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कविता

स्वप्नमयी संगिनी
पर्सी बिश शेली

अनुवाद - किशोर दिवसे


स्वप्नरत, रास्ते से गुजरते देखा मैंने
सर्दियाँ हुई मौन... अचानक आ गया वसंत
भटक गया मन, ऐसी गमकती थी गंध
समाए थे जिसमें जलधाराओं के रंग
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बहती जल धाराएँ पसरे हुए दूबचौरे पर
घनी झाड़ियों ने जिसे रखा था ढककर
कभी नहीं सँजोया था साहस जिसकी
हरित-मयूरपंखी उतावली बाँहों ने
झरने के मदमाते-मचलते यौवन को
मनचले की तरह बाहुपाश में लेने का
पर... अधीर, चुंबन लेकर लहराता बढ़ चला
स्वप्न में ही किसी शूर पराक्रमी की तरह
पुष्प खिले थे वहाँ बहुरंगी - नीलपुष्प
भीगी थी धरा भोर के स्वाति बूँद मोतियों से
धूमिल आक्सलिप और नाजुक नील घंटिकाएँ
जिनके जन्म पर ही उखड़ने लगती हैं
त्रिनमृदा की उत्तेजित बहकती साँसें
धौंकनी की तरह धक-धक धड़कती हैं
***
और आसमान की और मुँह ताकता पुष्प
भिगोता है प्रकृति के ममतामयी चेहरे को
स्वर्ग से सहेजे स्वाति सागर से
जब बहती है पुष्प की संगिनी बयार
महकती मंदानिल की गमकती गुनगुनाहट से
प्रफुल्लित होते हैं पुष्प हर्षातिरेक से
ऊबदार शल्यकी में उगती हैं अनेक
अरण्यजमा की घनी लहराती लताएँ
हरी केवाँच और चंद्ररंगी वसंत रानी
खिलते हैं सूर्यमुखी और श्वेत कटोर
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रिसता नहीं है इनका मधुरस देर तक
जंगली गुलाबों और सिरपेंचे की लता सर्पिल
अपनी गहरी कलियों और पत्तियों के साथ
भटकते हैं दिशाहीन बयार के झोंकों से
सुनहरी धारियों से सजे नीलवर्णी पुष्प
जागती आँखों से भी हैं अधिक चमकीले

नदी के थरथराते किनारों के निकट
खिलते हैं हेमवती के बैगनी पताका पुष्प
सजते हैं सफेद चकत्तियों के साथ
क्यारियों में पसरती हैं घनी जलकुंभियाँ
जिनकी रश्मियाँ प्रकाशित हैं चंद्रप्रभा से
वहीं हैं दलदली सेवार और सरकंडा
हरीतिमा जिसकी बढ़ाती है नेत्रों की आभा
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मैं सोचता हूँ... इन ढेर सारे पुष्पों से
बनाऊँ एक गुलदस्ता सजीला ऐसे
उनकी आभा और अठखेलियाँ लगें ऐसे
निकुंज में गले मिलें - और रूठे कोई जैसे
हाथों में हो अगणित कालखंड के मानसपुत्र से
प्रफुल्लित होकर मैं पहुँच जाऊँ वहाँ
प्रेमार्पित कर सकूँ इसे मैं जहाँ
ओह! पर किसे !!! तलाश करूँ मैं कहाँ !!!

 


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