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लेख

अज्ञेय और हिंदी पत्रकारिता
अच्युतानंद मिश्र


श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' के जन्म शताब्दी वर्ष में उनके संपूर्ण सर्जक व्यक्तित्व का समग्रता के साथ आकलन किया जा रहा है। उत्तर आधुनिकता में पली-बढ़ी हिंदी साहित्य और हिंदी पत्रकारिता की पिछली दो पीढ़ियों के लिए अज्ञेय, आज भी 'अज्ञेय' ही हैं, खास तौर से हिंदी के नए पत्रकारों के लिए। 1987 में उनके निधन के पूर्व भी उनके संपादन-कर्म और पत्रकारीय लेखन के सम्यक विश्लेषण का कोई ठोस और गंभीर प्रयास नहीं किया गया था। यह कोई आरोप नहीं, लेकिन इस सत्य को रेखांकित करना बेहद जरूरी कि अज्ञेय से अनभिज्ञ वर्तमान पीढ़ी के हिंदी के पत्रकारों या उनके कटु आलोचकों को कोसना व्यर्थ है, क्योंकि 'प्रतीक', 'दिनमान', 'एवरीमैंस' या 'नवभारत टाइम्स' में उनके निकट सहयोगी रहे अनेक मूर्धन्य जो बाद में बड़े संपादक बने इस उपेक्षा के लिए सीधे जिम्मेदार हैं। एक उदाहरण देना जरूरी है। अज्ञेय ने 1946 में सेना से लौटने के बाद, पहले इलाहाबाद से फिर दिल्ली से 'प्रतीक' निकाला था, उसमें सहयोगी के रूप में श्री रघुवीर सहाय भी जुड़े थे जो बाद में 'दिनमान' में भी पहले सहयोगी और बाद में उसके संपादक बने थे। 'प्रतीक' साहित्यिक पत्रिका थी, स्वयं अज्ञेय ने दो बार निकाली थी। उसके प्रकाशन में उन पर कितना आर्थिक बोझ पड़ा था, इसको उनके अनन्य मित्र और सहयोगी पंडित विद्यानिवास मिश्र ने लिखा है, 'प्रतीक' में अज्ञेय ने अपना सबकुछ लगाया और उसमें इतनी आर्थिक हानि सही कि उस हानि को पूरा करने के लिए उन्हें 1963 तक कठोर परिश्रम करना पड़ा।' इसी तरह 'प्रतीक' बंद होने के बाद श्री रघुवीर सहाय ने लिखा - 'प्रतीक' बंद होने के बाद हठात् यह मालूम हुआ कि अपने को कहने का, अपने को पहचानने का बहुत बड़ा साधन छिन गया। ऐसा सोचनेवालों में बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', सेठ गोविंददास, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, शमशेर और नागार्जुन जैसे लोग थे। 'प्रतीक' तो बंद हो गया, लेकिन उसने जो ऊर्जा फैलाई थी, वह नए कवियों में अपने-अपने ढंग से विकसित होती रही।' श्री रघुवीर सहाय को ही 'आकाशवाणी' दिल्ली ने अज्ञेय से सीधे साक्षात्कार के माध्यम से रेडियो जीवनी तैयार करने का काम सौंपा था। 1984 में उन्होंने श्री गोपालदास के सहयोग से यह साक्षात्कार पूरा किया था जिसकी रिकॉर्डिंग आज भी आकाशवाणी के अभिलेखागार में मौजूद है। इस लंबे साक्षात्कार को बाद में आकाशवाणी ने 175 पृष्ठों की पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी किया था। इसकी भूमिका प्रो. रमेशचंद्र शाह ने लिखी है। इस लंबे साक्षात्कार में जहाँ अज्ञेय के संपूर्ण व्यक्तित्व, विचार, परिवार और सृजन पर प्रश्न पूछे गए हैं, 'दिनमान' और 'प्रतीक' पर भी प्रश्न पूछे गए हैं। लेकिन पत्रकारिता में उनके योगदान को पृथक रूप में चिह्नित नहीं किया गया जबकि आगरा के 'सैनिक' और कोलकाता के 'विशाल भारत' से शुरू हुई पत्रकारिता की उनकी यात्रा लगभग उतनी ही पुरानी है जितनी उनकी साहित्य यात्रा।

साहित्य की तरह पत्रकारिता में भी अज्ञेय लीक से हटकर थे। उनके साहित्य की तरह उनकी पत्रकारिता भी अनुशासित, लेकिन मुक्त थी। साहित्य में उन्होंने श्री मैथिलीशरण गुप्त को अपना काव्य गुरु माना है, लेकिन पत्रकारिता में उनके गुरु कौन थे, यह प्रश्न उनसे कभी किसी ने पूछा ही नहीं। पंडित महावीर प्रयाद द्विवेदी मानते थे कि संपादक की पहली परीक्षा इस बात से होती है कि वह कितना निर्भीक है। 'सैनिक' हो या 'विशाल भारत', 'आकाशवाणी हो या 'दिनमान', 'एवरीमैंस' हो या 'नवभारत टाइम्स' इस कसौटी पर अज्ञेय जी पूरे खरे उतरते हैं। आजीविका की तलाश में पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी की मदद से 'सैनिक' के संपादक बने थे, जिसके स्वामी श्रीकृष्णदत्त पालीवाल जैसे स्वतंत्रता सेनानी थे, लेकिन संपादक के स्वाभिमान पर आँच आते ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी। 'विशाल भारत' के संपादक का पद तो उन्होंने स्वयं चतुर्वेदी जी से मतभेद के कारण छोड़ दिया था। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने इसका खुलासा भी किया है। अज्ञेय ने अभिव्यक्ति की आजादी और संपादक के स्वाभिमान के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। उनके संपादकीय कौशल का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि एक लेख माँगने के लिए नए-नए लेखकों को भी बार-बार पत्र लिखकर तगादा करते थे, और उत्साही नौजवान पत्रकारों का लेखन स्वयं सुधारकर छापते थे। अपने एक लेख 'संपादक अज्ञेय' में उनके सुपरिचित डॉ. प्रभाकर माचवे ने लिखा है, 'वे मित्रों की रचनाएँ बेमुरव्वत लौटाते थे और नए-नए लेखकों से लिखवाते थे।'

' दिनमान' और अज्ञेय :

हिंदी पत्रकारिता में साप्ताहिक 'दिनमान' का अवतरण बिलकुल नया, साहसिक,सार्थक और अद्वितीय प्रयोग था। स्वतंत्रता के लगभग दो दशक बाद शुरू हुआ 'दिनमान' का प्रकाशन हिंदी पत्रकारिता में आज भी अज्ञेय की अक्षय कीर्ति का स्तंभ है। संपादक के रूप में अज्ञेय के जुड़ने के कारण 'दिनमान' का नाम पाठकों तक पहुँचने के पहले ही चर्चित और सुपरिचित हो गया था। स्वतंत्रता संग्राम से तपकर निकले सेनानियों के अलावा राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े लाखों ऐसे लोग थे, जिनका सत्ता की राजनीति और व्यवस्था से मोहभंग तेजी से हो रहा था। उनमें माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', शिवपूजन सहाय जैसे लोग भी थे जो राजनीति, साहित्य और पत्रकारिता में मूल्यों, सरोकारों, संवेदनाओं और ईमानदारी के क्षरण से बेहद व्यथित थे। 'दिनमान' उनके लिए एक नई ऊर्जा और ताजी बयार की तरह थी। 'राष्ट्र की भाषा में राष्ट्र का आह्वान' के सूत्र वाक्य ने सबको मोह लिया था और इस आदर्श को 'दिनमान' ने अक्षरशः चरितार्थ किया था। नामकरण से लेकर दिनमान के कलेवर, सामग्री चयन, पाठक वर्ग और उनकी भागीदारी पर अज्ञेय ने गंभीर विमर्श किया था। 1900 में जब 'सरस्वती' का प्रकाशन हुआ था तो उसके उद्देश्य में लिखा गया था कि इस पत्रिका में कौन-कौन से विषय रहेंगे, यह केवल इसी से अनुमान करना चाहिए कि इसका नाम सरस्वती है। इसी तरह साप्ताहिक 'दिनमान' (सूर्य) का क्षेत्राधिकार संपूर्ण सौरमंडल ही नहीं उससे भी आगे संपूर्ण ब्रह्मांड था। उसमें हर सप्ताह ज्ञान-विज्ञान, देश-विदेश, इतिहास, अनुसंधान, भाषा, खेल साहित्य से लेकर राष्ट्रीय अस्मिता और मानवता की गरिमा तक सबकुछ धड़कता था। अज्ञेय ने हिंदी के बुद्धिजीवियों, परिवर्तन के लिए मचलते नौजवानों, अपनी पहचान बनाने की तलाश में लगे लोगों को एक साथ जोड़ा था। संपादकों की एक ऐसी टीम जुटाई थी, जिनमें कुछ लोग आकाशवाणी के दिनों से उनके सहयोगी रहे थे, लेकिन पाठकों के बीच सुपरिचित नहीं थे। मनोहर श्याम जोशी ने इसे माना है कि रघुवीर सहाय के अतिरिक्त किसी की कोई पृथक पहचान नहीं थी। उस दौर की लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों के बीच भी अज्ञेय को अस्पृश्य ही माना गया था। पाठकों के बीच उनकी स्वीकार्यता जैसे अनेक साहित्यिकों को भयभीत करती थी, उसी तरह उस दौर के संपादकों में भी ईर्ष्या जगाती थी। लेकिन अवरोध और अस्वीकार के बावजूद अज्ञेय पूरी मजबूती से हिंदी पत्रकारिता में परिवर्तन के पहले प्रयोग के लिए मौजूद थे। उनकी प्रतिमा को खंडित और प्रतिभा को खारिज करना संभव नहीं था। रघुवीर सहाय ने लिखा है कि 'राजनीतिक क्षेत्र में जब साहित्यिकों के नाम याद किए जाते है' वात्स्यायन का नाम सूची से अलग किया जाता है, 'दिनमान' का प्रकाशन अपने समय की एक क्रांतिकारी घटना थी। हिंदी का बौद्धिक जगत इस सूचना से उत्साहित और उत्तेजित था कि अज्ञेय जी हिंदी में 'टाइम' और 'न्यूजवीक' की तरह एक सुसज्जित पत्रिका निकाल रहे हैं। हर क्षेत्र के श्रेष्ठ पुरुषों ने प्रकाशन के लिए शुभकामनाएँ भेजी थीं। उन दिनों श्रीमती इंदिरा गांधी भारत सरकार की सूचना और प्रसारण मंत्री थीं। अज्ञेय को जानती थीं। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि 'वात्स्यायन जी जैसे प्रतिष्ठित रचनाकार के निर्देशन में यह पत्रिका भारतीय पत्रकारिता के क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करेगी।' 'दिनमान' के पन्ने गवाह हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद 'दिनमान' और अज्ञेय द्वारा सबसे कटु आलोचना इंदिरा गांधी और उनकी सरकार की ही की गई थी। 'हिंदी की राह के रोड़े' संपादकीय टिप्पणी में उन्होंने लिखा, 'अच्छा नेता कम बोलता है, लोकतांत्रिक भारत के अधिकतर नेता अधिक बोलते हैं। इसलिए नेताओं की अधिकतर बातें अब अनसुनी कर देने लायक हो गई हैं। लेकिन बीच-बीच में कोई बात ऐसी भी कह दी जाती है जिससे एकाएक कई खरतनाक संभावनाएँ उधड़कर सामने आ जाती है। खतरनाक इसलिए कि जिस मनोवृत्ति या पूर्वग्रह का परिचय वह बात देती है वह मनोवृत्ति दूषित है। प्रधानमंत्री जब गालिब और कृश्न चंदर के काम की तुलना करती हैं तब उनकी बात हँसकर उड़ा दी जाती है, क्योंकि वह केवल समकालीन साहित्य के बारे में एक राजनेता का अज्ञान ही सूचित करती हैं और ऐसे लोगों के इस अज्ञान के हम अभ्यस्त हो गए हैं।' एक सी अनेक तीखी टिप्पणियाँ 'दिनमान' में मौजूद हैं। फणीश्वरनाथ रेणु के साथ घूमकर उन्होंने 1966 में बिहार के सूखे का जो मार्मिक विवरण चित्रों सहित छापा था, उसी की नकल करते हुए देश के दूसरे अखबारों ने भी यह प्रकाशित किया था। अब इस कथा से अवगत हैं कि 'दिनमान' से अलग होने के बाद इमरजेंसी के समय जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में अज्ञेय ने कितना बड़ा जोखिम उठाकर कितनी बड़ी भूमिका निभाई थी।

उस दौर में देश के अनेक साहित्यकारों और बड़े पत्रकारों का आचरण कैसा था, इस बारे में पं विद्यानिवास मिश्र ने लिखा है। 1965 फरवरी में उन्होंने 'दिनमान' साप्ताहिक का संपादन स्वीकार किया। घर-बाहर दिनमान में जाने का विरोध भी हुआ, घर इसलिए कि स्वास्थ्य परिश्रम के लिए अनुकूल नहीं है और बाहर इसलिए कि पत्रकारिता की बाधा है। पर एक तो वे इसके लिए वचनबद्ध हो चुके थे, दूसरे वे हिंदी पत्रकारिता के स्तर को ऊँचा उठाने अपना योगदान करना चाहते थे। साथ ही वे अपने लिए प्रयोग भी करना चाहते थे कि सहृदय ही नहीं, जन-साधारण पात्र के स्तर पर मैं प्रेषणीय बनूँ। इसके अलावा एक जबरदस्त कारण था। अज्ञेय स्वातंत्र्योंत्तर भारतवर्ष में अपनी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का निर्वाह करने के लिए यह जरूरी समझने लगे थे कि गैर पेशेवर राजनीतिक मत का सामने आना आवश्यक हो गया है। पेशेवर राजनीतिज्ञों के हाथ में देश को सौंपकर चुपचाप बैठ जाना जनतंत्र के लिए वांछनीय नहीं है। 'दिनमान' में उन्हें सबसे पहला अनुभव यह हुआ कि हिंदी की प्रतिष्ठा की बुनियाद हिंदी की प्रेषणीयता में है, हिंदी की आंतरिक शक्ति में है। हिंदी के पाठक की सुरुचि, प्रबुद्धता और जिज्ञासा में ही हिंदी की वास्तविक शक्ति में है। इस विश्वास ने उन्हें अपनी समूची संगठन-शक्ति, कल्पना और मनोनयन को लगाकर 'दिनमान' के विकास में झोंक दिया। 'दिनमान' में एक तीखा अनुभव भी हुआ कि अंग्रेजी के लिए मानसिक दासता का ऐसा कुप्रभाव है कि देश के समाचार-पत्र, प्रतिष्ठान, हिंदी पत्रों और पत्रकारों को अंग्रेजी से नीचे का दरजा देते हैं और हिंदुस्तान के तथाकथित प्रबुद्ध पाठकों का एक महत्वपूर्ण वर्ग अंग्रेजी में लिखी हुई बात को ही प्रमाण मानता है। पर 'दिनमान' अज्ञेय का साध्य नहीं, एक साधन मात्र था। वे 'दिनमान' में उतने आसक्त नहीं थे, जितने अपने कर्तव्य-बोध से आबद्ध थे। दिसंबर 1972 में उन्होंने श्री जयप्रकाश नारायण के आग्रह पर अंग्रेजी के नए वैचारिक साप्ताहिक 'एवरीमैंस' का संपादकत्व ग्रहण किया। परंतु साल भर तक इस साप्ताहिक को एक निश्चित आकार देने के बाद उन्होंने अनुभव किया कि यद्यपि ऊपर से कागज पर संचालन एक स्वायत्त दीखनेवाली संस्था का है पर परिस्थितिवश भीतर से इसका प्रबंध क्रमशः अधिकाधिक एक व्यक्ति के हाथों में जा रहा है। 'एवरीमैंस' की बदली हुई स्थिति उन्हें स्वीकार नहीं थी, इसलिए वे दिसंबर 1973 में इस पत्र से अपने-आप अलग हो गए। इसके साथ उनहोंने अनेक मित्रों तथा सहकर्मियों से बात करके 'प्रतीक' को नए सिरे से फिर से निकालने की योजना बनाई और दिसंबर 1973 में 'नया प्रतीक' नाम से मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। अज्ञेय के साहित्यिक लेखन को लेकर जितना विवाद खड़ा किया गया उतना संपादन-कर्म को लेकर नहीं था। प्रसिद्ध कवि, आलोचक और 'पूर्वग्रह' के संपादक रहे श्री अशोक वाजपेयी ने लिखा है - 'अज्ञेय का खुले दिमाग से वस्तुनिष्ठ आकलन नहीं किया गया। समूची हिंदी में उन जैसा कोई लेखक नहीं हुआ जिसने इतनी अधिक विधाओं में एक समान मूर्धन्यता पाई हो। एक अन्य लेखक में उन्होंने रेखांकित किया था कि वे स्वाधीनता, व्यक्ति गरिमा, वरण की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के पक्षधर थे। उन्होंने 'प्रतीक' को जिस तरह सुरुचि और परख का अचूक प्रतिमान बनाया था उस तरह का गौरव दूसरी कोई पत्रिका आज तक नहीं पा सकी।'

प्रो. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने लिखा है - 'अज्ञेय जैसी भाषा की सजगता - व्याकरण और रचना - दोनों के स्तरों पर हिंदी के किसी अन्य लेखक में नहीं मिलती।' एक अन्य लेख में उन्होंने लिखा - 'अज्ञेय का आकर्षण भी प्रबल था और विकर्षण भी। उन पर खुद को महिमामंडित कराने का आरोप था। अपने चारों ओर की अनुकूलता या प्रतिकूलता से वे विचलित नहीं होते थे। कई बार तो वे खुद इसे आमंत्रित करते थे। कभी-कभी वे दोनों ध्रुवों पर साथ-साथ दिखाई देते थे। उनके व्यक्तित्व में रहस्यमयता भी थी और ज्ञान की गरिमा भी।'

ऊर्जापुंज :

अपने संपादन-कर्म पर स्वयं अज्ञेय की एक टिप्पणी महत्वपूर्ण है जो उन्होंने एक लेख 'कलकत्ते की याद' में की थी। यह लेख हिंदी साहित्य - बंगीय भूमिका' नामक पुस्तक में शामिल है, जिसका संपादन पंडित कृष्ण बिहारी मिश्र और रामव्यास पांडे ने किया है। उन्होंने लिखा 'जहाँ भी में संपादक रहा हूँ लगातार अपना उत्तराधिकारी तैयार करता रहा हूँ। इसे मैं काम के प्रति अपना कर्तव्य समझता हूँ और अपनी आजादी का अंग भी। मैं यह नहीं चाहता हूँ कि किसी काम के साथ मैं केवल इसलिए बँधा रहूँ कि इसे और कौन सँभालेगा। यह शायद भारतीय प्रवृत्ति भी नहीं है, क्योंकि यहाँ तो लगातार यही देखता आया हूँ कि शीर्षस्थ व्यक्ति सबसे पहले अपने आसपास एक शून्य बना लेता है, जिससे वह अपने को सुरक्षित समझ सके और कुछ योग्य व्यक्तियों को काफी नीचे स्तर पर रखकर उनसे कुछ ऐसे ढंग से काम लेता है जैसे बँधुआ मजदूरों से लिया जाता है।' साप्ताहिक 'दिनमान' और दैनिक 'नवभारत टाइम्स' का दौर ऐसा था जिसमें अज्ञेय की पत्रकारिता किसी सीमा तक उनकी आजीविका भी थी। 'दिनमान' की लोकप्रियता का लाभ उठाने के बाद भी टाइम्स समूह के प्रबंधकों से मतभेद के कारण ही उन्हें 'दिनमान' छोड़ना पड़ा था। इसी तरह इमरजेंसी के समर्थन के कारण 'नव भारत टाइम्स' की अलोकप्रियाता चरम सीमा पर थी तो बड़ी खुशामद करके अज्ञेय को लाया गया था। इसके पीछे जनता पार्टी सरकार में अज्ञेय की सम्मानित छवि को भुनना भी था।

अगस्त 1977 में संपादक के रूप में आने के बाद उन्होंने देखा कि विरासत में मिले उस ढाँचे में अवरोध अधिक थे और सार्थक बदलाव की संभावनाएँ बेहद कम। उस दौर के अखबार के साप्ताहिक परिशिष्टों, संपादकीय पृष्ठों पर अज्ञेय की मौजूदगी दर्ज है। 'दिनमान' हो या 'नवभारत टाइम्स' उन दिनों अज्ञेय ने पत्रकारिता के माध्यम से जिन सवालों को उठाया था वह उनके भविष्यदर्शी संपादक होने का प्रमाण है। 'नवभारत टाइम्स' में उनके सहयोगी रहे डॉ. नंदकिशोर त्रिखा बताते है कि अज्ञेय ने अपनी शर्तों पर लेकिन पूरी किमत चुकाकर संपादक का काम किया था। उसी समय से हिंदी के लेखकों को सबसे अधिक सम्मान और पारिश्रमिक मिलने लगा था। अज्ञेय दूसरे प्रेस आयोग के सदस्यों थे। टाइम्स प्रबंधन ने आयोग से असहयोग करने के लिए आदेश जारी किया था लेकिन अज्ञेय को यह मंजूर नहीं था। शायद इसी कारण प्रबंधन ने संपादक पद पर उनके सेवाकाल को विस्तार नहीं दिया था।

'दिनमान' से अलग होने से 18 वर्ष बाद उनके सहयोगी रहे, श्री त्रिलोक दीप ने अज्ञेय से 'प्रतीक', 'दिनमान' और समूची हिंदी पत्रकारिता को लेकर एक लंबी बातचीत की थी जो अज्ञेय के निधन के बाद 19 से 25 अप्रैल, 1987 के अंक में प्रकाशित हुई थी। अज्ञेय ने पत्रकारिता की भाषा के प्रश्न पर कहा था, 'दिनमान' में मैंने भाषा की ओर अधिक ध्यान दिया था। मैंने अपने सहयोगियों के मन में याह बात बैठा दी थी कि 'दिनमान' में हम जो कुछ लिखेंगे, भले ही उसकी सामग्री कहीं से अनुवाद करके ही पाई हो, उसके इसी रूप में प्रस्तुत करेंगे जैसे कि वह मूल हिंदी में ही लिखा गया है। अनुवाद की भाषा हम नहीं चाहते थे, हम मौलिक पत्रकारिता की भाषा चाहते थे।' समाचार साप्ताहिक होने के बावजूद - 'दिनमान' को कोई एजेंसी सेवा या फोटो सेवा उपलब्ध नहीं थी। अंग्रेजी अखबारों के लिए बेकार और फालतू चित्रों को 'दिनमान' में भेज दिया जाता था। अज्ञेय को इस बात की पीड़ा थी कि हिंदी पत्रकारिता में समाचार पत्रकारिता का विस्तार तो हुआ लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता में अधिक प्रगति नहीं हुई। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि 'पत्रकारिता उद्योग बनती जा रही है। उद्योग आदर्शवादी नहीं होते, इसलिए आज ऐसे संपादक तो हैं जो प्रशासन की दृष्टि से अधिक कुशल हैं लेकिन निष्ठावाले संपादक शायद दुर्लभ हैं। ऐसा सूचना अब संभव नहीं रहा कि अमुक संपादक ने यह कहा है और वह खरा और निष्ठावान आदमी है, इसलिए हम मान ले कि बात सच होगी।' भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता पर अज्ञेय ने बी.बी.सी. संवाददाता नरेश कौशिक के सवालों का उत्तर दिया था। उनका एक बड़ा लेख 'आज की भारतीय पत्रकारिता' का प्रकाशन भी बहुत पहले हुआ था जो पहले अद्यतन और बाद में अब उनकी पुस्तक 'केंद्र और परिधि' में शामिल है। पत्रकारिता पर उनके विचारों का संपादन या विमर्श बिलकुल नहीं हुआ है जो आज और अधिक प्रासंगिक है। यह एक सुखद संयोग है कि अज्ञेय के एक निकट और सम्मनित मित्र तथा प्रतिष्ठित हिंदी विद्वान प्रो. रमेश चंद्र शाह ने, जो कई दशकों तक उनके साहित्यिक, सांस्कृतिक, पत्रकारीय और समस्त बौद्धिक गतिविधिओं के साक्षी तथा कभी-कभी सहयोगी रहे हैं, अज्ञेय की पत्रकारिता पर एक मौलिक पुस्तक इसी शताब्दी वर्ष में पूरी की है। शताब्दी वर्ष के उपहार के रूप में आई इस पुस्तक से अगर पत्रकारिता में अज्ञेय के अवदान पर विमर्श शुरू हो सका तो हिंदी पत्रकारों के लिए यह वर्ष सार्थक हो जाएगा।


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