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वैचारिकी

गांधी का सर्वोत्तम उपवास और अहिंसा की असहायता
सुधीर चंद्र


जिस उपवास की बात मैं यहाँ करने जा रहा हूँ उसका गांधी के जीवन और दर्शन को ले कर या तो जिक्र होता ही नहीं या निहायत मुख्तसर ढंग से होता है। कई साल हो गए जब मेरा ध्यान इसकी तरफ खिंचा। संपूर्ण गांधी वांगमय के 1933 से संबंधित खंड पर ऐसे ही सरसरी निगाह डाल रहा था कि सहसा मेरी नजर रुक सी गई जब इस उपवास की सरदार पटेल से चर्चा करते हुए मैंने गांधी को यह कहते सुना, ‘क्या कोई अपने मन के सारे विचार किसी से कहता है? या कह सकता है?’ मैं सोचने लगा। क्या रहा होगा इस उपवास में कि गांधी, जो सदा अपने अंतर के प्रति सजग रहते थे और अपने आप को खुली किताब बनाए रखना चाहते थे, इसकी बात करने में अपने को न केवल असमर्थ बल्कि अनिच्छुक भी पा रहे थे? जिज्ञासा बढ़ी तो मैं अगल बगल के पृष्ठ पलटने लगा। वहीं मिला गांधी का सार्वजनिक वक्तव्य जिसमें इस उपवास के कारणों के बारे में गांधी ने कहा, ‘वे कारण इतने पवित्र हैं कि बताए नहीं जा सकते।’

गांधी पर पढ़ी पुस्तकों और आधुनिक भारत से संबंधित इतिहास ग्रंथों में कभी कभार इस उपवास का जिक्र जरूर ही मैंने देखा होगा। पर उसमें कुछ भी ऐसा नहीं था कि इस उपवास की अलग से कोई याद मेरे मन में बनी रह जाती। हाँ गांधी वांगमय के इन पृष्ठों का ऐसा असर पड़ा कि मेरी उत्सुकता इस उपवास के बारे में बढ़ती ही चली गई।

जितना इसके बारे में जाना उतना ही अचरज बढ़ा कि क्यों गांधी के जीवनीकारों ने इस उपवास को विस्तार से जानने और बताने की जरूरत महसूस नहीं की। उससे भी ज्यादा अचरज हुआ यह देख कर कि इतिहासकारों ने तो इसे लगभग अनदेखा ही कर दिया है। अन्य विधाओं, मसलन राजनीतिशास्त्र और दर्शन के नजरिए से गांधी का अध्ययन करने वालों ने भी ऐसा ही किया है। लोक स्मृति में भी यह उपवास अनुपस्थित है।

यह अचरज अनिवार्यतः एक सवाल पैदा करता है कि कौन सी प्रक्रिया चीजों और घटनाओं का महत्व निर्धारित करती है?जिससे निश्चित होता है कि न सिर्फ लोक मानस में वरन अकादमिक विमर्श में क्या उभरे और टिकेगा, और क्या भुला दिया जाएगा?इसी से एक और सवाल भी लगे हाथ जोड़ा जा सकता है, क्या इक्के दुक्के अकादमिक या अखबारी हस्तक्षेप से स्मरण विस्मरण की इस अद्भुत लीला में कोई फेरबदल हो सकता है?

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गांधी का यह उपवास 8 मई की दोपहर से शुरू हो कर 29 मई की दोपहर तक 21 दिन चला। इसका जन्म खासे रहस्यमय ढंग से 28-29 अप्रैल की रात में हुआ। पूना स्थित यर्वदा जेल में बंदी, गांधी 28 की रात को हमेशा की तरह जल्दी सोने चले गए थे। सोने जाते समय अनशन प्रारंभ करने का कोई विचार उनके मन में नहीं था। उसी रात, गांधी के अपने विवरण के मुताबिक, ‘तकरीबन बारह बजे किसी ने अचानक मुझे जगा दिया और एक आवाज ने, जो मैं बता नहीं सकता मेरे अंदर से आई या बाहर से, फुसफुसाते हुए कहा, ‘तुझे उपवास करना चाहिए।’ ‘कितने दिन का?’ मैंने पूछा। ‘इक्कीस दिन।’ आवाज ने कहा। ‘यह शुरू कब होगा?’ मैंने फिर पूछा। उसने कहा, ‘कल शुरू कर।’ उसी समय उपवास का फैसला कर गांधी पुनः सोने चले गए।

भरी रात में जगा देने वाली आवाज चाहे भीतर से आई हो या बाहर से, गांधी को यकीन था कि उपवास का आदेश उन्हें ईश्वर ने भेजा है। और ईश्वरी आदेश को मानने के अलावा वह और कुछ कर नहीं सकते। हाँ इतना जरूर उनको करना पड़ा कि दूसरे दिन ही उपवास पर न जा कर उन्होंने 8 मई से उसे शुरू किया। इसका कारण यह था कि अगर वह जेल में रह कर बगैर किसी पूर्व चेतावनी के अनशन शुरू कर देते तो अंग्रेजी सरकार और उसके अधिकारियों को बेहद परेशानी हो सकती थी। और गांधी की अहिंसा का तकाजा था कि विरोधी को भी अनावश्यक परेशानियों से बचाया जाय।

1933 के 21 दिवसीय अपने उपवास को गांधी ने भले ही ईश्वरी आदेश माना हो, और उस रात की घटना का उनका विवरण कितना भी रहस्यमय हो, इस उपवास का सीधा संबंध सात महीने पहले किए गए एक अनशन से था। 20 सितंबर 1932 को शुरू किया गया वह अनशन गांधी द्वारा किए गए तमाम अनशनों में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। यह वही अनशन है जिसके फलस्वरूप ऐतिहासिक पूना समझौता (पूना/यर्वदा पैक्ट) हुआ था। गांधी ने यह अनशन बर्तानवी प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडॉनल्ड की उस योजना के विरोध में किया था जिसमें दलितों को पृथक निर्वाचन देने का प्रस्ताव था। गांधी इस तरह से दलितों को हिंदू समाज से अलग कर देने के लिए कतई तैयार नहीं थे। अपनी जान को दाँव पर लगाते हुए उन्होंने इसके विरोध में 20 सितंबर से आमरण अनशन शुरू कर दिया।

हम सब जानते हैं कि इस अनशन का कैसा जबरदस्त प्रभाव सारे देश पर पड़ा। कोई भी गांधी की मौत के लिए तैयार नहीं था। गांधी के प्रबल राजनैतिक विरोधी भी संकट की इस स्थिति में अपने हितों, विश्वासों, मान्यताओं और विचारधाराओं को यथासंभव दरकिनार रख एक ऐसे समझौते को बनाने में जुट गए जिससे गांधी की जान बच जाए। कट्टरपंथी हिंदू और डॉ. आंबेडकर का नेतृत्व मानने वाले दलित गांधी के इन विरोधियों में प्रमुख थे। कोई नहीं चाहता था कि इस मुद्दे पर अनशन करते गांधी की मौत आ जाय।

विभिन्न वर्गों और पार्टियों के नेता बंबई और पूना में आ जुटे और दिन रात कोशिशें होने लगीं समझौते तैयार करने की। केवल पाँच दिन लगे इस असंभव दिखते काम में। प्रस्तावित समझौते का मसौदा तार से लंदन भेजा गया ताकि बर्तानवी सरकार उसे मान कर दलितों को दिए जाने वाले पृथक निर्वाचन को खारिज करने को तैयार हो जाए। उस समय प्रधानमंत्री मैकडॉनल्ड लंदन में नहीं थे। किसी मुर्दनी में वह ससैक्स गए हुए थे। तुरंत लंदन लौट आए वह और देर रात तक चली बहस के बाद उनके मंत्रिमंडल ने प्रस्तावित पूना समझौते को अपनी स्वीकृति दे दी।

26 सितंबर को यर्वदा जेल में एक विशेष प्रार्थना सभा के बाद गांधी ने अपना आमरण अनशन तोड़ा। पर अनशन समाप्त करते समय गांधी को लगा कि देशवासियों को एक चेतावनी जरूर दे दें वह। एक सार्वजनिक वक्तव्य में उन्होंने साफ साफ बता दिया इस अनशन को तोड़ने में इसको फिर से शुरू कर देने का वादा निहित है। वादा यह कि पूना समझौता अगर पुरजोर तरीके से कार्यान्वित नहीं होता और मापी जा सकनेवाली मियाद में पूरी तरह से अमल में नहीं आ जाता तो गांधी का नैतिक दायित्व होगा 20सितंबर वाले अनशन को फिर से चालू कर देना।

वैसे तो सामान्य परिस्थितियों में भी गांधी इस तरह की चेतावनी देना जरूरी समझते, पर पूना समझौता जिस तेजी से तैयार हो गया था और जिस तत्परता से परस्पर विरोधी तत्व साथ मिल बैठे थे उसमें आशंका का एक भाव आना स्वाभाविक ही था। गांधी ने अनशन तोड़ते समय सी. एफ. एंड्रूज से कहा भी था कि दकियानूसी हिंदुओं ने समझौता तैयार कराने में जो उत्साह दिखाया है उससे वह धोखे में नहीं आना चाहते। उनको यह भी डर था कि अनशन के दौरान जो मंदिर अचानक अछूतों के लिए खोल दिए गए हैं वे अधिक दिनों तक खुले नहीं रहेंगे उनके लिए।

गांधी की आशंकाएँ निराधार नहीं थीं। उनका अनशन समाप्त ही हुआ था कि पूना समझौते में फेरबदल की माँगें होने लगीं। कहा जाने लगा कि रैम्जे मैकडॉनल्ड की प्रस्तावित योजना में दलितों को जितना मिलना था उससे ज्यादा पूना समझौते में दिया गया,उतना ज्यादा देना जरूरी नहीं था। ध्यान देने की बात यह है कि दलितों के लिए आरक्षित प्रतिनिधित्व के अनुपात को अधिक बता कर उठाई जाने वाली आपत्तियाँ उस भावना के ठीक विपरीत थीं जिसको आधार बना कर गांधी दलितों की समस्या का समाधान करना चाह रहे थे।

गांधी मानते थे कि यदि समाज किसी पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने का औचित्य स्वीकार कर लेता है तो आरक्षण की मात्रा का फैसला उस पिछड़े वर्ग पर छोड़ देना चाहिए। दरअसल पूना समझौते के मुताबिक दलितों को जितना आरक्षण मिला वह न केवल मैकडॉनल्ड के प्रस्तावित अनुपात से बल्कि उससे भी अधिक था जितने की माँग आंबेडकर कर रहे थे।

यर्वदा जेल में किया गया गांधी का आमरण अनशन सतही तौर पर भले ही मैकडॉनल्ड योजना के खिलाफ रहा हो, उसकी प्रेरक शक्ति बहुत विशाल थी। वह थी गांधी की अदम्य इच्छा कि हिंदू समाज में अस्पृश्यता का नामोनिशान तक न रहे। उनका लक्ष्य सिर्फ यह नहीं था कि दलितों को हिंदू समाज से अलग न होने दिया जाय। उनका लक्ष्य था कि लोगों, ‘सवर्ण और दलित दोनों ही’ के दिलों में गहरे पैठी अस्पृश्यता समाप्त हो जाए। इसको हासिल करने के लिए दलितों की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति में तेजी से बदलाव तो जरूरी था ही, साथ ही यह भी जरूरी था कि सवर्ण हिंदू दलितों पर सदियों से हो रहे अन्याय और अत्याचार का पश्चात्ताप स्वरूप, प्रतिकार करें।

इस भावना से प्रेरित अनशन में किसी ओछे वर्गीय हिसाब किताब या जनसंख्या के आकड़ों से निकाले गए दशमलवीय अनुपातों की गुंजाइश नहीं थी।

गांधी के आमरण अनशन से उत्पन्न संकट के उन छः नाजुक दिनों में यदि किसी एक व्यक्ति की सबसे अधिक निर्णायक भूमिका रही तो वह आंबेडकर थे। इस अनशन से वह किस कदर क्षुब्ध हो गए थे उसका अंदाजा केवल एक वाक्य से लग जाता है। समझौते के लिए चल रही जीतोड़ कोशिशों की सफलता के लिए जरूरी समझा गया कि आंबेडकर और गांधी आपस में बैठ कर बात करें। आंबेडकर यर्वदा जेल में गांधी से मिलने को तैयार हो गए। वहाँ पहुँचते ही उन्होंने गांधी से कहा, ‘महात्माजी, यू हैव बीन वैरी अनफेअर टू अस।’ (महात्माजी, आप ने हमारे साथ बड़ा अन्याय किया है।)

देने को तो गांधी ने तपाक से जवाब दे दिया, ‘मैं क्या करूँ मेरे साथ हमेशा यही होता है कि मैं अन्याय करता दिखता हूँ!’ पर यह कोई ऐसा जवाब नहीं था जिससे आंबेडकर की मनःस्थिति में कोई अंतर आता। बातचीत के दौरान वह जोर से कहते रहे ‘मैं अपना मुआवजा चाहता हूँ।’ मुआवजा, मतलब यह कि पृथक निर्वाचन, जिसमें केवल दलित चुनाव करेंगे अपने प्रतिनिधियों का, से होने वाले संभावित लाभ को छोड़ने की एवज संयुक्त, यद्यपि दलितों के लिए आरक्षित, निर्वाचन में दलितों का आरक्षण बढ़ा दिया जाए। गांधी ने अब जो कहा वह वास्तव में आंबेडकर के क्षुब्ध मन को आश्वस्त करने वाली बात थी। उन्होंने कहा, ‘आप जो बातें कह रहे हैं उनमें से ज्यादातर से मैं सहमत हूँ।’ साथ ही, बातचीत के दौरान गांधी को लगा कि आंबेडकर जितना चाह रहे हैं उतना कहने में हिचकिचा रहे हैं, सो उन्होंने खुद ही अतिरिक्त आरक्षण की तजवीज कर दी। (देखिए, प्यारेलाल, द एपिक फास्ट, अहमदाबाद, 1932, पृ. 59)

जाहिर है पूना समझौता गांधी के लिए कोई राजनैतिक रस्साकशी नहीं थी। वह चाह रहे थे कि उनके अनशन से दलित और सवर्ण दोनों में ही परस्पर एक नए विश्वास और सौहार्द का प्रस्फुटन हो। ऐसा न होने की स्थिति में, राजनैतिक समझौते के बावजूद,उनका अनशन असफल ही होता उनकी दृष्टि में। और उस स्थिति में एक नया प्रयत्न, एक प्रायश्चित्त, अनिवार्य हो जाता उनके लिए। इसी कारण उन्होंने अनशन समाप्त करते वक्त चेतावनी दे दी उसको, जरूरी होने पर फिर से करने की।

सवर्ण हिंदुओं ने जिस तरह इस मुद्दे पर गांधी के आमरण अनशन का समर्थन किया और जिस तेजी से पूना समझौते की भावना को भुला कर उसके संशोधन की माँग जोर पकड़ने लगी उससे स्पष्ट हो जाता है कि उनके और गांधी के सोचने में कितना बुनियादी फर्क था। चाहे वे आधुनिक विचारों वाले हों या कट्टर सनातनपंथी, अधिकतर हिंदू गांधी के साथ आ खड़े हुए थे अपने समाज को विघटन से बचाने के लिए। उनको वह विघटन विघटन ही नहीं लगता था जो अस्पृश्यता के कारण हो रहा था। वह गांधी के इस विचार को नहीं समझ सकते थे कि अस्पृश्यता न मिटी तो हिंदू धर्म और संस्कृति का विनाश निश्चित है।

इसका सबसे नाटकीय उदाहरण मिलता है रवींद्रनाथ टैगोर में। आमरण अनशन का निश्चय कर लेने के बाद गांधी ने कुछ विशेष व्यक्तियों को पत्र लिख कर उनके आर्शीवाद की याचना की, बशर्ते कि वे इस विषय में गांधी से सहमत हों। एक लंबे उछाह भरे तार में टैगोर ने गांधी से कहा कि, ‘देश की एकता और सामाजिक समग्रता की खातिर एक बहुमूल्य जीवन की कुर्बानी उचित ही होगी। वह समझ नहीं सकते थे कि देश के शासक समझ भी पाएँगे या नहीं कि देश के लोगों के लिए इसका क्या महत्व है। लेकिन उनको पूरी आशा थी कि देशवासियों की आत्मा पर इतनी बड़ी कुर्बानी के निश्चय का सही असर होगा। साथ ही उन्हें विश्वास था कि इस संभावित राष्ट्रीय ट्रैजिडी को उसकी तार्किक परिणति से पहले ही रोक दिया जाएगा। ‘हमारे शोकित हृदय’, टैगोर ने लिखा, श्रद्धा और प्रेम से इस प्रायश्चित्त में आपके साथ होंगे।'

यही नहीं, टैगोर पूना के लिए चल दिए। संयोग से वह 26 सितंबर को वहाँ पहुँचे जिस दिन अनशन समाप्त होना था। यर्वदा जेल पहुँच कर टैगोर सात दिन के उपवास से क्लांत गांधी के सीने में अपना मुँह रख पाटी पर थोड़ी देर बैठे रहे। बाद में अनशन की समाप्ति से पहले हुई प्रार्थना सभा में टैगोर ने अपना एक गीत भी गाया।

टैगोर इस समय बिल्कुल अभिभूत थे गांधी से। चार दिन बाद शांतिनिकेतन वापस पहुँच कर उन्होंने ‘महात्मा जी’ को लिखा,‘इन चंद दिनों में, असंभव के संभव हो जाने से हमारे लोग आश्चर्यचकित हैं और चारों ओर जबरदस्त राहत की भावना है कि आपका जीवन हमारे लिए बच गया है।’ जेल के अंदर बैठे बैठे जो चमत्कार गांधी ने कर दिया था देश की एकता और सामाजिक समग्रता के संरक्षण का, उससे उत्साहित हो टैगोर ने कहा कि यही उपयुक्त अवसर होगा कि गांधी हिंदुओं को आदेश दें मुसलमानों का दिल जीत कर एकजुट काम करने का। यह काम, टैगोर ने लिखा, अस्पृश्यता निवारण के अभियान से कहीं ज्यादा दुष्कर होगा। ‘चूंकि हमारे बहुत सारे लोगों में मुसलमानों के खिलाफ गहरा विद्वेष है और वह भी हमें कोई ज्यादा प्रेम नहीं करते।’ गांधी अकेले व्यक्ति थे जिनसे यह कठिन काम सध सकता था। ‘आप जानते हैं कि कैसे उनके दिल पिघलाए जाएँ जो हठी हैं, और केवल आप में धीरज वाला वह प्रेम है जो सदियों से जमा हो रही घृणा पर जीत पा ले।’

इसी के साथ टैगोर ने एक ऐसी बात कही जिसका महत्व अभी थोड़ी देर में जाहिर होगा। उन्होंने लिखा, ‘मैं नहीं जानता हूँ कि राजनैतिक परिणामों को कैसे आँका जाए, पर मैं मानता हूँ कि ऐसी कोई चीज बहुत महँगी नहीं होगी जिससे हम उनका (मुसलमानों का) विश्वास हासिल कर सकें और उन्हें यकीन करा सकें कि हम उनकी मुश्किलें और उनका दृष्टिकोण समझते हैं। वैसे मैं आप को राय देने के लायक नहीं हूँ और इस संबंध में आप जो भी करना मुनासिब समझेंगे वह ठीक होगा।’

यही टैगोर पूना समझौते की खुल कर आलोचना करने लगे जब बंगाल में सवर्ण हिंदुओं ने दावा किया कि इस समझौते में बंगाल के हितों को अनदेखा कर दिया गया है। इस संबंध में गांधी से कोई बात किए बगैर उन्होंने एक वक्तव्य जारी करते हुए कहा कि पूना समझौता देश के ‘स्थायी हितों' के लिए हानिकर है। उन्होंने अंग्रेजी सरकार और भारतीय नेताओं दोनों की भर्त्सना करते हुए कहा कि कोई भी इस अनिष्टकारी समझौते में संशोधन के लिए तैयार नहीं था। टैगोर किस हद तक पूना समझौते से अपने को अलग कर उसकी आलोचना कर रहे थे, यह सर नृपेंद्रनाथ सरकार को भेजे गए उनके लंबे तार से समझा जा सकता है। उस तार के कुछ अंश इस प्र्रकार हैं, ‘उस क्षण एक ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी गई थी जो अत्यंत ही दुःखद थी, क्योंकि तब हमारे लिए न तो कोई समय बचा था और न मानसिक शांति की ही गुंजाइश थी कि हम पूना समझौते के संभावी नतीजों पर शांतिपूर्वक विचार कर सकते। वह तो मेरे पहुँचने से पहले ही... अन्य सदस्यों की सहायता से, जिनमें बंगाल का एक भी उत्तरदायी प्रतिनिधि नहीं था, कार्यान्वित किया जा चुका था। इस प्रश्न के शीघ्र समाधान पर ही तब महात्मा जी का जीवन निर्भर था और ऐसे संकट से उत्पन्न असह्य चिंता के कारण मैंने हड़बड़ी में एक ऐसा वादा कर लिया जो, अब मुझे महसूस हो रहा है, देश के स्थायी हित के विरुद्ध था। राजनैतिक दाँवपेंच का कोई अनुभव न होने और महात्मा जी के प्रति अगाध प्रेम और भारतीय राजनीति के विषय में उनकी बुद्धिमता में पूर्ण आस्था होने के कारण, मैं और अधिक विचार विमर्श के लिए प्रतीक्षा नहीं कर सका और इस बात पर ध्यान नहीं दे सका कि बंगाल के मामले में न्याय की हत्या की गई है। अब मुझे जरा भी संदेह नहीं है कि इस प्रकार का अन्याय सभी दलों के लिए अहितकर होगा,जिससे हमारे प्रांत में तीव्र सांप्रदायिक कलह की मनोवृत्ति बराबर बनी रहेगी। फलस्वरूप, शांतिपूर्ण सरकार बनाना हमेशा के लिए दुष्कर हो जाएगा। मुझे इससे न तो कोई अधिक आश्चर्य हो रहा है और न बहुत दुःख कि ब्रिटिश सरकार के मंत्री इस विषय पर... विचार करने के लिए कतई राजी नहीं हैं...। कारण, क्या ये वही लोग नहीं हैं जो बार बार उस दुर्दिन की भविष्यवाणी करते अघाते नहीं थे जब हम भाई भाई बिना उनकी मदद के आपस में लड़ेंगे...। इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि वे आज सांप्रदायिक मेलमिलाप के मार्ग को सुगम बनाने में हमारी मदद करने में कतई उत्साह न दिखाएँ। लेकिन सम्मेलन के अन्य प्रांतों के भारतीय सदस्यों का बंगाल के दुर्भाग्य के प्रति न केवल उदासीन रहना बल्कि उसको बदतर बनाने में उत्साहपूर्वक भाग लेना एक भयानक अपशकुन है, जो हमारे भावी इतिहास के लिए किसी शुभ का सूचक नहीं है।’

टैगोर, जो मानते थे कि राजनैतिक परिणामों का लेखा जोखा करने वाला दिमाग उनके पास नहीं है, अब बगैर किसी संदेह के जान और कह रहे थे कि पूना समझौता न केवल बंगाल वरन देश के लिए अहितकारी था। टैगोर, जो बगैर कीमत की परवाह किए गांधी से सदियों पुराना हिंदू मुस्लिम विद्वेष समाप्त करने का आह्‌वान कर रहे थे, अब विचलित थे कि दलितों को अतिरिक्त आरक्षण मिल गया है।

अपनी सारी महानता और मानवता के बावजूद, इस वक्त टैगोर जाने अनजाने एक संकीर्ण मानसिकता का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। दलितों के संदर्भ में यह मानसिकता ‘सवर्ण हिंदू’ मानसिकता थी, और मुसलमानों के संदर्भ में ‘हिंदू’। टैगोर की भाषा, उनके भावबोध में, सतत एक ‘हम’ है, जिसका अर्थ प्रसंगानुसार बदलता रहता है। दलितों की समस्या पर विचार करते समय यह हम सवर्ण हिंदू का हम है, और मुसलमानों की समस्या पर विचार करते समय ‘हिंदू’ का।

और दोनों ही स्थितियों में यही हम है जो ‘भारत’ व भारतीय का द्योतक होता है। ध्यान दें कि मैकडॉनल्ड की प्रस्तावित योजना, जिसके अनुसार दलितों को पृथक निर्वाचन मिलने जा रहा था, टैगोर की भाषा में घातक है देश की एकता और सामाजिक समग्रता के लिए, मात्र हिंदू समाज की एकता और समग्रता के लिए नहीं।

टैगोर ने जरूरी नहीं समझा गांधी से इतने अहम मसले पर बात करना। पर गांधी ने अखबार में टैगोर द्वारा की गई आलोचना पढ़ कर जरूरी समझा उनको जवाब देना। असल में टैगोर से पहले भी लोगों ने गांधी और पूना समझौते के खिलाफ बोलते हुए यह तर्क दिया था कि गांधी की जान बचाने की विवशता में उन्हें वह करना पड़ा था जो गलत था। मई 1933 के उपवास का फैसला करने से पहले ही गांधी ने इस तरह की आलोचना का दो टूक उत्तर देते हुए, और बंगाल से हो रही तीव्र आलोचना का उल्लेख करते हुए कहा था, ‘मैंने अपना जीवन इसलिए नहीं दाँव पर लगाया था कि किसी को विवश करूँ और कुछ भी गलत करने के लिए उन पर दबाव डालूँ। इस प्रश्न पर बात करने का सही तरीका यह नहीं है कि अनशन को विवाद में घसीटा जाए, बल्कि दिखाया जाए कि (पूना) समझौता अपने आप में राजनैतिक या नैतिक स्तर पर गलत है। जब संतोषप्रद तरीके से ऐसा दिखा दिया जाएगा तब समझौते पर गंभीरता से पुनर्विचार करने का वक्त होगा।’

टैगोर को गांधी ने लिखा, ‘यह जान कर मुझे गहरा दुःख हुआ है कि मेरे प्रति अगाध स्नेह और मेरी निर्णय क्षमता में विश्वास के कारण बहक कर आपने एक ऐसे समझौते का समर्थन कर दिया जो कि पता लगा बंगाल के लिए अन्यायकारी है। मेरा अब यह कहना व्यर्थ है कि मेरे प्रति स्नेह से आपका निर्णय प्रभावित नहीं होना चाहिए था, या यह कि मेरी निर्णय क्षमता के प्रभाव में आपको एक ऐसा समझौता मान नहीं लेना चाहिए था जिसके बारे में अपना स्वतंत्र निर्णय करने के साधन आपको उपलब्ध थे...। वैसे मैं बिल्कुल भी नहीं मानता कि कोई गलती हुई है।’

यद्यपि गांधी का यह पत्र मई 1933 के 21 दिवसीय उपवास के बाद लिखा गया था, मैंने यहाँ पर इसका जिक्र यह दर्शाने को किया है कि जब टैगोर जैसे संवेदनशील महापुरुष, जो राष्ट्रवाद समेत हर संकीर्ण विचार के, बौद्धिक स्तर पर, प्रबल विरोधी थे, को पूना समझौते से इतनी जबरदस्त परेशानी हो गई, तो सामान्य सवर्ण हिंदुओं की मनःस्थिति इसको ले कर क्या रही होगी। उनका सारा जोश, सारा उत्साह, गांधी के प्रति श्रद्धा का उफान अपने चरम पर थे जब तक हिंदू समाज, देश, के विखंडन का खतरा सामने था। उस वक्त गांधी की कुर्बानी की अहमियत थी। पर संकट टलते ही गांधी का आमरण अनशन कुर्बानी के बजाय नैतिक दबाव के रूप में दिखाई पड़ने लगा।

गांधी ने चाहा था सवर्ण हिंदुओं की तरफ से सामूहिक पश्चात्ताप, और दलितों के साथ होते रहे अन्याय का अंत। अपने अनशन की सफलता के बारे में जितने भी आशंकित रहे हों वह, पूना समझौता उनके लिए कोई विवशता का परिणाम नहीं था। इसमें कुछ हृदय परिवर्तन भी सवर्ण हिंदुओं का उनको दिखाई पड़ रहा था। पर समझौते के फौरन बाद उठ खड़ी आलोचना ने और उसके पीछे छिपे ढोंगीपन ने उनको विचलित कर दिया।

आमरण अनशन के समय उन्हें यकीन था कि उन्होंने दलितों के साथ कोई अन्याय नहीं किया है। पर अब वह समझ पा रहे थे कि वह दलितों को न्याय नहीं दिला सके हैं। दिनों दिन उनको दर्शन होने लगे सवर्ण हिंदुओं की दलितों के प्रति संवेदनहीनता और क्रूरता के।

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ऐसी विचलित दशा में थे गांधी जब उस रहस्यमयी आवाज ने आधी रात में उन्हें जगा कर 21 दिन के उपवास का आदेश दिया। इस घटना के एक दिन बाद, 30 अप्रैल को, गांधी ने एक विस्तृत वक्तव्य जारी किया जिससे उनके उपवास के ‘पवित्र’ कारणों का खासा अंदाजा हो जाता है। उन्होंने कहा, ‘कुछ दिनों से मेरे अंतर में एक तूफान उठ रहा है। मैं उसके विरुद्ध संघर्ष करता रहा हूँ...।

‘जब मैं बिल्कुल हाल के अतीत पर दृष्टि डालता हूँ तो बहुत से ऐसे कारण मिलते हैं जिन्होंने इस उपवास को उकसाया होगा।... वे सब महान हरिजन ध्येय से जुड़े हैं।...

‘यह बुराई जितनी मैंने सोची थी उससे बहुत ज्यादा बड़ी है। यह हरिजनों को धन, बाह्य संगठन और आंतरिक शक्ति देने से भी दूर नहीं होगी, यद्यपि ये तीनों चीजें आवश्यक हैं। परंतु, कारगर होने के लिए, ये आंतरिक संपदा, आंतरिक संगठन और आंतरिक शक्ति,दूसरे शब्दों में आत्मशुद्धि, के बाद या कम से कम साथ होनी चाहिए। वह उपवास और प्रार्थना से ही हो सकती है। शक्ति के अंहकार से हम सत्यरूपी परमेश्वर के पास पहुँच नहीं सकते,पर दुर्बल और असहाय की विनम्रता से पहुँच सकते हैं।’

यहाँ हम देख सकते हैं कि एक ठोस, विकट समस्या पर रोजमर्रा की आसानी से समझ में आने वाली भाषा में बात करते करते अचानक गांधी किसी दूसरे ही धरातल पर पहुँच जाते हैं और एक ऐसी भाषा बोलने लगते हैं जो सामान्य ज्ञान और तर्क से हट कर किसी गहरी आस्था से जुड़ी होती है। इस भाषा को पूरी तरह समझ पाना कम से कम उस सामान्य ज्ञान और तर्क के धरातल पर रहने वाले हम जैसों के लिए, काफी कठिन है।

फिर भी अगर हम बहुत उतावली में नहीं हैं तो, और गांधी का इतना महत्व तो है ही कि हम धीरज धर उनकी भाषा और उनके अर्थ को समझने का थोड़ा प्रयास करें, इतना महसूस जरूर होता है कि गांधी समस्या की तह में जा रहे हैं। तह में जाने पर समस्या केवल राजनैतिक नहीं रह जाती। न ही, परिणामतः, उसका कोई मात्रा राजनैतिक समाधान समुचित समाधान हो सकता है। इस अमानवीय विभाजन रेखा के दोनों ओर जीने वाले लोगों के मानस न बदले तो कुछ भी न हो सकेगा। समस्या और विकराल हो जाएगी।

मई 1933 का उपवास गांधी के हरिजन आंदोलन से प्रेरित था और उनका हरिजन आंदोलन, मैं अपनी भाषा में कहता तो यहाँ ‘केवल’ जोड़ता ‘राजनैतिक’ आंदोलन नहीं था। जैसा कि उन्होंने अपने 30 अप्रैल के वक्तव्य में कहा, ‘मैं जानता हूँ कि मेरे बहुत से सनातनी मित्रों और अन्य लोगों के खयाल में यह आंदोलन एक गहरी राजनैतिक चाल है। मेरी बड़ी इच्छा है कि यह उपवास उन्हें यह विश्वास दिला दे कि यह विशुद्ध धार्मिक आंदोलन है।’

वक्तव्य के अंत में गांधी ने कहा, ‘अपने सनातनी मित्रों से मैं यह कहना चाहूँगा कि वे यह प्रार्थना करें कि इस उपवास का मेरे लिए चाहे कुछ भी परिणाम हो, पर सत्य पर जो स्वर्णिम आवरण पड़ा है वह हट जाय।’

हालांकि ‘सनातनी मित्रों’ के साथ साथ गांधी ने ‘अन्य लोगों’ को भी जोड़ दिया था, अपने उपवास की पवित्रता को न समझे,या गलत समझे, जाने को ले कर लगता है कि उनकी आशंका प्रधानत: सनातनी हिंदुओं से ही थी। उनका यह अनुमान सरासर गलत साबित हुआ। सरदार पटेल जैसे कतिपय अपवादों को छोड़ कर गांधी के निकटतम प्रिय सहयोगियों तक को इस उपवास का विचार अनावश्यक, निरर्थक, विचित्र या आपत्तिजनक और हानिकारक लगा।

पटेल, जो गांधी के साथ ही उस समय यर्वदा जेल ‘यर्वदा मंदिर कहते थे जेल को वह’ में थे, पूरी तरह से गांधी की विवशता अर्थात घोषित 21 दिवसीय उपवास की अनिवार्यता, समझ रहे थे। वह बुरी तरह से घबराए हुए थे कि गांधी इतने लंबे उपवास के अंत तक जीवित नहीं रह सकेंगे। पर जानते थे कि ‘बापू’ के पास कोई और विकल्प नहीं बचा था। उन्होंने ‘गांधी ने’ न केवल साफ साफ कह दिया था कि पूना समझौते की शर्तों या भावना को सही तरह से न माना गया तो वह अपना 26 सितंबर को स्थगित किया अनशन पुनः शुरू कर देंगे। उन्होंने बार बार मर्मांतक अपीलें की थीं देशवासियों से कि अस्पृश्यता का कलंक वे समाप्त कर दें। ऐसी ही एक अपील में गांधी ने कहा था, ‘सरकार अब इस मसले के बाहर है। उसने फुर्ती से अपना दायित्व निभा दिया है। यर्वदा पूना समझौते की प्रमुख शर्तों को अमल में लाने का काम तो उन करोड़ों लोगों, तथाकथित सवर्ण हिंदुओं को करना है जो (अनशन के दौरान) सभाओं में टूटे पड़ते थे। अब उन लोगों को अपने दलित भाइयों और बहनों को गले लगाना है, उनको अपने मंदिरों, घरों और विद्यालयों में बुलाना है। गाँवों में बसने वाले ‘अछूतों’ को अब महसूस कराना है कि वे किसी भी तरह से निकृष्ट नहीं हैं गाँव में रहने वाले अपने दूसरे भाइयों से, कि उनकी जंजीरें टूट गई हैं, कि वे उसी ईश्वर के उपासक हैं जिसके बाकी गाँववासी हैं, और उनको भी वही अधिकार और विशेषाधिकार प्राप्त हैं जो औरों को हैं। लेकिन अगर समझौते की इन शर्तों को सवर्ण हिंदू अमल में नहीं लाते तो क्या मैं ईश्वर और मानव को अपना मुँह दिखाने को जीवित रह सकूँगा?...

‘यर्वदा समझौते की शर्तों की अनदेखी करना हिंदू धर्म के प्रति विश्वासघात होगा। मैं उसका जीवित साक्षी नहीं बनना चाहूँगा।’

सात महीने तक गांधी अपना दर्द बखानते रहे। व्यर्थ ही पुकारते रहे वह लोगों को कि उनकी ‘आत्मा की वेदना’ सुनें वे। कि उस वेदना और उससे जुड़ी शर्म के साझीदार बनें और अपना सहकार दें अस्पृश्यता निवारण में।

पटेल ने देखा और समझा यह। उन्होंने वह ‘झूठ और धोखा’ भी देखा जो हिंदू धर्म के नाम पर किया जा रहा था पूना समझौते के विरुद्ध प्रचार करने के लिए। ‘ऐसी परिस्थितियों में’ पटेल ने पूछा, ‘बापू कब तक उदासीन रह सकते थे? करोड़ों दरिद्र हरिजनों से किया गया उनका वादा खतरे में है। क्या आप धर्म को सुधारने का कोई और तरीका सोच सकते हैं, और अगर कोई और तरीका नहीं है तो उन (गांधी) जैसा आदमी क्या करे जिसके लिए धर्म जीवन से ज्यादा मूल्यवान है?'

पटेल की ही तरह सी.एफ. एंड्रूज और रोमा रोलाँ ने भी गांधी की वेदना और इस उपवास की अनिवार्यता को समझा। रोमा रोलाँ ने लिख भेजा : ‘सदा साथ’। एंड्रूज का संदेश था,‘मानता हूँ और समझता भी हूँ।’

इनके बरक्स चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, जिनको गांधी अपनी आत्मा का रखवाला मानते थे और जो अपनी आधुनिक शिक्षा के बावजूद हिंदू धर्म और संस्कृति में पगे हुए थे, इस उपवास को एक ऐसी भूल मान रहे थे जिससे कोई भी अच्छाई निकलने वाली नहीं थी। वह यह मानने की ‘मूर्खता’ करने को तैयार नहीं थे कि गांधी 21 दिन के उपवास में जिंदा बच सकेंगे। और अगर वह भयंकर घटना घटित हो ही गई तो उसके परिणामस्वरूप न केवल देश की प्रगति को धक्का पहुँचेगा, बल्कि हरिजनों की प्रगति भी डाँवाडोल हो जाएगी। 30 अप्रैल के अपने वक्तव्य में गांधी ने बहुत ही स्पष्ट तरीके से कह दिया था, ‘मित्रों से यह प्रार्थना करना, मुझे आशा है,आवश्यक नहीं है कि वे मुझसे इस आने वाले उपवास को स्थगित करने, छोड़ने या इसमें किसी तरह का कोई परिवर्तन करने का आग्रह नहीं करेंगे। वे मेरी इस बात पर विश्वास करें कि यह उपवास... शब्दशः स्वयं आया है। इसलिए भारत और संसार भर के मित्रों से मेरा कहना है कि वे मेरे साथ ईश्वर से प्रार्थना करें कि मैं इस अग्निपरीक्षा में पूरा उतरूँ, और मैं चाहे जिंदा रहूँ या मर जाऊँ जिस ध्येय के लिए उपवास किया जाना है वह फले फूले।’

इस स्पष्ट आग्रह के बावजूद राजाजी विशेष रूप से गांधी को इस उपवास से रोकने के लिए पूना गए और देर तक उनसे बहस करते रहे। बहस के दौरान राजाजी ने इस तर्क पर बहुत जोर दिया कि आत्महत्या हिंदू धर्म में अमान्य है। गांधी यह मानने को तैयार नहीं थे क्योंकि महादेव देसाई ने उनको गंगा में डूब मरने की प्रथा के बारे में बताया था। राजाजी का यह भी कहना था कि उपवास के आठ दस दिनों के अंदर गांधी इतने क्षीण हो जाएँगे कि उनमें सही गलत का विवेक नहीं बचेगा। इस पर अनशन के आचार्य गांधी का जवाब था, ‘ इससे पहले तो मैं ऐसा कर पाया हूँ। शुद्ध उपवास में विचार ज्यादा पवित्र हो जाते हैं।’

गांधी को उपवास से रोकने को व्याकुल राजाजी ने तब कहा, ‘यदि मृत्यु की संभावना अस्सी प्रतिशत हो तब तो यह जुआ कहा जाएगा। आप कहेंगे कि यह एक अच्छा जुआ है। मुझे ऐसा लगता है कि जेल में रहते हुए आप के मन में यही एक बात घूमती रही है और उसका परिणाम यह हुआ है कि आपको तारतम्य का कोई बोध नहीं रह गया है। आपके मन में नए नए प्रयोग करने का बड़ा उत्साह है। इस उपवास में आप मृत्यु के साथ प्रयोग कर रहे हैं और मैं मानता हूँ कि गलत राह पर जा रहे हैं। अब मुझे कोई ऐसा आदमी बताइये जिसने आपके इस कदम को पसंद किया हो।’

जब जवाब में गांधी ने एंड्रूज का नाम लिया तो राजाजी बोले, ‘एंड्रूज को तो कमरे का ताला लगाना तक नहीं आता और वे जिंदगी में ताला लगाने की बात कर रहे हैं। और आप भी ईश्वर के कानून को पूरी तरह जानने का दावा कैसे कर सकते हैं? मैं तो आपसे कहूँगा कि आप ज्यादा सावधान हो जाएँ। यह तो संभव है कि किसी बार ईश्वर की प्रेरणा स्पष्ट रूप से मिल जाय, किंतु हमेशा नहीं मिल सकती।’

संभव है कि राजाजी मन में जानते रहे हों कि उनकी दलीलें बौद्धिक थीं, एक हद तक सतही भी, और उनका मकसद था किसी तरह से गांधी को इस आत्मघाती कदम से रोक देना। फिर भी यह तथ्य तो अपनी जगह है ही कि चंद व्यक्तियों को छोड़ सारे लोग गांधी को गलत मान रहे थे। कैसा भयानक अकेलापन रहा होगा गांधी का उस समय? और कैसी नैतिक चेतना और मानसिक बनावट रही होगी लोगों की कि जो गांधी चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे अपने व्यथित हृदय की गहराइयों से वह पटेल या एंड्रूज या रोमा रोलाँ या डंकन जैसों के अलावा किसी को सुनाई ही नहीं दे रहा था?

जो भी हो, राजाजी से अंत में गांधी ने विनती की, ‘बुद्धि में जो मुझसे बहुत ज्यादा हैं उनके साथ मैं कैसे टिक सकता हूँ?किंतु जहाँ सवाल हृदय की प्रतीति का है वहाँ मैं उनके विरुद्ध खड़ा रह सकता हूँ। क्योंकि उसमें संस्कृत भाषा के गहरे ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। गरीबों के सौभाग्य से ईश्वर का निवास हृदय में है और मैं यह उपवास हृदय की शुद्धि के लिए ही कर रहा हूँ...। अपने हृदय में मैं जिस चीज का अनुभव कर रहा हूँ उसका आदर आपको करना ही चाहिए। आप तो मुझसे अपने हृदय की प्रतीति की अवज्ञा करने को कह रहे हैं। मेरे साथ लड़िए, दलील कीजिए। यह संभव है कि मुझसे भूल हो रही हो। किंतु आप तो मुझसे ऐसी वस्तु को निश्चित रूप से मानने के लिए कह रहे हैं जो शक्य तो है पर निश्चित नहीं है। इस उपवास का परिणाम मेरी मृत्यु होगा, इस बात को अगर मैं निश्चयपूर्वक जानते हुए उपवास कर रहा हूँ तो मैं झूठा हूँ। जब तक आप मेरी कही हुई बातों के आधार पर मुझे इस बात का यकीन नहीं दिला देते कि मैं भूल कर रहा हूँ तब तक आपको मेरे विश्वास को डिगाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति ईश्वर जैसी निश्चितता प्राप्त नहीं कर सकता। किंतु अपनी नौका का कर्णधार तो मैं ही हो सकता हूँ न?’

वैसे तो गांधी की उपवास की पूरी परिकल्पना शुद्धि पर आधारित थी, ‘शुद्धि अपनी और दूसरों की’ लेकिन इस उपवास के मर्म में जैसी विशुद्ध शुद्धि थी शायद किसी और उपवास में नहीं थी। मैं यहाँ केवल उन उपवासों की बात कर रहा हूँ जो किसी सार्वजनिक समस्या से जुड़े थे।

इस उपवास की कोई शर्त नहीं थी जो दूसरों पर किसी तरह का दबाव डाले। यह एक निर्धारित अवधि के लिए था और इसका अंत किसी पूर्व घोषित उद्देश्य के पूरा होने से नत्थी नहीं था। इस उपवास में पूरी तरह से इस संभावना ‘खतरे’ को निकाल दिया गया था कि लोग गांधी को बचाने के लिए उमड़ पड़ें, उन्हें बचाने के लिए सहर्ष या मजबूरन वह कर बैठें जो सामान्य परिस्थितियों में कभी न करते, और बाद में ऐसा करवा देने के लिए गांधी को कोसें।

सितंबर 1932 वाला आमरण अनशन समाप्त करते वक्त गांधी ने जो सार्वजनिक चेतावनी दी थी उसमें बहुत ही साफ तरीके से कहा था कि अगर उन्हें फिर से अनशन करना पड़ा तो वह उन पर दबाव डालने के लिए नहीं होगा जो सुधार के विरोधी हैं। वह अनशन होगा उनको कर्म के लिए उकसाने को जो या तो सहकर्मी हैं या अस्पृश्यता के अंत की प्रतिज्ञा में सहभागी हैं। और अब जब कि फिर उपवास का समय आ गया तो अपने 30 अप्रैल के वक्तव्य में पुनः गांधी ने जोर दे कर कहा कि यह उपवास आत्मशुद्धि के लिए और उनकी शुद्धि के लिए है जो हरिजन आंदोलन के समर्थक हैं। 8 मई को भी, उपवास प्रारंभ करते समय, गांधी ने एक अन्य वक्तव्य में कहा, ‘हरिजन सेवा एक ऐसा कर्तव्य है जो सवर्णों पर कर्ज की तरह चढ़ा हुआ है। अपने ही सगों के प्रति किए गए अत्याचारों के लिए इन्हें अब प्रायश्चित्त करना होगा। हरिजन सेवा उसी प्रायश्चित्त का अंग है।...

‘सनातनियों को तो मेरे इस उपवास में भी दबाव की गंध आई है, जबकि वे जानते हैं कि हरेक मंदिर खोल दिया जाए और अस्पृश्यता जड़ से उखाड़ कर फेक दी जाए तो भी यह अनशन अपनी अवधि के पहले भंग नहीं किया जा सकता। दिल से तो शायद वे भी अनुभव करेंगे कि इस अनशन में दबाव डालने जैसी कोई भी बात नहीं है। यह अनशन तो कटुता हटाने, हृदय शुद्ध करने और यह स्पष्ट कर देने के लिए किया गया है कि हरिजन आंदोलन एक बिल्कुल धार्मिक आंदोलन है और उसका संचालन सर्वथा धार्मिक लोगों के द्वारा ही किया जाना चाहिए। ईश्वर इस अग्निपरीक्षा को सफल करे और इसका उद्देश्य पूर्ण करे।’

गांधी की इस वक्त की बेचारगी बार बार उसी बात पर जोर देने वाले उनके वक्तव्यों से झलकती है। इसी दौरान अनेक व्यक्तियों को लिखे गए उनके पत्रों में भी वही झलक है। लगता है, हताशा से अपने को किसी तरह रोके, वह चाह रहे हैं कि किसी तरह तो लोग समझें वह क्या करना चाह रहे हैं। कभी कभी तो इस कोशिश को करते वक्त ही इसकी असफलता का ज्ञान रहता है उन्हें, पर हारते नहीं वह। इस बेचारगी की दयनीयता, ‘यदि यह सही शब्द है गांधी के संदर्भ में’ कहीं ऐसे नहीं उजागर होती जैसे अपने ‘प्रिय जवाहर, को लिखे उनके पत्र और ‘जवाहर’ के जवाब में। गांधी के इस पत्र से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जब वह ‘धर्म’ और ‘धार्मिक’ की बात करते हैं तो किसी धर्म विशेष की कोई संकीर्ण छवि उनके मन में नहीं होती। उपवास का निर्णय हो जाने के दो दिन बाद लिखे गए पत्र में गांधी कहते हैं, ‘जब मैं आने वाले उपवास से जूझ रहा था तब मानो सशरीर तुम मेरे सामने थे। पर कोई लाभ नहीं हुआ। हरिजन आंदोलन निरे बौद्धिक प्रयत्न के लिए बहुत बड़ा काम है। सारे संसार में इतनी बुरी चीज और कोई नहीं है। फिर भी मैं धर्म को, और इसलिए हिंदुत्व को छोड़ नहीं सकता। हिंदू धर्म से मैं अगर निराश हो जाऊँ तो मेरा जीवन मेरे लिए एक बोझ बन जाएगा। हिंदुत्व की मार्फत मैं ईसाई, इस्लाम और दूसरे धर्मों से प्रेम करता हूँ। वह छीन लिया जाए तो मेरे पास बचता ही क्या है?लेकिन मैं इसे छुआछूत और ऊँच नीच की मान्यता के रहते सहन नहीं कर सकता। सौभाग्य से हिंदू धर्म में इस बुराई का रामबाण इलाज भी है। मैंने उसी इलाज का प्रयोग किया है। संभव हो तो मैं तुम्हें यह महसूस कराना चाहता हूँ कि यदि मैं उपवास के बाद बच रहूँ तो अच्छा ही है, और यदि जीवित रहने की कोशिश के बावजूद यह शरीर नष्ट हो जाता है तो भी क्या बुराई है?... मृत्यु से निश्चय ही सारे प्रयत्नों का अंत नहीं हो जाता। ठीक ढंग से सामना किया जाए तो मृत्यु उदात्त प्रयत्न का आरंभ भी हो सकता है। परंतु यह सत्य तुम्हें स्वयं अंतःप्रेरणा से दिखाई न देता हो तो मैं दलीलों से तुम्हें कायल नहीं करना चाहता।’

फौरन जवाब में 5 मई को नेहरू ने जेल से एक तार भेजा और उसी दिन एक पत्र भी लिखा। तार, जिसमें उनकी पूरी प्रतिक्रिया व्यक्त हो जाती है, था, ‘जो बातें मेरी समझ में नहीं आतीं उनके बारे में क्या कह सकता हूँ? ऐसा लगता है कि एक अजनबी देश में अपनी राह भूल गया हूँ। परिचित मार्ग चिह्न केवल आप ही हैं। मैं अँधेरे में अपना रास्ता टटोलने की कोशिश करता हूँ, पर लड़खड़ा जाता हूँ। कुछ भी हो, मेरी प्रीति और भावनाएँ आपके साथ होंगीं।’

गांधी की भाषा जिसे तर्क माना जाता है उससे कितनी भी अलग हो जाती रही हो इस उपवास की चर्चा के दौरान, पूना समझौते के तुरंत बाद उभरने लगी परिस्थितियों की रोशनी में उस तर्क के हिसाब से भी उपवास की अनिवार्यता को नकारना असंभव सा है। आखिर पटेल ने, गांधी के प्रति अपने सारे मोह के बावजूद और उपवास के अंत की संभावित भयावहता से आक्रांत होते हुए भी,उसी तर्क की भाषा में गांधी के निर्णय का औचित्य समझा था।

यदि राजाजी जैसे विश्वासी हिंदू को भी गांधी के उपवास का अनौचित्य ही दिखाई पड़ा तो उसकी वजह गांधी की भाषा तो हो नहीं सकती थी। मैं यहाँ अलग से उन कारणों का विश्लेषण नहीं करना चाहता जिनके प्रभाव में अलग अलग लोगों ने उपवास को अनावश्यक, निरर्थक, हानिकारक इत्यादि माना। वैसे ऊपर जिन प्रतिक्रियाओं का जिक्र हुआ है उनसे इतना अनुमान तो लग ही जाता है कि नासमझी, ‘गांधी की भाषा और चिंतन प्रक्रिया की’ गांधी को ले कर मोह, राजनीति की एक खास तरह की समझ, जिसमें व्यक्ति के हृदय परिवर्तन का नहीं बल्कि अमूर्त आर्थिक सामाजिक राजनैतिक शक्तियों का असल महत्व माना जाता है, चेतन या अवचेतन में तिरते सामूहिक हित, इत्यादि उन विभिन्न प्रतिक्रियाओं को जन्म दे रहे थे।

इस संबंध में मुझे सबसे दिलचस्प और संश्लिष्ट प्रतिक्रिया टैगोर की लगती है। बंगाल में पूना समझौते के विरुद्ध पनप रहे आक्रोश को जानते हुए भी गांधी ने, वैसे ही जैसे सात महीने पहले आमरण अनशन प्रारंभ करने से पहले किया था, ‘प्रिय गुरुदेव' को लिखा, ‘अभी रात के पौने दो बजे हैं और मैं आपका तथा कुछ अन्य मित्रों का ध्यान कर रहा हूँ। अगर आपका हृदय प्रस्तावित उपवास का समर्थन करता है तो मैं पुनः आपका आशीर्वाद चाहता हूँ।’

इस बार गांधी को पहले जैसा आह्लादित तार नहीं मिला। इस बार सोचा समझा एक उपदेश आया बहुमूल्य जीवन को बचाए रखने के कर्तव्य पर। इसी के साथ जिक्र था टैगोर की अपनी कठिनाई का। उनके पास उन तथ्यों और विचारों की पृष्ठभूमि नहीं थी जिसके संदर्भ में वह गांधी के निर्णय और उसके महत्व के बारे में कोई फैसला कर सकें। इसके अलावा यह भी संभव था कि गांधी अपनी प्रतिज्ञा से उत्पन्न हुई अनिवार्यता के बारे में ही भूल कर रहे हों। यह कोई ऐसी वैसी भूल न होगी। इसका जो भयंकर न मिटाए जा सकनेवाला दुष्परिणाम हो सकता है उसको सोच कर ही दहशत होती है। अतएव गुरुदेव उपवास का अनुमोदन करने में असमर्थ थे।

आमरण अनशन के वक्त भेजे गए विह्वल आशीर्वचन के मुकाबले में यह उत्तर कितना तार्किक, दार्शनिक है। इसमें गांधी की संभावित मृत्यु का उल्लेख भी बगैर उस भावातिरेक के है जो आशीर्वाद वाले तार के हर वाक्य से टपक रहा था। पर पूरे उत्तर में कहीं उस असहमति का जिक्र नहीं था जो पूना समझौते को ले कर शुरू हो गई थी। गांधी अपनी आत्मा की जिस वेदना को बार बार देश के सामने उड़ेले जा रहे थे क्या वह टैगोर जैसे संवेदनशील हृदय पर कोई प्रभाव नहीं डाल रही थी? और यदि टैगोर तार्किक दार्शनिक ही होना चाह रहे थे, तो क्या गांधी का यह तर्क बेबुनियाद था कि व्यक्ति का अंत मृत्यु के साथ नहीं हो जाता। कि उनका, ‘गांधी का’जीवन शरीर के मिट जाने के बाद भी रहेगा? ‘मैं’ तो नहीं मरूंगा, शरीर नहीं रहा तो क्या?' गांधी कह रहे थे।

मुझे लगता है कि प्रायः और कम से कम एक हद तक, किसी आदर्श का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह लोगों के अपने वैयक्तिक और सामूहिक हितों पर भी निर्भर करता है। गांधी के हिंदू समाज में दलितों को बनाए रखने के लिए किए गए आमरण अनशन का प्रेरणास्रोत एक बड़ा आदर्श था। लेकिन उस अनशन का टैगोर पर एक प्रभाव पड़ा, और आंबेडकर पर बिल्कुल दूसरा। और गलत न होगा, इस संदर्भ में, टैगोर को सवर्ण हिंदुओं की प्रतिक्रिया, एवं आंबेडकर को दलितों की प्रतिक्रिया का प्रतिनिधि मानना। सात महीने बाद भी गांधी उसी आदर्श से प्रेरित हो उपवास करने जा रहे थे। पर उस आदर्श का अर्थ और उसके संभावित परिणाम बदल चुके थे बहुसंख्यक सवर्ण हिंदुओं के लिए। विशेष रूप से बंगाल के सवर्णों के लिए।

ऐसा नहीं है कि हितों की सदा, हर स्थिति में, निर्णायक भूमिका रहती है। या रहती भी है। गांधी के इस 21 दिवसीय उपवास के समय ही एक अनुपम अपवाद उभर कर आया। जबकि बार बार कट्टरवादी, ‘अंग्रेजी में गांधी का शब्द था ‘आर्थाडॉक्स' हिंदुओं को ले कर गांधी शिकायत कर रहे थे कि वे इस विशुद्ध धार्मिक उपवास में भी राजनैतिक चाल देख रहे हैं, मदन मोहन मालवीय ने बड़े स्नेह से यह तार भेजा था, ‘आपको भगवान का आशीर्वाद प्राप्त है।... मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि अपने इस निर्णय में आप भगवान के आदेश से ही प्रेरित हुए हैं। मैं निरंतर यह प्रार्थना करता रहा हूँ कि वह आपको यह व्रत सफलतापूर्वक पूरा करने की शक्ति दे और मेरा विश्वास है कि वह आपको ऐसी शक्ति अवश्य देगा।... ज्यों ही स्वास्थ्य अनुकूल होगा आपसे भेंट करूँगा।’

3

गांधी जैसी, कि उन्हें आशा थी, बगैर किसी कठिनाई के अपना व्रत पूरा कर सके। भले ही 21 दिनों में उनका वजन 22 किलोग्राम घट गया और वह कंकाल से हो गए। वह तो होना ही था।

पर और जो आशाएँ उन्होंने जोड़ रखी थीं अपने इस उपवास से उनमें से कोई भी किसी भी हद तक पूरी हुई हो, ऐसा लगता नहीं। जहाँ तक उनका विश्वास था कि चारों तरफ फैली अशुद्धि कहीं उनके अंदर बच रही किसी अशुद्धि के कारण है, और इस उपवास से हुए उनके अपने शुद्धीकरण से उनके अपने लोग भी शुद्ध होंगे, इस तरह का कोई सबूत नहीं मिलता कि उनके चारों ओर के वातावरण में कोई सुधार हुआ हो।

न ही दलितों को ले कर वैसी फौरी कोशिशें हुईं जैसी आमरण अनशन के समय हुई थीं। न मंदिरों में, न स्कूलों में, न सवर्ण घरों में स्वागत हुआ दलितों का इस उपवास के प्रभाव में। यहाँ तक कि केरल के गुरुवायूर मंदिर के दरवाजे भी बंद रहे दलितों के लिए। इस मंदिर में दलितों के प्रवेश को ले कर केलप्पन अनशन पर बैठ गए थे और उन्होंने गांधी के मनाने पर अपना अनशन समाप्त कर दिया था बगैर सफलता पाए। गांधी के हस्तक्षेप में यह आश्वासन था कि जरूरत पड़ने पर गांधी भी केलप्पन के साथ अनशन पर बैठेंगे। 21 दिवसीय उपवास के समय इस आशा का आधार बनता था कि गुरुवायूर मंदिर के प्रबंधक दलितों के लिए अपना मंदिर खोल देंगे ताकि इतने लंबे उपवास के बाद फिर ऐसी स्थिति न पैदा हो जाए कि गांधी को एक और अनशन करना पड़े। वैसा न हुआ।

अगर कुछ हुआ तो यह कि राहत महसूस हुई कि गांधी बच गए। पर राहत में भी खीझ थी कि खामखा गांधी ने एक मुसीबत खड़ी कर दी थी।

गांधी के अपने ही कांग्रेसियों में खासा असंतोष जन्मा इस उपवास को ले कर। विशेष रूप से तब जब, इस उपवास के प्रारंभ होने से पहले जेल से रिहा होने के बाद, गांधी ने पार्टी के सभापति से अनुरोध करके सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करवा दिया। वैसे तो यह आंदोलन उस समय तक समाप्तप्राय हो गया था और जहाँ तहाँ थोड़ा बहुत हो जाता था। इसके स्थगन पर कांग्रसियों को लगा कि गांधी ने नाहक दलितों के मसले को तूल दे कर राजनैतिक संघर्ष को पीछे धकेल दिया है। उस समय विदेश में प्रवास कर रहे दो बड़े नेताओं ‘विट्ठलभाई पटेल और सुभाष चंद्र बोस’ ने तो गांधी के नेतृत्व से कांग्रेस को निजात दिलाने की माँग ही कर डाली।

गांधी का कोई उपवास मई 1933 के उपवास जैसा अहिंसक नहीं था। न इतना सुंदर। किसी पर कोई जोर नहीं। कोई दबाव नहीं। पटेल गांधी से शिकायत किया करते थे कि उनकी अहिंसा में हिंसा भरी है और प्रेम में क्रूरता। उनके प्रेम को यहाँ छोड़ दें और सिर्फ अहिंसा की बात करें तो पाएँगे कि गांधी की कुछ बड़ी सफलताएँ केवल तब संभव हुईं जब उनकी अहिंसा में वह तत्व विद्यमान था जिसे पटेल हिंसा कहते थे। गांधी के कई प्रसिद्ध उपवासों का उल्लेख इस संदर्भ में संभव है। वह न कर मैं सिर्फ सितंबर 1932 के आमरण अनशन को एक बार फिर याद करूँगा। क्यों गांधी तब कुछ कर सके, ‘जो भी कुछ वह था’ और क्यों उसी अनशन के जुड़वाँ अनशन का वह हश्र हुआ जो हुआ?

गांधी को मौन में बड़ा विश्वास था। शब्दों के परे मौन की भाषा में। और उन्हें विश्वास था आदर्श निजी जीवन के प्रभाव में। ऐसा जीवन जो गुलाब की तरह केवल अपने होने से चारों ओर सुंगध फैलाता है। 8 मई से 29 मई तक गांधी जिस तरह गुलाब बने वैसे शायद केवल अपने अंतिम क्षणों में हुए।

हमारी कौन सी कमजोरियों ने, मानव स्वभाव के किस दोष ने, उनको उस विलक्षण उपवास के वक्त इतना बेअसर बना दिया था?


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हिंदी समय में सुधीर चंद्र की रचनाएँ