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कविता

हर बंदरगाह पर स्वागतं
रक्षक नायक

अनुवाद - शंकरलाल पुरोहित


आओ
पौरुष के मुक्तवास!
मुझे घर्षण करो
माटी मेरी उर्वर।

मेरा स्वामी है
जांगलिक यौवन का साक्षी बन
भाग्य से जुटी नहीं बीज विक्षेप की मधुबेला
मेरी गोद ऐश्वर्य की प्रतीक्षा में
शून्य कोठी
मुझे हँसती रही पर पुरुष की छाया
तुम चरमानंद के शीर्ष योग मेरे।

किस लिए उफनते?
मेरे जले बगीचे को हथेली से
एक बार सहला दो
हर ऋतु मेरे लिए बसंत
तुम्हारे आने वाले घोड़े के खुरों की धूल में
मैं देख पाती अपने फल फूल पत्ते
अपनी आँख की लहर में

नाच-नाच आ रहा अतीत से
भविष्य की ओर
गीत और कहानियों भरा बोहित।

तुम आओगे अतः
लालटेन लगा, खुला रखा है द्वार
पानी लोटा रखे प्रतीक्षा कर रही
जिस दिन पहुँचोगे तुम
उसी दिन है मानबसा गुरुबार, लक्ष्मी का शुभवार।

सच तुम आने से पहले
कभी कौवा बन एंटीना पर
कभी थैंक यू कार्ड बन
चिट्ठी में
आने की महक मिल रही,
तुम्हारे अभिसार के अभिषेक में
तुम्हें रंजित कर देने
पीढ़ी से पीढ़े
मेरे घर की सारी छत पर।

मुझे खोजने पर हीरा,
मुझे नचाने पर नदी
मुझे बाँधने पर बन्य
मुझे सुलाने पर आकाश।

 


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