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आत्मकथा

फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष
तोताराम सनाढ्य


समर्पण

सन 1879 से ले कर सन 1916 तक 60,553 भारतीय गिरमिट की प्रथा में फँसकर फिजी द्वीप में गए। गिरमिट की अवधि को पूरी कर कितने ही भारतीय स्वदेश लौट आये, मगर इनमें से अधिकतर फिजी में ही रह कर स्वतंत्र रूप से खेती तथा व्यापार करने लगे। इनमें से अधिकांश अशिक्षित थे, फिर भी उन्होंने अपनी लगन और मेहनत से फिजी के सामाजिक तथा आर्थिक विकास में पूरा-पूरा हाथ बँटाया। आर्थिक कठिनाइयों को झेलते हुए तथा भेदभावों का सामना करते हुए भी अपनी संतानों को शिक्षित करने में कोई कोर-कसर नहीं रखी। इन्हीं पूर्वजों की मेहनत और त्याग के फलस्वरूप फिजीद्वीप आज 'प्रशांत महासागर के स्वर्ग' के नाम से प्रसिद्ध है।

इन साठ हजार पाँच सौ तिरपन गिरमिटिया में से स्वर्गीय सरदार श्री रामउग्रह भी एक श्रमिक थे। आपका जन्म यू.पी. के गोरखपुर जिले में हुआ था। सन 1904 में आरकटियों के चंगुल में फँस कर आप फिजीद्वीप गए थे। अपनी गिरमिट की अवधि समाप्त करने के बाद सारू, लटौका में जमीन लेकर स्वतंत्र रूप से खेती तथा व्यापार करने लगे। आप तथा आप के पुत्र स्वर्गीय श्री सरजूप्रसाद जी धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में सदा अग्रसर रहे। सरदार श्री रामउग्रह के पौत्र तथा स्वर्गीय श्री सरयू प्रसाद के सुपुत्र लटौका के लोकप्रिय बैरिस्टर श्री सुरेंद्रप्रसाद जी, एल.एल.बी. भी अपने पूर्वजों की तरह धार्मिक, सामाजिक तथा शिक्षा के क्षेत्र में एक उत्साही कार्यकर्ता हैं। आप में भारतीय संस्कृति का अभिमान है। आपकी यह धारणा है कि फिजीद्वीप के विकास में भारतीयों के गिरमिटिया पूर्वजों ने जो बलिदान किए थे उन्हें उनकी भावी संतानों को तथा अन्य फिजीवासियों को कदापि नहीं भूलना चाहिए। बैरिस्टर श्री प्रसाद के उत्साह तथा सहयोग से हम पाठकों के समक्ष इस संस्करण को प्रस्तुत करने में समर्थ हुए हैं।

कृतज्ञतास्वरूप यह पुस्तक स्व० सरदार श्री रामउग्रह की आत्मा को सादर समर्पित है।

ज्ञानपुर बनारसीदास चतुर्वेदी

जिला - वाराणसी

अक्टूबर 1972



लटौका, फिजी के स्वर्गीय सरदार श्री रामउग्रहजी


श्रद्धांजलि

महात्मा गाँधी

वयोवृद्ध तोतारामजी किसी से भी सेवा लिए बगैर गए। ये साबरमती आश्रम के भूषण थे। विद्वान तो नहीं पर ज्ञानी थे। भजनों के भंडार थे, फिर भी गायनाचार न थे। अपने एकतारे और भजनों से आश्रमवासियों को मुग्ध कर देते थे। जैसे वे, वैसे ही उनकी पत्नी भी थीं। पर तोतारामजी पहले ही चल बसे!

जहाँ आदमियों का जमाव रहता है, वहाँ तरह- तरह के झगड़े चलते ही रहते हैं। मुझे एक भी मौका याद नहीं, जिसमें इस दंपत्ति ने भाग लिया हो या ये किसी तरह के झगड़े की जड़ बने हों। तोतारामजी को धरती प्यारी थी। खेती उनका प्राण थी। आश्रम में वे बरसों पहले आये और कभी उसे नहीं छोड़ा। छोटे-बड़े स्त्री- पुरुष उनके मार्गदर्शन के भूखे रहते। उनसे अचूक आश्वासन पाया करते।

वे कट्टर हिंदू थे। पर उनका हृदय हिंदू, मुसलमान और अन्य धर्मियों के प्रति समान रहा, उनमें अस्पृश्यता की बू तक न थी और न किसी तरह का व्यसन ही था। राजनीति में उन्होंने भाग नहीं लिया। फिर भी उनका देश-प्रेम चाहे जिसकी तुलना में खड़ा रह सके, इतना उज्ज्वल रहा। त्याग उनमें सहज ही था। उसे ही वे शोभित करते थे।

ये फिजीद्वीप गिरमिटिया के तौर पर गए थे। दीनबंधु एंड्रूज ने ही उन्हें खोज निकाला था। उन्हें आश्रम में लाने का श्रेय श्री बनारसीदास चतुर्वेदी को है। उनकी अंतिम घड़ी तक जो कुछ सेवा हो सकती थी, वह भाई गुलाम रसूल कुरैशी की पत्नी और इमाम साहब की बहन ने की थी। "परोपकाराय सतां विभूतय:"- तोतारामजी में अक्षरशः सत्य रहा।

['अंतिम झांकी' पुस्तक से, नवजीवन ट्रस्ट की अनुमति से साभार]



स्वर्गीय पं. तोतारामजी सनाढ्य

ग्रंथकर्ता की प्रार्थना

प्रिय देशबंधु!

मैं वास्तव में उन महानुभावों का अत्यंत कृतज्ञ हूँ, जिन्होंने मेरी इस क्षुद्र पुस्तक को अपना कर मेरे प्रयत्न को सफल किया है। जिन समाचार-पत्रों के संपादकों ने मुझे इस कार्य में सहायता दी है, उनका मैं आजन्म ऋणी रहूँगा। मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने उनकी सहायता का दुरूपयोग नहीं किया है। यह उन्हीं की कृपा का फल था कि मैं चार सौ से अधिक प्रतियाँ हरिद्वार, कुंभ, लखनऊ साहित्य सम्मेलन तथा मद्रास कांग्रेस के उत्सव पर बिना मूल्य वितरण कर सका, और उन्हीं की मदद के कारण मेरी तुच्छ पुस्तक को आशातीत सफलता प्राप्त हुई। जो थोड़ा सा काम मैं इस विषय में अपनी तुच्छातितुच्छ बुद्धि के अनुसार करता हूँ, उसके लिए मुझे प्रशंसात्मक शब्दों तथा धन्यवादों की आवश्यकता नहीं हैं, क्योंकि ऐसा करना मेरा कर्तव्य ही है।

यदि हो सका तो शीघ्र ही मैं अपनी दूसरी पुस्तक ले कर आपकी सेवा में उपस्थित होऊँगा।

विनीत

तोताराम सनाढ्य


लटौका, फिजी के श्री सुरेंद्र प्रसाद बैरिस्टर


दो शब्द

इस पुस्तक का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुए अट्ठावन वर्ष हुए हैं। इन अट्ठावन वर्षों में फिजी के भारतीयों की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुके हैं।

सन 1919 में फिजी के अधिकांश भारतीय शर्तबँधे मजदूर तथा कुछ इनके संतान थे। वे ज्यादातर मजदूर ही थे। मगर कुछ किसान और छोटे व्यापारी भी थे।

आज फिजीद्वीप की आबादी लगभग 5,40,000 है जिसमें करीब 2,40,000 आदिवासी तथा शेष अन्य जाति के लोग हैं। अभी भी काफी तादाद में भारतीय मजदूर हैं, मगर अधिकांश किसान हैं, कई छोटे तथा बड़े व्यापारी भी हैं, कुछ डाक्टर, वकील इत्यादि हैं, और कई उच्च सरकारी पदों पर हैं। शर्तबंदी के जमाने के समय से अनेक अन्यायों को सहते हुए भी भारतीयों ने आर्थिक सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है।

भारत से 12,000 मील दूर होते हुए भी तीसरी और चौथी पीढ़ी के भारतीयों ने फिजी में अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और धर्म को सुरक्षित रखा है। फिजी में आर्य समाज, सनातन धर्म, मुसलिम लीग, कबीर पंथ सभा, सिक्ख गुरुद्वारा समिति आदि धार्मिक संस्थाएँ अपना-अपना कार्य आनंद-पूर्वक कर रही हैं। दीपावली, होली, रामनवमी, ईद इत्यादि त्यौहार आज उसी तरह मनाए जाते हैं जैसे वे पचास वर्ष पहले मनाए जाते थे। अंग्रेजी शिक्षा प्रचलित होते हुए भी 95% भारतीय अपने घरों में हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं।

लटौका (फिजीद्वीप) 30 नवंबर 1972 सुरेंद्र प्रसाद


आज का फिजी

आज का फिजी ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंतर्गत एक स्वतंत्र देश है। इसकी जनसंख्या 5,35,375 है। इनमें भारतवंशियों की संख्या 2,72,040 है, मूल निवासियों की संख्या 2,39042 है तथा शेष यूरोपियन, चीनी तथा दूसरे द्वीपों के लोग हैं।

फिजी में दो प्रमुख पार्टियाँ हैं, एलायंस और नेशनल फेडरेशन। फिजी की वर्तमान सरकार एलायंस पार्टी की है और प्रधानमंत्री रातु सर कामिसेसे मारा हैं। विरोधी दल के नेता हैं श्री एस० एम० कोया।

अब तक फिजी के प्रमुख व्यवसाय चीनी, नारियल और सोना रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से पर्यटन व्यवसाय में भी भारी प्रगति की है तथा वर्तमान समय में यह दूसरे नम्बर का व्यवसाय है और संसार के हर कोने से सैलानी फिजी आने लगे हैं। वर्तमान सरकार नए व्यवसायों को भी प्रोत्साहन दे रही है।

फिजी की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है, किंतु मूल निवासियों की भाषा तथा हिंदी को भी मान्यता प्राप्त है। हिंदी फिल्म तथा भारतीय संगीत फिजी में काफी लोकप्रिय है। दिवाली, होली, ईद आदि पर्व फिजी में बड़े समारोह के साथ मनाए जाते हैं। "वनुआलेवु" द्वीप की रामलीला तीन दिन तक चलती है और मीलों चल कर लोग इसमें भाग लेते आते हैं। सुवा के गिरजाघरों में भी दिवाली के दीये जलते हैं।

आज के फिजी में अनेक भाषों और अनेक संस्कृतियों का संगम है। देश की उन्नति के लिए सभी जातियाँ शांति और सहयोग से परिश्रम कर रही हैं। वर्तमान सरकार के मंत्रिमंडल में सभी प्रमुख जातियों के लोग हैं। तीन सरकारी विभागों के मिनिस्टर भारतवंशी हैं। फिजी के प्रथम स्थानीय गवर्नर जनरल रातू जॉर्ज दकांबाऊ नियुक्त हुए हैं।

गिरमिट में आये हुए भारतीयों की संतानों ने तथा भारत से बाद में आये हुए लोगों ने अन्य जातियों के साथ मिल कर फिजी के विकास के लिए कठिन परिश्रम किया है। इनमें से कई आज उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे हैं। ये सब आज फिजी राष्ट्र के नागरिक हैं। आज के फिजी के साथ भारत का संपर्क काफी घनिष्ट है। प्रतिवर्ष भारी संख्या में फिजी के विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए भारत जा रहे हैं, इनमें कई विद्यार्थी इस देश के मूल निवासी भी हैं। भारत से आये हुए अध्यापक, डाक्टर तथा अन्य विशेषज्ञ फिजी को अपनी सेवा प्रदान कर रहे हैं। फिजी के अनेक प्रमुख नागरिक भारत सरकार के अतिथि के रूप में भारत की यात्रा कर चुके हैं। इनमें फिजी के वर्तमान प्रधानमंत्री भी हैं। रातू सर कामिसेसे मारा, जिन्हें स्नेह से केवल "रातुमारा" भी पुकारा जाता है, एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनमें आकर्षण है, नेतृत्व की शक्ति है और धार्मिक सहिष्णुता भी। व्यक्ति की समानता और चरित्र की गंभीरता के बल पर फिजीद्वीप का ही नहीं बल्कि सारे दक्षिण प्रशांत के स्वतंत्र राष्ट्रों का नेतृत्व सँभाले हुए हैं और वह भी केवल भाई-चारे के नाते।

आज के फिजी के अंतरजातीय एकता और सद्भावना फिजी के उज्ज्वल भविष्य की सूचक है। एक ऐसा भविष्य जबकि फिजी पूर्ण रूप से दक्षिण प्रशांत का स्वर्ग बन सकता है।

फिजी के भारतवंशी तमिल, तेलुगू, केरल, बिहार, यू०पी०, राजस्थान तथा पंजाब आदि प्रान्तों से आये थे आज आज वे अपने परिवार सहित हिंदी बोलते हैं। फिजी रेडियो पूरे दिन हिंदी का प्रोग्राम चालू रखता है। हिंदी के चार साप्ताहिक पत्र हैं।

काईवीती लोग बड़े सरल, धर्मप्रेमी और गाने तथा खेलने के बड़े शौकीन हैं। उनके जीवन में सामाजिक अनुसाशन भी है। उनके गाँव छोटे परंतु बहुत ही परंतु, फूल-पत्ते एवं फलयुक्त हैं। सबका स्वागत वे सहज मुस्कान से करते और शौक से हाथ मिलाते हैं। भारतीय, फिजियन और चीनी सभ्यताओं और जातियों की त्रिवेणी फिजी देश को रंगीन और शस्य-श्यामला बनाये हुए है। आज के फिजी का वर्तमान सुखद और रंगीन मनोरंजक है और भविष्य आकर्षक, उन्नत और धन-धान्यपूर्ण।

22 नवंबर, 1972 भगवानसिंह

(फिजी में भारत के हाई कमिश्नर)


प्रकाशक का निवेदन

(द्वितीय संस्करण से)

पाठकगण!

आज आप लोगों की सेवा में "फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष" नामक पुस्तक का द्वितीय संस्करण ले कर उपस्थित होते हैं। वास्तव में हम उन महानुभावों को धन्यवाद देते हैं, जिनकी कृपा से हमें द्वितीय संस्करण प्रकाशित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। निम्नलिखित पत्रों के संपादकों और संचालकों के हम अत्यंत ऋणी तथा कृतज्ञ हैं।

भारतमित्र, हिंदी चित्रमय जगत, नवजीवन, प्रताप, विद्यार्थी, सुधानिधि, प्रभा, जैनहितैषी, प्रभात, भारतसुदशा प्रवर्तक, तरंगिणी, हिंदी समाचार, नवनीत, भारतोदय, चतुर्वेदी, अभ्युदय और सद्धर्मप्रचारक।

पुस्तक की सफलता

यद्यपि यह प्रकाशक को यह शोभा नहीं देता कि अपनी पुस्तक के विषय में प्रंशसायुक्त शब्द कहे, क्योंकि लोग उसे नोटिसबाजी ख्याल कर सकते हैं, तथापि हम दो-चार शब्द पुस्तक की सफलता के विषय में कहने से रुक नहीं सकते। इसका कारण यही है कि जिन पत्रों के संपादकों तथा संचालकों ने हमें कृपापूर्ण सहायता दी है, उनकी सेवा में हम निवेदन कर देना चाहते हैं कि आपकी सहायता का सर्वदा सदुपयोग ही हुआ है। हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली, गुजराती तथा उर्दू व मराठी पत्रों ने इस पुस्तक के बारे में जो सहमतियाँ दी हैं, उनसे पुस्तक के सफलता का कुछ-कुछ पता लग सकता है।

बंगाली के 'भारतवर्ष' नामक मासिक पत्र में, जो कि बंगाली भाषा में ही नहीं बल्कि भारत की सारी देशी भाषाओं में सर्वोत्कृष्ट मासिक पत्र है, इस पुस्तक के विषय में एक सचित्र प्रशंसात्मक लेख छपा था। इस लेख के लेखक श्रीयुत हंसेश्वर देव शर्मा, एम०ए० हैं। पूना के सुप्रसिद्ध मराठी पत्र 'केसरी' ने डेढ़ कालम में इस पुस्तक की बड़ी बढ़िया आलोचना की, जिसका फल यह हुआ कि चार महाराष्ट्रियन सज्जनों ने इस पुस्तक के मराठी अनुवाद करने की आज्ञा माँगी। हर्ष की बात है कि खानापुर बेलगाँव से निकलने वाली प्रसिद्ध मराठी पुस्तक 'लोकमित्र' के उप-संपादक श्रीयुत सीताकांतजी ने इस पुस्तक का मराठी अनुवाद कर लिया है। यह अनुवाद शीघ्र ही प्रकाशित होगा। सुप्रसिद्ध गुजराती पत्र 'प्रात:काल' के संपादक इस पुस्तक का गुजराती अनुवाद प्रकाशित करेंगे। इस पुस्तक का उर्दू अनुवाद हो चुका है। अनुवादक हैं हिंदी के प्रसिद्ध राष्ट्रीय लेखक श्रीयुत पीर मुहम्मदजी मूनिस। हम आपके अत्यंत अनुगृहित हैं। यह अनुवाद बहुत जल्द छपेगा। युक्त प्रांत के सर्वोत्तम अंग्रेजी पत्र 'लीडर' के संपादक ने एक बड़ी जोरदार संपादकीय टिप्पणी इस पुस्तक के विषय में लिखी थी। इस टिप्पणी में उन्होंने लिखा था " We hope the startling facts disclosure made in this book will receive the best attention from the Government of India." अर्थात "हम आशा करते हैं कि जो आश्चर्यदायक पोलें इस पुस्तक में खोली गयीं हैं उनकी ओर भारत सरकार का ध्यान आकर्षित होगा।" सर्वश्रेष्ठ भारतीय मासिक पत्र Modern Review के संपादक ने अपनी एक संपादकीय टिप्पणी में लिखा था "It would be good if somebody could publish an English translation of Pandit Totaram's Hindi book. For its own information the Government of India might get it translated." अर्थात "यदि कोई पंडित तोताराम की हिंदी पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद कर दे तो बड़ी अच्छी बात हो। भारत सरकार ही अपने लिए अनुवाद करा ले।" इस टिप्पणी के प्रकाशित होने के दो-चार दिन बाद ही प्रसिद्ध भारत हितैषी मिस्टर सी० एफ़० एंड्रूज का कृपापत्र आया उसमें उन्होंने लिखा था, "I have got a translation made for me of your excellent book. It is very nearly completed. I shall use it freely." अर्थात मैने आपकी अत्युत्तम पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद अपने लिए करवा लिया है। यह अनुवाद लगभग समाप्त हो गया हैं। मैं इसका खूब प्रयोग करूँगा।

बड़े-बड़े विद्वानों की सम्मति में कुली प्रथा के विरुद्ध आंदोलन में इस पुस्तक ने बड़ी सहायता दी है। मिस्टर एंड्रूज ने लिखा था, "मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि शर्तबंदी की गुलामी उठा देने में इस पुस्तक से बड़ी भारी सहायता मिलेगी।"

भारत के कई प्रसिद्ध नेताओं ने इस क्षुद्र पुस्तक को पढ़ लिया है और संतोष प्रकट किया है। फिजीद्वीप में इस पुस्तक का अच्छा प्रभाव पड़ा है। इन बातों पर विचार करते हुए यह कहना अनुचित न होगा कि इस क्षुद्र पुस्तक को पूरी-पूरी सफलता प्राप्त हुई है।

ग्रंथकार के विषय में दो बातें

पुस्तक के रचयिता पं० तोतारामजी सनाढ्य के बारे में दो-चार बातें कहना हमने अत्यंत आवश्यक समझा है। इसके कई कारण हैं। कुछ लोग तो तोतारामजी को कोरम कोर कुली ही समझते हैं और कुछ लोग उन्हें "भारत गौरव'' महापुरुषों की कोटि में रखकर अत्युक्ति कर देते हैं। पं० तोतारामजी इन दोनों में से कोई भी नही हैं। पंडितजी एक साधारण आदमी हैं। आप हिंदी पढ़ लिख सकते हैं। फिजीयन भाषा के आप अच्छे ज्ञाता हैं और सिर्फ थोड़ी-सी टूटी-फूटी अंग्रेजी भी जानते हैं। अंग्रेजी से हिंदी तथा हिंदी का अनुवाद दूसरों से कराना पड़ता है। जो लोग पंडितजी को बढ़े-चढ़े विद्वान समझते हैं वे भूल करते हैं। हाँ, हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि पंडितजी कट्टर देशभक्त हैं और बड़े अनुभवी हैं। फिजी के प्रवासी भारतवासियों के लिए आपने जो काम किया है, तथा जो आप कर रहे हैं, वह अत्यंत प्रशंसनीय है। आपके फिजी के कार्य के विषय में हम अपनी ओर कुछ न कह कर एक अभिनंदन पत्र से जो फिजी प्रवासी भारतीयों ने आपको भेंट किया था, कुछ वाक्य उद्धृत करते हैं।

"आपने 21 वर्ष रहकर हम सब फिजी प्रवासी भारतवासियों के साथ जो भलायी की है, उसके लिए हम सब आप के आजन्म ऋणी रहेंगे। आपने सनातन धर्म की पताका को फिजी में फहरा कर हम सबको धर्म में प्रवृत्त किया। ईश्वर आपको इस उपकार का बदला देगा। महात्मा गांधी और डाक्टर मणिलालजी से पत्र-व्यवहार करके डाक्टर मणिलालजी को बुलाने के लिया पैसा इकट्ठा करने के निमित्त आप अपनी गाँठ का पैसा खर्च कर पहाड़ व जंगलों में कोठियों में घूमे और अपनी स्त्री और बच्चों की परवाह न करके 2600 रुपये इकट्ठे किए और मणिलालजी को बुलाया। यह कहना अनुचित न होगा कि डाक्टरजी आज आप ही के कठिन परिश्रम से आये हैं। 'भारत सरकार ने जो कमीशन हम लोगों के दुःख की जाँच करने के लिए भेजा था, उसके जाँच करने की सूचना फिजी के एजेंट जनरल ने यहाँ के गोरे जमींदारों को दे दी थी, हम लोगों को स्वप्न में भी कमीशन के आने की खबर न थी! आपने ऐसे समय बुद्धिमत्ता दिखा, कुली एजेंट से उपरोक्त कमीशन की जाँच का नोटिस ला कर अंग्रेजी से हिंदी में तजुर्मा कराके तमाम कोठियों में पहुँचाया......... और भी कुंती का दुःख देख उस पर गुजरे जुल्म आपने ही भारत के समाचार पत्रों में उद्धृत कराके भारत के नेता तथा सरकार तक पहुँचाये। आपने ही यह बात एजेंट जनरल तक पहुंचायी कि हिंदू मुसलमानों के धार्मिक विवाहों को सरकार स्वीकार करे...।

30 मार्च 1914 के पैसिफिक हैराल्ड नामक गोरों के एक पत्र ने लिखा था-

"Tota Ram is leaving for good and his departure is much felt by the Indians of Fiji, as he has been one of the leading Aryan lecturers and debaters in the colony. It is note-worthy that Pandit Tota Ram is the first Indian who has received an address from his fellow countrymen in Fiji."

अर्थात पं० तोताराम हमेशा के लिए फिजी को छोड़ कर जा रहे हैं। उनके जाने से फिजी प्रवासी भारतवासियों को बड़ा खेद हुआ है, क्योंकि वे इस उपनिवेश में आर्यधर्म पर व्याख्यान देनेवाले तथा शास्त्रार्थ करनेवालों में से एक मुख्य पुरुष रहे हैं.......यह बात ध्यान देने योग्य है कि पं० तोतारामजी ही पहले भारतवासी हैं, जिन्हें कि अपने फिजी प्रवासी देश-भाइयों से अभिनंदन-पत्र मिला है।

प्रसिद्ध मिशनरी मिस्टर जे० डब्ल्यू० बर्टन साहब ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'फिजी आव टुडे' Fiji of To-day में आपको 'A well educated Brahmin- clearheaded and cool debater' एक सुशिक्षित ब्राहमण, शुद्ध मस्तिष्क वाला और शंतिपूर्वक शास्त्रार्थ करने वाला लिखा है और आपको फिजी के हिंदुओं का मुखिया समझा है।

भारत में आपको आये हुए एक साल हो गया। इसी बीच में आपने कुली-प्रथा के विरुद्ध बहुत कुछ आंदोलन किया है। कलकत्ता, लाहौर, अंबाला, मथुरा आदि अनेक स्थानों में आप कुली-प्रथा के विरुद्ध व्याख्यान दे चुके हैं। मद्रास कांग्रेस में आप फिजी के प्रतिनिधि हो कर सम्मिलित हुए थे और कांग्रेस के प्लेटफार्म से आधे घंटे तक राष्ट्रभाषा हिंदी में कुली-प्रथा के विरुद्ध व्याख्यान दिया था। सुप्रसिद्ध पत्र 'भारत मित्र' ने लिखा था, "कुलियों के कष्टों के बारे में हमारे पाठक बहुत कुछ नहीं जानते हैं, परंतु कांग्रेसवाले इस विषय में कुछ भी नहीं जानते। यदि फिजी प्रवासी भाई तोतारामजी को अपना प्रतिनिधि बना कर न भेजते तो इसकी भी आशा न थी।" हरिद्वार के कुंभ पर अपने निज के व्यय से बारह दिन तक कुली-प्रथा के विरुद्ध प्रचार किया था और पचास हजार विज्ञापन आरकाटियों के विरुद्ध बँटवाए थे। कितने ही गावों में घूम-घूमकर अपने टापुओं के दुःख सुनाए हैं। इस विषय में आप बिना किसी दूसरे की सहायता के सात सौ रूपए अपने गाँठ से खर्च कर चुके हैं। फिजी में भी कुली-प्रथा के विरुद्ध आपने बहुत काम किया ही था। 23 सितंबर, 1912 को आपने राजर्षि गोखले की सेवा में बांकीपुर कांग्रेस को निम्नलिखित तार भेजा था:

Indians Fiji wish success congress move resolution stop recruitment coolies disproportion women murders crimes immorality differential treatment education representation grievances many ill-treatments plantations.

फिजी की धार्मिक स्थिति सुधारने के लिए भी आपने कुछ काम किया था। यह आपके ही प्रयत्न का फल था कि सन 1902 ई० में फिजी के नाबुआ जिले में रामलीला प्रारंभ हुई। लगातार आपने सात-आठ वर्ष तक आपने रामलीला का वहाँ प्रबंध किया था। यह रामलीला दो उद्देश्यों से करायी जाती थी। एक तो यह कि प्रवासी भारतवासियों के हृदय में अपने धर्म तथा अपने उत्सवों पर श्रद्धा बनी रहे तथा शर्तबंदी भाई- बहनों के दुखों को जानने का अवसर मिले।

पं० तोतारामजी जो उपयोगी काम आजकल कर रहे हैं उसमें उन्हें दूसरों की सहायता की बड़ी आवश्यकता है। यदि अन्य लोग इस कार्य में उनका हाथ नहीं बटाएँगें तो अर्थाभाव के कारण दो-चार महीने बाद अपना काम छोड़ पड़ेगा।

हम तोतारामजी के अत्यंत कृतज्ञ हैं कि उन्होंने अपनी इस पुस्तक को भारती भवन द्वारा प्रकाशित करा कर भवन की ख्याति को बढ़ाया है।

निवेदक

सभासद-भारती भवन

निवेदन

15 जून, 1914 को मैं अपने क्षुद्र जीवन का एक चिरस्मरणीय दिवस मानता हूँ। उस दिन कुझे फिरोजाबाद के हिंदी पुस्तकालय भारती भवन में फिजी से लौटते हुए पं० तोतारामजी सनाढ्य के प्रथम दर्शन हुए थे।

भवन के मैनेजर लाला चिरंजीलाल ने मुझे से उनका परिचय कराते हुए कहा था:

"इनसे मिलिए। ये पं० तोतारामजी हैं, जो अभी हाल में फिजी से लौटे हैं।"

मैंने तुरंत ही पंडित जी से कहा-"भारत-मित्र में मैंने आपके भाषण का सारांश पढ़ा था। आप अपने अनुभव क्यों नहीं लिख देते?"

पंडितजी ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया-"मैं कोई लेखक तो हूँ नहीं। अगर कोई लिखने वाला मिल जाय तो मैं अपनी अनुभूतियाँ उसे सुना सकता हूँ।" मार्च, 1912 में मेरे लेखक जीवन का प्रारंभ हो चुका था और मेरे कितने ही लेख पत्रों में छप भी चुके थे। मैंने मन में सोचा कि यदि पंडितजी के अनुभव लिख सकूँ तो एक छोटी-सी पुस्तिका बन ही सकती है। पर मैं उन दिनों फर्रुखाबाद के सरकारी स्कूल में तीस रुपये महीने पर अध्यापक था और जनता में सरकार के विरुद्ध आंदोलन करने वाली किसी भी पुस्तक पर मैं अपना नाम दे ही नहीं सकता था।

भवन से निकलकर हम दोनों चल दिए। मैं पंडितजी को अपने घर ले आया। कुछ देर बातचीत होने के बाद यह तय पाया गया कि पंद्रह दिन तक पंडितजी नित्य प्रति मेरे घर पधार कर अपने अनुभव सुनाएँ और मैं उन्हें लिपिबद्ध कर दूँ।

इस प्रकार मेरा काम एक क्लर्क का ही था। हाँ, मैंने तथ्यों तथा अंकों को इकट्ठा करके पंडितजी की रामकहानी को जामा जरूर पहना दिया था। पुस्तक हम दोनों के सम्मिलित उद्योग से बनी थी, पर उस पर नैतिक अधिकार तो पंडितजी का ही था। पुस्तक के छपते ही जो घनघोर आंदोलन उठ खड़ा हुआ, उसकी मैंने कल्पना भी न की थी। उसके चार भिन्न-भिन्न अनुवाद गुजराती में हुए, दो अनुवाद बँगला में, एक मराठी में और श्री पीर मुहम्मद मूनिस ने उसका अनुवाद उर्दू में किया। उसका अंग्रेजी अनुवाद करा कर दीनबंधु एंड्रूज फिजी लेते गए। राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी किसान नामक पुस्तक उसी के आधार पर लिखी तथा कवियित्री सुभद्राकुमारी चौहान के पूज्य पति श्री लक्ष्मण सिंह चौहान ने कुली-प्रथा नाटक उसी से प्रेरित हो कर प्रताप में छपाया, जिसे सरकार ने जब्त कर लिया। लोकमान्य तिलक के केसरी में उस पर दो बार अग्रलेख निकले थे और क्रांतिकारियों को वह पुस्तक पढ़ने को दी जाती थी। मैनपुरी के षड्यंत्र केस के अभियुक्तों के पास वह पायी गयी थी। श्रद्धेय जयप्रकाश उन दिनों विद्यार्थी थे और उनके जीवन-चरित्र में श्री बेनीपुरीजी ने लिखा था कि 'फिजीद्वीप में 21 वर्ष' ने उन्हें बहुत प्रभावित किया था।

जब श्री जयप्रकाश जी हमारे नगर फिरोजाजाबाद में पधारे थे तो 'भारती भवन' का निरीक्षण करने के लिए भी वे गए थे। उसकी निरीक्षण- पुस्तिका में उन्होंने लिखा था:

'मुझे आज भारती भवन आ कर बड़ी खुशी हुई। अपने बचपन में यहाँ से प्रकाशित पं० तोताराम सनाढ्य की 'फिजी में मेरे 21 वर्ष मैंने पढ़ी थी, जिसका गहरा असर मुझ पर हुआ था। आज उस संस्थान का दर्शन कर मैं बड़ा खुश हुआ, जिसने वह साहित्य देश के सामने रखा था। मैं 'भारती भवन' की उत्तरोत्तर उन्नति की शुभकामना करता हूँ।

14-3-63 जयप्रकाश नारायण

उस पुस्तक के छपने के कुछ दिनों बाद ही इंदौर के राजकुमार कालेज में हिंदी अध्यापक का कार्य मिल गया था और यदि सरकार को इस बात का पता लग जाता कि पुस्तक के लिखने में मेरा हाथ था तो मुझे नौकरी से हाथ धोना पड़ जाता। उन दिनों दिनों भाई हरप्रसादजी चतुर्वेदी भारती भवन के प्रमुख कार्यकर्ता थे और उनके द्वारा कुंवर हनुवंतसिंह रघुवंशीजी के पास यह खबर भिजवा दी गयी कि वे उस पुस्तक की पांडुलिपि को सरकार के हाथ में न पड़ने दें। पुस्तक उन्हीं के प्रेस में छपी थी।

लोकमान्य तिलक के केसरी ने अग्रलेख में लिखा था-"लाखों पाठकों में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति निकले, जो इस पुस्तक को पढ़ कर रो न दे। और चूँकि सरकार ने अभी तक पुस्तक को जब्त नहीं किया था, इसलिए यह सिद्ध होता है कि इस पुस्तक में वर्णित तथ्यों का उत्तर सरकार के पास नहीं।"

उसका परिणाम यह हुआ कि सरकार की कुदृष्टि उस पुस्तक पर पड़ गयी। उन दिनों मै डेली कालेज इंदौर में था और मेरे पास खबर पहुँची कि शायद पुलिस मेरे घर की तलाशी ले। उस समय मैं प्रवासी भारतवासी नामक ग्रंथ लिख रहा था और इस खबर के पाते ही मैंने उसकी संपूर्ण सामग्री अपने मित्र लाला बद्रीप्रसाद जी के पास रखवा दी। 728 पृष्ठों का यह ग्रंथ सन 1918 में छपा और उसके प्रकाशक थे भाई द्वारिकाप्रसादजी सेवक, जो हमारे सौभाग्य से अब भी हमारे बीच में विद्यमान हैं।

उन दिनों मैं डेली कालेज में पढ़ाता था जहाँ मध्यभारत के राजा-महाराजों के राजकुमार अथवा उनके जागीरदारों के लड़के शिक्षा पाते थे। ओरछा के राजकुमार वीरसिंह जूदेव अपने दोनों भाइयों के साथ मेरे शिष्य थे। उनमें अधिकांश को मैंने 'फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष' पढ़ने को दी थी ओर प्रवासी भारतवासी के कुछ पृष्ठ तो क्लास-रूम में ही लिखे गए थे।

यह विवरण मैं केवल इस विचार से दे रहा हूँ कि प्रत्यक्ष रूप से पं० तोतारामजी का और परोक्ष रूप से फिजीद्वीप का मैं कितना ऋणी हूँ। फिजीद्वीप ने मेरे संपूर्ण जीवन को जकड़ लिया था। यह बात मुझे आगे चलकर ज्ञात हुई कि मूकों को वाणी देना एक पवित्र कर्तव्य है और 'फिजीद्वीप मेरे 21 वर्ष' नामक पुस्तक ने मूकों को वाणी देने का काम किया था। सौभाग्य से एक ऐसा विषय मेरे हाथ लग गया जो उस समय उपेक्षित था।

मैं यहाँ कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करूँगा कि इस मिशन ने मेरा कितना हित किया। उसी के कारण मैं दीनबंधु एंड्रूज, महात्मा गांधी, माननीय श्री निवास शास्त्री, संपादकाचार्य सी० वाई० चिंतामणि आदि के संपर्क में आ सका। कुछ ग्रंथ भी लिखे गए:

  1. प्रवासी भारतवासी-जिसकी भूमिका दीनबंधु एंड्रूज ने लिखी थी। पृ० संख्या 728
  2. फिजी में भारतीय-दीनबंधु की फिजी रिपोर्ट का अनुवाद।
  3. फिजी की समस्या-फिजी में 1921 के उपद्रव का इतिहास।
  4. फिजी की डायरी-गोविंद सहाय शर्मा कृत।
  5. मर्यादा, चाँद, विशाल भारत तथा नवचेतन (गुजराती) के 'प्रवासी-अंक'।
  6. विदेशों से लौटनेवाले भारतीयों के विषय में अंग्रेजी में रिपोर्ट, स्वामी भवानीदयाल संन्यासी के सहयोग से।
  7. कांग्रेस में प्रवासी विभाग की स्थापना।
  8. माडर्न रिव्यू इत्यादि पत्रों में इस विषय पर लेखमाला।
  9. दिल्ली में प्रवासी भवन की स्थापना के लिए आंदोलन।

    इस प्रकार पूरे बाईस वर्ष-सन 1914 से 1936 तक मैंने अपनी क्षुद्र बुद्धि तथा अल्प-शक्ति के अनुसार प्रवासी भारतीयों की सेवा की। जून 1920 में मैंने दीनबंधु एंड्रूज के आदेश पर राजकुमार कालेज, इंदौर की नौकरी छोड़ दी थी और फिर चौदह महीने शांति निकेतन में प्रवासी भारतीयों के कार्य के लिए ही रहा था। तत्पश्चात इसी कार्य के लिए चार वर्ष साबरमती आश्रम में भी रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहीं से मुझे पूर्वी अफ्रीका की यात्रा करने का भी अवसर मिला।

    सन 1936 में मुझे प्रवासी भारतीयों की सेवा का कार्य आर्थिक कठिनाइयों के कारण छोड़ देना पड़ा। उन बाईस वर्षों में मुझे कुल जमा चौदह सौ रुपये की सहायता प्रवासी भाइयों से प्राप्त हुई थी।

    यद्यपि सन 1952 में पार्लामेंट में पहुँचने के बाद मैंने प्रवासी भारतीयों के कार्य को पुनः अपने हाथ में लेने का प्रयत्न किया और उस समय बंधुवर स्व० सी० एल० पटेल मेरे सहायक थे, पर वह काम आगे बढ़ नहीं सका।

    मेरी प्रार्थना पर फिजीद्वीप के स्वर्गीय शंकर प्रताप जी ने श्री प्रकाशवीर शास्त्री द्वारा श्रद्धेय पंडित जवाहरलाल जी नेहरु को प्रवासी भवन के लिए एक भूमिखंड प्रदान करने के लिए लिखवाया और और पंडितजी ने कृपाकर अपने स्वर्गवास से तीन दिन पहले इस विषय का पत्र श्री प्रकाशवीर शास्त्री को भेजा था। पर जमीन का वह टुकड़ा बीच में ही एक सज्जन ने हड़प लिया। इस प्रकार मेरा वह स्वप्न जहाँ का तहाँ पड़ा रह गया। अब मैं शीघ्र ही अपनी 81 वीं वर्ष प्रारंभ कर रहा हूँ और इस बात की संभावना बहुत कम है कि मैं अपने प्रवासी भवन के स्वप्न को इस जीवन में चरितार्थ देख सकूँ। यदि फिजी तथा मारीशस के प्रभावशाली भारतीय भारत सरकार से भूमिखंड प्राप्त करके अपने-अपने कमरे बनवा दें तो अन्य उपनिवेशों के भाई भी ऐसा करने के लिए उत्साहित हो सकते हैं। इस अवसर पर मैं प्रवासी भारतीयों से कुछ निवेदन कर देना चाहता हूँ :

    (1) आप लोग जहाँ भी जिस देश में रह रहे हों उसे ही अपनी मातृभूमि समझे और अपनी सर्वोत्तम भेंट उसी को अर्पित करें।

    (2) सभी जातियों के साथ भातृत्व की भावना से काम लें। सबकी मिली-जुली संस्कृति ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

    (3) भारतीय पत्रों को अपने यहाँ के प्रामाणिक समाचार नियमपूर्वक बराबर भेजते रहें।

    (4) स्वामी भवानी दयाल जी की तरह किसी न किसी प्रवासी भारतीय युवक को यह मिशन अपने हाथ में ले लेना चाहिए। यह बात ध्यान देने योग्य है कि स्वामीजी का जन्म दक्षिण अफ्रीका में हुआ था।

    (5) यद्यपि साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा शिक्षा-संबंधी कार्यों में भारतवर्ष प्रवासी भारतीयों की यथाशक्ति सेवा कर सकता है तथापि अपने राजनीतिक सवाल खुद ही हल करने होंगे। हमारा देश साम्राज्यवाद के पैरों तले कुचला गया था और हम लोग अपना उपनिवेश बनाने की कल्पना भी नहीं कर सकते।

    (6) भारत में भी कुछ नवयुवक ऐसे तैयार होने चाहिए, जो प्रवासी भारतीयों के विषय में विशेषज्ञता प्राप्त करें और उनकी यथाशक्ति सहायता करना प्रवासी भारतीयों का कर्तव्य है।

    (7) एक भी वाक्य तो क्या, एक भी शब्द हमारे मुँह या लेखनी से ऐसा न निकले, जिससे भिन्न-भिन्न जातियों में पारस्परिक दुर्भावना पैदा हो।

    फिजियन लोगों की अपनी अलग संस्कृति है और उनमे कई गुण ऐसे हैं, जिनका अनुकरण हम भारतीयों को करना चाहिए। पं० तोतारामजी के हृदय में फिजियन लोगों के प्रति प्रेम तथा आदर की भावना थी। उनकी भाषा पंडितजी ने परिश्रमपूर्वक सीखी थी और भूतलैन में जब वे आत्मघात करना चाहते थे तो उनके जीवन की रक्षा एक फिजियन भाई ने ही की थी। पंडितजी द्वारा लिखित भूतलैन की कथा प्रत्येक फिजी प्रवासी भारतीय को पढ़ लेनी चाहिए।

    (8) प्रत्येक उपनिवेश में एक केंद्रिय पुस्तकालय ऐसा होना चाहिए जिसमें हिंदी, उर्दू, तमिल तथा गुजराती के ग्रंथों का संग्रह हो। अंग्रेजी ग्रंथों का रहना तो अनिवार्य है। ही उन पुस्तकालयों में महात्मा गांधी, कवींद्र श्री रवींद्रनाथ ठाकुर, दीनबंधु एंड्रूज, मि० पियर्सन, राजर्षि गोखले, महामाननीय श्रीनिवास शास्त्री, डाक्टर मणिलाल, स्वामी भवानी दयाल संन्यासी, जे० डब्ल्यू० बर्टन तथा पंडित तोताराम सनाढ्य प्रभृति के तैलचित्र रखे जायें। जब तक ऐसे पुस्तकालय कायम न हों तब तक कुछ साधन-संपन्न भाइयों को अपने निजी पुस्तकालय ही स्थापित कर देने चाहिए।

    इस अवसर पर जबकि पं० तोतारामजी सनाढ्य की पुस्तक का चतुर्थ संस्करण छप रहा है, मैं लटौका के श्री एस० प्रसाद बैरिस्टर साहब के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। उनकी उदारतापूर्ण सहायता के बिना यह असंभव था। आज इस पुस्तक का केवल ऐतिहासिक महत्व ही रह गया है। शर्तबंदी गुलामों की प्रथा राजर्षि गोखले, महामना मालवीयजी, महात्मा गांधी, दीनबंधु एंड्रूज, पं० तोताराम सनाढ्य आदि के निरंतर और अनथक प्रयत्नों से 1 जनवरी 1920 को सदैव के लिए समाप्त कर दी गयी। इस प्रथा को बंद करने में इस पुस्तक ने भी योगदान दिया था, वह कितनी अन्यायपूर्ण और अमानुषिक थी, इस संबंध में यह पुस्तक अकाट्य प्रमाण के रूप में प्रस्तुत की गयी थी। एक बात और, जो भारतीय कुली-प्रथा के अधीन फिजी तथा अन्य उपनिवेश को गए थे, वे सच्चे अर्थों में महाप्राण थे। फिजी के सुप्रसिद्ध नेता श्री विष्णु देव के शब्दों में वे तपस्वी थे। हमारे सौभाग्य से भगवानसिंह जी इस समय फिजी मे हमारे हाई कमिश्नर हैं। फिजी से उनका पैतृक संबंध है। यह भी एक आश्चर्य की बात है कि हम तीनों पं० तोताराम जी, श्री भगवानसिंह जी और मैं एक ही जिला आगरा के निवासी हैं। श्री भगवानसिंह जी सुलझे हुए दिमाग के व्यवहार-कुशल आदर्शवादी है। आशा है कि फिजी प्रवासी भारतीय उनकी सेवाओं से भरपूर लाभ उठाएँगे। प्रवासी भारतीय भूतपूर्व तपस्वियों की संतान हैं और हमें विश्वास है कि वे अपने परिश्रम, लगन तथा सूझबूझ से अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सकेंगे।

    2 अक्टूबर, 1972 बनारसीदास चतुर्वेदी

    ज्ञानपुर, जिला-वाराणसी


    फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष

    मेरा जन्म सन 1876 ई० में हिरनगो (फिरोजाबाद) में सनाढ्य कुल में हुआ था। मेरे पिता पं० रेवतीरामजी का देहांत सन 1887 ई० में हो गया, और मैं, मेरी माँ व मेरे भाई रामलाल और दुर्गा प्रसाद अनाथ रह गए। पिताजी ने हम लोगों के लिए कोई चार हजार रुपये के गहने, इत्यदि की संपत्ति छोड़ी थी, परंतु वह कुल एक ही वर्ष में उड़ गयी। कारण यह था कि जिन महाजनों के यहाँ गहने रख कर रुपये उधार लिए गए, उन्होंने बहुत कम मूल्य में ही गहने रख लिए। इस कारण चार हजार रुपये का गहना थोड़े ही दिनों में व्यय हो गया। वे दरिद्रता के दिन मुझे आज तक स्मरण हैं और जब मैं उन दिनों की कल्पना अपने मस्तिष्क में करता हूँ तो मेरे हृदयाकाश में एक दुःख की घटा छा जाती है।

    मेरा बड़ा भाई रामलाल इन दुखों से पीड़ित हो कर कलकत्ता चला गया और वहाँ रेली ब्रदर्स के यहाँ आठ रुपये महीने की मुनीमगिरी की नौकरी कर ली। मेरी माता इस निर्धनता से बड़ी पीड़ित थी। आठ रुपये महीने में मेरा भाई स्वयं अपना व्यय चलाता था और थोड़ा बहुत घर भी भेज दिया करता था। मैं हिरनगौ की एक पाठशला में तीसरे दर्जे में पंडित कल्याण प्रसाद के पास पढ़ता था। मेरी माता मुझसे कहा करती थीं- "बेटा! जिस तरह हो, अब तो अपने पेट-पालन का उपाय सोचो।" माता का दुःख मुझसे देखा न गया, अतएव सन 1893 ई० में नौकरी के लिए मैं घर से निकल कर पैदल चल दिया। मेरे पास कुल सात आने पैसे थे। मार्ग में अनेक कठिनाईयों का सामना करता हुआ कोई सोलह दिन में प्रयाग पहुँचा। बस, इसी स्थान से मेरी तुच्छ जीवनी की दु:खजनक रामकहानी प्रारंभ होती है।

    प्रयाग पहुँच कर मैंने भागीरथी के तट पर स्नान किए, तदनंतर दारागंज के बच्चा नामक एक अहीर से मेरी भेंट हो गयी। उस अहीर ने मेरा सब हाल सुन कर मुझ पर दया की और अपने घर ले गया। मैं लगभग दो महीने उस अहीर के यहाँ रहा। उस अहीर ने जिस कृपा का बर्ताव मेरे साथ किया उसे मै जन्म-पर्यंत नहीं भूलूँगा। जब तीर्थराज में रहते-रहते मुझे बहुत दिन हो गए और कोई नौकरी नहीं मिली, तो मैंने विचार किया कि चलो अपने घर लौट चलें, परंतु फिर मेरे मेरे मन में यही विचार आया कि अब घर चल कर माता के वे कष्ट मुझसे देखें नहीं जाएंगे, उसे कुछ भी सहायता न देते हुए उसके ऊपर भार-स्वरूप होना ठीक नहीं। कभी माता का प्रेम मुझे घर की ओर खींचे लाता था और कभी माता के दुखों की स्मृति मुझे इस बात के लिए बाध्य कर रही थी कि मैं कहीं कोई नौकरी कर लूँ और घर न जाऊँ। इस प्रकार मैं दुविधा में पड़ा हुआ था।

    एक दिन मैं कोतवाली के पास चौक में इसी चिंता में निमग्न था कि इतने में मेरे पास एक अपरिचित व्यक्ति आया और उसने मुझसे कहा, "क्या तुम नौकरी करना चाहते हो?" मैंने कहा 'हाँ'। तब उसने कहा 'अच्छा हम तुम्हें बहुत अच्छी नौकरी दिलवायेंगे। ऐसी नौकरी कि तुम्हारा दिल खुश हो जाय।' इस पर मैंने कहा, 'मैं नौकरी तो करूँगा लेकिन छह महीने या साल-भर से अधिक दिन के लिए नहीं कर सकता।' उसने कहा, 'अच्छा! आओ तो सही, जब तुम्हारी इच्छा हो तब नौकरी छोड़ देना, कोई हर्ज नहीं, चलो जगन्नाथजी के दर्शन तो कर लेना।' मेरी बुद्धि परिपक्व तो थी नहीं, मैं बातों में आ गया। इसी तरह धोखे में आ कर सहस्रों भारतवासी आजन्म कष्ट उठाते हैं। हे मेरे सुशिक्षित देशबंधुओं! क्या आपने इन भाइयों के विषय में कभी विचार किया है? क्या आपके हृदय में इन दुखित भाइयों के लिए कुछ कष्ट हुआ है? क्या कभी सजला सफला मातृभूमि के उन पुत्रों के विषय में आपने सुना है जो डिपोवालों की दुष्टता से दूसरे देशों में भेजे जाते हैं? क्या इन लोगों के आर्तनाद को सुन कर आप के कान पर जूँ भी नही रेंगेगी?

    वह आरकाटी मुझे बहका कर अपने घर ले गया वहाँ जा कर मैंने देखा कि एक दालान में लगभग एक सौ पुरुष और दूसरे में करीब साठ स्त्रियाँ बैठी हुई हैं। कुछ लोग गीली लकड़ियों से रसोई कर रहे थे और चूल्हा फूँकते-फूँकते हैरान हो रहे थे। उस आरकाटी ने मुझे एक मूढ़े पर बैठा दिया। उन स्त्रियों को देख कर मैंने सोचा कि ये पुरुष तो नौकरी करने के लिए जा रहे हैं परंतु ये बेचारी स्त्रियाँ कहाँ जा रही हैं। लेकिन उस समय उन स्त्रियों से बातचीत करने की उस आरकाटी ने बिलकुल मनाही कर रखी थी। वहाँ से न तो कोई बाहर आ सकता था और न कोई बाहर से भीतर जा सकता था। आरकाटी ने मुझसे कहा- 'तुम यहीं चावलों का भात बना लो, मैं अभी चावल तुम्हें देता हूँ। मैंने कहा- मैं भात बनाना नहीं जानता। इसी ब्राह्मण के साथ जो रसोई बना रहा है, मैं भी खा लूँगा। आरकाटी उन लोगों को समझाता था, "देखो भाई, जहाँ तुम नौकरी करोगे वहाँ तुम्हें ये दुःख वहाँ नहीं सहने पड़ेंगे। तुम्हें वहाँ किसी बात की तकलीफ नहीं होगी। खूब पेट-भर गन्ने और केले खाना और चैन की बंशी बजाना।"

    तदनंतर तीसरे दिन यह वह आरकाटी हम सब को मजिस्ट्रेट के पास ले जाने की तैयारियाँ करने लगा। कुल 165 स्त्री-पुरुष थे। सब गाड़ियों में बंद किए गए और कोई आध घंटे में हम लोग कचहरी पहुँचे। उस आरकाटी ने हम लोगों से पहले ही कह रखा था कि साहब जब तुम लोगों से कोई बात पूछे तो 'हाँ' कहना, अगर तुमने नाहीं कर दी तो बस तुम पर नालिश कर दी जाएगी और तुम्हें जेल काटनी पड़ेगी। सब लोग एक-एक करके मजिस्ट्रेट के सामने लाये गए। वह प्रत्येक से पूछता था, "कहो तुम फिजी जाने को राजी हो?" मजिस्ट्रेट यह नहीं बताता था कि फिजी कहाँ है, वहाँ क्या काम करना पड़ेगा तथा काम न करने पर क्या दंड दिया जाएगा। उस मजिस्ट्रेट ने 165 आदमियों की रजिस्ट्री कोई 20 मिनट में कर दी। इस बात से पाठक अनुमान लगा सकते हैं कि मजिस्ट्रेट साहब भी अपना पिंड छुड़ाना चाहते थे, नहीं तो यह काम इतनी जल्दी कैसे हो सकता है।

    वहाँ से चल कर हम सब रेल में लादे गए। न तो गाड़ी में बैठे हुए मनुष्यों से और न बाहर के आदमियों से बातचीत करने पाते थे, यदि कोई आपस में बातचीत करते तो उठा दिए जाते थे। हाँ, यह कहना भूल गया कि वह ट्रेन स्पेशल थी और सीधी हावड़ा पहुँची, बीच में कहीं नहीं रुकी। हावड़ा स्टेशन से सब लोग बंद गाड़ी में बिठाए जा कर डिपो में पहुँचाये गए। यहाँ इमीग्रेशन अफसर ने हम सब को एक पंक्ति में खड़ा किया और कहा, "तुम फिजी जाते हो, वहाँ तुम्हें 12 आना रोज मिलेंगे और 5 वर्ष तक खेती का काम करना होगा। अगर तुम वहाँ से पाँच वर्ष बाद लौटोगे तो अपने पास से किराया देना होगा और अगर 10 वर्ष बाद लौटोगे तो सरकार अपने पास से भाड़ा देगी। तुम लोग वहाँ से बहुत रुपये ला सकते हो। केवल 12 आना नहीं, बल्कि और भी उपर कमा सकते हो। वहाँ बड़े आनंद से रहोगे। फिजी क्या है स्वर्ग है।" इस प्रकार उसने बहुत कुछ चिकनी-चुपड़ी बातें कहीं। हम अशिक्षित लोग कुछ तो पहले ही से बहकाए हुए थे और रहे-सहे उस अफसर ने बहका दिए। इमिग्रेशन अफसर ने भी यह पूछा, "तुम्हारा किसी के पास धन तो नहीं है?" उस आरकाटी ने, जो साहब के पीछे खड़ा हुआ था, हम लोगों से हाथ से इशारा कर दिया की कुछ मत कहो, हम तुम्हारी चीजें अभी दे देंगे। लेकिन साहब के जाते ही वह आरकाटी भी चला गया। फिर कौन देता है और कौन लेता है। कितने ही आदमियों के बर्तन, वस्त्र, रुपये-पैसे इत्यादि उस आरकाटी के पास रह गए।

    जब वह अफसर हम लोगों को समझा रहा था तो मेरे दिल में एक शंका उत्पन्न हुई। मैंने सोचा, पाँच वर्ष बहुत होते हैं, न जाने फिजी जा कर कैसा कठिन काम करना पड़ेगा और काम न कर सका तो कैसी मार पड़ेगी। यही विचार कर मैंने कहा, "मैं फिजी नहीं जाना चाहता, मैंने खेती का काम कभी नहीं किया, मेरे हाथ देखिए, ये खेती कभी नहीं कर सकते, मैं फिजी न जाऊँगा। यह सुन कर उस अफसर ने मुझे दो बंगाली बाबुओं के हवाले किया और उनसे कहा, "इसे समझा कर ठीक करो।" मैंने उनसे भी इंकार किया और कहा "मेरे भाई कलकत्ते में यहीं किसी मुहल्ले में है, मुझे उससे मिल लेने दो, फिर देखा जाएगा।" पर कौन सुनता है। मेरे साथ-साथ दरबान रहता था। जब मैं समझाए जाने पर किसी तरह राजी न हुआ, तो एक कोठरी में बंद कर दिया गया। एक दिन एक रात मैं भूखा-प्यासा उसी कोठरी में रहा। अंत में लाचार हो कर मुझे कहना पड़ा कि मैं फिजी जाने को राजी हूँ। क्या करता। वहाँ कोई अपना आदमी तो था नहीं जिसे यह दुख-वृतांत सुनाता।

    जब मैं कोठरी से बाहर लाया गया तो मैंने देखा कि जबरदस्ती चमार, कोली, ब्राह्मण इत्यादि सबको एक ही जगह बैठ कर भोजन कराया जाता है। लगभग सबको मिट्टी के जूठे बर्तनों में भोजन कराया गया और पानी पिलाया गया। जहाँ कोई कुछ बोला, बस फिर क्या है खूब पीटा गया। मैंने यह व्यवस्था देख कर कहा, "मैं इनके साथ भोजन नहीं करूँगा चाहे भूखों मार जाऊँ।" उस अफसर ने कहा "मर जाओ कोई डर नहीं, तुम्हें नदी में फ़ेंक देंगे।" अंत में मुझे आज्ञा दी गयी कि तुम भंडारी के साथ भोजन कर लिया करो। कपड़े जो हम लोगों के पास अच्छे-अच्छे थे, धोने के बहाने सब ले लिए गए और एक भंगी स्नान कराने के लिए हम सबको घाट पर ले गया। हम सबको साबुन दिया गया। बेचारे बहुत से भोले-भाले लोगों ने यह समझा कि हम दूर से आये हैं, हमें जल-पान के लिए बर्फी मिली है! कुछ लोगों ने तो उसे कलाकंद जान कर खा भी लिया और फिर हरे राम हरे राम, थू थू थू करने लगे। देखिए किस तरह के सीधे-सादे लोगों को आरकाटी बहका कर ले जाते हैं। ये विचारे साबुन को भी बर्फी समझते हैं! क्या हमारे धर्मोपदेशकों ने जो कि धर्म की धुरी बने हुए हैं और शहरों में ही प्लेटफार्म को व्याख्यान देते-देते घिसा करते हैं, कभी उन ग्रामीण बुद्धि के रंकों के ऊपर भी दया की है? क्या कभी ग्रामों में आ कर किसी ने इनके उद्धार के विषय में भी व्याख्यान देना कर्तव्य समझा है? शहरों में तो नित्य नये उपदेशक बने रहते हैं पर बेचारे ग्रामीणों को ऐसे उपदेश दुर्लभ हैं, इसी से यह साबुन को बर्फी समझ बैठे।

    डाक्टरी परीक्षा- जब जहाज पर चढ़ने के दो या तीन दिन शेष रहे, तब हम सब की डाक्टरी परीक्षा हुई। पुरुषों और स्त्रियों तक की परीक्षा पुरुष डाक्टरों ने ही ली। तत्पश्चात पहनने के लिए कैदियों के से कुर्ते, टोपी और पजामा दिए गए। पानी के लिए टिन का लोटा, भोजन रखने के लिए टिन की थाली और सामान रखने के लिय एक छोटा-सा थैला दिया गया।

    जहाज का वृतांत -फिर हम लोगों के नाम पुकारे गए और हम सब जहाज पर चढ़ाये गए। उस समय पाँच सौ भारतीय अपनी मातृभूमि को छोड़ कैदियों और गुलामों की तरह फिजी को जा रहे थे। यह किसे ज्ञात था कि वहाँ पहुच कर हमें असंख्य कष्ट सहने पड़ेगें! कितने ही आदमी अपनी माता, पिता, भाई, बहन इत्यादि के प्रेम में अश्रुओं की धारा बहा रहे थे। उन दुखों की कथा सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था। जो लोग खसखस की टट्टियों में रहते हैं और जिन्होंने कि 'Eat drink and be merry' खाओ और मौज उड़ाओ, यही अपने जीवन का उद्देश्य समझ रखा है, वे उन बेचारे पाँच सौ भारतवासियों के हाल क्या जान सकते हैं। उनकी दुर्दशा पर तो वे ही ध्यान दे सकते हैं जिन्होंने कि 'परोपकाराय सतां ही जीवनम्' यही अपना आदर्श मंत्र बना लिया हो।

    हम लोगों में से प्रत्येक को डेढ़ फुट चौड़ी और छह फुट लंबी जगह दी गयी। इतनी जगह एक मनुष्य के लिए कहाँ तक पर्याप्त हो सकती है, यह आप स्वंय विचार सकते हैं। कई लोगों ने शिकायत की कि इतने स्थान में हम नहीं रह सकते, तो गोरे डाक्टर ने ललकार कर कहा "साला टुम को रहना होगा"। जब हम लोग बैठ चुके तो हर एक को चार-चार बिस्कुट और आधी-आधी छटांक चीनी दी गयी। इन बिस्कुटों कों गोरे लोग डाग बिस्कुट कहते हैं और ये कुत्तों को खिलाये जाते हैं। हा परमात्मन्! हम भारतवासी क्या कुत्तों के समान हैं? बिस्कुटों के विषय में क्या पूछना है। इतने ज्यादा नरम थे कि घूसों से टूटे और पानी में भिगो कर खाए गए। लगभग चार बजे जहाज छोड़ दिया गया। अब मातृभूमि के लिए हमारा अंतिम नमस्कार था। 6 बजे सूर्य भगवान अस्त हुए। रात को 8 बजे हम लोग सो गए। प्रात:काल पहरेवाले ने हम लोगों को उठा दिया। देखते क्या है कि समुद्र में हिलोरें लेता हुआ हमारा जलयान चला जा रहा है। चारों तरफ नीले आकाश के अतिरिक्त कुछ नहीं दीख पड़ता था। उस समय हम लोगों के हृदय में अनेक भाव उत्पन्न हो रहे थे। जिस प्रकार कि कोई स्वतंत्र पक्षी पिंजरे में बंद कर दिया जाता है, उसी प्रकार हम लोग बंद कर दिए गए थे।

    सवेरा होते ही उस जहाज के एक अफसर ने हम लोगों में से कुछ लोगों को रसोई बनाने के लिए और कुछ को पहरा देने के लिए चुना, और कुछ लोगों को 'टोपस' का काम करने के लिए नियुक्त किया। लोगों से कहा गया कि टोपस का काम कौन-कौन करेगा। हमारे भोले भाई नहीं जानते थे कि 'टोपस' क्या बला है। अतएव कितने ही लोगों ने टोपस का काम करनेवालों की सूची में अपना नाम लिखा लिया। जब जहाज के अफसर ने टोपसवालों से कहा "तुम लोग अपना काम करो" टोपसवालों ने कहा "क्या काम करें?" तब आज्ञा दी गयी कि "तुम लोग टट्टियों को साफ करो। कितने ही लोगों ने आपत्ति की। लेकिन वे पीटे गए और जबरदस्ती उनसे मैला उठवाया गया। सारे जहाज में त्राहि-त्राहि का शब्द गूँजने लगा। क्या हमारा शिक्षित जनसमुदाय इन दुखी भाइयों की पुकार पर ध्यान देगा? हमारे भाई जबरन जहाज पर मैला उठायें और हम चुपचाप बैठे रहें, क्या हमारे लिए यह लज्जा की बात नहीं है?

    पीने के लिए दिन में दो बार एक-एक बोतल पानी मिलता है। फिर नहीं मिलता चाहे प्यासे मरो। खाने के विषय में भी यही बात है। वहीं मछली पकती थी और वहीं भात बनता था। Sea-sickness (समुद्री बीमारी) से भी बहुत आदमी पीड़ित हो गए। कई तो बेचारे कै करके इस संसार से सदा के लिए विदा हो गए। वे लोग समुद्र में फेंक दिए गए।

    इस प्रकार तीन महीने बारह दिन में हमारा जहाज सिंगापुर, बोर्नियो इत्यादि के किनारे होता हुआ फिजी पहुँचा। यहाँ कुछ फिजी के विषय में लिखा जाता है।

    फिजीद्वीप

    फिजी द्वीपसमूह प्रशांत महासागर में स्थित है। उसके पश्चिम में न्युहैब्रीडीज है। भूमध्यरेखा के दक्षिण में देशांतर के 15 अंक से ले कर 22 अंक तक और पश्चिम में अक्षांश की 175 डिग्री से ले कर 177 डिग्री तक फैला हुआ है। इसमें सब मिला कर 254 द्वीप हैं। इनमें से लगभग 80 टापुओं में आदमी रहते हैं। फिजी द्वीपसमूह का क्षेत्रफल 7435 वर्गमील है। सन 1911 की जनगणना के अनुसार फिजी की जनसंख्या 1,39,541 है। इन द्वीपों में दो द्वीप सबसे बड़े हैं। एक तो वीती लेवू (Viti Levu) और दूसरा वनुआ लेवू (Vanua Levu)। इनके अतिरिक्त कंदावू और तवयूनी नामक टापू भी बड़े-बड़े हैं। इनकी भूमि बड़ी उपजाऊ है और विशेषत: पूर्व की ओर यह द्वीप बहुत कुछ हरा-भरा दीख पड़ता है। यहाँ पर कितने ही पहाड़ हैं, जिनकी चोटी हजारों फिट ऊँची हैं। समुद्र के किनारे-किनारे नारियल के बहुत पेड़ होते हैं। यहाँ रतालू, शकरकंद और नारंगी बहुत पायी जाती है। यहाँ पर पहले बहुत कम जानवर थे। फिर पीछे से बहुत-से जानवर भेजे गए। गाय, बैल, घोड़ा, बकरी, जंगली सूअर इत्यादि थोड़े बहुत पाए जाते हैं। कबूतर, तोता, बतख इत्यादि चिड़ियाँ भी जो गर्म मुल्कों में प्राय: हुआ करती हैं, देखने में आती हैं। सन 1866 ई० में यहाँ पर न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया से बहुत-से यूरोपियन आ-आ कर बसने लगे। सन 1874 ई० में यह द्वीपसमूह ब्रिटिश सरकार के हाथ में आ गया और ब्रिटिश राज्य का उपनिवेश भी कहा जाने लगा। फिजी की राजधानी सुवा है, जो कि विती लेवू के दक्षिण पर स्थित है। फिजी के विषय में विस्तारपूर्वक आगे चल कर लिखेंगे।

    भिन्न-भिन्न स्टेटों में बाँट दिए गए

    फिजी में एक नुकलाओ नामक एक टापू है। यहाँ पर भी एक डिपो है। हम लोग, जो कि कुली के नाम से पुकारे जाते हैं, यहीं उतारे जाते हैं। ज्योंही हमारा जहाज वहाँ पहुँचा त्योंही पुलिस ने आ कर उसे घेर लिया, जिससे कि हम वहाँ से भाग न जाएँ। हम लोगों से वहाँ गुलामों से भी बुरा बर्ताव किया गया। लोग कहा करते हैं कि दासत्व-प्रथा संसार के सब सभ्य देशों से उठ गयी है। यह बात ऊपर से तो ठीक मालूम होती है परंतु वास्तव में नितांत भ्रममूलक है। क्या आप इस कुली-प्रथा को दासत्व-प्रथा से कम समझते हैं? इसी न्यायशील ब्रिटिश सरकार के राज्य में यह प्रथा जारी रहे यह कितने खेद की बात है। क्या अब बर्क, ब्राडला जैसे निष्पक्ष अंग्रेज इंग्लैंड में नहीं रहे।

    थोड़ी देर के बाद डाक्टर आया और उसने हम सबकी परीक्षा की। सब लोगों के कपड़े हौज में एक साथ डाल कर गर्म किए गए। कोठीवालों को पहले से ही एजेंट जनरल ने आज्ञा दे दी थी कि आ कर अपने-अपने कुली नुकलाओ डिपो से ले जाओ। कोठीवालों ने प्रत्येक मनुष्य का व्यय दो सौ दस रुपये इमीग्रेशन विभाग में पहले से जमा करा दिया था। एजेंट जनरल की आज्ञानुसार वे लोग नुकलाओ डिपो में पहुँचे। वहाँ पर छोटे कुली एजेंट ने हम सब को भिन्न-भिन्न स्टेटों में जाने के लिए विभक्त कर दिया। फिर उस एजेंट ने हम सबको बुलाया और प्रत्येक से कहा, "तुम आज से पाँच वर्ष तक के लिए अमुक साहब के नौकर हुए" मैंने कहा 'मैं नौकरी नहीं करता। मैं बिका नहीं हूँ। मेरे बाप या भाई ने किसी से कुछ ले कर मुझे बेच नही दिया है। मैंने भी किसी से कुछ नहीं लिया। जब मैंने तीन-पाँच की तो दो गोरे सिपाहियों ने धक्के दे कर मुझे नाव पर चढ़ा दिया। इस प्रकार सब लोग भिन्न-भिन्न स्टेटों में बाँट दिए गए।

    स्टेट का हाल- स्टेट में रहने के लिए कोठरियाँ मिलती हैं। प्रत्येक कोठरी 12 फुट लंबी 8 फुट चौड़ी होती है। यदि किसी पुरुष के साथ उसकी विवाहिता स्त्री हो तो उसे यह कोठरी दी जाती है और नहीं तो तीन पुरुषों या तीन स्त्रियों को यह कोठरी रहने को मिलती है। दिखाने के लिए तो यह नियम बनाया गया है "Employers of Indian labourers must provide at their own expense suitable dwellings for immigrants, The style and dimension of these buildings are fixed by regulations." यानी 'जो लोग भारतवासी मजदूरों को नौकर रखेंगे, उन्हें अपने खर्च से उन मजदूरों को रहने के लिए अच्छे निवास-स्थान देने होंगे। इन मकानों की बनावट, लम्बाई, ऊँचाई, चौड़ाई इत्यादि नियमों से स्थिर की जाएगी।' पाठकों यही तीन आदमियों के रहने, उठने, बैठने, सोने, खाना बनाने इत्यादि के लिए 12 फुट लंबी 8 फुट चौड़ी उचित निवास-स्थान है। परमात्मा ऐसे अच्छे मकान में किसी को न रखे। जिन तीन आदमियों को यह कोठरी मिलती है उनमें चाहे कोई हिंदू हो या मुसलमान, अथवा चमार-कोली कोई क्यों न हो। यदि कोई ब्राह्मण देवता किसी चमार-कोली इत्यादि के संग आ पड़े तो फिर उनके कष्टों का क्या पूछना है। और प्रायः ऐसा हुआ करता है कि ब्राह्मण लोगों को चमारों के साथ रहना पड़ता है।

    पहले छह महीने के कष्ट -पहले छह महीने तक स्टेट से रसद मिलती है और इसके लिए 2 शिलिंग 4 पेंस प्रति सप्ताह के हिसाब से काट लिए जाते हैं। प्रतिदिन 10 छटाँक आटा, 2 छटाँक अरहर की दाल और आधी छटाँक घी के हिसाब से सप्ताह भर की रसद एक दिन मिल जाती है। हम लोगों के वास्ते जो कि भारी-भारी फावड़े ले कर दस घंटे रोज कठिन परिश्रम करते थे, भला ढ़ाई पाव आटा एक दिन के लिए कैसे पर्याप्त हो सकता है। हम लोग 4 दिन में सप्ताह भर की रसद खा कर बाकी दिन एकादशी व्रत रहते थे, अथवा कहीं किसी पुराने भारतवासी से उधार आटा-दाल मिल गया तो उसी से अपना पेट भर लेते थे।

    काबुली पठानों पर अत्याचार

    एक बार एक आरकाटी ने 60 काबुली पठानों को बहका कर फिजी में भेज दिया। इन लोगों से डिपोवालों ने कहा था कि तुम्हें पलटन में बड़ी-बड़ी नौकरियाँ मिलेंगी। ये लोग खूब मोटे ताजे थे और पलटन में नौकरी पाने की इच्छा से फिजी जाने को राजी हुए थे। परंतु जब वे फिजी पहुँचे तो उन्हें वहाँ कुली का काम करना पड़ा। रसद भी उन्हें उतनी ही दी गयी जितनी औरों को मिलती है, यानी ढाई पाव आटा और आध पाव दाल के हिसाब से सात दिन का सामान एक दिन में दे दिया गया। वे लोग एक सप्ताह की रसद को चार दिन में खा कर बैठ गए। फिर जब उनसे काम करन को बोला गया तो वे बोले "खाना लाओ, तो काम करें।" इस पर पुलिस को खबर दी गयी। फिर क्या था कांस्टेबल और इंस्पेक्टर आ धमके। स्टेट के गोरे ने कहा 'देखिए साहब ये 60 बदमाश कुली हमें मार डालने और लूट लेने की धमकी देते थे। तब काबुलियों ने कहा "हम लोग सिर्फ खाना माँगते हैं, बिना खाए काम न करेंगे, और हमने कुछ नहीं कहा।" पुलिस लौट गयी, काबुली काम पर न गए। फिर उस गोरे कोठीवाले ने काबुलियों से काम पर जाने के लिए कहा। काबुलियों ने फिर भी वही जबाव दिया। गोरा फिर पुलिस को बुला लाया। अबकी बार पुलिस ने उन निहत्थे काबुलियों पर गोली चला कर धमकाया। काबुलियों ने कहा हम तो वैसे ही भूखों मरे जाते हैं, और आप हम पर गोली चलाते हैं। इस पर पुलिस फिर लौट गयी। घायल काबुली अस्पताल भेजे गए।

    तदनंतर उन काबुलियों से कहा गया चलो नुकलाओ डिपो में तुम लोगों के रहने खाने-पीने, रहने और नौकरी का ठीक प्रबंध कर दिया जाएगा। इस बात पर वे सहमत हो गए और सब के सब नुकलाओ डिपो में लाए गए। उन्हें खाना बनाने के लिए चावल इत्यादि दे दिए गए और वे अपना भोजन तैयार करने लगे। इधर इमीग्रेशन विभाग के गोरे अफसरों ने 500 फिजी के आदिम निवासी जंगल में छिपा दिए थे। ज्योहीं काबुली लोग मुँह में कौर देना चाहते थे, त्योंही एक सीटी बजायी गयी। देखते-देखते 500 आदिवासी उन निःशस्त्र कबुलियों पर आ टूटे और उन्हें पकड़-पकड़ कर समुद्र के किनारे ले गए। काबुली लोग जबरदस्ती डोंगियों पर बैठा दिए गए और भिन्न-भिन्न कोठियों में विभक्त कर दिए गए।

    यह थी इमीग्रेशन विभाग की न्यायप्रियता और बहादुरी। इस पर कितने ही निष्पक्ष समाचार-पत्रों ने खूब खरी-खरी सुनायी थीं; पर कौन ध्यान देता है। कठिन परिश्रम

    सब लोग नित्य प्रात:काल उठाये जाते हैं और सबको रोटी तैयार करके पाँच बजे खेत पर पहुँचना होता है। जो स्त्रियाँ बच्चे वाली होती हैं, वे अपने बच्चे को खेत पर ले जाती हैं। लगभग प्रत्येक मनुष्य को 1200 फुट से ले कर 1300 फुट लंबी और 6 फुट चौड़ी गन्ने की लैन कुदाली से दिन-भर को नराने के लिए दी जाती है। इसको Full task पूरा काम कहते हैं। डाक्टर प्रायः लिख दिया करते हैं कि इन लोगों को 'पूरा काम' दिया जाय। जो डाक्टर साहब 30 या 40 जरीब चलने से हाँफ जाते हैं और रुमाल से मुँह पोछने लगते हैं, वे ही बेचारे भूखे लोगों से कठिन परिश्रम करवाते हैं। पर उन लोगों से इतना काम नहीं होता। फिर क्या है, चट ही दूसरे दिन सम्मन आ जाता है और मजिस्ट्रेट के सामने कचहरी में मामला पेश हो जाता है। मजिस्ट्रेट पूछता है 'फलां तारीख को तुमने पूरा काम क्यों नहीं किया? वह कहता है 'काम इतना अधिक था कि नहीं हो सका।" मजिस्ट्रेट यह बात सुन कर कहता है "हमारा सवाल यह नहीं है कि शक्ति से बाहर काम था। हमारा सवाल तो यह है कि फलां तारीख को काम पूरा किया या नहीं।' 'हाँ या नहीं' जो सवाल हम पूछें, उसी का जबाब दो। अधिक मत बको।" बेचारे मजदूर को लाचार हो कर यह कहना पड़ता है "हाँ, सरकार काम पूरा न हो सका।" बस फिर क्या है, दफा कायम हो जाती है। मजिस्ट्रेट 10 शिलिंग से ले कर 1 पौंड तक जुर्माना ठोंक देता है। इस प्रकार बेचारों का 15 या 20 दिन का वेतन जुर्माने में ही चला जाता है। मासिक वेतन एक पौंड दो शिलिंग पूरा काम करने पर मिलता है। लेकिन पूरा काम प्रति सैकड़ा पाँच आदमी से अधिक नहीं कर सकते, और ये आदमी भी पाँच या छह महीने से अधिक लगातार पूरा नहीं कर सकते। मेरे 21 वर्ष के अनुभव में 40000 भारतवासियों में मुझे एक भी ऐसा नहीं मिला जिसने लगातार पाँच वर्ष तक पूरा काम किया हो। साधारण मनुष्य 10 शिलिंग यानि साढ़े सात रुपये मासिक से अधिक नहीं कमा सकते। इस पर भी फिजी में खाद्य-पदार्थ भारतवर्ष से दूने तेज हैं और क्या कहें, सैकड़ों भूखों मरते हैं। कितने ही लोगों को इतना कठिन परिश्रम करने पर भी आधे पेट ही रहना पड़ता है।

    ओवरसियरों के अत्याचार - ओवरसियर हम लोगों पर मनमाने अत्याचार करते हैं। कितने ही हमारे भाई वहाँ पर कठिन परिश्रम के डर से और ओवरसियरों की मार और जेलखाने के भय से फाँसी लगा कर मर गए हैं। बहुत दिन नहीं हुए जबकि जबकि कई मद्रासी नबुआ की कोठी में इसी कारण फाँसी लगा कर मर गए थे। इन लोगों की मृत्यु का कारण वहाँ की मृत्यु- विवरणी से ज्ञात हो सकता है। प्रत्येक जिले में हम लोगों के दुःख-सुख की जाँच करने के लिए यद्यपि इमीग्रेशन-विभाग की ओर से कुली-इंस्पेक्टर नियत हैं, पर ये गोरे इंस्पेक्टर लोग हमारी वास्तविक स्थिति को कभी प्रकट नहीं करते। कोठीवालों के यहाँ ब्रांडी उड़ानेवाले ये महाशय हम दीन-हीन भारतवासियों के दुःख निवारणार्थ कब प्रयत्न कर सकते हैं?

    जब ओवरसियर लोग किसी से नाराज होते हैं, तो उस पर दलेल बोल देते हैं। दलेलवाले को सब आदमियों से अलग बहुत कड़ा काम करना पड़ता है। वहाँ अकेले में जाकर ये ओवरसियर लोग उसे खूब पीटते हैं। पहले तो बेचारे नालिश ही नहीं करते, क्योंकि उन्हें डर लगा रहता है कि इन्हीं साहब के आधिपत्य में हमें पाँच वर्ष तक काम करना पड़ेगा और यदि कोई करता भी है, तो गवाह न मिलने के कारण मुकदमा ख़ारिज हो जाता है। ऐसे कितने ही दृष्टांत हमारे देखने में आये हैं जिनमें ओवरसियरों के डर के मरे भाई इत्यादि निकट संबंधी भी गवाही नहीं दे सके हैं। इसी दलेल के बहाने ओवरसियर लोग हमारी कितनी ही देश-बहनों पर अत्याचार करते हैं। उदाहरणार्थ, कुंती नामक चमारिन का वृतांत यहाँ लिखना अनुचित न होगा।

    कुंती पर अत्याचार- आरकटियों ने कुंती और उसके पति को लखुआपुर जिला गोरखपुर से बहका कर फिजी को भेज दिया था। इन लोगों को वहाँ बड़े-बड़े कष्ट सहने पड़े। इस समय कुंती की अवस्था 20 वर्ष की थी। बड़ी कठिनाईयों से कुंती 4 वर्ष तक अपने सतीत्व की रक्षा कर सकी। तदनंतर सरदार और ओवरसियर उसके सतीत्व को नष्ट करने के लिए सिरतोड़ कोशिश करने लगे। 10 अप्रैल, 1912 को ओवरसियर ने कुंती को साबू केरे नामक केले के खेत मे सब सब स्त्रियों और पुरुषों से पृथक घास काटने का काम दिया, जहाँ कोई गवाह न मिल सके और चिल्लाने पर भी कोई न सुन सके। वहाँ उसके साथ पाशविक अत्याचार करने के लिए सरदार और ओवरसियर पहुँचे। सरदार ने ओवरसियर के धमकाने पर कुंती का हाथ पकड़ना चाहा। कुंती हाथ छुड़ा कर भागी और पास की नदी में कूद पड़ी लेकिन दैव-संयोग से जयदेव नामक एक लड़के की डोंगी पास में ही थी। कुंती डूबते-डूबते बची। जयदेव ने उसे डोंगी पर चढ़ाकर पार किया। जब कुंती ने यह बात अपने कोठीवाले गोरे स्वामी से कही तो उसने जबाब दिया "चलो जाओ खेत का बात हम सुनना नहीं माँगता।" तत्पश्चात 13 अप्रैल तक कुंती काम पर न गयी। 14 अप्रैल को 20 जरीब घास उसे खोदने को दी गयी और उसके पति को एक मील की दूरी पर काम दिया गया, कुंती का पति भी इतना पीटा गया की वह भी अधमरा हो गया! कुंती ने यह समाचार किसी से लिखवा कर 'भारत मित्र' में छपवा दिया, भारत सरकार की उस पर दृष्टि पड़ी और कुंती के मामले की जाँच फिजी में करायी गयी। इमिग्रेशन अफसर वहाँ पहुँचा और कुंती को बहुत धमकाया। पर कुंती ने यही कहा कि जो कुछ मैंने 'भारत मित्र' में छपवाया था, बिलकुल ठीक था। यहाँ पर कुंती के धैर्य और साहस की जितनी प्रशंसा की जाय थोड़ी है। नदी में कूद कर उसने अपने सतीत्व की रक्षा की और पराधीन होने पर भी उसने इमिग्रेशन अफसर को फटकार बताई।

    क्या कुंती के इस दृष्टांत को सुन कर भी हमारे भाई इस कुली-प्रथा को रोकने का प्रयत्न नही करेंगे?

    नारायणी- इस नाम की एक स्त्री नादी जिला की नावो नामक कोठी में काम करती थी। इसके एक बच्चा पैदा हुआ जो कि मर गया। बच्चा पैदा होने के दो-तीन दिन बाद ही ओवरसियर ने चाहा की वह काम पर चले, यद्यपि सरकारी नियम के अनुसार बच्चा पैदा होने पर तीन महीने तक कोई स्त्री काम पर नहीं जा सकती। पर गोरा ओवरसियर भला ऐसे नियमों को क्यों मानने लगा! नारायणी ने कहा "मेरा बच्चा मर गया है, मैं काम पर न जाऊँगी। इस पर उस ओवरसियर ने इतना पीटा कि वह एकदम बेहोश हो कर गिर पड़ी। पुलिस के गोरे सब-इंस्पेक्टर ने आ कर जाँच की और उस स्त्री को अस्पताल पहुँचाया। ओवरसियर गिरफ़्तार किया गया। सुवा नगर की बड़ी अदालत Supreme Court तक यह अभियोग पहुँचा। जब सुवा में यह स्त्री उतारी गयी तो उसमे इतनी भी शक्ति नहीं थी कि एक फर्लांग भी पैदल चल सके। इसीलिए कचहरी तक खाट पर रख कर लायी गयी थी। अभियोग के अंत में वह गोरा ओवरसियर निरपराध (not guilty) हो कर छूट गया। उस बेचारी पर इतनी मार पड़ी थी कि उसका मस्तिष्क खराब गया था, वह अभी तक पागल सी रहती है। न्याय का यह ज्वलंत दृष्टांत है! श्वेत रंग की महिमा अपार है! इस प्रकार के कितने भी अत्याचार वहाँ नित्य-प्रति हुआ करते हैं। ये ओवरसियर लोग जूतों की ठोकरों से भारतवासियों को पीटना खूब जानते हैं और घूसों की मार से जड़ से दाँत तोड़ना भी खूब जानते हैं। ये लोग कपड़े जला देते हैं, लात मार कर खाना फ़ेंक देते हैं, और हम लोगों को मनमाने कष्ट देते हैं। ये सब भीतरी दुःख हैं। बिना गवाह के कचहरी में जाना वृथा हो जाता है। 1912 ई० में मैं जिला नदी की कचहरी में बैठा था, वहाँ पर मैंने एक मामला मजिस्ट्रेट के इजलास पर होते देखा। एक मद्रासी ने नवकाई के कंपनी अस्पताल के श्वेतांग डाक्टर (सुप्रिटेंडेंट) पर नालिस की थी। उसका बयान इस तरह हुआ- "मैं हाथ के दर्द से व्याकुल हो कर कोठी में काम न कर सकने पर अस्पताल में भर्ती हो गया। दिन-रात हाथ के दर्द से व्याकुल रहता हूँ। अस्पताल के सरदार ने मुझ को दो डोल दे कर कुँए से टंकी में पानी भरने को कहा। मैंने जबाब दिया "मैं हाथों के दर्द से लाचार हूँ, पानी नहीं भर सकता। अगर काम करने लायक होता तो काठी में ही रहता। अस्पताल में क्यों आता? यह सुन कर सरदार ने मुझे निर्दयता से पीटा, मैं चिल्लाया, पीछे मेरे डाक्टर साहब ने आ कर पूछा क्या बात हैं? सरकार ने कहा "यह आदमी हुक्म नहीं सुनता, पानी नहीं भरता।" डाक्टर से मैंने कहा मेरा हाथ दुखता है इस बात को आप जानते हैं। हाथ के दर्द से मैं खाली डोल नहीं उठा सकता, पानी से भरा किस तरह उठेगा? उस नर पिशाच डाक्टर ने भी मुझे ठो कर और घूंसों से मारा। घूंसे की चोट से मेरे दांत जख्मी हो गए, नाक से लहू बह कर मेरी कमीज तर हो गयी। मैं बेहोश हो कर गिर पड़ा। बेहोशी की दशा में उठा कर मुझे टट्टी की कोठरी में बंद करके बाहर से ताला लगा दिया गया। यह घटना शाम चार बजे की है, जब मुझे होश आया तब मैंने अपने आपको टट्टी की कोठरी में बंद पाया। मैंने जहाँ पर मैले का बर्तन रहता है उस द्वार से एक लकड़ी का तख्ता उखाड़ा। उसी रास्ते से कोठरी से निकल भागा। भाग कर हुजूर के पास आया। हुजूर ने जिला डाक्टर के पास भेजा। वहाँ से यहाँ बुलाया गया हूँ। मेरी इस घटना के समय बहुत आदमी देखते थे। डाक्टर के डर से मेरी गवाही कोई न देगा। मेरे गवाह जो यहाँ आये हैं उनको भी डाक्टर ने धमका दिया है।"

    मजिस्ट्रेट ने बयान सुन कर गवाह बुलाये। पर वे मद्रासी के पक्ष से विरुद्ध निकले। डाक्टर साहब के वकील ने बहुत बहस की। लाचार पक्ष पुष्ट न होने से मद्रासी की हार हुई। डाक्टर साहब जीत गए। फैसले में डाक्टर निर्दोष ठहरे। डाक्टर साहब ने मजिस्ट्रेट साहब से अपने खर्चे की प्रार्थना की। दयालु मजिस्ट्रेट बोले कि जब यह आदमी मेरे पास आया था तो चोट से इसका मुँह फुटबाल के समान फूल गया था। तिस पर आप खर्च लौटाना चाहते हैं। खर्च नहीं मिलेगा। बस डाक्टर चले गए।

    मद्रासी को उसका मालिक ओवरसियर पकड़ कर काम पर ले गया। उस मद्रासी का नाम रामदास था।

    काले रंग से घृणा

    स्टीमरों पर काले रंग के कारण हम लोगों को अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। प्रथम तो यह कि बैठने के लिए हम लोगों को बहुत ही बुरा स्थान मिलता है। यूरोपियन लोगों की कोठरी की ओर तो जाने के लिए भी आज्ञा नहीं है। चाहे हम पूरा किराया देने के लिए उद्यत हो पर हमें तो भी अच्छी जगह बैठने के लिए भी नहीं मिलती। एक बार मैं एण्डी केपा नामक स्टीमर पर चढ़ कर सुवा से लतौका को गया। मुझे वहाँ बिठाया गया जहाँ की सूअर इत्यादि जानवर भी बिठाये जाते हैं। कई कारणों से मुझे ज्वर आ गया था। रात्रि को पानी बरसने लगा और मेरे पास केवल एक ही कम्बल था। मेरे कपड़े सब भीग गए थे और जाड़े के मारे मैं थरथरा रहा था। मैंने बहुत प्रार्थना की कि मुझे एक अच्छी कोठरी मिल जाय, मैं पूरा-पूरा भाड़ा उसका दे दूँगा, पर कुछ सुनवायी न हुई। लाचार हो मुझे वहीं पड़ा रहना और भीगना पड़ा। यह बर्ताव मेरे जैसे अशिक्षित व अल्प-शिक्षित भारतवासियों के साथ ही नहीं किया जाता, बल्कि बड़े-बड़े सुशिक्षित भारतवासियों के साथ भी किया जाता है। कितने ही बंदरगाहों पर तीसरे दर्जे तक के गोरे योंही निकाल दिए जाते हैं और दूसरे दर्जेवाले भारतवासियों के मोज़े, पाजामे इत्यादि सब कपड़े उतारे जाते हैं और निःसंक्रमक (disinfect) किए जाते हैं।

    फिजी में सी० एस० आर० नामक एक बड़ी कंपनी है जो खाँड का व्यापार करती है। वह हम लोगों के गन्ने मोल लेती है। जिस मनुष्य का गन्ना वहाँ जाता है उसे एक रसीद दी जाती है। सप्ताह में एक दिन इस रसीद से गन्नेवालों को रुपया मिलता है। कंपनी के गोरे अफसर हम लोगों के हाथों से जब रसीद लेते हैं तो पहले दूर से ही उसे लोहे के चिमटे से पकड़ते हैं और फिर उसे जलती हुई गंधक का धुआँ देते हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि ऐसा क्यों करते हो, तो यही कहते हैं कि तुम लोग काला आदमी है। तुम्हारे हाथ की छुई हुई रसीदों से हमको बीमारी हो जाने का डर है, इसलिए हम इन रसीदों का रोग दूर करते हैं।

    एक बार मैं अपने एक मित्र के साथ एक अंग्रेज बैरिस्टर के कार्यालय में गया। वहाँ पर एक भारतवासी अपने इजहार लिखा रहा था। बैरिस्टर साहब ने अपनी मेम साहब से कहा कि रुमाल से अपने मुँह और नाक बंद कर लो, नहीं तो इस काले आदमी के मुँह से निकलने वाली हवा से तुमको रोग हो जायगा। यद्यपि यह आदमी मेम साहब से बहुत दूर पर खड़ा हुआ था, पर तब भी श्वेतांग बैरिस्टर साहब ने ऐसा कह ही दिया! पाठक! ये वे ही बैरिस्टर साहब हैं जो कि हमारे भाइयों की बदौलत ही हजारों पौंड प्रतिवर्ष कमाते हैं।

    कंपनियों के कार्यालय के बरामदों तक हम लोग नहीं जाने पाते। यदि भूल से चले भी गए तो धक्का मार कर धकेल दिए जाते हैं।

    उपर्युक्त प्रकार के कितने ही दुख हमें काले रंग के कारण हर रोज सहने पड़ते हैं। हम लोग, जो अपने को ब्रिटिश राज्य की प्रजा समझते हैं, जब अपने घर भारतवर्ष से बाहर निकलते हैं, तो यह बर्ताव हमारे साथ किया जाता है तब हमारी आँखे खुल जाती हैं।

    सौदागरों के अत्यचार

    फिजी के अंग्रेज सौदागर हम भारतवासियों की भलायी कभी नहीं चाहते। पहले तो कितने ही हमारे भाई पाँच वर्ष तक कठिन परिश्रम करते-करते ही यमलोक को चले जाते हैं। यदि कोई परमेश्वर की कृपा से पाँच वर्ष तक काम करके स्वतंत्र (Free) हो जाते हैं और खेती काम करना चाहते हैं तो यूरोपियन सौदागर उनके काम में अनेक बाधाएँ डाल देते हैं! गन्ने की खेती में गोरों का माल 14 शिलिंग प्रति टन के हिसाब से लिया जाता है, पर हम लोगों का माल चाहे वह गोरों के माल से अच्छा ही हो, 9 शिलिंग फी टन से अधिक पर नहीं बिकता! कितने ही भारतवासी फिजी में केले का व्यापार करते हैं। बहुत-सा केला वहाँ से आस्ट्रेलिया भेजा जाता है। आस्ट्रेलिया में जा कर तो हम लोग व्यापार कर ही नहीं सकते। ये यूरोपियन सौदागर इस लिए केले के जिस संदूकक का दाम आस्ट्रेलिया में 14 शिलिंग लेते हैं उसी को हम लोगों से दो या तीन शिलिंग में खरीद लेते हैं। मक्का के जिस बोरे के लिए वे हमें दस शिलिंग से अधिक नहीं देते उसे स्वंय 18 शिलिंग में बेचते हैं। हम लोगों को हार कर उन्हें माल बेचना पड़ता है, न बेचें तो क्या करें?

    200 भारतवासियों को धोखा दिया गया!

    फिजी में बाईनर साहब एक पुराना प्लैंटर हैं। उसने 800 एकड़ भूमि पट्टे पर ले ली। उस भूमि में बहुत-सा जंगल था, साहब ने सोचा की इस जंगल को यदि अपने व्यय से कटवाएँगे तो 1000 हजार से कम खर्च नहीं पड़ेगा, इसलिए यदि किसी तरह भोले-भाले भारतवासियों को धोखा देने से काम चल जाय तो ठीक है। यही विचार कर उसने कोई 200 भारतवासियों को बुलाया और कहा, हमारे पास 800 एकड़ भूमि है, जिसको जितनी भूमि की आवश्यकता हो, हम से ले सकता है। इस जमीन को साफ कर लो और इसे जोतो या बोया करो। इस प्रकार चिकनी-चुपड़ी बातें कह कर उसने कुल भूमि उन भारतवसियों में बाँट दी और उनको एक-एक कागज पर लिख दिया कि इस भूमि को तुम 5 या 10 वर्ष तक काम में लाना और एक पौंड प्रति एकड़ के हिसाब से दाम देना। उन विचारों ने बड़े परिश्रम से और अपने पास के पौंड खर्च करके उस जंगल को काटकर ठीक किया और उसमे एक वर्ष खेती की। दूसरी वर्ष के प्रारंभ होते ही बाईनर साहब ने उन सब भारतवासियों को वहाँ से निकाल दिया और जमीन छीन ली। उन बेचारों बहुत कहा-सुनी की पर सब व्यर्थ!

    इस प्रकार के कितने ही दृष्टांत दिए जा सकते हैं, पर स्थानाभाव के कारण नहीं लिखे गए। पाठक स्थाली-पुलाक-न्याय (डेगची के चावल) से उनका भी अनुमान कर लें।

    फिजी के कानून से विवाह

    फिजी में जो आदमी अपनी स्त्री की मेरिजकोर्ट (marriage court) में रजिस्ट्री करा लेता है, वही उसका हकदार होता हैं। विवाह हो जाने पर मजिस्ट्रेट के सामने स्त्री-पुरुष दोनों को जाना पड़ता है, वहाँ पर मजिस्ट्रेट दोनों की राजी पूछ कर उन्हें एक-एक सर्टिफिकेट दे देता है। जो कि विवाह का सर्टिफिकेट कहलाता है। रजिस्ट्री करायी 5 शिलिंग देना पड़ता है। हमारी धार्मिक रीति से जो विवाह किए जाते हैं, बिना रजिस्ट्री कराए फिजी के शासन-नियमों के अनुसार वे ठीक नहीं समझे जाते हैं। यदि कोई भारतवासी फिजी में अपनी विवाहिता स्त्री के साथ जाए और वहाँ जा कर विवाह की रजिस्ट्री न कराए तो उस पुरुष का धन मृत्यु के पश्चात उसकी स्त्री को नहीं मिल सकता। वह धन इमीग्रेशन दफ्तर को भेजा जाता है। जिन आदमियों का कोई उतराधिकारी नहीं होता उनका धन भी इमीग्रेशन कार्यालय को भेजा जाता है। इमीग्रेशन विभागवाले उस धन को भारतवर्ष में भेजते हैं। परंतु आरकाटी जिन लोगों को बहका कर ले जाते हैं प्रायः उनका नाम, जाति और पता बिलकुल झूठा लिखवा देते हैं। इमीग्रेशन आफिस से वह धन उसी पते पर भेजा जाता है। जब कुछ पता नहीं चलता तो वह धन लौट कर फिजी में वहीं पहुँच जाता है। इस प्रकार आरकाटियों की बदमाशी से मृत आदमी का धन उसके माता, पिता, भाई इत्यादि संबंधियों को भी नहीं मिलता।

    क्या हम आशा कर सकते हैं कि भारत सरकार इस प्रकार के अन्याय को रोकने का प्रयत्न करेगी? फिजी संबंधी कानून के विषय में भी फिजी-प्रवासी लिखा-पढ़ी कर रहे हैं, परंतु अभी तक कोई फल नहीं निकला।

    गोरे बैरिस्टर और वकील

    यदि कोई भारतवासी गोरे बैरिस्टरों और वकीलों के पास जाता है तो वे एक गिन्नी के काम के लिए दस-दस गिन्नी ले लेते हैं। कितने ही बैरिस्टर तो यहाँ तक धूर्तता करते हैं कि पहले मनमाना मेहनताना ले लेते हैं और फिर कोर्ट में जाते भी नहीं! कुछ गोरे बैरिस्टर यह करते हैं कि पहले कुछ पौंड ले लेते हैं और अभियोग की पेशी के एक दिन पहले रात को कहला भेजते हैं कि अगर हमको पाँच गिन्नी और लाओ तो हम तुम्हारी पैरवी करेंगे, अन्यथा नहीं। बेचारे रात को दूसरा बैरिस्टर भी नहीं कर सकते, अतएव लाचार हो कर पाँच गिन्नी देनी पड़ती है। यदि उनसे कहा जाए कि हमारे दाम वापस दे दो तो वे यही कहते हैं, "हम लोग वापस नहीं दे सकते।" भारतवासियों के कितने ही मुकदमे यों ही ख़ारिज हो गए हैं क्योंकि गोरे बैरिस्टर ठीक समय पर नहीं पहुँचते। यदि कोई झगड़ा किसी भारतवासी और गोरे में वहाँ हो जाए, तो प्राय: गोरे बैरिस्टर यह किया करते हैं कि रुपये तो भारतवासी से पैरवी करने के लिए लेते रहते हैं और फिर अभियोग में गोरे का पक्ष ले कर गोरे को ही जिता देते हैं! हमारे जो भाई दस-दस घंटे काम करके कठिन परिश्रम से थोड़ा-बहुत कमाते हैं उसे ये गोरे बैरिस्टर छल-कपट से ठग लेते हैं, बेचारे भारतवासी उन पर रुपयों के लिए नालिश भी नहीं कर सकते, क्योंकि गोरे बैरिस्टर अपने श्वेतांग भाई के विरुद्ध अभियोग में काम करना स्वीकार ही नहीं करते।

    गोरा बैरिस्टर 1925 पौंड हजम कर गया

    फिजी की राजधानी सुवा में बर्कले नाम के एक बैरिस्टर हैं। एक बार 45 पंजाबी सिक्ख उनके निकट गए और प्रार्थना की "हम दक्षिण अमरीका में अर्जेंटाइन प्रजातंत्र (Argentina republic) राज्य को जाना चाहते हैं। हमने सुना है कि वहाँ पर हमको बहुत मजदूरी मिलेगी। परंतु फिजी से कोई स्टीमर दक्षिण अमरीका को नहीं जाता, क्या करें, कैसे जाएँ? गोरे बैरिस्टर ने मन में सोचा चलो ये लोग अच्छे चंगुल में आ फँसे। फिर उन सिक्खों से बातें बना कर कहा "यदि तुम में से प्रत्येक 4 पौंड जमानत के दे, 5 पौंड मेरे मेहनताने के दे और 16 पौंड किराये के दे तो मैं स्टीमर तैयार कराके तुम को सीधा अर्जेंटाइना भेज सकता हूँ।" सिक्ख लोग बातों में आ गए और बैरिस्टर की आज्ञानुसार पच्चीस-पच्चीस पौंड दे दिए। इनमें केवल 16 पौंड की उसने रसीद दी इस प्रकार उस बैरिस्टर ने 1925 पौंड इन लोगों के ले लिए और अपनी सब धन संपत्ति अपने पुत्र के नाम कर दी।

    पंजाबियों ने सुप्रीम कोर्ट में नालिश की। बीसियों पौंड उनके और व्यय हुए, तब जा कर कहीं डिग्री मिली, पर अब उस बैरिस्टर के पास क्या था। एक कौड़ी भी वसूल न हुई। बेचारे रो-पीट कर रह गए। कितने ही दीन-हीन हो गए और एक सिक्ख तो इसी के दुख में मर गया!

    भारतवासी बैरिस्टर का बुलाया जाना

    जब हमको इतने कष्ट सहने पड़े, तो हम लोगों ने सोचा कि यदि कोई भारतवासी बैरिस्टर फिजी में आ जाए तो ठीक हो। गोरे बैरिस्टर लिखते कुछ हैं और हम लोगों को सुनाते कुछ और ही हैं। हमारे साथ सहानुभूति रखना तो दूर रहा, हमें घृणा की दृष्टि से देखते हैं, इसलिए ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि कोई हिंदुस्तानी बैरिस्टर यहाँ आ कर रहे। हम लोग श्रीमान प्रात:स्मरणीय गांधीजी का नाम बहुत दिनों से समाचार पत्रों में पढ़ा करते थे और उनके परोपकारी कार्यों के विषय में भी थोड़ा बहुत जानते थे। अतएव हम लोगों ने एक सभा की। इस सभा के सभापति श्रीयुत रूपराम जी थे। सर्वसम्मति से निश्चय किया गया कि एक पत्र श्रीमान गांधीजी के पास भेजना चाहिए जिसमें हमारे कष्टों का संक्षिप्त विवरण हो और गांधीजी से प्रार्थना की जाय कि वे किसी बैरिस्टर को फिजी भेजने का प्रबंध करें। पत्र लिखने का कार्य मुझे सौंपा गया और मैंने अपनी तुच्छातितुच्छबुद्धि-अनुसार एक पत्र लिखा। पत्र का सारांश यह था "हम लोग फिजी में गोरे बैरिस्टरों से अनेक कष्ट पा रहे हैं। ये गोरे लोग हम पर नाना प्रकार के अत्याचार करते हैं और हमारे सैकड़ों पौंड खा जाते हैं। यहाँ पर एक भारतवासी बैरिस्टर की बड़ी आवश्यकता है। श्रीमान एक प्रसिद्ध देशभक्त हैं, अतएव हमें आशा है कि आप हमारे ऊपर कृपा करके किसी भारतवासी बैरिस्टर को यहाँ भेजने का प्रबंध करेंगे। इस विदेश में आपके अतिरिक्त कोई सहारा नहीं है।" श्रीमान गांधीजी ने कृपा करके पत्रों के कुछ उद्धृत अंशों का अनुवाद कई समाचार-पत्रों में छपवा दिया और मेरे पास एक पत्र भेजा। पत्र की प्रतिलिपि निम्नलिखित है:

    श्रावण वदी 8, सं० 1967

    "आपका खत मिला है। वहाँ के हिंदी भाइयों का दुख की कथा सुनके मैं दुखी होता हूँ। यहाँ से कोई बैरिस्टर को भेजने का मौका नहीं है। भेजने जैसा कोई देखने में भी नहीं आता है। जो इजा परे उसका बयान मुझे भेजते रहना। मैं यह बात विलायत तक पहुँचा दूँगा।

    स्टीमर की तकलीफ का ख्याल मुझे बराबर यहाँ पाता है। यह सब बातों के लिए वहाँ कोई इंगरेजी पढ़ा हुआ स्वदेशाभिमानी आदमी होना चाहिए। मेरे ख्याल से आवेगा तो मैं भेजूँगा।

    आपके दूसरे खत की राह देखूँगा।

    मोहनदास करमचंद गांधी का यथायोग्य पहुँचे।।"

    जिन गांधीजी ने अपने भाइयों के लिए सारा जीवन व्यतीत किया है, जिन्होंने 4000 पौंड की वार्षिक आय छोड़कर भारतवासियों के दुख मोच-नार्थ कुली तक का काम किया है, जो कि अपने देशबंधुओं के लिए कई बार जेल भी गए हैं, उन्हीं श्रीमान गांधीजी का उपर्युक्त पत्र है। इस पत्र में भी गांधीजी की महान आत्मा और पूर्ण देशभक्ति की झलक दीख पडती है। गांधीजी से महापुरुष ने यह पत्र हिंदी में लिखा है यह बात हिंदी के लिए कितने गौरव की बात है! इस पत्र से हिंदी की राष्ट्रीयता भी प्रकट होती है।

    गांधीजी के छपाए हुए लेख को "इंडियन ओपिनियन" में श्रीमणिलालजी, एम० ए०, एल-एल० बी०, बैरिस्टर-एट-ला ने पढ़ा। उन दिनों वे मौरीशस में काम कर रहे थे। श्रीमणिलालजी भारतवर्ष के एक प्रसिद्ध देशभक्त हैं। कांग्रेस में आप बहुत दिनों से भाग ले रहे हैं। अपने देश के शिक्षित भाइयों के सामने मणिलालजी का परिचय इस क्षुद्र पुस्तक में देना वृथा है। आपने मौरीशस में बहुत कुछ कार्य किया था। आपने वहाँ कुली जाना बंद करा दिया, जो भारतवासी वहाँ पर थे उनकी बहुत कुछ सहायता की, वहाँ कानून में हेर-फेर कराया और कष्टदायक फ्रेंच नियमों से हिंदू-मुसलमानों को मुक्त करा दिया। पहले मौरीशस में जेलखानों में हमारे भाइयों की चोटी और दाढ़ी काटी जाती थी और खाने-पीने में भी बहुत गड़बड़ होती थी। यह श्रीमान मणिलाल जी का ही काम था कि उन्होंने इन बातों को बिलकुल बंद करा दिया।

    श्रीमान मणिलाल जी ने गांधीजी के उक्त लेख को पढ़ कर हम लोगों से पत्र-व्यवहार किया। फिजी में हम लोगों ने मणिलाल जी के लिए 172 पौंड चंदा किया। इसमें से 45 पौंड उन्हें स्टीमर के भाड़े को भेज दिए और शेष से उनके लिए कानून की किताबें खरीदीं और उनके लिए घर इत्यादि का प्रबंध किया। परंतु कुछ दिनों बाद मणिलाल जी का हिंदी में पत्र आया, जिसमें उन्होंने लिखा था "हमारे संबंधी हमें इस बात की सम्मति नहीं देते कि हम फिजी जायँ। हम नैटाल जा रहे हैं, वहाँ श्रीमान गांधीजी से राय ले कर जैसा कुछ होगा लिखेंगे। यदि न आ सके तो हम आप के दाम वापस कर देंगे।" जब श्री मणिलाल जी का यह पत्र मिला तो हमारी आशा-लता मुरझाने लगी। फिर एक सभा की गयी। सर्व-साधारण की आज्ञानुसार मैंने पुनः एक पत्र गांधीजी के पास भेजा। इतने में श्री मणिलाल जी नैटाल पहुँचे। गांधीजी ने मणिलाल जी से यही कहा कि आपने जो वचन दिया है उसका पालन करना उचित है। मणिलाल जी फिजी आने को राजी हुए। स्वनामधन्य गांधीजी ने कृपाकर एक पत्र हम लोगों को फिर भेजा, पत्र की लिपि निम्नलिखित है-

    "आपका पत्र मिला है। मी० मणिलाल डाक्टर के लिए मैंने तार भेजा था। उसका जबाव आपने न भेजा। इस पर से मैं समझा कि आप लोग उसको मुक्त करने में राजी न थे, दूसरे सबबों के लिए भी मणिलाल जी फिजी ही जाने का निश्चय किया। गत शुक्रवार के रोज ये भाई केप से निकल चुके हैं, आप को तार भी दिया हूँ। आस्ट्रेलिया हो कर वहाँ पहुँचेंगे।

    मेरी उमीद है आपके सब अब राजी होवेंगे और मी॰ मणिलाल जी की अच्छी तरह बरदास करोगे। उनका रहना खाने का बंदोबस्त वहाँ के लोगों ने हाल तुरत में करना चाहिए! सब भाइयों का उत्तेजन मिलेगा तो अवश्य मी० मणिलालजी वहाँ स्थायी बनेगें।

    फेर कुछ लिखना होगा तो लिखना

    मोहनदास गांधी के यथायोग्य।"

    27 अगस्त, 1912 को मणिलालजी फिजी की राजधानी सुवा पहुँचे। हम लोगों ने उनके स्वागत का यथाशक्ति प्रबंध किया था। जिस दिन उनका स्वागत किया गया था, उस दिन हम फिजी प्रवासी भारतवासियों को जो प्रसन्नता हुए थी वह अकथनीय है। सैकड़ों भारतवासी वहाँ एकत्रित हुए थे। उस दिन स्टीमर से सैकड़ों ही हमारे भाई दूसरी जगहों से आये हुए थे। फिजी के आदिम निवासी लोगों को भी उस दिन बड़ी खुशी हुई। कठिन परिश्रम और दौड़-धूप के कारण बहुत-से भारतवासियों के मुख पर स्वेदबिंदु झलक रहे थे। अहा! वह दृश्य कैसा रमणीय था! सड़कों पर तिल-भर भी जगह नहीं थी, खचाखच आदमी भरे हुए थे। फिजी के दो एक अंग्रेजी पत्रों के संवाददाता घबड़ाव हुए इधर से उधर घूम रहे थे। उन्हें इस बात का पता नहीं था कि यह हो क्या रहा है? मणिलाल जी उतारे गए और बंगले में ठहराए गए। तदनंतर संध्या के समय फिजी-निवासी भारतवासियों की ओर से उन्हें स्वागत का अभिनंदन-पत्र दिया गया। अभिनंदन-पत्र में उनसे यही प्रार्थना की गयी थी कि आप हमारे भाइयों की गिरी हुई दशा को सुधारें और कृपाकर हम लोगों की सहायता करें। मणिलाल जी ने एक छोटा सा व्याख्यान दिया और उसमे उन्होंने कहा "मैं यथाशक्ति आप की सेवा करने का प्रयत्न अवश्य करूँगा।" अत्यंत हर्ष की बात है कि मणिलाल जी अपनी प्रतिज्ञा को पूर्णतया पालन करने में तत्पर हैं।

    इसके तीन दिन बाद फिजियन लोगों ने भी मणिलालजी का स्वागत बड़ी धूमधाम से किया। कोई छह या सात सौ फिजियन इकट्ठे हुए। उन्होंने मणिलालजी को निमंत्रित किया और उनके स्वागत के उपलक्ष में फिजियन पुरुष व स्त्रियों ने खूब नृत्य और गान किया। फिजियन लोगों में यह रीति है कि जिस मनुष्य को प्यारा समझते हैं और जिसका कि बहुत कुछ आदर-सत्कार करना उन्हें अभीष्ट होता है, उसके गले में वे अपने यहाँ के बड़े सरदार की लड़की के हाथ से माला पहनवाते हैं। यहाँ यह कहना बाहुल्य-मात्र है कि मणिलाल जी को भी यह माला पहनाई गयी थी। हम लोगों को फिजियन लोगों के इस उत्साह को देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ। कितने ही फिजियन अपनी भाषा में कह रहे थे "आज हमारे लिए बड़े हर्ष की बात है कि हमें एक ऐसे पढ़े-लिखे भारतवासी के स्वागत करने का सौभाग्य हमारे मित्र पंडित तोताराम के द्वारा प्राप्त हुआ। जब से फिजी देश बसा है तब से आज तक कोई इतना सुशिक्षित भारतवासी यहाँ नहीं आया। आप जैसे सुशिक्षितों की यहाँ अत्यंत आवश्यकता है, इस देश में आपको और आपके भाइयों को ईश्वर चिरायु करे। आप हम लोगों को भी अपने भाइयों की तरह समझना।" तत्पश्चात मि० मणिलाल जी ने भी एक मनोहर वक्तृता दी। मि० साम मुस्तफा ने फिजियन्स की भाषा का तजुर्मा अंग्रेजी में मि० मणिलालजी को समझाया, फिर संध्या को विदा हो कर मेरे यहाँ भोजन हुआ। प्रात: होते ही वे दुरुलुलु थाने के पास महाजन अलगू से मिलने को गए। वहाँ पहुँचते ही उन्होंने मारे खुशी के धूर-गोलों में आग लगा दी। आवाज होते ही मजिस्ट्रेट ने हुक्म दिया कि बंद करो, नहीं तो सम्मन मिलेगा। संध्या के तीन बजे मणिलालजी श्रीमान बाबू रामसिंह की लंच पर सवार हो कर सुवा को चले गए।

    फिजीद्वीप

    फिजी का इतिहास- फिजी के प्रचीन इतिहास के बारे में हम बहुत कम जानते हैं। बहुत कुछ अनुसंधान करने पर भी इस विषय में कोई निश्चित बात ज्ञात नहीं हुई। इसका कारण यही है कि मिशनरियों के जाने से पहले फिजीवाले लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे। इतिहास के अन्वेषकों का मत है कि ये लोग न्यू गायना से यहाँ पर बसे; पर यह बात निराधार-सी है। इस विषय में अद्यपर्यंत कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिला। हाँ पोलिनिशियन लोगों की भाषा में और इनकी भाषा में थोड़ी-सी समानता पायी जाती है। पर इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला कि पोलिनिशियन लोग कब और कैसे फिजी में आये। सन 1643 ई० में Tasman नाम का एक डच ने इसे आविष्कृत किया था। जैसा कि हम पहले लिख चुके हैं, यह द्वीप 1876 ई० में ब्रिटिश सरकार के हाथ में आया। रतूमा नामक द्वीप इसमें सन 1879 में मिला दिया गया।

    जनसंख्या- सन 1911 ई० की अप्रैल को जो मर्दुमशुमारी हुई थी, उससे ज्ञात हुआ कि फिजी की जनसंख्या 1,39,541 है।

    नाम जाति पुरुष स्त्री योग
    यूरोपियन और दूसरे गोरे 2403 1304 3707
    वर्णसंकर अर्ध गोरे (Half-caste) 1217 1841 2401
    भारतवासी 26073 14213 40286
    पोलिनिशियन 2429 329 2758
    फिजी के आदिम निवासी 46110 40986 87096
    चीनी निवासी 276 29 305
    रोतुमन 1043 1133 2176
    मिश्रित 457 355 812
    80008 59533 139541

    जलवायु- फिजी की आबोहवा बहुत अच्छी है। भूमध्य रेखा के निकट के देशों में इतना अच्छा जलवायु बहुत कम पाया जाता है। मलेरिया का तो फिजी में अभाव ही है। इसके अतिरिक्त और भी कितने ही प्रकार के ज्वरों और रोगों का वहाँ नाम-निशान भी नहीं। फिजी के दक्षिण-पूर्व के कोने से जो पछुआ हवा चलती है उससे फिजी की गर्मी शांत हो जाती है। फिजी में हैजा और प्लेग कभी नहीं फैलते। मच्छर फिजी में बहुत हैं, परंतु मलेरिया उनसे पैदा नहीं होता। चीता, सिंह, साँप, बिच्छू इत्यादि फिजी में बिलकुल नहीं पाए जाते। परंतु मक्खियाँ फिजी में बहुत ज्यादा होती हैं, इतनी ज्यादा कि उनके मारे नाक में दम हो जाता है। फिजी की राजधानी सुवा में लगभग 107 इंच पानी प्रतिवर्ष बरसता है। फिजी में अकाल का विशेष डर नहीं क्योंकि थोड़ा बहुत पानी वहाँ हर महीने में बरसा ही करता है। परंतु आँधी वहाँ बड़े जोर की आती है, इस कारण खेती को बड़ी हानि पहुँचती है, और केलों की खेती के लिए तो ये आँधियाँ बहुत ही हानिकारक होती हैं।

    फिजी के आदिम निवासी

    पहले फिजी के आदिम निवासियों की अपनी सभ्यता थी, परंतु जब से फिजी ब्रिटिश अधिकार में आया है तब से काफी परिवर्तन हो गया है। पहले इन लोगों में अनेक परम्पराएँ प्रचलित थी, परंतु अब वे क्रमशः नष्ट हो गयी हैं। कोई 250 वर्ष पहले इन लोगों में यह रीति थी कि जब कोई फिजियन बहुत वृद्ध हो जाता था तो कुछ फिजियन युवक मिल कर उसके पास जाते थे और कहते थे "कोई को सिंगनी बिया बीऊ न बूरा-बूरा "अर्थात क्या तुम संसार को नहीं छोड़ना चाहते? जब वह कुछ उत्तर नहीं देता था तो उसको भूनकर खा जाते थे।

    विवाह की रीति जो इन लोगों में प्रचलित थी, वह भी बड़ी अद्भुत थी। एक गाँव का फिजियन जा कर दूसरे गाँव की किसी कन्या को भगा कर अपने घर ले आता था। तब फिर उस लड़की के गाँववाले उस आदमी पर धावा बोलते थे। इधर लड़के की तरफ भी कितने ही आदमी लड़ने को तैयार रहते थे। फिर दोनों ओर से खूब लड़ाई होती थी। यदि वर पक्षवाले जीतते तो उस लड़की का विवाह पुरुष से कर दिया जाता था और लड़कीवाले विजयी होते तो लड़की अपने गाँव को लौट जाती थी ओर उसका विवाह किसी दूसरे के साथ कर दिया था। पति के शव के साथ पहले फिजियन लोगों की स्त्रियाँ भी जीवित ही गाड़ दी जाती थीं। जब किसी मनुष्य का मित्र मर जाता था तो वह अपने बाएँ हाथ की सबसे छोटी ऊँगली काट कर उसके साथ गाड़ देता था। परंतु अब ये कुरीतियाँ बहुत कम हो गयी है, क्योंकि अधिकांश फिजियन ईसाई हो गए हैं। विवाह की वह रीति भी नहीं रही है। कन्याएँ अब अपने आप वर को चुन लेती हैं। उनके माता-पिता उनके इस कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते। फिजियनों में 16 वर्ष से कम की कन्याओं और 25 वर्ष से कम के पुरुषों का विवाह नहीं होता। यद्यपि ऊँगली गाड़ने की प्रथा अब खत्म हो गयी है, पर तब भी दब-छिप कर थोड़े बहुत आदमी अपनी ऊँगली काटकर गाड़ देते हैं! मैंने कितने ही ऐसे आदमी देखे हैं जिनकी ऊँगली कटी हुई है। अपने मित्र व भाई मृतक के साथ अंगुली काट कर गाड़ देने से ये लोग "मांते बाता" यानी मित्र के प्रेम के वश उसके साथ मरने का परिचय देते थे। ये फिजियन अपने मित्र के मरने पर प्रेमपद को कैसा पूरा करते थे!

    फिजियन लोग नित्यप्रति के कार्यों में चाहे विदेशी वस्त्र व्यवहार करें, पर जब उनके यहाँ कोई त्योहार होता है तो वे सदा अपने हाथ की बनाई हुई चीजों को ही काम में लाते हैं। हम लोगों को जो कि विवाह के अवसर पर सैकड़ों रुपये विदेशी वस्तुओं के खरीदने में व्यय कर देते हैं, फिजियनों से यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। फिजियन लोगों में जब पुत्र उत्पन्न होता है तो फिजियन स्त्रियाँ तीन रात तक जागरण करती हैं और रात को घर में दीपावली की तरह खूब उजाला करती हैं। जब पहले-पहल फिजी आविष्कृत हुआ था तब ये लोग इतने नासमझ थे कि इन्होंने दियासलायी की डिबिया के लिए पचास-पचास एकड़ भूमि दे दी थी। पर वे अब बहुत बुद्धिमान हो गए हैं। अधिकांश लोग ईसाई हो गए हैं। उनके लिए गाँव-गाँव में ईसाईयों के स्कूल हैं जहाँ कि फिजियन भाषा पढ़ाई जाती है। सब मांसभक्षी हैं। तीर-कमान और बरछा, ये ही उनके हथियार हैं। घूँसा मारने में वे बड़े निपुण हैं। वे सुअरों को भी घूंसों से मार डालते हैं।

    फिजियनों का गिरमिट - हमारे भाई बहनों पर जो अत्याचार फिजी में होते हैं, उनका वर्णन किया जा चुका है। पर ये अत्याचार फिजियन लोगों पर नहीं होने पाते। पहले तो फिजियन लोग शर्तबंदी करके काम करते ही नहीं और यदि गिरमिट (Agreement) में काम करते भी हैं तो अपनी सुविधा के लिए नौकर रखनेवालों से कितनी ही शर्तें लिखवा लेते हैं। जब कोई फिजियन गिरमिट में काम करता है तो वह पहले लिखा लेता है कि दिन-भर में तीन बार भोजन देना होगा, छह महीने बाद कपड़े देने होंगे और साबुन, तंबाखू, मिट्टी का तेल और कंबल इत्यादि देने पड़ेगें। जब तक इस बात को लिखा कर रजिस्ट्री नहीं करा लेता तब तक कोई भी फिजियन काम करने को कदापि राजी नहीं होता।

    'COLONY OF FIJI' में एक यूरोपियन ने लेख लिखा है, जिसका आशय है: "फिजी के असली निवासी मजदूरी का काम अच्छी तरह नहीं कर सकते, उनका स्वभाव ही इस कार्य के लिए सर्वथा अयोग्य है। गन्ने की खेती में वही काम बार-बार रोज करना पड़ता है। (जिसे करते-करते जी ऊब जाता है) परंतु भारतवासी कुली इसी कार्य के लिए सर्वथा योग्य हैं और प्लेंटर लोग प्राय: उन्हीं से काम लेते हैं।"

    बहुत ठीक! फिजी के असली बाशिंदों को कौन नौकर रखेगा? पहले तो उनके नौकर रखने में खर्च ही बहुत पड़ता है और फिर गोरे लोग उन पर अत्याचार नहीं कर सकते। यह तो भारतवासी कुली ही हैं जिनके घूंसे मारो, पीटो, ठोकरें लगाओ, जिन्हें तनख्वाह मत दो, कैदखाने में भेज दो, कोई सुनने वाला ही नहीं!

    निष्पक्ष लेखक हो तो ऐसा हो! फिजी के आदिम निवासी इस कार्य के योग्य नहीं हैं। इसलिए कि उनका स्वभाव ही इस कार्य के लिए अयोग्य है!

    अब आप एक फिजियन मजदूर और भारतवासी की तुलना कीजिये। हम लोगों को वहाँ प्रति सप्ताह 5 शिलिंग 6 पैंस मिलते हैं, सो भी तब, जब पूरा काम करें। और सौ आदमियों में 5 से अधिक पूरा काम कभी भी नहीं कर सकते। परंतु जब भी में देखना है कि एक असाधारण परिश्रमी भारतवासी कुली, हर प्रकार के अत्यचार सहते हुए अधिक से अधिक कितना कमा सकता है। प्रति सप्ताह के 5शिलिंग 6 पैंस के हिसाब से एक महीने के 1 पौंड, 2 शिलिंग एक वर्ष के 13 पौंड 4 शिलिंग हुए। इसमे 9 पौंड तो सूखे खाने में ही व्यय हो जाते हैं। सेर-भर आटा और पाव-भर दाल के हिसाब से 9 मन आटा और 4.50 मन दाल हुई। फिजी में आटा 4 आना सेर, दाल 6 आना सेर और मसाला हल्दी, मिर्च इत्यादि 12 आना का का एक पौंड (आधा सेर) इस प्रकार तो कम से कम खाने में ही व्यय होने और साल-भर में एक- दो पौंड जुर्माना हो जाना कोई बड़ी बात नही है, अथवा दस-बीस दिन कि कैद ही हो जाना एक बल्कुल साधरण बात है; इसलिए इसका भी एक पौंड निकाल डालिए और कम से कम डेढ़ पौंड ऊपरी खर्च के लिए रख लीजिए। इस प्रकार कुल मिला कर 111\2 पौंड हुए। इस पर भी अभी कपड़े-लत्ते, तेल, लकड़ी, त्यौहार इत्यादि सबके सब बाकी हैं। 1 पौंड से अधिक कभी भी नही बच सकता। परंतु फिजियनों को सूखे 9 पौंड बचते है क्योंकि उनका खाना, पीना, कपड़ा, लत्ता, तेल साबुन सब प्लैंटरों के जिम्मे होता है और साल भर में 9 पौंड मिलते हैं।

    फिजियन लोग पूछताछ करके और सब प्रकार की सुविधाजनक शर्तें लिखाकर तब कहीं रजिस्ट्री करते हैं और हमारे यहाँ आरकाटी बहका कर मजिस्ट्रेट के पास ले जाता है। मजिस्ट्रेट पूछता है "फिजी जाने को राजी हो"? जहाँ मुह में से 'हाँ' निकली कि रजिस्ट्री हो गयी। रजिस्ट्री क्या हुई, केवल हाँ कहने से पाँच साल का कला पानी हो गया।

    फिजियनों की भाषा - पहले यहाँ लिखने की कोई भाषा नहीं थी। परंतु जब से ईसाई लोग वहाँ पहुँचे हैं तब से वहाँ के लोग रोमन में अपनी बातों को लिखते हैं और पढ़ते हैं। फिजियन लोगों के नाम भी बड़े अजीब होते हैं, जैसे माद्दु, इयोम्बी, लैबानी, सावे नादा, रातुइरोनी, च्यौ इत्यादि। फिजियन भाषा के दो चार-शब्द भी सुन लीजिए।

    तेनाना

    तमाना

    तोकाना

    तादीना

    वतीना

    कलौ

    माँ

    बाप

    बड़ा भाई

    छोटा भाई

    पत्नी

    ईश्वर

    फिजी प्रवासी भारतवासियों के जीवन पर एक दृष्टि

    फिजी में 40,000 से अधिक हिंदुस्तानी हैं। इनमें 35 फीसदी स्त्री हैं और 55 फीसदी पुरुष हैं। जब मैंने घूम-घूम कर वहाँ की भारतीय स्त्रियों से फिजी के आने के विषय में पूछा तो कुछ स्त्रियों ने कहा "हमारे निर्धन पति को आरकाटी ने बहका दिया, इसलिए हमें भी अपने पति के साथ यहाँ आना पड़ा। बहुत सी स्त्रियों ने कहा "हमारे सास, ससुर पति इत्यादि मर गए। तो निकट के कुटुंबी लोगों ने कुछ मदद नहीं की, इसलिए हम तीर्थ-भ्रमण करने को चली गईं और वहाँ से हमें आरकाटी बहका कर ले आये।" कुछ स्त्रियों ने यह भी कहा "पति के मरने पर जब हम विधवा हुईं तो घर के लोग हमसे लड़ने-झगड़ने लगे और हमें कष्ट देने लगे। इन्हीं दुखों से हम घर से निकल गयीं, बीच में दुर्भाग्यवश आरकाटियों के फंदे में पड़ गयीं और अंत में हमें अनंत कष्ट सहने के लिए यहाँ आना पड़ा।"

    उपर्युक्त बातों से प्रकट होता है कि गृह-संबंधी लड़ाई-झगडों से और विधवाओं के साथ समुचित बर्ताव न करने से बहुत-सी स्त्रियों को द्वीप-द्वीपांतरों में जाकर अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं। ये स्त्रियाँ बिलकुल भोली-भाली और प्राय: अशिक्षित होती हैं; इसी कारण वे आरकाटियों के फंदे में और भी जल्दी फँस जाती हैं। पता लगाने से ज्ञात हुआ कि रेवा और नाबुआ जिले की 500 स्त्रियों में कुल तीन या चार पढ़-लिख सकती थीं। यद्यपि पुरुषों को भी फिजी में अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं, पर स्त्रियों को उनसे भी अधिक दुःख उठाने पड़ते हैं। पहले तो उन्हें प्रात:काल साढ़े तीन बजे उठना पड़ता है और रोटी बनानी होती है। तत्पश्चात दस घंटे खेत पर कठिन परिश्रम करना पड़ता है, फिर घर लौटकर रोटी करनी होती है। जब स्त्रियाँ काम पर से लौटती हैं तब उनके मुँह पर मुर्दनी-सी छा जाती हैं। उस समय उनकी मुख की मलीनता देख कर जो दुःख होता है वह वर्णनातीत है। जो स्त्रियाँ भारतवर्ष में कभी अपने गाँव से बाहर नहीं गयी थीं, जो स्त्रियाँ इतना भी नही जानती थीं कि हमारे जिले के बाहर कोई देश है भी या नही, जो स्त्रियाँ स्वभावतः नम्र और सुकुमार थीं, जिन्होंने की घर पर कभी कड़ा काम नहीं किया था, वे ही स्त्रियाँ आज हजारों कोस दूर फिजी, जमैका, क्यूबा, होंडुरस, गायना इत्यादि में जाकर दस-दस घंटे कठिन परिश्रम करती हैं। कितनी ही बाल-विधवाएँ बहकायी जाकर फिजी में भेज दी गयी हैं, उनके दुखों की कहानी सुन कर कड़े से कड़ा हृदय भी पसीज सकता है। जिस समय वे नीचा मुख करके अश्रुधारा बहाती हुई अपने दुखों की कहानी सुनाती हैं उस समय अपनी आँखों से आँसुओं को रोकना सुननेवालों के लिए असंभव है।

    गोरे ओवरसियरों के कारण हमारी भगनियों को जो-जो दुःख वहाँ उठाने पड़ते हैं वे अवर्णनीय हैं। भारतीयों स्त्रियों के कष्टों को देखकर फिजियन लोग अपनी भाषा में हमसे कहा करते थे 'सादा बकलेबू न वाण्डआ इंदिया, सद्नगयी, मई, न या लेवा वू लंगी माई बीती साती को दाई के सा वुतुका वेसिंग्डा ने ओवासिआ सा दा न काई इण्डिया न मरा मा साला को माई बीती बनुआ वुलांगी कैबक दुआ न आटा माता सा न किता का वाता नई लेवा नकीतौ बक मतीया सारा को या।"

    अर्थात इंडिया बहुत बुरा देश है, जहाँ की स्त्रियाँ मजदूरी करने के लिए परदेश में फिजी को आती हैं और यहाँ आ कर अनेक अत्याचार सहती हैं। जैसे अत्याचार तुम्हारी इंडियन स्त्रियों पर किए जाते हैं वैसे यदि हमारी स्त्रियों पर किए जायँ तो करनेवालों को हम जड़ से मिटा दें।"

    क्या फिजियनों की बात अक्षरशः सत्य नहीं है। क्या हमारे लिए लज्जा की बात नहीं है कि हमारी भगिनियों, माताओं, कन्याओं पर सात समुद्र पार ये अत्याचार किए जायँ? क्या हम में अब आत्माभिमान और आत्म-रक्षा का लेश भी नहीं रहा? जब हम लोग फिजियनों के सामने अपने देश की बड़ाई करते थे तो वे फौरन यही कहते थे। "तुम्हारा देश कुछ काम का नहीं, खबरदार अपने बुरे मजूरा देश की बड़ाई कभी न करना।" फिजियनों की बात सुन के हमे निरुत्तर होना पड़ता था।

    देश लौटने में जाति का भय- कितने ही स्त्री और पुरुष अपने गिरमिट को पूरा करके और पाँच वर्ष और रह कर अपनी मातृभूमि को लौटना चाहते हैं तो वे इस विचार से नहीं लौटते कि वहाँ पहुँचकर कोई हमें जाति में तो मिलाएगा नहीं, जाति-अपमान वहाँ और सहना पड़ेगा, इसलिए मृत्युपर्यंत उन्हें वहीं कष्ट उठाने पड़ते है। हमारे देश के भाई समुद्र-यात्रा कि दफा लगा कर टापुओं से लौटे हुए अपने भाइयों को जाति से च्युत करके उन्हें इतना कष्ट देते हैं कि जिससे दुखित हो कर वे फिर टापुओं को लौट कर चले जाते हैं और उनके धन को, जो कि उन्होंने प्रदेश में जा कर मारपीट सह कर, आधे पेट खा-खा कर कौड़ी-कौड़ी मुश्किल से जमा किया है, कुछ तो भाई-बंधु ले लेते है और कुछ स्वार्थी पुरोहित प्रायश्चित्त करने में बेदर्द होकर खर्च करवा डालते हैं। अपने देश-बंधुओं को मै एक उदाहरण देता हूँ। मेरे घर के पास फिजी टापू में एक गुलजारी नाम का कान्यकुब्ज ब्राह्मण रहता था। उसने बड़े परिश्रम से आठ वर्ष में लगभग तीन सौ रुपये इक्कठे किए। इसको ब्राह्मण जान कर सब लोग प्रायः महीने कि पूर्णमासी को सीधा दे दिया करते थे। भारतवर्ष में कन्नौज के रहनेवाले थे, इनके घर से इनके भाई ने पत्र भेजा, उसमें लिखा था कि तुम चले आओं। इस साल तुम देश को नही आओगे तो तुमको एक सौ एक गौ मारने की हत्या होगी। गुलजारीलाल ने भाई कि लिखित जब ऐसी शपथ देखी तब ब्राह्मण-धर्म सोच कर वे देश को चले आये। चलते समय इनको लोगों ने कुछ और दक्षिणा दी। जब ये अपने घर आये तो दूसरे घर में ठहराए गए रुपया-पैसा सब भाई को सौप दिया। तीन-चार दिन बाद पुरोहित जी बुलाये गए। ये महाशय कानून की पुस्तक साथ लेकर आये। गाँव के सब बड़े-बूढ़े सब मिलकर बैठे। समुद्र-यात्रा पर विचार हुआ। गुलजारी ने घर से निकलने से ले कर फिजी में पहुँचे तक जहाज का खाना-पीना बयान किया। फैसले में सब तीर्थ बताए गए! भागवत सुनने को बताई गयी। लगभग पाँच या छह गाँव का भोज बताया। कोई सात सौ या आठ सौ रुपये खर्च करने का फैसला दिया गया। गुलजारी ने खर्च करने के लिए अपने भाई को दिए हुए रुपये माँगे। भाई ने कोरा जबाब दिया। जातिवालों ने अलग कर दिया। गुलजारी के साथ गाँववाले बड़ी घृणा करने लगे। भाई लोग कट्टर शत्रु हो गए। बोले कि तुमने हम लोगों से रुपया छिपा लिया है, वहीं खर्च करो। यह रुपया हम न देगें। लाचार गुलजारी ने फिजी में अपने इष्ट मित्रों को कष्ट-कहानी की चिठ्ठी भेजी और लिखा की कसाई के हाथ से गाय छुड़ाने के समान मुझे बचा कर पुन्य के भागी हो। वहाँ से चंदा कर के छह सौ रुपया लोगों ने भेंजा, तब अप्रैल 1914 में फिर फिजी पहुँचे। इसी तरह कितने ही लोग लौट कर फिजी गए हैं, और जा कर इसाई और मुसलमान भी हो गयें हैं। समुद्र-यात्रा की दफा में मुजरिम होकर हमारे बहुतेरे भाई मातृभूमि को अंतिम नमस्कार करके चले गए हैं और वहाँ पहुँचकर सनातन धर्म की जय बोल कर मसीह के रूल को पकड़ लिया है। पाठक! जरा आप विचारिए, क्या आप रामायण पढ़ते हैं? क्या आप ने भरत के प्रेम की शिक्षा को ग्रहण किया है? क्या आप भाई से प्रेम करना जानते हैं? हम भारत के धर्म-महामंडल के संचालकों से सविनय निवेदन करते हैं कि आपने इन प्रवासी भाइयों के लिए आपने क्या उपाय सोचा है, आप इन को क्या आज्ञा देते हैं? ये गौ की क़ुरबानी में भाग लें या ईसाईयों में? या आप पुचकारकर इन्हें छाती से लगाएँगे? क्या हम अपने देश के व्याख्यानदाताओं और धार्मिक पुरुषों से पूछ सकते हैं कि इन लोगों को पुनः जाति में मिला लेने में क्या हानि हैं? जो मनुष्य घर के अत्याचारों से पीड़ित हो कर और दुष्ट आरकटियों द्वारा बहकाए जाकर विदेश में भेज दिए गए, उसमे उन विचारों का क्या दोष है?

    शिक्षा की दशा- फिजी में मिशनरियों के स्कूल हैं, पर ऐसे स्कूलों में लड़कों को पढ़ाना मानो ईसाई बनाना है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि कुछ हिंदी पढ़े-लिखे और अंग्रेजी जाननेवाले आदमी भारतवर्ष से जायँ और स्कूल खोल कर अपने भाइयों को शिक्षित बनाएँ। हमारे थोड़े बहुत भाई वहाँ समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ पढ़ सकते हैं, यह अच्छी बात है। भारतवर्ष से कितने ही समाचार-पत्र, और पत्रिकाएँ वहाँ जाया करती हैं, यथा-सरस्वती, चित्रमयजगत, मर्यादा, भास्कर, भारतमित्र, अभुदय, आर्यमित्र, भारत-सुदशाप्रवर्तक, वीरभारत, वेंकटेश्वर इत्यादि। जो आदमी पढ़ सकते हैं, वे अपने निरक्षर भाइयों को मातृभूमि भारत के समाचार सुनाया करते हैं। भारतमित्र को वहाँ के भारतवासी बड़े चाव के साथ पढ़ते हैं, और वास्तव में फिजीवासियों के लिए भारतमित्र ने बहुत काम किया हैं। आशा है कि हमारे अन्य समाचार-पत्र भी भारतमित्र का अनुकरण करेंगें और अपने प्रवासी भाइयो के सहातार्थ थोड़ा-बहुत लिखा करेंगें।

    धार्मिक स्थिति- जो पंडित या मौलवी फिजी में जाते है, वे पहले तो स्वंय कुछ पढ़े-लिखे ही नहीं होते और फिर उनका उद्देश्य यही होता है की अपने भोले भाइयों से रुपया ठगकर अपने घर लौट आँए! ऐसे स्वार्थी मनुष्य फिजी प्रवासी भाइयों का कुछ उपकार नही कर सकते।

    एक बार हम लोगों ने एक प्रार्थना-पत्र फिजी के गवर्नर के पास इस आशय का भेजा था की भारत से कोई अच्छा उपनिवेशक फिजी में बुला लिया जाय तो बहुत लाभ हो। उसके आने जाने का व्यय Immigration विभाग दे और उसके भोजन इत्यादि का प्रबंध हम लोग करेंगे। गवर्नर के यहाँ से प्रस्ताव स्वीकृत हो कर भारतवर्ष को आया; परंतु खेद की बात है कि यहाँ से कोई जाने को राजी न हुआ। भारत धर्म मंडल का यह कर्तव्य है की अपना एक अच्छा उपदेशक फिजी को भेजे; परंतु जो लोग समुद्र-यात्रा को पाप समझते हैं वे प्रवासी भारतवासियों के दुख मोचनार्थ वहाँ कैसे जा सकते हैं? श्री राममनोहरानंद सरस्वती नामक एक आर्यसमाजी सज्जन वहाँ गए हुए हैं और वहाँ प्रचार का काम भी किया है, अतएव वे धन्यवाद के पात्र हैं वहाँ एक ऐसे उपदेशक की अत्यंत आवश्यकता है, जो कि वैदिक सिद्धांतों का ज्ञाता हो और अच्छी तरह अंग्रेजी भी जानता हो। धर्म का प्रचार करना बड़ी टेढ़ी खीर है, इसके लिए सैकड़ों कष्ट सहने पड़ते हैं ओर इस कार्य में बड़े साहस, आत्मिक बल, शारीरिक शक्ति, धैर्य और सहिष्णुता की आवश्यकता है। हम यह जानते है कि आर्यसमाज के ऊपर काफी बोझ रखा हुआ है और आर्यसमाज बहुत कार्य कर रहा है परंतु संसार के उपकार का दम भरने वाला आर्यसमाज अपने प्रवासी भाइयों के लाभार्थ क्या एक उपदेशक भी फिजी को नही भेंज सकता? हमें पूर्ण आशा है की फिजी के हिंदू लोग यहाँ से भेजे हुए उपदेशकों की यथाशक्ति सहायता करेंगें। हम लोगों ने वहाँ दो-चार जगहों में प्रतिवर्ष रामलीला करने का भी प्रबंध किया था। अब भी लंबासा, नाबुआ लतौका इत्यादि कई स्थानों में हर साल रामलीला हुआ करती है। इससे लाभ यह होता है कि हमारे भाइयों के हृदय में अपने जातीय उत्सवों की ओर प्रेम बना रहता है।

    फिजी में इसाई लोग कितने ही वर्षों से बराबर अपना कार्य कर रहे हैं; परंतु बहुत प्रयत्न करने पर भी उन्होंने बहुत कम हिंदू इसाई बनाये हैं। इसका कारण यह है कि हम लोग बराबर यही प्रयत्न करते रहे हैं कि हमारे भाई ईसाई न होने पायें और यदि इतने पर भी वे ईसाई हो जाते थे तो हम लोग उन्हें शुद्ध कर लेते थे। फिजी में बहुत से कबीरपंथी, रामानंदी, सतनामी, गुसाई इत्यादि कितने ही प्रकार के साधू हैं: परंतु ये लोग अपने-अपने चेले बनाते फिरते हैं। कितने ही साधू बहका कर फिजी में भेज दिए गए हैं। 5 वर्ष गिरमिट में काम करके जब यह लोग स्वतंत्र हो जाते हैं तो भीख माँगना प्रारंभ कर देते हैं। साल भर में अपने चेलों के पास चक्कर लगाना बस यही उनका काम हैं। इसीलिए हम यह कहते हैं कि एक अच्छा उपदेशक फिजी में पहुँच जाय तो बहुत लाभ हो।

    कुछ वर्षों से फिजी में स्त्रियों के पुनर्विवाह भी होने लगे हैं। बात असली यह है कि पहले तो फिजी में मर्दों की संख्या स्त्रियों की संख्या से लगभग दूनी है। और फिर इन स्त्रियों में कितनी ही बाल विधवाएँ हैं, जो बहकाई जाकर भेज दी गयी हैं। ऐसी दशा में व्यभिचार होना स्वभाविक ही है। फिजी में ऐसे कितने ही अभियोग हुआ करते हैं, जिनमें कि पुरुष ने अपनी स्त्री को दुराचार के कारण मार डाला है और वह स्वंय फाँसी पर चढ़ गया है। इसमें दोष किसी का नहीं है। असली दोष है इस 'Indenture system' यानी कुली प्रथा का। ऐसी बुरी और पतित दशा में रहते हुए भी फिजी का भारतीय समाज बहुत नहीं बिगड़ा, यह बात वास्तव में आश्चर्यजनक हैं। जब फिजी निवासियों ने देखा की दब-छिप कर बहुत-व्यभिचार होता है तो उन्होंने उत्तमतर समझा कि पुनर्विवाह की प्रथा जारी कर दी जाय।

    पुनर्विवाह शास्त्र सम्मत है या नहीं, इस विषय में कहना मेरे लिए अनाधिकार चेष्टा होगी; पर इतना कहे बिना मैं नहीं रह सकता कि फिजी में व्यभिचार को रोकने में पुर्विवाह ने थोड़ी बहुत सहायता अवश्य दी है।

    आर्थिक स्थिति- फिजी-प्रवासी भारतीय लोगो की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। पाँच वर्ष के बाद स्वतंत्र हो कर थोड़े बहुत आदमी खेती कर लेते है; परंतु धन की खेती अतिरिक्त और किसी में लाभ होने की संभावना नहीं है। खाद्द्य-पदार्थों की तेजी के कारण कुछ लोग भूखों भी मरते हैं। अगर वहाँ धान पैदा न होता तो और कितने आदमी भूखों मरने लगते। सैकड़ा पीछे एक-दो आदमी ऐसे हैं जो अपना व्यापार करते हैं। हम पहले कह चुके हैं कि पूरा काम करने पर एक शिलिंग मजदूरी मिलती है। परंतु पूरा काम करनेवाले 100 में पाँच निकलेगें, क्योंकि पूरे काम की कोई हद्द मुकर्रर नहीं है, वैसे तो 20 जरीब लंबे और 6 फुट चौड़े खेत काम पूरा काम कहलाता है, परंतु इस कठिन कार्य को एक दिन में कर लिया है तो दूसरे दिन का फुल टास्क 25 जरीब लंबी 6 फुट चौड़ाई का हो जाता है! साधारण मनुष्य 12 शिलिंग यानी 9 रुपये से अधिक एक महीने में नहीं कमा सकते। फिजी में गेहूँ का आटा एक शिलिंग का 6 पौंड, चावल 4 पौंड, दाल अरहर की 4 पौंड के हिसाब से मिलते हैं। सारांश यह है कि भारत वर्ष की अपेक्षा वहाँ दूना खर्च पड़ता है। कुछ लोगों का ख्याल है कि इन द्वीपों में जा कर आदमी बहुत कुछ रुपया कमा कर ला सकता है, परंतु उनका यह ख्याल भ्रममूलक है। हम यह मानते हैं कि इन द्वीपों से जो सैकड़ों आदमी भारतवर्ष लौटते हैं, उनके से दो-चार आदमी रुपया अवश्य कमा लाते हैं। पर हम लोगों के कहने को यह हो जाता है कि देखो अमुक मनुष्य कुली बह कर गया था और वहाँ से इतना धन बटोर लाया! हम लोग यह नहीं विचारते कि सौ में पाँच आदमी कमा लाये तो कौन सी बड़ी बात हुई। बाकी 95 तो बेचारे भूखों मरते लौटे हैं। और जो आदमी कमा लाते हैं, उनसे पूछा जाए तो वे प्राय: यही कहेंगे कि भारतवर्ष में रह कर यदि उतना परिश्रम करते तो उससे अधिक नहीं तो कम भी नहीं कमा सकते थे। अस्तु, तात्पर्य यह है कि लोगों के दिल में से और और विशेषतया गाँव के लोगों के हृदय में से यह भ्रम दूर कर देना चाहिए कि इन द्वीपों में जा कर आदमी मालामाल हो आता है।

    शारीरिक अवस्था- जो लोग गिरमिट में काम करते हैं, उनमें से 90 फीसदी की शारीरिक अवस्था शोचनीय है। यदि गिरमिटवाले बीमार पड़ते हैं तो प्लैंटर लोगों के अस्पताल में भेज दिए जाते हैं, पर जो लोग गिरमिट के काम से छूट कर स्वतंत्र हो जाते हैं, उन्हें इस विषय में बहुत कष्ट सहना पड़ता है। स्वतंत्र आदमी को वहाँ के सरकारी अस्पताल में जाना चाहें तो उन्हें इमीग्रेशन आफिस में जाना पड़ता है। इस आफिस के कार्यकर्ता जब पहले दस रुपये जमा करा लेते हैं तब अस्पताल जाने के लिय पत्र देते हैं। यदि रुपया न हुआ तो गहना ही रखवा लेते हैं। पहले तो जिनके पास दाम नहीं होते उनको अस्पताल में भेजते ही नहीं और यदि कृपा करके भेज दिया तो उनके नाम आठ आना प्रतिदिन के हिसाब से दाम जुड़ते हैं और पीछे से उन्हें सब देना पड़ता है। क्या ही अच्छा हो यदि भारतवर्ष से कुछ डाक्टर और वैद्य जाकर वहाँ अपने औषधालय खोल दें! स्वतंत्र आदमियों की शारीरिक अवस्था साधारण है।

    संगठन शक्ति- यहाँ पर हमें हर्षपूर्वक लिखना पड़ता है कि फिजी निवासी भारतीय भाइयों में अब तीन-चार वर्ष से संगठन-शक्ति का भी अंकुर उत्पन्न हो गया है। यदि कोई कठिन परिश्रम करके चंदा इकट्ठा करना चाहे तो वह भी हो सकता है। दक्षिण अफ्रीका के प्रवासी भाइयों के लिए लोगों ने अकेले सुवा नगर से 18 पौंड चंदा करके भेजा था। फिजी का सब चंदा 40 पौंड (600 रुपये) गया था। हम लोगों ने ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन नामक सभा भी कायम की थी, जो अब तक बराबर अपना काम कर रही है। उसके सभापति श्रीयुत मणिलालजी बैरिस्टर हैं, और मंत्री बाबू रामसिंह, श्रीयुत राममनोहरनंद सरस्वती ने बहुत परिश्रम करके 140 पौंड चंदा करके सरस्वती स्कूल नामक पाठशाला ताईबाऊ नामक ग्राम में स्थापित कर दी है। ये महाशय जब ब्रह्मदेश में थे तब फिजी से एक व्यक्ति ने इनके पास पत्र भेजा था। इसी तरह एक वर्ष तक पत्र-व्यवहार होता रहा। तत्पश्चात 6 जनवरी 1913 ई० को फिजी में पहुँचने के एक महीने बाद इन्होने भ्रमण करना आरंभ किया। हर्ष की बात है कि स्वामीजी ने फिजी-प्रवासी भारतवासियों की अशिक्षित संतान को शिक्षित बनाने का संकल्प किया है। स्वामी जी ने सामाकला स्थान में व्याख्यान देते हुए कहा था कि 'मेरी आयु का शेष भाग फिजी-प्रवासी भारतीय भाइयों की संतान के उद्धार के लिए है।' परमेश्वर उनकी इस प्रतिज्ञा को पूर्ण करे।

    प्रसन्नता की बात है कि फिजी के मुसलमान लोग हिंदुओं से मिले रहते हैं। वे लोग बकरीद पर गाय की कुर्बानी कभी नहीं करते। चंदे आदि के कामों में भी वे आगे बढ़ कर भाग लेते हैं। हम अशिक्षित व्यक्तियों में इतना मेल होना कोई साधारण बात नहीं है।

    फिजी-प्रवासी भारतवासियों के विषय में कुछ निष्पक्ष लोगों की सम्मति

    फिजी की राजधानी सुबा में कुमारी एच० डडले (Miss H. Dudley) नामक एक मिशनरी हैं। आप आस्ट्रेलियन मेथोडिस्ट हैं और आपकी फिजी के भारतवासियों से बहुत कुछ सहानुभूति है। उन्होंने भारतवासियों की दशा पर खेद प्रकट करके एक पत्र 'इंडिया' नामक पत्र में भेजा था। यह पत्र माडर्न रिव्यू में उद्धृत किया गया था। पाठकों के लिए माडर्न रिव्यू से ले कर उसे हम यहाँ लिखे देते हैं।

    लेखिका कुमारी डडले, सुवा, फिजीद्वीप

    Sir,

    Living in a country where the system called, "Indentured labour" is in vogue, one is continually oppressed in spirit by the fraud, injustice, and inhumanity of which fellow creatures are the victims.

    Fifteen years ago I came to Fiji to do mission work among the Indian people here. I had previously lived in India for five years. Knowing the natural timidity of Indian village people and knowing also that they had no knowledge of any country beyond their own immediate district; it was a matter of great wonder to me as to how these people could have been induced to come thousands of miles from their own country to Fiji. The women were pleased to see me as I had lived in India and could talk with them of their own country. They would tell me of their troubles and how they had been entrapped by the recruiter or his agents. I will cite a few cases.

    One woman told me she had quarrelled with her husband and in anger ran away from her mother-in law's house to go to her mother's. A man on the road questioned her, and said he would show her the way. He took her to a depot for Indentured labour. Another woman said her husband went to work at another place. He sent word to his wife to follow him. On her way a man said he knew her husband and that he would take her to him. This woman was taken to a depot. She said that one day she saw her husband passing and cried out to him but was silenced. An Indian girl, was asked by a neighbor to go and see the Muharram festival. Whilst there she was prevailed upon to go to a depot. Another woman told me that she was going to a bathing ghat and was misled by a woman to a depot.

    When in the depot these women are told that they can not go till they pay for food they have had and for the other expenses, they are unable to do so. They arrive in this country timid fearful women not knowing where they are to be sent. They are alloted to plantations like so many dumb animals. If they do not perform satiafactorily the work given to them, they are punished by being struck or fined, or they are even sent to gaol. The life on the plantaions alters their demeanour and even their very faces. Some look crushed and broken-hearted, others sullen, others hard and evil, I shall never forget the first time I saw "indentured" women. They were returning from their day's work. The look on those women's faces haunts me.

    It is probably known to you that only about 33 women are brought out to Fiji to every one hundred men, I can not go into details concerning this system of legalised prostitution. To give you some edea of the result, it will be sufficient to say that every few months some Indian man murders for unfaethfullness of the woman whom he regards as his wife.

    It makes one burn with indignation to think of the helpless little children born under the revolting condition of the "indentured labour'' system. I adopted two little girls- daughters of two unfortunate women who had been murdered. One was a sweet, graceful child so good and true. It is always a marvel to me how such a fair jewel could have come out of such loathsome environments. I took her with me to India some years ago, and there she died of tuberculosis. Her fair form was laid to test on a hill side facing snow-capped Kinchin-chinga. The other child is still with me- now grown up to be a loyal, true and pure girl. But what of the children- what of the girls- who are left to be brought up in such pollution?

    After five years of slavery, after five years of legalised immorality- the people are "Free". And what kind of a community emerges after five years of such a life? Could it be a moral and self-respecting one? Yet some argue in favour of this worse than barbarors system, that the free Indians are better off financially than would be in their own country! I would ask you at what cost to the Indian people? What have their women forfeited? What is the heritage of their children?

    And for what is all this suffering and wrong against humanity? To gain profits- pounds, shillings and pence for sugar companies and planters and others interested.

    I beseech of you not to be satisfied with any reforms to the system of indentured labour. I beg of you not to cease to use your influence against this iniquitious system till it be utterly abolished- H. Dudley, Suva, Fiji, November 4.

    अर्थात, "श्रीमान-एक ऐसे देश में रहते हुए जहाँ कि 'कुली प्रथा' प्रचलित है, मनुष्य की आत्मा को अपने सजातीय लोगों के साथ छल, अन्याय और अमानुषिकता का बर्ताव होते देख कर, बार-बार पीड़ा पहुँचती है।

    पंद्रह वर्ष हुए, जब मैं प्रवासी भारतवासियों में ईसाई-धर्म का प्रचार करने के लिए फिजी में आयी थी। इसके पहले मैं पाँच वर्ष हिंदुस्तान में रह चुकी थी। मैं यह जानती थी कि भारतवर्ष में गाँव में रहनेवाले स्वभावतः डरपोक होते हैं और मुझे यह भी ज्ञात था कि उन लोगों को अपने पास के जिले के अतिरिक्त और किसी देश का ज्ञान भी नहीं होता, अतएव यह देख कर मुझे अत्यंत आश्चर्य हुआ कि ये लोग अपने देश से हजारों मील दूर फिजी को आने के लिए किस प्रकार प्रेरित किए गए। फिजी की भारतीय स्त्रियाँ मुझे देख कर प्रसन्न होती थीं, क्योंकि मैं पहले भारतवर्ष में रह चुकी थी और उनके साथ देश के विषय में बातचीत कर सकती थी। वे मुझे अपने दुखों को बताया करती थीं और मुझे सुनाया करती थीं कि किस प्रकार हम आरकाटियों के जाल में फँसी। मैं यहाँ दो-एक उदाहरण देती हूँ :

    एक स्त्री ने मुझे से कहा-'मुझसे और मेरे पति से झगड़ा हुआ, इसीलिए मैं क्रुद्ध हो कर अपने सास के घर से माँ के घर को चल दी। रास्ते में सड़क पर मुझे एक आदमी मिला, उसने कहा 'कहाँ जाती हो? मैं तुम्हें मार्ग बता दूँगा।' इसी बहाने वह आदमी मुझे डिपो ले गया और वहाँ से शर्तबंदी में यहाँ भेज दी गयी।' एक दूसरी स्त्री ने कहा- 'मेरा पति‍ एक जगह काम करने के लिए गया था, उसने मुझे खबर भेजी कि तू यहाँ चली आ। मैं उसके पास जा रही थी कि मार्ग में मुझे एक आदमी मिला। उसने मुझसे कहाँ कि चलो मैं तुम्हें तुम्हारे पति के पास ले चलूँ। मैं उसकी जगह जानता हूँ। वह आदमी मुझे डिपो में ले आया। जब मैं डिपो में थी तो अपने पति को वहाँ से जाते हुए देखा। मैं चिल्लायी 'परंतु मुझे चुप कर दिया गया। डिपो से मैं फिजी को भेज दी गयी।' एक हिंदुस्तानी लड़की से उसकी पड़ोसी ने कहा- 'जा मुहर्रम का मेला देख आ।' मेला में वह लड़की बहका दी गयी और डिपो में भेज दी गयी। एक और स्त्री ने मुझसे कहा- 'मैं घाट पर स्नान करने जा रही थी। रास्ते में एक स्त्री ने मुझे बहका कर डिपो भेज दिया।'

    जब ये स्त्रियाँ डिपो में पहुँच जाती हैं तो उनसे कहा जाता है कि जब तक तुम खाने का खर्च न दे दोगी और जब तक दूसरी चीजों का व्यय न दे दोगी तब तक तुम यहाँ से अपने घर नहीं जा सकती हैं। ये बेचारी कहाँ से दे सकती हैं। ये भीरु-हृदय और डरपोक स्त्रियाँ इस देश में भेज दी जाती हैं और उन्हें यह भी नहीं मालूम होता कि कहाँ भेज दी गयी हैं। वे खेतों पर काम करने के लिए गूँगे जानवरों की तरह लगा दी जाती हैं। जो काम उन्हें दिया जाता है, यदि वे उसे ठीक तरह नहीं करतीं तो पीटी जाती हैं, उन पर जुर्माना होता है! यहाँ तक कि वे जेल भेज दी जाती हैं। खेतों पर काम करते-करते उनकी चेष्टा बदल जाती है और उनके चेहरे भी बदल जाते हैं। कुछ अत्यंत पीड़ित और विदीर्ण-हृदय दिख पड़ती हैं, कुछ उदास और उद्विग्न ज्ञात होती हैं और अन्य व्यथित और दुखित जान पड़ती हैं। बार-बार उनके म्लान मुखों की आकृति मुझे याद आ जाती हैं।

    यह तो शायद आपको ज्ञात ही होगा कि 100 पुरुष पीछे 33 स्त्रियाँ फिजी में लायी जाती हैं। मैं इस व्यभिचारपूर्ण प्रथा के बारे में, जिसका विरोध कानून भी नहीं करता, विस्तारपूर्वक नहीं लिख सकता। इसके नतीजे का कुछ बोध आपको कराने के लिए यह कहना होगा पर्याप्त होगा कि महीने-दो-महीने पीछे एक न एक फिजी-प्रवासी भारतवासी दुश्चरित्रता के कारण अपनी स्त्री को मार डालता है। इस कुली-प्रथा के भयानक और अत्यंत निंदनीय कारणों से जो अनाथ बच्चे पैदा होते हैं, उनका विचार करते हुए क्रोध से हृदय प्रज्वलित हो जाता है। मैंने दो लड़कियों को जिनकी माँ मार डाली गयी थी (और जिनके बापों ने फाँसी की सजा पायी थी) ग्रहण कर लिया था। उनमें सी एक बड़ी ही परंतु और कोमल लड़की थी। यह बात मेरे लिए सर्वदा आश्चर्यजनक रही है कि ऐसी कुत्सित और निंदनीय स्थिति में वह प्यारी, सच्ची रत्नस्वरूपा लड़की कैसे पैदा हुई। कुछ वर्ष हुए, मैं अपने साथ उसे भारतवर्ष को ले गयी थी, वहाँ पर तपेदिक से वह मर गयी। हिम-मंडित किनचिनचिंगा के सामने पहाड़ पर उसका परंतु शरीर गाड़ दिया गया। दूसरी लड़की अब तक मेरे पास है और वह बड़ी, सच्ची, पवित्र और आज्ञाकारिणी कन्या है; परंतु उन बच्चों की बाबत-उन लड़कियों की बाबत-तो विचार करो जो कि इस प्रकार की दूषित और कलंकित अवस्था में पाली जाती हैं।

    पाँच वर्ष की गुलामी के बाद- पाँच वर्ष के कानून-प्रेरित दुराचारों के बाद ये लोग स्वतंत्र हो जाते हैं। जिन लोगों ने पाँच वर्ष तक ऐसी बुरी तरह जीवन व्यतीत किया हो, उन लोगों से किस प्रकार का समाज संगठित होता है। क्या यह समाज सदाचारी और आत्माभिमानी हो सकता है? इस पर भी कुछ महाशय ऐसे हैं जो निष्ठुर और अत्यंत असभ्य कुली-प्रथा के पक्ष में तर्क करते हैं और कहते हैं कि शर्तबंदी के बाद स्वतंत्र हुए प्रवासी भारतवासियों की आर्थिक स्थिति, अपने देश में रहने पर उनकी जो स्थिति होती उससे, उत्तमतर होती है।

    मैं आप से पूछती हूँ कि इसमें भारतवासियों की कितनी अधिक हानि हुई है? उनकी स्त्रियों ने कौन-सा अपराध किया है, जिसके लिए उन्हें यह दंड दिया जाता है और उनके बाल-बच्चे कैसी दशा में पैदा होते हैं?

    और फिर मनुष्य जाति के विरुद्ध यह अन्याय और क्लेशोत्पादक कार्य किस लिए किए जाते हैं? इसलिए कि जिस से चीनी की कंपनियों को, प्लैंटरों को और दूसरे स्वार्थी लोगों को पौंड, शिलिंग और पैंस का लाभ हो।

    मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि आप इस अन्यायपूर्ण कुली-प्रथा में किसी प्रकार के सुधारों पर राजी न हों। मैं आप से याचना करती हूँ कि आप बराबर इस प्रथा का विरोध करें, जब तक कि यह अत्याचारपूर्ण प्रथा जड़-मूल से नष्ट न हो जाय।

    एच० डडले, सुवा, फिजी, 4 नवंबर

    इस पर टिप्पणी करते हुए India के संपादक ने कुमारी डडले के विषय में लिखा था-

    "Miss Dudley, the writer of this pathetic letter, is the pioneer Indian missionary in Fiji, she is an Australian Methodist and has done admirable and devoted service in undertaking the care of Indian orphan-girls whose mothers have been murdered and their father hanged and the result of sexual jealousy produced by the scarcity of women, which is one of the many blots upon the system of indentured labour."

    अर्थात इस करुणापूर्ण चिट्ठी की लेखिका कुमारी डडले हैं, जो कि फिजी में प्रवासी भारतवासियों में ईसाई-धर्म का प्रचार करनेवालों में अग्रणीय हैं। उन्होंने भारतवासियों की अनाथ लड़कियों की रक्षा कर के प्रशंसनीय परोपकार का कार्य किया है। कुली-प्रथा के कितने ही दोषों में से एक दोष यह है कि इसमें स्त्रियों की कमी होती है। इस कारण पुरुषों में स्त्रियों के लिए पारस्परिक ईर्ष्या उत्पन्न होती है। जो स्त्रियाँ दुराचार के कारण मार डाली गयी हैं और जिनके पति फलतः फाँसी पर चढा दिए गए हैं, उन्हीं की लड़कियों की रक्षा कुमारी डडले करती रही हैं।"

    कुमारी डडले के पत्र पर टीका-टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं! हम नहीं समझते कि हमारी सरकार फिजी में मजदूरों का जाना तो भी क्यों बंद नहीं करती।

    फिजी में श्री जे० डब्ल्यू० बर्टन साहब एक प्रसिद्ध ईसाई है। आप बड़े निष्पक्ष लेखक हैं। आप फिजी में कभी-कभी मेरे यहाँ आया करते थे। आपको न जाने कैसे विश्वास पैदा हो गया था की मैं ईसाई हो जाऊँगा! एक बार उन्होंने मुझसे ईसाई होने के लिए कहा भी था, मुझे अच्छी तरह याद है। मैंने यही उत्तर दिया था कि "पादरी साहब आप किस भ्रम में फँसे हुए हैं। मैं ईसाई होने वाला आदमी नहीं। अच्छा और तो और, आप मेरे यहाँ काम करनेवाले इस लड़के को ही तर्क से ईसाई बना लीजिए!" पादरी साहब इस पर उस लड़के से बहस करने लगे। उस लड़के ने ऐसी युक्तिसंगत बातें पूछी कि पादरी साहब दंग रह गए। पादरी साहब ने उस पुस्तक में उस लड़के का जिक्र करते हुए लिखा है कि जिन भारतवासियों के छोटे-छोटे बच्चों में इतनी तर्क-बुद्धि हो, उनमें ईसाई धर्म का प्रचार होना दुस्साध्य है।

    अस्तु, इन्हीं बर्टन साहब ने Fiji of to-day नामक एक पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक में आपने फिजी की वास्तविक स्थिति की आलोचना की है। यद्यपि हम बर्टन साहब के कुल विचारों से सहमत नहीं, पर उनके आत्मिक बल की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकते। सत्य और तिस पर भी अप्रिय सत्य लिखने के लिए बड़े आत्मिक बल की आवश्यकता है, और 'फिजी आफ-टुडे' को पढ़ कर हम यह जान सकते हैं कि बर्टन साहब बड़े साहसी हैं। जिन प्लैंटरों के डर के मारे हमारी सरकार कुली-प्रथा को बंद करने में हिचकती है, उन्हीं प्लैंटरों के विरुद्ध सच्ची बातें बर्टन साहब ने लिखी हैं। उदाहरणार्थ, दो-चार बातें उपरोक्त पुस्तक में से हम उद्धृत करेंगे।

    गोरे लोगों के अमानुषिक अत्याचारों के विषय में बर्टन साहब लिखते हैं-

    "The young and brutal overseers on sugar estates (of Australian and Newzealand origin) take all sorts of liberties with good looking Indian women and torture them and their husbands in case of refusal. Sometimes compounders of medicine wiss call an Indian woman into a closed room pretending to examine her, though she may protest there is nothing the matter with her and then torture her most indecently for the gratification of their lust and even for getting her to swear a charge against some Indian who may have incurred their displeasure. Women are known to have been fastened in a row to trees and then flogged in the presence of their little children."

    अर्थात "असभ्य और जवान ओवरसियर जो कि आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के होते है, खूबसूरत हिंदुस्तानी स्त्रियों पर मनमाने अत्याचार करते हैं और अगर ये स्त्रियाँ मना करती है तो उनको और उनके पति को अत्यंत दुःख देते हैं। कभी-कभी दवाखाने के कंपाउंडर किसी भारतीय स्त्री को एक बंद कमरे में बुला लेते हैं और यह बहाना करते हैं कि आओ हम तुम्हारी डाक्टरी परीक्षा करें, चाहे वह बेचारी विरोध करे और कहे कि मुझे कोई बीमारी नहीं, मैं नहीं जाना चाहती, पर तब भी बलात उसे कोठरी में ले जाते हैं फिर अपनी कामेच्छा पूर्ण करने के लिए अत्यंत असभ्यता के साथ उस पर पाशविक अत्याचार करते हैं अथवा उसे इसलिए तंग करते हैं कि वह एक ऐसे भारतवासी के विरुद्ध गवाही दे दे जिससे कि उनकी कुछ अनबन हो गयी है। सुना गया है कि स्त्रियाँ वृक्षों में एक कतार से बाँध दी गयी हैं और उनके छोटे-छोटे बच्चों के सामने उन पर कोड़े फटकारे गए हैं।"

    भारतीय निस्सहाय अबलाओं पर ये अत्याचार होते हैं और हमारे यहाँ के धनी और सुशिक्षित आदमी भी यही कहते हुए पाए जाते हैं-"अजी! हिंदुस्तान की आबादी बहुत बढ़ गयी है, इसलिए यह जरूरी है कि बहुत-से मर्द और औरतें दूसरे मुल्कों और जजीरों में जा कर आबाद हों, वहाँ मजदूरों की मांग है और वे मौज से रहेंगें।" ऐसे सुशिक्षित मनुष्यों से (यदि हम उन्हें सुशिक्षित कह सकते हैं) हमारी विनीत प्रार्थना है कि जरा आँखें खोल कर उपरोक्त अत्याचारों पर विचार करें।

    स्त्रियों की कमी के विषय में बर्टन साहब ने भी कुमारी डडले की भाँति ही लिखा है। बर्टन साहब का कथन है- 'भारतवासियों की स्थिति में सबसे बड़ा दोष यह है कि यहाँ पर स्त्रियों की कमी है। इसका कारण वही कुली-प्रथा है। प्रति 100 पुरुष पीछे 33 स्त्रियाँ यहाँ लायी जाती हैं। इसका फल यह होता है कि बलात्कार, अपहरण और व्यभिचार इत्यादि के ही अभियोग प्रायः कचहरियों में दीख पड़ते हैं। कचहरी की हरेक बैठक दो-चार अभियोग आया करते हैं कि पुरुष ने अपनी स्त्री को परपुरुष-संगति के कारण मार डाला। समाजशास्त्र के अनुसार यदि विचार किया जाय तो इस दोष की जड़ Indenture system अर्थात कुली-प्रथा ही है। कोई एक दर्जन भारतवासी इस प्रकार हर साल फाँसी पर चढ़ा दिए जाते हैं।"[*]

    मजिस्ट्रेटों के विषय में बर्टन साहब ने बहुत ठीक लिखा है। विस्तार-भय से हम उनका सारांश ही यहाँ दिए देते हैं।

    "फिजी में बहुत कम मजिस्ट्रेट कानून पढ़े हुए हैं, वे गोरे रंग के होते हैं और थोड़ा लिखना-पढ़ना जानते हैं। बस मजिस्ट्रेट होने के लिए यही काफी है और प्राय: बहुत-सी जगहों में मजिस्ट्रेट ही मैडीकल आफिसर यानी डाक्टर का काम करते हैं। ताविन्नी नामक जगह में एक ही आदमी मजिस्ट्रेट District Medical Officer, जिले का डाक्टर, पुलिस का इंस्पैक्टर, जेल खानों का सुपरिटेंडेट, बंदरगाह का स्वामी, सड़कों का दरोगा और अपने छोटे जहाज का कप्तान है।"

    देखा पाठक आपने, फिजी की सरकार ने अपने आफिसरों को कैसा सर्वशक्तिमान बनाया है! ऐसे सर्वशक्तिमान मनुष्यों से यह आशा रखना कि ये लोग अपने कर्तव्य का पालन करेंगे, व्यर्थ है।

    बर्टन साहब का कथन है कि फिजी में पुलिस का प्रबंध ठीक नहीं और पुलिस संख्या में आवश्यकता से बहुत कम है। एक तो फिजी वैसे ही बहुत कम आबाद है और इस पर भी थाने और कचहरियाँ बीसियों मील की दूरी पर बसी हुई हैं।

    The inspector of Indian coolies only pays two visits a year to their miserable baracks where men and women are penned together like cattle and even these inspectors are for the most part not very keen abort the grievances of Indians, as some of them are ex-employees of the C.S.R.Co. (Colonial Sugar Refining Company) which is the real king of the colony.

    अर्थात भारतवासी कुलियों का इंस्पैक्टर उनके क्षुद्र और अभागे घरों को देखने के लिए साल-भर में दो ही बार आता है। इन कोठरियों में स्त्री और पुरुष जानवरों की तरह भर दिए जाते हैं। और ये इंस्पैक्टर भी ज्यादातर भारतवासियों के दुखों पर खास तौर पर ख्याल नहीं करते, क्योंकि उनमें से कितने ही सी०एस०आर० कंपनी के पुराने नौकर होते हैं। वास्तव में यही कंपनी इस उपनिवेश की असली मालिक हैं।

    स्टेट में भारतवासियों को कैसा जीवन व्यतीत करना पड़ता है, इस विषय में बर्टन साहब लिखते हैं "The difference is small between the state he now finds himself in, and absolute slavery…..The coolies themselves, for the most part frankly call it 'Nark' (hell)! Not only are the wages low, the task hard, and the food scant, but it is an entirely different life, from that to which they have been accustomed, and they chafe, especially first at the bondage………No effort is made either by the Government or by the emploters to provide the coolie with any elevating influence……..A company of course has no soul. So long as its labour is maintained in sufficient health to do its tasks, no more is required. The same may be said of its mules and bullocks. The children are allowed to run wild. No educational privileges are given. As soon as they reach the age of twelve they too must go to the field."

    "जिस स्थिति में कुली को रहना पड़ता है उसमें और पूर्ण दासत्व में बहुत कम फर्क है। ज्यादातर कुली इसे स्पष्टतया नर्क कहते हैं। तनख्वाह कम होती है, काम बहुत कड़ा होता है और खाना कम मिलता है; परंतु इन कष्टों के अतिरिक्त एक कष्ट यह भी होता है कि उन्हें ऐसा जीवन व्यतीत करना पड़ता है जोकि उनके पहले जीवन से बिलकुल भिन्न होता है। ये लोग जब पहले-पहल इस बंधन में डाले जाते हैं तो बड़े संतप्त और क्षुब्ध होते हैं। न तो गवर्नमेंट और न ही कंपनी ही उनकी उन्नति का कुछ प्रयत्न करती है। कंपनीवालों के तो वास्तव में आत्मा होती ही नहीं। जब तक कंपनी का काम मजदूर लोग भले प्रकार करते रहते हैं तब तक कंपनीवालों को किसी बात की फिक्र नहीं। और यही बात कंपनी के खच्चरों और बैलों के विषय में कही जा सकती है। लड़के-लडकियाँ उद्दंड बना दिए जाते हैं। शिक्षा-सबंधी कोई अधिकार उन्हें नहीं दया जाता। ज्योहीं वे 12 वर्ष के हुए कि उन्हें भी खेत में काम पर जाना पड़ता है।"

    बर्टन साहब का कथन यह अक्षरशः सत्य है। फिजी की सरकार हमारी उन्नति के लिए कुछ नहीं करती, पर हम फिजी की सरकार को उलाहना क्यों दें, जब हमारी सरकार ही हमें आरकाटियों के फंदे में फँसने देती है और थोड़े-से प्लैंटर लोगों की प्रसन्नता के लिए हम 30 करोड़ भारतवासियों के भावों और विचारों का कुछ भी ख्याल नहीं करती!!

    खेत के कार्य के विषय में बर्टन साहब एक जगह लिखते हैं-

    "The system of tasks prevails on the estates. So many chains of sugar-cane weeding or planting counted, for example, as task. For the satisfactory performance of this amount of work the coolie recieves one shilling. He is expected to accomplish it in one day and the basis is that of an average man's ability. The women are placed on the same footing, but their tasks are lighter and the payment proportionateeely lessless. If a man fails to perform the task set him within the day, he is to be summoned to the court and may be fined or imprisoned for his slothfulness…….When the coolie judges that the task is too hard, he has the right of appeal to the coolie inspector (a Government official) but as that gentleman is not seen oftener than once or twice a year, it is a somewhat limited privilege. Of course there is the magistrate to whom complaint can be made, but the court-house may be twenty or thirty miles away, and that is practically an impossible distance. It is not surprising, therefore that under such conditions it frequently happens, that the coolie takes the law into his own hands, tries the edge of his cane-knife upon the skull of the English overseer."

    अर्थात स्टेटों में 'टास्क' की प्रथा जारी है। गन्ने के खेत में इतने चेन लंबी और इतनी चौड़ी जगह को नराने या बोने को एक 'टास्क' कहते हैं। यदि इस कार्य को अच्छी तरह कर लें तो कुली को एक शिलिंग मिलता हैं। कुली से आशा की जाती है कि वह इस कार्य को एक दिन में कर ले। यह आशा इसी आधार पर की जाती है कि एक साधारण मनुष्य इतना काम एक दिन में कर सकता। स्त्रियों के साथ भी ऐसा ही बर्ताव किया जाता है। लेकिन उनका काम कुछ हल्का होता है और इसीलिए मजदूरी भी उसी हिसाब से उन्हें काम मिलती है। अगर कोई आदमी अपने काम को एक दिन में नहीं कर सकता है तो उसके नाम सम्मन आता है और अपनी सुस्ती के लिए उस पर जुर्माना हो सकता है और उसे कैद भी हो सकती है। जब कुली को अपना कार्य बहुत ही कड़ा ज्ञात हो तो उसको अधिकार है कि वह 'कुली-इंस्पैक्टर' से इसके लिए शिकायत करे, परंतु ये महाशय साल भर में एक या दो बार से ज्यादा नहीं आते हैं, इसलिए यह 'अधिकार' भी एक संकुचित अधिकार ही है। कुली इंस्पेक्टर एक सरकारी नौकर होता है। हाँ, मजिस्ट्रेट के यहाँ भी कुली इसके लिए शिकायत कर सकता है; परंतु कचहरी बीस मील या तीस मील दूर होती है और वस्तुतः इतनी दूर कुली के लिए जाना असंभव है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस स्थिति में प्रायः कुली कानून को अपने हाथ में ले लेते हैं और गन्ने काटने की छुरी को अंग्रेज ओवरसियर के सिर पर जमा देते हैं।"

    बर्टन साहब बहुत ठीक लिखते हैं, क्योंकि जब आप किसी जानवर को भी हर तरफ से घेर लेंगे और उसके बचने का कोई मार्ग न रहेगा तो फिर वह भी यही सोच लेगा कि 'मारो और मरो' आखिर आदमी तो आदमी है। कुली इंस्पेक्टर साल में एक-आध दफे आता है; परंतु तब भी वह हम लोगों की शिकायत कभी सुनता नहीं। मजिस्ट्रेट की कचहरी में जा किस तरह सकते हैं क्योकि छुट्टी कंपनी देती ही नहीं और बिना छुट्टी लिए भाग कर शिकायत करना मानो अपने आपको जेल भेजना है। और फिर शिकायत भी कैसे करें? जिनके यहाँ पाँच वर्ष तक अवश्यमेव काम करना है, उनकी शिकायत कैसी? आज हमने शिकायत की, कल ही वह हमारे जूतों की ठोकरें लगाता है, काम और भी कठिन देता है, लिखता एक शिलिंग है रजिस्टर में, और देता छह पैंस ही है। यह नतीजा हमारी शिकायत का होता है।

    बर्टन साहब का कथन है, सन 1907 में 11,689 कुलियों में से 1461 पर अभियोग लगाया गया कि उन्होंने सुस्ती से काम किया और उन पर जुर्माने हुए या उन्हें जेल हुई। बर्टन साहब आगे चल कर लिखते हैं-

    Probably an even grater proportion of dissatisfaction did not make its appearance before the bench."

    अर्थात "इससे भी ज्यादा आदमी अपने कार्य से असंतुष्ट थे, परंतु वे कचहरी में नहीं लाए गए'। मतलब यही कि मारपीट कर बलात उनसे काम लिया गया। बर्टन साहब लिखते हैं-

    "One of the saddest and most depressing sights, a man can behold if he have any soul at all is a 'coolie line' in Fiji."

    अर्थात "यदि किसी मनुष्य में थोड़ा भी हृदय हो तो संसार में सबसे अधिक कष्टदायक और विषादोत्पादक दृश्य इसके लिए यह होगा कि वह फिजी में 'कुली लेन को देखे।" बर्टन साहब ने हम भारतवासी कुलियों को 'Human agricultural instruments' यानी 'मनुष्य के रूप में खेती के यंत्र' कहा है, और बात भी ठीक, प्लैंटर लोग हम कुलियों के साथ यही समझ कर बर्ताव करते हैं।

    बर्टन साहब लिखते हैं कि जो लोग खेत पर काम करते हैं उनमें कितने ही थोड़ा-बहुत पढ़े-लिखे होते हैं, उच्च जाति के और सभ्य भी होते हैं। ये लोग भारतवर्ष से आरकाटियों द्वारा बहकाए जाते हैं कि थोड़े ही दिनों में वहाँ पहुँच कर तुम मालामाल हो जाओगे। वे इन चिकनी-चुपड़ी बातों पर विश्वास कर लेते हैं और जब फिजी में पहुँचते हैं तो उन्हें कठिन से कठिन परिश्रम करना पड़ता है और ओवरसियरों की ठोकरें खानी पड़ती है, इत्यादि।

    हाँ, कभी-कभी तो दुष्ट आरकाटी पढ़े-लिखों को भी बहका देते हैं। आरा जिले में एक एंट्रेंस तक पढ़ा हुआ लड़का आरकाटी ने बहका दिया। जब वह फिजी पहुँचा तो उसे भी खेत पर काम करने को दिया गया। जैसे-तैसे मरते-गिरते उसने कुछ दिन काम किया। तदनंतर उसने एक पत्र मेरे नाम भेजा और उसमें लिखा 'मै फाँसी लगा कर मर जाऊँगा नहीं तो मेरे बचाने का कोई उपाय करो। मुझसे इतना कठिन परिश्रम नहीं होता।' मैंने अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार लिख भेजा कि एक दावा इमिग्रेशन आफिस पर अपने बाप को चिट्ठी लिखकर करवा दो। यदि आपके पिता आपका व्यय इमिग्रेशन आफिस को दे देंगे तो शायद ईश्वर की कृपा से आप छुटकारा पा जायें। आखिर उसने ऐसा ही किया। बड़े ही प्रयत्न के बाद दासत्व से उसका पीछा छूटा। भारतवर्ष को आते समय मैं उसे अपने साथ लेता आया।

    बर्टन साहब ने भारतवासियों के और भी कितने ही कष्ट लिखे हैं। उन सब का वर्णन तो हम फिर कभी करेंगे, क्योंकि हमारा विचार 'Fiji of To-day' का भावानुवाद प्रकाशित करने का है, परंतु दो-चार बातें उनमें से यहाँ देना ठीक होगा।

    (1) फिजी में सब जानवरों पर पहचान के लिए गरम लोहे से अंक डाले जाते हैं। यह कहना अनावश्यक है कि गौ पर भी यही अत्याचार किया जाता है। यह बात वास्तव में हम हिंदुओं को दुख देने वाली है।

    (2) नबुआ जिले में कुछ स्वतंत्र भारतवसी बड़ी-बड़ी नावों पर माल लाद कर नदी द्वारा किनारे की कोठियों में बेचा करते थे। इस प्रकार रोजगार करते उनको पंद्रह-बीस वर्ष हो गए थे। सन 1913 में एक गोरे ने नबुआ कोठी में दुकान खोली; परंतु उसका माल इन नाववालों के मुकाबले में कम बिकता था। उसने मैनेजर से कहकर नदी से सब नावें हटवा दीं। ये बेचारे लाचार हो कर सब नाव हटा लाए और रोजगार से हाथ धो बैठे!

    (3) मारीशस में जहाँ कि कुली जाना अब बंद कर दिया गया है, भारतवासियों को व्यवस्थापक सभा के सभासद चुनने के लिए वोट देने का अधिकार है, पर फिजी में यह अधिकार भी नहीं। यह भी गनीमत है कि फिजी में चुंगी के मेंबर चुनने के लिए भारतवासियों को वोट देने का अधिकार है। पर अब फिजी के गोरे लोग यह तुच्छ अधिकार भी छीनने की फिक्र में हैं! वे एक बिल पेश करना चाहते हैं जिसमें कि वोट देनेवालों को एक परीक्षा अंग्रेजी में देनी होगी, तब यह अधिकार मिलेगा।

    यदि फिजी की सरकार इसे स्वीकृत कर ले तो वास्तव में उसका यह बड़ा भारी अन्याय होगा।

    एक भी स्कूल नहीं, जिस पर भी तुर्रा यह कि शिक्षा की परीक्षा अंग्रेजी में ली जायगी! क्या हम भारतवासी पेट में से अंग्रेजी पढ़ कर निकलेंगे?

    (4) जो भारतवासी गन्ना उगाते हैं उन्हें अपने गन्ने जिस कीमत पर कंपनी लेती है, देने पड़ते हैं, क्योंकि दूसरा कोई खरीदने वाला नहीं। जो भारतवासी न्यूजीलैंड या आस्ट्रेलिया को केले भेजना चाहे तो उसे गोरा दलाल अवश्य ही करना पड़ता है। यह दलाल स्वंय लाभ का अधिकांश अपने लिए रख लेता है।

    (5) फिजी में कोई ऐसे अमीर भारतवासी नहीं हैं जो कलकत्ता और बंबई से माल सीधा अपने नाम मँगा ले, इसलिए कुछ यूरोपियन लोगों की कंपनी ही माल मँगाती है। ये कंपनी छोटे-छोटे भारतवासी बजाजों और दुकानदारों से मनमाना नफा लेती हैं।

    इन बातों पर टीका-टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं।

    आगे चल कर बर्टन साहब कुली-प्रथा के विषय में लिखते हैं।

    "The system is a barbarous one, and the best supervision can not eliminate cruelty and injustice. Such a method of engaging labour may be necessary in order to carry out the enterprises of capital, but there is something dehumanizing and degrading about the whole system; it is bad for the coolie; it is not good for the Englishman."

    अर्थात "कुली-प्रथा बड़ी निष्ठुरतापूर्ण है और अच्छी से अच्छी देखभाल भी इसमें से निर्दयता और अन्याय को दूर नहीं कर सकती। पूँजी लगाकर व्यवसाय करने के लिए मजदूर रखने की यह पद्धति भले ही आवश्यक हो, पर यह संपूर्ण प्रथा भ्रष्ट, अपकृष्ट और मनुष्यत्व नष्ट करने वाली है। कुली लोगों के लिए यह बुरी है और अंग्रेजों के लिए भी यह अच्छी नहीं।"

    उपरोक्त कष्टों को सहते हुए भी स्वतंत्र भारतवासी फिजी का कितना उपकार कर रहे हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं। बीस हजार एकड़ भूमि को भारतवासी जोतते-बोते हैं, यानी 5580 एकड़ गन्ना, 2000 एकड़ केला, 1158 एकड़ मक्का, 9347 एकड़ धान इत्यादि।

    राज्य-प्रबंध

    फिजी ब्रिटिश सरकार का एक उपनिवेश है। अंग्रेज सरकार की ओर से वहाँ गवर्नर नियत हो कर जाता है। गवर्नर की सहायता के लिए व्यवस्थापक और कार्यकारिणी सभाएँ हैं। इन सभाओं का सभापति गवर्नर होता है। व्यवस्थापक सभा में गवर्नर के चुने हुए दस सरकारी अफसर सदस्य होते हैं। फिजियन लोगों के सरदारों की सभा अपनी ओर से दो सदस्य भेजती है और छह सदस्य सर्वसाधारण द्वारा चुने जाते हैं। गवर्नर कार्यकारिणी सभा का काम, चीफ जस्टिस, अटार्नी जनरल, नेटिव कमिश्नर, इमिग्रेशन विभाग के एजेंट जनरल और रिसीवर जनरल की सहायता से करता है। बाहर से आये हुए माल पर जो कर लगाया जाता है वही अधिकतर वहाँ आमदनी का जरिया है। सन 1911 में कुल आमदनी 2,40,304 पौंड 14 शिलिंग हुई, इसमें से 1,46,628 पौंड 6 शिलिंग 3 पैंस आमदनी उस महसूल से हुई जो बाहर से आयी हुई वस्तुओं पर लगाया गया था। जो आदमी व्यापार करते हैं उन्हें लाइसेंस लेना पड़ता है। विशेष-विशेष पेशेवालों पर भी कर लगता है। सन 1911 ई० में Building Tax Ordinance घर बनाने का कानून पास हुआ और सब घरों पर कर लगने लगा। फिजी के आदिम निवासियों में प्रत्येक बालिग पुरुष को 10 शिलिंग से ले कर 1 पौंड तक प्रतिवर्ष टैक्स देना पड़ता है। फिजी की जमीन पर वहाँ के आदिम निवासियों का अधिकार है। यह जमीन पट्टे पर उठाई जाती है। सरकार पट्टे के रुपयों को इकट्ठा करके फिजियन जमींदारों में बाँट देती है।

    कृषि और व्यापार

    फिजी में तीन चीजों की खेती ज्यादातर होती हैं- गन्ना, केला, और नारियल। फिजी की भूमि गन्ने के लिए विशेषतया उपयोगी है और नदियों और समुद्र के किनारे की जमीन में तो बड़ी कसरत से गन्ना पैदा होता है। मुख्यतया छह जिले गन्ने की खेती के लिय प्रसिद्ध हैं-

    जिला गन्ने की खेती (एकड़ में)
    रेवा 10000 एकड़ गन्ने की खेती होती है
    वा 14000 ,, ,, ,,
    लतौका 15000 ,, ,, ,,
    नबुआ 6000 ,, ,, ,,
    रकीराकी 1200 ,, ,, ,,
    लवासा 10500 ,, ,, ,,

    अकेली सी० एस० आर० कंपनी ही 60 हजार टन चीनी प्रतिवर्ष तैयार करती है। केला भी फिजी में बहुतायत से होता है। वैसे तो केला फिजी में सैकड़ों वर्षों से होता है; परंतु 1848 ई० में चीन से केले के पौधे लाए गए थे। चीनी पौधे कद में बहुत छोटे होते हैं और तूफान और आँधी उन्हें विशेष हानि नहीं पहुँचा सकती। सन 19०9 से 1911 तक 41,172 डिब्बे केले आस्ट्रेलिया को और 1,17,479 डिब्बे केले न्यूजीलैंड को भेजे गए।

    इनके अतिरिक्त कपास, कॉफी, मक्का, तंबाखू, अंडी, चावल इत्यादि भी फिजी में पैदा होते हैं। रस्सी इत्यादि बनाने के लिए केतकी भी फिजी में पैदा की गयी है।

    इमीग्रेशन विभाग

    प्रायः तीन तरह के आदमी फिजी में शर्तबंदी में काम करते हैं:

    (1) भारतवासी, (2) फिजी के आदिम निवासी, (3) पलिनिशीयन लोग।

    इनमें आदिम निवासियों को रखने में तो ज्यादा खर्च पड़ता है और वे मजदूरी भी नहीं करते, पलीनीशियन लोगों ने अब अत्याचारों से तंग आ कर शर्तबंदी में काम करना बंद कर दिया है। अतएव बेचारे भारतवासियों को ही सैकड़ों मुसीबतों के सहते हुए और मार खाते हुए कुलीगीरी का काम करना पड़ता है। कलकत्ता और मद्रास में सरकारी इमिग्रेशन एजेंट हैं। ये लोग आरकाटियों को नौकर (Recruiters) रखते हैं। ये आरकाटी लोग हमारे भोले-भाले भाइयों को बहकाया करते हैं। कोई चौबों की शक्ल में मथुरा में घूमता है, तो कोई हरिद्वार में पंडा बना बैठा है, कोई रियासत में कहता है कि 'कुलियों को 22 रुपये माहवारी नौकरी हम दिलवाते हैं। हमारा यह काम स्वार्थ का नहीं, यह गवर्नमेंटी काम है', तो कोई कानपुर में सेठ बना हुआ जेब में घड़ी डाले हुए और हाथ में छड़ी लिए हुए कहता है 'हम तुमको नौकरी दिलवाएगा, कलकत्ते में हमारी जमैका नाम की धर्मशाला बन रही है। हम नौ आने रोज देगा।' कोई डाक्टर बन जाता है तो कोई सिपाही के भेष में घूमता हुआ गाँववालों को बहकाता है। तात्पर्य यह कि यह धूर्त आरकाटी पुराने जमाने के राक्षसों की तरह नाना प्रकार के भेष धारण करके हमारे भाइयों को बहकाया करते हैं। एक समाचार-पत्र के संपादक ने अपने एक संपादकीय लेख में लिखा था।

    "In no country in the world would this state of matters be tolerated for a moment and we think the position serious."

    अर्थात "संसार के किसी देश में यह बातें सह्य न होंगी, हम इस स्थिति को गंभीरतापूर्वक ध्यान देने योग्य समझते हैं।"

    आगे चल कर संपादक जी ने लिखा है :

    "There is now a number of recruiting agents…….who have done all that man can do to treat the labourers as a preserve for them to plunder.

    Contractors are everywhere plundering and seizing the labourer and selling him for something like Rs.210 or more per head, of which the poor labourer receives not even a pinch of salt. Thus the very essence of scoundrelism, an absolute traficing in human flesh, of which the responsible Government takes no notice, is tolerated everywhere, while schemes permitting of the labourer, proceeding to the labour districts in a state, where all the comfort which he desires, are sternly suppressed.

    अर्थात "अब बहुत-से आरकाटी पाए जाते हैं, जिन्होंने यह समझ रखा है कि मजदूर हमारे लूटने के लिए ही बनाये गए हैं और जिन्होनें मजदूरों को बहकाने और बेचने में कोई उपाय बाकी नहीं छोड़ा। ये ठेकेदार लोग जगह-जगह मजदूरों को बहका रहे हैं और पकड़ रहे हैं और 210 रुपये प्रति मनुष्य के हिसाब से बेच रहे हैं। इन 210 रुपये में उस बेचारे मजदूर को एक कानी कौड़ी भी नहीं मिलती। यह बदमाशी, मनुष्यों का क्रय-विक्रय, हर जगह पर सह्य समझा जाता है, और गवर्नमेंट जो हमारी रक्षा की उत्तरदाई है इस पर ध्यान भी नहीं देती। परंतु किसी रियासत के जिले में मजदूरों के भेजने के लिए तो स्कीम तैयारी की जाती है-चाहे इन रियासतों में मजदूरों को अभीष्ट आराम और सुख हों-तो वह स्कीम बड़ी सख्ती के साथ रद्द कर दी जाती है।"

    उपरोक्त कथन सर्वथा सत्य है, परंतु इसे सुनता कौन है? रियासतों में मजदूर नहीं भेंजने चाहिए। क्यों? इसलिए कि ऐसा करने से हिंदुस्तानियों को लाभ होने की संभावना है! हमारे आरकाटी सेठों की जो ट्रिनीडाड, जमैका, क्यूबा, नेटाल, होंडुरास, फिजी नामक धर्मशालाएँ हैं (क्योंकि आरकाटी लोग इन टापुओं को अपनी धर्मशाला बताते हैं) उन्हीं को मजदूरों के भेजने की आवश्यकता है!

    इस विषय को हम यहीं छोड़ते हैं, आगे उपसंहार शीर्षक अध्याय में इस पर विस्तृत रूप से लिखेगें।

    कमीशन की नियुक्ति

    सन 1913 ई० में भारतवर्ष से एक कमीशन नियुक्त हुआ, सरकार ने इस कमीशन में दो आदमी मुकर्रर किए थे। एक तो मिस्टर मकनील साहब और दूसरे खुर्जा निवासी सेठ नत्थीमल के भतीजे श्रीयुत चिम्मनलाल जी। जब हम लोगों ने सुना कि कमीशन आ रहा है तो हमें बड़ी प्रसन्नता हुई। ये लोग सितंबर के महीने में फिजी पहुँचे। यद्यपि हम अभी इस कमीशन के कार्यों की आलोचना करना ठीक नहीं समझते, तथापि इस विषय में हमें थोड़ा सा निवेदन हमें करना है। जब कोठियों के गोरे लोगों को यह ज्ञात हुआ कि कमीशन आने वाला है तो कई दिन पहले से उन्होंने हमारे भाइयों को धमकाना आरंभ कर दिया। उन्होंने भारतवासियों से कहा "देखो तुम्हारे लिए कमीशन आ रहा है। अगर तुमने हमारे खिलाफ एक भी बात कही तो फिर समझ लेना कि बस तुम्हारी आफत आ गयी। कमीशनवाले तो दो-चार दिन में यहाँ से चले जाएँगे और तुम्हें हमारे यहाँ पाँच वर्ष तक काम करना है। खबरदार! यदि एक भी बात मुँह से निकाली, नहीं तो हम घूसों से तुम्हारा मुँह तोड़ देंगे। इस प्रकार डराए गए लोगों ने कमीशन के सामने क्या कहा होगा, यह आप स्वयं सोच सकते हैं। जब कमीशन के सदस्य लतौका में पहुँचे तो मिस्टर मैकनील तो दौरे पर गए, लेकिन श्रीयुत चिम्मनलाल जी कुछ अस्वस्थ होने के कारण लतौका होटल में ही रहे। एक दिन क्या हुआ कि एक गोरे ओवरसियर ने एक भारतवासी के इतने घूंसे मारे कि बेचारा अधमरा हो गया, घूंसों के मारे उस के मुँह से खून गिरने लगा और उसके दो दांत भी टूट गए! उसी दशा में वह उन दांतों को हाथ पर रख कर चिम्मनलाल जी के पास लाया और कुल हाल कह सुनाया। श्री चिम्मनलाल जी ने उसे एक चिठ्ठी दे कर थाने में जाने के लिए कहा। वह थाने को जा रहा था कि बीच में ओवरसियर साहब मील गए और उनहोंने उसे खूब धमकाया और कहा 'सब्र करो चार दिन बाद चिम्मनलाल चले जाएँगे, क्या चिम्मनलाल तुम्हारे बाप है? पाँच वर्ष के लिए हम तुम्हारा बाप है। कमीशन के जाने पर हम तुम्हारी गर्मीं सब निकल देंगें, वह बेचारा इस धमकी में आ गया और चुप रह गया।

    जिन-जिन कोठियों में कमीशन गया वहाँ प्लैंटर लोगों के सामने ही हमारे भाइयों से प्रश्न किए गए। अत्याचारी के सामने उसके विरुद्ध गवाही देना बहुत ही कठिन काम है। यह काम और भी कठिन हो जाता है, जब पाँच वर्ष उस अत्याचारी के नीचे और काम करना हो। कमीशन के सदस्य नोकोमोदी भी गए थे, जहाँ से कि वाइनी वकासी नामक कोठी एक मील थी। इसी कोठी में कुंती नामक चमारिन रहती है। खेद है कि कमीशन के सदस्यों ने कुंती से पूछताछ करने का कष्ट ही नहीं उठाया।

    हम लोगों ने श्रीयुत चिम्मनलाल जी की सेवा में एक पत्र द्वारा निवेदन किया था। इस पत्र में अपने कष्टों का हाल लिखा गया था और सुधार के लिए प्रार्थना की गयी थी। पत्र का सारांश यह था:

    "जितने ओवरसियर होने चाहिए, सब विवाहित होने चाहिए। इन लोंगों का भारतीय रीति-रिवाज और हिंदी भाषा से थोड़ा-बहुत परिचित होना आवश्यक है, जिससे कि वे हम लोगों के दुःख-सुख को समझ सकें।

    प्रायः कुली-इंस्पेक्टर ओवरसियर या बड़े साहब के घर जा कर ब्रांडी उड़ाते हैं उसका कर्तव्य है कि खेत में जा कर हम लोगों के कष्टों की जाँच करें और उनके निवारणार्थ प्रयत्न करें। जो आदमी ओवरसियर का काम कर चुका हो, उसे कुली-इंस्पेक्टर नियुक्त नही करना चाहिए, क्योंकि जो आदमी पहले ओवरसियरी का काम कर लेता है उसके दिल में दया और शील का लवलेश भी नही रहता। कुली-इंस्पेक्टर भी विवाहित होनें चाहिए। उनके के लिए यह अत्यंत आवश्यक होना चाहिए कि वे हिंदी भाषा बोल सकें और समझ सकें। प्रति मास उन्हें प्रत्येक कोठी में जा कर रिपोर्ट लिख कर लानी चाहिए।

    जो लोग भारतवर्ष से आ कर यहाँ मर गए हैं, उनका धन सरकारी खजाने में जमा है। हम यह पूछते हैं कि सरकार ने उसे किस काम में व्यय किया? क्या सरकार का यह कर्तब्य नही है कि उस धन से दो-एक स्कूल ही बनवा दे, जिससे कि हम लोगों के अपने बच्चों को पढ़ाने का सुभीता हो!

    बर्टन साहब ने अपनी पुस्तक Fiji of To-day के 243 वें पृष्ठ में लिखा है 'कंपनी नही चाहती कि हिंदुस्तानी लोग पढ़ें।' क्या कंपनी यह चाहती है कि हम भारतवासी सदा अशिक्षित और प्लैंटरों के गुलाम ही बने रहें?

    जो हमारे भाई भारतवासी अपनी युवावस्था में कंपनी का काम करते है, वे जब बूढ़े हो जाते हैं तो उनकी परवरिश करने वाला कोई नही रहता। वे बेचारे फिजी में भूखों मरते है। कुली-एजेंट का यह कर्तव्य है कि अपाहिज आदमियों को भारतवर्ष भेंज दें। इसका व्यय सरकार को उस रुपये में से देना चाहिए जोकि मृत भारतवासियों का सरकारी खजाने में जमा हो।

    हिंदुस्तानियों को जो वेतन वहाँ मिलता है वह बहुत थोड़ा है। इस पर भी सरकार खाद्य-पदार्थों पर बहुत कर लगता है। उदाहरणार्थ, दाल पर फि टन 3 पौंड ड्यूटी है, इसलिए इतने कम वेतन में काम नही चल सकता। यहाँ की कुछ चीजों का भाव सुन लीजिए। आटा एक शिलिंग का 6 पौंड, चावल एक शिलिंग का 4 पौंड और दाल एक शिलिंग की 4 पौंड।

    जो गोरे लोग बलात् हमारे देश की स्त्रियों पर पाशविक अत्याचार करते हैं, उन्हें खूब कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

    सरदार वह होना चाहिए जिसको कुली-एजेंट खुद मँगवाए और स्वयं उसे कोठी में भेजें। सरदार का संबंध सीधा कुली-एजेंट से होना चाहिए, न कि ओवरसियरों से। ओवरसियर लालच दे कर गिरमिटिया सरदारों से खूबसूरत ओरतों को मँगवाते हैं और जो नही लाते तो सरदारी से उनको छुड़ा देते हैं। सरदारों को उनके सब कर्तव्य समझा देने चाहिए। कुली एजेंटों को चाहिए कि सरदारों के काम पर कड़ी दृष्टि रखें। बर्टन साहब ने 'फिजी आफ टुडे' में 210 पन्ने पर लिखा है कि एक ओवरसियर ने एक सरदार से कहा कि तुम जा कर एक रूपवती स्त्री ले आओ। वह सरदार लिखा-पढ़ा होशियार था, उसने ऐसा करने से इंकार कर दिया। इसी वास्ते ओवरसियर ने सरदार को खूब मारा और उल्टी उसके उपर नालिश कर दी। बेचारे सरदार को छह महीने की जेल हुई। पादरियों ने इस पर लाट साहब के पास अर्जी भेंजी। तब कहीं वह सरदार जेल से छूटा। वह दुष्ट ओवरसियर कोठी से निकाल दिया गया।

    जिन कोठियों में 15 से अधिक छोटे-छोटे बच्चे होतें हैं, उनमें एक नर्स रखी जाती है, जो की स्त्रियों के काम पर जाने पर उनके बच्चों की देखभाल करती है। नर्स के काम के लिए हिंदुस्तानियों से सलाह ले कर विश्वसनीय स्त्रियाँ रखनी चाहिए। कितनी ही धूर्त नर्से कुट्टिनी का काम करतीं हैं।

    भूमि के विषय में भी हम सबको बहुत कष्ट है। हम लोगों को फिजियन लोगों को पैसा देना पड़ता है, तब वे बड़ी मुश्किलों से राजी होते हैं। इस पर भी जो सरकार की मर्जी में आया तो जमीन मिली और नहीं तो सब प्रयत्न और धन व्यर्थ जाता है। दिन पर दिन हम लोगों के लिए कड़े कानून बनाये जाते हैं। गोरा जितनी जमीन लेना चाहे उसको उतनी मिल सकती है। वह सस्ती से सस्ती 2 शिलिंग से 3 शिलिंग बीघे तक खरीद सकता है। कानून बनानेवाले वे ही गोरे हैं जिनकी हजारों बीघे भूमि है और जोकि हम भारतवासियों को भूमि देना पसंद नहीं करते हैं। हमारे भाई जब जंगल काट कर तैयार करते हैं तब उनकी जमीन छीन ली जाती है। जिन के पास चार या पाँच वर्ष से सरकारी जमीन है, उनको सरकार से नोटिस मिला है कि जब सरकार को आवश्यकता होगी तब छह महीने का नोटिस दे कर सरकार निकाल देगी।"

    हमारे दुर्भाग्य से श्रीयुत चिम्मनलाल जी बीमार पड़ गए और कमीशन उन स्टेटों में जा भी नहीं सके जो जंगल में बसी हुई है। और जहाँ की गोरे लोग हमारे भाइयों को और अधिक कष्ट देते हैं।

    श्रीयुत चिम्मनलाल जी दबेऊलेबू जिला रेवा में फिजियनों के एक स्कूल का उत्सव देखने के लिए गवर्नर के साथ गए थे। वहाँ पर एक फिजियन जमींदार ने श्रीयुत चिम्मनलाल जी से हाथ मिलाते वक्त अपनी भाषा में कहा था -"क्या आप नहीं जानते कि आपके देश की स्त्रियाँ गिरमिट में काम करने के लिए इस देश में आती हैं और उन पर यहाँ पर तरह-तरह के जुल्म किए जाते हैं? क्या इन स्त्रियों को देख कर आपकी आँख से लोहू नहीं निकलता? "खेद है कि श्रीयुत् चिम्मनलाल जी फिजी की भाषा नहीं जानते थे। मै वहीं पीछे खड़ा हुआ था और चाहता था कि कोई दुभाषिया इस बात को श्री चिम्मनलाल जी को समझा दे, देखें वे इसका क्या उत्तर देते हैं! पर खेद है, ऐसा नहीं हुआ। यदि ऐसा होता भी तो एक सहृदय भारतवासी के लिए तो इसका केवल एक उत्तर था, वह यह कि लज्जा से मुख नीचा करके दो आँसू बहाता।

    मेरी राम-कहानी

    फिजी में अपने पहुँचने का हाल मैं लिख चुका हूँ। मैं नौसुरी नामक कोठी में भेज दिया गया था। वहाँ पर ओवरसियर ने आठ फुट लंबी आठ फुट चौड़ी कोठरी दी, जिसमें मुझे और एक मुसलमान तथा एक चमार को रहने के लिय आज्ञा दी गयी! मैंने उस ओवरसियर से कहा कि मैं इन लोगों के साथ रहना ठीक नहीं समझता। पर ओवरसियर ने मुझे ललकार कर कहा-"जाओ हम नहीं जानटा, रहना होगा।" तत्पश्चात मैंने अपने साथियों से कहा कि आप ही कृपा करके किसी दूसरी कोठरी में चले जाइए। जैसे-तैसे वे रात को एक दूसरी कोठरी में जाने को राजी हुए। प्रात:काल हम तीनों लोगों के लिय एक लोहे की हाँड़ी मिली, उसे वे लोग Iron Cost कहते हैं। इस हाँड़ी की प्रशंसा करना मेरी शक्ति के बाहर है। वह काली हाँड़ी मानो कुली-प्रथा की कालिमा को प्रकट कर रही थी। कोई दो घंटे में मैंने उसे साफ किया, और फिर उसमे चावल चढ़ा दिए। मैंने चावल चढ़ाए ही थे कि इतने में वह चमार और मुसलमान ओवरसियर को ले कर चले आये। उन लोगों ने शिकायत कर दी कि वह हाँड़ी हमको नहीं दी गयी। ओवरसियर ने मुझे आज्ञा दी कि इन लोगों को हाँड़ी दो, पीछे तुम भोजन बनाना। मुझे हाँड़ी देनी पड़ी। फिर मै एक स्वतंत्र भारतवासी के यहाँ गया और उससे हाँड़ी ले कर अपना काम चलाया। पहले छह महीने में जो सामान एक सप्ताह का मुझे मिलता था, उसे मै चार दिन में ही खा डालता था और शेष दिन स्वतंत्र भारतवासियों से माँग-जाँचकर काम चलाता था और अपनी क्षुधा देवी को नमस्ते करके संतोष धारण करने की प्रार्थना किया करता था। परंतु मेरी दयालु क्षुधा देवी कंपनी के दाल-चावल को देखते ही सुरसा का पथ पकड़ लेती थी। यद्यपि मैं कुली-प्रथा की कालिमा को प्रकट करने वाली भैरवदेव के रंग की हाँड़ी को बड़ी शीघ्रता से माजता था तथापि वह अपनी कालिमा को नहीं त्यागती थी। इतने में मेरी दयालु क्षुधादेवी क्षण-क्षण मुझे ललकार-ललकार कर ओवरसियरों से कुछ ही कम दुःख देती थी और संपूर्ण रसद को चार ही दिन में चाटकर पाँचवे दिन कालोनियल शुगर रिफायनिंग कंपनी, फिजी के कर्मचारी और रसद का एक्ट पास करनेवालों को आशीष दिया करती थी। क्षुधा देवी कभी मुझसे युद्ध में हार जाती थी तब मै खीच-खाँच कर किसी सप्ताह में रसद पाँच दिन को कर लिया करता था। एक दिन मैंने अपने मैनेजर से कहा कि मुझे रसद और मिलना चाहिए। मैनेजर ने कहा "वेल टूम आडमी हाय की घोरा"? मैंने उत्तर दिया "था तो आदमी लेकिन इस कुदाली ने मुझे घोड़ा बना दिया है। इसी कुदाली ने मेरी क्षुधादेवी को जगाया है।" मैनेजर हँस पड़ा और कहा अच्छा चिट्ठी ले जाओ। मैं वह चिट्ठी खाने का सामान देनेवाले साहब के पास दुकान में ले गया। 2 पौंड यानी एक सेर कच्चे चावल मिले। मैनेजर के पास ले आया। उसने कहा हमारे सामने राँधो, मैंने भात बनाकर तैयार किया। उसके सामने तीन हिस्सा खा गया, तब तो मैनेजर साहब चकित हुए। उसके दूसरे सप्ताह से मुझे रसद कानून से एक सेर अधिक मिलने लगी। चौथे सप्ताह में एक व्यक्ति ने मैनेजर से कहा कि मुझे भी रसद अधिक मिले, मेरे भी खाने-भर को नहीं होती। तोताराम को तो मिलने लगी है। मैनेजर ने कहा, कानून के मुताबिक दिया जायगा। उस दिन से मेरे लिए भी अधिक मिलना बंद हो गया। उसी दिन से क्षुधादेवी फिर सताने लगी। पहले मुझे भी फुल टास्क यानी पूरा काम दिया गया था, पर वह इतना अधिक था कि मुझसे कभी नहीं हो सकता था। ओवरसियर मुझे बहुत तंग किया करता था। ज्योहीं मेरे काम को देखने आता, दो-चार थप्पड़ मुँह में जमा जाता था! एक बार मैंने मन में ठान लिया चाहे कैद में भले ही जाना पड़े, परंतु इस दुष्ट ओवरसियर को मारे बिना नही छोड़ूँगा। एक दिन यह ओवरसियर साहब कोट-पतलून पहने और हैट लगाये हुए झूमते-झामते आये और आते ही एक घूंसा मेरे सिर में जमाया। गोरे लोग घूंसे लगाने में तो बड़े तेज होते हैं, उस घूंसे से मेरा सिर भन्ना गया। मैं चुप रह गया, ओवरसियर साहब क्यों माननेवाले एक डबल घूँसा फिर लगा ही तो दिया। अबकी बार मुझे क्रोध आ गया। मैंने कुदाली तो रख दी और एक साथ ओवरसियर की टाँगों में सिर डाल कर ऐसा पटका कि धड़ामधम नीचे चित्त जा पड़े। गिरते ही मैंने दोनों पाँव साहब की छाती पर जमा दिए और फिर मारना शुरू किया। इतने घूँसे मारे कि ओवरसियर साहब के दो दाँत टूट गए, मुँह से लोहू निकलने लगा, कनपटी फूट गयी। पाठक! यह न समझें कि यह काम मैंने बड़ी वीरता से किया था, मुझे इस बात का डर था कि कहीं अगर यह उठ बैठा तो मुझे मार डालेगा, और मार डालना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि पीछे से वह बेकसूर (not guilty) सिद्ध हो कर छूट जाता। बस इसी डर के मारे मुझ में चौगुना जोश आ गया था। साहब के इतने घूँसे लगे कि वे नशे में हो गए और नीचे से बोले That will do अर्थात् बस करो, भाई बस। मैं उन दिनों अंग्रेजी बिलकुल नहीं समझता था। मैं नहीं समझा कि 'दैट विल डू" क्या होता है? मैं इसका तात्पर्य यही समझा कि अभी इसमे बल है। बस फिर मैंने दाहिने हाँथ के घूँसे जमाना प्रारंभ किया। अब की बार ओवरसियर साहब ने हाथ हिलाकर कहा 'बौय नो' नो के मानी मैं समझ गया और मैंने उसे छोड़ दिया। तत्पश्चात मैंने उससे कहा "अगर तुमने नालिश की तो समझ लेना जान से मार डालूँगा।" वह ओवरसियर टूटी-फूटी हिंदी बोल लेता था और थोड़ा समझ भी लेता था। उसने मुझसे कहा कि यह बात किसी से कहना नहीं। मैं उसका अभिप्राय समझ गया। बात यह थी कि अगर उस कोठीवाले को खबर लग जाती कि गोरा एक कुली से पिट गया है तो वह गोरे को निकाल देता और यह कहता कि जो आदमी 100 कुलियों से काम लेने के लिए रखा गया है, यदि वह एक से पिट गया तो वह नौकरी के योग्य नही! मैंने भी सिर हिला दिया कि मैं नहीं कहूँगा। फिर ओवरसियर साहब ने कहा "आज से हम-तुम Friend (दोस्त) हुए।" यद्यपि मैं उसकी भाषा नहीं समझता था, पर पर उसकी आकृति और कहने के ढंग से उसका भाव समझ लेता था। और वह जो दो-चार अशुद्ध हिंदी के शब्द बोलता था उन्हें मैं अच्छी तरह से समझ लेता था। फिर उसने अपने पास से कई पैंस दे कर नारियल मँगाए और एक नारियल मेरे हाथ में दिया कि इसको तोड़ कर इसका पानी पियो और एक अपने हाथ में लिया। पीते वक्त ओवरसियर साहब ने कहा "Good luck" (गुड लक)। मैं समझा तो नहीं; परंतु मुझे उसके चेहरे को देख कर हँसी आ गयी और मैंने कहा कि आज तो साहब समझ गया होगा कि 'गुड लक' कैसा होता है!

    कोठी में डाक्टरी परीक्षा

    एक बार एक डाक्टर साहब परीक्षा लेने के लिए आये। मैंने सोचा कि यदि कहीं इन्होंने मेरे लिए Full task लिख दिया तो बस काम करते-करते दम निकल जाएगा। कई सौ मजदूर डाक्टर साहब को घेरकर खड़े हो गए और डाक्टर साहब अपनी स्टैथस्कोप लगा कर जाँच करने लगे। जब मैंने देखा कि मेरे नाम के पुकारे जाने में थोड़ी देर है, मैं एक फर्लांग दूर चला गया और वहाँ से भागता हुआ आया। डाक्टर साहब ने मुझे भागते हुए नहीं देख पाया, क्योंकि वहाँ भीड़ बहुत थी। मेरा नाम पुकारा गया, मैं हाजिर हुआ। मेरा दिल दौड़ने के कारण धड़कने लगा था। ज्योहीं स्टौथकोप लगाई गयी, त्योहीं डाक्टर ने कहा, "क्या तुम्हें कोई बीमारी हो गयी है?" मैंने कहा "मुझे दमा हो गया है।" डाक्टर ने कहा, "कलकत्तेवाले डाक्टर ने तो यह लिखा ही नहीं कि तुम्हें दमा है।" मैंने कहा "उन दिनों मेरी बीमारी दबी हुई थी और बहुत कुछ सेहत थी। अब दमा फिर उखड़ आया है।" डाक्टर साहब बातों में आ गए और उन्होंने 'आधा काम' लिख दिया।

    इस प्रकार मुझे झूठ बोलना पड़ा। अगर मै चालाकी न चलता तो मेरे नाम पूरा काम लिखा जाता और काम करते-करते मेरे प्राण जाते, जेलखाने में पड़ा-पड़ा भूखों मरता और ओवरसियरों की मार खानी पड़ती सो अलग। अस्तु, मैं मर्त्यलोक के यमराज ओवरसियर की मार से एक प्रकार बच गया, अब यमलोक के यमराज मुझे इस झूठ बोलने के लिए भले ही दंड दें, मैं उसे सहर्ष सह लूँगा। मैं आधा काम करता और 6 पैंस रोज कमाता था। 5 वर्ष तक मुझे जो-जो कष्ट भोगने पड़े उन्हें मैं ही जानता हूँ। पाँच वर्ष बाद जब मैं स्वतंत्र हुआ तो मेरे ऊपर 15 शिलिंग का कर्ज था। लीजिए पाठक! मैंने 5 वर्ष तक कठिन परिश्रम करके और भूखों मर के क्या कमा पाया! केवल मैं ही नहीं, हमारे सैकड़ों भाई जो गिरमिट से छुटकारा पाते हैं तो उनके पास एक कौड़ी भी नहीं होती। हाँ दो-चार आदमी भले ही ऐसे निकलें जो गिरमिट में काम करके दस-पाँच रुपये प्रति वर्ष बचा लें। स्वतंत्र होने पर मैंने कुछ पौंड उधार ले कर थोड़ी-सी जमीन पट्टे पर ली और गन्ने की खेती करने लगा। जब मुझे खेती में कुछ लाभ हुआ तो मैंने सोचा कि अब घर चिट्ठी भेजनी चाहिए। मैंने बीच में चिट्ठी यह सोच कर न भेजी थी कि यदि मेरे घरवालों ने मेरे कष्टों का वर्णन पढ़ा तो वे घबड़ा जाएँगे। जब फिजी में आये हुए मुझे 8 वर्ष हो गए तो मैंने एक पत्र अपने भाई को, जो कलकत्ते में मुनीमगिरी करता था, भेजा। इस पत्र में मैंने विस्तारपूर्वक उन सब कष्टों का वर्णन किया था जोकि मुझे फिजी में गिरमिट में काम करने में सहने पड़े थे।

    मैं अपने हृदय में विचार करता था कि मेरा भाई मेरा पता पा कर बड़ा प्रसन्न होगा। जब पत्र को भेजे हुए डेढ़ महीना हो गया तो पत्र की प्रतीक्षा करने लगा। अंत में एक पत्र कलकत्ते से आया। ज्योहीं मुझे पत्र मिला, मुझे बड़ी उत्कंठा उसे खोलने की हुई। पत्र खोलते ही मैंने पढ़ा- "तुम्हारे भाई ने ज्योहीं तुम्हारे कष्टों का विवरण पढ़ा कि उसके दिल में बड़ा धक्का लगा और उसे बड़े जोर से बुखार चढ़ आया, दो दिन तक बराबर बुखार चढ़ा रहा, तीसरे दिन अकस्मात उसका देहांत हो गया!" इस हृदय-विदारक समाचार को सुनकर मुझे दुःख हुआ और मुझे बाल्यकाल की सब घटनाएँ एक-एक करके स्मरण आने लगीं, जबकि मैं अपने भाई के साथ भोजन किया करता था। जब मैं उन कष्टों का स्मरण करता हूँ जो उस दुष्ट आरकाटी के कारण सहने पड़े तो मेरे हृदय के घाव फिर हरे हो जाते हैं और मेरे मुख से सहसा यही शब्द निकलते हैं- हा! परमात्मन् यह कुली-प्रथा कब बंद होगी और इन धूर्त आरकाटियों से हमारे भाइयों का कब पिंड छूटेगा!"

    इधर जब मेरी माँ को मेरा कुछ समाचार न मिला तो उसे बड़ी भारी चिंता हुई। गाँव के लोग कहते हैं कि एक बार एक साधू लड़का मेरे ग्राम हिरनगौ में आया। कहा जाता है कि उस लड़के की सूरत मुझसे कुछ मिलती-जुलती थी। ज्योहीं मेरी माँ ने सुना कि कोई साधू मेरी शक्ल का आया हुआ है त्योहीं वह साधू के पास गयीं और दौड़ कर उसे पकड़ लिया और कहने लगीं- "बेटा क्यों साधू हो गया है? अब तो अपनी दुखित माँ पर दया कर और जटा मुड़ा कर अपने घर में रह।" उस साधू ने कहा, "माँ! मैं तेरा लड़का नहीं हूँ। मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, मैं तो क्षत्रिय हूँ।" पर मेरी माँ का मस्तिष्क मेरी याद करते-करते इतना विचलित हो गया था कि वह साधु की बात पर विश्वास ही नहीं करती थी! आख़िरकार वह साधु तंग हो कर मेरे गाँव से भाग गया!

    कोई दो वर्ष परिश्रम करके मैंने फिजियनों की भाषा पढ़ी और उसे अच्छी तरह समझने और बोलने लगा। एक वर्ष तक मैंने बढ़ई का काम सीखा, तदनंतर धातुकार का भी काम मैंने बहुत दिनों तक सीखा था। फोटो लेना मैंने इस उद्देश्य से सीखा था कि मैं खेतों पर भारतीयों के चित्र लूँ! मैंने छिपकर ऐसे कितने ही चित्र लिए थे, जिनमें गोरे लोग भारतीय स्त्रियों और पुरुषों को पीट रहे थे। मेरा विचार इन चित्रों को 'सरस्वती' मासिक पत्रिका में छपवाने का था। लेकिन एक दिन जब मैं सुवा शहर को गया हुआ था तो एक अपरिचित मनुष्य बनावटी चिठ्ठी मेरे नाम की लेकर आया और सब तस्वीरें माँग कर ले गया! घर आ कर मैंने चिट्ठी पढ़ी तो उसकी लिपि कुछ मेरी लिखावट से मिलती थी। इसी से उसका दाँव चल गया। मैंने बहुत चाहा कि मामला चलाऊँ; परंतु वह मनुष्य लापता हो गया और मुझे स्वदेश को आना था, इसलिए मैं चुप हो गया। तसवीर जाने के दो दिन बाद मुझको एक सरकारी सिपाही ने आ कर हुक्म सुनाया कि आज से किसी खेत में कंपनी या कोठीवालों के मजदूरों की तसवीर न खींचना। अगर उदूल हुक्मी करोगे तो अभियोग चलाया जाएगा और सजा होगी।

    यह तो पहले लिख चुका हूँ कि मैं खेती करने लगा था। एक बार सन 1910 ई० में जबकि मेरी गन्ने कि खेती तैयार थी, एक बड़ा भारी तूफान आया और मेरी तमाम खेती नष्ट हो गयी। तत्पश्चात मैंने फिर उधार लेकर कार्य आरंभ किया। परमेश्वर की कृपा से फिर थोड़ा-बहुत लाभ होने लगा।

    मैं प्राय: यह किया करता था कि अपना काम अपने नौकरों पर छोड़ कर कोठियों में जाया करता था और वहाँ जा कर अपने भारतीय भाइयों की दशा देखा करता था और उन्हें उनकी भलायी की सलाह दिया करता था। फिजी की बीसियों कोठियाँ मैनें स्वयं जा कर देखी थी और उनके समाचार ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन को दिए थे। उपरोक्त सभी भारतीय भाइयों के दुःख-निवारणार्थ यथाशक्ति प्रयत्न करती थी। सभा का पत्र-व्यवहार मै हिंदी में किया करता था।

    कोठीवाले कितने ही गोरे मुझसे इतने नाराज हो गए थे कि कितनी ही कोठियों में मेरा जाना बंद करवा दिया था! जिन कोठियों में मैं अपने भारतीय भाइयों से मिलने जाता था वहीं वे मुझे निकलवाने का यथाशक्ति प्रयत्न करते थे। एक बार मैं एक कोठी में घूमते-घूमते पहुँचा। कोठी के भीतर घुसने की तो मुझे आज्ञा थी नहीं, अतएव मैं सड़क के किनारे बैठ कर जोर से भजन गाने लगा। भजन गाने का मेरा उद्देश्य यही था कि जब कोई गाना सुनेगा तो अवश्य मेरे पास मेरा गाना सुन कर आयेगा। कितने ही आदमी कोठी के बाहर सड़क पर मेरे निकट आ गए। मैंने गाना बंदकर उनसे बातचीत करना प्रारंभ किया। बातें करते- करते मेरी दृष्टि एक मुसलमान युवती पर पड़ी। उसकी आकृति को देख कर यह ज्ञात होता था कि मानो वह अभी रोए देती है! उस स्त्री की छोटी लड़की उसके निकट खड़ी हुई थी। मैंने उस स्त्री से पूछा, "क्या तुम्हें कोई खास तकलीफ है?" यह सुनते ही उस स्त्री की अश्रुधारा बहने लगी और उसने रोते-रोते मुझे अपना हाल सुनाना प्रारंभ किया। उसने कहा, मेरा नाम ललिया है और मेरे पति का नाम इस्माइल है। कई वर्ष हुए, जब मैं अपने पति के साथ कानपुर में रहती थी। मेरा पति स्टेशन से यात्रियों का बोझा ढोया करता था और इस तरह जो आठ-दस पैसे जो कमाता था उसमें हम तीनों- यानी पति, मैं और यह छोटी लड़की गुजर करते थे। एक दिन मेरा पति मजदूरी करने के लिय गया हुआ था, मैं घर पर थी। इतने में एक आदमी मेरे घर पर आया और उसने मुझसे कहा, 'तुम यहाँ बैठी हो और वहाँ तुम्हारे मालिक के बड़ी चोट आ गयी है! वह कई संदूक लिए जा रहा था, वह संदूक उसके पाँव पर गिर पड़े और कई जगह बड़ी भारी चोट पहुँची। अगर तुम उसे देखना चाहती हो तो मेरे साथ चलो।' मैं घबरा गयी और उसके साथ चलने को राजी हो गयी। यह मुझे ले कर एक बड़े मकान के दरवाजे पर पहुँचा। मुझसे कहा देखो इसी में तुम्हारा मालिक है, यह डाक्टर साहब का मकान है। बिना डाक्टर साहब की आज्ञा के इसमें जाना ठीक नहीं। थोड़ी देर ठहरो अभी डाक्टर साहब आते होंगें। थोड़ी देर बाद ही एक आदमी कोट-पतलून पहने चश्मा लगाये आ पहुँचा। जो आदमी मुझे घर से लिवा लाया था उसने डाक्टर साहब से कहा, "देखिए डाक्टर साहब यह उसी आदमी की औरत है जिसका कि आप इलाज कर रहें हैं। यह अपने मालिक से मिलना चाहती है।" डाक्टर साहब ने कहा अभी हम नही मिलने देगा। कैसे अहमक हो समझते नहीं! इस वक्त उसके दिल पर बड़ी भारी चोट है। उसकी जान आफत में है। यदि उसने अपनी औरत को देखा तो इसमें शक नहीं कि उसकी जान निकल जाएगी और इस औरत को भी बहुत घबराहट होगी। अभी चार-पाँच दिन उसका इलाज हम कर लें, फिर उससे मिला लेना, वह कहीं भागा नही जाता है।" पहले आदमी ने कहा "हुजूर इसके पास कुछ खाने को नहीं है, यह कहाँ जाय?" डाक्टर साहब ने कहा, "अच्छा इसका और इसकी लड़की के खाने का इंतजाम कर दो।" इस प्रकार मैं अपनी छोटी लड़की के साथ वहीं रह गयी। दस दिन तक वह आदमी मुझे बहकाता रहा कि अब तुम्हारे मालिक को सेहत हो रही है, आज नही कल उससे मिलना। दस दिन बाद फिर वे ही डाक्टर साहब आये। मैंने उनसे अर्ज की मेरे मालिक से मिला दो। डाक्टर साहब बोले "तुम अभी तक यहीं बनी हो! वह तो कोई चार-पाँच दिन हुए हमारे शफाखाने से चला गया। हमने बहुत कहा अभी आराम नही हुआ अभी ठहर जा, पर उसने कहा कि मेरे बाल-बच्चे भूखों मरते होगें मैं नही ठहरूँगा।" इस लिए मैं ना-उम्मीद हो कर वहाँ से निकल आई। मार्ग में तीन आदमी दूर-दूर खड़े हुए मुझे मिले। पहले आदमी ने कहा-कहाँ जाती हो? किस की तलाश में हो? मैंने सारा किस्सा कह सुनाया। उस आदमी ने कहा- तुम्हारे आदमी का नाम इस्माइल था। मैंने कहा-हाँ। तब उसने बड़े अचंभे के साथ कहा- अरे वह तो कलकत्ते भेज दिया गया, उसे आरकाटी ने बहका दिया था। मैं बड़ी घबराई। थोड़ी दूर पर दूसरे आदमी ने भी ये ही बातें कहीं। आगे चलने पर तीसरे आदमी ने कहा, "पीछे तुम्हारा पति अपने घर पर आया था, उसे तो आरकाटी ने बहका दिया कि तेरी स्त्री कलकत्ते भेज दी गयी; इसलिए वह तो कलकत्ते गया। अगर तुझे उससे मिलना हो तो जल्दी तू भी कलकत्ते जा। मै कलकते जाने पर राजी हो गयी। उस आदमी ने मुझे बहुत-से आदमियों के साथ जो कलकत्ते आ रहे थे, भेज दिया। जब मै कलकत्ते की डिपो में पहुँची तो मुझे पता लगा कि मेरा मालिक तीन दिन हुए फिजी भेंज दिया गया है! इसके बाद मैं भी इस लड़की के साथ यहाँ भेज दी गयी। आज तीन वर्ष हो गए, मैं इस कोठी में काम करते-करते मरी जाती हूँ, मुझे नही मालूम मेरा मालिक कहाँ हैं। मैं तुम्हारा बड़ा अहसान मानूगीं, अगर तुम उससे मुझे मिला दो।" इतना कह कर वह स्त्री फूट-फूट कर रोने लगी। और उसकी लड़की भी अब्बा-अब्बा कहकर रोने लगी। मैंने उससे कहा बेटी! तुम मुझे अपने मालिक का नाम, अपनी सास-ससुर वगैरह का नाम और अपना सब हाल लिखवा दो, मै तुम्हारे मालिक को तलाश करूँगा। मैंने अपनी डायरी में उसका सब हाल लिख लिया और उसे तसल्ली दे कर मैं स्टीमर पर सवार हो कर कई घंटे के बाद सुवा आ पहुँचा। सुवा आते ही मैं एजेंट जनरल के पास गया और मैंने उनसे प्रार्थना की कि कृपया आप अपने आफिस के क्लर्क से कह कर एक सूची बनवा दीजिये जिसमें कि गत तीन वर्ष में आये हुए इस्माईलों की कोठियों के पते हों। एजेंट जनरल ने मुझे से कहा, "हम यह काम करवाने का तुम्हारा नौकर नहीं हैं। मैंने एक व्यक्ति से सुना की कोठी में इस्माइल नामक एक पुरुष हैं। मैंने उसी कोठी में जाने का निश्चय किया। जब मै स्टीमर पर सवार होकर उस कोठी में पहुँचा तो मैने इस्माइल को बुलवाया और मैंने उसकी स्त्री के विषय में पूछा। इस्माइल के मुख पर कुछ पसीना आ गया और वह बोला- "मेरी औरत ललिया थी।" मैंने उससे कह दिया की तुम्हारी औरत अमुक कोठी में, जो यहाँ से 500 मील पर है, काम करती है। मैं तुम्हारी ओर से एक अर्जी पंद्रह दिन की छुट्टी के लिए एजेंट जनरल के नाम लिखे देता हूँ।, तुम इस पर अपने दस्तखत करों। अर्जी लिख कर मैंने अपने साथ ली। तदनंतर नाव पर सवार हो मैं उस कोठी में पहुँचा जहाँ की ललिया काम करती थी। जब मैंने उससे यह हाल कहा तो उसे बड़ी प्रसन्नता हुई और प्रसन्नता के कारण उसकी आँखों मे आँसू आ गए। मैंने उसकी ओर से भी एक अर्जी एजेंट जनरल के नाम लिखी। दोनों अर्जी ले कर मैं एजेंट जनरल के पास गया। एजेंट जनरल बड़ा नाराज हुआ और उसने कहा- "जाओ हम नही जानटा, कोठी वाला जाने।" मैं बड़ा हैरान था कि क्या करूँ। अंत में मैंने सोचा, चलो कोठीवाले के पास ही चलें और उसी से छुट्टी के लिए कहें। तत्पश्चात मैं ललिया को ले कर कोठीवाले के पास गया। कोठीवाले ने हम दोनों को फटकार कर कहा- "मानते ही नही, क्यों मुझे तंग करते हो! हमारा काम 'सफर' करेगा।.........गन्ना कटने के लिए तैयार है। जाओ हम छुट्टी नही देगा।"

    लौटकर मैंने विचार किया कि किसी दूसरी तरकीब से अभी छुट्टी दिलाऊँगा। इधर क्या हुआ, इस्माइल काम करते- करते और अपनी स्त्री व लड़की की फिक्र से बीमार पड़ गया। उसने अर्जी दी, वह अस्पताल भेज दिया गया। अस्पताल के डाक्टर ने उसे काम पर वापस कर दिया और लिख दिया, इसे कोई रोग नही, बहाना बनाता है। बेचारा फिर काम पर वापस आया। अब की बार उसकी तबियत और भी ज्यादा खराब हो गयी। वह अस्पताल फिर भेजा गया, बड़े डाक्टर ने उसे देखा और लिख दिया "इसको कोढ़ की बीमारी है, यह बहुत कमजोर है इससे काम नहीं होगा। अगर बैठे-बैठे तनख्वाह देना चाहते हो तो भले ही दो। बेहतर तो यह होगा कि इसे इंडिया को वापस भेंज दो। जहाज चौदह या पंद्रह दिन में जाने वाला है।' कोठी के मालिक ने यही विचार कर लिया कि इसे शीघ्र ही हिंदुस्तान भेज देना चाहिए। जब मुझे यह खबर लगी तो मै फिर उस अस्पताल में पहुँचा। मैंने इस्माइल से पूछा तो उसने कहा कि डाक्टर के कहने के मुताबिक ये मुझे जबरदस्ती अभी हिंदुस्तान भेजनेवाले हैं। अब मै अपनी औरत से कैसे मिलूँगा? मैंने सोचा कि यह तो बड़ा अनर्थ हुआ। मैं झटपट ही एक बैरिस्टर के पास गया और मैंने उसे दो गिन्नी अपने पास से इसलिए दिया कि किसी तरह प्रयत्न करके इसे अभी हिंदुस्तान जाने से रोक लिया जाय। बैरिस्टर साहब ने प्रयत्न करके पूछताछ की और कहा कि अब तो उसका जाना निश्चित हो गया। अब क्या हो सकता है? जहाज छूटने वाला था। मैं वहाँ से चलकर जहाज के निकट आया, देखा तो इस्माइल को जहाज में सवार पाया। इस्माइल की हार्दिक अभिलाषा थी कि वह अपने स्त्री से मिले। भारतवर्ष को जहाज छूटते वक्त इस्माइल के नेत्र अश्रुओं से परिपूर्ण थे। यद्यपि असह्य दुःख के कारण मुझसे वह कुछ कह नही सकता था; पर उसकी आकृति से दुःख टपकता था। मुझे भी उस समय हार्दिक खेद था। मैंने दिल में सोचा की मेरा प्रयत्न सब व्यर्थ गया और मैंने ललिया से जो प्रतिज्ञा की उसे मै पूरी न कर सका। मैंने जहाज के एक खल्लासी से कह दिया था कि इस्माइल की देखभाल रखना। यह बीमार है, इसे यथाशक्ति सहायता देना। जहाज रवाना हो गया, मैं 'जैसी भगवान की इच्छा' कह के घर लौट आया। जब वह जहाज भारतवर्ष से फिजी लौटा तो उस खल्लासी ने मुझसे कहा कि हिंदुस्तान की जमीन पर पैर रखते ही कलकत्ते में इस्माइल की मौत हो गयी। मुझे सुनकर बड़ा खेद हुआ, मैं सोचने लगा कि यह समाचार मैं ललिया को कैसे सुनाउगाँ! वह इस्माइल से मिलने की राह देखती होगी। मै कड़ा दिल कर के ललिया की कोठी को रवाना हुआ। वहाँ पहुँचकर पहले तो मैंने उससे कहा कि तुम्हारा पति हिंदुस्तान भेज दिया गया। वह फूट-फूटकर रोने लगी। मैंने तसल्ली दे कर कहा, अब तुम्हारे गिरमिट के थोड़े दिन बाकी हैं तुम्हें भी हिंदुस्तान चार महीने बाद भिजवा देगें। दूसरे दिन इतवार को मैंने उसकी मृत्यु का हाल सुना दिया। सुनते ललिया को मूर्च्छा आ गयी और वह बीमार पड़ गयी। बड़ी कठिनाई से 15 दिन में उसे थोड़ा-बहुत आराम हुआ। अपने दुःख को वह स्वयं ही जानती थी। इस दुर्दशा में भी कोठीवाले उससे बराबर काम लेते रहे! धिक्कार है सहस्त्रवार ऐसे पौंड, शिलिंग और पैसों पर जिनके लिए प्लैंटर लोग मनुष्य जाति पर ये अत्याचार करते हैं। ये अर्थपिशाच और धनलोलुप प्लैंटर कहते हैं:

    "Material resourses of the colonies cannot be developed without these labourers."

    अर्थात बिना इन मजदूरों के उपनिवेशों के द्रव्य-साधनों में उन्नति नहीं हो सकती। हमारी समझ में मनुष्यों को दासत्व-श्रृंखला में बाँधने में यह लाख गुना बेहतर है कि उपनिवेश ऊजड़ और कंगाल बने रहें।

    आस्ट्रेलिया की सैर

    हम लोगों में बहुत-से ऐसे होंगें जो यह भी नही जानते होंगें कि आस्ट्रेलिया में सौ-दो सौ भारतवासी रहते हैं या नही। इस बात का कारण हमारे अनुत्साह के सिवाय और क्या हो सकता हैं? हम लोगों के हृदय में इस बात की इच्छा ही उत्पन्न नही कि दूसरे देशों में रहनेवाले अपने भारतीय भाइयों के बारे में जानने का प्रयत्न करें। और न हो, तो सैर करने के लिए ही हम में से दस-पाँच आदमियों को ऐसे द्वीप-द्वीपांतरों में जाना चाहिए, जहाँ कि भारतवसी बसे हुए हैं। हमारे यहाँ के राजा-महाराजा और सुशिक्षित धनवान पुरुष भी जब सैर करना चाहते हैं तो सीधे इंग्लैंड या फ्रांस को चल देते हैं।

    एक बार सैर करने के लिए मैंने आस्ट्रेलिया जाने की इच्छा की। आस्ट्रेलिया की सरकार से मुझे आज्ञा लेनी पड़ी। मैं सिडनी पहुँचा। तत्पश्चात मैं वहाँ के एक होटल में चला गया और सात शिलिंग देकर वहाँ ठहर गया। गोरे लोंगो से अलग मुझे एक कमरा दिया गया। मैं उस कमरे में जा कर लेट रहा। मेरे पहुँचते ही वहाँ हल्ला हो गया 'काला आदमी आया है।' बस, फिर क्या था, कितनी ही स्त्रियाँ और पुरुष मुझे देखने के लिए मेरे कमरे पर आये! भीड़ के मारे मेरी तबियत हैरान थी। मेरे विषय में कोई कुछ कहता था, कोई कुछ। एक स्त्री मुझसे बोली "औल ब्लैक' हैव यू गौट नों सोप।" पर मैंने उसकी बात का उत्तर देना ठीक न समझा। मुझे इस बात का डर था की अगर कहीं इन लोगों को यह ज्ञात हो गया की मैं थोड़ी अंग्रेजी बोल और समझ सकत हूँ तो ये बातें पूछते-पूछते मेरा पिंड न छोड़ेंगें। मैंने एक साथ जोर से फिजियन भाषा में कहा, "लाकौ सालेबू न औसो ज्यौसौं" अर्थात 'चले जाओ, कोठरी बहुत भर गयी हैं।' यह सुन कर बहुत से लोग चले गए, लेकिन तब भी कितनी ही स्त्रियाँ वहीं खड़ी रहीं। मुझे प्यास लगी तो मैंने अपना लोटा बैग से निकाला। लोटे को देखते ही वे चिल्लाने लगीं "come, Come, look at this water pot" यह आवाज सुनकर और भी भीड़ इकट्ठी हो गयी। भीड़ में से एक स्त्री बोली यह मँजता है, दूसरी बोली यह कभी नहीं माजा जाता, इतने में इतने में एक तीसरी स्त्री उसे उठा ले गयी और नहाने के साबुन से उसे साफ करने लगी। भला नहाने के साबुन से लोटा किस तरह साफ हो सकता था? तदनंतर किसी अन्य स्त्री ने कहा की इसमें sand soap (बालू का साबुन) लगाओ। ऐसा किया जाने पर वह लोटा साफ हो गया। इसके बाद मैंने पाखाने जाना चाहा और मै लोटा लेकर चलने लगा तो फिर सबको आश्चर्य हुआ। जब मै पखाने से लौटा तो होटल की मैनेजर स्त्री ने कहा 'You habe sapoiled our latrin' तुमने हमारा शौचालय खराब कर दिया मैंने क्रुद्ध हो कर कहा, 'Then given me back my seven shillings, I will not stay here.'-"तो मेरे सात शिलिंग लौटा दो। मै यहाँ नहीं ठहरूँगा।"

    मैंने सोचा कि यहाँ रहने से बहुत-सी असुविधाएँ होंगी, चलो किसी हिंदुस्तानी भाई के यहाँ चल कर ठहरें।

    यहाँ पर दो-चार बातें आस्ट्रेलिया-प्रवासियों के विषय में कहना अनुचित न होगा। आस्ट्रेलिया में कोई 6644 भारतवासी हैं। आस्ट्रेलिया में अब और भारतवासी नहीं बसने पाते। "शिक्षा की परीक्षा" जिसका कि आविष्कार नेटाल ने किया था, आस्ट्रेलिया में भी प्रचलित है। आस्ट्रेलियन अफसर नए आनेवाले भारतवासी की परीक्षा लेते है कि वह अंग्रेजी पढ़-लिख सकता है या नहीं, और जबरदस्ती भारतवासियों को फेल कर देते हैं और आस्ट्रेलिया में नहीं घुसने देते। यह मुफ्त की परीक्षा देते समय परीक्षा देनेवालों के जो हार्दिक भाव होते हैं उन्हें वे ही अच्छी तरह जान सकते हैं, जिन्होंने कभी इस तरह की परीक्षा दी हो। आप उस बेचारे की स्थिति पर तो ध्यान दीजिये जो की सात समुद्र पार से अनेक कष्ट सहता हुआ बहुत रुपये खर्च करके, आया हो और फिर परीक्षा में फेल करके वापस कर दिया जाय। क्या ही अच्छा हो यदि 'दुष्टं दुष्टवदाचरेत' की निति से भारतवर्ष में आनेवाले आस्ट्रेलियन लोंगो की हिंदी में परीक्षा ली जाय!

    लेकिन यह खैरियत है कि आस्ट्रेलियन लोग दक्षिण अफ्रीकावालों की तरह बहुत निर्दयी नही हैं। जो 6644 भारतवासी आस्ट्रेलिया में बस गए हैं, उन पर आस्ट्रेलियन सरकार अत्याचार नही करती। यद्यपि आस्ट्रेलिया में नये भारतवासी नहीं बसने पाते, पर सैर करने के लिए या जलवायु परिवर्तन के इए मेलबोर्न नगर के वैदेशिक विभाग (Department for external Affairs) से आज्ञा मिल जाती है। परंतु इसमें भी एक बड़ी बाधा हैं, वह यह कि 100 पौंड की जमानत देनी पड़ती है। जो भारतवासी आस्ट्रेलिया में बस गए हैं, उनमें अधिकतर पंजाबी, सीख और पठान हैं। सीख लोग ज्यादातर गेंहूँ खेती करते हैं और पठान लोग ऊँट रखते हैं। पढ़े-लिखे ये लोग बिलकुल नहीं। परंतु हर्ष की बात हैं की ये लोग यूरोपियन लोगों की तरह जमीन व घर सकते है, राजनीतिक अधिकार भी उनको प्राप्त हैं, चुंगी की मेंबरी के लिय वोट भी दे सकते है। सर्वसाधारण की संस्थाओं में जा सकते हैं और होटलों में ठहर सकते हैं। पुलिस भी उन पर विशेष अत्याचार नही करती।

    पहले कुछ निम्न कोटि के गोरों ने भारतवासी सिक्खों और पठानों से छेड़छाड़ की थी; परंतु जब उसके प्रत्युतर में भारतवासियों ने दो-चार डंडे जमा दिए तो फिर छेड़ने का साहस उन्हें न हुआ! आस्ट्रेलियन लोगों लोगों में प्राय: यह भाव प्रचलित हो गया है कि भारतवासी बड़ी जल्दी क्रुद्ध हो जाते है और लाठी लेकर सीधे हो जाते हैं, इसलिए इनसे छेड़छाड़ करना ठीक नहीं! कुछ भी क्यों न हो, हम यह अवश्य कहेंगें कि प्राय: आस्ट्रेलियन लोग दक्षिण अफ्रीकावालों से हमारे साथ बर्ताव करने में कई गुने अच्छे हैं। हाँ, एक बात बड़े आश्चर्य की हैं, वह यह कि आस्ट्रेलियन लोग इस बात पर कोई आपत्ति नहीं करते की हिंदुस्तानी पुरुष आस्ट्रेलियन स्त्रियों से विवाह करे। उनकी पॉलिसी यह है कि चूँकि हिंदुस्तानी आस्ट्रेलिया में रुपया कमाते हैं, इसलिए उन्हें इस रुपये को यहीं खर्च करना चाहिए।

    आस्ट्रेलियन स्त्रियाँ बड़ी खर्चीली होतीं हैं और जो कोई उनसे विवाह करता है तो उसकी आय का अधिकांश मेमसाहब ही खर्च कर डालती हैं! पठन लोगों ने ही अधिकतर आस्ट्रेलियन स्त्रियों से विवाह किया है, और थोड़े बहुत सिख भी ऐसे हैं जिन्होनें कि इन स्त्रियों के साथ शादी की है। इन स्त्रियों को अथवा इनकी संतति को ये लोग आस्ट्रेलिया से किसी दूसरी जगह नहीं ले जा सकते। आस्ट्रेलियन सरकार की यह बात न्यायसंगत नही है। यह बात सच है कि हमारे देश के लोगों ने निर्धन आस्ट्रेलियन स्त्रियों से विवाह किया हैं पर इससे यह अवश्य प्रकट होता है कि आस्ट्रेलियन लोग काले रंग से बहुत घृणा नही करते हैं।

    होटल से मै चला आया और किसी हिंदुस्तानी का घर तलाश करने लगा। अकस्मात मुझे एक जानता-पहचानता अंग्रेज मील गया जो कि फिजी में काम करता था। वह मुझे सिडनी से 15 मील दूरी पर ले गया और मुझे मेवाराम नामक एक पंजाबी जाट का घर दिखा दिया। मेवारामजी के दरवाजे पर मैं गया। मेवारामजी से मैंने सारा हाल कह सुनाया। उन्होंने मेरा बड़ा आदर-सत्कार किया। मेवारामजी ने एक आस्ट्रेलियन स्त्री से विवाह कर लिया था और वे मिस्टर मेव के नाम से पुकारे जाते थे। मेरे लिए मेवारामजी ने दो-तीन शिलिंग के सेव और अंगूर ला दिए। भूखा तो मै था ही, खा कर खूब सोया। कई दिन मैं मेवारामजी के यहाँ रहा। फिर सिडनी इत्यादि को सैर करता हुआ मै स्टीमर द्वारा फिजी को चला आया।

    फिजी में अब कैसे भारतवासियों के जाने की आवश्यकता है ?

    कुली बन कर शर्तबंदी में तो वहाँ एक भी भारतवासी को कभी न जाना चाहिए, पर कोई अपना खर्चा करके जाना चाहे तो जा सकते हैं। जो आदमी लुहारी का काम जानते हों, या घोड़ों के नाल लगाना जानते हों, उनकी गुजर वहाँ बहुत अच्छी तरह हो सकती है। ऐसे आदमी तीन रुपये रोज कमा सकते हैं। फिजी में सर्वेयर लोगों की बड़ी जरूरत है। निस्संदेह सर्वेयरों को वहाँ खुब आमदनी हो सकती है। वकील बैरिस्टर भी वहाँ जा कर अच्छी आमदनी कर सकते हैं। लेकिन जो वकील या बैरिस्टर स्वार्थी हों और रुपया कमाना ही जिनके जीवन का लक्ष्य हो वे फिजी को न जायें, क्योंकि फिजी में तो मणिलाल जी के समान वकीलों बैरिस्टरों की आवश्यकता है। सबसे ज्यादा जरूरत फिजी में हिंदुस्तानी डाक्टरों की है। यदि भारतवर्ष से कोई डाक्टर वहाँ चले जाएँ तो अपने भाइयों को बड़ी सहायता पहुँचेगी। जो बैरिस्टर वहाँ जाना चाहें उनको अपनी डिग्री का प्रमाण-पत्र साथ ले जाना चाहिए। जिनको भारतीय भाइयों के साथ हार्दिक प्रेम से बरतने और उनके आंतरिक दुखों के विमोचन के उपाय सोचने में जमुहाई आये उन महाशयों को वहाँ जाना उचित नहीं है। जिनके हृदय में शांति, दया, क्षमा, परोपकार, देश-सेवा, दिनों का उद्धार ये गुण बस रहे हों उन्हीं से प्रवासी भाइयों का उद्धार हो सकता है। जिनको निरंतर पैसे की धुन के सिवाय और कुछ नहीं सूझता हो वे महाशय कृपा करके फिजी न जायें।

    धन्य हैं वे लोग जो स्वार्थ को त्याग कर प्रवासी भाइयों के दुःख में भाग ले रहे हैं और कुटुम्ब से मुँह मोड़ टापुओं में जा कर अपने भाइयों को धैर्य दे रहे हैं।

    ऐसे लोगों के जाने से फिजी के दुखित भारतीय लोगों के बहुत कुछ कष्ट दूर हो जाएँगे। फिजी के वर्तमान गवर्नर Sir Bickam Sweet Escott bde उदार और न्यायप्रिय हैं और हम यह बात निस्संदेह कह सकते है कि ऐसा अच्छा गवर्नर फिजी में कभी नही आया। गवर्नर साहब कहते हैं "हमारी हार्दिक इच्छा है कि फिजी के भारतवासी सुशिक्षित हो जाँय और यहाँ के राज्य-संबंधी कार्यों में भाग लेने लगें।" फिजी की उन्नति खास तौर पर वहाँ के भारतवासियों की उन्नति पर निर्भर हैं, क्योकि जो वहाँ के आदिम निवासी हैं वे धीरे-धीरे कम होते जाते हैं। वहाँ 40,000 भारतवासी हैं, जो वहाँ के यूरोपियन लोगों की संख्या से 12 गुने हैं। भारतवर्ष के किसी बंदरगाह से न्यूजीलैंड या आस्ट्रेलिया होते हुए फिजी जा सकतेहैं। आस्ट्रेलिया होकर जाने में वहाँ उतरने की आज्ञा पहले से मँगानी होगी, पर न्यूजीलैंड होकर जाने में कोई विशेष दिक्कत नहीं होगी। और सबसे सस्ता मार्ग तो यह है की British India Steam Navigation Company के उन जहाजों से जाएँ जो कि 'कुली जहाज' कहलाते हैं। इन्ही जहाजों से हम कुली लोग बहका कर भेजे जाते हैं। इन जहाजों से जानेवालों यह भी ज्ञात जाएगा कि जहाजों पर हमारे भाइयों को कितने कष्ट दिए जाते हैं; परंतु इन जहाजों का आना-जाना ठीक-ठीक निश्चित नही रहता।

    स्वदेश की यात्रा


    है ऐसौ कोऊ अधम मनुज जगमाँहीं
    जाके मुख सों वचन कबहूँ निकस्यौ यह नाही
    "जन्मभूमि अभिराम यही है मेरी प्यारी
    वारो जापै तीन लोक की संपत्ति सारी"
    सात समुंदर पार विदेशन सों करि विचरन
    भयो नाहीं घर चलन समय हर्षित जाकौ मन?

    (जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी)

    उपर्युक्त कथन अक्षरशः सत्य है। शायद ही संसार में कोई ऐसा अधम मनुष्य निकले जिसका कि मन विदेश से अपने घर को आते समय प्रसन्न न हुआ हो। इक्कीस वर्ष फिजी में रह कर मेरे हृदय में अपनी मातृभूमि और माता के दर्शन करने कि लिए उत्कट इच्छा उत्पन्न हुई। मैंने अपना यह विचार डाक्टर मणिलाल जी से कहा, उन्होंने कहा अगर तुम वहाँ जा कर कुछ काम करो तो तुम्हारा जाना ठीक है। मैंने कहाँ, न तो मुझमें इतनी बुद्धि है और न मैं कुछ अधिक पढ़ा-लिखा ही हूँ। मैं वहाँ अपने भाइयों कि क्या सेवा कर सकूँगा। श्रीयुत मणिलालजी ने कहा "तुम्हारे लिए एक काम मैं बताता हूँ कि तुम गाँवों जा कर कुली-प्रथा के विरुद्ध प्रचार करो और अपने ग्रामीण भाइयों को यहाँ के कष्टों को बता दो।" मैंने भी यही कहा कि मैं आपकी आज्ञा को पालन करने का यथाशक्ति प्रयत्न करुगाँ। तत्पश्चात मैंने इमिग्रेशन विभाग को इस बात को सूचना दी कि मै भारतवर्ष को जाना चाहता हूँ। वहाँ से उत्तर आया कि 27 मार्च, 1914 को सुवा से स्टीमर कलकत्ते को चल देगा। वहीं सुवा पहुँचना चाहिए। इसके बाद फिजी के हर जिले से प्रतिनिधि आ कर एकत्रित हुए और सुवा में मुझे एक अभिनंदन-पत्र दिया गया। यद्यपि में इस आदर के योग्य कदापि नहीं था तथापि 'आज्ञागुरुणांह्यविचारणीया' अर्थात गुरुओं की आज्ञा मानना ही धर्म है, यह सोच कर मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया! इन लोगों ने भी मुझे यही आज्ञा दी कि तुम जाकर गाँव के लोगों में हमारे दुखो को सुनाओ और आरकाटियों के विरुद्ध यथाशक्ति आंदोलन करो। जिस समय मैं उन लोगों से विदा हुआ उस समय मेरे हृदय में खेद और हर्ष दोनों के भाव उत्पन्न हो रहे थे। खेद, इसलिए था कि मैं अपने भाइयों से जुदा हो रहा था और हर्ष इसलिए कि मैं अपने मातृभूमि को आ रहा था।

    इमिग्रेशन विभाग ने पहले से विज्ञापन दे रखा था कि जो कोई हिंदुस्तानी जाने वाला हो वह सुवा में हमारे कार्यालय पर आये। इस समाचार को पाकर कोई 1300 भारतवासी Immigration Office में एकत्रित हुए। कितने ही तो इनमें अपना घर, खेत, मॉल-असबाब सब बेंच कर स्वदेश को आने की तैयारी कर चुके थे। इस आशा से उन्होंने अपने वस्तुओं को आधे व तिहाई मूल्यों पर दे दिया था! परंतु इनमें से कुल 833 आदमी लिए गए, शेष सब धक्का मार कर निकाल दिए। एक भारतवासी का, जो फिजी में रहता था, पिता भारतवर्ष में मर गया। उसकी माँ की चिठ्ठी फिजी में पहुँची कि मै भूखों मरी जाती हूँ, कौड़ी पास नही, जैसे हो तैसे जल्दी