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सिनेमा

टूटते सपने का एक बीज और गौरैयों का गीत : द साँग ऑफ द स्पैरोज
विमल चंद्र पांडेय


'द कलर ऑफ पैराडाईज', 'बरान', 'द चिल्ड्रेन ऑफ हैवेन' और 'फादर' जैसी अर्थपूर्ण और संवेदनशील फिल्में होते हुए भी ईरान के नामचीन निर्देशक माजिद मजीदी की फिल्म 'द साँग ऑफ द स्पैरोज' (आवाज-ए-गोंजेश्क-हा) इस मायने में उनकी सबसे खूबसूरत फिल्म है कि यहाँ जो सपना है वो इतना नाजुक और पवित्र है कि उसे थोड़ी देर तक उम्मीदों का पानी न मिले तो वह तड़फड़ा कर मर जाएगा लेकिन फिर भी कुछ बच्चे उसे बचा ही लेते हैं। ये उन बच्चों की जिद ही है की जिस गंदे पानी और कीचड़ के कुंड को फिल्म की शुरुआत में दिखाया गया है, हजारों बार झिड़कियाँ और फटकार खाने के बावजूद जिद के धनी वे बच्चे उसे फिल्म के अंत में एकदम साफ सुथरा और साफ पानी वाला कुंड बना कर ही मानते हैं। और तो और कमाल ये है कि जब उनका सपना उनकी आँखों के सामने टूट रहा होता है तो वे स्वप्नदर्शी बच्चे थोड़ी देर रोने और मायूस होने के बाद अचानक दुनिया के सबसे समझदार बच्चों के रूप में हमारे सामने आते हैं और उस सपने का एक बीज बचा लेने में कामयाब हो जाते हैं। उन्हें पता है कि जब सपने टूटने लगें तो क्या करना चाहिए, ये उनके बाप करीम को भी नहीं मालूम और दर्शकों को भी नहीं। यहाँ वे बच्चे फिल्म के असली नायक बन कर उभरते हैं कि सारी मछलियों को पानी में गिराते वक्त वे उनमें से एक रंगीन मछली को बचा लेते हैं और उसे एक पन्नी में भर लेते हैं। रास्ते में करीम उन उदास बच्चों को बहलाने के लिए एक गीत भी सुनाता है जिसमें वह कहता है कि 'दुनिया एक भ्रम है' और 'दुनिया एक ख्वाब है'। बच्चे उसके गीत को सुन कर खुश तो होते हैं लेकिन दुनिया उन बच्चों के लिए कोई भ्रम या स्वप्न नहीं है। यह वही दुनिया है जहाँ उन्हें ढेर सारी मछलियाँ पालनी थीं और उन्हें बेच कर लखपति बनना था लेकिन वो सपना टूट गया है। करीम यही समझता है कि सपना टूट गया है लेकिन वह ध्यान से अपने बेटे हुसैन के हाथ में एक प्लास्टिक के थैले में रखी उस एक मछली को नहीं देखता जो उस टूटे हुए सपने का बीज है। इस एक बीज से फिर एक बड़ा सपना उगेगा और जिंदगी फिर से उम्मीदों से भर जाएगी।

करीम कुंड को साफ करके उसमें साफ पानी भर दिए जाने के बाद जिस दिन पहली बार उसे देखता है, उसके चेहरे पर आए बदलावों से साफ जाहिर होता है कि वह बच्चों की जिद को काफी हद तक समझ चुका है। करीम शुतुर्मुर्गों के फार्म पर काम करता है और एक शुतुरमुर्ग के भाग जाने पर नौकरी से निकाल दिया जाता है। पूरी फिल्म में वह अपना घर चलाने के लिए मोटरसाइकिल पर सवारियाँ और सामान ढोता है पर उसकी नजर और एक कान हमेशा शुतुरमुर्ग की खबर पर ही लगे रहते हैं। फिल्म के अंतिम हिस्सों में जब उसे पता चलता है कि शुतुरमुर्ग अपने आप वापस लौट आया है तो हमेशा उसकी तलाश में लगे उस इनसान के चेहरे की मायूसी बहुत कुछ कह देती है जो शुतुरमुर्ग को खोजने के लिए खुद शुतुरमुर्ग तक बन चुका है।

फिल्म एक ईमानदार और हर चीज मिल बाँट कर खाने वाले उस गँवई इनसान के भीतर आ रहे परिवर्तनों की बात भी करती है जो शहर की दूषित हवा के कारण आए हैं। लोग तेहरान में उसकी बाइक के पीछे बैठे हैं और झूठ बोल रहे हैं कि वो तेहरान के बाहर एक मस्जिद के सामने हैं। कोई उसकी गाड़ी पर सवारी करने के बाद उसे किराया नहीं दे रहा और उल्टा उसे ही चोर ठहरा रहा है। सवारी ढोने वाले लोग उसे अपनी जगह पर खड़े नहीं होने दे रहे। माजिद ने कहीं भी शहर और उसके लोगों को करीम के भीतर आ रही कठोरता के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया है क्योंकि जहाँ वहाँ पर ऐसे लोग हैं वहीं ऐसे लोग भी हैं जो उसे गलती से अधिक किराया दे देते हैं या उसका गलती से अधिक दिया गया पैसा वापस करने पलट कर आते हैं। ये सारी चीजें दरअसल इनसान के भीतर रहती ही हैं जिन्हें बाहर आने के लिए उपयुक्त मौका और जरूरत चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे एक हजार टोमंस अधिक पाने के बाद करीम उसे किराए से अलग नीचे वाली पॉकेट में रखता है, लगता है जैसे अगले दिन उसे वह सवारी मिली तो वह उसे रोक कर उसका पैसा वापस करेगा और कहेगा की आका, अपने किराए में ये अधिक पैसे दे दिए थे, लेकिन जब वह एक फल खरीदने के लिए रुकता है और एक किलो तौलने को कह देता है, तभी उसका हाथ नीचे वाली जेब में जाता है और एक किलो वाला आदेश दो किलो हो जाता है। एक ध्वस्त की गई ईमारत में से वह अपने काम की ढेर सारी चीजें उठा कर ले आता है जिसमें एक एंटीना, खिड़की का फ्रेम और एक दरवाजा भी है। उसकी अनुपस्थिति में वह दरवाजा करीम की पत्नी नर्गिस अपने पड़ोसी को दे देती है जिसे उस दरवाजे की जरूरत है। मगर शहर में काम करते करते करीम की संवेदनाएँ अब ऐसी कठोर हो चुकी हैं कि वह जाकर और अपने पड़ोसी के घर से वह दरवाजा वापस माँग लाता है। दरवाजा नीले रंग का है और माजिद ने अपने एक साक्षात्कार में इसे पवित्रता का प्रतीक बताया था। जाहिर है कि करीम अपने आसपास ऐसी चीजों का पहाड़ खड़ा करता जा रहा है जिसकी फिलहाल उसे कोई जरूरत नहीं। ऐसी हालत में उन सामानों के बोझ तले दब कर उसे घायल होना ही था। घायलावस्था में करीम वापस अपने भीतर की तरफ लौटता है और अपने घर की खिड़की से टकरा रही एक गौरैया को खिड़की खोल कर उड़ जाने देता है। गौरैया का वह घोंसला जो उसे उस कुंड की दीवार पर दिखाई दिया था, उसके माध्यम से फिल्म गौरैयों की तरह करीम और उसके बच्चों, या कहें परिवार की बात करती है। करीम अपने बच्चों को डाँटना बंद कर देता है और अपने टूटे पैर पर लगे प्लास्टर पर क्षेत्र विभाजित कर देता है ताकि उसके बच्चे अलग अलग हिस्सों में अपने मनपसंद चित्र बना सकें। कहना न होगा की बच्चों के बनाए चित्र उसके अपने मन के प्रतिबिंब होते हैं। वह जिन पहाड़ों और जंगलों में उस खोए हुए शुतुरमुर्ग को खोज रहा था, वही प्रतिबिंब उसे बच्चों द्वारा बनाए गए चित्रों में भी दिखाई पड़ते हैं। वह अपने प्लास्टर लगे पैर से ही अपनी मोटरसाइकिल पर फार्म पर जाता है और पाता है कि वह शुतुरमुर्ग वहाँ नाच रहा है। शुतुरमुर्ग पर शुरू हुई फिल्म शुतुरमुर्ग पर ही खत्म हो जाती है और अपने पीछे मानव मन की उलझनों, सपनों और आशाओं का ऐसा विन्यास रच जाती है कि फिल्म हमेशा आपके मन में एक विशेष स्थान पर विराजमान रहती है।

इस फिल्म को सिर्फ इसलिए ही नहीं याद किया जाना चाहिए कि यह माजिद की सबसे आशावादी फिल्म है बल्कि कई छोटी छोटी विशेषताएँ फिल्म को पूरी दुनिया के दर्शकों और सिनेमा प्रेमियों के लिए अवश्य देखने लायक यानी 'मस्ट वाच' बनाती हैं। एरियल शॉट्स का इससे बढ़िया प्रयोग कम से कम हिंदी सिनेमा ने तो कभी नहीं देखा, बढ़िया मतलब सिर्फ वहीं जहाँ सबसे ज्यादा जरूरत हो यानी वह दृश्य जो बिना हेलिकाप्टर के शूट हो ही नहीं सकता। फिल्म में ऐसे दो दृश्य हैं, पहला जब करीम खोए हुए शुतुरमुर्ग को खोजने के लिए शुतुरमुर्ग की खाल पहन कर, हाथ में शुतुरमुर्ग की गर्दन के जैसा एक डंडा लेकर शुतुरमुर्ग कि तरह चल रहा है। वह दृश्य जितने दूर से दिखाया जाता है, इनसान के इनसान होने की विडंबना बढती जाती है और एरियल शॉट में तो यह चरम पर है। दूसरा दृश्य भी उतना ही सुंदर है जब करीम वह नीला दरवाजा अपने पड़ोसी से जबरदस्ती माँग कर ला रहा है और दूर दूर तक सपाट पड़े खेत में खुद एक दरवाजे सा लग रहा है।

माजिद अपनी बड़ी बातें कहने के लिए बच्चों को हथियार बनाते हैं क्योंकि उनके जरिए जो बातें कही जाती हैं वहाँ सिर्फ भावनाएँ ही मुख्य होती हैं और इस तरह आसानी से वे पूरी दुनिया की बातें कह देते हैं। बच्चों की भावनाएँ ऐसी होती हैं जहाँ आम तौर पर राष्ट्रीयता, धर्म और लिंग का कोई आग्रह नहीं होता, वहाँ सिर्फ खालिस भावनाएँ होती हैं और सुनहले सपने। यही कारण है कि माजिद जिस तरह से अपनी फिल्मों से पूरी दुनिया से आसानी से संवाद कर लेते हैं, अन्य फिल्मकारों के लिए ये चीजें इतनी सहज नहीं होतीं।

2008 में प्रदर्शित हुई यह फिल्म ईरान की ओर से आस्कर में अधिकारिक प्रविष्टि थी। फिल्म का कैमरावर्क शानदार है और अभिनय में सबने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है। माजिद के पसंदीदा नाज़ी रेजा फिल्म की जान हैं तो वहीं बच्चे के रूप में कामरान देघान का अभिनय भी बेहतरीन है। नाज़ी रेजा को इस फिल्म के लिए एशिया पैसिफिक स्क्रीन अवार्ड्स में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए सिल्वर बियर से नवाजा गया था।


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