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आलोचना

अज्ञेय की काव्यभाषा संबंधी अवधारणा एवं प्रयोग
अखिलेश शंखधर


आधुनिक हिंदी कविता में अज्ञेय महत्वपूर्ण कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं। अज्ञेय न केवल अपनी कविताओं के कारण प्रसिद्ध हैं वरन् भाषा और साहित्य संबंधी उनका चिंतन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अपनी अंतःप्रक्रियाओं के संकलन 'भवंती', 'अंतरा','शाश्वती' आदि तथा निबंध संकलन 'आत्मनेपद', 'आलवाल', 'लिखि कागद कोरे', 'अद्यतन', 'योग लिखी', 'संवत्सर' तथा भूमिकाओं तारसप्तक, दूसरा सप्तक, तीसरा सप्तक, आदि में उनका भाषा और साहित्य संमंधी चिंतन व्यक्त हुआ है। अज्ञेय लिखते हैं - 'मैं उन व्यक्तियों में से हूँ और ऐसे व्यक्तियों की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है जो भाषा का सम्मान करते हैं और अच्छी भाषा को अपने आप में एक सिद्धि मानते हैं।'1 निस्संदेह अज्ञेय की काव्यभाषा उनके इस कथन का साक्ष्य प्रस्तुत करती है।

अज्ञेय शब्द को सृजन की आधारभूत इकाई मानते हैं - 'कवि भाषा नहीं लिखता शब्द लिखता है, या यों कहना अधिक सही होगा कि भाषा भी लिखता है पर कविता भाषा नहीं शब्द में है।' 2 अज्ञेय काव्यभाषा में शब्द को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।

आचार्य शुक्ल के बाद रचना के केंद्र में पाठक को मानने वालों में अज्ञेय सर्वप्रमुख रचनाकार और आलोचक हैं। अज्ञेय ने अनेकत्र इस सिद्धांत की स्थापना की है कि कवि की खोज अर्थवान् शब्द की खोज है। आत्मनेपद में 'मेरी पहली कविता' शीर्षक में 'नाचत है भूमरी', नाचत है भूमि, री की द्वयर्थता ने सहसा सामान्य कथन को विशिष्ट बना दिया। अज्ञेय लिखते हैं - 'मैंने साधारण वाक्य से असाधारण अर्थ निकान लिया है - मैं आविष्कारक हूँ, स्रष्टा हूँ। मैंने शब्द की शक्ति को पहचान लिया है, पहचान ही नहीं, स्वायत्त कर लिया है'।3 आत्मनेपद, त्रिशंकु और तारसप्तक में उनके प्रारंभिक भाषा संबंधी वक्तव्य काफी सीमा तक प्रतीकवादी कवियों येट्स और इलियट से प्रभावित हैं। मलार्मे का प्रसिद्ध कथन है - कविता विचारों से नहीं शब्दों से होती है। अज्ञेय की भी यही मान्यता है। बल्कि यह कहा जाए कि उनके काव्यभाषा संबंधी चिंतन का यह कथन प्रस्थान-बिंदु है। अज्ञेय का यह चिंतन उनकी कविता 'नया कवि : आत्म-स्वीकार' में द्रष्टव्य है -

किसी की उक्ति में गरिमा थी

मैंने उसे थोड़ा-सा सँवार दिया,

किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था

मैंने दूर हटते हटते उसे धिक्कार दिया।

X X X X X

यों मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ

काव्य-तत्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ?

चाहता हूँ आप मुझे

एक एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ें।

पर प्रतिमा - अरे, वह तो

जैसी आप को रुचे आप स्वयं गढ़ें।4

वस्तुतः कवि की काव्य-तत्व की खोज मूलतः शब्दों की खोज ही है। कवि चाहता है कि शब्दों का इतना सार्थक, समुचित और अर्थवान प्रयोग हो कि पाठक अभिभूत हो जाए। कवि का दायित्व भाषा के प्रति सर्वाधिक होता है। अज्ञेय ने लिखा है - 'विभिन्न कलाओं के जितने माध्यम हैं, भाषा का माध्यम उनमें सबसे अधिक कृत्रिम है। संगीत के सुर होते हैं, उनका अपना एक मूल्य होता है जो गायकी में उनके उपयोग से स्वतंत्र है। इसी प्रकार चित्रकला के रंग या मूर्तिकार के मिट्टी, पत्थर, रत्न आदि अपना स्वतंत्र अस्तित्व और सत्ता रखते हैं। किंतु भाषा एक ऐसा माध्यम है जिसमें आत्यंतिक या स्वतंत्र अस्तित्व रखने वाला कुछ भी नहीं, शब्द का अर्थ एक सर्वदा मानवीय आविष्कार है। इस दृष्टि से भाषा कला के माध्यमों की तुलना में कमजोर माध्यम है।5 हालाँकि इस माध्यम की एक शक्ति यह भी है कि यह लोगों द्वारा प्रयुक्त माध्यम है। लोगों द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इसका प्रयोग कई रूपों में संभव है।

अज्ञेय ने अपने काव्यभाषा संबंधी चिंतन में शब्द और अर्थ के संयोग पर गहराई से विचार किया है और उनकी मान्यता है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। कहने का आशय यह है कि अज्ञेय 'वागर्थ प्रतिपत्ति' में विश्वास रखते हैं। अज्ञेय लिखते हैं - 'जरा भाषा के मूल प्रश्न पर - शब्द और उसके अर्थ के संबंध पर - ध्यान दीजिए। शब्द में अर्थ कहाँ से आता है, क्यों और कैसे बदलता है, अधिक या कम व्यप्ति पाता है। इस प्रकार कवि के सामने हमेशा चमत्कार की सृष्टि की समस्या बनी रहती है - वह शब्दों को निरंतर नया संस्कार देता चलता है और ये संस्कार क्रमशः सार्वजनिक मानस में पैठ कर ऐसे हो जाते हैं कि - उस रूप में - कवि के काम के नहीं रहते।' 6 इस प्रकार अज्ञेय यह मानते हैं कि कवि को हमेशा शब्दों को नए संस्कार देते रहना चाहिए। शब्द का वह ऐसा प्रयोग करे जिससे नए अर्थ का संधान हो सके। कवि को शब्दों का इस तरह प्रयोग करना चाहिए जिससे नए-नए अर्थ उद्घाटित हों। नवीन संदर्भों में शब्दों के प्रयोग से पाठक में ऊब नहीं उत्पन्न होती है और शब्द अपना मूल्य और अर्थवत्ता नहीं खोते हैं - अज्ञेय की काव्य-पंक्तियाँ हैं -

हरी बिछली घास!

डोलती कलगी छरहरी बाजरे की

अगर मैं तुमको

ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका

अब नहीं कहता,

या शरद के भोर की नीहार-न्हाई कुँई,

टटकी कली चंपे की

वगैरह तो

नहीं कारण कि मेरा हृदय उथल या कि सूना है

बल्कि केवल यही :

ये उपमान मैले हो गए हैं।

देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच।

कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है। 7

कवि कहता है कि अब पुराने उपमानों से काम नहीं चलने वाला है। कहने का आशय यह है कि बड़ा कवि या भाषा की दृष्टि से संपन्न कवि सदैव नई उपमाओं और नई भाषा के प्रयोग पर बल देता है। नए प्रतीकों के प्रयोग का प्रयास करता है।

अज्ञेय की काव्यभाषा संबंधी अवधारणा का एक महत्वपूर्ण पक्ष है प्रतीकों के संदर्भ में उनके विचार। अज्ञेय प्रतीकों को व्यापक महत्व देते हैं। प्रतीक के संबंध में अज्ञेय की मान्यता है - 'कोई भी स्वस्थ साहित्य प्रतीकों की, नए प्रतीकों की सृष्टि करता है, और जब वैसा करना बंद कर देता है तब जड़ हो जाता है - या जब जड़ हो जाता है तब वैसा करना बंद करके पुराने प्रतीकों पर निर्भर करने लगता है।8 अज्ञेय ने न केवल प्रतीक के स्वरूप पर सैद्धांतिक रूप से विचार किया वरन् उन्होंने अपने काव्य में प्रतीकों का सार्थक प्रयोग भी किया है। इतना ही नहीं कवि के कई कविता-संग्रह का नाम भी प्रतीकार्थ रखने वाली काव्य-पंक्तियों पर ही आधारित हैं। 'हरी घास पर क्षण भर', 'आँगन के पार द्वार', 'बावरा अहेरी', इंद्रधनुष रौंदे हुए', 'कितनी नावों में कितनी बार' आदि इस दृष्टि से उल्लेखनीय काव्य-संकलन हैं। अज्ञेय की 'नदी में द्वीप' कविता की पंक्तियाँ अपनी प्रतीकात्मकता के कारण प्रसिद्ध हैं -

हम नदी के द्वीप हैं।

हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाय

वह हमें आकार देती है।

हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल

सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।

माँ है वह! है, इसी में हम बने हैं।

किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।

स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के

किंतु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहना रेत होना है

हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं। 9

उद्धृत कविता में 'द्वीप' व्यक्ति का प्रतीक है और 'नदी' संस्कृति या समाज की। प्रयोगवादी चिंतन सिंधु में बिंदु के विलय को उचित नहीं मानता है। इस आधुनिक चिंतन का यह मानना है कि बूँद समुद्र में विलीन तो हो, किंतु अपना अलग अस्तित्व, अस्मिता और व्यक्तित्व रखते हुए। अज्ञेय का मानना है कि व्यक्ति का अपना अलग व्यक्तित्व, अस्मिता और अस्तित्व होना चाहिए। 'नदी के द्वीप' कविता में अज्ञेय कहते हैं कि मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा हूँ कि मैं इस समाज / संस्कृति (नदी) का अंग नहीं हूँ लेकिन मैं बहूँगा नहीं। यदि मैं बह जाऊँगा तो मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं रहेगा।

'तीसरा सप्तक' में अज्ञेय प्रतीक के बजाय शब्द के लिए 'संकेत' का प्रयोग करते हैं। 'उपयुक्त शब्द' और 'अर्थवान शब्द' की खोज के संदर्भ में अज्ञेय का यह कथन महत्वपूर्ण है कि 'कोई शब्द किसी का पर्याय नहीं हो सकता है। अज्ञेय की मान्यता है कि 'कविता भाषा में नहीं शब्द में होती है। (भूमिका, चुनी हुई कविताएँ)। शब्दों पर बल देते हुए अज्ञेय लिखते हैं - 'मेरी खोज भाषा की खोज नहीं है, केवल शब्दों की खोज है। भाषा का उपयोग मैं करता हूँ निस्संदेह, लेकिन कवि के नाते जो मैं कहता हूँ वह भाषा के द्वारा नहीं केवल शब्दों के द्वारा।'10 वस्तुतः कविता में शब्द अपना संबंध स्वयं निर्धारित करते हैं और वह संबंध ही महत्वपूर्ण होता है जो नई अर्थ छटाएँ और अनेक अर्थस्तरों को बढ़ाता है। अज्ञेय की प्रक्तियाँ द्रष्टव्य हैं -

आँगन के पार

द्वार खुले

द्वार के पार आँगन

भवन के ओर छोर

सभी मिले -

उन्हीं में कहीं खो गया भवन।

कौन द्वारी

कौन आगारी, न जाने

पर द्वार के प्रतिहारी को

भीतर के देवता ने

किया बार-बार पा लागन।11

अज्ञेय की काव्यभाषा संबंधी अवधारणा पर विचार प्रकट करते हुए सत्य प्रकाश मिश्र लिखते हैं - 'शब्दों के अर्थ गर्भ उपयोग से लेकर मौन तक के बीच' अज्ञेय की भाषा-दृष्टि के कई स्तर हैं परंतु यह एक तथ्य सदैव रहा है कि भाषा के प्रयोजन और उसके स्वरूप पर वे बल देते रहे हैं। 12

अज्ञेय कहते हैं कि 'भाषा का मैं उपयोग करता हूँ। उपयोग करता हूँ लेखक के नाते और एक साधारण सामाजिक मानव प्राणी के नाते, दूसरे सामाजिक मानव प्राणियों से साधारण व्यवहार के लिए। ऐसे माध्यम का जिसको निरंतर दूषित और संस्कारच्युत किया जाता रहता है। उसका उपयोग मैं ऐसे ढंग से करना चाहता हूँ कि वह नए प्राणों से दीप्त हो उठे। ऐसा मैं कैसे करता हूँ या कर सकता हूँ / अपना ध्यान शब्द पर, हमेशा शब्द पर, केंद्रित करके ही।13

साहित्यकार शब्दों या भाषा का उपयोग नहीं करता है बल्कि शब्दों के नए संबंध निर्मित करता है। यह नया संबंध ही उसके संप्रेषण की पहचान बनाता है। अज्ञेय की मान्यता है - 'कवि का उद्देश्य केवल शब्द की निहित सत्ता का पूरा उपयोग करना नहीं बल्कि उसकी जानी हुई संभावनाओं के परे तक उसका विस्तार करना है।' 14

संदर्भ :

1. अज्ञेय, आत्मनेपद, भारतीय ज्ञानपीठ, पुनर्नवा संस्करण, 2003, पृ. 176

2. अज्ञेय, भवंती

3. अज्ञेय, आत्मनेपद, पृ. 16

4. अज्ञेय, अरी ओ करुणा प्रभामय'

5. अज्ञेय, आत्मदेपद

6. अज्ञेय, दूसरा सप्तक, (भूमिका), पृ. 10

7. अज्ञेय, हरी घास पर क्षण भर

8. अज्ञेय, आत्मनेपद

9. अज्ञेय, हरी घास पर क्षण भर

10. अज्ञेय, सर्जना और संदर्भ', पृ. 164

11. अज्ञेय, आँगन के पार द्वार

12. काव्यभाषा पर तीन निबंध (भूमिका, पृ. 47), डॉ. सत्य प्रकाश मिश्र

13. 'सर्जना और संदर्भ', ('शब्द, मौन और अस्तित्व ' लेख) पृ. 164, अज्ञेय

14. 'सर्जना और संदर्भ', ('शब्द, मौन और अस्तित्व ' लेख) पृ. 164, अज्ञेय


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