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नाटक

विद्यावती
भारतेंदु हरिश्चंद्र

अनुक्रम


पहला गर्भांक

राजा और मंत्री का प्रवेश


राजा : (चिन्ता सहित) यही तो बड़ा आश्चर्य है कि इतने राजपुत्र आए पर उनमें मनुष्य एक भी नहीं आया। इन सबों का केवल राजवन्श में जन्म तो है पर वास्तव में ये पशु हैं। जो मैं ऐसा जानता तो अपनी कन्या को ऐसी बड़ी प्रतिज्ञा न करने देता पर अब तो उसे मिटा भी नहीं सकता। अब निश्चय हुआ कि हमारी विद्या की विद्या केवल दोषकारिणी हो गई। हाँ, क्यों मंत्री तुम कोई उपाय सोच सकते हो।
मंत्री : महाराज आप जो आज्ञा करते हैं सो सच है। लक्ष्मी और सरस्वती दोनों एक स्थान पर नहीं रहतीं। इससे ऐसा भाग्यशाली वर मिलना अत्यंत कठिन है। इन दिनों मैंने सुना है कि कांचीपुर के राजा गुणसिन्धु का पुत्र सुन्दर युवराज अत्यन्त सुन्दर अनेक शास्त्रों में शिक्षित और बड़ा कवि है और उसने अनेक पंडितों को शास्त्रार्थ में जीता है।
राजा : क्या गुणसिन्धु राजा को ऐसा गुणवान् पुत्र हो और उसका समाचार हम अब तक न जानें।
मंत्री : महाराज मैंने निश्चय सुना है वह अपूर्व सुन्दर और अद्वितीय पंडित है। इससे मैं अनुमान करता हूँ कि जिसने संसार की सब विद्या पाई है वही हमारी राजकुमारी विद्या को भी पावेगा। यद्यपि ईश्वर की इच्छा और होनहार अत्यन्त प्रबल है तथापि हमको निश्चिन्त होके बैठ रहना उचित नहीं है। इस कहने का अभिप्राय यह है कि आप कांचीपुर में किसी को समाचार लेने के हेतु भेजिए।
राजा : ठीक है, तो विलम्ब क्यों करते हो। शीघ्र ही वहाँ किसी को भेजना चाहिए। (द्वार की ओर देखकर) कोई है! गंगा भाट को अभी बुला लाओ।
प्रतिहारी आकर
प्रतिहारी : जो आज्ञा महाराज। (जाता है)
राजा : (खेदपूर्वक) विद्यावती का केवल यह अदृष्ट है कि अब तक कहीं विवाह नहीं ठहरता। देखें क्या होता है।
मंत्री : महाराज आज तक कोई कन्या क्वांरी नहीं रही। सीता और द्रौपदी इत्यादि जिनके बड़े कठिन प्रण थे उनका तो विवाह हो ही गया। जब ईश्वर कन्या उत्पन्न करता है तो उसका वर भी उसी के साथ उत्पन्न कर देता है। अतएव आपको सोच करना न चाहिए।
(प्रतिहारी के सहित गंगा भाट का प्रवेश)
गंगा भाट : वीरसिंह महाराज की दिन दिन ही जय होय।
तेज बुद्धि बल बढ़ै शत्रु रहै नहिं कोय।।
राजा : कविराज अब तक तुमने अनेक देशों में भ्रमण किया और अनेक राजपुत्रों को यहाँ ले आए परन्तु उनमें सुपात्र एक भी न आया। अब हम सुनते हैं कि कांचीपुर के राजा गुणसिन्धु के पुत्र सुन्दर ने अनेक विद्या उपार्जित की है। इससे हम सोचते हैं कि वही हमारी विद्या के योग्य भी होगा। इससे तुम शीघ्र वहाँ गमन करो और राजपुत्र को अपने साथ ही लेते आओ तो अति उत्तम हो जिसमें विलम्ब न हो क्योंकि राजकन्या विवाह योग्य हो चुकी है।
भाट : महाराज यह कौन बड़ी बात है। मैं अभी जाता हूँ। (जाता है)
राजा : (मंत्री से) गुणसिन्धु राजा को एक पत्र भी देना उचित है। तुम यह सब वृत्तान्त इस रीति से लिख दो कि जिसमें हमारा सब कार्य सिद्ध हो जाय और गंगा भाट की यात्रा की सब वस्तु शीघ्र ही सिद्ध कर दो जिसमें उसे विलम्ब न हो। अब बेला ढल चली, हम भी रनिवास को जाते हैं।
मंत्री : जो आज्ञा।
जवनिका गिरती है।




दूसरा गर्भांक


सुन्दर आता है
सुन्दर : (स्वगत) वर्द्धमान की शोभा का वर्णन मैंने जैसे सुना था उससे कहीं बढ़कर पाया। आह कैसे सुन्दर सुन्दर घर बने हैं, कैसी चौड़ी-चौड़ी सुन्दर स्वच्छ सड़कें हैं, वाणिज्य की कैसी वृद्धि हो रही है, दुकानें अनेक स्थान की अनेक प्रकार की सब वस्तुओं से पूर्ण हो रही हैं, सब लोग अपने काम में लगे हुए हैं और बहुतेरे लोग नदी के प्रवाह की भांति इधर-उधर दौड़ रहे हैं, स्थान स्थान पर पहरेदार लोग सावधानी से पहरे दे रहे हैं, प्रजा लोग सुख से अपना कालक्षेप करते हैं। निश्चय यहां का राजा बड़ा भाग्यमान है। यद्यपि हमारे पिता की राजधानी भी अत्यन्त अपूर्व है। परन्तु इस स्थान सा तो मुझे पृथ्वी में कोई स्थान तो नहीं दिखाई देता। इसका वर्द्धमान नाम बहुत ठीक है क्योंकि इसमें रूप और धन दोनों की वृद्धि है। (हंसकर) परन्तु हमारा अभिलाषा भी वर्द्धमान हो तो हम जानें (चारों ओर देखकर) वाह, यह उद्यान भी कैसा मनोहर है, इसके सब वृक्ष कैसे फले फूले हैं और यह सरोवर कैसे निर्मल जल से भरा हुआ है मानो सब वृक्षों ने अपने अनेक रंग के फूलों की शोभा देखने को इस उद्यान के बीच में एक सुन्दर आरसी लगा दी है। पक्षी भी कैसे सुन्दर स्वर से बोल रहे हैं मानो पुकारते हैं कि इससे सुन्दर संसार में और कोई उद्यान नहीं है। आहा, कैसा मनोहर स्थान है। हम इस बकुल के कुंज में थोड़ा विश्राम करेंगे। (बैठता है) अहा, शरीर कैसा शीतल हो गया। निश्चय यह पौन (सांस लेकर) हमारी प्राणप्यारी त्रिभुवनमोहिनी विद्या का अंग स्पर्श करके आता है, नहीं तो ऐसी मधुर सुगंध इसमें न होती। (कुछ सोचकर) यह तो सब ठीक है परन्तु जिस काम के हेतु मैं यहाँ आया हूं उसका तो कुछ सोच ही नहीं किया। यहाँ मैं किसी को जानता भी नहीं कि उससे कुछ उपाय पूछूं क्योंकि मैं तो यहां छिपकर आया हूं। (चिन्ता नाट्य करता है)
एक चौकीदार आता है
चौकीदार : (स्वगत) ई के हौ भाई, कोई परदेसी जान पड़îला। हमहन के कुछ घूस फूस देई की नाहीं। भला देखी तो सही (प्रकाश) कौन है।
सुंदर : हम एक परदेशी हैं।
चौ. : सो क्या हमें नहीं सूझता पर कहां रहते हौ।
सुं. : हमारा घर दक्षिण है।
चौ. : दक्षिण तो जमराज के घर तक सभी है। तुम किस दक्षिण में रहते हो।
सुं. : सो नहीं, हमारा घर इतनी दूर नहीं है।
चौ. : तो फिर कहते क्यों नहीं कि तुम्हारा घर कहां है।
सुं. : कांचीपुर।
चौ. : काशी कांची जो सुनते हैं सोई कांची!
सुं. : काशी दूसरा नगर है कांची दूसरा। काशी कांची एक ही कैसी।
चौ. : तो फिर यहां क्यों आए हौ।
सुं. : यहां विद्याप्राप्ति के अर्थ आए हैं।
चौ. : कौन विद्या।
सुं. : जो विद्या सब में प्रधान है।
चौ. : सब में प्रधान विद्या! सब में प्रधान विद्या तो चोरी है।
सुं. : (मुसक्याकर) तुम्हारे यहां यही विद्या प्रधान होगी।
चौ. : (सोंटा उठाकर पैंतरे से चलता हुआ) हां रे, यही तो हमारा काम है कि जो जिस विद्या के पंडित हों उन्हें हम वैसा पुरस्कार दें।
सुं. : क्या पुरस्कार देता है।
चौ. : इस विद्या के पुरस्कार हेतु एक यंत्र बना है जिसका नाम काठतुडुम है और चोर शत्रु है।
सुं. : कैसा है।
चौ. : दो बड़े बड़े काठ एकत्र करके चोर भाई का पांव उसके भीतर डाल देते हैं। (सुन्दर का दाहिना पैर बल से खींचकर अपनी दोनों जांघ में रखकर दबाता है) अब जब तक हमरी पूजा न दोगे तब तक न छूटोगे।
सुं. : (चौकीदार को बलपूर्वक लात मारता है और चौकीदार पृथ्वी पर गिरता है) लो तुम्हारी यही पूजा है।
चौ. : (उठ कर) हां हां बचा, अभी तुमको दूसरा पुरस्कार नहीं दिया। चार पांच कोड़े तुम्हारी पीठ पर लगे तब जानो।
सुं. : बस अब बहुत भई, मुंह सम्हाल के बोलो नहीं तो एक मुक्का ऐसा मारूंगा कि पृथ्वी पर लोटने लगोगे और दक्षिण दिशा में यमराज के घर की ओर गमन करोगे। जिसके हेतु तुम इतना उपद्रव करते हौ सो मैं जानता हूँ परंतु धमकी दिखाने से तो मैं एक कौड़ी भी न दूंगा और तुमको भी परदेशियों से झगड़ा करना उचित नहीं है। (कुछ देता है) इसे लो और अपने घर चल दो।
चौ. : (आनन्द से लेकर) नहीं नहीं, हमने आपको जाना नहीं निस्संदेह आप बड़े योग्य पुरुष हैं हम आशीर्वाद देते हैं कि आप अनेक विद्या लाभ करें, राजकुमारी विद्या भी आपको मिले। (हंसता हुआ जाता है)
सुं. : आज बहुत बचे नहीं तो यह दुष्ट बहुत कुछ दुख देता। जिस काम को चलो पहले अनेक प्रकार के बिघ्न होते हैं। देखैं अब क्या होता है। (पेड़ के नीचे बैठ जाता है। हीरा मालिन आती है)
ही. मा. : (आश्चर्य से) अरे यह कौन है। हाय हाय ऐसा सुन्दर रूप तो न कभी आंखों से देखा न कानो सुना। इसकी दोनों हाथ से बलैया लेने को जी चाहता है। लोग सच कहते हैं कि चन्द्रमा को सिंगार न चाहिए। हमको जान पड़ता है कि चन्द्रमा ही पृथ्वी पर उतर के बैठा है। क्या कामदेव इस रूप की बराबरी कर सकता है। ऐसी कौन स्त्री है जो इसको देख के धीरज धरेगा। हम सोचते हैं कि यह कोई परदेशी है क्योंकि इस नगर में ऐसा कोई नहीं है जिसको हीरा मालिन न जानती हो। हाय हाय इसके मां बाप का कलेजा पत्थर का है कि ऐसे सुकुमार सुन्दर पुरुष को घर से निकलने दिया। निश्चय इसको स्त्री नहीं है नहीं तो ऐसे पति को कभी न छोड़ती। जो कुछ हो एक बेर इससे पूछना तो अवश्य चाहिए। (पास जाकर हंसती हुई) क्यों जी तुम कौन हौ। हमको तो कोई परदेशी जान पड़ते हौ।
सुं. : (स्वगत) अब यह कौन आई। (प्रकाश) हमारा घर दक्षिण है और विद्या को खोजते खोजते यहां तक आए हैं।
ही. मा. : उतरे कहां हौ।
सुं. : अभी कहां उतरे हैं क्योंकि हम इस नगर में किसी को नहीं जानते। इसी हेतु अब तक उतरने का निश्चय नहीं किया और इसी वृक्ष की ठंडी छाया में विश्राम करते हैं और सोचते हैं कि अब कौन उपाय करैं। तुम कौन हौ।
ही. मा. : हम राजा के यहां की मालिन हैं, हमारा नाम हीरा है। हमारा घर यहां से बहुत पास है। भैया, हमारा दुख कुछ न पूछो। (पास बैठ जाती है) हमारे दोनों कुल में कोई नहीं है, जमराज सबको तो ले गए पर न जाने हमको क्यों भूल गए। (लम्बी सांस लेती है) पर रानी और राजकुमारी हम पर बड़ी दया रखती हैं और उन्हीं के पास जाकर हम अपना जी बहलाती हैं। अभी तो आपने अपने रहने का निश्चय कहीं नहीं किया है। (रुक कर) हमें कहने में लाज लगती है क्योंकि हमारे यहां बड़ी-बड़ी अटारी तो है नहीं केवल एक झोंपड़ी है जो आप दुःखिनी जान कर हमसे बचना न चाहिए तो चलिए हम सेवा में सब भांति लगी रहैंगी।
सुं. : (स्वगत) तो इसमें हमारी क्या हानि, जो रहने का टिकाना होगा तो काम का भी ठिकाना हो रहेगा क्योंकि यह रात दिन रनिवास में आती जाती है इससे वहाँ के सब समाचार मिलते रहेंगे और ऐसे कामों में जहां अच्छा बिचवई मिला तहां उसके सिद्ध होने में विलंब नहीं होता। (प्रकाश) अब इससे बढ़कर हमारा क्या उपकार होगा कि इस परदेश में हमको आप से आप रहने को घर मिलै। तुमने हम पर बड़ी कृपा की। आज से तुम हमारी मौसी और हम तुम्हारे भांजे हुए।
ही. मा. : यह हमारे भाग्य की बात है कि आप कैसे कहते हौ और यों तो आप हमारे बाप के भी अन्नदाता हौ। दया करके जो चाहो पुकारो। तौ हम आज से तुमको बेटा कहेंगे। (स्वगत) हाय हाय, इसका मुख कैसा सूख गया है। (प्रकाश) तो अब बेटा अपने घर चलो, हमारा जो कुछ है सो सब तुम्हारा है।
सुं. : हां चलो।
जवनिका गिरती है



तीसरा गर्भांक




सुंदर और हीरा मालिन आती है
सुं. : रनिवास का समाचार सब मैंने सुना। तो मौसी राजा को क्या केवल एक ही कन्या है।
ही. मा. : हां बेटा केवल एक ही कन्या है पर वह कुछ सामान्य कन्या नहीं है मानो कोई देवता की कन्या श्राप से पृथ्वी पर जनमी है और राजा रानी दोनों उसको वैसा प्यार भी करते हैं। घर में सब से विशेष उनको वही प्यारी है। यहां तक कि उसको प्राण से भी अधिक समझते हैं।
सुं. : भला मौसी वह राजकन्या कैसी है।
ही. मा. : बेटा उसकी कथा कोई एक मुंह से नहीं कह सकता। (गाती है)
राग सोरठा तिताला कहौ यह वैसे बरनै रूप।
नख सिख लौं सब ही बिधि सुंदर सोभा अति ही अनूप । 1 ।
नैन धरे को कौन सुफल जो नैन न देख्यौ वाहि।
कोटि चंदहू लाज करत है तनिक बिलोकत जाहि । 2 ।
घुंघरारे सटकारै कारैं बिथुरे सुथरे केस।
एड़ी लौं लांबे अति सोभित नव जलधर के भेस । 3 ।
लचकीली कटि अति ही पातरी चालत झोंका खाय।
अति सुकुमार सकल अंग वाके कवि सो नहिं कहि जाय । 4 ।
दिन दिन जोबन बढ़त उमंग अति पूरि रहे सब गात।
लाज भरी चितवन चित चोरति जब मुसुकाई जंभात । 5 ।
तरुनाई अंगराई अंग अंग नैन रहत ललचाय।
मनु जग जुवजन जीतन एकहित बिधिना रची बनाय । 6 ।
सुं. : हां मौसी यह सब बात तो हम जानते हैं पर हम चाहते हैं कि एक बेर राजसभा में जाकर विद्या के विद्या की परीक्षा करैं। जो जीत गए तो काम सिद्ध भया और जो हार गए तो कुछ लाज नहीं क्योंकि हमें इस नगर में कोई पहिचानता नहीं। भला एक दिन मौसी हमारे हाथ की गूँथी माला तू वहां ले जा सकती है।
ही. मा. : (हंसकर) वाह बेटा तुम क्या माला बनाने भी जानते हौ। तुम लोगों का तो यह काम नहीं है। क्या माला गूंथ कर राजकन्या के गले के हार हुआ चाहते हौ।
सुं. : नहीं मौसी हम केवल एक ही माला गूंथना जानते हैं जिसे तुम देख लेना जो अच्छी बने तो राजकन्या के पास ले जाना।
ही. मा. : (हंसकर) अच्छा, कल तुम माला गूंथना देखें कैसी बनती है। अब रात बहुत गई उठो और कुछ भोजन करके सो रहो।
जवनिका गिरती है।



चौथा गर्भांक


विद्या बैठी हुई है डाली हाथ में लिए हीरा मालिन आती है।
ही. मा. : (हंसकर) राजकुमारी कहां हैं (सामने देखकर) अहा यहां बैठी हैं। आज मुझको इस माला के गूंथने में बड़ी देर लगी इससे मैं दौड़ी आती हूं। यह माला लीजिए और आज का अपराध क्षमा कीजिए।
वि. : चल बहुत बातें न बना। जो रात भर चैन करेगी तो सबेरे जल्दी कैसे आ सकेगी। तेरा शरीर बूढ़ा हो गया है पर चित्त अभी बारही बरस का है। इतना दिन चढ़ गया अब तक मैंने पूजा नहीं किया। पर तुझे क्या। तू तो अपने रंग में रंग रही है। मेरी पूजा हो या न हो।
ही. मा. : वाह वाह बाल पके दांत टूटे पर अभी हम बारही बरस की बनी है। आप धन्य हैं, हमने तो आज बड़े परिश्रम से माला गूंथी कि राजकुमारी उसको देख कर अत्यन्त प्रसन्न होंगी। उसके बदले आपने हमको गाली दिया। सच्च है अभागे को कहीं भी सुख नहीं है। अब हमने अपना कान पकड़ा। अब की बार क्षमा कीजिए ऐसा अपराध फिर कभी न होगा। यह माला लीजिए।
वि. : (माला हाथ में लेती है) अभी आज तो माला बड़ी सुन्दर है। (पत्ते की पुड़िया में फूल के धनुषबाण देखकर) क्यों रे, इसमें यह फूल के धनुषबाण कहां से आए क्या तू हम से ठिठोली करती है। सच्च बतला यह माला किसने बनाई है।
ही. मा. : मेरे बिना कौन बनावेगा।
वि. : नहीं नहीं तू नित्य ही बनाती थी पर ऐसी माला तो किसी दिन नहीं बनी। आज निश्चय किसी दूसरे ने बनाई है।
ही. मा. : मैं तो एक बेर कह चुकी कि हमारे घर में दस बीस देवर जेठ तो बैठे नहीं हैं कि बना देंगे। (आकाश देखकर) अब सांझ होती है हमको आज्ञा दो!
वि. : वाह वाह आज तो आप मारे अभिमान के फूली जाती हैं। ऐसा घर पर कौन बैठा है जिसके हेतु इतनी घबड़ाती हैं। बैठ तुझे मेरी सौगन्ध है। बता यह माला किसने बनाई है। (मालिन का अंचरा पकड़ के खींचती है।)
ही. मा. : नहीं भाई नहीं, मैं कुछ न कहूंगी। जड़ काट के पल्लव सींचने से क्या होगा। बैठ बैठाये दुःख कौन मोल ले क्योंकि प्रीत करनी तो सहज है पर निबाहना कठिन है, इस हेतु इससे दूर ही रहना उचित है।
वि. : वाह वाह तू बड़ा हठ करती है। एक छोटी सी बात मैंने पूछी सो नहीं बताती। क्या मुझसे छिपाने की कोई बात है जो नहीं बतलाती।
ही. मा. : मैं तो तुम्हारे लिये प्राण देती हूं और भगवान से नित्य मनाती हूं कि हमारी राजकुमारी को सुन्दर वर मिले जिसे देख के मैं अपनी आँख ठंडी करूं और आप उसके बदले मुझ पर क्रोध करती हो। इसी के जतन में तो मैं रात दिन लगी रहती हूं।
वि. : तो खुलकर क्यों नहीं कहती। आधी बात कहती है आधी नहीं कहती व्यर्थ देर करती है।
ही. मा. : सुनिए दक्षिण देश के कांचीपुर के गुणसिन्धु राजा का नाम आपने सुना ही होगा। उसका पुत्र सुन्दर जिसे ले आने के हेतु राजा ने गंगा भाट को भेजा था यहां आप से आप आया है।
वि. : (घबड़ाकर) कहां कहां? (फिर कुछ लज्जित होकर) नहीं क्या वह सचमुच यहां आया है।
ही. मा. : (हंसकर) मैं उसको बड़े यत्न से लाई हूं क्योंकि मैं सर्वदा खोजा करती थी कि मेरी बेटी को दूल्हा चाँद का टुकड़ा मिले तो मैं सुखी होऊं। सो मैने कहीं से खोजकर उसे अपने घर में रक्खा है पर यहां तो वही दशा है जाके हित चोरी करो वही बनावै चोर।
वि. : तो फिर वे छिप के क्यों आए हैं।
ही. मा. : आपकी प्रतिज्ञा तो संसार में सब पर विदित ही है सो प्रत्यक्ष वाद करने में जो कोई हारे तो प्रेम भंग होय और परस्पर संकोच लगै, इस हेतु छिप के आए हैं।
वि. : उनका रूप कैसा है।
ही. मा. : उनका रूप वर्णन के बाहर है।
(गाती है, राग-बिहाग)।
कहै को चन्द बदन की शोभा।
जाको देखत नगर नारि कों सहजहि तें मन लोभा ।
मनु चन्दा आकास छोड़ि कै भूमि लखन कों आयो।
कैघौं काम बाम के कारन अपुनो रूप छिपायो ।
भौंह कमान कटाक्ष बान से अलक भ्रमर घुंघुरारे।
देखत ही बेधत हैं मन मृग नहिं बचि सकत बिचारे ।
वि. : तो भला उनको एक बेर किसी उपाय से देख भी सकती हैं?
ही. मा. : वाह वाह यह तुमने अच्छी कही। पहिले राजा रानी से कहैं वह देख सुन के जांच लें तो पीछे तुम देखना।
वि. : नहीं, ऐसा न होने पावे, पहिले मैं देख लूं तब और कोई देखै।
ही. मा. : मैं कैसे पहिले तुम्हें दिखला दूं, यह राजा का घर है चारों ओर चैकी पहरा रहता है यहां मक्खी तो आही नहीं सकती भला वह कैसे आ सकते हैं जो कोई जान जायगा तो क्या होगा?
वि. : सो मैं कुछ नहीं जानती जैसे चाहो वैसे एक बेर मुझ को उन का दर्शन करा दो। तू आप चतुर है कोई न कोई उपाय सोच लेना और जो तू मेरा मनोरथ पूरा करैगी तो मैं भी तेरा मनोरथ पूरा कर दूंगी।
ही. मा. : यह तो मैं भी समझती हूं पर मैं सोचती हूं कि किस रीति से उसे ले आऊं, हां एक उपाय यह तो है कि वह इस वृक्ष के नीचे ठहरैं और तुम अपनी अटारी पर से देख लो।
वि. : हां ठीक है, यह उपाय बहुत अच्छा है। पर अब आज या कल?
ही. मा. : कल उन को लाऊंगी (हंस कर) एक बात मैं कह देती हूं कि उन को एक बेर देख के फिर भूल न जाना।
वि. : भूल जाऊंगी-हाय!
(गाती है-ठुमरी)
मेरे तन बाढ़ी बिरहपीर अब नहिं सहि जाई हो।
अब कोउ उपाय मोहि नहिं लखाय,
दुख कासों कहौं कछु कहि जाय,
मन हीं विरह की अगिनि बरै धूआं न दिखाई हो ।
दईमारी लाज बैरिन सी आज, कहो आवत मेरे कौन काज, पिय
बिन मेरा जियरा तड़पै, कछु नाहिं बसाई हो ।
(राग बिहाग)
चढ़ावत मो पैं काम कमान।
बेधत है जिय मारि गारि कै तानि श्रवन लगि बान ।
पिया बिना निसिदिन डरपावत मोहि अकेली जान।
तुमरे बिनु को धीर धरावै पीतम चतुर सुजान । 1 ।
ही. मा. : (हंस कर) वाह वाह यह अनुराग हम नहीं जानती थीं।
(गाती है-राग-कलिंगड़ा)
अहो तुम सोच करो मति प्यारी।
तुम्हरो प्रीतम तुमहिं मिलै हैं करि अनेक उपचारी ।
अति कुम्हिलाने कमल बदन कों प्रफुल्लित करि हौं वारी।
चंदहि जौ चाहै तौ लाऊं यह तो बात कहारी ।
वि. : तो मैं आज छत पर उसकी आशा देखूंगी।


जवनिका गिरती है।
। प्रथम अंक समाप्त हुआ ।


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