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बात-चीत

वृक्ष खेती से वर्तमान समस्याओं का हल संभव : सुंदरलाल बहुगुणा
डॉ. अमित कुमार विश्वास


चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा का जन्‍म 9 जनवरी, 1927 को उत्‍तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के सिलयारा (मरोड़ा) नामक स्‍थान में हुआ। प्राथमिक शिक्षा के उपरांत वे लाहौर चले गए और वहीं सनातन धर्म कॉलेज से उन्‍होंने बी.ए. किया। लाहौर से लौटने के उपरांत काशी विद्यापीठ में एम.ए. की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। पत्‍नी विमला नौटियाल के सहयोग से इन्‍होंने सिलयारा में ' पर्वतीय नवजीवन मंडल' की स्‍थापना की। आजादी के उपरांत 1949 ई. में मीराबेन व ठक्‍कर बाप्‍पा के संपर्क में आने के बाद वे दलित विद्यार्थियों के उत्‍थान के लिए कार्य करने लगे, टिहरी में ठक्‍कर बाप्‍पा होस्‍टल की स्‍थापना भी की। 1971 में शराब की दुकानों को खोलने से रोकने के लिए उन्‍होंने सोलह दिनों तक अनशन किया। चंडी प्रसाद भट्ट द्वारा शुरू किए गए चिपको आंदोलन (इस आंदोलन के तहत 26 मार्च 1974 में गौरा देवी के नेतृत्‍व में पेड़ों से चिपक कर पेड़ों की कटाई पर रोक लगवाने में सफल हुई।) में पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा भी जुड़ गए, आंदोलन को विस्‍तार दिया और इसे जल, जंगल तथा जमीन को जीवन की सुरक्षा से जोड़ दिया। बहुगुणा के कार्यों से प्रभावित होकर अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्‍था ने 1980 में इनको पुरस्‍कृत किया। सन 1981 में भारत सरकार ने इन्‍हें पद्मश्री पुरस्‍कार दिया, जिसे उन्‍होंने यह कह कर स्‍वीकार नहीं किया कि जब तक पेड़ों की कटाई जारी है, मैं अपने को इस सम्‍मान के योग्‍य नहीं समझता हूँ। सुंदरलाल बहुगुणा ने चिपको आंदोलन से गाँव-गाँव में जागरूकता लाने के लिए 1981 से 1983 तक लगभग 5,000 कि.मी. लंबी ट्रांस-हिमालय पदयात्रा की। ' चिपको आंदोलन' का ही परिणाम था कि 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बना और केंद्र सरकार को पर्यावरण मंत्रालय का गठन करना पड़ा। प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए वन एवं वन्‍य जीवों का संरक्षण एक सतत प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया के हिस्‍सेदार हम सभी को होना चाहिए। पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न संकटों के संदर्भ में पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा से डॉ. अमित विश्वास ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश :

 

आप आजादी आंदोलन के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं, तरुणाई में आपने किस प्रकार से आंदोलन को गले लगाया?

 

मैं 13 साल का था और उस जमाने में पूरे देश में गांधी की आँधी चल रही थी, हमलोग पहाड़ की तलहटी में रहते थे, वहाँ भी गांधी के आंदोलन की अनुगूँज सुनाई दी। हमारे जिले के नवयुवक श्रीदेव सुमन (जो गांधीजी के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो चुके थे) पोशाक बिल्कुल अलग पहनते थे। इसके पहले प्रो. अर्जुन आया था, जो घोड़े के बाल पर तीर चलाता था। खेल-तमाशे देखने के क्रम में श्रीदेव सुमन को देखा कि वे भी अलग ढंग का बक्शा पकड़े हुए हैं, मैंने उनसे पूछा कि इस बक्शे में क्या है, मुझे दिखाओ। देखा कि उस बक्शे में चरखा था। उन्होंने बताया कि इस चरखे से कपड़े बनाने के लिए सूत काता जाता है, तुम भी चरखा लो, सूत कातो। गांधीजी कहते थे कि सब सूत कातने लगेंगे तो देश आजाद हो जाएगा और अंग्रेज यहाँ से चले जाएँगे। श्रीदेव सुमन ने तीन किताबें (नवयुवकों से दो बातें, स्वराज कैसे लाएँ, राष्ट्रीय गीतों की पुस्तक) दीं। इन किताबों को पढ़कर राष्ट्रीय आंदोलन के लिए मैं प्रेरित हुआ। स्वावलंबन के प्रतीक-चरखा खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। एक व्यापारी के बेटे से छह रुपए लाया तो चरखा आ गया। चरखे को कहाँ रखें? साथी रामचंद्र उनियाल (उनके पिताजी पुलिस में थे) के घर में रखा। कब्रिस्तान में जाकर चरखा कातते थे। उस समय लोग पढ़ते थे - राजा की नौकरी करने के लिए। श्रीदेव सुमन ने पूछा कि तुम पढ़-लिख क्या करोगे? मैंने कहा कि राजा की नौकरी करेंगे तो उन्होंने कहा कि 'चाँदी के चंद टुकड़ों के बदले अपने को बेच दोगे?' उनके इस वाक्य ने मुझे झकझोर दिया। राजा ने सुमन को जेल में बंद कर दिया, उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया, दो साल की जेल की सजा और 200 रु़. का जुर्माना किया गया। यह बात छपी तो मैं और भी जंग-ए-आजादी के लिए प्रेरित हुआ। आंदोलन के दौरान मैं तरुणाई में गोरे पुलिस द्वारा गिरफ्तार हुआ, पाँच महीने हवालात में रहा और पुलिस हिरासत में ही इंटर की परीक्षा दी।

आपके बिना चिपको आंदोलन की बात करना बेमानी होगी, बताएँ कि आप चिपको आंदोलन से कैसे जुड़े?

प्रकृति की गोद में पला और बड़ा हुआ, प्रकृति से प्रेम होने के कारण पेड़ कटते देखकर रहा नहीं गया। 1973 ई. से 1981 ईं तक चिपको आंदोलन चलाया, इस आंदोलन में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर पेड़ों को बचाने की मुहिम चलाई। 8 वर्षों तक महिलाओं ने आंदोलन के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। सरकार का नारा था -

क्या हैं जंगल के उपकार
लीसा, लकड़ी और व्यापार
उसी लय में महिलाओं ने जबाव दिया -
क्या हैं जंगल के उपकार
मिट्टी, पानी और बयार
जिंदा रहने के आधार।

स्थानीय मजदूरों ने पेड़ काटने से मनाही कर दी। नेपाल से मजदूर लाए गए, उन लोगों ने भी पेड़ कटाई के कारण हुए भूस्खलन से आहत होकर कटाई छोड़ दी। यूपी सरकार मानने को तैयार नहीं थी। वर्ष 1981 में इंदिरा सरकार ने मुझे पद्मश्री देने के लिए बुलाया तो मैंने अस्वीकार कर दिया। मैंने कहा कि हिमालय का लहू-मांस बह रहा है और आप मुझे सम्मानित कर रही हैं?

ऐसा कहा जा रहा है कि चिपको आंदोलन आपके परिवार तक ही सीमित रह गया?

चिपको आंदोलन प्रकृति को बचाने के लिए किया गया प्रयास था। यह आंदोलन मेरे परिवार तक ही सीमित नहीं रहा है, गढवाल, कुमायूँ उत्तरकाशी में तो महिलाएँ दिलोजान से इसमें जुड़ी थी। पूरे हिमाचल में चिपको आंदोलन की जंग छिड़ी थी, दक्षिण के कर्नाटक में अप्पिको आंदोलन चलाया गया था यही कारण है कि पांडुरंग हेगड़े बंगलौर में तथा हिमाचल में कुलभूषण उपमन्यु आज भी पर्यावरण को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। इन आंदोलनों के बाद लोगों में चेतना जागृत हुई, पेड़ों के प्रति दृष्टिकोण बदला। पहले जंगलों को लकड़ी का खान समझा जाता था अब वैज्ञानिक सत्य स्थापित हुआ है कि जंगल नदियों की माँ हैं।

चिपको आंदोलन का नारा है ' पारिस्थितिकी सतत अर्थतंत्र है' इस संदर्भ में आपकी राय?

इकोलॉजी मनुष्य और प्रकृति के संबंधों का शास्त्र है। मनुष्य और प्रकृति का संबंध माँ-बेटे जैसा है लेकिन जब हम आर्थिक लाभ के लिए जंगल का दोहन करते हैं तो थोड़े समय के लिए जरूर लाभ दिखता है पर हमेशा के लिए विनाश होता है। अर्थशास्त्र के दो गुण (बचावकारी होनी चाहिए, जो लाभ मुझे मिल रहे हैं दूसरे को नुकसान नहीं होना चाहिए) हैं। आज भी पृथ्वी प्राकृतिक संसाधनों पर ही टिकी हुई है। जल, जंगल, जमीन मनुष्य के लिए जीवन आधार हैं इसकी तुलना पूँजी के साथ करना बेमानी है। हमें अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सतत अर्थतंत्र वाले पेड़ों को बचाने की जरूरत है।

आजकल नदियों को आपस में जोड़ने को पानी की समस्‍या का हल बताया जा रहा है। अपनी राय दें?

नदियों को जोड़ना अप्राकृतिक है। यह मनुष्‍य के स्‍वार्थ की पराकाष्‍ठा है। इस नदी जोड़ से तकरीबन एक करोड़ लोग विस्‍थापित होंगे वो सब कहाँ जाएँगे। यह क्रूर और मानव विरोधी योजना है। विकास के नाम पर हो रहे नए प्रयोग से आम इनसान बेहद परेशान है। पश्चिम इस समस्‍या को भुगत रहा है। अब वह इस मानव विरोधी विकास को हम सब पर थोप रहा है या हम उनकी राह पर चल पड़े हैं, इस बात को हमें भलीभाँति जान लेना चाहिए।

आपने बात की विस्‍थापन की, अब तो आपको टिहरी बाँध ने विस्‍थापित कर दिया है, ऐसे में बाँधों को लेकर आपकी क्‍या राय है?

बाँध पानी समस्‍या का हल नहीं है, बाँध का पानी मृत पानी है और नदियों का पानी जिंदा पानी है। कई सारे बाँधों को देख लीजिए कृत्रिम बाँध की क्षमता धीरे-धीरे कम होती जा रही है। गांधीजी ने बड़े बाँधों के विचार को नकार दिया था। हमारे यहाँ एक कहावत प्रचलित है कि बूढे की बात और आँवले का स्‍वाद बाद में पता चलता है। अब हम बाँधों के कारण विस्‍थापन की समस्‍या को देख रहे हैं। हम कह सकते हैं कि बड़े बाँध तबाही का मंजर ही लाते हैं।

बड़े बाँध को विकास का द्योतक माना जाता है, बाँध से विस्थापन त्रासदी के संदर्भ में कुछ अनुभव बताएँ?

नेहरू ने भारत के विकास के लिए बड़े बाँधों के निर्माण पर बल दिया था। आम लोगों को केंद्र में रखकर ही विकास किया जाना चाहिए। लोगों को डुबाकर, कष्ट में डालकर कैसा विकास, किसका विकास करना चाहते हैं? टिहरी बाँध से एक लाख लोगों को विस्थापित किया गया। प्रकृति से जुड़े हुए व्यक्ति को शतरंज की भाँति उठाकर इस कदर रख दिया कि मानो वे कूड़े-कचरे हों। विस्थापित मनुष्य का मनोवैज्ञानिक पुनर्वास कभी भी नहीं हो सकता है।

ऐसा कहा जाता है कि विस्थापन आश्रितों को मिलने वाले मुआवजे को बिचौलिए खा जाते हैं, टिहरी बाँध के आश्रितों के साथ भी यही हुआ, इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?

विस्थापन सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है। मानवीय त्रासदी की भरपाई रुपये-पैसों से नहीं की जा सकती है। लंबे संघर्षों के बाद सरकार ने टिहरी बाँध के आश्रितों को मुआवजा दिया पर खानापूर्ति के समान। रवींद्रनाथ टैगोर ने एकला चलो का नारा दिया था। समाज में परिवर्तन करनेवालों को अकेले चलना पड़ता है। हक माँगने पर व्यवस्था का विरोधी करार दिया जाता है। काम करने वाले लोगों को उपहास, उपेक्षा, अलगाव और अपमान सहना पड़ता है, इसलिए इन चार उपहारों के लिए तैयार रहना चाहिए। आरोप लगानेवाले चाहे जो भी आरोप लगाएँ लेकिन सत्य जीवित रहता है। गांधी, सुकरात, ईसा सत्य के आधार पर ही आज भी जीवित हैं।

ऐसा कहा जाता है कि अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा, जलसंकट से निपटने के उपाय बताएँ?

बीसवीं शताब्दी में तेल को लेकर विश्वयुद्ध हुआ लेकिन पानी के संकट को देखते हुए कहा जा सकता है कि अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा। पानी संकट की त्रासदी लोगों में देखी जा रही है। भू स्तर से जल दूर होता जा रहा है, पृथ्वी को आर-पार करने पर भी पानी मिलना संभव नहीं हो पा रहा है। प्राकृतिक वस्‍तु का विकल्‍प कोई अप्राकृतिक साधन तो नहीं हो सकता है। पानी का विकल्‍प है - पेड़ (काष्‍ठफलों के पेड़)। हमें वर्षा पानी को संचित करने की जरूरत है। अपने घरों के पानी को संचित करके इस्तेमाल में लाएँ। पानी की समस्या के समाधान के लिए पानी का दुरुपयोग न करें साथ ही वृक्ष खेती करें। पानी का इस्तेमाल कृषि व उद्योग में होता है, इसके लिए हमें विकल्प ढूँढ़ने होंगे।

आपने चावल खाना क्यों छोड़ दिया है?

सन 1978 में गोमुख (जहाँ से गंगा निकलती है) गया था। वहाँ ग्लेशियर के पीछे होते रेगिस्तान को देखने पर मुझे लगा कि पानी का संकट आनेवाला है। धान की फसल में पानी सर्वाधिक लगता है। उसी वर्ष से मैंने चावल खाना छोड़ दिया।

वर्तमान में जो विकास की आँधी (यथा : भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण) चली है, इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?

वर्तमान दौर में भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के नाम पर जो विकास की आँधी चली है यह मनुष्य को खतरनाक मोड़ पर ले जा रही है। आज का विकास प्रकृति के शोषण पर टिका है जिसमें गरीब, आदिवासी को प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किए जाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। भूमंडलीकरण के द्वारा उपजी भोगवादी सभ्यता ने हम सभी को बाजार में खड़ा कर दिया है। प्रकृति को भी नकदी में बदला जा रहा है। लाभ-मुनाफे के खेल में समाज के हाशिए पर खड़े लोगों के विकास नहीं हो पा रहा है, इसका फायदा कुछ ही लोगों को होता है। हमें यह सोचना पड़ेगा कि प्रकृति सभी के लिए है और हमेशा के लिए है कुछ समय के लिए नहीं है।

पूँजीवाद के उपनिवेशवादी नीतिकारों ने देश को गुलाम बनाया, आज जो पूँजीवाद अपने दूसरे रूप में सांस्कृतिक गुलामी की ओर ले जाने को आतुर है, इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?

यह सही है कि पूँजीवाद के उपनिवेशवादी नीतिकारों के कारण ही देश को वर्षों गुलामी सहनी पड़ी। पूँजीपतियों ने सोचा कि आज विकास के नाम पर गरीब देशों का दोहन कर सकते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हमारे प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करके मुनाफा कमाने के लिए धुआँधार विज्ञापन करती है। विदेशी कंपनियाँ भारतीय संस्कृति की चिंता किए बगैर माल बेचने की जुगत में जुटे हैं। गांधीजी अपने जीवन से ही समाज को संदेश देते थे। इन्होंने सादगी, संयम, शांति, सदाचार से जीवन जीने की कला समाज को दी है, पर आज हमारा समाज सत्‍ता, संपत्ति, शस्त्र व शास्त्र पर आधारित हो गया है। गांधीजी ने सत्‍ता के स्थान पर सेवा की भावना, संपत्ति के स्थान पर संयम, शस्त्र की जगह पर शांति, शास्त्र के स्थान पर सदाचार की राह दिखाई थी। वे भारतीय संस्कृति के वसुधैव कुटुंबकम के संदेश के आधार पर समाज को खड़ा करना चाहते थे। भारतीय संस्कृति की परंपरा अरण्य संस्कृति पर आधारित रही है, जो प्रकृति के सानिध्य में रहेगा वही प्रकृति को माँ के समान देखेगा। आज मानव की धरती माँ को देखने की दृष्टि भोगवादी है और हम धरती माँ को प्यार की नजरों से नहीं अपितु कसाई की भाँति देखते हैं।

प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अभिजात्य वर्गों द्वारा हो रहा है, गाँव, गरीब, आदिवासी, खेतिहर मजदूर, आश्रितों को जल, जंगल, जमीन से बेदखल किए जाने की मुहिम चल पड़ी है, आपका मानस कैसा महसूस करता है?

समाज के चंद लोग, जो उद्योगपति हैं, उनके द्वारा ही प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। वर्चस्वशाली ताकतों की भाषा में उत्पीड़कों का जीवन समझना बेहद मुश्किल है। पढ़े-लिखे युवक देहातों में नहीं जाते अपितु शहरों तक ही सिमट कर रह जाते हैं। दुनिया को राह दिखाने का एकमात्र रास्ता गांधी का जीवनादर्श है। गांधी के समकालीन चर्चिल, मुसोलिनी, हिटलर, स्टालिन हुए थे, इन चारों का नामोनिशान मिट गया, गांधीजी के जीवनादर्शों से ही वर्तमान संकट से निपटा जा सकता है। इस बात को संयुक्त राष्ट्र ने भी माना और इनके जन्म दिवस को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मना रहे हैं।

बढ़ते शहरीकरण पर आपकी राय?

देखिए शहरों में अपने स्‍वयं के संसाधन तो होते नहीं हैं, शहर के लोग गाँव के संसाधनों पर आश्रित रहते हैं और यहीं से शोषण प्रारंभ होता है। पिछली शताब्दियों में यूरोपियन देशों में शहरीकरण प्रारंभ हुआ परिणामस्‍वरूप उनके लिए संसाधनों की आवश्‍यकता पड़ी जिसकी पूर्ति के लिए गरीब देशों को गुलाम बनाया। गांधी और विनोबा दोनों ने गाँवों की ओर लौटने का आग्रह किया था पर हम इसके विपरीत कार्य कर रहे हैं। गाँवों के बारे में हमारा ध्‍यान कम और हम शहरी मध्‍य वर्ग के बारे में ज्‍यादा सोचने लगे हैं।

आतंकवाद के खिलाफ दुनिया खड़ी दिखती है पर आज आतंकवाद से भी बड़ा खतरा ग्लोबल वार्मिंग से दिख रहा है, यह खतरा हमारी आनेवाली पीढ़ियों के लिए और भी भयावह होगा, इसके समुचित समाधान के लिए आप क्या उपाय सुझाएँगे?

 

आतंकवाद से दुनिया भयभीत है, आज इससे भी बड़ा खतरा ग्लोबल वार्मिंग से है। ग्लेशियरों की पूरी बर्फ पिघल रही है, भविष्य के लिए जब बर्फ बचेगी ही नहीं तो प्रकृति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। अगर हम समय रहते अपनी आदतों में परिवर्तन नहीं लाएँगे तो आने वाली पीढ़ियाँ कभी माफ नहीं करेंगी। ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए हमें अपनी आवश्यकताएँ कम करनी पड़ेगी, कम से कम चीजों से काम चलाने की आदत डालनी होगी साथ ही विकल्प ढूँढ़ने होंगे। दुनिया के सामने जो खतरा उत्पन्न हुआ है, इन खतरों से मनुष्य को वृक्ष खेती ही बचा सकती है। प्राण वायु देने, कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा को कम करने, लोगों को पानी सुनिश्चित करने तथा खाद्य पदार्थ की पूर्ति करने में वृक्ष ही हमारे लिए उपयोगी है। हमें अपने आस-पास ऐसे वृक्षों का चयन करना चाहिए जो मनुष्य को भोजन, फूल से शहद, पशु के लिए चारे, वस्त्र के लिए रेशा दे सके, ताकि धरती से ही हम स्वावलंबी हो जाएँ।

' सेज' के संदर्भ में कहा जाता है कि इसमें आधुनिक भारत के नए रजवाड़े शामिल हो गए हैं; क्या स्पेशल इकोनॉमिक जोन को स्पेशल एक्सप्लाइटेशन जोन कहना उचित होगा?

कपड़े की दुकान, झगड़े की दुकान और दारू की दुकान के लिए बौद्धिक हाथापाई हो रही है। विकास के नाम पर सेज से पूँजीपति अपना लाभ कमाने के बारे में सोच रहे हैं। सेज द्वारा सीमित क्षेत्र में शोषण को तीव्र करने की एक साजिश है। यह साजिश प्राकृतिक संसाधनों से गरीबों को बेदखल करने की है। इस समय दुनिया में अर्थशास्त्र का धर्म फैला हुआ है और ये अर्थशास्त्र थोड़े लोगों के लिए हो रहा है। केंद्रित उत्पादन व्यवस्था का लाभ संपन्न लोगों को ही मिलता है। सेज को स्पेशल इकोनॉमिक जोन की बजाय स्पेशल एक्सप्लाइटेशन जोन कहना उचित ही होगा। आज की जरूरत के मुताबिक स्पेशल इकोनॉमिक जोन के स्थान पर स्पेशल सेल्फ सफिसिएंसी जोन बनना चाहिए। संसाधनों का उपयोग आम आदमी के लिए होना चाहिए।

क्या आप मानते हैं कि भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता को खतरा होगा साथ ही परमाणु ऊर्जा का रास्ता हमें पर्यावरणीय विनाश की ओर ले जाएगा?

अमेरिका बड़ी शक्ति है जो पूरी दुनिया पर छाना चाहता है। इसलिए भय व खतरा उत्पन्न करके अपना हथियार गरीब देशों में बेचना चाहता है। भारत को कहता है कि पाकिस्तान तुम्हारा दुश्मन है, कभी भी हमला कर सकता है इसलिए हथियार खरीदो। शक्तिशाली देश व्यापारिक हित को हम पर थोपते हैं। विनोबा जी ने कहा था कि एबीसी (अफगानिस्तान, बर्मा और सीलोन के बीच) का त्रिकोण बनाओ। ऐसे संघ बनने से पड़ोसी देश एकजुट हो सकेंगे, सेना का खर्च कम होगा तथा ज्यादा से ज्यादा पैसा विकास कार्यों में लगेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं अपितु व्यापारिक हितों से यूरोपियन देशों ने महासंघ बना लिया। परमाणु ऊर्जा से पर्यावरण का विनाश ही होगा। भारत तो भाग्यशाली देश रहा है सूर्य यहाँ रोज उगता है। इसलिए ऊर्जा संकट के लिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलशक्ति ऊर्जा, मनुष्य ऊर्जा और पशु ऊर्जा से हम आत्मनिर्भर हो सकते हैं। हाँ इन स्रोतों से प्राप्त ऊर्जा विकेंद्रित होनी चाहिए, जिससे इसका लाभ आम व्यक्ति को भी मिल सके।

पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को आप किस रूप में देखते हैं?

पर्यावरणीय असंतुलन की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है। पर्यावरणीय संकट से उबरने हेतु सरकार का योगदान सहायक के रूप में होना चाहिए। गाँव के आम जनों को एकजुट होकर इस संकट का मुकाबला करना चाहिए। सरकार का काम कागजों पर होता है। राज्य का आधार लोगों की शक्ति है न कि सैन्य शक्ति। इसलिए शक्तिशाली जनता व जमीन से जुड़े कार्यकर्ता पैनी नजर से इस समस्या पर ध्यान दें तथा इसमें जुड़ने के लिए सरकार को भी मजबूर करें ताकि हमारा भविष्य सुरक्षित रह सके।

वर्तमान समस्‍याओं का हल किस प्रकार से हो सकता है?

वर्तमान में हम जितनी भयावह समस्‍याओं को देख रहे हैं, यह मनुष्‍यों द्वारा निर्मित है। लक्‍जरी जीवनशैली और लिप्‍सा के कारण हम प्राकृतिक संसाधनों के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं। भूमि और जल हमारी पूँजी है। हमें ब्‍याज या लाभ पर जिंदा रहना चाहिए। आज हम पूँजी ही खा रहे हैं, ऐसे में किस प्रकार से समस्‍याओं का हल निकलेगा। हमें जिंदा रहने के लिए प्रकृति का सम्‍मान करना पड़ेगा। वृक्ष, खेत आदि का सम्‍मान करना पड़ेगा। हमें समाधान अपनी संस्‍कृति में मिलेगा, जिसे हम भूलते जा रहे हैं।

नई पीढ़ियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

हमारी पीढ़ी ने जो गलत काम किए हैं उसे नकार दें और भविष्य का निर्माण स्वयं करें, अपने को स्वावलंबी बनाएँ, विकेंद्रित व्यवस्था के वाहक बनें तथा अपनी ऊर्जा को शासन और शोषण को समाप्त करने में लगाएँ तभी वर्तमान समस्याओं का निपटारा हो सकेगा। नई पीढ़ी स्वयं को केवल अपने तक ही सीमित न रखें, भावी पीढ़ी के लिए आदर्श कायम करें। नई पीढ़ी को आनेवाले संकटों के बारे में जागरूक करता हूँ ताकि वे इस संकट का भारतीय संस्कृति (सादगी, संयम, सदाचार) के अनुरूप उसका मुकाबला कर सके। साथ ही ये पीढ़ियाँ भोगवादी सभ्यता के बरक्‍स अपनी सांस्कृतिक विरासत को न सिर्फ बचाए रखने में अपितु दुनिया को मार्गदर्शन करने में दीप प्रज्वलित कर प्रज्‍ज्‍वलित कर सकेगा।

82-83 वर्ष की अवस्था में आजकल आप क्या कुछ कर रहे हैं?

पर्यावरण को बचाने के लिए उम्र के अंतिम पड़ाव में लोगों को अनुभव सुनाता हूँ। जमीनी स्तर पर नए कार्यकर्ता बनाने के लिए जगह-जगह घूम रहा हूँ।


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हिंदी समय में डॉ. अमित कुमार विश्वास की रचनाएँ