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कविता

मुक्त भूगोल
रक्षक नायक

अनुवाद - शंकरलाल पुरोहित


हीड़ नहीं बाड़ नहीं
कोई रेख भी नहीं मानचित्र पर
आकाश-सा खुला
रास्ते से पिछवाड़ा, आँगन पर तना
मेरी साँसों के अंगारकाम्ल में
अमेजन तट का एक पेड़ बचता
मेरे पेट्रोल के धुएँ में
प्रशांत हृदय में एक तिमि छटपटा रही
समझ गया इगलू संग
जुड़ा है मेरा घर
अफ्रीका में पेड़ गिर पड़े
मुँह बाए पड़ा रहे मेरा खेत
इजिप्ट में बम से ममी माटी में मिले
मेरा माथा काला पड़ जाता
कौन नहीं जानता
किसी नदी का उत्पत्ति स्थल!

अनेक सभ्यताओं के युग से भूगोल टूटने की
चेष्टा छूते हैं, कितने यज्ञ, युद्ध, प्रलय
कितने मंत्र पढ़े गए
आविष्कार, अब लगता है
नदी, माटी, पहाड़, मरुभूमि, हँसी, रुलाई
किसी की न हो कर, हो गई हैं
सब की, जेनम कोड ने
तोड़ दी है भूगोल की आखरी अर्गला।

कैलिफोर्निया या पुरी, सब जगह
लगता है एक जैसा,
ऐंडीज पर्वत पर भी कैलाश है।

मुक्त भूगोल के स्वाधीन बिहंग हम
हम चिलिका झील के पक्षी, शायद
हम अधिक समय देते केस्पियन को
जहाँ रहे भी
अंग देने आएँगे गहरी मथा तट पर।
हम भूगोल मुक्त हो सके
भूमा से कामना कर सके
पर, इतिहास हमें
रिसती बालू-सा
खींच लेता, गाँठ बाँध देता
पहचान करा देता भीड़ में।

 


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