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आत्मकथ्य

मेरे लिए कविता
श्रीप्रकाश शुक्ल


मैं कविता क्यों लिखता हूँ यह सवाल उतना ही जटिल है जितना यह कि मैं यह जीवन ही क्यों जीता हूँ अथवा यह कि मैं यह निर्णय क्यों लेता हूँ जैसा की अपनी तरह से लेता हूँ और कई बार दूसरों को आहत करते खुद भी लहूलुहान होता हूँ। इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि यदि मैं कविता न लिखता तो क्या करता। या तो बहुत बोलता या फिर चुप चुप रहता। संभव है थोड़ा उत्तर यहाँ पर मिले। कविता चुप्पी के विरुद्ध मेरी शब्द प्रवण वाचालता है और मेरी वाचालता के विरुद्ध एक अर्थप्रवण चुप्पी। जब मुझे बोलने का मन नहीं करता तब कविता के पास जाता हूँ और जब चुप रहने का मन नहीं करता तब गद्य के पास जाता हूँ जो मेरी कविता का प्रेरक होता है।

असल में मेरा समग्र कविकर्म अपने को बार बार सुनने का उपक्रम है और इस अपने में ही मेरा काव्य संसार बसा हुआ है जो हमेशा मेरे आस पास रहता है या यह कि जिसके आस पास मैं रहने की कोशिश करता हूँ। कविता मेरे लिए एक ऐसी कथा है जिसमें मेरे आस पास की व्यथामूलक ध्वनियाँ हैं और जिन्हें मैं खुलकर केवल कविता में ही सुन पाता हूँ। कविता ही इसलिए कि यहाँ गूँजों के लिए पर्याप्त अवकाश रहता है जो मुझे बार बार उस स्थिति की याद दिलाती रहती हैं जिनसे या तो ये बनी हैं या जिनमें यह अपने को व्यक्त करती रहती हैं। कविता मेरे लिए पड़ोस की कहानी है जिसे मैं गीत की तरह सुनता हूँ या कि बहुत दूर का गीत है जिसे कहानी की तरह सुनता हूँ।

अक्सर कहा जाता है कि कविता दुखी आत्माओं का संबोधन है लेकिन असल में यह विक्षुब्ध आत्माओं का संबोधन हुआ करती है। दुख का होना एक बात है इसके अहसास का होना बिलकुल दूसरी बात। इस अहसास से ही विक्षोभ जन्म लेता है तब प्रतिरोध की कविताएँ लिखी जाती हैं। और यहीं अहसास जब भाववादी होकर नियतिवादी हो जाता है तब उत्सवधर्मी कविताएँ लिखी जाती हैं। यहाँ नियतिवाद का मतलब प्रदत्त हालात से समझौता करना और आत्मलीन होकर मुक्ति का गीत गाना है जो असल में कहीं होती नहीं। मुझे प्रसन्नता होती है जब मेरी कविताओं में विक्षोभ की प्रतिरोधी चेतना के तत्व दिखाई देते हैं लेकिन यदि कभी कभी इसके बीच भाववाद की उत्सवधर्मी कविताएँ दिखाई दे जाती हैं तो इसे मेरे अतिशय व्याकुल मन को नियंत्रित करने की एक कोशिश के तौर पर देखा जाना चाहिए।

इसी के साथ यह भी सच है कि मेरे लिए जिंदगी का हर अनुभव कविता में नए अवसर की खोज है और यह अवसर मुझे उस अनुभव की हर अच्छी या बुरी ऐतिहासिक और सामाजिक गतिशीलता से परिचित कराता है।इसलिए कविता लिखते समय अनुभव में दर्ज घटनाओं को जहाँ बहुत सकारात्मक ढंग से देखता हूँ वहीं इस सकारात्मकता को अपनी मुक्ति से भी जोड़ देता हूँ। सच्ची व वास्तविक मुक्ति अपने अनुभवों को अपने पाठकों के साथ साझा करने में है क्योंकि असल में यहीं अनुभवगत साझेदारी है जो एक कवि को विस्मृत होने से बचाता है। कह सकते हैं कि हर कविता मुझे अपने तात्कालिक अनुभवों से मुक्त कर एक शाश्वत विचार से जोड़ने का माध्यम है जहाँ जीवन को दुबारा समझने का अवसर मिलता है। जिसे भोक्ता के रूप में जिया, उसे द्रष्टा के रूप में देखना और अपने बहुत बाद तक अपनों में देखना, असल में अपने जीवन के विकास को भी देखना है।

मेरे लिए कविता में आख्यान महत्वपूर्ण होते हैं। कविता में कथा वाली शैली मुझे प्रिय है। इससे रोचकता के साथ काव्य संभावना के वृहद् द्वार हमेशा खुले रहते हैं। कविता को शब्दों में रखने की जगह उसे हिलाते डुलाते रहना या कि उनका हिलते डुलते रहना मुझे पसंद है।इससे निकटतम वर्तमान से कुछ आगे व अधिक का भाव हमेशा बना रहता है जो केवल कविता को ही ताकत नहीं देता, मेरे भीतर के मनुष्य को भी समृद्ध करता है।

मानव मस्तिष्क की यह एक बड़ी विशेषता रही है कि पहले उसने प्रकृति के ध्वनि तत्व और रंगों को अपने भीतर ढालना आरंभ किया और जब इससे भी संतोष न हुआ तब इनको एक खास अर्थ में पिरोना शुरू किया। आगे इससे भी संतोष न होने पर वह गंध के तत्व की तरफ मुड़ा और कविता में गंध के तत्व का समावेश यहीं कहीं होता है जिससे वस्तु तत्व में निजता आती है। ...रंग कई बार अपनी समानता के कारण भ्रम पैदा करते हैं किंतु इस धरती के हर पदार्थ की गंध अलग होती है जिससे वस्तु की अपनी निजता प्रतिबिंबित होती है। यह गंध कोई अतिरिक्त अथवा अलग उपस्थिति नहीं होती अपितु समानता के भीतर जी निजता ही है जिसे हम कई बार वस्तु कह देते हैं जबकि होती यह एक शिल्प ही है। रंग नामक वस्तु के भीतर गंध नामक शिल्प को पहचानना मेरे कविता का अभीष्ट रहा है जिसकी सार्थकता इसकी उपलब्धि में नहीं, इसके उपक्रम में है।

कह सकते हैं कि मेरे कवि कर्म का समस्त सुख कविता के एक सुन्दर शब्द में समाहित है और दुःख यह है की यही आज तक नहीं मिला।कहना न होगा कि मेरे लिए इस शब्द की खोज ही असल में मेरी कविता है और इस खोज की विफलता ही उसकी निरंतरता है।

अंत में यह कि मेरा कवि अपने समस्त प्राधिकार को त्याग कर शरीररूपी भौतिकता के जड़तत्व से संघर्ष करता हुआ समग्र मनुष्य की मुक्ति का माध्यम बन सके, यह कामना तो कर ही सकता हूँ। जिसे वेदांत ईश्वर कहता हैं वह मेरे लिए कविता है। केवल कविता। क्योंकि कविता ही मेरे लिए विशेषाधिकार से मुक्ति है और इसके लिए सतत संघर्ष की योजना में मेरे कवि कर्म की चरितार्थता है।


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