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डायरी

मैं वह धनु हूँ...
अज्ञेय


मैं स्वल्प-सन्तोषी हूँ। पतझर के झरते पत्ते से अधिक सुन्दर किसी चीज़ की कल्पना नहीं कर पा रहा हूँ। यह धीरे-धीरे, लय के साथ डोलते हुए झरना-मानो धरती के गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होकर,भार-मुक्त तिरना-और उस मुक्त होने में लय पहचानना और उसके साथ एक-प्राण होना-सृष्टि-मात्र में इससे बड़ा सौभाग्य क्या और इससे बड़ा सौन्दर्य क्या... पत्ते यों झरते जाएँ और मैं उन्हें देखता जाऊँ-लगता है कि इसी में कालमुक्त हो जाऊँगा!

यों यह बात पते के बारे में जितनी है, खुद मेरे बारे में उससे अधिक है। यों भी जानता हूँ कि लययुक्तगति का मेरे लिए प्रबल आकर्षण है-कोई भी लययुक्त गति-फुलचुही का पंख फडफ़ड़ाते हुए क्षण-भर को अधर में अटक जाना; अच्छी तैराकी; घुड़-दौड़ की सरपट; अबाबील की लहराती या बाज की सीधी उड़ान; हिरन की छलाँग जो अपने शिखर पर एक साथ ही निश्चेष्ट और निरायास अग्रसरण हो जाती है-कथकिये के चक्कर या ततकार, पुङ् वादक की कूद... और यही क्यों, साँप का डोलना, नाली में काही का लहराना, केंचुए की चाल में लहराता-बढ़ता संकुचन-आस्फालन... लट्टू का घूमना, कुम्हार के चाक पर सकोरे का रूपायन, एंजिन के शाफ़्ट की खडक़न के साथ भाप की सीटी की ‘ताल वाद्य कचहरी’, कड़ाही में जलेबी के घोल की चुअन... सूची का कोई अन्त है?

एकाएक सोचता हूँ कि कितनी सुन्दर है दुनिया-क्योंकि कितनी लययुक्त गतियाँ दीखती हैं इसमें!

यह हो कैसे सकता है कि कोई अपना रास्ता चुने भी, और उस पर अकेला भी न हो? राजमार्ग पर चलने वाले रास्ता नहीं चुनते; रास्ता उन्हें चुनता है।

नहीं। मैं अकेलापन चुनता नहीं हूँ, केवल स्वीकार करता हूँ।

इसमें, और अपनी परिस्थिति सम्प्रेष्य बनाना चाहने में, कोई विरोध नहीं है। अकेलेपन को मैंने वरीयता नहीं दी, लेखक होने के नाते दूसरे तक पहुँचना-उसके भीतर पैठ कर उसे अपने भीतर पैठने देना-पैठाना-मैंने अनिवार्य माना है।

जो मेरा हो वह अनन्य मेरा हो, पर वह सह-संवेद्य अवश्य हो-नहीं तो उसके मेरा होने का भी और क्या प्रमाण है-होने का ही क्या प्रमाण है? अनुभूति स्वत:प्रमाण होती है, पर उसकी पहचान स्वत:प्रमाण नहीं हो सकती, क्योंकि पहचान जिस यन्त्र से होती है वह साझा है।

सर्जन-प्रक्रिया की जितनी चर्चा इधर हुई है उससे यह तो स्पष्ट हो ही जाना चाहिए कि सर्जन एक यन्त्रणा-भरी प्रक्रिया है। ‘भोगने वाले व्यक्ति’ और ‘रचने वाली मनीषा’ के अलगाव की पुरानी चर्चा में जब कहा गया था कि दोनों के बीच एक दूरी है और जितना बड़ा कलाकार होगा उतनी अधिक दूरी होगी, तब यह नहीं स्पष्ट किया गया था कि दूरी लाने की यह प्रक्रिया भी-और वही तो सर्जन-प्रक्रिया है!-कष्टमय है। न यही बताया गया था कि बड़ी दूरी ही आवश्यक है या कि जो भोगा गया (और जिससे दूरी चाही गयी) उसका भी बड़ा होना आवश्यक है? दूसरे शब्दों में क्या भावों से उन्मोचन ही महत्त्वपूर्ण है, या कि इसका भी कुछ मूल्य है कि वे भाव कितने प्रबल थे?

पुरानी चर्चा यहाँ फिर नहीं उठाना चाहता, न उलझन बढ़ाना चाहता हूँ। उसकी ओर ध्यान गया तो इसलिए कि वह एक दूसरे प्रश्न की पूर्व-पीठिका है। जो पुस्तक रची नहीं गयी, केवल जुड़ गयी है, उसके सन्दर्भ में क्या रचना-प्रक्रिया और इस यन्त्रणा का उल्लेख कुछ सार्थकता रखता है?

कहना चाहता हूँ कि हाँ, रखता है। जिन छोटे-छोटे प्रकरणों को जोडक़र यह पुस्तक बनी है, वे प्राय: सभी छोटे-छोटे युद्धों के इतिहास हैं : प्रत्येक के पीछे एक ‘यन्त्रणा-भरी प्रक्रिया’ रही है। इतना ही है कि समूची पुस्तक में एक ही रचना की प्रक्रिया में पायी हुई यन्त्रणा से मिलने वाली संहति नहीं है, यह फुटकर प्रक्रियाओं का कलन है जिनके पीछे उतनी ही फुटकर, विविध और वैचित्र्यमयी यन्त्रणाएँ रही हैं। संहति उसमें है तो रचना के माध्यम से नहीं, रचयिता के जीवनानुभव के माध्यम से। संवेदनशील यन्त्र के लिए भावानुभव का संग्रह, भोग और उससे उन्मोचन एक सतत् प्रक्रिया है। इस लिए अगर यह भी न कहें कि यह पुस्तक ‘बन गयी है’ या ‘जुड़ गयी है’, केवल यह कहें कि उपशीर्षक में बतायी गयी अवधि में ‘जितनी बनी’ या ‘जितनी जुड़ी’ उतनी ही है, तो भी सही होगा-बल्कि वही अधिक सही होगा। इसमें से कुछ छोड़ भी दिया जा सकता था, इस में कुछ जोड़ भी दिया जा सकता था। इसी अवधि में लिखा गया दूसरा कुछ या इससे पूर्व लिखा गया कुछ या आगे लिखा जाने वाला कुछ भी पुस्तक का अंग हो सकता था। क्रम भी बदला जा सकता था-जैसा कि चयन के दौरान कई बार बदला भी जाता रहा क्योंकि ‘जोड़ी हुई’ चीज़ में भी तो कुछ तारतम्यता होनी चाहिए...

इसी काल में ‘रचना’ भी हुई जो अलग छपी है और कुछ छपेगी। पाठक-वर्ग को उसी तक न रख कर लेखक के कुछ निकटतर आने देने का यह उपक्रम-उसका ‘वर्कशाप’ या ‘कंट्रोल पैनेल’ भी देखने का यह निमन्त्रण-ऐसा नहीं है कि अभूतपूर्व हो : मेरे लिए भी नहीं। और अगर यह प्रश्न हो कि ठीक इस समय क्यों, तो उसका भी उत्तर है; यद्यपि यह नहीं जानता कि वह उत्तर मुझे देना चाहिए या कि पाठक को स्वयं पाना चाहिए-अभी या कुछ समय बाद। मैंने कहा कि यह संकलन इससे पहले भी रुक सकता था, इससे आगे भी चलता रह सकता था; फिर भी यहीं ‘पूरा’ कर दिया गया। उसका कारण यही दे सकता हूँ कि अपने भीतर अनुभव किया कि यहीं-कहीं एक पड़ाव है, यहीं-कहीं से यात्रा एक नया मोड़ लेगी। ऐसा मैंने स्वयं जाना या अनुभव किया; किसी और के पास ऐसा मानने का कारण होगा या नहीं मैं नहीं जानता, न यही कह सकता हूँ कि मेरी बात को मानने या काटने के लिए उसके पास अभी यथेष्ट प्रमाण होगा या कि उसे और प्रतीक्षा करनी होगी, जब तक कि किसी नए मोड़ का कोई स्पष्ट संकेत परवर्ती रचना में ही उसे न मिले।

जिन्होंने इस अवधि की रचनाएँ भी पढ़ी हैं, उन्हें जगह-जगह उनकी अनुगूँज सुनाई देगी। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि उन में एक समान्तर यात्रा है-देश-काल दोनों में समान्तर। बल्कि यह कहें कि ‘यात्रा’ उन्हीं रचनाओं में है, यह उस यात्रा की ‘लॉग बुक’ है, जिसमें जब-तब दिक्काल की माप की टीप लिखी जाती रही है, जिसके आधार पर यात्रा के पथ-चिह्न, अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियाँ तथा धाराएँ, जोखम, भटकन, प्रत्युत्पन्न सूझ आदि का ब्यौरा मिलता रहे।

तो इस अवधि की अन्त:प्रक्रियाएँ देखने के इस ‘अन्तरिम’ निमन्त्रण का उद्देश्य यही है कि मेरे पाठक उस पूरे परिदृश्य, उस सागर-पथ का एक बार अवलोकन करके उसे पहचान लें जिसमें से मैं गुजरता आया हूँ। मेरे यान (अथवा नौका) के ‘कंट्रोल पैनेल’ (अथवा ‘एंजिन-रूम’) को भी देख लें जिसके सहारे मैं अपनी अवस्थिति, गति और दिशा शोधता रहा हूँ, और लॉग बुक देखकर प्रत्येक निर्णय तथा निर्णय करने वाली बुद्धि की भी परख कर लें। और, हाँ यह भी देख लें कि जो शक्तिचलाने वाली है वह सधती कैसे है।

लेखक के नाते मेरी यात्रा काफ़ी अकेली रही है, मैं जानता हूँ। कभी कोई कुछ दूर साथ चल लिये हैं तो मैं उनके लिए यात्रा के संयोगों का भी और उनका भी आभारी हूँ। ऐसी अकेली यात्रा में मैं भटक न जाऊँ या पाठक-समुदाय से सम्पर्क न गँवा बैठूँ, इसके लिए आवश्यक जान पड़ता है कि जब-तब उसे आमन्त्रित करके वह पूरा देश दिखा दूँ जिसमें से मैं अपनी राह खोजता रहा हूँ, वे यन्त्र-उपकरण भी दिखा दूँ जिनका मुझे सहारा रहा है, और उन यन्त्रों से लक्ष्य जितना, जैसा, जिधर दीखता है उसकी भी एक झाँकी उन्हें दिखा दूँ। मेरा पाठक-वर्ग बहुत बड़ा कभी नहीं होगा, निरी संख्या की मुझे आकांक्षा भी नहीं है, पर जितने भी पाठक हों वे मूल्यों के उस समूह के साझीदार हो सकें जिनकी खोज ही मेरी यात्रा का लक्ष्य और प्रेरणा-स्रोत रही है, तो मेरी अकेली यात्राओं में भी उन सबका साथ मुझे मिल गया होगा, मैं अपने कृति-कर्म को सफल मानूँगा।

सर्जनात्मक अन्त:प्रक्रिया एक सतत प्रक्रिया है; जिसमें नैरन्तर्य का भी उतना ही महत्त्व है जितना पूर्वापरता का। उस सतत प्रक्रिया में पाठक को सहयात्री के रूप में पा सकना या पाने का भरोसा बनाये रख सकना वह सम्बल है जो सर्जक को यात्रान्त तक ले जाता है। इसके बदले मैं पाठक को यही आश्वासन दे सकता हूँ कि मैं भी भरसक इस अन्त:प्रक्रिया में उसकी दिलचस्पी कम नहीं होने दूँगा-कि सह-यात्रा उसके लिए रोचक और स्फूर्तिप्रद बनी रहेगी। यह गर्वोक्ति नहीं है; एक आस्था की अभिव्यक्ति है। यदि मैं कृत-संकल्प हूँ कि केन्द्रीय प्रयोजनों और मूल्यों से विमुख नहीं होऊँगा, तो निश्चय है कि मेरा पाठक भी मेरे प्रयास को चित्ताकर्षक पाएगा-क्योंकि यह हो नहीं सकता कि उनसे उसका भी गहरा सरोकार न हो। अपने पाठक के प्रति यह निष्ठा मैंने जीवन-भर जो कुछ लिखा-रचा और प्रकाशित किया है उसकी मूल निष्ठा रही है।

जवाब? जवाब मैं नहीं जानता। दो-टूक एक जवाब-निर्विकल्प जवाब। यों रास्ते कई दीखते हैं इस जंगल में से निकलने के; पर जिधर भी थोड़ा बढ़ता हूँ एक सन्देह (जिसे सन्देह कहना भी ठीक नहीं क्योंकि वह एक प्रतिकूल निश्चय ही होता है) धर दबोचता है कि नहीं, यह रास्ता भी बाहर को नहीं है, जंगल के भीतर ही को मुड़ जाएगा! ध्रुव निश्चयपूर्वक इतना ही जान पाया हूँ कि जो जीवन जी रहा हूँ यह मेरा नहीं है। ऐसे नहीं जीना चाहता, ऐसे नहीं जी सकूँगा। जीना चाहता हूँ। पर जीना ऐसे नहीं। यह ऐसापन ही गलत है, जीवन नहीं।
कोरा असन्तोष होता तो वह भी बेकार होता। सिर्फ ‘जंगल से बाहर निकलने’ की आतुरता होती तो सोचता कि क्या वह भी एक प्रतीप पलायन नहीं है-कहाँ नहीं है जंगल? नहीं; कहाँ जाना-पहुँचना चाहता हूँ, उसका कुछ चित्र मन के सामने है। बल्कि वह न होता तो शायद इतना कष्ट भी न होता! समस्या यही है कि किस रास्ते से जाने से वहाँ पहुँच सकूँगा : इसी सवाल का साफ सीधा जवाब सामने नहीं है। लक्ष्य सन्दिग्ध नहीं है, कम से कम उतना नहीं, शायद कुछ द्विधा वहाँ भी हो, रास्ते ही सब सन्दिग्ध हैं।
और-फिलहाल-मैं स्वस्थ नहीं हूँ : अस्वस्थ हूँ और कष्ट में हूँ और नहीं जानता कि क्या करूँ। और शरीर का हाल पूछने वाले ये सब मुझे पागल किये दे रहे हैं!

म्युनिख के होटल के गलियारे में स्टीफेन स्पेंडर से अचानक मुठभेड़ हो गयी। बदहवास दीख रहे थे। दोनों ही ओर के ‘तुम यहाँ कैसे?’ के बाद (स्पेंडर बवेरिया सरकार के अतिथि होकर आए हुए थे और उनकी बड़ी आव-भगत हो रही थी), मैंने परेशानी का कारण पूछा तो बोले, ‘‘मुझे कुछ ऐसा लग रहा है कि मुझे बनाया जा रहा है।’’ मुझे याद आया, कई बरस पहले बम्बई में एक दूसरे अवसर पर भी स्पेंडर ने इससे मिलती-जुलती बात और भी जोरदार शब्दों में मुझसे कही थी : ‘‘आइ हैव एन अनकम्फर्टेब्ल् फ़ीलिंग आइ’म बीइंग मेड ए स्टूज ऑफ़, बट आइ डोंट नो बाई हूम!’’
पता नहीं स्पेंडर अपनी परेशानी का हल अभी तक जान पाए हैं कि नहीं। पर बात उनकी शायद आज के बौद्धिक की वास्तविक स्थिति का अच्छा-खासा चित्र प्रस्तुत कर देती है : कि यह अस्वस्ति-भाव तो आपके मन में है कि आपके निमित्त से कोई अपना उल्लू सीधा कर रहा है, पर यह समझ में नहीं आता कि कौन! तीस-एक बरस पहले उन के लँगोटिये साथी ऑडेन ने अपने समय के बौद्धिक की नियति का जो चित्र खींचा था-’टु डिफेंड द बैड अगेंस्ट द वर्स’ उससे स्पेंडर की स्थिति ज्यादा दर्दनाक पर शायद ज्यादा सच भी है। ऑडेन को काम अगर रद्दी जान पड़ता था तो कम-से-कम पता तो था कि क्या उससे अपेक्षित है! आज के बौद्धिक की समस्या यह नहीं है कि उसे ‘अच्छा’ चुनने की स्वतन्त्रता नहीं, केवल बदतर और बद के बीच चुनाव करने-भर की उसे छूट है। उसकी समस्या यह है कि वह यही जानने को स्वतन्त्र नहीं है कि उससे क्या चुनवाया जा रहा है-कि जिस मत-पत्र पर उससे हस्ताक्षर कराये जा रहे हैं उस पर क्या लिखा है यह उसे नहीं जानने दिया गया है।
परिणाम? वही ‘अनकम्फर्टेब्ल् फ़ीलिंग’-लेकिन बौद्धिक महोदय, आप करेंगे क्या?

लन्दन में एक लेखक-अध्यापक के घर में रहना हुआ था। वह स्वयं छुट्टी मनाने विदेश गया था, घर बन्द कर के ताली उसने बाहर पायदान के नीचे मेरे लिए रख दी थी कि जब भी पहुँचूँ घर खोल लूँ। और सब छूट थी, एक शर्त उसकी ओर से थी कि उसके अध्ययन-कक्ष की हर चीज़ ‘ज्यों की त्यों’ रहे : पुस्तकें मैं पढऩा चाहूँ तो पढूँ, कागज आदि भी गोपनीय नहीं हैं, पर कोई भी चीज़ अपने स्थान से हटी न पायी जानी चाहिए! पुस्तकें मैं यों भी देखना चाहता, पर इस शर्त के कारण ‘स्टडी’ में कौतूहल अधिक हुआ। घर में अपना सामान रख कर पहले उसी को देखने गया।

हर पढऩे-लिखने वाले को दूसरे की पढऩे-लिखने की जगह अव्यवस्थित लगती है, अपनी चाहे वह जैसे रखता हो। पर यह-! कमरे में दो बछड़ों को, या दो-चार अमेरिकी बच्चों को, ऊधम करने को छोड़ दिया जाता तो भी शायद इससे अधिक गड़बड़ी वे न कर पाते! तीन मेज़ों पर किताबें-कागज छितरे पड़े थे, फ़र्श पर भी कुछ ढेर और कुछ बिखरे कागज : बीच में जहाँ-तहाँ सीपियों, कटोरों, डिब्बों में बरसों नहीं तो महीनों की सिगरेटों की राख और मसले हुए टुकड़े, चिठ्ठियाँ, धूल, चाकलेट की पन्नी, पुराने स्लीपर, मैले मोजे, प्याले जिनमें चाय की तलछट सूख चुकी थी और फफुँदिया गयी थी, टूटी कंघियाँ, बियर के खाली डिब्बे... पूरी सूची की जरूरत नहीं है, इससे आगे स्थाली-पुलाक न्याय लागू हो सकता है। (सोचने की बात यह है कि अगर यह दाना है तो पूरी स्थाली क्या होगी!)

‘स्टडी’ मैंने ‘ज्यों की त्यों’ रहने दी! किताबें भी नहीं छुईं। शर्त के डर से नहीं, अपनी जान की खातिर।

जब मकान छोड़ा, तब घर बन्द कर के ताली पायदान के नीचे रख देने से पहले एक बार सारे कमरे देख लिए-सब कुछ पूर्ववत् है न? तब खयाल आया, यूरोप में कितने लोग कितना समय इसमें बिताते होंगे कि ‘सब कुछ पूर्ववत्’ छोड़ कर जाएँ-अपना निशान कहीं न छोड़ जाएँ! ‘गतिशील’-डायनैमिक-समाज का यह मूल्य है शायद; और अपनी छाप मिटाने तथा अपनी अस्मिता के मिटने में स्वयं योग देने में क्या बहुत बड़ा अन्तर है?
क्या समाज की गतिशीलता, समाज के भीतर इकाई की चलनशीलता (जो प्रगति का लक्षण मानी जाती है) का अनिवार्य परिणाम एक बना-बनाया ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ है?

एक दूसरी भी आग है जहाँ से शिखा ऊपर को उठती है।

यह मेरी देह है।

क्या ज़रूरी है कि यह आग चिता की आग हो? क्या यह यज्ञ की ज्वाला नहीं हो सकती?
चिति दोनों में है। आग के लिए मैंने क्या जुटाया, इससे क्या? यह तो सिर्फ जलने के लिए है। आग में मैं आहुति क्या दे रहा हूँ, इसी पर तो सब-कुछ है। क्या मैं फूँक रहा हूँ, या किसी चीज़ को शोध रहा हूँ?

थोड़ा-सा अस्वस्थ होता हूँ तो लोग चिन्तित हो उठते हैं। जो चिन्तित नहीं होते-यानी जिन्हें इससे वास्तव में कोई प्रयोजन नहीं है, वे भी ‘हाल पूछना’ अपना कर्तव्य समझते हैं और पूछ-पूछ कर बेहाल कर देते हैं।

सोचता हूँ : इस शरीर के थोड़े कष्ट की इतनी चिन्ता, और इसके भीतर जो जीव घुटन से छटपटा रहा है, धीरे-धीरे मर रहा है, उसके कष्ट का किसी को पता भी नहीं है!

नीम-बेहोशी के पार से डॉक्टर की आवाज़ (नीम-बेहोशी में ऐसा लगता है, जैसे गहरी डुबकी के दौरान कुछ सुन रहे हों-एक तरफ़ तो ठीक से सुनाई नहीं देता, दूसरी तरफ ऐसा लगता है कि सिर्फ कान से नहीं, सारी देह से सुन रहे हैं!) पूछती है : ‘दर्द कैसा है?’
मैं कहता हूँ, ‘‘बहुत है।’’
‘‘इज इट इंटालरेबल्? (क्या असह्य है?)’’
मैं फिर कहता हूँ, ‘‘इट इज़ सिवीयर। (तीखा है।)’’
वह ज़िद करते हैं ‘‘इज़ इट इंटालरेबल्?’’
नशे की झील में मुझे लगता है, वह व्यर्थ का सवाल पूछ रहे हैं-अर्थहीन सवाल। मैं चिढ़-सा कर उत्तर देता हूँ : ‘‘कहा तो, डॉक्टर, कि सिवीयर है। इंटालरेबल् का मतलब है कि या तो मैं चीखूँ-चिल्लाऊँ, या फिर बेहोश हो जाऊँ। आप देख रहे हैं कि होश में हूँ, और सह रहा हूँ।’’
डॉक्टर थोड़ी देर अचकचाये-से मेरी ओर देखते हैं। फिर सिर एक ओर को झुका कर चल देते हैं।

बाद में मुझे बताया गया, डॉक्टर कह रहे थे, ‘‘अजीब पेशेंट है। दिल के दौरे में और मार्फ़िया के नशे में लफ़्ज़ों पर बहस करता है।’’
क्यों न करूँ? इंटालरेबल् : यानी जो सहा न जाए। सह तो रहा हूँ-भाषा के साथ आप का अन्याय भी तो सह ही रहा हूँ!

हमारे मध्यवर्ग की प्रतिभा मर गयी है, सचमुच बिलकुल मर गयी है। शायद उस वर्ग के लेखकों की भी। या कि अँग्रेज़ी घुन सब को खा गया है। (तभी एक आयातित राजरोग को ‘फिरंगदोष’ कहा गया था!) हर मध्यवर्गीय घर में कमब$ख्त मनीप्लांट पनप रहा है, या बेशर्म कैक्टस कंटकित हो रहे हैं; हर घर में न पाये जाएँ तो हर समकालीन कहानीकार या उपन्यासकार (नर या मादा) की कल्पना पर तो छाये ही हुए हैं। पर अभी तक किसी को किसी देशी भाषा में इसका नाम नहीं सूझा-न अँग्रेज़ी नाम को ही ठोक-पीट कर देसी बना लिया गया। इस से तो पिछली पीढ़ी कहीं अच्छी थी जिसने डैफोडिल को गुण-केसरी नहीं भी कहा तो बूगोनविलिया को बेगमबेली तो बना ही लिया। सुना है कि पश्चिम के नृतत्त्वविदों ने प्रयोग के लिए एक आदिम जाति के कुछ परिवारों को हटा कर एक नितान्त अपरिचित भौगोलिक परिवेश में बसा दिया तो एक वर्ष बाद पाया कि नए द्वीप-देश में उन्होंने चार सौ से अधिक पेड़-पौधों को न केवल अपने नाम दे दिये थे वरन् उनकी तासीर को भी सूचीबद्ध कर लिया था। यह होती है जीवन्त जाति की परम्परा-सृष्टि; और वह होती है-क्या? मनीप्लांट असल में प्लांट नहीं है, एक परोपजीवी उद्भिज है : मनीप्लांट-मणि बेल-मणियर बेल-कौडिय़ा बेल... इतने ठट्ठ के ठट्ठ कवि बिम्ब-रचना पर पिल पड़े है; उतने ही कहानीकार प्रतीक पर प्रतीक उगल रहे हैं-क्या सामूहिक कल्पना चार-छह नाम नहीं चस्पाँ कर दे सकती?


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