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कविता

फालतू लड़की
रुनु महांति

अनुवाद - शंकरलाल पुरोहित


सारी रात तो नाची सागर-सी

क्या लेकर ? शंख, कौड़ी की स्मृति ?

रात भर तो छंदित किया,

मालती लता-सा

क्या देकर ? सुगंधयुक्त कलंक

फूलरेणु या फिर दुबारा

लौट आने की प्रतिश्रुति।

घेर घुमेर घागरा रात भर

प्याले छलकी सुरा,

रात भर...

जाते हो ? जाओ

अब खोजूँगी नहीं,

किसी क्यारी में तुम्हारा छोड़ा

उत्तरीय।

खोजूँगी क्या ? स्वर्ण मुंदरी

पहनूँगी अपनी किस अँगुली में ?

कहूँगी ना ? विरह व्यथा

दूती को ?

पूछूँगी ना ? कांत की कुशल हनु को ?

जाओ ! जाओ

पता देते जाओ पता

शायद, मैं लिख सकूँ

प्रेमपत्र।

परदेसी ! सुन जाओ

अँधेरा भवितव्य मेरा

किसने नाम दिया

चंद्रमुखी ?


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