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नाटक

बिदेसिया
भिखारी ठाकुर


कथा-सार

गाँव का एक युवक। मझोला कद, गेंहुआ रंग, धोती-कुरता और टोपी पहनावा। खेतिहर मजदूर। वर्ष के कुछ ही दिनों काम मिलता है, शेष समय में बेरोजगार रहता है। उसकी शादी एक साँवली-सलोनी सुंदर युवती से हो जाती है। विवाह के कुछ दिनों बाद वह युवक अपनी प्‍यारी पत्‍नी का द्विरागमन (गवना) करा कर अपने घर ले आता है। पति-पत्‍नी में बहुत प्रेम रहता है। वह अपनी पत्‍नी के रूप-लावण्‍य एवं परस्‍पर प्रेम के कारण उसे 'प्‍यारी सुंदरी' नाम से ही संबोधित करता है।

कुछ दिन तो सुख-चैन से बीतते हैं, लंबी बेराजगारी और बिगड़ती आर्थिक स्थिति युवक के मन-मस्तिष्‍क को बराबर उद्विग्‍न करती रहती है। दूसरी ओर गाँव तथा आस-पास के युवक और अधेड़ उम्र के लोग कृषि-कार्य के अभाव में काम कर कुछ कमाने के लिए कलकत्ता तथा आसाम आदि पूर्व स्थित राज्‍यों में जाते-आते रहते हैं और धन बचाकर घर लौट आते हैं। युवक भी सोचता है कि वह कलकत्ता जाकर मेहनत-मजदूरी कर कुछ धन कमाए और फिर घर लौटकर अपनी पत्‍नी प्‍यारी सुंदरी के साथ रहकर मौज-मस्‍ती करे।

युवक अपनी पत्‍नी प्‍यारी सुंदरी से अपना कलकत्ता जाने का प्रस्‍ताव रखता है। युवती आशंकित एवं विचलित हो जाती है। वह इस प्रस्‍ताव का पुरजोर विरोध करती है। तब वह बहाना बनाकर घर से चुपचाप भाग कर कलकत्ता जाने का मन बना लेता है।

युवक कलकत्ता पहुँच जाता है। वहाँ जाकर वह परदेशी 'विदेशी' बन जाता है। दिन भर कड़ी मेहनत-मजदूरी कर धन कमाता है।

अचानक उसका परिचय एक युवती से हो जाता है। एकाकी युवक की कामनाएँ प्रबल होने लगती हैं। युवती भी दिनोंदिन उसके पास आती जाती है। उभय पक्ष की आवश्‍यकता तथा परिस्थिति की नाजुकता के कारण दोनों पति-पत्‍नी के रूप में रहने लगते हैं। उसे तत्‍कालीन समाज 'रखैल', 'रखेलिन' या 'रंडी' ही समझता है। बिदेसी दिन भर मजदूरी करता है और शाम को तथा छुट्टियों के दिन दिनभर उसी महिला के साथ मौज-मस्‍ती में रहता है। ताश खेलता है। युवती खाना बनाती है और मिल-जुल कर चैन से जिंदगी बीतती है।

गाँव में बिदेसी की पत्‍नी प्‍यारी सुंदरी को जब यह बोध होता है कि उसका पति बिना उसकी सहमति के, उसे अकेली छोड़कर कलकत्ता कमाने चला गया, तो उसके सिर पर जैसे विपत्तियों का पहाड़ ही टूट पड़ता है। व‍ह दिन-रात कलपती रहती है। अपने पति के वियोग में तरह-तरह से विलाप करती रहती है। कभी उसे अपने पति के साथ रहते समय की घटनाओं की याद आती है, कभी पति का परदेश में क्‍या हाल होगा, इसको सोच कर विलखती है और कभी अपने एकाकीपन तथा पत्‍नी-सुलभ कामनाओं के वशीभूत हो विचलित हो जाती है। उसे दृढ़ विश्‍वास है कि उसका पति अवश्‍य लौटेगा।

अचानक एक दिन एक अधेड़ बटोही, जो कमाने के लिए कलकत्ता जा रहा था, बिदेसी की पत्‍नी प्‍यारी सुंदरी के विलाप से दयार्द्र हो जाता है और उसके कष्‍ट एवं दुख को समझकर उसके पति को खोजकर वापस भेजने का आश्‍वासन उसे देता है।

कलकत्ता पहुँचने के बाद घूमने-फिरने के क्रम में बटोही की दृष्टि प्‍यारी सुंदरी के अपने पति के बताए गए विवरण से मिलते-जुलते एक युवक पर दृष्टि अचानक पड़ जाती है और बटोही उसे समझता-बुझाता है, उसकी पत्‍नी की दारुण दशा का वर्णन करता है तथा उसके अखंडित पातिव्रर्त्‍य की पुष्टि करता है। बिदेसी की स्‍मृतियाँ लौट जाती है और वह घर वापस लौटने की बात सोचने लगता है।

कलकत्ता में पत्‍नी के रूप में रखी गई महिला बिदेसी की इस योजना का विरोध करती हैं, किंतु, बटोही के समझाने, डराने और विवश करने पर बिदेसी घर की राह पकड़ता है। बाड़ीवाला (मकान-मालिक), साहूकार और गुंडों द्वारा बिदेसी के बकाए की बसूली में सब सामान एवं कपड़े छीन लिए जाते हैं, फिर भी, वह उसी दुरावस्‍था में घर लौटता है।

इसी बीच गाँव का एक मनचला युवक, जिसकी आयु बिदेसी से कम थी, प्‍यारी सुंदरी के पातिव्रर्त्‍य की परीक्षा लेने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन देता है और बलात्‍कार करने की चेष्‍टा करता है। प्‍यारी सुंदरी दृढ़ता से प्रतिवाद करती है तथा पड़ोसिन के आ जाने के कारण उस का सतीत्‍व बच जाता है। वह देवर बना मनचला युवक भाग खड़ा होता है।

इसी समय अपनी दुरावस्‍था की स्थिति में बिदेसी अपने घर पहुँचता है। बहुत विश्‍वास दिलाने पर और अपने पति की आवाज पहचान कर सुंदरी दरवाजा खोलती है और परदेशी पति को देखकर एक ओर प्रसन्‍न होती है, तो दूसरी ओर उसकी इस दशा पर स्तंभित हो जाती है। समाचार पूछने का क्रम पति-पत्‍नी में चलता है।

इसी बीच बिदेसी के कलकत्ता छोड़कर घर आने की बात सोचकर उसकी कलकतिया पत्‍नी और दोनों बच्‍चे बिदेसी के घर के लिए पूरे गहने-कपड़े एवं सामान के साथ घर से निकलते हैं। कलकत्ता के चोर-डकैत उसके गहने-कपड़े छीन लेते हैं। विपन्‍नावस्‍था में भी वह महिला अपने दोनों पुत्रों के साथ कलकत्ता से बिदेसी के घर के लिए चल देती है। पूछते-पूछते वह बिदेसी के घर पर पहुँचती है। बिदेसी उसको देखकर आश्‍चर्यचकित होता है, किंतु, वह महिला जब प्‍यारी सुंदरी के साथ रहने का अनुनय- विनय करती है, तो सब मिल-जुल कर रहने लगते हैं।

 

पात्र-परिचय

बिदेसी - गाँव का एक युवक
बटोही - बाहर आने-जानेवाला प्रौढ़
रंडी - कलकत्ता-प्रवास में बिदेसी की दूसरी पत्‍नी या रखैल
देवर - गाँव का मनचला युवक
दोस्‍त - बिदेसी का साथी एवं हितैषी
सूत्रधार , समाजी एवं दो बच्‍चे तथा एक ग्रामीण महिला


(सूत्रधार मंच पर आ के मंगलाचरण सुनावतारे)

 

श्‍लोक

वामांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्‍तके
भाले बालविधूर्गले च गरलं यस्‍योरसि व्‍यालराट्
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्री शंकरः पातु माम्

अखंडमंडलाकारं व्‍याप्‍तं येन चराचरम्
तत्‍पदं दर्शितं येन तस्‍मै श्रीगुरवे नमः
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्‍णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्‍मै श्रीगुरवे नमः

हे राम पुरुषोत्तम नरहरे नारायण केशव
गोविंद गरुड़ध्‍वज गुणनिधे दामोदर माधव
हे कृष्‍ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते
वैकुंठाधिपते चराचरपते लक्ष्‍मीपते पाहि माम्

मनोजवं मारुततुल्‍यवेगं जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्‍ठम्
वातात्‍मजं वानरयूथमुख्‍यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये

 

चौपाई

मंगल भवन अमंगल हारी। द्रबहु सो दसरथ अजिर बिहारी॥
महावीर बिनवों हनुमाना। जासु सुजस प्रभु आप बखाना॥
धन्‍य-धन्‍य गिरिराज कुमारी। तुम समान नहिं कोउ उपकारी॥
नाच१ तमासा२ कीर्त्तन३ जेते। होखत बा सब जग मँह तेते॥
नावत४ बानीं सब कर माथा। चित देइ सुनहु बिदेसिया काथा॥
एह किताब के सब बिस्‍तारी। थोरही में सब कहते ' भिखारी'

१. नृत्‍य, लोकनृत्‍य।
२. नाटक, लोकनाट्य की एक विधा
३. भगवत भजन की विधा, सामूहिक भजन।
४. झुकना, विनयपूर्वक झुकाना।

आज बिदेसी के तमासा होइहन। बिदेसी के तमासा काहे? दूर-दूर के लोग कहेला जे बिदेसिया के नाच देखे चले के। बिदेसिया के नाच ना हवन, बिदेसिया के तमासा हवन। एह तमासा में चार आदमी के पाट (पार्ट, पात्र के रूप में भागीदारी) बा - बिदेसी एक, प्‍यारी सुंदरी दू, बटोही तीन, रखेलिन (उप-पत्‍नी, दूसरी पत्‍नी) चार।

अथवा, बिदेसी ब्रह्म, बटोही धरम, रखेलिन माया, प्‍यारी सुंदरी जीव। ब्रह्म जीव दूनों जना एही देह में बाड़न बाकी भेंट ना होखे। कारन? माया। एकरा के काटेवाला बटोही धरम।

आत्‍मा से परमात्‍मा काहे कुरोख (क्रुद्ध; विपरीत दिशा की ओर) हो गइलन? देना का झंझट से चाहे बिरोध का झंझट से। जइसे स्‍त्री के पति छोड़ के परदेस चल जालन, तइसे झूठ-झंझट से आत्‍मा से परमात्‍मा कुरोख हो जालन। बीच में कारन रखेलिन स्‍त्री। झंझट से छोड़ा के मिलाप करा देबे खातिर बटोही - उपदेश। एह चारों के संबाद होखे के चाहीं। कइसन? प्‍यारी सुंदरी के राधिकाजी लेखा, बिदेसी के श्रीकृष्‍णचंद्रजी लेखा, रखेलिनके कुबरी लेखा, बटोही के ऊधोजी लेखा।

पातिव्रत धर्म स्‍त्री खातिर सब धर्म से उत्तम धर्म ह; जइसे -

उत्तम के अस बस मन नाहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।।

पतिबरता (प्रतिव्रता, एकमात्र पति आस्‍था वाली पत्‍नी) सती सुलोचना का राम जी से बात भइल, स्‍तुति कइली। कहली हा जे हमरा पति के सीस ना देब त -

अब हम जाइ मरब सत साधी। मिलब हमहिं जस मिलत समाधी।।

पतिबरता का ई दुख काहे भइल? जइसे लरही (घर पर छावनी करने में उसकी लंबाई वाले भाग के बीच में लकड़ी का एक बल्‍ला, जिसका छोर दिवाला पर टिका रहता है।) - धरन (कमरे की चौड़ाई वाले भाग के बीच में लकड़ी का बल्‍ला जिसके छोर दोनों दिवालों पर टिके होते हैं और 'लहरी' के भार बहन करने में सहायता देते हैं।) - कमरबाला (भार वहन में सहायता देने वाले अन्‍य लकड़ी के बल्‍ले।) पर जतना भार रहेला, ततना भार कोरो (लहरी और दिवार को मिलानेवाले बाँस या लकड़ी के बल्‍ले) पर न रहे। राजा हरिश्चंद्र में पूरा सत भइल हा, तब डोम किहाँ बिका गइलन हा, जेकर किरती (कीर्ति, यश) आज ले गवात बा। ई केहू कहे जो बनउवा (बनावटी, नकली) बात ह, तेकरा खातिर बनउवा भी ह। कइसे? जउना कुँआ के जल ऊख (ईख, गन्‍ना) में पटावल जाला, ओही कुँआ का जल में मरिचा पाटेला, ऊखे के मीठ आ मरिचा के तीत कइ देला। जइसे -

जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।।

बिदेसी ऊहे हवन, बिआह क के घर में जनाना के बइठा देलन। अपने चल गइलन कमाए। बहरा (बाहर, परदेश) से न एगो खत भेजतारन, ना खबर भेजतारन, ना खरच-बरच खातिर पाँच गो रोपेया मनीआडर से भेजतारन। बाहर में जाके दोसर जनाना राखि लेतारन। एहिजा घर में प्‍यारी सुदंरी रोअतारी।

बटोही ऊहे हवन, जे गाँव-नगर से बहरा जातारन-आवतारन। ओह बाट (रास्‍ता) के हाल जानतारन। अथवा बिदेसी रामचंद्रजी। भरतजी महाराज बटोही बनि के रामजी के बन से फेरे (लौटने, वापस लाने) खातिर गइले हा। ऊ बिदेसी त दोसर जनाना राखि लेलन, तेहसे न लवटलन, बाकी रामचंद्रजी काहे ना लवटलन?

तापस वेष बिसेसि उदासी। चौदह बरिस रामु बनवासी।

भादो (भाद्रपद) के महीना अन्‍हरिया तेरस (कृष्‍ण पक्ष की त्रयोदशी) का दिन आधा राति खानी प्‍यारी सुंदरी सोचतारी -

भादी दरसावत१ , आधा राति होइ जावत२
बदी३ तेरस परि जावत; बूँद झम-झम-झमकत बा
घेरत घनघोर, झींगुर-दादुर मचावत सोर४
दामिनि दल साजि-साजि, चम-चम-चम, चमकत बा
पुरवा पवन आवत, सनसनावत, सरमावत५
मन भावत नइखे सरग, दम-दम-दम-दम दमकत बा
कहत ' भिखारी', भारी जारी६ जनावत७ ;
तम तरुनी८ के तबीयत भीतर बम-बम-बम बमकत बा

 

१. दिखलाना

२. जाता है

३. कृष्‍ण पक्ष

४. शोर

५. शरमाना

६. रोब-दाब

७. जनवाता

८. तरुणी युवती

ओ समय में प्‍यारी सुंदरी का कहि के रोअतारी?

(लोरिकायन (एक प्रसिद्ध लोकगाथा) का लय में)

जनियाँ१ मकनियाँ में , हनि२ के कवरिया डहकत बाड़ी बारंबार।
पिया घरे रहितन५, जवन-जवन चहितन६ कहितन७ करिती८ तइयार ॥
मनवाँ भवनवाँ अँगनवाँ में लागत नइखे, कब मिलिहन समाचार?
कहत ' भिखारी' नाई९, प्‍यारी के चरित गाइ, काइ करिहन करतार?

१. पत्‍नी, स्‍त्री

२. जोर से बंद करना

३. किवाड़

४. भीतर-भीतर रोना

५. रहते

६. चाहते

७. कहते

८. करती

९. एक जाति विशेष

(जतसारी {लोकगीत का एक प्रकार} के लय)

ए सामीजी१, जवना जूने२ भइल सुमंगली३
त जनलीं जे भाग जागल हो राम।
ए सामीजी, नइहर४ से नाता तूरि दिहलऽ
त ससुरा सोहावन लागल हो राम।
ए सामीजी, घरवा-भीतरवा बइठाइ कर गइलऽ
कवना दो मुलुकवा भागल हो राम।
ए सामीजी, खतवा में पातावा पेठइतऽ ८,
त सुनि के अगरइती पागल हो राम।
ए सामीजी हाथ-गोड़ चउरि १० के, लोहवा लाल कइके,
ईहे हवे देहिया दागल हो राम।
ए सामीजी, सुसुकि-सुसुकि लोरवा पोंछत बानीं,
केहू नइखे सुनत रागल ११ हो राम।
ए सामीजी, कहत ' भिखारी' नाई, पतइन १२, खाइ के,
गुनलऽ ना, मिमिआली छागल १३ हो राम।

१. स्‍वामी, पति

२. समय

३. विवाह

४. पितृ-गृह

५. श्‍वसुर-गृह

६. सुहावना

७. मुल्‍क, देश

८. भेजना

९. प्रसन्‍न होना

१०. कठोरता से बाँधना

११. गीतात्‍मक स्‍वर में रोना

१२. पत्ते

१३. बकरी

(दोसर तरह के जतसारी के लय)

डगरिया जोहत ना, बीतत बाटे आठ पहरिया हो डगरिया जोहत ना।
धोती पढ़धरिया धड़ के कान्‍हावा पर चदरिया हो।
बबरिया झारि के ना, होइबऽ कवना सहरिया हो बबरिया झारि के ना।

एकऊ ना भेजवलऽ खत कतहूँ३ से खबरिया हो।
नगरिया देखि जा ना, नइखीं खोजत बट‍सरिया हो४ नगरिया देखि जा ना।
केइ हमरा जरिया५ में भिरवले६ बाटे अरिया७ हो।
चकरिया८ दरि के ना, दुख में होत बा जतसरिया हो चकरिया दरि९ के ना।
परोसि१० कर थरिया११ , भात-दाल-तरकरिया हो।
लहरिया१२ उठेला ना, रहितऽ करितऽ जेवनरिया१३ हो लहरिया उठेला ना।
कहत ' भिखारी' मनवाँ करेला हर घरिया हो।
उमरिया भरिया ना, देखत रहतीं भर नजरिया हो।

१. पाढ़ वाली धोती

२. सिर का बाल

३. किसी भी स्‍थान

४. सौगात

५. जड़

६. संधान करना

७. रेत-रेत कर लकड़ी काटनेवाला यंत्र

८. चक्‍की

९. चीसना, छोटे-छोटे टुकड़े या पाउडर बनाना

१०. भोजन-सामग्री सजा कर

११. थाली

१२. लहर, ज्‍वाला

१३. जेवनार, विशिष्‍ट भोजन

(सोरठी {लोकगाथा 'सोरठी-वृजभार' की लय} के लय)

पिया कहलन बहरा जाइबि , कुछ दिन में घूमि के आइबि
किया हो मोरे रामऽ सुकवा उगल तब गइलन भागल हो राम।
जाये नाहीं दिहितीं कबहूँ, लाखो तरहे कहितन तबहूँ
एकिया हो मोरे रामऽ, पहिले से रहिती तनी भर जागल हो राम।
तब से ना नींद आवेला, घर ना अँगनवाँ भावेला
एकिया हो मोरे रामऽ, एही सोचे मनवाँ भइल बा पागल हो राम।
कहत ' भिखारीदास', दिअरा में घर ह खास
एकिया हो मोरे रामऽ, साँवली सुरतिया बा मनवाँ में लागल हो राम।

१. भोर में दीखनेवाला तारा-विशेष

कवन साँवली सूरति? जवना साँवली सूरति खातिर विश्‍वामित्रजी तपस्‍या छोड़ि के अयोध्‍या में पहुँचलीं हाँ। दसरथजी महाराज कहलीं हाँ जे अपने के कहहीं में देरी बा, हमरा करे में देरी नइखे।

विश्‍वामित्रजी कहली हाँ - 'नील बरनवारे, जिनिकर नीला रंग के कमल लेखा बदन बा, हम उनके खातिर अइलीं हाँ -

असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आयउँ नृप तोही।

दसरथजी महाराज कहलीं हाँ कि राज माँगीं, धन माँगीं, प्रान माँगीं, बाकी साँवली सूरत देल कबूल नइखे।

विश्‍वामित्र जी महाराज कहलीं हाँ जे हम स्राप (श्राप, बद्दुआ) देबि।

दसरथजी महाराज कहलीं हाँ - स्राप कबूल बा, दुनिया बदनाम करी सेहू कबूल, बाकी साँवली सूरत दीहल कबूल नइखे।

तब बसिष्‍ठ बहुबिधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा।

झगरा बसिष्‍ठ जी महाराज छोड़वलीं हाँ।

अथवा आज के प्‍यारी सुंदरी का कहि के रोअतारी -

ए किया हो मोरे रामऽ, जब से परदेस में बाड़न रहल हो राम।
ए किया हो मोरे रामऽ, तनी ना सोहात बा कवनो टहल हो राम।
ए किया हो मोरे रामऽ, रहि-रहि के मनवाँ जात बा दहल हो राम।
ए किया हो मोरे रामऽ, कवनी बेयरिया आइ के बहल हो राम।
ए किया हो मोरे रामऽ, कबहूँ के नइखीं दुखवा सहल हो राम।
ए किया हो मोरे रामऽ, सुनहट लागत बा दुअरा महल हो राम।
ए किया हो मोरे रामऽ, ओहिजा उड़त बा चहल-पहल हो राम।
ए किया हो मोरे रामऽ, एहिजा के लहकल-सहकल ढहल हो राम।
ए किया हो मोरे रामऽ, नइखे ' भिखारी' से जात कहल हो राम।

१. मन से पसंगी

२. सेवा

३. दहना, विचलित होना

४. बयार, हवा

५. एकांत, शून्‍यता

६. द्वार, घर के बाहर

एगो हई ह -

परदेसी का सोचे मरलीं।
अन१ - पानी के सवाद रुचत नइखें, कबहूँ पेट ना भरलीं।
मतलब मोर बिधाता जनिहन, प्रेम का फंदा में परलीं।
छठ, एतवार एको ना छोड़लीं, बरत से काया के जरलीं।
कहत ' भिखारी' उपाय नइखे लउकत, कोटिन जतन क के हरलीं।

१. अन्‍न

२. स्‍वाद।

३. रुचिकर लगना

४. व्रत

५. यत्‍न , प्रयास उपाय

( निरगुन {गीत का प्रकार, सगुन से भिन्‍न की उपासना})

हे राम , जोगिनिया बनि के हम,
करब मालिक के उदेस । हे राम...
तूरि के गला के हार, देहब अगिया में जार ६,
छोड़ि के परइलन परदेस। हे राम...
टिकुली ८- सेनूर तजि, पिउ-पिउ भजि-भजि,
छूरा से छिलाइ १० कर केस। हे राम...
गहना सोना-चानी के, लोढ़ा ११ से खानि-खानि १२ के,
एही सोचे बनबि अनभेस १३ । हे राम...।
कहत ' भिखारी' नाई, अंग में भभूत १४ लगाई।
तूमा १५ लेके घूमब हरमेस १६ । हे राम...

१. सोगिनी

२. पति , ईश्‍वर धन का कर्ता-धर्ता या मुखिया

३. खोज

४. तोड़ना

५. अग्नि

६. जलना

७. भागना

८. स्त्रियों के ललाट पर लगनेवाली बड़ी बिंदुली

९. सिंदूर

१०. बाल साफ करना , मुंडन

११. कूटने के लिये पत्‍थर का टुकड़ा , सिल-लोढ़ा

१२. कूटना

१३. खराब वेष-भूषा वाली

१४. भभूति , धूनी की राख

१५. साधुओं की तुमड़ी

१६. हमेशा , सदा

(बिरहा {एक गीत-विशेष, एक राग-विशेष})

मालिक चलि गइलन परदेस , घर में छोड़ि के,
हमरा तनिको भर धरात नइखे धीर।
तनिको भर धरात नइखे धीर, बटोही भइया।
कइक जनम के उदय भइल पाप के कमइया।
चढ़ल जवानी जोर परदेस गइलन कन्‍हइया,
बीचे धार में दहत बाटे छेद कइल नइया।
पियऊ बिनु जगत में ना लउकत बा खेवइया,
कहत ' भिखारी' पंच लोग में देत बानीं दोहइया
हमरा तनिको भर धरात नइखे धीर।

१. धारण करना , पकड़ाना

२. छिद्र

३. कृष्‍ण की दुहाई

फेरु अइसे कहाता -

पियवा गइलन कलकातावा ए सजनी।
तूरि दिहलन पति-पत्‍नी-नातावा ए सजनी,
किरनि भीतरे परातवा१ ए सजनी। पिया...
गोड़वा में जूता नइखे, सिरवा पर छातावा ए सजनी,
कइसे चलिहन रहतवा ए सजनी। पिया...
सोचत-सोचत बीतत बाटे दिन-रातवा ए सजनी,
कतहूँ लागत नइखे पातावा ए सजनी। पिया...
लिखत ' भिखारी' खोजिकर बही-खातावा ए सजनी,
प्‍यारी सुंदरी के बातवा ए सजनी। पिया...

१. प्रातः , सबेरे , सूर्योदय के पहले।

कबो ईहो -

पिया निपटे नादानवाँ ए सजनी।
हमरा घोंटात नइखे कनवाँ भर ‍अनवाँ ए सजनी,
चाभत होइहें मगही पानवाँ ए सजनी। पिया...
भीतरे रोवत बाड़न तनवाँ में मनवाँ ए सजनी,
छोड़त होइहन मुसुकानवाँ ए सजनी। पिया...
लड़िका नइखन, भइल बाड़न मस्‍तानावाँ ए सजनी,
जेकर हइसन बा जनानावाँ ए सजनी। पिया...
गावत ' भिखारी' हउए कुतुबपुर मकानवाँ ए सजनी,
प्‍यारी सुंदरी के गानाबा ए सजनी। पिया...

१. निगलना , कंठ के भीतर जाना

२. कण , छोटा टुकड़ा

३. जीभ और मुँह से खाना

४. मस्‍त , पूर्ण युवा

५. इस प्रकार की

(चौपाई)

श्री गणेश महादेव दिनेसा १, जेहि सुमिरे सब मिटत कलेसा।
तेहि चरन में मैं सिर नाऊँ, चरचा कुछ बिदेसी के गाऊँ।
जयति भागवत जय बाल्‍मीकी २, जयति रामायण श्री तुलसी की।
संत-मंडली पद सिर नाऊँ, विप्र चरन-रज सीस चढ़ाऊँ।
कवि सज्‍जन सब के पद बंदे, करहु कृपा जो होखों अनंदे।
गिरत बानी सकल चरना, जो बिनु स्‍वारथ अघ सिर धरना।
विद्या से बानी कमजोरा, करहु माफ सब अवगुन मोरा।
बिचऊ नाटक बानी बनावत, बिनु विद्या के नइखे आवत।

गावे लायक हम ना बानीं, पत राखऽ अंबिका भवानी।
अब आगे के सुनहु बेयाना४, करत बिदेसी बिदेस पयाना
कहत पियारी से तुरत जाइब, चतुर बानीं हम बहुत कमाइब।
पत्‍नी कहे पति जा मत बहरा, केइ लगावल अइसन लहरा ७?

१. दिनेश , सूर्य

२. बाल्‍मीकि

३. स्‍वार्थ

४. बयान , वर्णन , कथन

५. यात्रा

६. शीघ्र , त्‍वरित

७. झूठा या गलत बहकानेवाली बात कहना

(सूत्रधार के प्रस्‍थान)

समाजी : (चौपाई)

बाल्‍मीकि महाभारत गीता , करहु कृपा जग-जननी सीता।
एह नाटक के बिचऊ बाना २, गावत बानीं बिदेसिया गाना।
पति कहे पतनी से बाता, हम जाइब देखे कलकाता।

१. बीच-बीच का यानि शास्‍त्रीय एवं लोकनाटक के बीच का मिश्रित स्‍वरूपवाला

२. रूप , स्‍वरूप , गठन

३. पत्‍नी

(एक ओर से पहिले बिदेसी आ दोसरा ओर से प्‍यारी सुंदरी के प्रवेश)

बिदेशी : हो प्रानप्‍यारी, सुनतारू?

प्‍यारी सुंदरी : का कहतानी, ए स्‍वामी जी?

बिदेशी : एगो सलाह बा।

सुंदरी : भला कवन सलाह बाटे?

बिदेशी : सलाह बा कि हमार मन करता जे तनी कलकाता से जाके हो अइतीं।

सुंदरी : ए रवो (पति या श्रेष्‍ठ लोगों के लिए संबोधन), रउआ (आप) कलकता जाये के कहत बानीं, रउआ कवना बात के तकलीफ बाटे?

बिदेशी : हमरा कवनो बात के दुख-तकलीफ नइखे, बाकी हमार दोस्‍त अइलहँ कलकाता से। कलकाता के समाचार सुनि के हमरों तबियत कइले बा कि हमहूँ जाइब। हम पंद्रह दिन में लवटि के चल आइब।

सुंदरी : ए रवों, रउआ पनरह दिन खातिर कहतानीं, हम घरियों छन भर रउआ के अपना आँखी का सोझा (समक्ष, सामने) से ना जाये देब।

बिदेशी : हम जतरा (यात्रा, यात्रा-मुहूर्त्त) कइले बानीं त देखऽ, जतरा पर ठकठेनि (जिद्द करना, टोकटाक) तूं मत करऽ।

सुंदरी : (गीत)

दूनों एके साथे रहे के परानी।
देस परदेस में असाम-मुलतानी,
सँगही में राखऽ चरनों के दासी जानी। परानी...
गवना करा के देस जइबऽ बिरानी १ ,
केकरा पर छोड़ि कर टुटही पलानी । परानी...
केकरा से आग माँगब, केकरा से पानी,
खाला-ऊँचा गोड़ परी चढ़ल बा जवानी। परानी...
कहत ' भिखारी' सून होई रजधानी,
पति-मति फेरि द बिंधाचल भवानी। परानी. ..

१. अन्‍य , दूसरे का

२. घर , गरीबों की खर-फूस की झोंपड़ी

बिदेशी : (चौबोला)

मन हमार परदेस जाये के चाहत अबहीं प्‍यारी।
जल्‍दी से तइयार करहु कुछ, रास्‍ता के बटसारी॥
फिरती, बार तोहरे पहिरन हित कीनब, बंगला सारी।
कहे ' भिखारी' खुसी रहऽ घर, मत करऽ सोच हमारी।

सुंदरी : (चौबोला)

हाय नाथ, तोहें सौंप दीन्‍ह मोर भाई, बाप, महतारी।
सत के बंधन तोड़ि के स्‍वामीजी मति करहू बरिआरी॥
हम तोहे संबंध बिधाता जोड़ी रचेउ बिचारी।
कहे ' भिखारी' कुसल करहु नित गनपति-उमा-त्रिपुरारी॥

बिदेशी : (चौबोला)

परदेस जाइब हे प्रिये, घर में रहऽ तनी धीर से।
आँखों से आँसू आ रहे, कपड़ा भिंजत है नीर से।
तन-मन-जिगर, से कहत हूँ भगवान रखिहें सरीर से।
कहते ' भिखारी' तोहि सँगे आ के फगुआ६ खेलब अबीर से

हे प्रानप्‍यारी, देखऽ, आउर महीना में कहूँ रह जाइब, लेकिन फागुआ के दिन तहरा संगे आ के रंग-मसाला जरूर होई।

सुंदरी : परदेस जाये कर कहि के जीव मत तरसाइये।
कछु भूल-चूक जो होय हमसे तदपि मत बिसराइये॥
एह सोक-सागर-धार में कहुँ छोड़ि हमें मत जाइये।
कहते ' भिखारी' घरहिं रहिकर प्राणनाथ ! बचाइये॥

(गोड़ पर गिरतारी)

बिदेशी : अनेरे गोड़ पर फुट-फुट गिरतारू। एहिजे दोस्‍त राम बाड़न। असाम में भाटी काटे गइलन, त बारह बरिस रह गइलन। उनका जनाना के कवनो गम-फिकर नइखे। तूं त बुझाता कि दो चार महीना में प्राण त्‍याग देबू।

सुंदरी : ए रवों, रउवा अपना दोस्‍त के परतूंत (उपमा, उदाहरण) करत रहीला। उहाँके दू चार गो नान्‍ह (बच्चे) बार बाटे। रउॅवा कवन आगा-पाछा कुछल उकत बडुये (है)।

बिदेशी : उनका दू-चार गो नान्‍ह-बार बा। हमार तहार काली माई जिंदगी अबाद रखीहन -त नव, दस गो के खल (गिनती) - लगा दिआई।

सुंदरी : (कबित्त)

अँगना आनंद लागत, दुअरा बधाव बाजत,
जाये के बिदेस रउआ कबहूँ मत भाखिये
धोती आ कमीज, टोपी आसकीट सिलाइ देहब,
इतर के बास तेल भूतनाथ माखिये
बिबिध मिठाई, पकवान, तरकारी, दधी, निमिकी,
मोराबा, पापड़, घरहीं सब चाखिये
कहत ' भिखारी' पिया हिया में छमा करिके
हम से गरीबनी पर दया नित राखिये।

१. बधाई देने वाला बाजा

२. बोलिये

३. बंडी या हाफ कोट

४. मखना , सूँघना।

५. चखना , स्‍वाद लेना

बिदेशी : हम जाइब परदेस के , घर में करऽ बहार।
बरिस दिन पर आइब सुनिलऽ, छैल छबीली नार॥
सुंदरी : चलि जइबऽ परदेस के, घर में रहब अकेल।
कहत ' भिखारी' कइसे चलिहें, बिन इंजन के रेल?
बिदेशी : जतरा भइल बिदेस के, धरहु राम पर ध्‍यान।
करिहें जानकि-जीवन प्‍यारी, तोर-मोर कल्‍यान ॥
सुंदरी : त्राहि-त्राहि अबला कर स्‍वामी! मत करहू परिसान।
सीता-राम गइलन कानन सँग, जानत सकल जहान।
बिदेशी : संघत के फल तुरते मिलल, हरन भइल प्रिय नारि।
आजु तलक ले सुनि लऽ प्‍यारी, गावत बेद पुकारि॥

 

१. साथ-साथ।

सुंदरी : धन१ संघत, धन-धन करनी, जो जानत सकल जहान।
धन पतनी जो पति मुख पंकज, करत मधुप इव पान॥
 

१. धन्‍य

बिदेशी : त हमरा के नाहिये जाये देबू।

सुंदरी : नाहिये जाये देब।

बिदेशी : खूब सोच-बिचार ल तहरा भाई के गवना बा। हमहूँ तोहरा के नइहर ना जाये देबऽ।

सुंदरी : नइहर छूट जाई ऊ पक्‍का। हमरा के कइसे छोड़ के चल जाइब आँखि के सोझा से ना जाये देब।

बिदेशी : (गीत)

प्‍यारी, देस तनी देखे द हम के।
जात-आवत में देरी ना लागी, जइसे घोड़ा के रेस। देस तनी..।
कहना मानऽ करब ना देरी, जल्‍दी से भेजब सनेस। देस तनी...।
बल बुद्धि से रोजे कमाइब, नगद माल हरमेस। देस तनी...।
कहत ' भिखारी' तूँ सोच दूर करऽ करिहन कृपा महेस। देस तनी...

सुंदरी : (गीत)

पिया मोर, मति जा हो पुरुबवा।
पुरुब देस में टोना बेसी बा, पानी बहुत कमजोर। पिया मोर...
सुनत बानी आँख पानी देत बा, सारी भइल सरबोर । पिया मोर...
एक नाथ बिनु मन अनाथ रही, घुसी महल में चोर। पिया मोर...
कहत ' भिखारी' हमारी ओर देखऽ, ' कतिना करीं निहोर? पिया मोर...

(गोड़ पर गिरतारी)

१. जादू-टोना

२. बहुत , अधिक

३. बहुत भीग जाना

४. कितना

५. अनुनय-विनय।

बिदेशी : तूँ त अनेरे नु फुट-फुट गोड़ पर गिरतारू। अच्‍छा लऽ, अतना रो अतारू, त हम कलकता ना जाइब, अच्‍छा एहिजे रहऽ, हम तनी स्‍नान क के आवतानीं।

सुंदरी : हँ, रउवा कलकता मत जाइब। जबसे रउवा कलकाता जाये के नाम लेत बानी, तब से हमार भादो के दरियाव लेखा करेजा उल्‍ह-माल (उद्विग्‍न) करत बा, हो दादा।

बिदेशी : अनेरे (व्‍यर्थ) नू तहार करेज उल्‍ह-माल कइले बा। हम तहरा के छोड़ के ना जाइब।

सुंदरी : ए रवों, हम बाल्‍टी में पानी आने (ले आना) देतानी, रउआ एहीजा (इसी जगह) स्‍नान करीं।

बिदेशी : स्‍नाने कइला ले बा? जाइब त स्‍नान करब, मंदिल (मंदिर) में शंकरजी के पूजा-पाठ करे के होई, जल चढ़ावे (जलाभिषेक) के होई।

सुंदरी : ए रवों, हम जातानी फुलवाड़ी में से फूल तूर (तोड़ना) के आन देत बानी। रउआ मंतर (मंत्र) पढ़ देहब। हम जाइब, त शंकरजी पर चढ़ा आइब।

बिदेशी : जब सब काम घर में मेहरारूए (महिला) करी, त मरद (मर्द, पुरुष) घर में रहि के का करी? हटीं जी, हमरा के जाये दीं। कतना देरी से पेसाब लागल बा। पेसाब (पेशाब, लघुशंका) का मारे पेट फूलि के नर-गर (पूरा भर जाना) भइल आवता।

सुंदरी : एगो कँटिया (मिट्टी का छोटा घड़ा) आन देत बानीं, पेसाब क लेब। हम फेंक देब।

बिदेशी : आरे बउराहिन कहीं के, नीमन (अच्‍छा, स्‍वस्‍थ, बढ़िया) आदमी कँटिया में पेसाब करेले? इहे असगुन मनावत बाडूकि बेमार परस, परले-परल पेसाब करस?

सुंदरी : रावां बरतन में पेसाब ना करब, त चलीं जहाँ पेसाब करब, तहाँ हम खड़ा रहब।

बिदेशी : आरे पागल, पेसाब उतरी कि टीक (सिर का उच्‍चतम भाग, शिखा) प चढ़ जाई?

सुंदरी : अच्‍छा त जाई, रउआ कर आईं। हम खड़ा बानीं। बाकी हमरा से छल मत करब।

(बिदेसी पेसाब करे का बहाने मंच का एक ओर जाताड़न। कुछ देर तक प्‍यारी सुंदरी उनका आवे के प्रतीक्षा करत बाड़ी। अचानक बहुत तेजी से मंच छोड़ देताड़ी)

समाजी : (चौपाई)

पिउ के प्‍यारी राखन लागे। करि छल कछुक धीर१ देइ भागे॥

१. कुछ धैर्य

( मंच पर एक ओर से बिदेशी आ दोसरा ओर से दोस्‍त के प्रवेश)

बिदेशी : (दोस्‍त से) राम राम दोस्‍त।

दोस्‍त : राम राम, बड़ा चंचल बाड़ऽ?

बिदेशी : हमरा घर के समाचार नइख नूं जानत?

दोस्‍त : कवन ममिला लागल, कहीं पिटइलऽ हा?

बिदेशी : ना दोस्‍त राम। कलकाता जाये के मन भइल बा। औरत से सलाह लेबे लगनी हाँ, त ऊ अठान-कठान (विरोध प्रकट करने के लिए धरना की तरह भंगिमा बनाना) डाल देली हा। हम खुदे चल देली हाँ। दोस्‍त से तनी सलाह लेबे खातिर अइलीं हाँ।

दोस्‍त: हमार राय लेबे अइलऽ हा?

बिदेसी : हँ।

दोस्‍त : हम राय ना देबऽ।

बिदेसी : काहे ना राय देब।

दोस्‍त : तू काल्‍हे गवना करवलऽ हो आ आजे जतरा क देलऽ? तहरा लेखाचपाट (मूर्ख) सवाँग (सदस्‍य, पति) खोजलो पर ना मिली।

बिदेसी: का दोस्‍त राम, गवना करावेवाला बिदेस ना जाय?

दोस्‍त : रह-सह के जाला। एके बेरा पावदान पर लातऽ ध देलऽ। तूँ ना मनबऽ?

बिदेसी : ना।

दोस्‍त : त अच्‍छा जा।

(बिदेसी चार डेग आगे बढ़ि के लवटतार)

बिदेसी : (दोस्‍त से) दोस्‍त राम, जतरा ठीक रहे कि भेंट हो गइल। चाभी छूटले जात रहे। हईं (यह) चाभी लीं।

दोस्‍त : चाभी कहाँ के हऽ?

बिदेसी : ई चाभी तीसरा अँगनई में कोनिया (कोने वाले) घर में अलमारी बा, ओकरे ह।

दोस्‍त : जवन सोनपुर में किनाइल (क्रय की गई, खरीदी गई) रहे?

बिदेसी : हँ, ओही अलमारी में कपड़ा-लत्ता, गहना-गुरिया, सब कुछ बाजाप्‍ते राखल बा। केह देब खूब पेन्हिहें, कुछ चिंता मत करिहें। खाये खातिर रबड़ी-मलाईं, जतना खाइल पार लागे, खाइल करिहें, जेमें मस्‍त रहिहें। रामजी कथी (किस चीज या बात) के कमी देले बानी?

दोस्‍त : (मुँह फेरि {दूसरी ओर मोड़ना} के) का बड़ले बा? (सोझा) गाय हव?

बिदेसी : हँ, एगो गाय बिआ। कोराई (दाल का छिलका), चोकर (गेहूँ पीसकर आटा को चालने पर निकलने वाला पदार्थ), भूँसी (गेहूँ के सुखा पौधे काटने के बाद उसके पौधा के निकाला पदार्थ) राखल बा, खूब खिअइहें।

दोस्‍त : जवन ससुरारी दहेज मिलल रहे?

बिदेसी : हँ-हँ। एगो सलाह बा। हमार घर राउर घर तनी दूर बा। कभी काल जाके हाल-चाल लेत रहब।

दोस्‍त : हई चाभी लऽ। जुग- जबाना खराब बा। लोग का कही?

बिदेसी : जब हमार राउल मन साफ बा, त केहू का करी?

दोस्‍त : अच्‍छा ठीक बा, जा।

बिदेसी : राम राम दोस्‍त।

दोस्‍त : राम राम भाई।

(बिदेसी बाहर जातारन। प्‍यारी सुंदरी मंच पर आवतारी। बिदेसी के दोस्‍त मंचे पर बाड़न।)

सुंदरी : (बिदेसी का दोस्‍त से) ए रवों, उहाँ के देखलीं हाँ?

दोस्‍त : केकरा के?

सुंदरी : रउआ अपना दोस्‍त के?

दोस्‍त : हँ, देखलीं हाँ।

सुंदरी : कहाँ देखलीं हाँ, तनी बताई ना।

दोस्‍त : टीसन (स्‍टेशन) पर देखलीं हाँ, टिकट कट के रेल में बइठल।

सुंदरी : ए रवों, जाईं, भेंट हो जाई?

दोस्‍त : आरे ओहिजे बाड़न? झाझा निअरवले होइहें।

सुंदरी : कुछ कह गइलन हॉं?

दोस्‍त : कहल छोड़ऽ, हमरा के पक्‍का पहचान दे गइजन हाँ। हई लऽ चाभी। देखिहऽ, रिंग ढीला बा, दबा के रखिह। जानत बाड़ू चाभी कहाँ के ह? तीसरा अँगनई में कोनियाँ घर बड़हू नूँ? ओह में अलमारी बा?

सुंदरी : हँ।

दोस्‍त : ओही में लूगा-सारी बा, खूब पेन्हिह। गाय हव?

सुंदरी : हँ, बिआ।

दोस्‍त : गाय के अतना खिअइह कि कबज जाय।

सुंदरी : अच्‍छा।

दोस्‍त : खुब रबड़ी, मलाई आ अनारकली बिसकुट चाभल करिहा।

सुंदरी : का हमरा से मजाक करतानीं।

दोस्‍त : दोस्‍त का जनाना से मजाक कइल जाला?

सुंदरी : अब का करीं हो दादा।

समाजी : (चौपाई)

सुनि प्‍यारी पिउ गए परदेस। तेहि छन हो गई पागल भेस॥
याद परे जब पति पेयाना। श्‍वांस लेत लागे धनु बाना ॥
रोवन लागे धुनि-धुनि छाती। सूझे तनिक दिन ना राती॥

(प्‍यारी सुंदरी बिलाप करतारी)

सुंदरी : (गीत-१)

करि के गइलन बलमुआँ निरासा
गवना करा के सँइयाँ घरे छोड़ि दिहलन,
गइलन बिदेस हमें करि के बेकासा। निरासा...
सँइयाँ के सुख हम कुछुओ ना जनलीं,
बिचहीं बिधाता बितवलन तमासा। निरासा ....
सतदेव सत राखऽ अरज करति हूँ,
दुख में दया करऽ शंकर जरा सा। निरासा....
कहत ' भिखारी' भगवती सहाय होखऽ,
सँइयाँ मिला के पुरा देहु आसा। निरासा...

१. पति, प्रियतम

२. निराश

३. पति

४. बलहीन।

( गीत-२)

घरवा के ना तनिको उदेस कइलन, जब से बिदेस गइलन साजन मोर।
गवना करा के सँइयाँ घरे छोड़ि दिहलन, गइलन पुरुबवा के ओर। जबसे...
खत-खबर एको ना भेजलन, हो गइलन निपटे१ कठोर।
दाढ़ी धरती रहीं, पँइयाँ परत रहीं, कहि-कहि लाख-कड़ोर । जबसे ...
दया तनिक उनुका नाहिं लागल, भगलन बँहियाँ झकझोर।
सँइयाँ के सुख हम कुछुओ ना जनलीं, देखलीं ना काला चाहे गोर। जबसे...
चहुँ दिसि चितवत बीतत रात-दिन, कतहूँ ना लउके अँजोर।
कहत भिखारी अब जिअल कठिन बा नयना से ढरकत बा लोर। जबसे...

 

१. निहायत, बिल्‍कुल

२. पैर

३. करोड़

४. ध्‍यान से देखना

५. जीना, जीवित रहना

६. मर्यादा

७. ढब-ढब की ध्‍वनि बजाने वाले।

(गीत-३, जँतसारी)

जबहीं पिया मोर गइले पुरुबवा, लिखि के ना, भेजले एकउ पाती,
लिखि के ना भेजले एकउ पाती।
सैयाँ के रूप-गुण मनवाँ में गुनि-गुनि, बइठल बितेला सारी राती,
बइठल बितेला सारी राती।
दुखदाई जरत बाटे छाती आई के पहुँचल तू बरसाती,
आई के पहुँचल तू बरसाती॥
कहत ' भिखारी' मोरा प्राण छूटत नइखे,
जिउवा कठोर बाटे गुलाम के नाती।

(चौबोला)

छोड़कर चला परदेस पिउ मैं क्‍या कहूँ इस बात के।
जोहती डगर दिन भर उन्‍हीं का कल परत नाहिं रात के॥
महादेव? भगवान हे। मरजाद राखहु, लाज जातके।
कहते ' भिखारी' पिउ मिलसु, न तु जीव होइहें घात के ॥

समाजी : (चौपाई)

तेहि अवसर बटोही एक आये। तासो प्‍यारी दुख सुनाये॥
पति गुन कहि-कहि रोवन लागी। सुनि बटोही के धीरज भागी॥

(बटोही के मंच पर प्रवेश। बटोही पूछ रहल बाड़े बाजा बजनिहार सजवहिया से)

बटोही : ए बबुआ ढब-ढब (ढब-ढब की ध्‍वनि बजाने वाले)

समाजी : का ह बाबा?

बटोही : हम टीसन पर जाइब, ए बबुआ।

समाजी : ए बाबा, हइहे (यही) रास्‍ता सीधे टीसन पर चल जाई।

बटोही : अच्‍छा ए बबुआ, ई बतावऽ कि कलकाता के मसूल (किराया) कतना (कितना) बा।

समाजी : कलकाता के मसूल एह घरी तीस रुपया लागी।

बटोही : (चिहा {आश्‍चर्य चकित होना} के) तीस रुपया लागी? सवा रुपया में ना फरिआई (सुलझना) ?

समाजी : सवा रुपया में त टिकठे ना मिली, महराज।

बटोही : बबुआ, कम सुने लऽ का? हम कहतानी रेल, तूँ कहतारऽ टिकठ (टिकट)।

समाजी : टिकठे ना कटइबऽ, त रेल प कइसे चढ़बऽ?

बटोही : का बबुआ, टिकठ प चढ़ा के रेल में धसोर (धक्‍का देकर गिरा देना) दिआई?

समाजी : ना महाराज, तीस गो रोपेया देबऽ, त एगो टिकठ मिली।

बटोही : टिकठ कथी (क्‍या) के?

समाजी : कागज के।

बटोही : कती (कितनी, किस) मूटी (आकार) के?

समाजी : हती (इतनी) मूटी के।

बटोही : हमरा के बुरबके (मूर्ख) समझतारऽ? तीस गो रोपेया लागे जात बा, त नान्‍हा-बार के सूते (सोने) - बइठे लायक ना होई, त लेके का होई?

समाजी : कवनो घर-दुआर ह?

बटोही : अच्‍छा ए बबुआ, तीस रोपेया टिकठ में लाग गइल। रेल में कतना लागी, बबुआ?

समाजी : रेल में एको पइसा ना लागी।

बटोही : अच्‍छा ए बबुआ, रेल में हमार एको पइसा ना लागी, त टिकठ के कवन (कौन) काम बा? हम रेल में बइठ के दमदमवले (दमदार स्थिति में) चल जाइब।

समाजी : ए बाबा, बिना टिकठ लेले रावां रेल में चढ़व, त दोबरी (दोगुना) चार्ज लाग जाई। ना त छव महीना जेहल (जेल) के खिचड़ी खाये के परी।

बटोही : ए बबुआ, ई त घरो छोड़ला के बड़ा भारी रोग भइल।

समाजी : ए बाबा, त खरचे-बरचे रावां पास में ना रहे, त कलकाता का चल देली? पगरी (पगड़ी) बन्‍हा के, लाठी लेके, सेरवानी झारि के चल देले बानी।

बटोही : हम का जानत बानी कि रेल में आ टिकट में एके हाली दाम बुकनी (चूर) हो जाई हो?

समाजी : ए बाबा, आज कल मसूल (भाड़ा) बढ़ गइल बा।

बटोही : बढ़ जाला अधेली-सूका कि एके हाली दहाना-के-दहाना?

(प्‍यारी सुंदरी खड़ा हो जातारी)

प्‍यारी : ए बाबा।

बटोही : का बबुआ, कुछ कहबऽ का?

समाजी : हम रावा से कुछ नइखीं कहत। होने बाड़ी भगतिन (भक्‍त महिला)।

सुंदरी : ए बाबा।

बटोही : का बबुआ, कुछ कहबू का?

सुंदरी : हम पूछतानीं जे रावां कहाँ जाइब।

बटोही : हमरा से? कलकाता हो बबुआ। ओह बबुआ से रेल के भाड़ा-बूता पूछतानी, तोहरा से कुछ ना हो, तूँ जा।

सुंदरी : ए बाबा, हम रउआ से एगो आपन दुख कहबऽ।

बटोही : का भइया, हम कवनो ओझां-गुनी हुई?

सुंदरी : ओझा-गुनी के बात नइखे, ए बाबा। जब से हमार पति परदेस चल गइलन, तब से एगो-चपाठी (पत्र आदि) ना भेजलन हा, ए बाबा।

बटोही : ओ, पाठा (बकरी का मादा बच्‍चा) भुलाइल बा। खूँटी में गाड़ के चरही (दूर तक लम्‍बी रस्‍सी) में बाँध देला, ओही पर भला मचत रहिती।

सुंदरी : पाठी नइखे भुलाइल। हम रावां से पूछतानी कि रावां कहाँ जाइब। गइलन तब से एको चीठी ना आइल।

बटोही : ओ, मालूम भइल, पेट बथत (दर्द करना) बा। का खइलू हा, फुलवरी (उड़द की बरी)?

सुंदरी : कुछुओ ना, ए बाबा।

बटोही : ओ, एक ढेबुआ (पूर्व में प्रचलित एक वर्गाकार तांबे का सिक्‍का) भर आदी खा लीहऽ।

सुंदरी : ए बाबा।

बटोही : जतना अयगुन होई, सब पचा दी।

सुंदरी : ए बाबा, रावां सुनात नइखे?

बटोही : आ रे पागल, हमरा सुनाते नइखे? ई जुलुमी दवा ह, जुलुमी (अत्‍याचारी, असरदार)।

सुंदरी : हमार पेट नइखे बथत, ए बाबा। जब से हमार पतिजी परदेस में गइलन, तब से एको चीठी आ चपाठी ना भेजलन हाँ, हो बाबा।

बटोही : मालूम भइल। ओ, पीठी के सियार ले गइल बा। एगो कि दूर गो रे? दू गो ले गइल होई, त एह अकाला (अकाल) में राजे बुरुज भइल।

सुंदरी : हे? पाठी सियार नइखे ले गइल। जब से हमार स्‍वामीजी परदेस गइलन, तब से एको जोह-जाह (सूचना) ना मिलल ह, ए बाबा।

बटोही : ओ? स्‍वामी कवन चीज रे?

सुंदरी : ए बाबा, हमरा घर के सवाँग।

बटोही : त हइसे नूँ फरिआ के कहेला। तब से तें बीस गो भेंवता (भ्रामक बात) का कइले बाड़िस? के, ससुर (श्‍वसुर) ?

सुंदरी : ना।

बटोही : भसुर (पति के बड़े भाई) ?

सुंदरी : ना।

बटोही : देवर (पति का छोटे भाई) ?

सुंदरी : ना।

बटोही : जाउत (पति के भाई का पुत्र) ?

सुंदरी : ना।

बटोही : फेर दूर होले कि ना। एक हाली (बार) कहेली कि हमरा घर के सवांग हवन, एक हाली कहेले कि के हुए ना। ई बाबा के बुरबक समझ लेले बाड़ी। अब बुरबक का साथे बुरबक लेखा बतिअवला से फरिआई। ई बताउ जे नाता में केहू लागेलहू।

सुंदरी : हँ, ए बाबा।

बटोही : के ?

सुंदरी : ए बाबा, पुरुष।

बटोही : ओ बुझ गइलीं - भतार (पति, भर्ता)।

सुंदरी : हँ, ए बाबा।

बटोही : तब, तूँ, हमरा से...

सुंदरी : ए बाबा। रउआ ओनिये (उसी ओर) कावर (की ओर) जातानी, तनी खोज-ढूँढ़ के पता लगा के रउआ तनी लिअवले आइब, ए बाबा।

बटोही : ई बताउ कि हम चलल बानीं नगद नारायण दाम कमाए कि देसा-देसी तुम्‍हारा भतार खोजता है?

सुंदरी : ए बाबा, रउआ हमार देह नइखीं देखत का?

बटोही : आउर बनल। रे पागल, भला हम तोर देह देख के का करबऽ? केकरा घर के ना सर-सवाँग देस-परदेस कमाए जाला? त का घर के बेकत (व्‍यक्ति) आपन प्रान त्‍याग देली? हमहू? त अपना घर के एगो सर-सवाँग हईं जे दम-दमवले चलल बानीं बहरा कमाए खातिर (के लिये)।

सुंदरी : ए बाका, पाव (चार छटाँक या २५० ग्राम के कम वजन) भर बनावल हमरा से ना घोंटाय।

बटोही : ना हमार बाबू। का खाइल जात होई? ना ढुकते (भीतर घुसना) होई, ना धँसते (नीचे की ओर जाना) होई। बूढ़ हो गइल बानी, हमार अकिलो (अक्‍ल, बुद्धि) कतहूँ (किसी अन्‍य जगह) हेराइला (खो जाना) बा? (समाजी का ओर) बबुआ रे, हमरा बुझात नइखे कि एह उमर के जनाना के आँखि का सोझा सवाँग जो ना रहे, त मन करत होई कि कुँआ में गिर जाईं।

सुंदरी : ए बाका, चलीं कुछ अन-जल क लीं।

बटोही : का अन-जल करीं रें? तोरा (तुम्‍हारा) दुख के मारे ओटा (चबूतरा) खिआई (घिस जाना) गइल बा।

(बटोही बइठतारे)

समाजी : (पूर्वी)

सिरि गनपति के चरन के सरन गहि,
कहि के सुनावत बानीं गीत में बिदेसिया।
मचिया१ ऊपर धनि, छतिया में हनि-हनि,
पति के धेयान ध के रोवे प्‍यारी धनियाँ।

१. बहुत छोटी सहेली।

सुंदरी : (गीत - तेवड़ा)

अब पत१ राखऽ श्री भगवान !
करि गवन मोहिं छोड़ि भवन, पिया कइलन पुरुष पेयान। अब पत...
ना मालूम केहि२ देस गइलन, तनी ना मिलत ठेकान३। अब पत...
राम ना बिसरत४ एक छन, मोर भइल बा बयस५ जवान। अब पत...
अब ले कसहूँ धीर धरीं, हम करिके छाती पखान६। अब पत...
कहे ' भिखारी' पिया का पद में रहत निसि-दिन ध्‍यान। अब पत...

(गीत-पूर्वी)

करि के गवनवाँ भवनवाँ में छोड़ि कर, अपने परइलऽ पुरुबवा बलमुआँ।
अँखिया से दिन भर गिरे लोर ढर-ढर, बटिया७ जोहत दिन बीतेला बलमुआँ।

१. प्रतिष्‍ठा

२. किस

३. ठहरने की जगह

४. विस्‍मृत होना, भूलना

५. उम्र

६. पत्‍थर

६. बाट, राह

बटोही : आरे हमार बाबू, चुप रहऽ। गइल बाड़न, त ओतही (वहीं) रहिहन? अइहन (आएँगे) नूँ।

सुंदरी : (गीत)

गुलाम के नतिया, आवेला जब रतिया त, तिल भर कल ना परत बा बलमुआँ।

बटोही : आ का कल परो हो दादा।

समाजी : तूँ काहे रोअतारऽ ए बाबा?

बटोही : बेचारी के दुख देखि के जीव ब्‍याकुल बा।

सुंदरी : (गीत)

तोहरे कारनवाँ परानवाँ दुखित बाटे,
दया क के दरसन दे दऽ हो बलमुआँ।
काइ कइलीं चूकवा कि छोड़लऽ मुलुकवा तूँ,
कहलऽ ना दिलवा के हलिया बलमुआँ।
साँवली सुरतिया सालत१ बाटे छतिया में,
एको नाही पतिया भेजवलऽ बलमुआँ।
कवना नगरिया डगरिया में पिया मोर,
करत होइबऽ घर-बास हो बलमुआँ।
घर में अकेले बानी, ईसवर जी राखऽ पानी,
चढ़ल जवानी माटी मिलता बलमुआँ।
बिरह के कूपवा में, जोगिनी का रूपवा में,
तोहरे के अलख जगाइब हो बलमुआँ।
मदन सतावत बाटे, छतिया फाटत बाटे,
अनवाँ जहर लेखा लागत बा बलमुआँ।
जनितीं त ध के हाथ, छोड़ि‍तीं ना तनी साथ,
दिन-रात सँगही में रहितीं बलमुआँ।
ताकत बानी चारू ओर, पिया आ के करऽ सोर,
लवटो अभागिनी के भगिया२ बलमुआँ।
मोरा लेखा दुखिया के मुखिया ना जग केहू,
भुखिया बा तोहरे दरस के बलमुआँ।
निज हाथे तेगा धरि, गरदन काटि करि,
माटी में मिलाइ के परइलऽ बलमुआँ।
कहत ' भिखारी' नाई, आस नइखे एको पाई३,
हमरा से होखे के दीदार हो बलमुआँ।

( रोअत-रोअत बटोही के देह पर गिर जातारी)

१. पीड़ा देना

२. भाग्‍य।

३. पूर्व प्रचलित छोटे मान का सिक्‍का।

बटोही : कहब, कहब।

सुंदरी : (बटोही से) (गीत - पूर्वी )

कहाँ जइबऽ भइया?, लगावऽ पार नइया, तूँ मोर दुखदेखि ल नेतर४ से बटोहिया।
सुनऽ हो गोसइयाँ५, परत बानीं पइयाँ, रचि-रचि कहिहऽ बिपतिया बटोहिया।
छोड़ि कर घरवा में, बीच महधारावा६ में, पियवा बहरवा में गइलन बटोहिया।
जइबऽ तूँ ओही देस, देखि लऽ नीके७ कलेस८, ईहे सब हलिया सुनइहऽ बटोहिया।
नइहर ईयवा९, तेयागि देलन पियवा, असमन१० जनिहऽ जे धियवा११ बटोहिया।
कइसे के कहीं हम, नइखे धरात दम, सरिसो फुलात बाटे आँखि में बटोहिया।
कहत ' भिखारी' नीके मन में बिचारि देखऽ, चतुर से बहुत का कहीं हो बटोहिया।

४. नेत्र , आँख

५. देवता

६. मझधार

७. ठीक से

८. क्‍लेश

९. कहीं (माँ) और (कहीं) दादी

१०. ऐसा

११. बेटी।

बटोही : (पूर्वी)

कइसन पिया तोर ? करिया कि हवन१ गोर?
सचमुच रूपवा बता दऽ प्‍यारी धनियाँ।
जाइ के कहब हम, तोहरा ले नाहीं कम,
अधिका बुझाई, जहाँ तक प्‍यारी धनियाँ।
मन में सबुर२ करऽ, जयऽ ' शिव, हरिहर'
कहत ' भिखारी' कारज३ होई प्‍यारी धनियाँ।

१. हैं

२. सब्र, धैर्य

३. काम

सुंदरी : (बारहमासा)

करिया ना गोर बाटे, लामा४ नाही हउवन नाटे५,
मझिला६ जवान साम७ सुंदर बटोहिया।
घुठी८ प ले धोती कोर, नि‍कया९ सुगा के ठोर,
सिर पर टोपी, छाती चाकर१० बटोहिया।
पिया के सकल के तूँ मन में नकल लिखऽ,
हुलिया के पुलिया११ बनाइ लऽ बटोहिया।
आवेला आसाढ़ मास, लागेला अधिक आस,
बरखा१२ में पिया घरे रहितन बटोहिया।
पिया अइतन बुनियाँ१३ में, राखि लिहतन दुनियाँ में,
अखड़ेला१४ अधिका सवनावाँ बटोहिया।
आई जब मास भादो, सभे खेली दही-कादो१५,
कृस्‍न के जनम बीती असहीं बटोहिया।
आसिन महीनवाँ के, कड़ा घाम१६ दिनवाँ के,
लूकवा१७ समानवाँ बुझाला हो बटोहिया।
कातिक के मासवा में, पियऊ का फाँसवा में,
हाड़ में से रसवा चुअत बा बटोहिया।
अगहन-पूस मासे, दुख कहीं केकरा से?
बनवाँ सरिस बा भवनवाँ बटोहिया।
मास आई बाघवा१८ लागी माघवा,
त हाड़वा में जाड़वा समाई हो बटोहिया।
पलंग बा सूनवाँ, का कइलीं अयगुनवाँ से,
भारी ह महिनवाँ फगुनवाँ बटोहिया।
अबीर के घोरि-घोरि, सब लोग खेली होरी
रँगवा से भँगवा१९ परल हो बटोहिया।
कोइलि के मीठी बोली, लागेला करेजे गोली,
पिया बिनु भावे ना चइतवा बटोहिया।
चढ़ी बइसाख जब, लगन पहुँची तब,
जेठवा दबाई हमें हेठवा२० बटोहिया।
मंगल करी कलोल, घरे-घरे बाजी ढोल,
कहत ' भिखारी' खोजऽ पिया के बटोहिया।

( प्‍यारी सुंदरी आपन बिपति बावते जात बाड़ी)

(गीत - १, झूमर)

गवना कराके सईयाँ , छोड़लन गईलन परदेश,
कइलन ना प्‍यारी के उदेश। परदेश॥
हरदम रटत बा पिया, कहि-कहि पिया परदेश गइलन,
फिकिर२१ परल बा हरमेश। परदेश॥
युवा पन बीत जइहन, कबले अइहन परदेश गइलन,
कुछ दिन में पाक जइहन केश
कहत भिखारी दास अइतन खास परदेश गइलन,
जात बाटे छतिया में गेस२२।

४. लंबा

५. छोटे कद वाला

६. मध्‍यम कद

७. श्‍याम

८. ठेहुना

९. नाक

१०. चौकोर, फैला हुआ

११. पुल

१२. वर्षा

१३. बूँदा-बूँदी

१४. कीचड़

१५. धूप

१६. लू

१७. माघ

१८. कंपन पैदा करना

१९. भाँग, एक मादक पौधा

२०. छोटा

२१. फिक्र, चिंता।

२२. घुसा देना

सुंदरी : (गीत - २)

पिया मोर गइलन परदेस , ए बटोही भइया।
रात नाहीं नीं
दिन तनी ना चएनवाँ, ए बटोही भइया,
सहतानी बहुते कलेस, ए बटोही भइया।
रोवत-रोवत हम भइलीं पगलिनियाँ, ए बटोही भइया,
एको ना भेजवलन सनेस, ए बटोही भइया।
नाहके जवानी हम के दिहलन बिधाता, ए बटोही भइया,
कुछ दिन में पाकि जइहन केस, ए बटोही भइया।
कहत ' भिखारी' तोहरा गोड़ के लउँड़िया१, ए बटोही भइया,
करऽ पिया के कसहूँ उदेस, ए बटोही भइया।

(गीत - ३, बिरहा)

चढ़ल जवानी जोर पियऊ हो गइलन कठोर ,
हमें छोड़ के लोभइलन२ परदेस।
छोड़ के लोभइलन परदेस बटोही भाई,
गवना कराके दिहलन घरवा में बइठाई।
का कइलीं कसूर जे परदेस गइलन पराइ३ ,
एकर कुछुओ हालत बालम ना देहलन सुनाई।
पियऊ का बियोग में प्रान छूटि जाई,
हमरे सिरवे बीतत बा, ना दोसरा का बुझाई।
लहकत४ बा करेज आ के अगिया के बोताई५?
कहे ' भिखारी' तनिक पिया के दरसन द कराई
हमें छोड़ के लोभइलन परदेस।

(गीत - ४)

दोउ कर जोरि अरज करत हूँ , सुनहु बटोही मोर भाई।
करउ प्रनाम, काम अड़बड़६ बा, सुनहु बटोही मोर भाई।
छल करिके पिया पुरुब देस में चलि गइलन बिसराई॥
प्रान पिया बिनु कुछु ना सोहाता उर में दाह अधिकाई।
बाट चलत में पियारी७ छाई, पढ़त सुग्‍गा उड़ि जाई।
अपने चलत ना अब लगि केहु के, कुछुओ कइलीं बुराई।
ना जाने केहि हेतु बिधाता दिहलन डबल८ सजाई।
धरम के भाई, होखऽ सहाई, का-का दुख सुनाईं?
स्‍वामीजी के चरन देखब तब नया जनम होइ जाई॥
पिया-पिया रटि-रटि प्रान तेजब हम, अब ना बिपति सहाई।
कहे ' भिखारी' पिया प्रेम के फाँसी दिहलन गले लगाई॥

१. दाई , दासी

२. लुब्‍ध हो जाना , लोभ में फँसना

३. भागना

४. प्रज्‍वलित होना

५. बुझाना , संयमित करना

६. कठिन , विचित्र

७. चींटी , कमजोरी के कारण झिनझिनी की बीमारी

८. दुगना , बड़ा।

 

( प्‍यारी सुंदरी रोअत रोअत चल देत बाड़ी। एकरा बाद बटोही भी चल देत बाड़न। दुसरा ओर से मंच प आ के रंडी आ बिदेसी तास खेलत बा लोग। तब तक घूमत-घूमत बटोही पहुँच जात बाड़न।)

समाजी : (पूर्वी)

चलि भइलन राहे राही , बनि के अधिक दाही४,
पुरुब का देसवा में पहुँचे बटोहिया।
नगर-सहरियावो हाटवा-बजरिया में,
करत बिदेसी के उदेस हो बटोहिया॥
लोग से भरल मेला, कतहूँ ना लउकेला,
माथ पर हाथ धके झँखेला५ बटोहिया।
रामजी के दया भइले, एक ओरि चलि गइले,
खुलि गइले पलक दइब६ के बटोहिया॥
बइठि के सलोनी७ पास, खेलत रहलन तास८,
सनमुख९ परल नजरिया बटोहिया।
चीन्हि१० का मने मन, होइ गइलन धने-धन,
प्‍यारी के खबर कहे लगलन बटोहिया॥

४. दयालु , मृत्‍यु के बाद मुखाग्नि देने वाला

५. दुख पूर्ण चिंतन

६. देवता , ईश्‍वर

७. सुंदर स्‍त्री

८. पत्तों का खेल

९. सम्‍मुख , सामने

१०. पहचाना

बटोही : (बिदेसी से)

सुनि लऽ बिदेसी बात, कइलऽ तूँ बहुत घात१,
अबहूँ से चेतऽ दीन-दुनियाँ बिदेसिया।
तोर कुलवंती नारी, रोअतारी पूका फारि२,
काटि के तूँ डालि दिहलऽ कुँआ में बिदेसिया।।
ध्‍यान धके पति पर, फेंकरि-फेंकरि कर,
मनि बिनु फनिक बेहाल बा बिदेसिया।
खेलतारऽ जूआसार, छोड़िकर घर-द्वार,
घरनी३ लोटत४ बिआ धरनी बिदेसिया॥
जल्‍दी से घर चेतऽ५, दुखित नारी के हेत,
अतने गरज६ के अरज बा बिदेसिया।
कहत ' भिखारी' फुलवारी के उजारि देलऽ,
पूत होके भइलऽ जमदूत तूँ बिदेसिया॥

(दोहा)

सुनहु तात एक बात तुम , जुआसार को त्‍याग।
कहना मानऽ नाहीं त, कुल में लागी दाग॥

(चौबोला)

कुल में लागी दाग जोग यह , मानहु बचन हमार॥
आगि लगावहु एह नोकरी में, बजर परहु जुआसार॥
तोरी धनी भइली जस बन के कोइलिया, करे पिउ-पिउ तोहि के पुकार॥
पथर के छाती तोहार हउवे बिदेसी, ना त फाटत तुरत दरार७॥

(गीत-लोरिकायन के लय)

अइलऽ कलकातावा त खतवा भेजइतऽ ताबर हो तोर।
रोपेया भेजइतऽ मनीआडर से, गँइयाँ में होइत हो सोर॥
रापेया खोंइछवा८ में लेइ कर, गुनवाँ गइती हो तोर।
दुअरा पर रहितऽ त केहू नाहीं देखित करिया-गोर॥
सुनरी का लोरवा से चुनरी९ होखत बा सर हो बोर।
कहत ' भिखारी' चेतऽ अबहूँ से, करत बानी निहोर॥

(गीत - लय कुँवर बिजई के)

बबुआ राम नाम करऽ सुमिरनवाँ१० हो ना।
बबुआ लागि गइल नीमन लगनवाँ हो ना॥
बबुआ खोजि कर भइलीं हरानवाँ११ हो ना।
बबुआ महजे भइल दरसनवाँ हो ना॥
घर में रोवत हबहु भीतरे जनानावाँ हो ना।
तेज देले बाड़ी सभ आभरनवाँ१२ हो ना॥
नइखे गतर१३ पर एकहू गहनवाँ हो ना।
लूगा१४ पहिरत बाड़ी फाटल-पुरानवाँ हो ना॥
बबुआ कहियो-कहियो करेली भोजनवाँ हो ना।
लवले बाड़ी तोहरा सूरत में परानवाँ हो ना॥
बाहर चाभत बाड़ऽ पाकल पाता पानवाँ हो ना।
बबुआ बॉव१५ नाहीं जाई कलपानवाँ१६ हो ना॥
बबुआ जलदी से चलि जा मकानवाँ हो ना।
पद चलल भोजपुरी के चलानवाँ हो ना॥
तनी निके कइले जइह पहिचानावाँ हो ना।
सीखऽ गानावाँ के करे के रचनवाँ हो ना॥
तनी कइले जइहऽ नीके पहचानवाँ हो ना।
बबुआ मानिलऽ ' भिखारी' के कहनवाँ हो ना॥

(गीत - आल्‍हा के लय)

भजि ल रामचंद्र के नाम, तुरत बिदेसी चल जा घर के।
देरी करे के नइखे काम, दिन-रात चाहे घरी-पहर के॥
देखत नइखऽ निमन-जबून१७, बहुत दिनन से रहले फरके१८।
लउकी तबहीं होई दिदार, लगिहन नैना से लोर ढरके॥
मन में अचरज बाटे बुझात, लकड़ी संघत करी लहर के।
काहे ना जरि के होइबऽ छार१९, बीगऽ२० प्‍याला भरल जहर के॥
पद अनहद के करऽ बिचार, पदवी पवलऽ ऊँचा दर के।
विद्या से भइलऽ भरपूर, काहे लगलऽ नीचा खरके२१॥
लगन महूरत पहुँचल ठीक, दाहिना अंग लागल अब फरके२२।
पिउ प्‍यारी से होई मिलाप, कहत ' भिखारी' दीअर२३ पर के॥

(गीत - लय पचरा)

बात एक सुनिल बिदेसी भइया, घरवा से चलि अलहूँ।
तोहार जनाना के दुखवा देखि के सुनि के पतिअलहूँ॥
टीसन पर आइ बिदेसी भइया रेल पर चढ़ि गलहूँ।
दिन-रात लागल बिदेसी कलकत्ता में उतरलहूँ॥
खोजत-खोजत बिदेसी कतहूँ पता तनिको ना पलहूँ२४।
प्‍यारी का कारनवाँ पाँच गो रोपे आ अबले ना कमलहूँ।
झूठहूँ का फेर में मत परिहऽ, असले कहल कहलहूँ।
कहत ' भिखारी' आजु हम भेजब कसहूँ बबुआ बलहूँ।

१. विश्‍वासघात

२. जोर-जोर से आवाज कर रोना , सियारिन का रोना

३. घरवाली , पत्‍नी

४. लोट-लोट कर

५. चिंता करना

६. मतलब

७. दिवाल या जमीन का दो हिस्‍सों में फटने के बाद रूप

८. साड़ी पहनने के बाद वह भाग , जो नारी के आँचल का होता है

९. विशेष ढंग की साड़ी

१०. स्मरण

११. परेशान , थकना

१२. सुहाग के चिह्न , आभूषण

१३. शरीर के अंग

१४. साड़ी

१५. व्‍यर्थ

१६. कलपना , हमेशा रोते रहना

१७. खराब , घटिया

१८. अलग

१९. राख

२०. फेंकना

२१. खड़कना , धीरे-धीरे गिरना

२२. फड़कना

२३. दिवार , नदी का छाड़न

२५. पाना

बटोही : (लय पचरा)

दूलहा बनि के गइलऽ बिआह करे
बान्हि के माथवा पर मउरिया१।
हथवा धइके लेइ अइलऽ बनाई लेल बहुरिया२।
तेकरा के छोड़ि के परइलऽ अइलऽ बबुआ देस दूरिया।
खाये के ना घर में हवहिस जब३ - मटर-मसूरिया ४।
हमरा से कहली जे जाके कहिहऽ, कवन कइलीं हम कसूरिया।
दुखवा सुनि के बरत नखहू देह में तनिको सुरबुरिया५।
दुअरा पर रहितऽ बिदेसी, प्‍यारी बनइती-खइतऽ पूरी-जउरिया,
घर के टहल करितऽ चाहे करितऽ केहू के मजूरिया।
मिलि-जुलि के रहितऽ बिदेसी कइले रहिती मनवाँ में सबुरिया।
खुसी से पहिरती प्‍यारी सारी चोली गहना गुरिया चुरिया।
पचारा६ के लइया७ बिदेसी हउए पद हउए भोजपुरिया।
कहत ' भिखारी' नाई हम हईं कानकुबज कुरिया८।

ए बबुआ, हम तोहरा घर से आवत बानी। ए बबुआ, तोहार बेकत के दुख ना देखल गइल हा, त दूगो मजदूरा लगा के रोअवले आवतानी, ए बबुआ।

१. विवाह के अवसर पर सिर पर पहननेवाला विशेष ढाँचा मौर

२. पत्‍नी

३. जौ

४. एक प्रकार का अन्‍न

५. सुरसुरी

६. देवी-गीत का एक प्रकार

७. लय

८. कुड़ी, कुल, उपजाति।

बिदेसी : (पूर्वी)

बान्हि के पगरिया रगरिया मचावतारऽ,
कवना नगरियाके हवऽ तूँ बटोहिया।
हमरी जनानावाँ मकानावाँ भीतरवा में,
साधि१ कर रहेली भवनवाँ बटोहिया।
चीन्हि ले लऽ कइसे, बतावऽ हमें जइसे,
तूँ जानियाँ मकनियाँ भीतर के बटोहिया॥
बटोही : कायापुर घर हउए, पानी से बनावल गउए२,
अचरज अकथ ह नाम हो बिदेसिया।
चललीं बहरवा से कानवाँ परल मोरा,
सती का बिपति के मोटरिया३ बिदेसिया॥
हउईं बटोहिया, लागल जब मोहिया४,
त जोहिया५ लगाइ कर अइलीं बिदेसिया।
तोहरा जनानावाँ के आसरा लागल बाटे,
कब आइ के देबऽ दरसनवाँ बिदेसिया॥
मोरवा मचावे जइसे सोरवा गरज६ सुनि,
प्‍यारी छपटाली७ राही देखि के बिदेसिया।
छोड़िकर घरवा के बहरी ओसरवा८ में,
जलन बिनु मछरी के हलिया९ बिदेसिया॥
बीसवा बरिसवा के, अबहीं ना केस पाके,
साँवर बरन१० प्‍यारी धनियाँ बिदेसिया।
माथवा के बारवा भँवरवा समान बाटे,
मुँहवाँ दीपकवा बरत बा बिदेसिया॥
फूलवा सरिस जगदीस जी बनाइ कर,
पति के बियोग देइ दिहलन बिदेसिया।
सुनिकर कानवाँ में, गुनिकर मनवाँ में,
कहत ' भिखारी' घरे चलि जा बिदेसिया॥

 

१. संयमित

२. गया , गयी

३. बण्‍डल , बँधा हुआ बोझ

४. मोह , दया

५. पता

६. बादल का गर्जन

७. छटपटाना

८. एक पल्‍ले वाले छाजन का मकान

९. हाल , स्थिति

१०. रंग , वर्ण

 

समाजी : (पूर्वी)

अतना सुनत बात , मुरुछा१ बिदेसी खात,
गिरि गइले धरती धड़ाम से बिदेसिया।
जोस नइखे तनवाँ में, होस नइखे मनवाँ में,
प्‍यारी दुख सुनि के बेहोस बा बिदेसिया॥
पतरी२ तिरियवा३, लपकि ध के पियवा के,
अँचरा४ से करेली बेयार हो बिदेसिया।
ताकतारन आँख खोलि, मुँह से ना आवे बोली,
धिरिजा५ धरा के पूछे रंडिया बिदेसिया॥

 

१. मूर्छा

२. पतली , कृश्‍काय

३. स्‍त्री

४. साड़ी का वह भाग , जो स्‍त्री के छाती पर रहता है

५. धैर्य।

बटोही : एके हाली हइसे (ऐसा, ऐसी) हड़बड़ा के गिर गइलऽ? सब कपड़ा लेटा (गंदा होना) गइल, काथी से झारीं ना ईंटा (ईंट, घर बनाने की सामग्री) बा, ना पथल बा। कहऽ ना, बबुआ के ताखी (टोपी) लोघड़ा (जमीन पर गेंद की तरह लुढ़कना) के हेइजा भागल बा। बड़ ताखी बनवले बाड़ऽ, बबुआ! जूना-कुजूना पाव भर सतुआ घोर खा सकेलवऽ।

बिदेसी : ए बाबा,रावां तनी बइठीं।

(बटोही बइठतारे आ बिदेसी घर का भीतर जातारे)

रंडी : (चौपाई)

मन में कष्‍ट भइल कहऽ काहे?
तन कछु पीर कि घर का दाहे?

बिदेसी : दोहा

तन के पीर कछुक नहीं , लागी घर के आह।
प्‍यारी के दुख समुझ के, होत कलजा दाह।

रंडी : प्‍यारी कवन?

बिदेसी : घरवाली।

रंडी : हम हईं बनवाली?

बिदेसी : हाँ-हाँ तुम भी हो।

रंडी : हम हैं कि वह?

बिदेसी : दोनों।

रंडी : क्‍या आप यहाँ रहना चाहते हैं कि घर जाना?

बिदेसी : घर जाना चाहते हैं।

रंडी : ए रवों, जब रावां घरहीं जाये के रहे, त हमार हाथ-बाँह काहे धइलीं?

बिदेसी : तहरा के कवनो हम छोड़ देतानी?

(बटोही से)

ए बाबा!

बटोही : का बबुआ, आ गइलऽ? कवनों प्रकार के अपना घरे-दुआरे जइबे करऽ।

बिदेसी : ए बाबा, हम त अपना घरे जइबे करब, रउआ बहुत देरी भइल। रउवा कुछ अन-जल करीं।

बटोही : हमार त अन-जल कइल ओही दिन बिसर गइल, जवना दिन ओकर दुख देखलीं। तीन दिन ता हमरा झाड़ा फिरला भइल।

बिदेसी : का कहीं, ए बाबा!

बटोही : का बबुआ, मिजाज ठीक बा नूँ?

बिदेसी : जीव त ठीक बा। रउआ से कहे में लाज लागता।

बटोही : कवन अइसन बात बा कि तोहरा कहे में लाज लागता?

बिदेसी : ए बाबा, हम एही से नइखीं कहत कि रावां कहीं कह देलीं...।

बटोही : का बबुआ, हमरा का एके हाली पुरान लुभुकी (एक जगह या व्यक्ति की बात अकारण दूसरी जगह या व्यक्ति से कहनेवाली महिला) समझ गइलऽ? समझ गइलऽ पाव भर अन पचावतानी, एक लोटा जल पचावतानी, एगो बात हमरा से ना पची हो? का जाने, मने ह कहला बिनु ना रहाई, त उहो एकांत में कहब, बबुआ। उहो एकांत जगहा टिपा (चिह्नित करना) लेले बानी। एतवार (रविवार) के दिन हबड़ा पुल पर बइठ के कहब जे ना केहू रही, ना केहू सुनी।

बिदेसी : ए बाबा, घरे से परदेस अइलीं, त आउर एगो सादी एहिजा क लेलीं।

बटोही : ए बबुआ ईहे नीमन काम कइलऽ। लायेक बेटा के इहे काम ह कि जहाँ, तहाँ कुछ हाथे लगा लेवे। कवनों प्रकार से हूँ अपना घरे-दुआरे चल जा।

रंडी : ए रवों, ई के (कौन) ह?

बिदेसी : ना तूँ घर में रहबू।

बटोही : ए बबुआ, ई के ह?

बिदेसी : ए बाबा, ऊहे जनाना ह, जवना से हम सादी कइले बानी।

बटोही : खुद ऊहे हइले हई? हटऽ बउराह, तनी हमरो के देखे दऽ

रंडी : रए रवों, चली घरे, लड़िका रोअत होइहें स।

बिदेसी : ना ओनही (उधर ही) रहबू।

बटोही : का बबुआ, इनका देह से लड़िका-फड़िका बाड़न स?

बिदेसी : हँ, ए बाबा।

बटोही : क गो, बबुआ?

बिदेसी : दू गो, ए बाबा।

बटोही : खास इनका देह से दूगो?

बिदेसी : हँ, ए बाबा।

बटोही : तहरा देह से अभी एको ना ह?

बिदेसी: आ एके बातवा नूँ भइल, बाबा।

बटोही : हम उनुका के बड़ा फरहर (स्फूर्तिशाली, फुर्तीबाज) देखतानी, ए बबुआ। खास टटुआनी के कान कटले बिआ। आ फरहरे ले ना ए बबुआ, बड़ा रहनदार देखतानी।

बिदेसी : हँ ए बाबा, रहन-सुभाव देख के हम मोहा गइलीं हाँ।

बटोही : हँ ए बाबा, देस-परदेस सगरी घुमलीं, बाकी अइसन मेहरारू से भेंट ना भइल रहे। बाकी आज सुजनीं (संयोग) हआ संजोग ह तबे भेंट भइल। ना त हइसे भला कवन मेहरारू होई जे मरद के कपार (कपाल, सिर) पर चढ़ल चले हो?

बिदेसी : ए बाबा, तनी बइठीं।

रंडी : (गाना)

नाहीं कहब जाये के, हम रहब केकरा पास? राजा।
जहाँ-जहाँ जइबऽ तहाँ जवरे (साथ-साथ) लिअवले चलऽ।

बटोही : तूँ का जइबू सहबाला (विवाह के समय दूल्हे के साथ बैठनेवाला, सामान्यतः छोटा भाई, या भतीजा-भाँजा)?

रंडी : माई-बाप छूटल , आखिर भइल उपहास, राजा। नाही...

बटोही : उपहास के करी हो? उपहास करी से अपना घरे रहे। (बिदेसी से) बबुआ, जवना सती के तूँ हाथ-बाँहि धइलऽ, ओह सती के तूँ छोड़ देलऽ, एह में अझुराइल (उलझा हुआ, फँसा हुआ) बाड़ऽ। ई-जादू जोनेले। कवनों प्रकार से घरे चल जा।

(रंडी खड़ा होतिआ)

बटोही: बबुआ, मुँह पर के बड़ाई कइल नीमन ह। इनकर सारी कइसन बा, बेलाउज (ब्लाउज) कइसन बा, सिंगार-पटार कइसन बा।

रंडी : जिअते हमें ना पइबऽ , पाछे खानी मोह खइबऽ
प्रान तेजब (त्यागना) अबहीं ला के गरदन में फाँस, राजा। नाहीं...

बटोही : फाँसी काहें लगइबू हो? तूँ होसियार हो के गँवार भइल बाडू? (बिदेसी से) बबुआ, बिआह में एगो कलसा (पानी से भरा हुआ घड़ा) धराला। कलसा का नीचे बालू बिछावल जाला से मालूम होला कि जलवामयी हवन। तवना पर जब (जौ) बिछावल जाला। ऊ कच्‍छप नारायण हवन। तवना पर से कलसा धइल जाला। मालूम होला कि समुद्र हवन। छीर समुद्र में बिस्‍नू (विष्णु) भगवान रहेलें। एह से ओह में कसइली डाल दि आइल। बिस्‍नू भगवान के साथ लछिमी (लक्ष्मी) रहेली। एहसे ओह में पइसा डाल दि आइल। बिस्‍नु भगवान के नाभी से कमल। आम के पलों (पल्लव, पत्तों का गुच्छा) कलसा में, नीचे डंटी (डंठल) क दिआला। तनवा पर से चार मुँह वाला दिया (दीपक) धराइ जाला। ऊ ब्रह्मा हवन। अतना गवाह के सामने जवना सती के हाथ-बाँहि तू धइलऽ, ओह सती के छोड़ देलऽ, एकरा में आके अझूरा राइलऽ। एकरे जामल (उत्पन्न) तोहरा मुँह में आग दी? कवनों प्रकार से तूँ घरे चल जा।

रंडी : तिरिया के बध होई , पातक से धर्म खोई,
सुनिलऽ लिखल बा, एकर मानऽ बिसवास, राजा। नाहीं...

बटोही : जाये दऽ, बीस दिन में लवट के चल अइहें।

बिदेसी : तूँ रोअते-रोअते आपन प्रान देबू?

बटोही : आ हा हा। तूँ ओकरा गोड़वा पर गिर परऽ। कहऽ हो, तोहरे अइसन आदमी देस-परदेस में असथिर नइखे रहे देत। (रंडी से) गजबे बाड़ू भाई? तनी भर जाये देला त।

रंडी : कहत ' भिखारी' चुगला (चुगलखोर) साबसी जनावत बाटे,
कहाँ के दो पगला बटोही बदमास, राजा।

(रंडी बटोही के माथ पर हाथ चला देतारी)

बटोही : (बिदेसी से) ए बबुआ, तनी हमरो के मार लेबे द।

बिदेसी : ना, ए बाबा।

बटोही : मेहरारू हो के मरद पर हाथ चलवले बिआ। एकरा मारहीं के रहल हा, त ईंटा चला के मारित, पथल चला के मारित, पथल चला के मार दीत, चाहे गड़ासी से काटि के भाला से भोंकि दीत। ई हमरा के माथ पर मरले बिआ। तूँ नइखऽ जानत जे हाथ से माथ पर मारला से आदमी परले पेसाब करेला। ऊ ढेर (बहुत) मरले बिआ, हम थोरहूँ मारब जरूर। ना दादा, गुंडा से हमार नाम कटि जाई। पगरी हमार हलकु हो जाई, भाई।

बिदेसी : आहा, जाये ना दीं।

रंडी : सैंयाँ सुरतिया बिसार के , भाग चला किस देस।
हमसे कुछ ना चूक भई, जानसु उमा-महेस॥

बिदेसी : (दोहा)

प्रान-प्‍यारी धीरज धरू , मत सोचतु मन मांहि।
बहुर (लौट कर आना) आई लबटाइहीं, उहाँ बसब हम नाहिं॥

रंडी : (गीत)

पिया पिरितिया लगाइ के , दूर देस मति जाहु।
कहे ' भिखारी' भीख माँगि के, हम लाइब तुम खाहु॥
प्रातकाल में दरसन करि के, भिक्षा माँगकर लाऊँगी।
अपने हाथ से सुंदर भोजन, नितहीं तुझे कराऊँगी॥

आहा, हे प्रान प्‍यारे नैना के तारे, कहूँ जा मत बिसारे, केवल आसरा है तिहारे।

(गोड़ पर गिरत बाड़ी)

बिदेसी : कहीं बात तुम साँच कामिनी। हम से कहत बनै ना।
पर एक कारन अहै ताहि में कहे बिनु जात रहै ना।
बान समान चोट मोहिं लागत घरनी प्रान तजै ना।
कहै ' भिखारी' यह दुख भारी हम से जात सहै ना।

रंडी : (पूर्वी)

सुनि कर बतिया काँपत बाटे छतिया ,
तूँ दोसरा का मतिया में परलऽ बलमुआँ।

बटोही : फेन हमार नाम धराए लागल।

रंडी : घरे चलि जइबऽ लवटि के ना अइबऽ ,
तूँ आस तूरि के सब नास कइलऽ बलमुआँ।
जइबऽ भवनवाँ परानवाँ तेयागि देहब,
पाका जानऽ जनिहऽ कहनवाँ बलमुआँ।
असल के हईं बेटी, इरिखे (ईर्ष्या) फँसल बा नेटी (गला),
कर तूरि घर जनि जइहऽ बलमुआँ।
अइसन रहिया उपहिया (उपहास्पद) के बात सुनि,
मनवाँ उदास मति करिहऽ बलमुआँ।
कहत ' भिखारी' नाई, तेजि देलीं बाप-माई,
कवन उपाइ हम करीं हो बलमुआँ।

बटोही : (बिदेसी से)

रंडी में ना कुछ बाटे , कुत्ता जइसे हाड़ चाटे,
एको नाहीं घाट तूहूँ लगबऽ बिदेसिया।
छोड़ि दऽ अधरम, मिजाज क के नरम,
तूं मनवाँ में करि लेहु सरम बिदेसिया।
धरम का नाव पर चढ़ि के मउज करऽ,
हरऽ बिरहिनियाँ के दुख हो बिदेसिया।
आवतानी घर देखि, चलि जाई सान-सेखी,
डूबि मरऽ घूठी भर पानी में बिदेसिया।
तोहरी तिरियवा किरियवा (शपथ) के खाई कर,
कहतारी पति बिनु गति ना बिदेसिया।
बिनु देखे चैन ना, दिन चाहे रैन ना,
मैन (मन) बेचैन करत बा बिदेसिया।
बोलिया कोइलिया के गोलिया लागत बाटे,
होलिया समान फूँकि दिहलऽ बटोहिया।
आगि लागे धन में, पिलेग (प्लेग) होखे तन में,
ओ मति केहू परे रंडी-फन में बिदेसिया।
जाके प्‍यारी धनियाँ के, हर लऽ हरनियाँ के,
छोड़ि दऽ कुचलिया (बदचलन) रहनियाँ बिदेसिया।
कहत ' भिखारी' सरदारी अतने में बाटे,
पनियाँ बहाने बोधऽ जनियाँ बिदेसिया।

रंडी : (गाना)

तोहे जाने ना देहौं पियारा ?
जो तुम चाहो कतहुँ को जाना,
हति देहु प्रान हमारा। तोहे...
अबहीं उमर के मैं काँचा (कच्ची) बहुत हूँ,
मन में तूँ करिलऽ बिचारा। तोहे...
निस दिन प्रेम के प्‍यासी रहति हूँ,
ललचत आँख बिचारा। तोहे...
रसिक पिया मोहे त्‍यागि न जाओ,
इतना करो उपकारा। तोहे...
कहत ' भिखारी' अनत (आँख से दूर) कहूँ मति जा,
प्रीतम प्रान अधारा। तोहे...

बिदेसी : (गाना)

मानऽ मानऽ तूँ प्‍यारी हमार कहना।
मुलुक में जाइब, जलदि फिर आइब,
हमरा तघर बा इहे अँगना। मानऽ...
जाइब त भर पेट दाना ना खाइब,
इहवाँ लागल बा बहुत लहना। मानऽ...
राति के कवनो भाँति से ना सूतब,
तोहरे में अधिक लागल चहना। मानऽ...
चाहे ' भिखारी' खराब होइ जाइब,
तोहरे त प्रेम के पेन्‍हब गहना। मानऽ...

रंडी : (गाना)

हमरा के पिया बिसरइहऽ मति हो।
बहुत दिनन से आसा लागल पिया,
आसा निरासा करइहऽ मति हो। हमरा...
मन में धीरज धरऽ छाड़ऽ फिकिर पिया,
झूठहूँ के जिया हहरइहऽ मति हो। हमरा...
एही अरजी पर मरजी करहु पिया,
जियरा के मोर तड़पइहऽ मति हो। हमरा...
तोहरे, सुरतिया में नैना लागल पिया,
अँखिया के मोर तरसइहऽ मति हो। हमरा...
कहत ' भिखारी' सुनऽ सँइयाँ रसिया,
उढ़री (दूसरी शादीवाली पत्नी) के नाँव धरवइह मति हो। हमरा...
बटोही : मानऽ बतिया बिदेसी , तूँ चल जा घर के।
प्‍यारी के दुख मो (मुझ) से कहलो ना जात बाटे,
कवनो बिधि राखतीया जीव जर-मर के। मानऽ...
नयना में नींद परत एक छन नाहीं,
रात से बिहान (सुबह) नित करेली कहँहर (दर्द से कहर के) के। मानऽ...
कहि-कहि के रोवत बिया एको के ना भइलीं,
पास के ना सास के ना ससुरा - नइहर के। मानऽ...
कहत ' भिखारी' अरज मोर अतने बा,
अबहूँ से चेतऽ दीन दुनियाँ से डर के। मानऽ...

(गाना-2)

ए बबुआ घर चली जा तुरते ,
ब्‍याही सती के तेजल, कहऽ कवना कसुरते।
घर में ना दूसर केहु बाड़े, तूहीं दूई मूरते॥ ए बबुआ...
एही अवसर में भल बा, शुभ लगन मुहरते,
कहत ' भिखारी' जा के, रह देश लुर ते। ए बबुआ...

बिदेसी : (गाना)

ए प्‍यारी हो घर जाये द मोहि के
जाइब त जल्‍दी आइब, हम भूलब ना तोहिके
बाट जोहत नित घरनी एक फिकिर ओहिके।
जे पत्‍नी निज ब्‍याही जिन भेजील बटोही के
कहत भिखारी बिहने जाइब लागत लोहि (उषा काल) के

रंडी : (चौबोला)

माता , पिता, भाई, भउजाई (बड़े भाई की पत्नी) तोहरे कारन राजा।
गेह-नेह सब सखी जाति कुल, तेजलीं सकल समाजा॥
नीति बिचारि के देखऽ धीरज धरि, प्रेम में होत अकाजा।
कहे ' भिखारी' राखऽ प्रानपति, बाँह गहे कर लाजा॥
बटोही : तनी बोलऽ बिदेसी , तूँ जइबऽ कि ना?
बहुत दिनन से कुमति कमइलऽ,
सुमति के सुपथ चलइबऽ कि ना? तनी...
पर तिय संग रति कुंभ नरक मानऽ,
धरम का कुंड में नहइबऽ कि ना? तनी...
पापिन गिधिनियाँ के सोझा से दूर करऽ,
गाढ  (विपत्तिकाल) में नइया बचइबऽ कि ना? तनी...

(रंडी से)

बाड़ी वाली बतिया तूँ मानलऽ हो मत करऽ बे बिचार।
थोड़े कहे से तूँ पूरा समुझिहऽ,
नीमन बना ल रहनियाँ हो तूँ त खुदे होसियार।
हमरा कहे से बिदेसी के जाये द,
मिलि जइहन छैला चिकनियाँ हो तोहार बनल बा बजार।
दया करके कुछ पुण्‍य कमा लऽ,
बड़ी तोहार हउए सवतिनियाँ (सौत) हो, ओकर कर उपकार।
कहत ' भिखारी' मरत बिया बिरहा से,
सुंदर बाड़ी प्‍यारी धनियाँ हो जिनकर हउअन भतार।

रंडी : हट जा फजीहत करा देहबि तोहि के। (बटोही के धसोरत) फुहरी फुहर पेठवनियाँ (संदेशवाहक) पेठवलस (भेजना) बुरबक बटोही के।

बटोही : ढेर परहेजल (बर्दाश्त करना) जीव के काल हो गइल। देखऽ बिदेसी, रेसमी चादर फाटल कि हाथे गोड़े सीकर (सिकुड़) भर देब।

रंडी : हमरा से ज्‍यादा चटाका (तेज) ना होइबऽ , सिखावऽ मत मोहि के।
सइयाँ के सेवा से सुंदर बना दिहलीं तेल घीव से बोहिके (डुबा कर)।

( बिदेसी के बटोही हटा देतारे। बिदेसी मंच पर से जातारे)

चोटही (चोटिल) बेसरमी का लाज नइखे लागत , पढ़ावऽ जाके ओहिके।
कहत ' भिखारी' तूँ जाइ के कहिहऽ भतार करिहें जोहि के।

(दोहा)

गंगा नहा के विपर जेंवां के सकल मिटाहु दोष।
गया में पिंडा पार के, करहूँ पितृ के तोष॥

समाजी : बड़ धोबिया पेंच (दाँव) मरलीहा, बाबा।

बटोही : तोहरा भुभुन (मुँह-नाक) फूटे से डेरइनीं हा, बबुआ।

रंडी : (गीत)

कहाँ गये मोर खेलवना छोड़ि के ?

बटोही : का बबुआ, बिदेसी चल गइलन साफा?

समाजी : हँ, चल गइले।

बटोही : इहे कइल चाहत रहे? तनी हँसी-मजाक कइलीं हाँ। जाये के बेरा (अवसर पर) बोल-बतिया लेला। ओह पर खखनल बाड़ी। (रंडी से) तोहार भलाई छोड़ के बुराई ना कइलीं हाँ। अइसन लंगा-लूचा से देह बचा के राखे के चाहीं। अच्‍छा, गइलन, त हम बानी नू? (समाजी से) ए बाजावाला।

समाजी : का बाबा?

बटोही : हमरा अइसन बूढ़ के नौकरी कलकाता में ना मिली का? खाटा-खट हप्‍ता मिलते चूड़ीदार कुरता सिआई, सेनगुप्‍ता धोती लिआई। गोड़ के मोजो। भउजी के अइसन के ठाट रही। साया किनाई पीअर दग-दग। कुरती लिआई करिया कुच-कुच। साड़ी किनाई लाल भभूका। किरपिन (कंजूस) रहलन, हम पूछ के खिआइब, डबल कि सिंगल?

( बटोही बइठ जातारे)

रंडी : चलती बार पिया हमसे ना बोला , चला मुख मोर के।

बटोही : ए बाजा वाला।

समाजी : का रे बुढ़वा? का रे बुढ़वा?

बटोही : इहे बोली ह? मुँह से 'जी' नइखे आवत?

समाजी : 'जी' के रउआ कामे करत बानीं।

बटोही : कवन जबून काम देखत बाड़ा ?

समाजी : देखतानी मेहरारू खींच-खींच के मारत बिआ।

बटोही : ए बुरबक। पढ़ले नइखऽ, देवता पर कुत्ता पेसाब क देला। लोग लीप-पोत के अँकुरी (पानी में फुलाया हुआ चना) पूरी चढ़ा के बाँट के खाजाला। तोहरा अइसन गँवार के के कहन करी?

समाजी : खूब कुटा।

बटोही : हमरा बीच में बोलो मत।

रंडी : हम उनुका बिनु जीअब नाहीं पिअब बिस घोर के।

(बटोही के घसकल)

समाजी : बाबा भगलन हो।

बटोही : (फिरि के) बबुआ, हमरा के डेरापुत (डरपोक) मत समझऽ। एह मोटरिया में तरुआर पिजा (धार बनाकर) के धइल बा। हई देखतारऽ नूँ लाठी? सादे-सादी नइखे, गुप्‍ती बा। उहो महुरावल (विष में डुबोकर निकाला हुआ) बा। एह से कालो से डर ना लागे।

(एही बीचे बटोही चल जातारन। रंडी के बिलाप चलता। बिदेसी मंच पर आवतारन।)

रंडी : नाहक नेह सँइया हमसे लगाया , खराब किया तोर के।
कहत ' भिखारी' सवतिन किहाँ भगलन करेजा खँखोर के।

१. बरतन में सूखकर सटे अंश को किसी प्रकार रगड़कर या खुरचकर साफ करना।

बिदेसी : काहे रोअत बाड़ूऽ (बिदेसी रंडी के समुझावतारे) तूँ खायेक बनावऽ तले हम आवत बानी।

( कहि के जातारन)

समाजी : (रंडी से) ऊ गइलन। बुढ़वा कादो सिखा देलस हा।

रंडी : ठीके कहतानी, बुढ़वा आइल तब से मन उचटल लागत रहे। अच्‍छा, हमहूँ चल जात बानी।

(रंडी अपना लइकन के साथे सामान के पेटी (बक्सा) लेके निकलतारे)

बाड़ीवाला : का हो, चल देलू?

रंडी : हँ चल देलीं।

बाड़ीवाला : हमार घर-भाड़ा के दी?

रंडी : हमरा रउरा कवनो बात बा?

(बाड़ीवाला जाये के मना करता, बाकी रंडी अपना सर-सामान का साथे बिदेसी के घर खातिर चल देत बाड़ी। राह में उनुकर सब सामान डाकू ले लेत बाड़न स। दोसरा ओर से बिदेसी मंच पर आ जातारे से अपना घरवाली के पूछतारे।)

बिदेसी : बगल से हमरा घरवाली के बोला दीं।

समाजी : गइली, एहिजा नइखी।

बिदेसी : कहाँ तक गइल होइहे?

समाजी : टीसन तक।

बिदेसी : भेंट हो जाई?

( बाड़ीवाला आ साहुकार आ के घर-भाड़ा आ कर्जा के तगादा करत बाड़े। भाड़ा आ कर्जा ना चुकवला खातिर रक-झक, तोर मोर होता। बाड़ीवाला आ साहुकार बिदेसी के कपड़ा उतरवा लेत बाड़े। बिदेसी एक गमछी पेन्‍ह के घर जातारे।)

बिदेसी : (रो-रो के गावतारे)

का बहाना करब घर जा के?
पातुर के धन चातुर देके आप रोवत पछताके।
बहुत कथा इतिहास सिखावल ना कइलीं बुढ़वा के।
हालत कोई भइल पिया तोरी पुछिहन जब जोरू धा के,
कवन जबाब देहब प्‍यारी से, मन में रहब सरमा के।
कहत ' भिखारी' भिखार होइ गइलीं दौलत बहुत कमा के।

( गावत-गावत मंच से बाहर गइला पर दोसरा ओर से रंडी अपना लइका का साथे फाटल-चीटल (पेबंद सटा हुआ) रूप में गावत आ रहल बाड़ी।)

रंडी : (गाना-1)

रास्‍ता कवन बिदेसी का घर के?
दुख के हालत बड़ सवतिन से रोअब कहब गोड़ पर के।
प्‍यारी बिदेस, देस पिया भगलन, अब हमार लीही खबर के?
करब टहल महल के निसि-दिन देखब नजर भर-भर के।
कइसे प्रान रही प्रीतम बिनु छोड़ि दिहलन बाँह धर के।
लुगरी पहिरब, सतुआ खाइब निजे मजुरी कर के।
कहत ' भिखारी' सारी धन लुटलस डाकू नतीजा (कष्ट देकर) कर के।

(गाना -2)

अब मन करबऽ तूँ कवन जतन?
सब दिन के बरबाद भइल धन, चल गइलन घर छोड़ि के सजन।
आज तलक कुछ काम ना कइलीं, कइसे पोसइहन सब लरिकन।
भूसन (आभूषण) बसन रहल कुछुओ ना, नाहीं रहल एकऊ बरतन।
राम नाम कहऽ कहत ' भिखारी' नाहीं त भइल चउथ आ के पन।

(गाना-3)

ए किया हो रामऽ, पियऊ के मतिया केइ हरल हो राम।
ए किया हो रामऽ, कहिया के पापवा आ के फरल हो राम।
ए किया हो रामऽ, मुदई (दुश्मन) के मनसा खूब तरे फरल हो राम।
ए किया हो रामऽ, एह से बा नीमन हमार मरल हो राम।
ए किया हो रामऽ, आजुए से उढ़री नँइयाँ परल हो राम।
ए किया हो रामऽ, कहत ' भिखारी' उपजल झरल हो राम।

( बेटा के रो-रो के गाना)

बेटा : (गाना-1)

अब ना जीअब हमार महतारी।
दाल-भात, घीव, पापड़, रोटी, सपना भइल तरकारी।
जमपुर हेतु काल सिर ऊपर, भइलन बटोही सवारी।
पहिरे के तन पर बस्‍तर (वस्त्र) नइखे, खाये के लोटा ना थारी।
जागऽ दाता केहू भोजन करा दऽ, हम बानी मूरत चारी।
कहत ' भिखारी' हमार देखि दुख कब ढरिहन गिरिवरधारी।

(गाना-2)

अब हमनी के कटाइल गला।
ना फुफहर१ ना ममहर गोतिया ना बहनोई ना ससुर-साला
समय पाइ हित मुदई भइलन घर से निकाल देलन बाड़ी वाला।
बड़ अनरीत गीत लागत बा बेटा से बाबूजी कइलन काला
दास भिखारी कहत मन चेतऽ राम-राम कहऽ लेके माला।

 

१. पिता की बहन का घर

२. माँ के भाई (मामा) का घर

३. गोत्र का व्यक्ति

४. बहन का पति

५. पत्नी का भाई

६. गलत काम

( रंडी अपना लइकन का साथे मंच पर से हटतारी। मंच पर प्‍यारी सुंदरी के आगमन)

सुंदरी : (गीत - खेमटा)

हमरा के सासत कइकें, परदेशवा गइले बेइमान।
कवनो त चोटही से प्रीतिया लगवले होइहें, अतने के बड़हिन गुमान
अपने पान खाय मुस्‍कात चलत होइहें, नैना से मारत होइहें शान।
हमरा हाय हो दइब अब दुख ना सहात बाटे, अधजल में कइ गइले प्राण॥
साँवरी सुरत बिनु रहल कठिन बाटे, हमरा पपिनियाँ के जान।
कहैं ' भिखारी' राम तप कहाँ गइले बलमुआँ, कुहुकत निसि दिन प्राण॥

१. कष्ट

२. घमंड

३. आधा जल-आधा सूखा, विमूढ़ स्थिति

(गाना-2)

चलने का बेरिया कह ना पियऊ एको बतिया।
हमरा के छोड़ी कर गइल पूरूबवा केई मारल मतिया।
कवनों शहर से समाद ना भेजल ना लिखल एक पतिया हो।
राह चलत रूप देखि के भोरवल कि कहुँ चतुर सवतिया।
चरण कमल भगवान के देखब कहत ' भिखारी' नाई जतिया॥

१. संवाद

२. पटाना, भ्रमित करना

(गीत-3)

नेह लाके कहवाँ तूँ गइल सजन, जहिया से पिया तजि गइल पुरुबवा।
दुख सवार सुख भइलन सपन, श्‍याम सुंदर मोर प्राणनाथ के।
रोकि लेहलीस विपता ही कवन, गौरी गणेश शेष सुर सरबा।
देत बानी सब केहु कीहाँ ओरहन, दिन रात तोहरे मैं सुरता लागत रहत बा रमन।
कहत ' भिखारीदास' जोरी, दासी के कब देब दरसन।

(गीत-4)

स्‍वामी जी सपनवाँ भइलन हो रामा।
सब बिभुती१ घर के, जवन वस्‍तु धर के देखल नइखे जात सरजाम
नइखीं भूखल रुपया के दर्शन, दे द, चुपे आके, एको धरी खातीर सूरत साम॥
काहे के भेजवलन पाती भरत बानी दिन राती शादी क के कइलन बदनाम ॥
एही सोचे प्राण गइल, पियऊ का अजस भइल अब हमारा कवन बाटे काम॥
चढ़ल जवानी पाई के बह भरत बाड़न जाईकेबनी के विपताहो के गुलाम॥
कहत भिखारी दास कुतुपुर मोकाम खास कुरी कनउनिया हजाम॥

१. विभूति, धन, यज्ञादि की अवशिष्ट राख

२. सामान, साधन

३. अपयश

४. दूसरे के लिए काम करना

(गीत-5 विलाप)

हमरा के सासत करि के परदेसे गइलन बेइमान।
साँवली सूरत हमरा दिल से ना बिसरत, लागल सुरतिया के बान। हमरा के...
पान खात मुसुकात रहत नित, हरि के ले गइलन परान। हमरा के....
दुनियाँ में दुखित केहू नइखे लउकत एह घरी हमरा समान। हमरा के..
कहत ' भिखारी' नाहक बाँह धइलन, तनिको ना कइलन गेयान। हमरा के...

(गाना - सोरठी)

कवने अयगुनवाँ पियवा हमें बिसरवलन, पिया हमें बिसरवलन हो,
किया पिया के मतिया बउराइल हो राम।
जइसे सपनवाँ अपना पियाजी के देखलीं, अपना पियाजी के देखलीं हो,
जिउआ में सनाक देना समाइल हो राम।
जब हम जनतीं तब पिया का पाछा लगतीं, हम पिया का पाछा लगतीं हो,
जरिये के हउए हमार भुलाइल हो राम।
कहत ' भिखारी' पियवा फाँसी देके भगलन, पियवा फाँसी देके भगलन हो,
अधजल में मनवा बा टँगाइल हो राम।

(दोहा)

तन, धन, धाम, धरनि, पुर, राजू, झूठे सकल जवाल
चरन-पादुका पिया के लेके, सती होखब तत्‍काल॥

१. झंझट

२. खड़ाऊँ

समाजी : (चौपाई)

इहाँ के बात इहाँ रहि गयऊ। बिचहीं में कुछ लील भयऊ।
दोस्‍त बिदेसी के घर आये। प्‍यारी से कुछ हाल सुनाए॥

( मंच पर बिदेसी के दोस्‍त देवर के रूप में आवतारे)

देवर : भउजी, काहे रोवत बाड़ू? चुप रहऽ। भइया परदेस गइलन, त हम बानी नूँ? हमरा से रुपइया, गहना, कपड़ा जे कुछ खोजऽ से हम देब।

(सवैया)

भउजी अफसोस तेजो मन से , कुछ हुकुम देहु सबे कर डारी।
काहू बिधि मत कष्‍ट सहऽ जब ले दुनियाँ में हमार बजारी।
झूठ एको रत्ती मैं न कहूँ, जस तोर हृदय तस मोर बिचारी।
कहे मानहु बात हमारी ' भिखारी' सुलच्‍छनि साजहु भूसन-सारी।

सुंदरी : (दोहा)

प्‍यारी के मन लागल बाटे , जहँवाँ बाड़न राम।
माड़ो में सतबंध भइल बा, कहत ' भिखारी' हजाम॥

१. सत्य का बंधन

देवर : (कवित्त)

भउजी तूँ जइसन अलबेली कटीली बाड़ू ,
तइसन हम तन के मस्‍ताना तइयारी हईं।
जइसे तूँ चाह करबू तन-मन से हमरा के,
तइसे हम धन-जन से सबसे तुम्‍हारी हईं।
जइसे तूँ छल-कपट, अयगुन के त्‍याग देलू,
तइसे हम लोभ, मोह, मद से निरधारी हईं।
मन में बिचारऽ, अब से रोदन बिसारऽ,
दया करके बिचारऽ कहत दियरा के ' भिखारी' हईं।

सुंदरी : (दोहा)

देवर जी , दया करऽ, पति-पत्‍नी में मेल।
कसहुँ जाके जल्‍दी बोला के, नीमन देखा दऽखेल।॥
देवर : भउजी सूनहू बात एक , भइया गये परदेस।
ना जानी केहि हेतु से, भेजत नाहीं सनेस॥

(चौबोला)

भेजत नाहीं सनेस , भेस तव लागत निपट उदासा।
कतहूँ से जतन करब हम अबहीं, पाका मानऽ बिसवासा॥
सुंदरी : बिसवास केहू के करब कइसे , धोखा देके पिउ गये।
बिसवास सुख सोहाग पिउ के साथे साथ चले गये॥
देवर : भउजी तनिक अफसोस दिल में झूठे करती तूँ अबे।
जिंदगी तलक सुख देब तुमको जानिहो हमके तबे॥
सुंदरी : जिंदगी के आसा है नहीं, हमको तो आसा पीउ की।
खाना वो गहना पहनना, चाहना नहीं है जीउ की॥
देवर : देह-प्रान ते प्रिय नाहीं जग कछु, सुनले भउजी कान से।
हठ करके दुख का बोझ से, आखिर तूँ मरबू सान से॥

(हाथ ध लेत बाड़न) - हल्‍ला मत करऽ॥

सुंदरी : मरना तो बेहतर बही जो मर जाय अपना सान से।
दसरथजी के पुत्र से प्रिय सुनिलऽ देवर कान से॥

देवर : (चौपाई)

भउजी मानऽ कहल हमारी। नाहीं त करब तुरत बरियारी
असल बाप के हईं बेटा। तें ना सहबे एक चमेटा

१. जबर्दस्ती, बल-प्रयोग

२. थप्पड़ की मार

सुंदरी : ना कुछ पइबऽ मरबऽ जान। पाछे होइबऽखूब हलकान
सोच-समझ के चलऽ देवर। चाहे लेलऽ तल के जेवर॥

१. परेशान

देवर : जेवर-फेवर कुछ ना चाहीं। गोटे बात समुझ मन माँहीं॥
अबहीं हमरा बस में आ जा। तब देखऽ कइसन बा माजा

१. सब मिलाकर

२. मजा

सुंदरी : माजा राम भेजवलन पार। सुनि लऽ देवर बात हमार॥
जीउ के पीउ में लागल आस। चाहे परी गला में फाँस॥
हे पिया! कहाँ लगवलऽ देरी। भइ जस हालत बाझ-बटेरी
हे बिधि-बिस्‍नू! भइलऽ बाँव । अब हम कवनी ओर पराँव
हे गंगाजी! राखऽ लाज। हमें बा अपना पीउ से काज॥
शंकर से बिनऊँ करजोर। पिउ चरन में लागो डोर॥
देबी-दुर्गा! तोहे मनाऊँ। जल्‍दी दरस पिया के पाऊँ॥

१. बाज-बटेर (पक्षी)

२. वाम, विपरीत

३. भागूँ

( एगो मेहरारू आवतारी)

मेहरारू : ए बहिन, केवाड़ी खोलऽ, तनो आग दऽ।

समाजी : (चौपाई)

आइ पहुँचल मोसकिल१ भारी। अब का प्‍यारी करे बिचारी॥
तेहि अवसर परोसिन एक आयी। ' आग-आग' कहि के गोहराई
सुनते देवर निकल पराई। सत के पत रखलन रघुराई॥
अब आगे लीला जे होई। सो सब कहब सुनऽ सब कोई॥
जेहि बिधि से बिदेसी घर आई। पिउ प्‍यारी भेंटे हरखाई
धन मालिक के बड़का माया। कहे ' भिखारी' करिहें दाया॥

१. मुश्किल

२. पड़ोसिन

३. पुकारना, कठिन स्थिति में पुकारना

४. प्रतिष्ठा, मान

५. हर्षित, प्रसन्न होकर

 

सुंदरी : (पूर्वी)

दिन बहु बीति गइले , तबहूँ ना पिया अइले,
मनवाँ में गुतल से कइलऽ बलमुआँ।
रचि के चिता बनाऊँ, लेके स्‍वामी के खराऊँ,
जरि कर हरि से मिलब हो बलमुआँ।

(बिलाप गीत-1)

रहि-रहि उठत बाटे मनवाँ में सूल।
सामली सूरत पिया, गड़ल बाड़न हमरा हिया,
मुँहवा कमलवा के फूल। रहि...
मालिक मोर गइलन भागल, पछवा से जइतीं लागल,
जरिये के बाटे हमार भूल। रहि...
देखऽ दुख दीनानाथ। दूनो जोड़ी एक साथ,
कहिया ले मिलइबऽ समतूल ३? रहि...
कहत ' भिखारी' नाई, पुरुब के ह कमाई,
अब सब गावल बा फजूल४ । रहि...

१. गुंथन, दिवास्वप्न देखना

२. शूल, छेदनेवाली पीड़ा

३. समतुल्य, बराबर

४. व्यर्थ

(बिलाप गीत-2)

हाय सँइयाँ , कइ दिहलऽ सून भवनवाँ।
बाँह ध के सँइयाँ गोसाइयाँ तेयाग दिहलऽ,
का देखलऽ बगदल रहनवाँ, हाय सँइयाँ...
एको कसूर मोर मुँह से ना कहलऽ,
होखतानी गुनि-गुनि हरनवाँ, हाय सँइयाँ...
साँवली सूरत मोरा मन से ना बिसरत,
मधुर-मधुर मुसुकानवाँ, हाय सँइयाँ...
कुरता-चादर टेढ़ी टोपी लगा के,
कहिया ले देबऽ दरसनवाँ, हाय सँइयाँ...
पावस रैन भेयावन लागेला,
बरिसेले बूँद सावनवाँ, हाय सँइयाँ...
कवना दो देस जाके झोपड़ी लगवलऽ,
छछनत बा हमरो परानवाँ, हाय सँइयाँ...
कहत ' भिखारी' कटारी से मार देतऽ,
बयस पर करिके गवनवाँ, हाय सँइयाँ...

(बिलाप गीत-3)

हाय , सँइयाँ कइ देलऽ सून खटोला । सँइयाँ...
घर में बिछाईं कि अँगना बिछाईं, दुअरा बिछाईं कि कोला ३? सँइयाँ...
केकरा से कहीं हम दिलवा के बतिया, देवरा बा निपटे भकोला ४, सँइयाँ...
आम के डारी कोइलिया कुहुके, ओसहीं कुँहुँकत बा चोला, सँइयाँ...
बालम के बहरा से जल्‍दी बोला दऽ, पारबती बमबम भोला, सँइयाँ...
कहत ' भिखारी' भेयावन लागत बा, हमरा कुतुबपुर के टोला, सँइयाँ...

१. भयावन, भयपूर्ण

२. छोटी खाट, सामान्यतः बच्चों के लिए निर्मित खाट

३. घर के पीछे का खुला या घिरा भाग

४. मूर्ख

(बिलाप गीत-4)

ए किया हो राम , स्‍वामीजी के पोसाकवा बा घर में धइल हो राम।
ए किया हो राम, चमकत ना होइहन, भइल बा मइल (मलिन) हो राम।
ए किया हो राम, सोचते-सोचते दिनवाँ गइल हो राम।
ए किया हो राम, मनवाँ में गुतलीं सेहू ना भइल हो राम।
ए किया हो राम, कहत ' भिखारी' केहू जादू कइल हो राम।

(बिलाप गीत 5 - लय आल्‍हा)

राम रसायन तोहरे पास , देरी होत बा महाबीर जी।
जाइ के अहिरावन दरबार, काली कवर से रामचंद्र के,
लिहलन छन में जान बचाय, खुसी भइल बा बानर-दल में।
ओसही पति के मति दऽ फेर अभी मिला दऽ घर-घरनी से।
कहत ' भिखारी' दोउ कर जोर, श्‍यामसुंदर में सुरत लागत बा।

(बिलाप गीत 6 - लय लोरिकायन)

स्‍वामी के सुरतिया , बतिया सालत बा दिन-हो-रात।
ऊपर से कहत बानी भीतरा से नइखे पूरा कहात।
कवना दो देसवा में बाड़न केहू नइखे आवत-हो-जात।
केहू नइखे देखत मकनियाँ में जनियाँ के बिल-हो-खात।
कुतुबपुर दिअरा के कहत ' भिखारी' नाई हो जात।

(बिलाप गीत 6 - लय सोरठी)

ए किया हो राम , कहिया हम स्‍वामीजी के दरसन पाइब हो राम।
ए किया हो राम, दुअरा बधइया कब बजवाइब हो राम।
ए किया हो राम, जथासकती दरब कब लुटाइब हो राम।
ए किया हो राम, गरदन में माला कब पहिराइब हो राम।
ए किया हो राम, स्‍वामीजी से कहिया बतिआइब हो राम।
ए किया हो राम, तरसल नयना कब जुड़वाइब हो राम।
ए किया हो राम, कहत भिखारी जनम फल पाइब हो राम।

(बिलाप गीत-7)

उड़ि के तूँ चलि जा जिया पियऊ का देसवा में ,
अहो मोरे रामऽ, मोर मनवाँ पिउ का रंग में राँगल हो राम।
सूतल रहलीं राति के, पिउ सँग में नींद से माति के
अहो मोरे रामऽ, बोलते मुरुगवा चिहुँकि के जागल हो राम।
कहलन जे बहरा जाइब, कुछ दिन में घूमि के आइब
अहो मोरे रामऽ, हाथ झटकारि के बेदरदा भागल हो राम।
तब से ना निंदिया आवेला, घर ना अँगनवाँ भावेला
अहो मोर रामऽ, एही सोचे मनवाँ भइल बा पागल हो राम।
कहत ' भिखारी' ठाकुर, पिया बिनु भइलीं भाकुर६
अहो मोरे रामऽ, साँवली सुरतिया बा हर छन लागल हो राम।

१. कौर, निवाला

२. यथाशक्ति

३. द्रव्य, रुपये-पैसे

४. तृप्त करना

५. रंगा हुआ

६. एक पक्षी

(बिलाप गीत-8)

सँइयाँ गँइयाँ छोड़लऽ, धइलऽ कवनी ओर डगरवा,
कइसे लाँघत होइबऽ कतिना नदिया नारवा?
बहुत मिलत होइहन परबत जंगल झारवा,
कहँवाँ बइठलऽ जाइ के केकरा दुआरवा?
चिठिया भेजावत रहितऽ लिखि के बारंबारवा २,
तनिको ना अखंडित मिलत रहित समाचारवा।
कहत ' भिखारी' रहि-रहि उठत बाटे लहरवा,
देखत बानी कहियाले लवटि के अइबऽ घरवा।

१. गाँव

२. बार-बार

(बिलाप गीत-9)

चलने का बेरिया कहलऽ ना पियऊ एको बतिया हो।
हमरा के छोड़ि कर गइलऽ पुरुबवा, के मारल तोहार मतिया हो।
कवनो सहर से संवाद भेजलऽ, ना-लिखलऽ एको पतिया हो।
राह चलत रुप देखि के भोरवलसि, कि कहूँ चतुर सवतिया हो?
चरन-कमल भगवान के देखब कब, कहत ' भिखारी' नाई जतिया हो।

समाजी : (धुन पूर्वी)

एक दिन धनियाँ मकनियाँ भीतरवा में ,
रोवतारी भरि के केवरिया बिदेसिया।
रात कुछ बीति गइले, दुअरा बिदेसी अइले,
कहलन '' खोलि द केवारी प्‍यारी धनियाँ।''
चोरवा समुझि कर, लोरवा गिरन लागे,
रोइ-रोइ सोरवा करेली प्‍यारी धनियाँ।
'' दइब कठोरवा भेजवलन चोरवा के,
बिपति परल घनघोरवा बलमुआँ।
पिया में बा मोर जिया, कसहूँ के बारे दिआ,
हउआ१ लागी त बूति जाई हो बलमुआँ।
आगा-पाछा केहू नाहीं, रोअतानी घर माँहीं,
कवन जुगुतिया2 चलाईं हो बलमुआँ।''

१. हवा

२. युक्ति, उपाय

 

सुंदरी : (चौबोला)

हाय दइब अब केहि गोहराऊँ , अइले महलिया में चोर।
सँइयाँ घरे रहितन, धइ बान्हि मरितन, केकरा से कहीं करि सोर?
प्रीतम पिउ बिनु प्रान छूटत नइखे, हिरदयबा बहुत कठोर।
त्राहि रमापति, त्राहि उमापति, अब धरम बचावहु मोर।

बिदेसी : (पूर्वी)

खोलु-खोलु धनिया! से बजर (ब्रज) केवरिया हो ,
हम हईं पियवा तोहार रे सँवरिया।
नाहीं हम हईं राम ठग-बटवारवा से,
नाहीं हम हईं डाकू चोर रे सँवरिया।
पूरुब से आवतानी, करऽ पहिचान बानी,
मुदित ना बहरे बीतल प्‍यारी धनियाँ।
समाजी : अतना सुनत धनी , खोखली केवरिया से,
दुअरा पर देखे पिया ठाढ़ रे सँवरिया।
तुरते खोलि के पट २, प्‍यारी ताके पति झट,
पपिहा का स्‍वाती बूँद मिललन बलमुआँ।

१. खड़ा

२. पल्ला, कपाट

 

सुंदरी : सन्‍मुख परल हो रजउ चारो हो नजरिया से।
बहे लागल प्रेम जलधार हो बिदेसिया॥
सुंदरी : धन ह आजु के रात , पिया से भइल बात,
हिया मोर देखि के जुड़इलन बलमुआँ।
आजुए के रोज सन, तिथि वो महीना धन,
कहत ' भिखारी' कर जोरि के बलमुआँ।
कुतुबपुर मोर ग्राम, बेड़ा पार ला दऽराम,
जाति के हजाम जिला छपरा बलमुआँ।

(चौबाला)

प्रेम मगन मन बहुत होत है देखि के चरन तुम्‍हारे!
सोक धार में बहत जात रहीं खींचि के कइलीं किनारे!
बहुत दिनन पर दरसन दिहलऽ हे प्रभु प्रान अधारे!
कहे ' भिखारी' जय गंगाजी बहुरल (लौटना) सेनूर हमारे।

सुंदरी : ई दसा राउर का भइल।

बिदेसी : हमार दसा का हाल का पुछले बारु। तोहर बात ना मननी, चल गइली कलकत्ता। कवनो बात के हरजा (हर्ज, कमी, बर्बादी) ना भइल, ओइजा (वहाँ) गइलीं काम लाग गइल, दस रुपया हाथ प हो गइल। मन कइलस चलि घरे, तहरा खातिर निमन-निमन गहना, निमन साड़ी किन के चलनी। रास्‍ता में चोर-डाकू मार-पीट के छीन लेलस। हमार इहे दसा बा।

सुंदरी : गहना-गुड़िया कपड़ा लता के काम नइखे, हम देख लेनी छुधा (भूख) भर लेनी।

बिदेसी : एक मुठा भात बनाव, गाड़ी के मारल बानी।

(रखेलिन मंच प लरिका ले के पहुँचतारी)

रंडी : एह गाँव में कोई बहरा से आइल हा?

समाजी : हँ, बिदेसी अइले हा।

रंडी : उनका घरे कवन राह जाई?

समाजी : इहे गली धइले चल जा।

बिदेसी : (‍देखी के चिहा तान) तोहरा का दसा भइल!

रंडी : रउवा छोड़ के चल अइलीं। लइकन के साथे सामान लेके आवत रही कि डाकू सब लूट लेलस।

बिदेसी : अच्‍छा जाये दय, हमार-तोहार जिनिगी रही, त घर भर जाई।

रंडी : एहिजा केहू के चीन्‍हत नइखीं।

बिदेसी : कइसे चिन्‍हबू। देखऽ दुमँहा (घर का प्रवेशद्वार, दो ओर खुलनेवाला कमरा) में सवतिन खाड़ (स्थिर खड़ा या चुपचाप खड़ा होना) हवऽ।

( रंडी सवतिन के गोड़ लागतारी)

रंडी : (लइका से) ए बबुआ, माई बाड़ी, गोड़ लागऽ।

(लइका माई के गोड़ लागत बाड़न। सकल परिवार के मिलन हो जाता)

समाजी : बोलिए बृंदाबन बिहारी लाल की जय।

 


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हिंदी समय में भिखारी ठाकुर की रचनाएँ