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विमर्श

प्रेमचंद के संग : पहली बार उर्फ रसोई और स्टडी के बीच हरसिंगार के फूलों की बरसात
रोहिणी अग्रवाल


स्मृतियों के समंदर में कुशल गोताखोर हुए बिना डुबकी लगाओ तो साँस उखड़ते ही अधबीच यात्रा स्थगित कर वापस लौट आने का अंदेशा बना रहता है।

कठिन प्रशिक्षण के बाद मेरे ट्यूटर ने मुझे कुशल गोताखोर होने का सर्टिफिकेट दे दिया है। मैं उल्लसित हूँ कि स्मृति-सागर की अतल गहराई में दबे मणि-मुक्ता के खजाने को बटोर कर मालामाल हो जाऊँगी। अपेक्षाओं से भर कर भीतर उतरी तो देखा यादों से सिरजे वे मणि-मुक्ता बेशकीमती पत्थर होकर रह गए हैं, जीवन के कोलाहल से भरे लम्हे नहीं। हिला-डुला कर बंद स्मृतियों को जगाना चाहा तो भीतर से प्रतिरोध की दूनी ताकत दबाव बनाने लगी। ''कैसी अंधेरगर्दी है! मेरी संपत्ति, उसमें कैद मेरे उच्छ्वास, मेरी रुचियाँ, मेरे अक्स - क्यों नहीं उम्र के अंतराल को पाट कर मैं अपने पिता की उँगली पकड़ कर नारनौल की जिला लाइब्रेरी में जाती छह-सात वर्षीया बालिका बन जाती, मैं अपने और पिता के अड़तालीस बरस पुराने चेहरे को याद करने की कोशिश में दिमाग पर जरूरत से ज्यादा जोर डाल रही हूँ और दिमाग है कि चेहरों की आज की पहचान को बासी न होने देने की जिद पर अड़ा है।

''ऐसे तो मैं एक भी जीवित स्मृति उठा कर नहीं ले आ पाऊँगी?'' मैं हताश, ''मुर्दा सीपियों के खोल इकट्ठा कर क्या करूँगी?''

मेरे प्रशिक्षक ने समझाया - स्मृतियाँ सामान नहीं होतीं जिन्हें 'उठा' कर लाया जा सके। उन्हें फिर से जीना और सिरजना पड़ता है। गुजरा पल वापस नहीं लौटता। अपनी अनुगूँजों के जरिए उस पल की अनुभूतियों और सच को फिर से रचने का निमंत्रण देता है।

''लेकिन इस पकी उम्र में आकर मैं उस कच्चे पल को ठीक उसी खुशबू के साथ कैसे रच सकती हूँ?'' मेरी अपनी परेशानियाँ वाजिब थीं। मैं, जो भावना की जगह व्यावहारिकता, संवेग की जगह बौद्धिकता को तरजीह देते-देते एक सफल शख्सियत में तब्दील होने के दुनियावी दंद-फंद में शामिल हो चुकी थी, अपने भीतर बसी किसी पुरानी सभ्यता को पर्यटक की नजर से अलहदा किसी और नजर से कैसे देख सकती थी?

बारह साल की उम्र में पहली दफा प्रेमचंद को पढ़ती उस किशोरी के अंतस को कैसे चीन्ह पाऊँगी? मेरी हर कोशिश क्या उसकी नैसर्गिकता को क्षरित करने की चेष्टा नहीं होगी?

नहीं, बेशकीमती निधियाँ बटोर लाने का लोभ ही व्यर्थ है।

मुझे उस किशोरी से बतियाने के लिए उम्र के जीने से नीचे उतरना होगा - एक-एक सीढ़ी पर एहतियात से कदम रखते हुए, ताकि अपने आग्रहों और विजन के बनने की क्रमिक प्रक्रिया के उद्गम स्रोत ढूँढ़ सकूँ।

'पर्यटन के रोमांच और पजेस करने के लोभ को दरकिनार कर अपने भीतर की बसावटों में रिश्तों की महक ढूँढ़ने निकलो तो सब कुछ ज्यों का त्यों जीता-जागता मिल जाता है।' मेरे प्रशिक्षक गोताखोर एक उम्दा काउंसलर भी हैं। हार और हताशा जैसे शब्द उनके शब्दकोश में नहीं, इसलिए हर 'खोज' खुद-ब-खुद उन्हें ढूँढ़ते उन तक आ पहुँचती है।

मैं मुस्करा दी। जीने से उतर कर नीचे समतल चौड़े मैदान में आई तो खिड़की की सिल पर बैठी बारह बरस की लड़की मुझे दिखाई पड़ी। उफ! कैसा तो गंभीर चेहरा! बारह बरस जैसी 'बड़ी' उम्र की गंभीरता को ओढ़ कर कितना-कितना विशिष्ट होने का भान! तिस पर आठवीं क्लास में प्रवेश पाने का उल्लासपूर्ण बड़प्पन! बोर्ड की परीक्षा की तैयारी कोई छोटी बात नहीं होती। मैं लड़की की ओर देख लाड़ से मुस्करा दी। बिना दर्पण के ही देखा, मेरे चेहरे को उसके दूधिया नक्श की महक कोमल और ताजा किए दे रही है। खिड़की की चौड़ी सिल लड़की का मनपसंद आसन है। घर के भीतर और बाहर दोनों जगह एक साथ होने की सहूलियत बनी रहती है। किताब में डूबो तो एक साथ दो-दो दुनियाओं की सैर करने का लुत्फ भी - किताब के अंदर और घर के बाहर की दुनिया।

''क्या पढ़ रही हो?'' मैं उचक कर उसकी किताब के पन्नों में घुस जाना चाहती हूँ।

'बड़े घर की बेटी।' वह पढ़ने में तल्लीन है। मैं जानती हूँ, अभी वह मुझ से बिल्कुल नहीं बतियाएगी। क्लास टीचर के पढ़ाए जाने से पहले हिंदी-अंग्रेजी की टेक्स्ट बुक्स चाट जाने का चस्का लगा है उसे।

'दीमक!' भाई उसे चिढ़ाता है, और वह गुस्से में भरकर उसे मारने दौड़ती है। पिता हैं कि किसी की मदद को नहीं आते। बस, बैठे मुस्कराते रहते हैं।

कहानी पढ़ने के बाद लड़की अन्यमनस्क है।

''क्यों? क्या हुआ?'' मैं पूछती हूँ।

''कैसी अजीब-अजीब कहानी है!''

हकलबेरी फिन और टॉम सायर के किस्सों, सर वाल्टर स्कॉट के उपन्यासों, गुलिवर के यात्रा-वृत्तांतों, शहजादी शहरयार की अनंत दास्तानों और हातिमताई की मेहरबानियों के किस्से पढ़-पढ़ कर लड़की कल्पना के उड़नखटोले पर सवार होकर कहाँ-कहाँ नहीं निकल जाया करती थी। कभी अलादीन के चिराग के साथ, कभी जादुई कालीन पर सवार दुनिया के कौन-कौन से दुर्गम स्थल उसने नहीं छान मारे थे। 'आदम बू-आदम बू' कह कर चिल्लाते मानसखोर राक्षसों को मारने के लिए राजकुमार नहीं, वह खुद सात समंदर, सात पहाड़ पार कर गुफा में जाती रही है ताकि पिंजरे में बंद तोते की गर्दन मरोड़ सकें। सिंदबाद के संग समुद्री यात्रा करते हुए या तीन चुड़ैलों की भविष्यवाणी सिद्ध होते देखने की उत्सुकता में धड़कते दिल से 'मैकबेथ' के पन्ने पलटते हुए उसे कभी इतनी बदरंग मायूसी नहीं हुई।

''इस कहानी में दुनिया की सैर है ही नहीं। बस, घर की कहानी है। वह भी रुकी-रुकी सी।'' वह अपनी मायूसी को शब्दों में ढाल कर पहचान देना चाहती है। लड़की को अपनी सहेलियों की तरह गुड्डे-गुड़िया का खेल खेलना बिल्कुल पसंद नहीं। सिर्फ एक बार यह खेल खेला था। तब गुड़िया की माँ बनी थी वह। गुड़िया को खिलाने-नहलाने और थपक-थपक कर सुलाने के खेल में वह इतना ऊब गई थी कि अधबीच खेल छोड़ भाग गई थी। तब से सहेलियाँ उसे अपने किसी भी राज में शामिल नहीं करतीं। न करें, वह भी क्या किसी की परवाह करती है। जब तक लाइब्रेरी में अलमारी भर-भर किताबें हैं, उसे आलतू-फालतू किसी से बतियाने की फुर्सत नहीं।

लेकिन यह कहानी... 'बड़े घर की बेटी'! पता नहीं क्यों, उसे गुड़िया के खेल की याद दिलाए जा रही है? वह आनंदी से बेहद खफा है। लालबिहारी ने खड़ाऊँ मारी है और वह रो-रो कर श्रीकंठ की प्रतीक्षा क्यों कर रही है। क्यों नहीं खुद ही जाकर लालबिहारी को... लड़की की बँधी मुट्ठियों में उसका सारा तैश संचित हो गया है।

''अन्याय करने की बजाय अन्याय सहना ज्यादा बड़ा अपराध है। जानती तो हो तुम, पापा हमेशा यह बात कहा करते हैं।'' एक राजदार आश्वस्ति के साथ वह मेरे सामने अपना हृदय खोल देने को तैयार हो उठी है। ''याद नहीं, पिछले साल दीवान अंकल के भोलू के साथ स्टापू खेलते हुए जब लड़ाई हुई, तब कैसे टंगड़ी मार कर उसने मुझे गिरा दिया था।''

मुझे सब कुछ याद था। पापा ने गोद में दुलार कर न मेरी सुबकियों को बंद करने की कोशिश की, न मेरे प्रतिनिधि के रूप में भोलू को सबक सिखाने की मेरी प्रार्थना पर गौर फरमाया। सख्ती से कड़क कर एक हुक्म दे डाला - जब तक रोती रहोगी, मैं कोई बात नहीं करूँगा।'' हिचकियों के दूने वेग में अपनी रुलाई रोक कर मैं पत्थर की राजकुमारी की तरह अडोल खड़ी हो गई। नहीं जानती, वह लम्हा कैसे गुजरा, बस, पापा की गूँजती आवाज आज भी सीख बन कर कान में गूँज रही है - अपने लड़ाई-झगड़े, मार-पीट, गिले-शिकवे खुद सुलझाना सीखो। कोई तुमसे बेहतर नहीं, कोई ताकतवर नहीं। अपने को छोटा मानती रहोगी तो हमेशा दूसरे का सहारा पाने के लिए दौड़ती रहोगी, रोती रहोगी। मैं नहीं चाहता, मेरी बेटी जिंदगी में कायर बने, लूजर बने।''

स्मृतियों की झील में एक नरम साझेदारी के साथ हम दोनों देर तक चप्पू चला कर अपनी नाव खेती रहीं। दूरियाँ और बेगानापन धीरे-धीरे गलने लगा था। तभी मैंने देखा, बगल में बैठी वह लड़की मेरे भीतर उतर गई है। अहा! कैसा जगर-मगर आलोक!

लड़की आनंदी से बेतरह नाराज है। वह उसकी जगह होती तो जिन हाथों से खड़ाऊँ रोकी, उन्हीं हाथों से पलट कर खड़ाऊँ लालबिहारी की ओर जरूर उछाल देती। इतना तो वह जानती है कि रोटी दिखा कर कुत्ते को अपने पास बुलाओ और रोटी देने की बजाय लाठी से मार दो तो किंकियाने के बाद कुत्ता भौंक कर पलटवार जरूर करता है।

पहली बार लड़की एक कहानी की दुनिया से निकल कर दौड़ते हुए दूसरी कहानी की दुनिया में नहीं घुसी है। वहीं ठिठक कर खड़ी है, और कहानी के साथ अपना रिश्ता बनाने की कोशिश कर रही है। धीरे-धीरे उसे घर के भीतर एक दुनिया आकार लेते दिखने लगी है। वह टहल कर उस तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। आनंदी के घर में उसे वंदना चौधरी की सात चौक वाली हवेली दीख पड़ी है। वंदना चौधरी की हवेली लड़की को लुभाती भी है और डराती भी है। कैसी भूलभुलैया!

''हवेली के तीन चौक में हमारा बड़ा परिवार रहता है और बाकी जगह दादा के दूसरे भाइयों का परिवार। '' वंदना ने बताया था और मैं विस्मय से बस, यही दुहराती रह गई थी - ''इत्ते सारे लोग!'' वंदना के पापा अक्सर पहले तल्ले पर तख्त पर बैठे दीखते हैं। देखते ही अँधेरी सँकरी सीढ़ियों की ओर इशारा कर देते हैं - 'वंदना की सहेली हो? ऊपर चली जाओ।' जब कभी तख्त पर न हों, तो बगल की बैठक में दोस्तों के संग ताश खेलते दीखते हैं। तब मैं सीधे ऊपर चली जाती हूँ। दूसरे तल्ले पर उनका रसोईघर है। अक्सर वंदना की मम्मी वहीं मिल जाती हैं। उन्हें देख कर लगता ही नहीं कि यही कृष्णा चौधरी मैडम हैं जो स्कूल में दसवीं कलास को हिंदी पढ़ाती हैं। सिर पर धोती का पल्लू लपेट कर चूल्हा फूँकती वंदना की मम्मी और स्कूल में डिबेट और कविता-प्रतियोगिता की तैयारी करती कृष्णा चौधरी मैडम में मुझे कभी कोई समानता नजर नहीं आई। अलबत्ता मन में डर और दूरी दोनों जगह बराबर बनी रही। लेकिन उस दिन जब मैं वंदना के घर पहुँची तो पता चला वह चूड़ियाँ पहनने मनियारिन के पास गई है। मैं मुँह लटका कर जीने तक पहुँची ही थी कि मैडम ने आवाज दी - ''रुको।'' मैं घबरा गई। कृष्णा चौधरी मैडम की पक्की सहेली कांता खुराना मैडम हमें इंग्लिश पढ़ाती हैं। कहीं उन्होंने मेरी कोई शिकायत तो नहीं की।

''जी, मैडम।''

''बैठो।'' उन्होंने मुझे अपने सामने पीढ़े पर बैठा लिया, ''घर जाने की जल्दी तो नहीं?''

''जी, नहीं।'' मेरा गला खुश्क।

जल्दी-जल्दी चार फुल्के सेंक कर उन्होंने थाली में दाल-सब्जी-रोटी और अचार रख दिया।

''घड़े में से एक गिलास पानी निकाल लो।'' मैंने पानी का गिलास भर लिया।

''ये थाली तीसरे तल्ले की बरसाती में राकेश को दे आओ।''

''राकेश चाचा को?'' मैं खिल गई। राकेश चाचा से बात करना मुझे बहुत अच्छा लगता था। वंदना ने बताया था, वे अंग्रेजी में एम.ए. कर रहे हैं। हमें कितनी-कितनी कहानियाँ सुनाया करते थे।


अगले दिन जब वंदना मिली तो सबसे पहले अब तक का भूला सवाल दाग दिया - ''तुम सब लोग चौके में बैठ कर खाना खाते हो। फिर, राकेश चाचा को अलग से ऊपर खाना क्यों भिजवाया?''

''मम्मी और चाचा की बोलचाल नहीं है न! न मम्मी चाचा को खाना परोसती हैं, न चाचा मम्मी से अपना कोई काम कराते हैं।'' वंदना ने मेरे कान में फुसफुसाते हुए बताया। ''वो तो आजकल चाचा के एग्जाम हैं, इसलिए पापा के कहने पर मम्मी हमारा खाना बनाते वक्त उनका खाना भी बना देती हैं। नहीं तो पहले चाचा खुद अपना खाना बनाया करते थे।''

मैं चकित! ''आदमी लोगों को खाना बनाना नहीं आता।''

मैं जितने जोर से वंदना को झूठा ठहराने की कोशिश करती, वह उतने ही आग्रह से मुझे हर बात रेशा-रेशा खोल कर बताने लगी कि कैसे दादी के ऊपर जाने के बाद दादा और राकेश चाचा के खाने की जिम्मेदारी लेने से पापा और सारे चाचा-ताउओं ने इंकार कर दिया। दादा गुस्से में पैर पटकने लगे थे - ''मेरे छह-छह बेटे मुझे और राकेश को खाना नहीं खिला सकते। राकेश की बहू होती तो...।''

तब परिवारवाले छहों भाइयों ने विचार-विमर्श कर बीच का रास्ता निकाला - बारी-बारी से सारे भाई एक-एक महीना दादा और राकेश चाचा को रखेंगे।

मैं और लड़की एक-दूसरे की आँख में झाँक कर चुप हो गए। चार भाई-बहन और मम्मी-पापा वाले छोटे से परिवार में रहने के कारण हमें संयुक्त परिवार की अंदरूनी लड़ाइयों का कोई इल्म न था। लेकिन वंदना की बात को झूठ साबित करने का जोश तो था ही। घर पहुँचते ही बस्ता रखने से पहले मम्मी को राई-रत्ती बात बता दी। मम्मी को सुन कर आश्चर्य नहीं हुआ - ''होता है ऐसे। जहाँ चार बरतन होंगे, खड़केंगे ही।''

लड़की ने फिर से कहानी खोल ली है और सिल पर सरक कर जरा सी जगह मेरे लिए भी बना दी है। ''पढ़ो'', किताब के एक स्थल पर उसने उँगली रख दी, श्रीकंठ पिता से कह रहे हैं - ''लालबिहारी के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता। ...उसकी दुष्टता को मैं कदापि नहीं सह सकता। या तो वही घर में रहेगा या मैं ही। आपको यदि वह अधिक प्यारा है तो मुझे विदा कीजिए, मैं अपना भार सँभाल लूँगा। यदि मुझे रखना चाहते हैं तो उससे कहिए, यहाँ से चाहे चला जाए। बस, यह मेरा अंतिम निश्चय है।''

आज हम दोनों एक-दूसरे की आँख में कुछ ज्यादा ही झाँक रही हैं।

''वंदना के पापा ने राकेश चाचा को घर से निकल जाने को क्यों नहीं कहा?'' लड़की ने पूछा, उद्विग्नता से भर कर।

''मम्मी कहती हैं, परिवारों में मनमुटाव चलता रहता है। कितने ही झगड़े हों, नाखून से मांस अलग नहीं होता।'' मैंने कहा, लेकिन उत्तर में जवाब की निश्चितता नहीं थी, सवाल की दुविधा ही थी।

हम दोनों किताब के पन्नों पर आँख गड़ाए बैठी थीं, लेकिन कहानी में आनंदी और लालबिहारी नहीं, कृष्णा चौधरी मैडम और राकेश चाचा दिखाई दे रहे थे।

सर्दियों की सुबह है। कृष्णा चौधरी मैडम को स्कूल जाने के लिए देर हो रही है। लपट-झपट सीढ़ियाँ उतरते हुए वे पहले तल्ले के आँगन में आ गई हैं। हाथ में खाली बाल्टी है। राकेश चाचा हैंडपंप से पानी खींच रहे हैं। उनकी बाल्टी अभी आधी भी नहीं भरी। चौधरी मैडम ने राकेश चाचा की बाल्टी परे सरका कर अपनी बाल्टी नल के नीचे लगा दी है - ''पहले मेरी बाल्टी भरेगी।'' वे अधिकार से कहती हैं। राकेश चाचा हैंडपंप चलाना छोड़ हैरत से भाभी की हरकत देख रहे हैं। हाथ बढ़ा कर अपनी बाल्टी नल के नीचे सरका उन्होंने हैंडपंप के हत्थे को दबा दिया है। पानी की मोटी सी धार उनकी बाल्टी में गिरती, उससे पहले चौधरी मैडम ने दोनों बाल्टियाँ बदल दी हैं।

''कहा न राकेश, पहले मेरी बाल्टी भरेगी। मुझे स्कूल के लिए देर हो रही है।''

राकेश चाचा जिद्दी बालक की तरह हैंडपंप के हत्थे को जकड़ कर खड़े हो गए हैं - ''मुझे भी कॉलेज के लिए देर हो रही है।''

''अरे, जाओ-जाओ, सब जानती हूँ, कैसे पढ़ाई करते हो कॉलेज में। आवारगी करनी है, और दस मिनट बाद चले जाना।''

राकेश चाचा का पूरा शरीर गुस्से में लहक गया है। उन्होंने पैर की ठोकर से बाल्टी को दूर लुढ़का दिया है। हैंडपंप का हत्था जोर-जोर से चलने लगा है। बाल्टी आधी से ज्यादा भर गई है। अपनी बाल्टी की ओर बढ़ती कृष्णा चौधरी मैडम पलट कर लौटी हैं और राकेश चाचा की बाल्टी का पानी जमीन पर उलट दिया है।

''भाभी!'' गुस्से में चीखते हुए राकेश चाचा ने चौधरी मैडम को धक्का मारा है। सब कुछ इतना झपाटे से हुआ कि चौधरी मैडम धक्के का आघात सँभाल नहीं पाई। संतुलन खोकर पैर जरा सा अपनी जगह से हिला और जब तक राकेश चाचा समझ-बूझ कर उन्हें सँभालने आगे बढ़ें, वे फैले पानी पर फिसल कर गिर पड़ी हैं। इसके बाद कुछ खास नहीं हुआ। पैर पर प्लास्टर बँधाते-बँधाते उन्होंने राकेश चाचा से जिंदगी भर न बोलने की कसम खाई। और सबको सफाई देते-देते चाचा भी बिफर पड़े एक दिन - ''अपनी नौकरी और कमाई का इतना गुमान है तो लगवा लें कमेटी का नल अपने बाथरूम में। अपना किया देखेंगी नहीं, दूसरों को जी भर गालियाँ। वाह री मास्टरनी।''

हम दोनों कहानी से बाहर निकल आई हैं, लेकिन कहानी हवा में घुल कर हमारे इर्द-गिर्द बनी हुई है।

''सुन!'' रोटी का पहला कौर मुँह में रखते-रखते लड़की ने कहा, ''हो सकता है प्रेमचंद भी हमारी तरह अपने मम्मी-पापा और भाई-बहन के साथ रहते हों। हमारी तरह उन्होंने भी संयुक्त परिवार न देखे हों। अब हमें ही कहाँ पता था कि संयुक्त परिवारों में ऐसे झगड़ों की कोई परवाह नहीं करता।''

''हाँ,'' मैंने आधे-अधूरे मन से समर्थन किया - ''हो सकता है, पर अपन प्रेमचंद के बारे में तो कुछ भी नहीं जानते।''

''कल चौधरी मैडम से पूछ लेंगे।'' लड़की का चेहरा सिरा मिलने के सुकून से खिल उठा।

लड़की आज खुश है। आज उसने पहली बार पेठे की खट्टी-मीठी सब्जी बनाई है। सभी ने उँगलियाँ चाट-चाट कर उसे सौ में से सौ नंबर दिए हैं। आज तो रोटियाँ भी माँ की तरह गोल-गाल बनी थीं। पिछले साल जब पापा ने रोज शाम का खाना बनाने की ड्यूटी उसके जिम्मे लगाई थी तो माँ ज्यादे सकते में आ गई थी, ''अभी से। कुल ग्यारह साल की तो है लड़की।''

''मैं? नहीं, मैं पढ़ूँगी, अफसर बनूँगी। मैं रोटी क्यों बनाऊँ?'' उसके ठुनकने में ऐतराज कम, विश्वास ज्यादा था।

''तुम क्यों नहीं? अफसर क्या रोटी नहीं खाते?''

''पर कुल ग्यारह साल की है लड़की। अभी कुछ साल और... ''

माँ की हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं समझते पिता। और मैं जानती हूँ, उनकी हर इच्छा हम सबके लिए आदेश है। कसमसा कर रोज खाना बनाते-बनाते देख रही हूँ कि कसमसाहट धीरे-धीरे किसी बँधे ढर्रे में घुलती जा रही है। माँ मुझे सब्जी काटने, मसाला भूनने के साथ-साथ नमक-मिर्च-मसाले का अंदाजा भी सिखा रही हैं।

''किताबों की दुनिया की तरह रसोई की दुनिया भी दिलचस्प है। है न?'' लड़की मुस्करा कर मुझसे पूछ रही है।

''लेकिन यहाँ गर्मी ज्यादा है और धुआँ भी।''

''और नया करने का सुख भी ... कहानी पढ़ने की तरह।''


मेरी आँख झपकी ही थी कि लड़की ने झकझोर कर जगा दिया। ''उठो, उठो।''

''क्या हुआ?'' मीठी नींद में डूबने के नशे से बड़ा सुख दुनिया में दूसरा कुछ नहीं। कमबख्त ने जगा दिया। मैं बड़बड़ा दी, ''क्या हुआ?''

''आनंदी को खाना बनाना नहीं आता था।'' वह फुसफुसाई।

''कौन आनंदी?'' मैं खुमारी में।

'बड़े घर की बेटी।' हे भगवान! मैंने माथा पीट लिया, ''तुम पागल हो?''

'सो जाओ, चुपचाप।''

''ठीक है, ठीक है,'' ऐंठते हुए वह मेरी बगल में लेट गई।

''सच्ची, उसे खाना बनाना नहीं आता था।'' थोड़ी देर बाद उसने मुझे फिर झकझोर दिया।

इस बार मैं उठ बैठी। जानती थी उसका झक्की स्वभाव! जब तक सारे सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे, न खुद चैन से बैठेगी, न दूसरों को बैठने देगी।

''तो जासूस महोदया उर्फ मैडम माताहारी, कैसे जाना कि आनंदी को खाना बनाना नहीं आता था?'' मैंने मखौल उड़ाने की कोशिश की।

''ऐसे'', तकिए के नीचे से टॉर्च निकाल कर उसने कहानी के पन्ने रोशन कर दिए।

''देखो, दो चिड़िया का मांस पकाने के लिए सब्जी में पाव भर घी डाल दिया।''

''तो?'' मैं चिढ़ गई। लालबिहारी पहलवान किस्म का युवक है। जानती है आनंदी कि उसका देवर घी के सहारे ही अपने कसरती बदन को पालता आया है।

''ऐसी क्या अनहोनी कर दी आनंदी ने? पाव भर घी ही तो डाला। कौन सा कनस्तर-भर कढ़ाही में उँड़ेल दिया!''

''कनस्तर-भर उँड़ेलना चाहती, तो भी न डाल पाती। हाँडी में कुल पाव भर घी ही बचा था।'' लड़की बदजुबानी में मुझ जैसी तेज।

''तो तुम्हारा कलेजा क्यों जल रहा है लालबिहारी की तरह? तुमने तो दो चम्मच घी डाल कर बड़े स्वाद से दाल खाई है। देख रही थी मैं।'' मैंने चुटकी ली, लेकिन लड़की ने ध्यान नहीं दिया।

''याद करो, माँ ने क्या बताया था - सुघड़ गृहिणी के लक्षण? किफायत से घर-खर्च चलाने की बात... ''

मैंने बात बीच में काट दी, ''आनंदी हमारी-तुम्हारी तरह गरीब परिवार की थोड़े ही थी। पढ़ो, क्या लिखा है प्रेमचंद ने - 'बड़े घर की बेटी किफायत क्या जाने? उसने सब घी मांस में डाल दिया।'

लड़की भक् से जल उठी - ''और द्रौपदी! छोटे घर की थी वो? पांडवों को खाना खिलाने के बाद सारे बर्तन-कनस्तर खाली नहीं कर देती थी। तली में कुछ न कुछ जरूर बचा कर रखती थी, मुसीबत के लिए। तभी न, चेले-चपाटों समेत दरवाजे पर आए दुर्वासा मुनि को भी भोजन करा दिया उसने। धुर जंगल में।'' मैं जानती हूँ, चंदामामा में पढ़ी थी यह कहानी उसने। क्या कहती, निरुत्तर हो गई।

लड़की पाव भर घी को हम छह-छह जनों के परिवार में खपाने के अनुपात के बारे में सोचने लगी।

''हमारे माँ-पापा प्रेमचंद से अलग हैं न?'' अचानक उसने अपनी टिप्पणी दी।

''कैसे?'' मैं जानने को उत्सुक हो उठी।

''प्रेमचंद फिजूलखर्च बेवकूफ लड़की को बड़े घर की बेटी कहते हैं। उसे तो अपने झगड़े तक खुद निबटाने नहीं आते। शिकायती टट्टू कहीं की, छोटी सुनीता जैसी।'' हम दोनों हँसी को दबा-दबा कर हँसने लगीं। छोटी सुनीता का सब खूब मजाक उड़ाते हैं।

''पापा कहते हैं, बड़प्पन न उम्र से आता है, न पैसे से। बड़प्पन समझदारी से आता है।'' लड़की पापा की भक्त है। उनके रटाए सारे पाठ दिल और जुबान पर एक साथ।

मुझे पहली बार लड़की की बात की काट मिली, ''समझदार तो है ही आनंदी। दो भाइयों के बीच आग लगाई, तो आगे बढ़ कर सुलह भी करवा दी।''

''और वंदना की मम्मी... कृष्णा चौधरी मैडम... उन्होंने तो अपनी लड़ाई को वंदना के पापा या दादा तक जाने ही नहीं दिया। लड़ते हुए ही सही, रिश्ता तो दिल से निभा रही हैं न वे।''

अचानक वह उत्तेजित हो उठी, ''मैं कभी आनंदीबाई जैसी नहीं बनूँगी। तुम्हें कभी प्रेमचंद मिलें तो पूछना उनसे, कृष्णा चौधरी मैडम पर कहानी क्यों नहीं लिखते?''

''देखो, रात ढलने को है। आओ, शहजादी शहरयार की तरह भोर होने तक जादुई कहानियाँ सुने-सुनाएँ।'' मैंने हथियार डालते हुए विषय बदल देना चाहा।

''नहीं।'' उसने दृढ़ता से मेरा प्रस्ताव नकार दिया। एक बार फिर टार्च की रोशनी में 'बड़े घर की बेटी' के खुले पन्ने उसके सामने थे।

''मुझे प्रेमचंद को पढ़ना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।''

मैंने देखा, वह पिघल कर पन्नों की इबारत में कहीं गुम हो गई है।

मैं चौवन बरस की उम्र का लबादा ओढ़ कर वापस अपने स्टडी रूम में चली आई। अचानक देखा, हरसिंगार के फूल मेरे चारों ओर झड़ रहे हैं।


प्रेमचंद : ' नारी का धरम है कि गम खाय'
        कथा-सम्राट प्रेमचंद!
       'गोदान' : हिंदी साहित्य में मील का पत्थर!!
       महानता के उत्कर्ष पर आरूढ़ प्रेमचंद : सबके चहेते और सर्वाधिक लोकप्रिय!!!


मैं पसोपेश में हूँ कि महान व्यक्ति के साथ संवाद कैसे करूँ? जमीन पर खड़े व्यक्ति की आवाज दूर ऊँचाइयों पर आसीन व्यक्ति को सुनाई नहीं पड़ती। वह दूरी को बनाए-बढ़ाए रखने वाले कोलाहल में कहीं गुम हो जाती है। अलबत्ता ऊँचाई तक पहुँचती कुछ कमंदों के सहारे अपनी बात पहुँचाई जा सकती है लेकिन कमंदें थामने वाली राजनीतिक-सांस्कृतिक ताकतें महापुरुष को व्यक्ति नहीं रहने देतीं, देवता (पबवद) बना डालती हैं; स्तुति और प्रचार को धर्म। तो क्या मंत्र-पाठ की तरह आवृत्तियों को ही निष्ठापूर्वक दोहराऊँ? या 'वध' किए जाने के तमाम खतरों को उठा कर कथा सम्राट को उन ऊँचाइयों से खींच लाऊँ और महानता के खोल में संवाद के लिए ललकते साधारण से उत्सुक लेखक से बस एक सवाल पूछ ही डालूँ कि जब स्त्री के मन को बिल्कुल नहीं समझते तो उसके बारे में इतनी-इतनी टिप्पणियाँ क्यों करते हैं आप?

लेकिन नहीं। शालीनता की कुछ सीमाएँ हुआ करती हैं। यूँ उँगली उठा कर किसी पर भी आरोप लगा देना अपनी ही आवेशजनित दुर्बलताओं और असुरक्षा का सार्वजनिक स्वीकार है। फिर धनिया तो हिंदी कथा-साहित्य के कुछेक जीवंत पात्रों में से एक है - विद्रोह की तीखी धार और आत्मीयता की सरस फुहार के साथ संबंधों को ही नहीं, अपने व्यक्तित्व को नई ऊर्जा देती एक समाजनेत्री; सीधी खरी बात कह कर अपनी डगर पर अकेले चलने का हौसला रखती स्त्री! सचमुच स्त्री में इतना साहस नहीं होता। वह अबला है यानी प्रताड़िता, परावलंबी। बात-बात पर पति/पिता का मुँह जोहने वाली अवश कातरता! लेकिन मुँहजोर धनिया पति से ही भिड़ने को तैयार! एक बार नहीं, बार-बार। अकेले नहीं, पूरे गाँव-समाज के सामने। बस, सच्चाई का पल्लू हाथ में हो, फिर रणचंडी बनने में देर नहीं। रणनीति चाहे न आती हो। क्या होगा अव्यावहारिक ढंग से लड़ाई लड़ने का परिणाम? जनमत ही विरुद्ध होगा न! बड़े 'कॉज' के लिए निकली धनिया ऐसी क्षुद्रताओं की परवाह नहीं करती। सच्चाई को दाब-ढाँक कर दोगलेपन को 'जनती' मर्यादा को वह तार-तार कर देती है - ''मैं आज इसे और इसके हत्यारे भाई को जेहल भेजवाकर तब पानी पिऊँगी। इसके भाई ने गाय को माहुर खिला कर मार डाला। अब जो मैं थाने में रपट लिखाने जा रही हूँ, तो यह हत्यारा मुझे मारता है।'' (पृ. 100) तथा ''घर में तलासी लेने से इसकी इज्जत जाती है। अपनी मेहरिया को सारे गाँव के सामने लतियाने से इसकी इज्जत नहीं जाती। ...बड़ा वीर है तो किसी मर्द से लड़। जिसकी बाँह पकड़ कर लाया है, उसे मार कर बहादुर न कहलाएगा।'' (पृ. 105) सचमुच पर्दा प्रथा से त्रस्त स्त्री प्रवंचनाओं के आवरण ओढ़ कर अपनी गति को बाधित और दृष्टि को धुँधला नहीं करना चाहती।

कितना साहस! कितना आत्मविश्वास!

फिर कैसे सिद्ध करूँ मैं अपना आरोप कि प्रेमचंद स्त्री-मानस को बिल्कुल नहीं जानते। बल्कि वे तो धनिया की अभ्यर्थना में सिर झुका कर खड़े हैं और इस 'अकुशल सिपाही' को स्त्री-पुरुष दोनों का सम्माननीय नेता बना देते हैं। लेकिन जाने क्यों पंक्तियों के बीच छिपे कुछ तथ्य चुगलखोर हमदर्द दोस्त की तरह कान में फुसफुसा जाते हैं कि धनिया की दिलेरी एक छद्म आवरण मात्र है जिसके नीचे 'अपने नारीत्व के संपूर्ण तप और व्रत से अपने पति को अभयदान देती' और 'सोहाग' रूपी तृण के सहारे जीवन-सागर को पार करती किसी भी औसत पतिव्रता स्त्री को देखा जा सकता है। असल में प्रेमचंद जो बार-बार धनिया की पीठ ठोंकते हैं, सो भी इसी गुण के कारण कि इस साध्वी ने ''होरी के सिवा किसी पुरुष को आँख भर कर देखा भी न था।'' (पृ. 112) और पतिव्रता पत्नी का मालिक होने के गुमान में फूला होरी अपनी जिंदगी के वरक पलट-पलट कर प्रमाण जुटाता चलता है कि कैसे जवान धनिया की एक झलक पाने के लिए गाँव के मनचले और साहूकार उसके झोंपड़े के चारों ओर मँडराया करते थे और 'सती' धनिया उन्हें अपनी सूरत तक न दिखाती थी। होरी के अतिरिक्त गद्गद्पन का एक कारण क्या यह भी नहीं कि स्वयं अपने को टटोलते हुए उसने जवानी क्या, इस अधेड़ावस्था में भी दुलारी सहुआइन के साथ 'रँगीली' बातें करने के रस में भीगते हुए देखा है? जाहिर है, धनिया कितना ही रँभा ले, उछल-कूद कर ले, होरी आश्वस्त है कि इस कामधेनु का पगहा उसके हाथ में है; कि साँझ-सवेरे उसके थनों में दूध भर-भर आता रहेगा; कि उस दूध के भार से निजात पाने के लिए वह स्वयं दोहन के लिए तैयार मिलेगी। बस, पुट्ठों को जरा सा सहलाने भर की देर है। धनिया की दिलेरी में समर्पण के भार से झुकी यह चारित्रिक निरीहता समाज को बरगलाने के लिए काफी है कि वह पति की अनुगता मात्र नहीं, परामर्शदाता भी है; कि वह सिर्फ देह और करुणा नहीं, बुद्धि और विवेक भी है।


''स्त्री पृथ्वी की भाँति धैर्यवान है'' यानी '' नारी का धरम है कि गम खाय''


व्यवहारकुशल होरी की कायरता के सामने धनिया के व्यक्तित्व की स्वतःस्फूर्तता और निर्भीकता उसे होरी की तुलना में अनायास ही प्रखर और ओजस्वी बना डालती है, अन्यथा होरी और प्रेमचंद की तरह धनिया भी जानती है कि होरी की सहमति के बिना उसके विद्रोह की ध्वनि, गति और जिंदगी कुछ भी नहीं। होरी की अपनी निश्चित प्राथमिकताएँ हैं - मरजाद, कुल परतिसठा, भाइयों के साथ खून का रिश्ता - और इसके निर्वहण के लिए बँधी हुई पारंपरिक दृष्टि। अपनी इस मिल्कियत के भीतर वह दुर्दांत है और इस घेरे के बाहर फक्कड़ वैरागी। वहाँ धनिया हस्तक्षेप कर निर्णय लेती रहे, होरी की बला से, लेकिन उसके अधिकार क्षेत्रा में कूदी तो वाही-तबाही - ''मैं जितनी तरह देता हूँ, उतनी ही यह सिर चढ़ती जाती है।'' लेकिन वही धनिया जब झुनिया और सिलिया को पनाह देती है तो होरी सिर झुका कर डाँड़ भरता है या मिमिया कर दुलारी के सामने सिलिया को न निकाले जाने की विवशता जताता है - ''धनिया उसे रखे हुए है, मैं क्या करूँ?'' (पृ. 236) यूँ झुनिया को शरण देने के प्रसंग की महीन जाँच करें तो भी होरी के मालिकाना अख्तियार धनिया को दूती या माध्यम भर सिद्ध करते हैं, निर्णायक शक्ति नहीं। धनिया झुनिया को आश्रय देने को स्वतंत्र होती तो क्यों घर के द्वार पर आश्रय माँगती झुनिया को वहीं छोड़ कर खेत में मड़ैया डाले रखवाली करते होरी को बुलाने आती? होरी के प्रत्याशित रोष में अपना रोष मिला कर क्यों उसकी क्रोधाग्नि को वहीं थामे रखने का जतन करती? घर लौटते समय क्रमशः पिघल कर होरी को पिघलाने की युक्तियाँ क्यों अपनाती? धनिया के गरम-नरम तेवर झुनिया की ओर से मर्सी अपील हैं - जिसमें वह कहीं शामिल है तो मनुष्यता के नाते, दुराचारी बेटे की माँ होने की लाज को ढाँपने के नाते; झुनिया के गर्भ में पलते अपने ही वंश के अंश को बचाने के नाते।

होरी धनिया की सब बातें नहीं मानता। उतनी भर मानता है जितने से उसका स्वार्थ सिद्ध हो या मान और मालिकाना हक बना रहे। हुक्का बंद होने से धनिया विचलित नहीं हुई, (वह खुले गले से पूरे गाँव के जले पर नमक छिड़कते हुए पोते के जन्म पर गीत गाती रही।) विचलित हुआ होरी - बिरादरी में नक्कू बनने के अपमान से बिद्ध होरी महतो! इसलिए उसने घर भी गिरवी रखा और अनाज का दाना-दाना भी पंचों के पास पहुँचाया। धनिया का ताने देता आक्रामक विरोध उसकी 'कर्मठता' को छू भी न गया। सोना के ब्याह के समय भी यही 'मर्यादा' उसे आत्मप्रवंचना के मायावी जाल में जकड़ कर दूर तक नचाती है और फिर ठक से धराशायी कर देती है - नाच-तमाशा, बाजा-गाजा, हाथी-घोड़े और तीन-तीन सौ बारातियों की आवभगत के लिए रुपया कहाँ से लाएगा? एक विकल्प है - अगर वह एक बीघा जमीन बेच दे, तो? लेकिन किसान होकर जमीन कैसे बेचे? ''बाप-दादा की यही तो निसानी है, यह निकल गई तो जाऊँगा कहाँ?'' दूसरा सदाबहार विकल्प - ऋण! ऋण ही लेता है होरी। दुलारी सहुआइन से। उधार की चकाचौंध पर प्रतिष्ठा का प्रपंच खड़ा करने। लेकिन सोना ने दहेज के खिलाफ लामबंदी कर दी है। चुपके से भावी पति के पास दहेज न लेने का पैगाम भिजवाया है और भावी पत्नी के मान की रक्षा में मथुरा ने अपने पिता की ओर से होरी को संदेस भिजवाया है - ''आगे जो हम लोगों में दहेज की बातचीत हुई थी, उस पर हमने सांत मन से विचार किया, समझ में आया कि लेनदेन से वर और कन्या दोनों ही के घरवाले जेरबार होते हैं। ...तुम दान दहेज की कोई फिकर मत करना, हम तुमको सौगंध देते हैं। जो कुछ मोटा-महीन जुरे, बरातियों को खिला देना।'' (पृ. 241) होरी किंकर्तव्यविमूढ़ है। ऐसी अनहोनी बात! वर पक्ष की माने या बिरादरी में नाक ऊँची रखने के लिए रुपयों का खेल खेले? वह मूढ़ की नाईं 'चतुर' धनिया की शरण में है। धनिया पति की देह और मन की भाषा पढ़ सकती है। होरी के दिलोदिमाग में धूमधाम से ब्याह कर कुलमर्यादा बढ़ाने की इबारत साफ लिखी है। वर पक्ष का आदेश और अपनी गरीबी 'व्यावहारिक' ज्ञान बन कर उसे मर्यादा के इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का विवेक देते हैं। होरी इस समय विवेक की बोली-बानी सुनना नहीं चाहता, धनिया जानती है। इसलिए उसकी मूक सहमति को अपना मुखर 'अव्यावहारिक' निर्णय बना डालती है कि 'रुपया हाथ का मैल है। उसके लिए कुल-मरजाद नहीं छोड़ा जाता।' और गद्गद् होरी हाथ मसल-मसल कर धनिया को कोसने का अवसर 'भुनाने' लगता है - ''तू आगे भी चलती है, पीछे भी चलती है। ...तेरा मरम भगवान ही जाने।'' (पृ. 242) अलबत्ता रूपा के ब्याह के समय धनिया की जिद और तर्क दोनों उसके सामने बेमानी हो जाते हैं। अपने हमउम्र अधेड़ रामसेवक से उस बालिका का ब्याह रचाते वक्त उसके हाथ नहीं काँपते। काँपते हैं इस संबंध के एवज में मिले दो सौ रुपए लेते वक्त। मन में अभी भी अभिमान है कि समाई होती तो सोना की तरह रूपा के ब्याह में शान-शौकत में कोई कमी न रखता। मन में उठते अपने ही अपराधबोध को निरस्त करने के लिए तर्क है कि वह लड़की कहाँ बेच रहा है? ऋण समझ कर यह राशि ले रहा है और हाथ में पैसा आने पर चुकता कर देगा। अलबत्ता अपनी दरिद्रता और लाचारी को साफ-साफ समझने और स्वीकारने का निर्भीक भाव अब उसमें है कि ''जब ईश्वर ने उसे इस लायक नहीं बनाया तो कुशकन्या के सिवा और वह क्या कर सकता है? लोग हँसेंगे, लेकिन जो लोग खाली हँसते हैं और कोई मदद नहीं कर सकते, उनकी हँसी की वह क्यों परवाह करे।'' इस संज्ञान के बाद अब वह निर्विरोध अपने निर्णय को क्रियान्वित रूप दे सकता है, लेकिन धनिया की ओर से उठने वाली असहमति की आशंका को फैला-फुला कर हमेशा की तरह उसे गरियाने का अवसर हाथ से जाने नहीं देना चाहता कि धनिया ''राजी न होगी। गधी तो है ही। वही पुरानी लाज ढोएगी।''

होरी-शासित गृह राजनीति में धनिया की हैसियत मुहरे से ज्यादा नहीं है। पुरुष के मन और समाज की संरचना को जानने वाली धनिया अपनी पराधीन स्त्री नियति को खूब पहचानती है। वह जानती है नैतिकता के दोहरे मानदंड पुरुष को अपनी पत्नी को देवी बना कर बाँधने और दूसरे की पत्नी को कुलटा मान कर गुलछर्रे उड़ाने की छूट देते हैं। स्त्री-पुरुष संबंध के केंद्र में हमेशा पुरुष है - कर्ता और भोक्ता; टिप्पणीकार और निर्णायक। अनुभव ने धनिया को सिखाया है कि जब-जब स्त्री ने अपने होने को महसूस कर अन्याय के खिलाफ जरा भी कसमसाहट की है, बड़े-बुजुर्गों ने उसकी 'आँच' पर नसीहत के घड़ों पानी उँड़ेल दिया है - ''नारी का धरम है कि गम खाय।'' (पृ. 41) पति के घर और आश्रय के बिना उसके वजूद को नहीं स्वीकारता समाज - ''जैसे हिंदू स्त्री पति के साथ घर की स्वामिनी है और पति त्याग दे तो कहीं की नहीं रहती।'' (पृ. 155) पति को पाने की लालसा में विधवा स्त्री यदि झुनिया की तरह किसी गोबर का हाथ पकड़ प्रेम में 'सर्वस्व' दान कर दे तो भगोड़ा गोबर दोषी नहीं क्योंकि 'लड़कों से इस तरह की भूल चूक होती रहती है।'' (पृ. 114) दोषी है झुनिया - स्त्री - जिसे पनाह देना ही गाँव-समाज को भ्रष्ट कर देना है। प्रेमचंद यदि सचमुच धनिया को विद्रोहिणी और जाँबाज स्त्री छवि में बाँधना चाहते तो क्या उसे नैतिकता के इन दोहरे मानदंडों के खिलाफ ठगी गई स्त्रियों को लामबंद करने का विवेक न देते? धनिया की अपने साहस के बल पर स्त्री-पुरुष दोनों का नेतृत्व करने की क्षमता का अभिनंदन तो वे पहले ही कर चुके हैं। लेकिन उसके साहस भरे नेतृत्व को वे इतनी पुख्ता जमीन नहीं देना चाहते। चूँकि वे सर्जक हैं और पात्रा उनके हाथ में खेलती कठपुतलियाँ, इसलिए अपने कुशल नियंत्र से बाहर वे उन्हें झाँकने ही नहीं देते। पाठक धनिया के दुर्गा रूप के झाँसे में आकर शुरू में भले ही उससे किसी सर्जनात्मक विद्रोह की अपेक्षा रखने लगे, प्रेमचंद उसे तत्परता से पुरुष व्यवस्था में दीक्षित करते चलते हैं। सही बात पर खरा-कड़वा बोलने के आरोप में कुटती-पिटती पुनिया में अपना ही प्रतिरूप देख वह उसकी रक्षा में आगे नहीं आती, होरी की जुबान बन कर उसकी जुबान खींच लेती है - ''बहुरिया होकर पराए मर्दों से लड़ेगी तो डाँटी न जाएगी।'' (पृ. 29) 'बहुरिया' बनने की सार्थकता क्या अपने स्वत्व को किन्हीं और के हाथों में सौंप देना है? धनिया के पास सवाल उठाने के लिए स्त्री दृष्टि और स्त्री हृदय नहीं है। होता तो रूपा के अनमेल ब्याह के प्रस्ताव पर वह हारी हुई अप्रत्यक्ष लड़ाई न लड़ती; शिवरानी देवी की कहानी 'साहस' की नायिका की तरह बूढ़े वर की खोपड़ी को चप्पलों से गंजा कर देने का हौसला रूपा में भर देती। धनिया की पराजय वस्तुतः प्रेमचंद की यथास्थितिवादी मानसिकता की विजय है।

प्रेमचंद स्त्री मानस को नहीं समझते क्योंकि वे स्त्री प्रश्नों और स्त्री की मानवीय अस्मिता पर विचार ही नहीं करना चाहते। सेवा और त्याग की देवी बना कर वे उसका स्थान और सीमा सुनिश्चित कर देते हैं, बस। यदि वे उन्मुक्त दृष्टि और उदार सोच के साथ स्त्री को तमाम आरोपित विशेषणों से मुक्त कर मनुष्य रूप में देख पाते तो स्त्री पात्रों को सिरजने में फतवेबाजी और लफ्फाजी जैसी अगंभीर हरकतें न करते। उनके अपने घर में शिवरानी देवी उनके ठीक विपरीत ध्रुव पर जाकर बेहद आक्रामक ढंग से स्त्री सुधार की कहानियाँ लिखती हैं जहाँ रोने के ठाठ से मुक्त स्त्री अपनी तयशुदा कैद से बाहर निकल कर नई राहें बना रही है। जाहिर है, अकेले ही, पूरे समाज की आलोचना से बेखौफ। इससे पूर्व 'सीमंतनी उपदेश' की रचयिता अज्ञात हिंदू महिला, पं. रमाबाई, ताराबाई शिंदे, आनंदी गोपाल, सावित्रीबाई फुले स्त्री को गुलाम बनाने वाली पितृसत्तात्मक व्यवस्था का विश्लेषण करने के साथ-साथ स्त्री को मनुष्य समझने वाली समाधानमूलक सरणियों और संवेदना की आवश्यकता का प्रसार कर चुकी हैं। स्त्री शिक्षा के समर्थन के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों की समाप्ति के लिए जोर पकड़ता आंदोलन; वोट के साथ-साथ पैतृक संपत्ति में अधिकार के पक्ष में संगठित संघर्ष; स्त्री की राजनीतिक आंदोलन में भागीदारी के साथ-साथ आर्थिक स्वावलंबन की प्रखरतर माँग - लेखक-पत्राकार-चिंतक प्रेमचंद अपने युग की रग-रग से वाकिफ थे। लेकिन उनके लेखन में उक्त महिलाओं के लेखन सरीखी तड़प, आक्रोश और पुनर्निर्माण की जूझती जिद नहीं। उनकी इकहरी सपाट दृष्टि में यथार्थ का अर्थ है परंपरा और संस्कार, सामाजिक-सांस्कृतिक विडंबनाओं का यथातथ्य प्रतिबिंबन। यथार्थ उर्वर रचनात्मक यथार्थ तभी बनता है जब उसका अतिक्रमण कर उसका पुनर्सृजन किया जाए, अन्यथा वह अपनी सलीब ढोने की मुर्दा कोशिश के अतिरिक्त कुछ नहीं रहता। क्या प्रेमचंद इस बुनियादी तथ्य से अपरिचित रहे होंगे? न्ना! 'साहित्य का उद्देश्य' निबंध में वे साफ लिखते हैं कि ''हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो - जो हममें गति, बेचैनी और संघर्ष पैदा करे।'' (प्रेमचंद रचनावली, भाग 7, पृ. 510) लेकिन मुझे 'गोदान' में रोजमर्रा की आवृत्तिमूलक जड़ जिंदगी के दोहराव के अतिरिक्त गति, बेचैनी और संघर्ष के दर्शन कहीं नहीं होते। गति जड़ आवृत्ति में, संघर्ष हताश यांत्रिकता में और बेचैनी विवश स्वीकार भाव में तब्दील हो यथास्थिति को पुख्ता किए जा रही है। प्रेमचंद अपने असंतोष और विरोध को कहाँ किस रूप में व्यक्त कर रहे हैं? सोना, रूपा और झुनिया - इन तीन स्त्री पात्रों के साथ वे समूचे स्त्री जगत को उत्पीड़ित करने वाली तीन सामाजिक समस्याओं की विभीषिका को पहचानने और समाज व्यवस्था से टकराने का अवसर पाते हैं। साहित्य के जरिए व्यक्ति और समाज के अंतर्संबंध को जानने और मजबूत करने की बात वे 'साहित्य का उद्देश्य' में कह चुके हैं। यानी समाज में व्यक्ति की स्थिति सहज करने के लिए उत्पीड़क समाज व्यवस्था से मुक्ति अनिवार्य है। सोना और रूपा उनके सामने क्रमशः दहेज प्रथा तथा अनमेल विवाह के विरोध तथा झुनिया विधवा विवाह एवं अंतरजातीय विवाह के समर्थन में उठी मानवीय हुंकारों के रूप में उपस्थित हो सकतीं थीं। मथुरा की फटकार खाकर उसके पिता गौरी महतो का हृदय परिवर्तन शायद इसीलिए होता है कि वे निर्मला की त्रासदी से परिचित हैं। लेकिन निर्मला के सर्जक इससे बेखबर एक और मुंशी तोताराम (यहाँ 'गोदान' के संदर्भ में रामसेवक) के साथ होरी की भेंट करवा देते हैं और रूपा के ललाट पर अपने हाथों निर्मला का भविष्य लिख होरी भीतर से कहीं संतुष्ट और सुरक्षित है कि रामसेवक जैसा समर्थ और बली (प्रपंची) आदमी उसका हाथ पकड़ ले तो बेड़ा पार है। नहीं, प्रेमचंद व्यक्ति और समाज, समस्या और समाज-व्यवस्था को साथ-साथ रख कर नहीं देखते, वे अपने मंतव्य को सिद्ध करने के लिए घटनाओं, पात्रों और तर्क की एक सीधी पगडंडी बना कर चलते हैं जिसके अगल-बगल कुछ नहीं। चूँकि 'गोदान' का अभिप्रेत (फोकस) 'निर्मला' से भिन्न है, इसलिए दहेज और अनमेल विवाह की विभीषिका की शिकार रूपा की परिणति निर्मला की त्रासदी को अँगूठा दिखा कर अपने लिए सुख रचती है। पिता के समवयस पति की बालिका वधू रूपा की गोद में सुख-समृद्धि की बरसात लेखक के दो मंतव्य सिद्ध करती है। एक, पिता के रूप में होरी की भूमिका पर सफलता की मुहर। (जाहिर है यह अनमेल विवाह के कलुष को धो डालने की व्यग्र कोशिश है।) दूसरे, रूपा को आत्मरतिग्रस्तता की उन्मादी छवि में बाँध कर स्त्री प्रश्नों की ओर से पाठक का ध्यान हटाना। लेखक ने रूपा के मनोभावों का वर्णन यों किया है - ''रूपा के लिए वह (रामसेवक) पति था, उसके जवान, अधेड़ या बूढ़े होने से उसकी नारी भावना में कोई अंतर न आ सकता था। उसकी यह भावना पति के रंग-रूप या उम्र पर आश्रित न थी। उसकी बुनियाद इससे बहुत गहरी थी। ...उसका यौवन अपने ही में मस्त था। वह अपने ही लिए बनाव-सिंगार करती थी और आप ही खुश होती थी। रामसेवक के लिए उसका दूसरा ही रूप था। तब वह गृहिणी बन जाती थी, घर के काम-काज में लगी हुई। अपनी जवानी दिखा कर उसे लज्जा या चिंता में न डालना चाहती थी। किसी तरह की अपूर्णता का भाव उसमें न आता था। अनाज से भरे बखार और गाँव से सिवान तक फैले हुए खेत और द्वार पर ढोरों की कतारें और किसी प्रकार की अपूर्णता को उसके अंदर आने ही न देती थी।'' (पृ. 330) रूपा के लिए दी गई यह स्टेटमेंट स्त्री को पतिव्रता की अपरिहार्य छवि में कैद करने की वही सजग कोशिश है जो बार-बार स्त्री को देवी और कुलटा के दो पालों में विभाजित करके ही दम लेती है। तब सवाल उठता है कि व्यक्ति (स्त्री) के बरक्स समाज को चीन्हने और समाज के भीतर शून्य होकर रहती स्त्री को मूल्य प्रदान करने के लिए उन्होंने क्या किया? गोबर के मन में झुनिया को 'रखेली' बनाने का विचार है - शहर से लौट कर वह उसे ब्याहता की तरह अपनाता है, लेकिन बाकायदा ब्याह कर ब्याहता का गौरव नहीं देता जिस कारण दबी जुबान से अभी भी लोग झुनिया को कुलटा कहते हैं। क्या इसलिए कि एक साथ विधवा विवाह और अंतरजातीय विवाह का समर्थन उन्हें अपनी ताकत और स्वीकृति से बाहर की बात लगा? या जात-कुजात की स्त्री को घर में डाल कर घर की चौखट के भीतर शालीन कुलीन कुलवधू लाने की परंपरा को यथावत रखने के लिए?

मैं यहाँ घूँघट के कठोर शासन में रह कर गुल खिलाने वाली झिंगुरीसिंह की पत्नियों या नोखेराम के साथ प्रेम के हरजाईपन को जीती दुहाजू भोला की युवा पत्नी नोहरी का जिक्र नहीं करना चाहती। प्रेमचंद की दृष्टि में ये कुलटाएँ दंडनीय हैं। धनिया को अपनी प्रवक्ता बना कर वे भोला को नोहरी जैसी पत्नी का गँड़ासे से सिर कलम करने का सुझाव भी देते हैं। परिणाम क्या होगा? फाँसी! लेकिन ''फाँसी इस छीछालेदर से अच्छी है।'' (पृ. 272) धनिया का यह अभिमत पितृसत्तात्मक व्यवस्था के क्रूरतम रूप का उद्घाटक है जहाँ बृहद् परिप्रेक्ष्य में नैतिकता के अर्थ को समझे बिना नैतिकता के कर्मकांड को सतीत्व बना कर स्त्री पर आरोपित कर दिया जाता है और फिर उसे ही कुल की लाज (ऑनर) कह कर उसकी रक्षा में हर अनैतिक-अकरणीय कदम को नैतिक और महिमंडित सिद्ध कर दिया जाता है। जाहिर है मैं यहाँ बर्बर कबीलाई मानसिकता की ओर इंगित करती ऑनर किलिंग जैसी आपराधिक घटनाओं की बात करना चाहूँगी। दुराग्रहों और वर्जनाओं को सूक्ति, आप्तवचन या धर्मोपदेश बना कर कितना ही महिमामंडित क्यों न कर लिया जाए, न्याय और स्वाधीनता पाने की प्रबल मानवीय आकांक्षा अंततः उनके औचित्य को प्रश्नचिह्नित करेगी ही। ऐसे में जरूरी है मौजूदा समाज व्यवस्था का पुनरीक्षण; न कि परंपरा की दुहाई देकर उन्हीं दुराग्रहों और वर्जनाओं को मजबूती से पकड़ने का हठ। हठ सृजन की संभावनाओं के चुक जाने और प्रतिपक्षी को अपने समकक्ष मनुष्य न समझने के दंभ से पैदा होता है। प्रतिपक्षी (कमजोर) के संदर्भ में सबल पक्ष द्वारा आरोपित वर्जनाओं का पालन जीने की मजबूरी भी बन सकता है (जिनके प्रति देर-सबेर असंतोष झलकना अनिवार्य है) और देदीप्यमान अभिमान भी। अपने अस्तित्व पर इठलाती धनिया में यह देदीप्यमान अभिमान बन कर फूटा है। ''औरत घी का घड़ा लुढ़का दे, घर में आग लगा दे, मर्द सह लेगा, लेकिन उसका कुराह चलना कोई मर्द न सहेगा।'' (पृ. 272) अभिमंत्रित धनिया ने अपनी जीवन दिशा तय कर ली है और 'सेवा और त्याग की देवी' के रूप में आकाओं से अपने वजूद की स्वीकृति भी पा ली है। नैतिकता के इसी तेज से दिपदिपा रही है सिलिया, झुनिया और सोना। ये तीनों स्त्रियाँ तीन अलग-अलग इकाइयाँ न रह कर धनिया का विस्तार बन जाती हैं और धनिया पितृसत्तात्मक व्यवस्था की रक्षक स्त्री-चौकीदार का प्रतीक तो है ही। इसलिए नोहरी का सिर कलम करने का सुझाव देते समय अपने सतीत्व के बड़बोले कंट्रास्ट से जहाँ वह अपने चारों ओर सुरक्षा की बाड़ मजबूत कर लेना चाहती है, वहीं पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था की मनोभिलाषा को मूर्त रूप देती है। झिंगुरीसिंह झुनिया को लेकर पहले ही ऐसा मंतव्य व्यक्त कर चुके हैं और झुनिया के पिता-भाई कुलटा झुनिया को मजा चखाने के लिए कसमसा रहे हैं। गोबर हाथ से छूटे शिकार की तरह शहर में कहीं अंतर्धान हो गया है और झुनिया को होरी का सामाजिक संरक्षण मिल गया है। औरत पर गिरोह बना कर समाज तभी वार कर पाता है, जब वह अकेली हो, निहत्थी तो होती ही है। इसलिए भोला द्वारा होरी के बैल खोल कर ले जाना एक गहरे प्रतीकार्थ (रोजी-रोटी का जरिया काटना) को संकेतित कर होरी को भौतिक धरातल पर चित कर देना चाहता है। जब ऐसा नहीं होता तो खुलेआम सौदेबाजी होती है - ''तुम अपने दो सौ को रोते हो, यहाँ लाख रुपए की आबरू बिगड़ गई। तुम्हारी कुशल इसी में है कि जैसे झुनिया को घर में रखा था, वैसे ही घर से उसे निकाल दो। फिर न हम बैल माँगेगे, न गाय का दाम माँगेंगे। उसने हमारी नाक कटवाई है तो मैं भी उसे ठोकरें खाते देखना चाहता हूँ। वह यहाँ रानी बनी बैठी रहे और हम मुँह पर कालिख लगाए उसके नाम को रोते रहें, यह नहीं देख सकता। वह मेरी बेटी है। मैंने उसे गोद में खिलाया है, और भगवान साखी है मैंने उसे कभी बेटों से कम नहीं समझा, लेकिन आज उसे भीख माँगते और घर पर दाने चुनते देख कर मेरी छाती सीतल हो जाएगी।'' (पृ. 140) नैतिक दुराग्रहों की यह दुर्दांत परिणति सामाजिक मान्यताओं और व्यवस्था को पलटने की जरूरत पर बल देती है। प्रेमचंद के यहाँ आज की तरह प्रेमी युगल की हत्या का आयोजन नहीं है, लेकिन हत्या की जमीन तैयार करती और हत्या के विकल्प सोच कर आनंद पाती मानसिकता अवश्य है। विडंबना है कि झुनिया के संदर्भ में जहाँ धनिया इस बर्बर अमानवीय कृत्य की विरोधिनी है, वहीं नोहरी के संदर्भ में उसकी पैरोकार। यह व्यक्ति बदलने से वैकल्पिक दंड विधान बदलने का वैयक्तिक मामला है जहाँ सामंती सोच के बदलने या मानवीय अधिकारों के लिए लड़ने का जज्बा नहीं। मैं फिर इस सवाल के साथ मुखातिब हूँ कि उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र कहने वाले प्रेमचंद ने 'निप द ईवल इन द बड' (बुराई के अंकुर जमने से पहले ही समूल नष्ट कर डालो) की तर्ज पर इस बर्बरता के खिलाफ रचनात्मक आंदोलन क्यों नहीं छेड़ा? प्रेमचंद क्या नहीं जानते कि बुराई पहले एक अमूर्त विचार की तरह व्यक्ति विशेष के मानस में आकार ग्रहण करती है; फिर अंतर्मन को मथता क्रमिक और अनवरत चिंतन उस अमूर्त विचार को सच्चाई में बदल डालता है जिसे समान अभिरुचियों वाले समाज/समूह में शेयर करना सरल हो जाता है। तब सामूहिक/सामाजिक अनुमोदन उस बुराई को एक अवधारणा/वर्जना/मूल्य में बदल कर क्रियान्वयन के रास्ते ढूँढ़ने लगता है। साहित्यकार से इतनी अपेक्षा तो समाज करता है कि सजग जिम्मेदार नागरिक और दृष्टिसंपन्न स्रष्टा की तरह वह औसत पाठक से अधिक संवेदनशीलता और क्रियाशीलता के साथ अँधेरे में नकारात्मकताओं का जाल बुनती ताकतों को खींच कर नष्ट कर डाले। उनकी षड्यंत्रकारी दुरभिसंधियों का समर्थन करती मानसिकता को परंपरा और संस्कार के नाम पर प्रश्नांकित किए बिना चित्रित न करे। प्रेमचंद अपने इस महत मानवीय दायित्व से किनारा कर जाते हैं। संभवतया अनजाने ही। गाय को विष देकर भाग खड़े हुए हीरा के पक्ष में आकर होरी भ्रातृ प्रेम की मिसाल कायम करना चाहता है, लेकिन अपनी उस उग्र उन्मत्त मानसिकता में प्रतिरोधी ताकत धनिया को धकियाते हुए भूल जाता है कि वह पत्नी (स्त्री) पर पति (पुरुष) के अधिकार की बात नहीं कर रहा, शोषित और शोषक, हीन और श्रेष्ठ की दो कोटियों में स्त्री-पुरुष को बाँट कर पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मंसूबों का दृढ़ कर रहा है। होरी अभिमानपूर्वक ऐलान कर रहा है कि ''उसके देखते यह तलाशी न होने पाएगी। और धनिया से अब उसका कोई संबंध नहीं। जहाँ चाहे जाए। जब वह उसकी इज्जत बिगाड़ने पर आ गई है तो उसके घर में कैसे रह सकती है? जब गली-गली ठोकर खाएगी, तब पता चलेगा।'' (पृ. 102) 'घर' का स्वामी होने का दंभ भरा भाव घर में आश्रय लेने वाली हर स्त्री को अपना खिलौना और गुलाम समझने का बोध अनायास पा जाता है - होरी के मुँह से इस 'सामान्य पुरुष कथन' को कहलवाते समय क्या प्रेमचंद ने स्त्री/धनिया की ओर से इसका निहित आशय ग्रहण करने का जरा भी प्रयास न किया होगा? शायद नहीं क्योंकि हीरा को होरी का प्रतिरूप और विस्तार बना कर वे पुनिया को भी उसी तरह पिटवाते रहते हैं। बल्कि हीरा तो सवर्ण नागर समाज की प्रथा को कृषक समुदाय तक ले आना चाहता है कि ''उसका बस होता तो वह पुनिया को पर्दे में रखता। पुनिया किसी बड़े से मुँह खोल कर बातें करे, यह उसे असह्य था।'' (पृ. 28) यह वह मानसिकता है जो स्त्री को ओट में रखते-रखते उसके पूरे वजूद को क्रमशः लुप्त कर देना चाहती है - उससे हास-परिहास और बनाव-श्रृंगार की नैसर्गिक चाहतों को बरबस छीनते हुए। इस्लामिक देशों में धर्म के नाम पर स्त्री पर इस प्रकार की फतवेबाजी आज चिंता का विषय बनी हुई है। 'गोदान' में वे एकाधिक स्थलों पर बनाव-श्रृंगार के प्रति स्त्री की अभिरुचि को बेहद गर्हित दृष्टि से देखते हैं। स्त्री को मानवीय आकांक्षाओं और प्रकृति से काट कर पुरुष मंतव्यों, अग्निपरीक्षाओं और लक्ष्मणरेखाओं में ढाल कर मनवांछित आकार देने की यह आदिम पुरुष मनोवृत्ति स्त्री के विषय में भ्रामक धारणाओं का जाल बुनती है कि रूप का जाल फैला कर स्त्री पुरुष का आखेट करती है; कि ''मन के संस्कार और भोग लालसा ही औरतों को वेश्या बनाते हैं। (पृ. 302) कहना न होगा कि ठीक यहीं इस स्थल पर यह आदिम पुरुष मनोवृत्ति अपनी कामुकता और लंपटता की ओर आँख उठा कर देखना भी नहीं चाहती बल्कि वृद्धावस्था में युवा पत्नी के लिए ललचते पुरुष में 'स्निग्धता' के दर्शन करती है और वृद्ध विवाह, बहुविवाह प्रथा को परंपरा और कुलीनता के नाम पर चलाए/जिलाए रखती है। उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद स्त्री को खिलौना मानने वाले पुरुषों की लंपट वृत्ति की खबर नहीं लेते, बल्कि 'खिलौने' से खेलने की उनकी बालसुलभ चपलता पर लट्टू हैं। खन्ना मालती से खेलने में 'पौरुष 'का उद्घाटन कर रहा है तो मेहता और मिर्जा खुर्शेद के लिए स्त्री मनोरंजन की वस्तु है। ग्रामीण परिवेश में यह पुरुष रखैल रख रहा है तो शहर में मुक्त भोग की वकालत कर रहा है। संभवतया यहाँ इस तथ्य का उल्लेख बिल्कुल जरूरी नहीं कि शिवरानी देवी से मधुर संबंध होते हुए भी प्रेमचंद ने एक स्त्री 'रखी' हुई थी और मृत्युशैया पर क्षमायाचना करते हुए यह सूचना उन्होंने शिवरानी देवी को दी, लेकिन रचयिता की दृष्टि से यह तथ्य प्रेमचंद की सीमा समझने का एक पुष्ट आधार अवश्य देता है कि क्यों वे चाहते हुए भी स्त्री मानस और स्त्री प्रश्नों पर स्त्री तड़प और स्त्री दृष्टि के साथ विचार नहीं कर सके। यहाँ मेहता की एक 'आंतरिक' इच्छा को उद्धृत करना बेहद जरूरी जान पड़ता है कि ''अगर कोई पुरुष मेरे और मेरी स्त्री के बीच में आने का साहस करे तो मैं उसे गोली मार दूँगा, और उसे न मार सकूँगा तो अपनी छाती में मार लूँगा। इसी तरह अगर मैं किसी स्त्री को अपने और अपनी स्त्री के बीच में लाना चाहूँ तो मेरी पत्नी को भी अधिकार है कि वह जो चाहे, करे। इस विषय में मैं कोई समझौता नहीं कर सकता। यह अवैज्ञानिक मनोवृत्ति है जो हमने अपने बनैले पूर्वजों से पाई है और आजकल कुछ लोग इसे असभ्य और असामाजिक व्यवहार कहेंगे, लेकिन मैं अभी तक उस मनोवृत्ति पर विजय नहीं पा सका और न पाना चाहता हूँ। इस विषय में कानून की परवाह नहीं करता। मेरे घर में मेरा कानून है।'' (पृ. 153) सवाल उठता है कि 'मेरा घर', 'मेरा कानून' का यह अराजक सिद्धांत क्या किसी भी रचयिता के प्रतिनिधि पात्र/प्रवक्ता का सत्य होना चाहिए? प्रेमचंद सरल और ईमानदार हैं कि वे अपने मनोभावों को ढाँपने का छल नहीं जानते, लेकिन क्या यह सच नहीं कि 'मेरा घर', 'मेरा कानून' का यह अराजक सिद्धांत ही समान अभिरुचियों वाले समाज का सामाजिक अनुमोदन पाकर आज ऑनर किलिंग का रूप ले रहा है? क्या यह अनैतिक नहीं कि लिंग के आधार पर विभाजन, विषमता और उत्पीड़न का पोषण करती सामंती मानसिकता और पितृसत्तात्मक व्यवस्था की रक्षा में एक गहरी अथगर्भित चुप्पी साध ली जाए? स्त्री को थोड़ी सी करुणा, थोड़ी सी ढील, थोड़ा सा ममत्व और थोड़े से अधिकार देते हुए उसे 'स्वाधीन' होने का भ्रम देकर 'पालतू' (कैदी) बना लिया जाए?

हो सकता है इस विश्लेषण में बहुतों को मेरे 'कुपढ़' होने की बू आए। मेरा यह कथन उन्हें आहत कर सकता है कि नैतिकता के दोहरे मानदंडों के प्रति मेहता सहित ग्रामीण समाज की मूक-मुखर सहमति दिखा कर प्रेमचंद अनायास इस अमानवीय व्यवस्था का समर्थन करते दीखते हैं और यही मूक/विवश/विकल्पहीन समर्थन समय के साथ खाद-पानी पाकर ऑनर किलिंग का रूप ले बैठता है। हो सकता है वे मेरी दृष्टि को निर्देशित करने की जुगत में मुझे यह देखने का 'विवेक' भी दें कि प्रेमचंद ही ऑनर किलिंग जैसी समस्या की जडों की ओर देखने वाले दूरदृष्टि एवं अंतर्दृष्टि संपन्न पहले कथाकार थे। संभव है! मैं कुछ भी स्वीकारने से पूर्व बस एक ही सवाल करना चाहती हूँ कि प्रेमचंद ने स्वयं या किसी पात्र की आड़ में नैतिकता के दोहरे मानदंडों का प्रबल पुरजोर विरोध क्यों नहीं किया? स्त्री को हाँक कर पशुओं के बाड़े में बंद करता यह चाबुक समर्थों के हाथ से छीना न भी जा सके, छीनने की कोशिश तो की ही जानी चाहिए थी। प्रेमचंद की समस्या है कि वे स्याह-सफेद में अपने मंतव्यों को व्यक्त करते हैं - खूब मुखर और वाचाल होकर; दो और दो चार समझाने वाली अध्यापकीय मुद्रा में। वे पात्रों, परिस्थितियों और परिवेश को खुद अपना दर्द बयान नहीं करने देते, दर्द को खुद आँसू बहाने नहीं देते, आँसुओं के खारेपन को नुकीला सवाल बना कर पाठकों के अंतस्तल को बींधने नहीं देते, जैसे रेणु 'मैला आँचल' में करते हैं। महंत की छत्रछाया में 'काँपती' 'लुटती' अरक्षणीया लछमी की पीड़ा में विवशता के घुटे आँसू नहीं, संघर्ष की प्रचंड ज्वाला है। यदि प्रेमचंद चुप्पियों को बोलने देते तो शायद स्त्री मानस को देखने का अवसर भी पा जाते। मौन हाहाकार के बीच धधकता ज्वालामुखी - यही तो है स्त्री मानस!


''मैं ऐसी बीवी नहीं चाहता जिससे मैं आइंस्टीन के सिद्धांत पर बहस कर सकूँ, या जो मेरी रचनाओं के प्रूफ देखा करे'' यानी '' नारी केवल माता है और इसके उपरांत वह जो कुछ है, वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र''


प्रेमचंद के पुरुष पात्र सामंती मनोवृत्तियों से सिरजे औसत भारतीय पुरुष हैं। स्त्री को समझने की संवेदना उनमें नहीं है। अलबत्ता मालती अपने सर्जक और औसत भारतीय पुरुष दोनों को खूब समझती है। मालती धनिया का विलोम नहीं, लेकिन उससे भिन्न तो है ही। भिन्न इसलिए कि अपनी मुखर वैचारिकता, खुली दृष्टि, ऊँची शिक्षा, आर्थिक स्वालंबन के कारण उसने अपने व्यक्तित्व को ही नहीं गढ़ा, रुचियों-प्राथमिकताओं, आकांक्षाओं-दायित्वों और सपनों की एक लंबी फेहरिस्त भी तैयार की है। धनिया की तरह अथक श्रम करने के बावजूद वह न अपने श्रम को अलक्षित होने देती है, न उस पर किसी के मालिकाना अधिकार को सहती है। स्वतंत्र निर्णय लेने का विवेक, गत्यात्मकता और सोशल एक्सपोजर उसे नैतिक वर्जनाओं और सांस्कृतिक-सामाजिक कुरीतियों के पंजे से निकलना सिखाते हैं। वह कर्ता है, अपनी शर्तों पर जीवन जीने की अभ्यस्त, शायद इसीलिए सभी की आँख का काँटा। पं. ओंकारनाथ की तरह सभी उसी को पानी पी-पी कर कोस रहे हैं कि 'बहत्तर घाटों का पानी पी कर भी मिस बनी घूमती है'; कि 'धन और भोग विलास को जीवन का लक्ष्य' बना लेने वाली यह तितली क्या खाकर लिखेगी। लिखने के लिए चाहिए दर्द, विचार, अनुराग और लगन। प्रेमचंद की तरह उनके पात्रों की सबसे बड़ी दुर्बलता है अधीरता और बिना सोचे समझे फतवे देने की आदत। सवाल है कि मालती को 'कोसने' ( लेकिन मन ही मन हर 'मालती' को भोगने की चाहना रखने) वाले कितने पुरुषों ने उसे नजदीक से देखा और समझा है? वह इसलिए 'बुरी' है कि जंगल में मिली वनकन्या की भाँति गूँगी गुड़िया बन कर उनके इशारों पर नहीं चलती बल्कि ऐसी व्यक्तित्वहीन, मूढ़ स्त्री की अभ्यर्थना में तल्लीन पुरुष की स्वार्थी दृष्टि को भी उधेड़ कर रख देती है कि ''ऐसी ही लौंडियाँ मर्दों को पसंद आती हैं जिनमें और कोई गुण हो या न हो, उनकी टहल दौड़-दौड़ कर प्रसन्न मन से करें और अपना भाग्य सराहें कि इस पुरुष ने मुझसे यह काम करने को कहा। वह देवियाँ हैं, शक्तियाँ हैं, विभूतियाँ हैं। मैं समझती थी, वह पुरुषत्व तुममें कम से कम नहीं है, लेकिन अंदर से तुम भी यही बर्बर हो।'' (पृ. 80)

मैं यहाँ फिर शिवरानी देवी की पुस्तक 'प्रेमचंद : घर में' से एक उद्धरण देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ। प्रेमचंद किसी भी औसत गृहस्थ भारतीय की तरह शराब पीकर देर रात लड़खड़ाते घर लौटे हैं। शिवरानी देवी अवाक्! लेकिन हत्बुद्धि नहीं! वे उन्हें उनकी सीमाओं का स्मरण करा देना चाहती हैं, सख्ती से - ''आइंदा आप अगर फिर पीकर आए तो मैं जागती हुई भी दरवाजा न खोलूंगी।'' चार-पाँच दिन बाद फिर वही। लेकिन इस बार रात के डेढ़ बजे नहीं, आठ बजे लौटे। नशा इतना कि दो बार कै हुई। शिवरानी देवी सहायता के लिए उठी ही नहीं। उठी उनकी भावज। सुबह प्रेमचंद ने शिकायती स्वर में किस्सा बयान कर जवाब तलब किया - ''रात को मेरी यह हालत थी। तुम कहाँ थीं?'' शिवरानी देवी ने क्रोध और आवेश दोनों पर संयम रख संयत स्वर में बस इतना ही कहा - ''मैं इन आदतों के फेर में पड़ने वाली नहीं। मैं उसी दिन आपसे कह चुकी हूँ।'' (शिवरानी देवी, 'प्रेमचंद : घर में', पृ. 76) तो क्या धीरज और जीवट वाली इस स्त्री से भयभीत हैं प्रेमचंद? शायद!! इसीलिए तो मेहता विवेकशील स्वतंत्र निर्णयसंपन्न स्त्री का तिरस्कार करने में जमीन-आसमान एक कर देता है कि ''मैं ऐसी बीवी नहीं चाहता जिससे मैं आइंस्टीन के सिद्धांत पर बहस कर सकूँ, या जो मेरी रचनाओं के प्रूफ देखा करे। मैं ऐसी औरत चाहता हूँ जो मेरे जीवन को पवित्र और उज्ज्वल बना दे, अपने प्रेम और त्याग से।'' (पृ. 135) ; कि ''नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं तो वह कुलटा हो जाती है। पुरुष आकर्षित होता है स्त्री की ओर जो सर्वांश में स्त्री हो''; कि ''मेरे जेहन में औरत वफा और त्याग की मूर्ति है जो अपनी बेजबानी से, अपनी कुर्बानी से, अपने को बिल्कुल मिटा कर पति की आत्मा का एक अंश बन जाती है''; कि ''हमारी उन्नत विचारों वाली देवियाँ उस दया और श्रद्धा और त्याग के जीवन से असंतुष्ट होकर संग्राम और कलह और हिंसा के जीवन की ओर दौड़ी रही हैं और आप समझ रही हैं कि यही सुख का स्वर्ग है तो मैं उन्हें बधाई नहीं दे सकता''; कि ''स्त्री को पुरुष के रूप में, पुरुष के कर्म में रत देख कर मुझे उसी तरह वेदना होती है जैसे पुरुष को स्त्री के रूप में, स्त्री के कर्म करते देख कर। ...ऐसी स्त्री पुरुष के प्रेम और श्रद्धा की पात्र नहीं बन सकती।'' (पृ. 146) इतनी-इतनी दलीलें देकर पसीने-पसीने होते मेहता से मालती का सिर्फ एक सवाल है - ''सारा उपदेश गरीब नारियों के ही सिर पर क्यों थोपा जाता है? उन्हीं के सिर क्यों आदर्श और मर्यादा और त्याग सब कुछ पालन करने का भार पटका जाता है?'' (पृ. 151) जाहिर है इस सवाल के जवाब में मेहता और प्रेमचंद दोनों के पास भारी चुप्पी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। लेकिन यह चुप्पी लाज ढाँपती नहीं, राज उघाड़ती है।

इसलिए ताज्जुब नहीं होता कि मेहता और प्रेमचंद दोनों शुरू से ही मालती के पीछे लट्ठ लिए घूम रहे हैं। मेहता को प्रारंभिक बातचीत के दौरान अहसास होता है कि 'इस रमणी में विचार की शक्ति भी है, केवल तितली नहीं (और विचारशील स्त्री से पुरुष हमेशा भयभीत रहता है। इसलिए उसे दबाने-मारने की सौ-सौ तदबीरें) और प्रेमचंद जानते हैं कि लकवाग्रस्त निकम्मे व्यसनी पिता के परिवार का खर्चा वह डॉक्टरी की प्रैक्टिस करके ही चलाती है। विजिट करेगी तो फीस लेगी ही। घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या। एक करेला दूसरा नीम चढ़ा। विचारशील भी और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी। रोटी का भय दिखा कर उसे लतियाया कैसे जाए? अपने भीतर की इस कुंठा को प्रत्यक्ष करके कि ''नए युग की देवियों की यही सिफत है। वह मर्द का आश्रय नहीं चाहतीं, उससे कंधा मिला कर चलना चाहती हैं।'' (पृ. 71) या फिर उस पर तोहमत लगा कर कि वह प्रेम नहीं कर सकती और कि ''अपनी जीवनसंगिनी में जो बात देखना चाहता हूँ, वह उसमें नहीं है और न शायद हो सकती है।'' (पृ. 134) दूसरा आरोप घोर वैयक्तिक दुराग्रह है, मालती भला इस पर क्या टिप्पणी करे। लेकिन पहले आरोप का मुँहतोड़ जवाब उसके पास है - आरोप की उसी तमतमाती मुद्रा में कि - ''झूठे हो तुम! बिल्कुल झूठे। मुझे तुम्हारा यह दावा निस्सार महसूस होता है कि तुम नारी हृदय तक पहुँच जाते हो।'' (पृ. 74) औंधे मुँह धूल चाटता मेहता अब आखिरी तुरुप की चाल निकालता है - ''नारी केवल माता है और इसके उपरांत वह जो कुछ है, वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र।'' यह मालती की कमजोर नस है। मातृत्व तक पहुँचने के लिए पत्नीत्व की अग्निपरीक्षा से उसे गुजरना होगा और पत्नीत्व (मेहता की अर्धांगिनी) का 'दुर्लभ आसन' गोविंदी के चरणों में बैठ कर नारी धर्म सीखने के बाद ही मिलना संभव होगा। मेहता दो विपरीत नक्षत्रों को आमने-सामने की टक्कर के लिए पाले में ले आया है। शक्ति असंतुलन इतना कि गोविंदी के पक्ष में वह स्वयं ही नहीं खड़ा, लेखक भी संग-साथ हैं। मेहता और प्रेमचंद सुर में सुर मिला कर गोविंदी की स्तुति में जुटे हैं, जैसे मालती को निरस्त करने के लिए वनकन्या की प्रशंसा में कसीदे काढ़ रहे थे। अकेली मालती क्यों, उस सरीखी पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर, आधुनिक चेतस महिलाओं पर भी दोनों की वक्र दृष्टि केंद्रित है। उन्हें भय है कि ये स्त्रियाँ भोली भाली बेजबान भारतीय स्त्रियों को बरगला कर पुरुष देवता के खिलाफ खड़ा कर देंगी। न, भय नहीं, विश्वास। इसी विश्वास की दारुण परिणति के लिए वे रायबहादुर की बेजबान अट्ठारह वर्षीया बेटी मीनाक्षी के कायांतरण की 'खूँखार' कहानी कहते हैं जो तीस वर्षीय दुहाजू व्यसनी कुँवर दिग्विजयसिंह से ब्याही जाने के बाद नारकीय जीवन जी रही है - साधारण हिंदू बालिकाओं की तरह। लेकिन स्थिति में मोड़ तब आया जब ''पत्रों में स्त्रियों के अधिकारों की चर्चा पढ़-पढ़ कर उसकी आँखें खुलने लगी।'' मीनाक्षी की खुली आँखों ने जो देखा, उसे प्रेमचंद साफ-साफ 'पुरुषों के विरुद्ध षड्यंत्र' का नाम देते हैं। उन्हीं के शब्दों में - मीनाक्षी ''जनाना क्लब में आने-जाने लगी। वहाँ कितनी ही शिक्षित ऊँचे कुल की महिलाएँ आती थी। उनमें वोट और अधिकार और स्वाधीनता और नारी जागृति की खूब चर्चा होती थी, जैसे पुरुषों के विरुद्ध कोई षड्यंत्र रचा जा रहा हो। अधिकतर वही देवियाँ थीं, जिनकी अपने पुरुषों से न पटती थी, जो नई शिक्षा पाने के कारण पुरानी मर्यादाओं को तोड़ डालना चाहती थीं। कई युवतियाँ भी थीं जो डिग्रियाँ ले चुकी थीं और विवाहित जीवन को आत्मसम्मान के लिए घातक समझ कर नौकरियों की तलाश में थीं। ...उन्हीं की सलाह से मीनाक्षी ने पति पर गुजारे का दावा किया... वह एक अलग कोठी में रहती थी और समष्टिवादी आंदोलन में प्रमुख भाग लेती थी। पर वह जलन शांत न होती थी। एक दिन वह क्रोध में आकर हंटर लिए दिग्विजयसिंह के बंगले पर पहुँची... उसने उन पर सड़ासड़ हंटर बरसाने शुरू किए और इतना मारा कि कुँवर साहब बेदम हो गए।'' (पृ. 299) मीनाक्षी रायबहादुर की पुत्री है, प्रेमचंद की पात्र नहीं। इसलिए उपन्यास के महज दो पृष्ठों में वे उसे हंटरवाली स्त्री बना कर स्त्री मुक्ति आंदोलन के नकारात्मक प्रभावों का आकलन करते हैं। जब प्रमुख पात्र मालती के मन को पढ़ने का अवकाश उनके पास नहीं तो मीनाक्षी की पीड़ा, प्रतिशोध, अपमान और विवशता-विकलता के बीच डूबती-उतराती जिंदगी को जीने की नैसर्गिक अभिलाषा का पाठ वे कैसे करते? अलबत्ता मीनाक्षी के जरिए वे शिवरानी देवी की कहानी 'समझौता' में पति-पत्नी के बीच होने वाली बहस का जवाब देने की कोशिश करते हैं। यूँ मेहता के सुदीर्घ भाषण में भी उसी कहानी की नायिका को परास्त कर देने की बौद्धिक कवायदें हैं। 'समझौता' कहानी का हर पाठ सदा एक ही मानस-बिंब रचता रहा है कि प्रेमचंद और शिवरानी देवी अपनी-अपनी मान्यताओं और आग्रहों के साथ स्वतंत्रा भारत में स्त्री की स्थिति, स्त्री-पुरुष संबंधों की संरचना और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के स्वरूप पर वाद-विवाद कर रहे हैं - यथास्थितिवादी दृष्टिकोण के बरक्स प्रगतिशील दृष्टिकोण; 'अन्या' रूप में स्त्री के अस्तित्व की स्वीकृति के बरक्स स्त्री की मानवीय गरिमा और अधिकारों की कानूनी और नैतिक स्वीकृति। कुछ संवाद अवलोकनीय हैं -


ललिता : ''स्त्री और पुरुष दोनों के हक हर एक बात में बराबर हों। रत्ती भर का भी फर्क न हो। पिता की संपत्ति, पति की संपत्ति, या ससुर की संपत्ति पर स्त्री का उतना ही हक हो जितना पुरुष का होता है। सरकारी नौकरियाँ दोनों को बराबर मिलें, कौंसिल में स्थान भी बराबर हों, राय देने का अधिकार भी बराबर हो। संतान पर भी स्त्री का अधिकार पुरुष के बराबर हो और अपने धर्म और देह पर भी उसका अपना अधिकार हो - उसी तरह जैसे पुरुष का अधिकार अपनी देह और धर्म पर होता है। स्त्रियाँ यह कभी स्वीकार न करेंगी कि पुरुष का जो धर्म हो, वही धर्म उन्हें भी मानना पड़े, या पिता-माता उसे जिसको चाहे दान दे दें।''

मोहन : ''इसका अर्थ यह हुआ कि तुम लोगों पर भी पच्छिम का जादू चल गया और तुम भी हकों के लिए लड़ने पर तैयार हो गईं। स्त्री का महत्व और बड़प्पन इसी बात में है कि वह माता है और माता का गुण है त्याग और उत्सर्ग। अगर स्त्री उस पद को त्याग कर पुरुषों के बराबर आना चाहती है तो शौक से आवे, लेकिन उसे बहुत जल्द मालूम हो जाएगा कि इन हकों को लेकर उसने महँगा सौदा किया है। ...जब उस तरह के अधिकार की बात आवेगी तो पुरुष भी कहेगा - तुम भी हमारे बराबर काम करो।''

ललिता : ''स्त्रियाँ जितने त्याग से काम कर सकती हैं, पुरुष नहीं कर सकते; लेकिन तब बच्चे आप ही पैदा कीजिएगा और घर के सब काम-काज भी आपको करने पड़ेंगे।'' ('समझौता', पृ. 152)


यह स्त्री स्वतंत्र भारत में वेश्यावृत्ति का उन्मूलन करने को कटिबद्ध है - ''जरा स्वराज्य मिलने दो, फिर देखूँगी कैसे चकले आबाद होते हैं?'' और बहुविवाह प्रथा को कानूनन निषिद्ध करवाने के लिए भी - ''चालीस वर्ष के बाद कोई बूढ़ा विवाह न कर सकेगा। अगर अपनी स्त्री के रहते कोई पुरुष किसी दूसरी रमणी से कुत्सित प्रेम करेगा, तो दोनों को सात-सात साल की कड़ी सजा दी जाएगी। जो पुरुष अपनी स्त्री को छोड़ देगा, उसे अपनी आमदनी की तीन-चौथाई स्त्री को देना पड़ेगा। यदि स्त्री पुरुष को छोड़े तो उसे उस पर कोई हक न रहेगा; अपना कमाय खाय। न पुरुष को दूसरा ब्याह करने की स्वाधीनता होगी, न स्त्री को।'' (वही, पृ. 158.159)

'आधी दुनिया' के लिए 'आधी जमीन और आधे आसमान' की पैरवी करती यह स्त्री नौकरियों में 'आधी जगहें' लेकर आर्थिक स्वाधीनता अर्जित करना चाहती है - ''नौकरी करना आसान है या मुश्किल, इसके बारे में स्त्रियाँ आप लोगों की राय नहीं पूछने जातीं। वे यह जानती हैं कि बिना मुश्किल काम किए उनका यथार्थ आदर नहीं हो सकता। इसीलिए अब वह आसान काम छोड़ कर मुश्किल काम करेंगी। जब पुरुषों को घर के आसान काम करने का तजरबा हो जाएगा, तब उन्हें स्त्रियों की कदर मालूम होगी। अगर पुरुष मुश्किल काम कर सकता है तो स्त्री भी कर सकती है।'' (पृ. 158)

यहीं अनायास यह प्रतीति भी होती है कि 'समझौता' की नायिका ललिता को पटकनी देने के लिए ही तो कहीं प्रेमचंद ने जबरन मालती के व्यक्तित्व को यू-टर्न देकर उसे पालतू गाय नहीं बना लिया है? ''मेहता ने ठुकरा कर मालती कर आत्मशक्ति को जगा दिया है' - प्रेमचंद कहते हैं और गोबर-झुनिया के चेचकग्रस्त बीमार बेटे मंगल की तीमारदारी में दिन-रात बौराई सी मालती (मातृ छवि) की अभ्यर्थना में अभिमानी मेहता अलौकिक सुख से भर उठा है - ''जब मैंने उसे हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ना चाहा तो देखा, वह आसमान में जा बैठी है। उस ऊँचाई तक तो क्या मैं पहुँचूँगा, आरजू-मिन्नत कर रहा हूँ कि नीचे आ जाए।'' (पृ. 304) मालती ने विवाहाकांक्षी मेहता के विवाह-प्रस्ताव को ठुकरा दिया है, लेकिन मेहता और प्रेमचंद दोनों को इसका जरा भी रंज नहीं क्योंकि आत्मदान का पाठ पढ़ कर अब वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दमनकारी स्वरूप की मुखालफत नहीं करेगी। बेहद चतुराई से दोनों ने मिल कर उसकी चेतना, जागृति, आत्मनिर्भरता, निर्णयकुशलता और विश्लेषणात्मक विवेक को समकालीन सामाजिक संदर्भों से काट दिया है। वह मनुष्यता की सेवा के अमूर्त आइडिया के प्रति समर्पित हो चुकी है और लेखक उसके कसीदे काढ़ने में व्यस्त - 'मालती नारीत्व के उस ऊँचे आदर्श पर पहुँच गई थी जहाँ वह प्रकाश के एक नक्षत्र सी नजर आती थी। अब वह प्रेम की वस्तु नहीं, श्रद्धा की वस्तु थी।'' (पृ. 314) मैं घनघोर विरक्ति और आपत्ति के साथ अंतिम पंक्ति - ''अब वह प्रेम की वस्तु नहीं, श्रद्धा की वस्तु थी'' - को रेखांकित करते हुए तीन शब्दों पर विचार करना चाहती हूँ - वस्तु, प्रेम, श्रद्धा। तो क्या धनिया हो या मालती, ग्रामीणा हो या शहरी स्त्री, पराश्रिता हो या आत्मनिर्भर, परंपरावादी हो या प्रगतिशील - स्त्री हमेशा वस्तु ही रहेगी उनकी नजर में? मनुष्य का दर्जा क्या कभी नहीं पा सकेगी? हाँ, वस्तु के साथ विशेषण बदल जाने से उसके मूल्य में परिवर्तन जरूर आ जाएगा? प्रेम की वस्तु यानी भोग्या स्त्री - मात्र देह! श्रद्धा की वस्तु यानी देवी - पत्थर की तरह निस्पंद या आइडिया की तरह अमूर्त!

हो सकता है मालती के हृदय परिवर्तन के पीछे प्रेमचंद पर गांधीजी के प्रभाव का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा हो। राजनीतिक एवं समाज सुधार आंदोलन में स्त्री को पुरुष की अनुयायी बना कर गांधी जी उसके लिए अलग कर्मक्षेत्र की नियोजना करते हैं। वे ब्रह्मचर्य के अनन्य पुजारी हैं, इसलिए विवाह उनके सिद्धांत के आड़े आता है। मनुष्य की सेवा के लिए अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को होम कर देना गांधीवादी दर्शन का सत्व है। क्या इसीलिए जीवन में ओज, ऊर्जा, सौंदर्य, गति और सक्रियता से भरी मालती अपनी प्रकृति के विरुद्ध जाकर सब कुछ एक महत् उद्देश्य को समर्पित कर देती है - ''मित्र बन कर रहना स्त्री-पुरुष बन कर रहने से कहीं सुखकर है। ...हमारी पूर्णता के लिए, हमारी आत्मा के विकास के लिए और क्या चाहिए? ...अपनी छोटी सी गृहस्थी बना कर अपनी आत्माओं को छोटे से पिंजड़े में बंद करके, अपने सुख-दुख को अपने ही तक रख कर क्या हम असीम के निकट पहुँच सकते हैं?'' (पृ. 315) लेकिन मालती के इन शब्दों पर विश्वास करने को जी नहीं चाहता। यह मालती का अकृत्रिम परिचय नहीं, औदात्य का ओढ़ाया गया आवरण है, ठीक वैसे जैसे जबरन विधवा को ढोल-नगाड़ों और यज्ञ-धूम के बीच सती कर दिया जाता है। मालती को आइडिया (श्रद्धा की वस्तु) बना कर भले ही प्रेमचंद फूले न समा रहे हों, किंतु स्वयं उनकी गिरफ्त में जकड़ी मालती निस्पंद हो वहीं ढह जाती है। वह मनुष्य नहीं, लेखकीय दृष्टि की प्रतिच्छाया है। हाँ, मालती (नई स्त्री) की वैचारिक आक्रामकता को पूरे उत्कर्ष पर देखना हो तो शिवरानी देवी की कहानियों को पढ़ा जा सकता है या नैतिकता की तंग हदबंदियों का अतिक्रमण करते स्त्री-पुरुष संबंधों की महीन बुनावट और उनकी सघन संवेदनशील तरलता को जानना हो तो सुभद्राकुमारी चौहान की कहानियों का पाठ जरूरी हो जाता है।


''सारा उपदेश गरीब नारियों के ही सिर पर क्यों थोपा जाता है? उन्हीं के सिर क्यों आदर्श और मर्यादा और त्याग सब कुछ पालन करने का भार पटका जाता है?''


गोविंदी को लेकर बेशक मेहता और प्रेमचंद दोनों आदर्श अनुकरणीय स्त्री छवि रचने की बात करते हों, लेकिन गोविंदी (जिसे उपन्यास के प्रारंभिक पृष्ठों में कामिनी कहा गया है) के व्यक्तित्व का सूक्ष्म विश्लेषण उसे मालती की तुलना में हर कदम पर बौना साबित करता है। मुँहजोर चपल चंचल खुशमिजाज आत्मनिर्भर मालती के सामने गोविंदी गंभीर, उदास, सादगी से परिपूर्ण आत्मसंकुचित महिला है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि दुख को सौंदर्य प्रसाधन की तरह चेहरे पर पोत कर वह पुरुष के हृदय में करुणा उपजाने की कला जानती है। वह रोती है (आँसू स्त्री की सामाजिक-मानसिक-भावनात्मक दुर्बलता का डंका पीटते हैं) और पुरुष अपने सामर्थ्य के जोश में बल्लियों उछल कर उसके आँसू पोंछ डालना चाहता है। रोती हुई स्त्री उसके पौरुष - बल एवं अहं - को दुगुना करती है। फिर यदि इस रुदन का कारण 'परस्त्री' हो तो कहने ही क्या? घर की लक्ष्मणरेखा से बाहर निकल कर पुरुष पर डोरे डालने वाली हर 'कुलटा' को मजा चखाने के लिए उसकी बाँहें फड़कने लगती हैं। गोविंदी की आर्त पुकार - ''मालती से मेरा उद्धार कीजिए। इस मायाविनी के हाथों मिटी जा रही हूँ'' - ने मेहता के कर्तव्य पथ को निर्धारित कर दिया है। लेकिन यहाँ एक समानांतर स्थिति की कल्पना करने को जी चाहता है। यदि मेहता विवाहित होता और उसकी पत्नी अपने पति को दिन रात किसी मिसेज गोविंदी खन्ना के आँसू पोंछते और सराहते देखती-सुनती तो क्या वह स्वयं गोविंदी की ही तरह असुरक्षित होकर किसी 'मेहता' (अन्य पुरुष) के कंधे को तलाशते हुए परित्राण की यही आर्त पुकार न लगाती? क्या गोविंदी के तमाम महिमामंडित पातिव्रत्य को ठेंगा दिखाती हुई वह दूध की जली मेहता-पत्नी गोविंदी पर ठीक वही लांछन न लगाती जो गोविंदी मालती पर लगा रही है - ''मेरी दृष्टि में वह वेश्याओं से भी गई बीती है क्योंकि वह परदे की आड़ से शिकार खेलती है।'' (पृ. 176)

लेकिन शायद असंभाव्य कल्पना द्वारा किसी की तुलना या मूल्यांकन सही नहीं। मैं मेहता-पत्नी की संभावना को वहीं छोड़ गोविंदी की स्टेटमेंट्स खँगालने लगती हूँ। खन्ना की बेवफाई से क्षुब्ध गोविंदी घर छोड़ने का निर्णय लेती है - ''दिखा देगी कि वह उनके आश्रय से निकल कर भी जिंदा रह सकती है।''

कैसे?

जिंदा रहने के लिए सिर्फ साँस लेना जरूरी नहीं होता। भौतिक जरूरतों के लिए सख्त भौतिक धरातल और तरल भौतिक मुद्रा भी जरूरी होती है। इसके लिए जरूरी है रोजगार। रोजगार के लिए जरूरी है श्रम - कुशल-अकुशल श्रम - और बाहर की दुनिया में अपने वजूद को टिकाए रखने की ताकत। गोविंदी के पास ऐसे 'अँधेरे' और पसीने से लबालब भविष्य का कोई ड्राफ्ट नहीं। बस, धुँधला सा ख्याल है - ''गांधी आश्रम से चीजें लेकर बेचना शुरू कर देगी। शर्म किस बात की?'' न, ख्याल को अमली जामा नहीं पहना सकती वह क्योंकि ''शर्म किस बात की'' जैसी 'साहस' भरी उक्ति कहने की बाध्यता ने ही उसे भीरु और दुर्बल बना दिया है - ''लोग उँगली दिखा कर कहेंगे - वह जा रही है खन्ना की बीवी; लेकिन इस शहर में रहूँ क्यों? किसी दूसरे शहर में क्यों न चली जाऊँ, जहाँ मुझे कोई जानता ही न हो। दस-बीस रुपए कमा लेना ऐसा क्या मुश्किल है। अपने पसीने की कमाई तो खाऊँगी, फिर तो कोई मुझ पर रोब न जमाएगा। यह महाशय इसीलिए तो इतना मिजाज करते हैं कि वह मेरा पालन करते हैं। मैं अब खूब अपना पालन करूँगी।'' (पृ. 178) अपना पेट पालने के लिए गोविंदी ने अभी घर से बाहर कदम नहीं बढ़ाया है, लेकिन बाहर निकलने और पेट पालने की दिक्कतें भयावह रूप धर कर उसके सामने आ खड़ी हुई हैं। उत्कंठा जगती है प्रेमचंद ने अपनी इस प्रिय पात्र के आत्मसम्मान को बचाए रखने के लिए क्या राह सुझाई? शीघ्र ही उसकी भेंट प्रोफेसर एवं दार्शनिक मेहता से होने जा रही है। गुप्तदान द्वारा जाने कितनी देवियों को डूबने से बचाने वाला यह 'मसीहा' जरूर गोविंदी सरीखी पति-प्रताड़िताओं को आर्थिक-भावनात्मक स्वावलंबन की राह दिखाएगा - मन में अटल विश्वस है। लेकिन मेहता-गोविंदी की यह मीटिंग मालती-निंदा बनाम गोविंदी स्तुति तथा स्त्री सुबोधिनी की उपदेशात्मकता में समाप्त हो जाती है। गोविंदी को घर लौटने की सलाह - पुनः मूषको भव - साथ में बेहतरी का सतरंगा आश्वासन - ''आप मि. खन्ना के विषय में इतना ही समझ लें कि वह अपने होश में नहीं हैं। वह जो कुछ कहते हैं या करते हैं, वह उन्माद की दशा में करते हैं, मगर वह उन्माद शांत होने में बहुत दिन न लगेंगे, और वह समय बहुत जल्द आएगा, जब वह आपको इष्टदेवी समझेंगे।'' (पृ. 183) सचमुच सीमोन द बउवा ठीक कहती हैं कि पुरुष पुरुष के विरुद्ध कभी जा ही नहीं सकता क्योंकि सत्ता को बचाने और असंतुष्टों को मनाने की राजनीति हर देश-काल में एक सी हुआ करती है। समझ नहीं आता कि तलाक जैसे अधिकार का मुखर विरोध करने वाला मेहता क्यों स्त्री की नौकरी और घर से बाहर उसकी स्वतंत्र दुनिया के विकल्प को लेकर मौन है? खासकर तब जब उस समय के समाज में नौकरीपेशा स्त्री कोई अजूबा नहीं रह गई थी। क्या 'मूढ़' गोविंदी समझ पाई होगी कि मेहता और प्रेमचंद दोनों उसका 'उपयोग' कर उसे आत्मधिक्कार और हताशा की दलदल में छटपटाते रहने को छोड़ गए हैं? तो क्या वह मान ले कि स्त्री 'उपयोग' और 'उपभोग' की जाने वाली वस्तु मात्र है? मनुष्य नहीं? यदि उसका दमित अहं और लावा बन कर फूटता आत्मसम्मान अपने लिए निष्कृति के मार्ग पाना चाहता है तो यकीनन उसे अपनी ही अंतःशक्तियों को खँगालना और थहाना होगा क्योंकि अपनी लड़ाई खुद अपने हाथ और हथियारों से लड़ी जाती है। तो क्या उसे उपन्यास के पूर्वार्द्ध की मालती से बहनापा गाँठ कर 'नारी धर्म' (मनुष्य की गरिमा की रक्षा का संकल्प) का पाठ पढ़ना होगा?

मालती के संपर्क में आने के बाद गोविंदी जान जाती कि कोई भी स्त्री रूप का बाजार लगा कर नहीं बैठती। वह चाहती है अपने निजत्व की रक्षा और पहचान। तब शायद गोविंदी मेहता के ओढ़ाए तमाम रेशमी आवरणों को उतार परे फेंक देती और आँसुओं के प्रवाह में बह जाने वाली संवेदना को विश्लेषण की वैचारिकता में ढाल कर पाती कि स्त्री की 'देवी' छवि जीते हुए भी वह उस छवि के खिलाफ असंतोष से कसमसाई रहती थी। मेहता के सामने उसने खुल कर अपनी बात कही भी थी - ''भूल जाइए कि नारी श्रेष्ठ है और सारी जिम्मेदारी उसी पर है, श्रेष्ठ पुरुष है और उसी पर गृहस्थी का सारा भार है। नारी में सेवा और संयम और कर्तव्य सब कुछ वही पैदा कर सकता है; अगर उसमें इन बातों का अभाव है तो नारी में भी अभाव रहेगा। नारियों में आज जो यह विद्रोह है, इसका कारण पुरुष का इन गुणों से शून्य हो जाना है।'' (पृ. 152) यानी सारी चर्चा नारी धर्म पर ही क्यों? पुरुष-कर्तव्य पर क्यों नहीं? (ठीक मालती सा सवाल!) दरअसल मालती या गोविंदी ही नहीं, प्रेमचंद की स्त्रियाँ एकमत हो यह सवाल पूछना चाहती हैं और प्रेमचंद हैं कि बार-बार इसी सवाल से कन्नी काट जाते हैं। नहीं, इसे आरोप की भाषा में क्यों कहा जाए? प्रेमचंद की स्त्रियाँ यदि इस सवाल को उठाने का विवेक पा सकी हैं तो इसलिए न कि प्रेमचंद स्त्री की स्थिति, असंतोष और सामाजिक उत्पीड़न को समझते हैं। मनुष्य के रूप में अपनी संवेदना का प्रसार करते हुए वे स्त्री प्रश्नों पर विचार भी करना चाहते हैं और विचार की इस प्रक्रिया में जान जाते हैं कि 'जिसके हाथ में लाठी है, वह गरीबों को कुचल का बड़ा आदमी बन जाता है।' उपन्यास दर उपन्यास स्त्री जीवन में नरक रचती समस्याओं को उठा कर वे उन्हें विस्तार से विश्लेषित करते हैं, भरसक समाधान जुटाते हैं और स्त्री के पक्ष में जनमत बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन जैसे ही सिमटी-सिकुड़ी-बिसूरती-अनुगता स्त्री उत्साह से उमड़ कर स्वयं झंडा हाथ में लेकर जुलूस का नेतृत्व करने लगती है कि वहीं वे हत्बुद्धि से जम जाते हैं। प्रेमचंद नैतिकता के दोहरे मानदंडों की रक्षा भी करते हैं और पुरुष की लंपटता से त्रस्त स्त्री को अपने डैनों तले छिपा भी लेना चाहते हैं। दूध बेचने घर-घर जाती झुनिया की देह के लोभी भ्रमरों की वे झुनिया के साथ कस कर पिटाई करते हैं और उन्हें उल्लू बनाने के लिए उनकी ही भाषा में प्रेम का खेल खेलती झुनिया पर उँगली भी नहीं उठाने देते। पुरुष का निर्लज्ज निमंत्रण झुनिया से कहीं अधिक उन्हें आहत करता है - स्त्री के सतीत्व पर कलंक लगाने के लिए नहीं, मनुष्यता को कलंकित करने के लिए। ''एक प्रेमी का मन रख दोगी तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाएगा, झूना रानी! कभी-कभी गरीबों पर दया किया करो, नहीं भगवान पूछेंगे, मैंने तुम्हें इतना रूपधन दिया था, तुमने उससे एक ब्राह्मण का उपकार भी नहीं किया, तो क्या जवाब दोगी?'' (पृ. 45) ऐसी निर्लज्ज लंपटता से कैसे लड़ें वे? समस्याओं को उभार कर भाग खड़े होना - क्या यही स्त्री प्रश्नों पर प्रेमचंद की दृष्टि का मूल सार है? निरुपाय (?) वे वहाँ से पलायन कर जाते हैं लेकिन भागते-भागते भी जिन सूत्रों/सवालों की ओर संकेत करते हैं, वे आज भी स्त्री लेखन का आधारभूत ढाँचा तैयार करते हैं। मसलन प्रेम एवं समर्पण को नई अर्थव्यंजनाओं के साथ खोलता झुनिया का कथन - ''सर्बस तो तभी पाओगे जब अपना सर्बस दोगे... जान देने का अरथ है साथ रह कर निबाह करना। एक बार हाथ पकड़ कर उमिर भर निबाह करते रहना, चाहे दुनिया कुछ कहे।'' (पृ. 43) ; नैतिकता के दोहरे मानदंडों को नकार कर पुरुष से एकनिष्ठ समर्पण को अधिकारपूर्वक माँगती माँग - ''मर्द का हरजाईपन औरत को भी उतना ही बुरा लगता है, जितना औरत का मर्द को। ...यह चाहो कि तुम तो अपने मन की करो और औरत को मार के डर से अपने काबू में रखो, तो यह न होगा। तुम खुले खजाने करते हो, वह छिप कर करेगी।'' (पृ. 46)। मातृत्व की निरर्थक अभ्यर्थना में वक्त जाया करने की अपेक्षा मातृत्व (पितृत्व भी) के दायित्व को समझने का आह्वान - ''क्यों माता ने पुत्रा को ऐसी शिक्षा नहीं दी कि वह माता की, स्त्री जाति की पूजा करता? इसलिए कि माता को यह शिक्षा देनी नहीं आती, इसलिए कि उसने अपने को इतना मिटाया कि उसका रूप ही बिगड़ गया, उसका व्यक्तित्व ही नष्ट हो गया।'' (पृ. 285)

ये प्रश्न और कामनाएँ पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को ही नहीं, संबंधों और व्यक्तियों को देखने की दृष्टि में परिवर्तन की माँग करती हैं। बेशक मेहता में प्रेमचंद अपने को अभिव्यक्त करते हैं, लेकिन मेहता प्रेमचंद का सर्वांश नहीं। दार्शनिकता की आड़ में मेहता जैसी अलमस्ती और उत्तरदायित्वहीनता प्रेमचंद का परिचय नहीं। मेहता कह सकते हैं कि ''मैं भूत की चिंता नहीं करता, भविष्य की परवाह नहीं करता।'' (पृ. 182) लेकिन प्रेमचंद भूत और भविष्य के साथ अनिवार्य रूप से बँधे वर्तमान को विच्छिन्न कर खंडों और टुकड़ों में व्यक्ति, वक्त और समाज के अंतर्संबंधों का अध्ययन नहीं कर सकते। मनुष्य को मुकम्मल रूप से जानने के लिए मुकम्मल वक्त और मुकम्मल दृष्टि चाहिए। पूर्वग्रहों में बँधे प्रेमचंद मुकम्मल दृष्टि पाने का स्वाँग नहीं रचते, अपनी दृष्टिगत सीमाओं को उजागर कर प्रबुद्ध पाठक से इन टाँकों और दरकनों को पाट लेने का आह्वान करते हैं क्योंकि साहित्य आस्वाद की वस्तु नहीं, सृजन की संयुक्त रचनात्मक यात्रा है - विचारशील पाठक की भागीदारी के साथ कृति और समकालीनता के बीच संवाद सेतु बनाती उर्वर सकारात्मक यात्रा।


संदर्भ

प्रेमचंद, 'गोदान' :


''न हुक्का खुलता तो हमारा क्या बिगड़ा जाता था? चार-पाँच महीने नहीं किसी का हुक्का पिया तो क्या छोटे हो गए? ...ले-दे के बाप-दादों की निसानी एक घर बच रहा था, आज तुमने उसका भी वारा-न्यारा कर दिया। इसी तरह कल यह तीन-चार बीघे जमीन है, इसे भी लिख देना और तब गली-गली भीख माँगना। मैं पूछती हूँ, तुम्हारे मुँह में जीभ न थी कि उन पंचों से पूछते ...कौन सा पाप किया है जिसके लिए बिरादरी से डरें? किसी की चोरी की है, किसी का माल काटा है? मेहरिया रख लेना पाप नहीं है। हाँ, रख के छोड़ देना पाप है।'' वही, पृ. 119


''कुश कन्या होरी भी दे सकता था। इसी में उसका मंगल था; लेकिन कुल-मर्यादा कैसे छोड़ दे? उसकी बहनों के विवाह में तीन-तीन सौ बाराती द्वार पर आए थे। दहेज भी अच्छा ही दिया गया था। नाच-तमाशा, बाजा-गाजा, हाथी-घोड़े सभी आए थे। आज भी बिरादरी में उसका नाम है। दस गाँव के आदमियों से उसका हेल-मेल है। कुश कन्या देकर वह किसे मुँह दिखाएगा? इससे तो मर जाना अच्छा है।'' वही, पृ. 234


'' उम्र की ऐसी कोई बात नहीं। मरना-जीना तकदीर के हाथ है। बूढ़े बैठे रहते हैं, जवान चले जाते हैं। रूपा को सुख लिखा है तो वहाँ भी सुख उठाएगी; दुख लिखा है तो कहीं भी सुख नहीं पा सकती।'' वही, पृ. 323


"साहित्य व्यक्ति को समाज से अलग नहीं देखता, किंतु उसे समाज के एक अंग रूप में देखता है। इसलिए नहीं कि वह समाज पर हुकूमत करे, अपने स्वार्थ साधन का औजार बनाए, मानो उसमें और समाज में सनातन शत्रुता है, बल्कि इसलिए कि समाज के अस्तित्व के साथ उसका अस्तित्व कायम है और समाज से अलग होकर उसका मूल्य शून्य के बराबर हो जाता है।'' प्रेमचंद रचनावली, भाग 7, पृ. 508


'' वह चाहे मुझे भूखों रखे, चाहे मार डाले, पर उसका साथ न छोड़ूँगी। उनकी साँसत करा के छोड़ दूँ? मर जाऊँगी, पर हरजाई न बनूँगी। एक बार जिसने बाँह पकड़ ली, उसी की रहूँगी।'' गोदान, पृ. 232


"ऐसी औरत का तो सिर काट ले। होरी ने इस कुलटा को घर रख कर समाज में विष बोया है। ऐसे आदमी को गाँव में रहने देना सारे गाँव को भ्रष्ट कर देना है। ...अगर गाँव में यह अनीति चली तो किसी की आबरू सलामत न रहेगी।'' गोदान, पृ. 116


हीरा पुनिया की मरम्मत कर उसे उसकी औकात बता रहा है। उल्लेखनीय है कि किसी भी व्यक्ति को पहले गालियाँ देना, फिर सार्वजनिक रूप से धुनना और फिर उस पर नाक काटने का आरोप लगाना सांस्कृतिक जालसाजी की ऐसी महीन प्रक्रिया है, जिसमें पीड़क और उत्पीड़ित दोनों ही समान भाव से फँस कर अपनी-अपनी मनुष्यता, विवेक और संवेदना का क्षरण किए जा रहे हैं। प्रेमचंद महीन षड्यंत्रों को बुनती इस व्यवस्था का न पर्दाफाश करते हैं, न उसके खिलाफ असंतोष की सुगबुगाहट पैदा करते हैं। है तो एक जड़ जाहिल स्वीकार और प्रतिकार में उठता बोदा स्त्री विद्रोह जो सिर्फ अपनी खाल बचाने के लिए है, स्थिति का आकलन कर उसे वैचारिक जागृति का सूत्र नहीं देता।

उल्लेखनीय है कि 'सेवासदन' उपन्यास का आधार ही लेखक की इस भ्रांत अवधारणा पर टिका हुआ है। इसलिए वह उसी दौरान अनूदित होकर प्रकाश में आए रूसी उपन्यास 'गाड़ीवालों का कटरा' के मुकाबले न समस्या की खुर्दबीनी जाँच करता है, न सामाजिक व्यभिचार के रूप में वेश्यावृत्ति का पोषण करने वाली अनैतिक ताकतों को चीन्हने और उनके खिलाफ जनमत बनाने की कोशिश करता है। यह उपन्यास अपने उद्धत अहं में निमग्न होकर 'पतित' स्त्री के उद्धार की उदात्त कोशिश का बड़बोला सुख पाता है।

खन्ना-रायबहादुर-संवाद का एक अंश अवलोकनीय है :

''मैं सचमुच खिलौना समझता हूँ, आप उन्हें प्रतिमा बनाए हुए हैं।'' खन्ना ने जोर से कहकहा मारा, हालाँकि हँसी की कोई बात न थी।

''अगर एक लोटा जल चढ़ा देने से वरदान मिल जाए तो बुरा क्या है!'' अब की रायसाहब ने जोर से कहकहा तारा, जिसका कोई प्रयोजन न था। पृ. 81

मुक्त भोग आत्मा के विकास में बाधक नहीं होता। विवाह तो आत्मा को और जीवन को पिंजरे में बंद कर देता है।'' वही, पृ. 56

'' अच्छा एक और चोरी सुनो। मैंने अपनी पहली स्त्री के जीवन-काल में ही एक और स्त्री रख छोड़ी थी। तुम्हारे आने पर भी मेरा उससे संबंध था।'' शिवरानी देवी, प्रेमचंद : घर में पृ. 264

'' संसार में ऐसे बहुत कम प्राणी हैं जिनके प्रति मेरे मन में श्रद्धा हो। उन्हीं में से एक आप हैं। आपका धैर्य और त्याग और शील और प्रेम अनुपम है। मैं अपने जीवन में सबसे बड़े सुख की जो कल्पना कर सकता हूँ, वह आप जैसी किसी देवी के चरणों की सेवा है। जिस नारीत्व को मैं आदर्श मानता हूँ, आप उसकी सजीव प्रतिमा हैं।''

तथा

गोविंदी अर्थात ऐसी स्त्री '' जो उपेक्षा और अनादर सह कर भी अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होती, जो मातृत्व की वेदी पर अपने को बलिदान करती है, जिसके लिए त्याग ही सबसे बड़ा अधिकार है, और जो इस योग्य है कि उसकी प्रतिमा बना कर पूजी जाए।'' पृ. 179

स्वयं प्रेमचंद जानते हैं कि इस विवाह प्रस्ताव को ठुकराने के मूल में है - मेहता के प्रति मालती का मोहभंग। 'आदर्श' की तरह मेहता का अनुकरण करने वाली मालती उसे सौ फीसदी मनुष्य (परफेक्ट ह्यूमन बीइंग) मानती थी - दोषों-दुर्बलताओं-संकीर्णताओं से परे। लेकिन प्रेम को लेकर मेहता की मान्यताएँ किसी भी जाहिल कबीलाई व्यक्ति से कम नहीं - ''प्रेम सीधी सादी गऊ नहीं, खूँखार शेर है जो अपने शिकार पर किसी की आँख भी नहीं पड़ने देता।'' यह कहते हुए मेहता में न संकोच है, न द्वंद्व बल्कि अपनी पशुता पर अलौकिक अभिमान ही है। मालती अपनी अंतःशक्तियों एवं उदार दृष्टि के बल पर ऊर्ध्व यात्रा करते हुए जिस मुकाम पर जा पहुँची है, वहाँ प्रेम 'संपूर्ण आत्मसमर्पण' है और 'परीक्षक बन कर नहीं, उपासक' बन कर अपने और दूसरे को पाना संभव है। मेहता को नकार कर मालती मानो यह तथ्य रेखांकित कर रही है कि स्त्री-हृदय वाले पुरुष (अर्धनारीश्वर) को पाने के लिए अभी उसे लंबी लड़ाई लड़नी है।

'नारी हृदय' कहानी संग्रह में संकलित कहानियों में प्रमुख हैं - 'वरयात्रा, 'साहस', 'समझौता', 'वधू परीक्षा' 'मँझली दीदी', 'थाती', 'उन्मादिनी', 'अनुरोध', 'मंगला', पवित्र ईर्ष्या', 'आहुति' तथा 'दृष्टिकोण'


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हिंदी समय में रोहिणी अग्रवाल की रचनाएँ