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कविता

आकस्मिक मुलाकात
विस्लावा शिम्बोर्स्का

अनुवाद - विजय अहलूवालिया


हम मिले
बड़े सलीके और शिष्टाचार के साथ ।
हमने कहा- कितनी खुशी हुई
आपको इतने सालों बाद देखकर !

पर हमारे भीतर थककर सो गया था बहुत-कुछ ।
घास खा रहा था शेर,
बाज ने अपनी उड़ान छोड़ दी थी ।
मछलियाँ डूब गई थीं और भेड़िए पिंजरों में बन्द थे ।

हमारे साँप अपनी केंचुल बदल चुके थे ।
मोरों के पंख झड़ गए थे ।
उल्लू तक नहीं उड़ते थे हमारी रातों में ।
हमारे वाक्य टूट कर ख़ामोश हो गए ।

असहाय-सी मुस्कान में खो गई
हमारी इंसानियत
जो नहीं जानती कि आगे क्या कहे !

 


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