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आलोचना

अज्ञेय का प्रकृति काव्य
ब्रजेंद्र त्रिपाठी


अज्ञेय की काव्य विशेषताओं को अगर हम गिनाना चाहें तो पाते हैं कि उनकी कविताओं में आवेग की जगह सर्जनात्मकता, खरी अनुभूति, लोक-संस्कृति, एक तरह की रहस्यात्मकता, मौन और सन्नाटा तथा विराट तथा साधारण का मेल दिखाई पड़ता है। अज्ञेय की काव्य भाषा में निरंतर एक उदासीनता दिखाई पड़ती है। उनकी आरंभिक कविताओं की तुलना बाद की कविताओं से करें तो पाएँगे कि उनकी काव्य भाषा धीरे-धीरे सर्जनात्मक और अनुभूति प्रवण होती गई है। उनका बिंब विधान भी अत्यंत संश्लिष्ट और सक्षम है। भाषा को लेकर अज्ञेय अत्यंत सजग हैं।

अज्ञेय में शुरू से ही प्रकृति के प्रति गहरा लगाव रहा है। अपनी 'आत्मकथा' में अज्ञेय ने लिखा है - 'दुनिया में इतना कुछ देखने को पड़ा है : क्षण-क्षण परिवर्तित प्रकृति वेश जिसे उसने आँख भर देखा। इसे देखने से उसको इतना अवकाश कहाँ कि वह निगाह अपनी ओर मोड़े। वह तो जितना कुछ देखता है उससे भी आगे बढ़ने की विवशता में देता है मन को दिलासा, पुनः आऊँगा - भले ही बरस दिन अनगिनत युगों के बाद।'

अज्ञेय का जन्म खंडहरों में एक खुदाई शिविर में हुआ था। उनका बचपन भी वनों और पर्वतों में बिखरे हुए पुरातत्वावशेषों के मध्य बीता और इन्हीं के बीच उन्होंने आरंभिक शिक्षा ग्रहण की। इस दौरान वे सदा अपने पुरातत्वज्ञ पिता के साथ-बीच में बाकी परिवार से - माँ और भाइयों से अलग रहते रहे। पिता खुदाई के काम में लगे रहते थे और अज्ञेय अधिकतर अकेले। इस प्रकार वे बचपन से ही एकांत के अभ्यासी हो गए थे। एकांतजीवी होने के कारण देश और काल के आयाम का उनका बोध कुछ अलग ढंग का है। उन्होंने स्वयं लिखा है कि उन्हें और बहुत कम चीजों से इतनी अकुलाहट होती है जितनी लगातार लंबी अरसे तक उनके एकांत में व्याघात पड़ने से। जेल में अपने सहकर्मियों के दिन-रात के अनिवार्य साहचर्य से त्रस्त होकर उन्होंने स्वयं काल कोठरी की माँग की थी और महीनों उसमें रहते रहे। उन दिनों वे घंटों निश्चल बैठे रहते, इतने निश्चल कि चिड़ियाँ उनके कंधों पर बैठ जाएँ या कि गिलहरियाँ उनकी टाँगों पर से फाँदती निकल जाएँ। उन्होंने लिखा है कि बड़ों को उनके निकट आना भले ही कठिन जान पड़े, पशु-पक्षी और बच्चे उनसे बड़ी जल्दी हिल जाते है। पशु उन्होंने गिलहरी के बच्चे से तेंदुए के बच्चे तक पाले हैं। पक्षी बुलबुल से मोर-चकोर तक, बंदी इनमें से दो-चार दिन से अधिक किसी को नहीं रखा। उसकी निश्चलता ही उन्हें आश्वस्त कर देती है। लेकिन गति का उनके लिए दुर्दांत आकर्षण है। ...आकर्षण है एक तरह की ऐसी लय युक्त गति का - जैसे घुड़दौड़ के घोड़े की गति, हिरन की छलाँग या अच्छे तैराक का अंग संचालन या शिकारी पक्षी के झपट्टे की या सागर की लहरों की गति। उनके लेखन में विशेष रूप में यह आकर्षण मुखर है। ...लय युक्त गति के साथ साथ उगने या बढ़ने वाली हर चीज में, उसमें विकास की बारीक से बारीक क्रिया में अज्ञेय को बेहद दिलचस्पी है - वे चीजें छोटी हो या बड़ी चींटी या पक्षी हों या वृक्ष और हाथी, मानव-शिशु हो या नगर और कस्बे का समाज। अज्ञेय नगर के कोलाहल से भागकर प्रकृति में शरण चाहते हैं - कृत्रिमता से मुक्त सहज जीवन के वे आकांक्षी हैं। उनकी एक चर्चित कविता है - 'हरी घास पर क्षण भर'। इसमें वे कहते हैं -

हो प्रकृतस्थ : तनो मत कटी-छँटी उस बाड़ सरीखी,
नमो, खुल खिलो, सहज मिलो
अंतःस्मित, अंत-संयत हरी घास-सी।
क्षण भर भुला सकें हम
नगर की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट
और न मानें उसे पलायन;
क्षण भर देख सकें आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली,
पौधे, लता दोलती, फूल, झरे पत्ते, तितली-भुनगे,
फुनगी पर पूँछ उठाकर
इतराती छोटी सी चिड़िया -
और न सहसा चोर कह उठे मन में -
प्रकृतिवाद है स्खलन
क्योंकि युग जनवादी है। क्षण भर हम न रहें रहकर भी;
सुने गूँज भीतर के सूने सन्नाटे में किसी दूर सागर की लोल लहर की
जिसे सीपी सदा सुना करती है।

इस कविता में प्रकृति के कितने कार्य व्यापार एक साथ प्रतिफलित होते देखते हैं। प्रकृति, पशु और मनुष्य का सहज साहचर्य और संगति भी यहाँ सुस्पष्ट दिखती है -

क्षणभर अनायास हम याद करें
तिरती नाव नदी में,
धूल भरे पथ पर आषाढ़ की भभक, झील में साथ तैरना,
हँसी अकारण खड़े महा-वट की छाया में,
बदन घाम से लाल, स्वेद से जमी अलट-लट,
चीड़ों का वन, साथ-साथ दुलकी चलते दो घोड़े,
गीली हवा नदी की, फूले नथुने, भर्राई सीटी स्टीमर की
खंडहर, गुथित उँगलियाँ, बाँसे का मधु,
डाकिए के पैरों की चाप
अधजाती बबूल की धूल मिली-सी गंध
झरा रेशम शिरीष का, कविता के पद
मस्जिद के गुंबद के पीछे सूर्य डूबता धीरे-धीरे
झरने के चमकीले पत्थर, मोर-मोरनी, घुँघरू
संथाली झमुर का लंबा कसक-भरा आलाप
रेत का आह की तरह धीरे-धीरे खिंचना, लहरें,
आँधी - पानी,
नदी किनारे की रेती पर बित्ते भर की छाँह झाड़ की
अंगुल-अंगुल नाप नाप कर तोड़े तिनकों का समूह,
लू,
मौन।

एक पूरी चित्र-श्रृंखला या कोलाज बनाते है अज्ञेय - जिसमें पशु, पक्षी, मनुष्य, प्रकृति और तमाम चीजें शामिल हैं और इसके माध्यम से वे हमें मुक्ति और सीमाहीन खुलेपन के बोध की तरफ ले जाते हैं।

अज्ञेय को पहाड़ भी उतना ही प्रिय है, जितना सागर। शांत सागर-तल उन्हें विशेष नहीं मोहता, चट्टानों पर लहरों का घात-प्रतिघात ही उन्हें मुग्ध करता है। उन्होंने एक जगह लिखा है कि वे हिमालय के पास भी रहना चाहते हैं, पर सागर के गर्जन से दूर भी नहीं रहना चाहते।

अज्ञेय में अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्यानुभूति है। उनमें छायावादी प्रकृति काव्य की सभी विशेषताएँ, चाहे वह ऐंद्रिय बोध हो, सांगीतिक सूक्ष्मता हो, विशेषण विपर्यय हो या गहन संवेदनशीलता अधिक विकसित रूप में मिलती हैं। उनमें निराला की शब्द चेतना और सांगीतिक स्वरबोध तथा पंत का रंगबोध, गंधबोध, ध्वनिबोध एक साथ हम पा सकते हैं।

'बावरा अहेरी' की ये पंक्तियाँ देखें :-

झर झर झर
अप्रतिहत स्वर
जीवन की गति आती-जाती
झर
नदी कुल के चल-नरसल
झट उमड़ा हुआ नदी का जल
ज्यों क्वाँरेपन की केंचुल में
यौवन की गति उद्दाम प्रबल...

अज्ञेय का वस्तुओं का प्रेक्षण और प्रकृति पर्यवेक्षण अत्यंत सूक्ष्म और तीक्ष्ण है। आकृति, ध्वनि, गंध और रंगों की काव्य में ऐसी पकड़ और उनकी प्रस्तुति बहुत कम कवियों में दिखाई पड़ती हैं।

एक चित्र देखें :

सूप-सूप भर धूप कनक
यह सूने नभ में गई बिखर
चौंधाया बीन रहा है
उसे अकेला एक कुरर।

अज्ञेय की कविताओं में संवेदना की अतल गहराई मिलती है। उनकी संवेदना समस्त प्रकृति में लय होती चलती है। इसीलिए वह लिखते हैं,

मैं सोते के साथ बहता हूँ
पक्षी के साथ गाता हूँ
वृक्षों के कोंपलों साथ थरथराता हूँ
और उसी अदृश्य क्रम में, भीतर ही भीतर
नए प्राण पाता हूँ।

वह प्रकृति के संसर्ग में ही अपने 'स्व' को पहचानते हैं, क्योंकि वह स्व उसी प्रकृति का अंश है, जिसके संसर्ग में आकर वह अपनी पहचान पाते हैं। रमेश चंद्र शाह ने 'अज्ञेय' विनिबंध में ऐसी कविताओं के उदाहरण दिए हैं, जहाँ प्रकृति एक उच्चतर नैतिक बोध के ज्वलंत दृष्टांत की तरह आती है। 'इत्यलम' संग्रह के बाद की कविताओं में अज्ञेय में प्रकृति-निरीक्षण सूक्ष्मतर हुआ है।

'कतकी पूतों' की पंक्तियाँ -

पकी ज्वार से निकल शसों कि जोड़ी गई फँलागती।
सन्नाटे में बाँक नदी की जगी चमक कर झाँकती।।

उनके इस सूक्ष्म निरीक्षण की गवाह हैं। अज्ञेय की पावस प्रातः 'शिलाङ' और 'दूर्वाचल' जैसी कविताओं में अभिव्यक्ति की तीक्ष्णता, भाव सघनता और जीवंत बिंबों को देखा जा सकता है। यहाँ 12 जुलाई 1947 को लिखी गई उनकी 'पावस-प्रात, शिलाङ कविता पढ़ना समीचीन होगा -

भोर बेला, सिंची छत से ओस की टिप-टिप्। पहाड़ी काक
की विजन को पकड़ती-सी क्लोत बेसुर डाक -
'हाक्! हाक्! हाक!'
मत सँजो यह स्निग्ध सपनों का अलस सोना -
रहेगी बस एक मुट्ठी खाक्!
'धाक्! धाक्! धाक्!

यह कविता अज्ञेय की लयात्मक संवेदना के वैशिष्ट्य को सूचित करती है।

अज्ञेय के प्रकृति काव्य के बारे में रमेश चंद्र शाह की टिप्पणी है - '...पंत के बाद शायद ही किसी कवि का प्रकृति संवेदन इतना प्रगाढ़, इतना भरा-पूरा और फिर भी इतने जोखिम से निखरा हुआ हो, जितना अज्ञेय का।' एलियट के साथ अज्ञेय की तुलना करते हुए शाह ने लिखा है, '...एलियट के विपरीत अज्ञेय का संबंध प्रकृति के साथ अधिक सहज और घनिष्ठ है और पर पक्ष उनकी रचनाओं में ही नहीं, चिंतन के स्तर पर भी बराबर अभिव्यक्त होता रहा है।'

अज्ञेय रोजमर्रा की जिंदगी से, लोक जीवन से और प्रकृति से बिल्कुल अनछुए और टटके बिंब लेते है और उनके माध्यम से हमारे भीतर एक अंतःयथार्थ का बोध जगाते हैं। वे जीवन के इर्द-गिर्द फैले सौंदर्य संसार में गहरी रुचि लेती हैं। पंडित विद्यानिवास मिश्र ने लिखा है, 'भाई के लिए प्रकृति न तो शौक थी न पलायन। प्रकृति उनकी जिंदगी का एक हिस्सा थी। वे फूलों को सजाने की वस्तु नहीं मानते थे। वे उनमें रहना चाहते थे और उनकी जीवन-यात्रा में कुटुंबी की तरह रचना-बसना चाहते थे।'

अज्ञेय की प्रकृति संबंधी कविताओं को जब उनके पहले की प्रकृति संबंधी कविताओं के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं तो दोनों में बुनियादी फर्क देखने को मिलता है। अज्ञेय ...प्रकृति का एकाग्र वर्णन नहीं है। वहाँ हम प्रकृति और व्यक्ति के संबंधों को एक तारतम्य में देखने की कोशिश हैं। यह संबंध छायावादी कविता के प्रकृति और मनुष्य के अमूर्त और रहस्यमय संबंध जैसा भी नहीं है। अज्ञेय के यहाँ छायावादी भावबोध से परे का निरंतर प्रयास है। अज्ञेय का प्रकृति से गहरा और व्यापक परिचय है जो उन्हें अपने विविधतापूर्ण जीवन से मिला। अपनी कविताओं में वे प्रकृति को नए तथ्य और ज्ञान के आलोक में प्रस्तुत करते हैं, एक नई वैज्ञानिक दृष्टि के साथ। उनकी प्रकृति कविता सौंदर्य बोध के नए मानक गढ़ती है। नंद दुलारे बाजपेयी ने लिखा है, 'अज्ञेय की नई काव्य सृष्टि में दो-तीन बातें हमारा ध्यान विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। एक है, इस काव्य -सृष्टि में प्रकृति की गतियों, रूपों और मुद्राओं का साफ अंकन। यद्यपि ये रूप, गतियाँ और मुद्राएँ लेखक को आंतरिक भावना से संपृक्त हैं, पर उनमें यथार्थ का पक्ष भी पूरी तरह भास्कर होता है।'

अज्ञेय के लिए कविता फोटोग्राफी नहीं है, इसलिए उनके यहाँ प्रकृति के तटस्थ, निर्लिप्त दृश्यचित्र कम हैं। प्रकृति के संसर्ग में कवि में संवेदना का विस्तार होता है और जीवन के नए अर्थ उद्घाटित होते हैं। वह कविता में प्रकृति को बरतते हुए उसे एक नई अर्थवत्ता देते हैं।

अज्ञेय की कविता में प्रकृति के सुंदर प्रभाव चित्र देखा जा सकते हैं। प्रकृति से वे प्रतीकों को ग्रहण करते हैं जो एक जीवन दर्शन सामने रखते हैं। उनके यहाँ प्रकृति के शांत-सौम्य रूप अधिक मुखर हैं जो उनके परिवेश से गहरे जुड़े हुए हैं। अज्ञेय तक आकर कवि का रिश्ता प्रकृति से वही नहीं रहता जो पहले था। एक मानवीय दृष्टि का विकास उनकी कविता में देखने को मिलता है। अब प्रकृति काव्य का आलंबन न रहकर उद्दीपन होती जाती है और उसका फलक भी व्यापक होता जाता है। इसे उनकी एक छोटी सी कविता 'खुल गई नाव' में देखा जा सकता है।

खुल गई नाव
घिर आई संध्या, सूरज डूबा सागर तीरे धुँधले पड़ने से जल-पंछी
भर धीरज से मूक लगे मँडलाने,
सूना तारा उगा, चमक कर, साथी लगा बुलाने।
तब फिर सिहरी हवा, लहरियाँ काँपी,
तक फिर मूर्छित व्यथा विदा की जागी धीरे-धीरे।

ढलती शाम के साथ विदा की मूर्छित व्यथा का धीरे-धीरे जागना - प्रकृति और व्यक्ति के संबंधों को एक नई दीप्ति से उद्भासित करता है। प्रकृति के विविध चित्रों के साथ मानवीय भावनाओं के संगुफन की कला में अज्ञेय माहिर हैं। प्रकृति तो मात्र बहाना है, उसके माध्यम से व्यक्ति - मन में जो घर रहा है, या जो संकेतित है, वही महत्वपूर्ण है। वैकल्पिक अनुभव की तीव्रता प्रकृति के रूप को स्पष्ट करती है। एक द्वंद्वात्मक संबंध जीवन और प्रकृति में है। अज्ञेय की कविता 'तुम कदाचित् न भी जानो' में इस रिश्ते की पहचान की जा सकती है -

मंजरी की गंध भारी हो गई है
अलस है गुंजार भौंरे की - अलस और उदास।
क्लांत पिक रह-रह तड़प कर कूकता है। जा रहा मधु-मास।
मुस्कराते रूप।
तुम कदाचित न भी जानो - यह विदा है।
ओस-मधुकण : वस्त्र सारे सीझ कर श्लथ हो गए हैं।
रात के सहमें चिहुँकते बाल-खग अब निडर हो चुप हो गए हैं।
अटपटी लाली उषा की हुई प्रगल्भ, विभोर।
उमड़ती है लौ दिए की, जा रहा है भोर।
ओ विहँसते रूप।
तुम कदाचित् न भी जानो - यह विदा है।

अज्ञेय प्रकृति को जीवन के तनावों और संघर्षों के साथ रखकर देखते हैं। डॉ. राम विलास शर्मा ने उनकी प्रकृति-चित्रण के बारे में लिखा है, 'अज्ञेय का प्रकृति से वह रागात्मक संबंध है जो उनके काव्य की श्रेष्ठ उपलब्धि है। प्रकृति-प्रेम अज्ञेय में नैसर्गिक है, खेतों-खलिहानों से दूर साधारणतः उनका मन ऐसे प्राकृतिक दृश्यों में रमता है जो सामान्य हिंदी पाठक के लिए असाधारण होते हैं। शब्दों और उपमानों की तरह वह इस तरह के दृश्य भी काफी अनुसंधान के बाद प्राप्त करते हैं।'

अज्ञेय बहुत बार अपनी संवेदना को सृष्टि - रचना के साथ संयुक्त करके चलते हैं। जीवन को वह इस तरह देखते है जैसे सागर में एक मछली हो। वह अंतहीन काव्य के फलक पर एक चित्र टाँक कर उसे व्यक्त करना चाहते है। उनके भीतर ही समस्त सृष्टि जग जाती है। जो कुछ है, भीतर ही है। हरी भरी धरती, विशाल आकाश, रंग फूल और कोंपले - यही सब तो सृष्टि है। सृष्टि की सत्ता अलग-अलग नहीं है। ...कवि ने जीवन की अनुभूति को प्रकृति से जोड़ दिया है। सुख और दुख की अनुभूतियाँ प्रकृति-व्यापारों से जुड़ जाती हैं। प्रकृति की हलचलों के मध्य मनुष्य ने अपना एक संसार बसा लिया हैं, जहाँ प्रकृति और भौतिक जीवन के बीच निरंतर आवाजाही है।

एक कविता में कवि धूप से गर्मी, चिड़िया से मिठास, घास की पत्ती से हरियाली और किरणों से उजास माँगता है। हवा से खुलापन और एक साँस, लहर से उल्लास और आकाश से एक झपकती पलक भर असीमता। वह प्रकृति से इस सब चीजों को पाता है और यही जीवन है -

सबसे उधार माँगा, सबने दिया
यों मैं जिया और जीता हूँ
क्यों कि यह सब तो जीवन है -
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गंधवाही मुक्त खुलापन,

जब हम अज्ञेय के प्रकृति काव्य पर विचार कर रहे हैं तो स्वयं अज्ञेय प्रकृति काव्य तथा काव्य-प्रकृति के बारे में क्या सोचते थे, यह जानना भी महत्वपूर्ण होगा। उन्होंने 'रूपांबरा' की भूमिका में लिखा है, '...प्रकृति वर्णन का वृत्त कालिदास में समय से पूरा घूम गया है। कालिदास 'प्रकृति के चौखटे में मानवी भावनाओं का चित्रण करते थे; आज का कवि 'समकालीन मानवीय संवेदना के चौखटे में प्रकृति' को बैठाता है। और क्योंकि समकालीन मानवीय संवेदना बहुत दूर तक विज्ञान की आधुनिक प्रवृत्ति से मर्यादित हुई है, इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि आज का कवि प्रकृति को विज्ञान की अधुनातन अवस्था के चौखटे में प्रकृति को बैठाता है। ऋत का स्थान वैज्ञानिक शोध ने ले लिया है, किंतु ऋत सनातन और आत्यंतिक था, वैज्ञानिक शोध के दिनमान बदते रहे, फलतः 'प्रकृति का सान्निध्य' नए कवि को पहले का सा आश्वस्त भाव नहीं देता, उसकी आस्थाओं को पुष्ट नहीं करता - इसके लिए वह नए प्रतीकों की खोज करता है।'

जाहिर है जब यह वक्तव्य अज्ञेय दे रहे होंगे जो उनकी खुद की कविताएँ भी उनके समक्ष होंगी। वह मानते हैं कि एक विशिष्ट अर्थ में छायावाद का प्रकृति काव्य अपनी सीमाओं के बावजूद अंतिम प्रकृति काव्य का अर्थात छायावादोत्तरकाल में प्रकृति काव्य में गुणात्मक परिवर्तन हुआ जिसकी चर्चा उनके वक्तव्य में है। अज्ञेय की काव्य कृतियों पर नजर डालें तो पाएँगे कि आरंभ में प्रकृति से संबंधित उनकी रचनाएँ कम है लेकिन 'हरी घास पर क्षण भर' और 'बावरा अहेरी' में इनकी संख्या अधिक है। प्रकृति संबंधी कविताओं में कुछ तो विशुद्ध दृश्य चित्र हैं, कुछ में प्राकृतिक उपादानों के साथ कवि के भावात्मक संबंधों का रूपायन है और कुछ में प्राकृतिक दृश्यों से आत्मपरक संकेत निकाले गए हैं। 'हरी घास पर क्षण भर' संग्रह में 'दूर्वाचल', 'सो रहा हैं झोंप', 'क्वाँर की बयार', 'कतकी पूतो' आदि प्रकृति से संबंधित रचनाएँ है। 'दूर्वाचल' कविता में प्रकृति के साथ एक मौन संवाद और उसके प्रति एक तीव्र आकर्षण का भाव है। इसमें उपमान नए हैं। मानसिक भावों से प्राकृतिक वस्तुओं की उपमा दी गई है -

'पार्श्व गिरि का नम्र, चीड़ों में
डगर चढ़ती उमंगों-सी
बिछी पैरों में नदी ज्यों दर्द की रेखा।
विहग-शिशु मौन नीड़ों में

'बावरा अहेरी' में 'प्रथम किरण', 'वसंत गीत', 'ये मेघ साहसिक सैलानी', 'शरद साँझ के पंछी', 'तुम फिर आ गए क्वाँर', 'चाँदनी जी लो', 'साँझ दर्शन', 'उषा दर्शन' और अंधड़ प्रकृति संबंधी रचनाएँ हैं। 'चाँदनी जी लो' में जीवन के उल्लास को दर्शाया गया है, जहाँ शरद चाँदनी में मुग्ध में कवि की चेतना चाँदनी की अनुभूति से अभिन्न हो गई है अर्थात, यहाँ दृश्य और दृष्टा एकाकार हो गए हैं :

शरद चाँदनी
बरसी
अँजुरी भर पीलो
ऊँघ रहे हैं तारे

अज्ञेय की बहुत सी कविताओं में प्राकृतिक वस्तुओं को प्रतीकात्मकता प्रदान कर उसमें आत्मचेतना का अंकन किया गया है। उनकी अंधड़ कविता गहन भावावेग के अभिव्यक्ति का प्रतीक बन गई हैं :

रसने दो
आकाश का विदग्ध उर
उमसने दो कसने दो
दुर्निवार मेघ को

'इंद्रधनु रौंदे हुए ये' में 'टेसू','वैशाख की आँधी', 'मलाबार का एक दृश्य' और सूर्यास्त' प्रकृति संबंधी रचनाएँ हैं। अगर अज्ञेय की कविताओं में 'चित्रोपमता' को देखना हो तो इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण 'मलाबार का एक दृश्य' है। विशुद्ध दृश्य शब्दों के माध्यम से सौंदर्य का उद्घाटन :

तालों के जाल
घने, कहीं लदे-छदे
कहीं ठूठ तने; केलों के कुंज
बने, सीसम की मेंड़ बंध
कवरी में खोंस फूल
गुड़हल का सुलगे अंगार सा।

प्रकृति के मामले में अज्ञेय की जितनी रेंज है, उतनी किसी और की नहीं। प्रकृति के इतने विविध रूपों और मानसिक रूपों को संग्रहित कर कविता में ढालने वाला नई कविता का कोई दूसरा कवि दिखाई नहीं पड़ता है। अज्ञेय के यहाँ प्रकृति नाना रूपों में विविध भावों के साथ आती है। उनके यहाँ एक ओर तो प्रकृति के उल्लासपूर्ण और आह्लादप्रद दृश्य हैं तो दूसरी और कारुणिक और गंभीर। उनकी कम ही रचनाएँ होंगी, जहाँ प्रकृति के बाह्य रूप का आलंबनगत चित्रण मिलता हो, अधिकांश में दृश्य की किसी चिदवृत्ति या मनोविकार के साथ उसका संबंध जुड़ा हुआ है। 'अरी ओ करुणा प्रभामय' की 'रात में गाँव', धूप, वसंत, 'पगडंडी', 'नदी तट : एक चित्र' आदि कविताएँ इसी तरह की हैं।

सुनहली धूप के बिखरने के चित्र को अज्ञेय यूँ शब्द देते हैं :

सूप-सूप भर
धूप-कनक
यह सूने नभ में गई विखर
चौंधाया
बीन रहा है
उसे अकेला एक कुरर।

समुद्र, नदी, वन, वृक्ष, पक्षी, रेगिस्तान, सन्नाटा, मौन, दुःख, करुणा जैसी मानवीय अस्तित्व से जुड़ी बुनियादी चीजें अज्ञेय की कविता में बार-बार लौटती है। वस्तुतः उनकी कविता प्रकृति और मनुष्य के शाश्वत संबंधों का पुनराविस्तार करती है।


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