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लेख

संवत्सर : चिंतन का एक नया आयाम
गंगाधर झा


इतिहास बताता है कि समृद्ध सर्जना के युग समृद्ध चिंतन और समीक्षा के भी युग हुआ करते है। इसी बात को उल्टाकर भी कहा जा सकता है और तब भी वह सही होगी। आज के हिंदी जगत में स्थिति क्या है? कुल मिलाकर हम विचार और चिंतन की काहिली या जड़ता के युग से गुजरे रहे हैं। उन लोगों पर भी यह बात लागू होती है जिन्होंने एक विशेष वैचारिक दृष्टिकोण अपना लिया है, जो उन्हें बना-बनाया मिल गया था, और जिस के बाद लीक से हटकर सोचने और समझने की जिन्हें कोई जरूरत नहीं रह गई। वे इलहाम की मनोदशा में डूबे हुए हैं और सब कुछ उन्हें इस इलहाम की ही छाया या प्रकाश में दिखाई देता है। जो कुछ उसके प्रतिकूल या बाहर है उस पर निरंतर वार करते हुए जो कुछ उसके अनुकूल और अंतर्गत है उसकी दुंदुभी बजाने में ही वे अपने चिंतकर्म की इतिश्री समझ लेते हैं। फिर भी, चिंतन न सही, चिंतन की एक मुद्रा जरूर उनके पास है। इस खेमे के बाहर अगर कोई और कुछ है तो वहाँ सब धान बाइस पसेरी का हिसाब है। रचनाओं का मूल्यांकन कुछ इस ढंग से हो रहा है कि 'टके सेर भाजी, टके सेर खाजा' वाली कहावत याद आती है। और कहा जाय तो माहौल इस अंधेर नगरी से भी कहीं भयावह है। रुचिहीनता और उदासीनता उस चरम सीमा पर है कि यदि कोई महत्वपूर्ण चिंतन प्रकाशित भी होता है तो एक बुलबुला भी नहीं उठता, एक तिनका भी नहीं सरकता। संशय होने लगता है कि हमारी राजनीति कहीं हमारी इसी विवेकशून्यता और चिंतनहीनता की प्रतिच्छाया तो नहीं है, वही राजनीति जो हमारी जिंदगी पर इतनी पुरअसर है और जिसकी हमारे लेखक उपेक्षा नहीं कर सकते।

मेरी राय में जो चिंतन इस तरह उपेक्षित है उसमें से एक अज्ञेय का संवत्सर भी है। वह ऐसी पुस्तक है जिसकी जैसी, जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, नहीं हुई। उसमें अज्ञेय ने एक बिलकुल नए रास्ते से जीवन, अनुभव साहित्यिक कृति और कृतित्व जैसे महत्वपूर्ण विषयों की छानबीन करने का प्रयत्न किया है। इन विषयों पर बने बनाए उत्तर खुद अज्ञेय के भी, हमारे पास मौजूद है, पर कभी-कभी बद्धमूल विचारों की जड़ हिलाने से चेतना में नई सक्रियता की संभावना हो जाती है। अज्ञेय की परिचित दुर्बलताओं (या विशेषताओं) के दर्शन संवत्सर में भी होते हैं। फिर भी, एकदम ताजे और नए चिंतन के आयाम भी उसमें खुलते हैं। इस पुस्तक में, 'काल-प्रतीति से संबद्ध मिथकों की व्याख्या के साथ-साथ इतिहास की अवधारणा, मानवीय काल की संवेदना, साहित्य की प्रतीति और भाषागत काल-प्रतीति की विवेचना करके एक अखंड और परिपूर्ण काल-बोध का दर्शन' रचा गया है। निःसंदेह हिंदी में अपने किस्म की यह पहली पुस्तक है, परंतु फ्लैप पर ही किया हुया यह दावा ठीक नहीं है कि, 'यूरोपीय भाषाओं में भी इतनी गहराई में इतने सहज ढंग से काल के विविध आयामों को परखने वाली और उन आयामों को जीवन के छंद में उतार के प्रस्तुत करने वाली ऐसी कोई पुस्तक नहीं लिखी गई है।' यूरोपीय भाषाओं में ऐसी पुस्तक का उदाहरण ज्योर्ज़ेज पाउले द्वारा फ्रेंच में लिखी गई, जिसका परिवर्द्धित संस्करण स्टडीज इन ह्यूमन टाइप के नाम से अंग्रेजी में अनुदित होकर सन 1956 में 'द जान हापकिंस प्रेस, बाल्टीमोर' के द्वारा प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में फ्रांस और अमेरिकी के लेखकों की काल-संबंधी धारणा का लेखा-जोखा लेते हुए उसके आधार पर उनके कृतित्व का विश्लेषण किया गया है। संक्षिप्त निष्कर्ष यह है कि हर लेखक की काल-प्रतीति अपने ढंग की है और वह उसकी रचनाओं की प्रतिविंबित ही नहीं होती, बहुत गहराई में उनका रूप भी गढ़ती है। निःसंदेह, अज्ञेय की पुस्तक का रवैया दूसरा है, और किसी का अनुकरण न होकर वह एक मौलिक कृति है, पर इतनी चेतावनी तो मिलती ही है कि अनावश्यक और अकारण बहुत लंबा दावा नहीं करना चाहिए।

साहित्य के क्षेत्र में काल-संबंधी विवेचना में आधुनिक दिलचस्पी की शुरुआत मार्सेल प्रूस्त और जेम्स ज्वाइस जैसे लेखकों से हुई जिन्हें अतियथार्थवादी और मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार कहा गया है। चेतना-प्रवाह के लेखकों का 'समय की नदी' में रुचि लेना स्वाभाविक ही था। मार्सेल प्रूस्त ने स्मृति का अनुसंधान करके विगत को फिर से पाने या पुनरूज्जीवित करने तथा उसी के साथ स्मृति के स्वरूप को परखने-पहचानने का प्रयास किया। जेम्स ज्वाइस ने पूर्ण जागरण और गहनतम निद्रा के बीच की श्रेणियों में चेतन और अवचेतन के बदलते हुए अनुपातों की विविध स्थितियों में स्वप्न-चेतना के प्रवाह को अंकित करने का आयोजन अपने उपन्यासों में किया। जिस तरह प्रूस्त ने स्मृति कि गवेषणा के माध्यम से काल को परखने का प्रयास किया। उसी तरह ज्वाइस ने काल और कला के अंतर्संबध पर विचार किया। ज्वाइस का सिद्धांत रोचक और महत्वपूर्ण है। उन्होंने कला में 'स्तंभन' का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उनके बहुत पूर्व लेसिंग ने कविता और मूर्तिकला की तुलना करते हुए निष्पत्ति दी थी कि कविता का प्रसार काल में होता है और मूर्ति का प्रसार दिक या आकाश में। इसलिए कविता में क्षणों की एक पूरी श्रृंखला, गति का अंकन किया जा सकता है, जो मूर्ति में संभव नहीं है। मूर्तिकार किसी की भी प्रतिमा गढ़ते हुए उसकी विविध स्थितिओं में से सिर्फ एक स्थिति या क्षण चुन सकता है। इसलिए कवि और मूर्तिकार के लिए अपनी-अपनी कला में उत्कर्ष पाने केरास्ते अलग-अलग हैं और यह कहना गलत है कि मूर्ति (या चित्र) मौन काव्य है और कविता मुखर चित्र (या मूर्ति)। ज्वाइस ने इसका खंडन किया। उनका कहना था कि कवि हो या मूर्तिकार, क्षण और दिक की निरंतरता में से वे एक क्षण या बिंदु को अलग कर लेते हैं, जो स्वयं में संपूर्ण है। वह रह जाता है, वह सार्थक है जबकि उसके आसपास का बाकी सब विलीन और अर्थहीन हो जाता है। इस प्रकार अलग किया हुआ क्षण अपने तरह विद्यमान रहता है, वह स्थिर है, और काल-प्रवाह से उसका को संबंध नहीं रह जाता। कल्पना इस स्वतंत्र और निरपेक्ष इकाई के आंगिक अनुपातों, सामंजस्य और उसकी इयत्ता की दीप्ति का अवलोकन और मनन करती है और उसे कलात्मक रूप देकर हमेशा के लिए स्थिर बना देती है।

काल के स्वभाव के बारे में जेम्स ज्वाइस ने ही यह टिप्पणी की थी कि वर्तमान में से होकर सारा भविष्य अतीत में डूबता जाता है। अज्ञेय की काल-संबंधी जिज्ञासा निरंतर रचना-धर्म के स्वरूप और समस्याओं के साथ जुड़ी हुई है। काल जिस रूप में साहित्य में प्रयोज्य है उसकी झलक देते हुए अज्ञेय कहते हैं, 'साहित्य किसी एक काल में किसी एक जाति अथवा समाज की संपूर्ण संस्कृति की उपज होती है। किसी भी समय में साहित्य संस्कृति के उस समय के विश्वदर्शन को प्रतिबिंबित करता है। दूसरे शब्दों में जो अनुभूति साहित्यिक के लिए प्रयोजनीय होती है वह शून्य में अवस्थित एक व्यक्ति की प्राथमिक अनुभूति नहीं होती है, बल्कि एक अनेकायामी, अनेक स्तरीय, अनेकरूपी जटिल संरचना होती है जिससे निरूपण के लिए काल के कई आयामों को आधार बनाना पड़ता है।' इस तरह साहित्यकार के सामने काल के स्तर, आयाम पर आयाम रहते हैं। एक उस यथार्थ का काल है जो अनुभव का विषय बनता है, एक अनुभोक्ता का काल है, एक उसे परिवेष्टित करने वाली संस्कृति का वर्तमान है, एक उस संस्कृति का ऐतिहासिक काल है। इस अनेकायामी समग्रता में ही यथार्थ का अर्थ खुलता है। अज्ञेय जब साहित्य के दोहरे धर्म की बात करते हैं तो कहते हैं कि एक तरफ वह वर्तमान की सही और सटीक पहचान कराता रहता है और दूसरी तरफ वर्तमान की अर्थवत्ता के वृहत्तर संदर्भ में जोड़ता है, तब उनका मतलब एक व्यक्ति की अनुभूति को सांस्कृतिक काल की अनेकायामिता से जोड़ने का ही है। पर अज्ञेय की यह निष्पत्ति नई नहीं है। अपने चिंतन के आरंभिक युग में टी.एस. इलियट के सहारे उन्होंने जो यह निष्पत्ति दी थी कि 'वर्तमान' परंपरा से जुड़कर (उसका ही अंग बनकर) ही आधुनिक और अर्थवान् होता है, उसका आशय भी ऐसा ही है। 'वर्तमान' जब परंपरा से जुड़ता है तब उसके जुड़ने से एक हद तक परंपरा भी रूपांतरित होती है और वर्तमान भी सार्थक होता है। इस तरह काल के आधार पर उनकी निष्पत्ति कोई नहीं है, नए ढंग से पुरानी बात की ही पुनरावृत्ति है।

अज्ञेय के इस निष्पत्ति का पूरा वजन समझने के लिए उनकी वैज्ञानिक काल और ऐतिहासिक काल संबंधी निष्पत्तियों पर नजर डालनी जरूरी है। काल का जिस तरह हम अनुभव करते है उसमें वह कभी सिकुड़ जाता है, कभी फैल जाता है, कभी धीरे-धीरे सरकता है, कभी जोर से भागता है। जब किसी बात में हमारा मन लगता है तो काल इतनी तेजी से निकल जाता है कि पता ही नहीं लगता। इसके विपरीत जब हम किसी अप्रिय स्थिति में फँस जाते हैं तो क्षण-क्षण दूभर हो जाता है। कभी हमारे वर्तमान अनुभव में स्मृति से उभरकर कोई पुराना अनुभव मिल जाता है और उसकी रंगत और आस्वाद बदल देता है। बूढ़ों में हमेशा पुराने अनुभवों में जाने की प्रवृत्ति होती है और किशोरों और जवानों का मन निरंतर संभावनाओं की ओर भागता रहता है। काल की प्रतीति इस प्रकार अनभोक्ता को उसकी स्थिति और मनःस्थिति की सापेक्षता में हुआ करती है। इसके विपरीत वैज्ञानिक या गणितशास्त्री काल की प्रतीति के भावपक्ष से बचकर चलने का प्रयत्न करता है। वह यह निर्धारित करने की कोशिश करता है कि काल की विषयातीत संरचना क्या है? उसकी पहली मान्यता यह होती है कि काल का प्रवाह समगतिक हुआ करता है। पर यह सही नहीं है। अनुभव में तो काल की गति सम नहीं ही होती, जिन भौतिक प्रतिमानों से उसे मापा जाता है वे भी समगतिक नहीं होते। ऐसा एक प्रतिमान सूर्य के चारों ओर पृथ्वी के घूमने की गति है। लेकिन परिक्रमा करते हुए पृथ्वी कभी सूर्य के पास पहुँच जाती है और कभी अधिक दूर हो जाती है। पहली स्थिति में उसकी गति कुछ तेज हो जाती है, दूसरी स्थिति में कुछ धीमी। इसलिए गति पर आधारित काल समप्रवाही नहीं हो सकता और उससे संबद्ध गणितीय समीकरण केवल परिभाषा के लिए ही काल की समप्रवाहिता निर्धारित करते हैं। इस तरह वैज्ञानिक काल केवल एक 'समय' (कन्वेंशन) है।

इस 'समय' की कुछ ऐसी विशेषताएँ है जो हमारे जीवन-बोध और व्यवहार को प्रभावित करती है। ऐसी सबसे बड़ी विशेषता कार्य-कारण संबंध की है। जो पहले है उसे हम कारण कहते हैं। और उसके परिवर्तन से जो अगले कदम पर बनता है, उसे कार्य कहते हैं। कार्य-कारण की यह अटूट श्रृंखला हमारे अंदर इतनी बद्धमूल है कि हम उसके बाहर जाकर सोच ही नहीं पाते। वैज्ञानिक के अनुसार कारण-कार्य प्रक्रिया ही तो काल प्रवाह है। अज्ञेय कारण-कार्य की दुर्निवार श्रृंखला पर प्रश्नचिह्न लगाकर उसे संदिग्ध करार देते हैं और यह निर्णय देते हैं कि यह वास्तविक या यथार्थ न होकर केवल एक ऐसा तथ्य है जो मान लिया गया है अर्थात काल्पनिक है। इस वैज्ञानिक काल का हमारे जीवनक्रम और चिंतन पर जो प्रभाव हुआ है वह अत्यंत दूरगामी है। और यह देखने योग्य है कि अज्ञेय इस प्रवाह का लेखा-जोखा किस प्रकार लेते हैं और हमें किन निष्कर्षों की ओर ले जाते हैं।

वैज्ञानिक के विषय - निरपेक्ष - कालमापन से यह सुविधा हुई कि हम 'अपने निजी अनुभव और निजी कालानुभूति की संगती दूसरे की कालानुभूति से बैठाकर सामाजिक व्यवहार और संचार का सुयोग' प्राप्त कर लेते हैं। पर इसी के कुछ ऐसे परिणाम हुए हैं जो इतने सुखद और खुशनुमा नहीं माने जा सकते। उदाहरण के लिए उत्पादन और वितरण और उपलब्धि की सारी प्रक्रिया वैज्ञानिक काल माप से जुड़ी होने के कारण यह कहावत बन गई है कि 'समय की पूँजी है'। समय इस तरह एक जिंस बन गया है। श्रम की माप करते हुए जब हम मैन आर्क्स की बात करते हैं तो ' मनुष्य को भी एक जिंस या वस्तु बना देते हैं - औद्योगिक यांत्रिकी के संदर्भ में मनुष्य की ओर डिब्बाबंद मांस की तुलना जिस के रूप में करना संभव हो गया है।' अज्ञेय का यह निष्कर्ष बहुत मार्के का है और इसका प्रतिबिंबन हम समकालीन साहित्य में पाते हैं। पर अज्ञेय जब कालचिंतन करने बैठे ही थे तो वर्तमान युग के संदर्भ में उन्हें अपने निष्कर्ष को और दूर तक ले जाना था। काल क्या है? परिवर्तन के बिना उसका कोई अर्थ नहीं है। परिवर्तन यदि न हो तो काल थम जाएगा। इसलिए परिवर्तन की गति जब तेजी से चलता हुआ प्रतीत होगा और जब धीमी होगी तो काल की गति भी धीमी प्रतीत होगी। घटनाओं का बाहुल्य होने पर समय जल्दी-जल्दी चलता मालूम पड़ता है, घटनाओं की न्यूनता होने पर धीमे-धीमें सरकता हुआ। इस दृष्टि से पश्चिमी देशों में काल की गति हमारे देश की अपेक्षा कहीं अधिक है। एक जगह स्थिर होकर रहने के बदले बहाँ के मनुष्य जल्दी-जल्दी ठिकाना और पेशा बदलते हैं। न्यूयार्क जैसे शहर के आधे टेलिफोन साल -भर के अंदर नए मनुष्यों के नाम जो जाते हैं। नतीजा यह है कि हर मनुष्य के जीवन में पहले से कहीं ज्यादा मनुष्य आते हैं।

इस तरह अंतर्मानवीय संबंधों की संभावना जितनी विशाल हो जाती है उनकी अवधि उतनी ही छोटी होती जाती है। इसका सुनिश्चित प्रभाव उसकी भाव-क्षमता तथा भाव-प्रकार पर और उसकी नैतिक मान्यताओं पर भी पड़ता है। धीमी गति से बदलने वाले जनसमूहों और अत्यंत क्षिप्र गति से बदलने वाले जनसमूहों में नैतिकता के प्रतिमान एक जैसे नहीं हो सकते। पारिवारिक नैतिकता को ही लें, तो बार-बार विवाह और तलाक वाले मनुष्यों की नैतिकता एक ही वैवाहिक संबंध को आजीवन निभाने वाली हमारी नैतिकता जैसी नहीं हो सकती।

पश्चिमी मनुष्य के सामने चमर सीमा की ओर बढ़ती हुई प्रौद्योगिकी निरंतर नई वस्तुएँ पेश करती रहती है। स्थायी परिचित वस्तुओं की तुलना में नई वस्तुओं का साथ अनुकूलन की समस्या निरंतर बनी रहती है। लंबे समय तक काम आने वाली वस्तुओं की तुलना में उन वस्तुओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो एक बार इस्तेमाल होने के बाद फेंक दी जाती है। इस तरह स्थान और वस्तुओं के प्रति मनुष्य में जो लगाव होता है वह तेजी से समाप्त हो रहा है। स्थायित्व की भावना विलीन हो गई है और उसकी जगह क्षणभंगुरता ने ले ली है। जा हिर है कि स्थायित्व के नैतिक मूल्य और क्षणभंगुरता के नैतिक मूल्य एक जैसे नहीं हो सकते। केवल यह नहीं कि पश्चिमी मनुष्य में स्थान, वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति भावनात्मक लगाव क्षिप्रता से समाप्त हो रहा है। नई चीजों के जीवन में आने की गति और जीवन के हर संबंध और परिस्थितियाँ, इतनी तेजी से बदल रही हैं कि भविष्य दूर की संभावना का रूप त्यागकर जीवन के बीचोंबीच टूटा पड़ रहा है। उसके साथ अनुकूलन की समस्या से मनुष्य इतना अधिक उलझता जाता कि विगत या भूत के लिए उसके पास कोई जगह नहीं बचती। पश्चिम में एक ऐसा आधुनिक मनुष्य पैदा हो रहा है जो निरंतर बदलते हुए वर्तमान में जीने के प्रयत्न में अतीत या विगत से वंचित होता जा रहा है, मानो उसका कोई भूतकाल नहीं।

'इस्तेमाल करो और फेंक दो' की इस संस्कृति का प्रभाव संस्थाओं और कलाओं पर भी पड़ रहा है। संस्थाओं में स्थायित्व अब नहीं रहा। अपने पुराने रूप को कायम रखने पर वे पीछे छूट जाएँगी और अप्रासंगिक होकर रह जाएँगी। कला में भी एक संप्रदाय जब जन्म लेता था तो वह आशा रहती थी कि वह अनेक -वर्षों तक बना रहेगा। पर कला की शैलियों और संप्रदायों के आने-जाने की गति इतनी तेज हो गई है कि वहाँ भी शाश्वत और स्थायी कहे जाने वाले सिद्धांत लुप्त या अप्रासंगिक हो गए हैं, और रोज एक नई शैली जन्म लेती है और रोज मरती है। लोकप्रिय पुस्तकों की आयु दिनों-दिन घटती जा रही है। क्षणभंगुरता ने कला के क्षेत्र में भी दृढ़ता से आसन जमा लिया है।

काल की गति के इस तरह तीव्र होने में नई तकनीकी का बहुत बड़ा हाथ है और तकनीकी को इस स्तर पर पहुँचाने वाली जो प्रक्रिया है वह है हमारा इतिहासबद्ध चिंतन और व्यवहार। वैज्ञानिक काल के आधार पर हम इतिहास की घटनाओं को एक अर्थपूर्ण संगति अथवा अनुक्रम में गूँथना संभव बना लेते हैं। अज्ञेय का निष्कर्ष है कि 'अगर ऐतिहासिक काल वह एकमात्र माध्यम है जिसमें मानव जीवन विकसित और निष्पन्न होता है, तो उस विकास की केवल एक दिशा हो सकती है।' रुचि भेद के अनुसार कोई इस दिशा को निरंतर उच्चतर भविष्य की ओर विकास के रूप में देख सकता है और कोई एक अंधी गली के रूप में, जो केवल ह्रास, विषमता और मृत्यु की ओर बढ़ती है। अज्ञेय ने पश्चिम के उन लेखकों को बहुत महत्वपूर्ण माना है कि जिन्होंने इस दूसरी दिशा के माध्यम से आधुनिक पश्चिमी सभ्यता की मौलिक दुर्बलता को उजागर किया है और यह आशा उत्पन्न की है कि यदि पश्चिम का जनसमाज उसे समझ ले तो उसकी सभ्यता आधाररूप में बदल सकती है और एक नया स्वरूप और संरचना उपलब्ध कर सकती है। अज्ञेय चाहते तो यहाँ रूककर ऐतिहासिकवाद के उस महत्वपूर्ण स्वरूप पर गहराई से विचार कर सकते थे जिसका इतना बोलबाला है और जिसे ऐतिहासिक भौतिकवाद कहते हैं। हेगेल की तरह मार्क्स ने भी इतिहास को निरंतर विकासमानता और प्रगति के रूप में देखा। हेगेल के अनुसार इतिहास की दिशा कुछ की आजा दी से बहुतों की आजा दी की ओर अंततः सबकी आजा दी की ओर है। मार्क्स यह स्थापित करते है कि इतिहास वर्गों में विभाजित समाज के वर्गहीन समाज की ओर अग्रसर है। उन्होंने इस वर्गहीन समाज को पाने का रास्ता भी बताया। पूँजीवादी समाज का विश्लेषण करते हुए उन्होंने यह भविष्यवाणी भी की, कि उसमें एक ओर पूँजी का अधिकाधिक केंद्रण होता जाएगा और दूसरी ओर श्रमिकों का अधिकाधिक समाजीकरण। श्रमिकों की इस बढ़ती हुई शक्ति की चरम सीमा तब होगी जब पूँजीवाद अपनी ही विसंगतियों से समाप्त होकर वर्गहीन समाज को जन्म देगा। इतिहास में काल की गति के विश्लेषण के आधार पर की हुई ऐसी भविष्यवाणी पर कठोर टिप्पणी करते हुए अश्रद्धालु लोगों ने कहा है कि यह ऐसा ही है जैसा हम भविष्यवाणी करें कि कल यह मकान जल जाएगा, और फिर उस मकान पर गैसोलिन उड़ेलें और यथासमय उस पर माचिस की जलती हुई तीली फेंक दें और चीख़-चीख़कर दुनिया को दिखाएँ कि देखा हमने कहा था न कि यह मकान जल जाएगा, और वह जल रहा है! इस विद्रूप में यह कहा गया है कि हम दावा करते हैं कि व्यवस्था बदल जाएगी, और फिर हथियार जुटाते हैं और क्रांति का सूत्रपात करते हैं, और जब क्रांति सफल हो जाती है तब दावा करते हैं कि हमने तो पहले ही कह दिया था, हमारे सिद्धांत के अनुसार ऐसा होना ही था और वह हो गया है, इसलिए यह प्रमाणित है कि हमारा सिद्धांत ठीक है।

यह तो हुई मार्क्सवाद के कट्टर विरोधियों और शत्रुओं की बात। मार्क्स की भविष्यवाणियों पर जरा हम उन वामपंथियों की राय भी देखें जो लीक से हटकर सोचने में नहीं कतराये। डॉ. राममनोहर लोहिया कहते हैं कि मार्क्स के सिद्धांत के अनुसार क्रांति से पूँजीवादी व्यवस्था का विनाश और साम्यवादी व्यवस्था का आविर्भाव सबसे पहले यूरोप के अग्रणी औद्योगिक देशों और अमेरिका में होना था। वहाँ पूँजी का अधिकाधिक केंद्रीकरण जरूर हुआ परंतु श्रमिकों की गरीबी बढ़ी, लेकिन उन देशों के मजदूर वर्ग में नहीं, जो और अधिक गरीब हो गए, वे हैं तीसरी दुनिया के देश; जहाँ उद्योग बहुत पिछड़े हुए हैं और जिन्हें अविकसित या विकाशशील कहा जाता है। साम्यवाद यदि किसी देश में आया भी तो वह अमेरिका और इंग्लैंड जैसे विकसित देशों में न आकर चीन जैसे पिछड़े हुए देश में आया, जिसका मार्क्स की भविष्यवाणियों में कहीं नाम भी न था। सबसे विलक्षण बात यह है कि पश्चिमी यूरोप (और अमेरिका) और रूस की प्रगति संबंधी आशाओं और आकांक्षाओं में कोई मौलिक भेद नहीं है। दोनों जीवन-स्तर को निरंतर अधिकाधिक ऊँचा उठाने में जुटे हैं, दोनों अधिकाधिक उपभोग के मार्ग पर अग्रसर हैं। मानों, दोनों में केवल साधन का भेद है, साध्य का नहीं। भोग, तथा अधिक भोग को ही सभ्यता और जिसके विकास का प्राथमिक लक्षण मान लिया गया है। पर प्रश्न उठना चाहिए कि सभ्य मानवीय जीवन और उसकी सार्थकता की क्या यही एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ दिशा है? क्या मानव सभ्यता का कोई दूसरा आधार और रूप नहीं होना चाहिए?

अज्ञेय ठीक इसी बिंदु पर ऐतिहासिकतावाद पर आक्षेप करते हैं। वे कहते हैं कि इतिहास ने 'सनातन को, नित्यता को नष्ट कर दिया।' दो सौ वर्ष पूर्व तक के भारतीय जीवन-मूल्यों की स्थिरता का निरूपण करते हुए वे कहते हैं... भारतीय चेतना इस कारण आश्वस्त रह सकी कि उसके परिचित संस्थान और संगठन उसके अनुभव में स्थायी थे, एक ईश्वर-परक धर्म-संस्थान, एक ऋत अथवा सत्यपरक विश्व-संरचना, एक आवर्तनमूलक सांस्कृतिक संस्थान, एक परंपरा पर आधारित समाज संगठन... क्या यह कहा जाए कि दो शती पहले तक भारतवासी इतिहास की पकड़ में नहीं आए थे ... कि भारतीय मानव को ऐतिहासिकवाद के चुंगल में फँसे कुल दो सौ वर्ष हुए हैं? अज्ञेय यह चेतावनी देते हैं कि भारत के पास अब भी समय है कि वह रूककर सोच सके कि पश्चिम जैसा विकास ही उसकी सार्थक सभ्यता के लिए क्या सबसे उपयुक्त लक्ष्य है? पश्चिम में सत्य तत्व न रहकर ऐतिहासिक गति के साथ निरंतर परिवर्तनशील हो गया है। जब भारत को विकासशील देश कहा जाता है तब मानो मान लिया जाता है कि हमारा रास्ता भी ठीक वही होना चाहिए जिसे पश्चिम ने अपनाया है। लेकिन इस प्रवाह में क्षण-भर थमकर नए सिरे से सारे सवाल को सोचने की कोशिश की जा सकती है। अज्ञेय कहते हैं कि '... अब भी कम-से-कम यह संभावना तो बनी हुई है कि पश्चिम-जीवन ने जीवन के जिन आयामों को बिलकुल खो दिया है या मिटा दिया है उनसे हम संपृक्त तो रह सकें।' वे इस पर जोर देते हैं कि पश्चिम ने जिसे प्रगति कहा और जीवन-मूल्य माना वही जीने का एकमात्र रास्ता नहीं है। ऐतिहासिकतावाद में जिस अनित्यता और क्षणिकता तथा निरंतर परिवर्तनशील सत्य की स्वीकृति निहित है उसका व्यक्ति की अपनी अस्मिता पर भी परिणाम होता है। अनित्यता का बोध ' हमारे काल-प्रत्यय को ही नहीं, समूचे अनुभव - समूह को, सरल और प्राथमिक इकाइयों में' विखंडित कर देता है। अनुभव के इस विखंडन में आत्म और व्यक्तित्व के विखंडन के भी अंकुर हैं : 'अनुभव' की यह परिभाषा इस धारणा का समर्थन नहीं करती है कि व्यक्ति अपनी अस्मिता (सेल्फ़) का अभ्यंतर रूप से संगठित परंपरा के रूप में अनुभव कर सकता है। स्पष्ट ही यह विचार-परिपाटी, अस्मिता और आत्मबोध के लिए एक संकट उत्पन्न कर रही है।

यहाँ रुककर अज्ञेय की शाश्वत, कालातीत, सनातन, नित्य संबंधी धारणा पर विचार कर लेना चाहिए। नित्यता और प्रकृति में क्या संबंध है? प्रकृति तो निरंतर परिवर्तनशील है। इस परिवर्तनशीलता को कुछ लोग नश्वरता और भंगुरता के संदेश के रूप में देखते हैं, अन्य (जिसमें अज्ञेय भी हैं) सतत आवर्तन के रूप में। वे कहते हैं कि 'जो कुछ है सब मिटता जाएगा ... लेकिन मिट जाने के लिए नहीं, इसलिए कि दूसरा कुछ बनता जाएगा।' इस तरह प्रकृति का संदेश भंगुरता और अनित्यता का नहीं, निरंतर सृजनशीलता का है। प्रकृति के सारे परिवर्तनों में ऋत या नियम निहित है, जो स्थायी है। स्थायित्व उस गड़रिए के भी जीवन में है जिससे यात्रा पर अज्ञेय ने पूछा था, 'क्या तुमने साँकल में बँधा हुआ कुत्ता ले जाते हुए किसी को देखा है?' और उसने उत्तर दिया, 'नहीं तो, हमने नहीं देखा।' तुलना करते हुए अज्ञेय कहते हैं कि यही सवाल यदि उन्होंने दिल्ली या बंबई या कलकत्ते में सड़क के किनारे बैठे हुए किसी व्यक्ति से पूछा होता तो वह जवाब देता : 'अरे साहब, रास्ते चलते सैकड़ों आदमी और कुत्ते आते-जाते रहते हैं... हम क्या हिसाब रखते हैं? ' अज्ञेय विश्लेषण करते हैं कि जहाँ महानगर में बँधे हुए कुत्ते को टहलाते हुए आदमी को देखना दैनंदिन अनुभव की इतनी साधारण घटना होगी कि उसकी ओर ध्यान न जाय, वहाँ ग्रामीण गड़रिये के लिए, वह एक ऐतिहासिक घटना होगी, जिसे वह 'अपने साधारण दिन के नहीं, समूचे जीवन के प्रमाण से नापता।' इस उदाहरण से अज्ञेय यह बात उठाते हैं कि विभिन्न मानव-समूहों का काल एक-दूसरे से भिन्न हुआ करता है और लेखक के सामने यह प्रश्न खड़ा रहता है कि वह इनमें से किसके काल के अनुरूप लिखे। उनकी राय यह जान पड़ती है कि लेखक को इस प्रकार लिखना चाहिए कि वह विभिन्न काल-आयामों का एक साथ निर्वाह करके अपनी रचना को सार्वजनीन बना सके। पर अज्ञेय के इस उदाहरण में एक और निष्कर्ष निहित है; गड़रिये के जीवन की सापेक्ष घटनाहीनता एक नित्यता या स्थायित्व का बोध करा सकती है और महानगरों के मनुष्य के जीवन की घटना-संकुलता-क्षणिकता और भागते हुए समय का बोध उत्पन्न करती है। नित्यता और अनित्यता की इस निष्पत्ति को यदि मान लिया जाए तो नित्यता के पक्ष में फैसले का अर्थ होगा कि महानगरों की जीवन-शैली की तुलना में हम ग्राम्य गड़रियों की जीवन-शैली का वरण करें। पर क्या अज्ञेय के आकांक्षित शाश्वत आयाम का यही रूप है?

नहीं। मध्ययुग के मनुष्य के जीवन में शाश्वत के आयाम की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं कि 'मानव एक देवानां पूरयोध्या या सिटी ऑफ गॉड में रहता था और एक शाश्वत जीवन अथवा अमरत्व के बारे में जो आश्वस्त था। इस उच्चतम परिकल्पना से कुछ नीचे वह दार्शनिक ढाँचा था जो शाश्वत सत्य, शाश्वत मूल्य और पुरूषार्थों पर आधारित था। इसमें भी निचला स्तर वह सामाजिक और राजनीतिक ढाँचा था जिसमें मानव का साधारण व्यवहार - जीवन बीतता था, लेकिन इस पार्थिव स्तर में भी जो सामाजिक और राजनीतिक संस्थाएँ थीं वे स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से स्थायी संस्थाएँ थीं।' इस तर्क को यदि आगे बढ़ाया जाए तो कहा जा सकता है कि भारतीय समाज में स्थायित्व का एक सूत्र यहाँ की वर्ण-व्यवस्था भी है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भारतीय संस्कृति के स्थायित्व और मौलिकता के आधार में वर्ण-व्यवस्था की मौजूदगी का उल्लेख किया है और वर्तमान युग के परिवर्तनों के संदर्भ में यह संकेत किया है कि इन अवश्यभावी परिवर्तनों के बाद भारतीय समाज शेष संसार की तुलना में अपना वैशिष्ट्य न रख सकेगा, और पहले जैसा नहीं रह जाएगा। क्या स्थायित्व के नाम पर अज्ञेय वर्ण-व्यवस्था को बरकरार रखने की सलाह देंगे, और क्या स्थायित्व के लिए ईश्वर और अमरत्व पर विश्वास जरूरी है? अज्ञेय का उत्तर हम क्रमशः देखेंगे।

भारत और पश्चिम तथा शाश्वत और क्षणिक के इस प्रश्न पर डॉ. राममनोहर लोहिया एक-दूसरे ढंग से विचार करते हैं। पश्चिम को केवल क्षणिकता से आबद्ध न मानकर वे कहते हैं कि : पश्चिम ने ईश्वर और स्थायित्व तथा विज्ञान और क्षणिकता को एक साथ लेकर चलने का प्रयास किया। ये दोनों आयाम एक बिंदु पर एक-दूसरे को काट देते हैं। जरूरत इस बात की थी कि दोनों में कोई सामंजस्य स्थापित किया जाए, इस सामंजस्य में आध्यात्मिक समानता तथा सामाजिक और आर्थिक समानता की प्यास में आधुनिक सभ्यता, आध्यात्मिक समानता की बात भी भूल गई। अब वह अपने ही बोझ से टूट रही है, जैसे पहले की मानव सभ्यताओं ने, जिन्होंने आध्यात्मिक समानता की बेजोड़ ऊँचाइयाँ प्राप्त की और बाद में अपनी कमर तोड़ ली क्योंकि वे सामाजिक और आर्थिक विषमताओं की भयानक बुराइयों में गर्क हो गईं। यदि पिछली सभ्यताएँ सामाजिक विषमता और आध्यात्मिक समानता के अनमेल बोझ से टूटीं, तो आधुनिक सभ्यता, सामाजिक एकता और आध्यात्मिक विषमता के अनमेल बोझ से टूट रही हैं। क्योंकि क्रांतिकारी तकनीकी ढंग के अत्यधिक विकास से आधुनिक मानव ऐसी मानसिक स्थिति में पहुँच गया है जब वह अन्य मानवों के साथ प्रत्यक्ष और निकट का अपनापन अनुभव नहीं कर पाता।

अज्ञेय का शाश्वतता का आयाम जहाँ मध्ययुगीन स्थायित्व के लिए एक उच्छ्वास जैसा प्रतीत होता है (जैसा है नहीं)। वहाँ राममनोहर लोहिया ऐसे स्पष्ट स्थायित्व और जीवन की पूर्णता का उल्लेख करते हैं जिसमें आध्यात्मिक और सामाजिक तथा आर्थिक समानता की एक साथ निष्पत्ति होती है और जिसमें मानवों के बीच में एक प्रत्यक्ष और निकट का अपनापन सिद्ध होता है। कुल मिलाकर यह आधुनिक पश्चिमी सभ्यता से भिन्न एक अधिक सर्वांगपूर्ण मानव संस्कृति का प्रस्ताव है।

डॉ. लोहिया एक कदम और आगे जाते हैं। प्रवाह और स्थायित्व की अधिक संगत और वस्तुपरक विवेचना करते हुए वे कहते हैं, 'प्रत्येक क्षण दोनों हैं - प्रवाह और स्थायित्व। अब तक मानव ने क्षण के इन दो अलग स्वरूपों को एक में मिलाने की भूल की है। इतिहास के सभी दार्शनिकों ने जिन्होंने आने वाले स्वर्णयुक के बारे में सोचा है उन्होंने क्षण को केवल प्रवाह या गति के रूप में लिया है और वे इसके स्थायी स्वरूप के बारे में भूल रहे हैं। सभी नीतिज्ञ जिन्होंने व्यक्ति के चरित्र और उच्च आदर्शों के बारे में उपदेश देने का प्रयत्न किया है, उन्होंने क्षण को केवल स्थायी मानकर सोचा है और उसे प्रवाह के रूप में देखने से चूके हैं। लेकिन क्षण, प्रवाह और स्थायित्व दोनों हैं। जब वह प्रवाह है, वह इतिहास के क्षेत्र में है, वहाँ चालक शक्तियाँ खोजी जा सकती हैं। जब स्थायी है, वह कथाओं और पौराणिक गाथाओं, कला और साहित्य, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में हैं। ...मनुष्य की नियति को केवल इतिहास के पृष्ठों में ही नहीं पढ़ना होगा, बल्कि हर क्षण के अशेष अमरत्व में भी जो बड़ी भव्यता के साथ ऐसी कहानियों में अंकित हो जो कभी घटित नहीं होतीं पर वे शाश्वत और सत्य हैं। यदि मनुष्य को इतिहास में रहना सीखना है, तो उसके बाहर रहने की भी उसे उतनी ही आवश्यकता है।' हम कह सकते हैं कि समस्त परिवर्तन के बीच में मनुष्य की मूल मनुष्यता ही वह चीज है जो स्थायी बनी रहती है। यदि सबसे महत्वपूर्ण हमारा मनुष्य बने रहना है तो तकनीकी खुद मुख्तार होकर अपने प्रवाह में हमें अनजानी मंजिल की ओर बहाए लिए जा रही है उसके प्रवाह से बाहर निकलकर उसे हमें अपने काबू में लाना होगा और उसे मनुष्य की संकल्पित दिशाओं में चलाना होगा।

नित्यता के संबंध में अपने विचार अज्ञेय ने अपनी इस चिंतन श्रृंखला के मानवीय कालः अनुभव का क्रम शीर्षक के अंदर व्यक्त किए हैं जो उनकी पुस्तक का सबसे समृद्ध और पांडित्यपूर्ण अंश है। अपना कथ्य निर्मित करने के लिए और प्रमाण जुटाने के लिए भी उन्होंने भारत और पश्चिम के दार्शनिकों तथा कवियों और लेखकों से विपुलतापूर्वक उद्धरण दिए हैं। इस सारे चिंतन की धुरी में 'नित्यता' जिस संदर्भ में प्रयुक्त है उसका स्पष्टीकरण करते हुए वे कहते हैं कि 'वर्तमान संदर्भ में नित्यता, शाश्वतता, इटर्निटी का अभिप्राय एक अंतहीन काल नहीं है बल्कि एक कालातीत आयाम मात्र है।' अतः यह देखना है कि अज्ञेय के कालातीत आयाम के अंतर्गत किन-किन बातों का समावेश है। अपने विवेचन की शुरुआत करते हुए वे कहते हैं कि 'मनुष्य जहाँ एक ओर काल को प्रवाह अथवा परिवर्तन के रूप में अनुभव करता है, वहाँ दूसरी ओर काल की प्रतीति उसे आत्म के विकास के संदर्भ में भी होती है।' प्रश्न उठता है कि काल का स्वरूप यदि अनित्यता और क्षणिकता का है तो हमें अपनी सत्ता-अस्ति या अस्मिता की निरंतरता का बोध कैसे होता? विलियम जेम्स को आधार बनाकर वे अनुभव के ऐसे क्षण से आरंभ करते हैं जिसका अपना एक स्वतंत्र लघु विस्तार है, जिस पर टिके रहकर हम दोनों दिशाओं में काल का अवलोकन कर सकते हैं। ये दोनों दिशाएँ भविष्य और अतीत की हैं। यत्किंचित विस्तार वाला यह क्षण यह संभव बनाता है कि वर्तमान में जीते हुए ही हम नैरंतर्य का अनुभव कर सकें। इस प्रक्रिया का नियमन हमारी स्मृति करती है। स्मृति एक ओर अनुभवों का संग्रहण करती चलती है, किंतु उसका एक रचनात्मक धर्म भी है। अपनी इस रचनाधर्मिता के द्वारा स्मृति अपने संग्रह में निरंतर चुनाव करती रहती है अनुभवों को नए क्रम में लगाती है, उनका संशोधन करती है और सबका पुनर्मूल्यांकन करने में व्यस्त रहती है। बार-बार होने वाली घटनाएँ भी याद के बाहर फेंक दी जा सकती हैं और केवल एक बार हुई घटना भी सँजोई जा सकती है। सबसे बढ़कर यह है कि स्मृति अलग-अलग समयों में हुई विशिष्ट घटनाओं को एक संयोजित क्रम में तत्क्षण प्रस्तुत भी कर सकती है। स्मृति की इसी विशेषता को अज्ञेय ने रचना-धर्म कहा है और उनकी राय में यह कदाचित वही चीज है जिसे 'रचनात्मक कल्पना' कहते हैं। चूँकि स्मृति अनुभूत घटनाओं को उनके घटित होने के कालक्रम से मुक्त कर सकती है और करती है, तथा अनुभवों को एक अपनी निर्धारित संरचना प्रदान कर सकती है, इसलिए अपनी रचनाधर्मिता में वह कालातीत आयाम की वस्तु है।

प्रवाह के रूप में काल की अनुभूति यह प्रश्न उठाती है कि इस प्रवाह की दिशा क्या है? उत्तर है कि वह निश्चित और अप्रत्यावर्तनीय दिशा, मरण की है। इसे ही ध्यान में रखकर हाईडेगर ने कहा था कि सारे प्राणियों में मनुष्य ही ऐसा है जिसे आत्मचेतन होने के नाते अपनी मुत्यु की अवश्यभाविता की पहले से जानकारी है। अतः मनुष्य के सामने सवाल है कि इस जानकारी के संदर्भ में वह क्या करे। यह टिपिकल अस्तित्ववादी प्रश्न है। इस संदर्भ में मनुष्य का संकल्पित निर्णय या वरण, मनुष्य की सत्ता-अस्ति का प्रमाण बनता है और काल प्रवाह से मुक्त करके इस 'अस्मि' को कालातीत आयाम में प्रतिष्ठित कर देता है। भारत के पुराणों में भी यह प्रश्न परीक्षित के माध्यम से उठाया गया है। परीक्षित अभिशप्त है कि वह एक निश्चित अवधि के अंत में मर जाएगा। मृत्यु और उसके निश्चित क्षण की यह जानकारी परीक्षित के सामने समस्या उत्पन्न करती है कि इस जानकारी के संदर्भ में जिन क्षणों में वह जीवित है उनमें क्या करें? उसकी इस जिज्ञासा के उत्तर में ही भागवत में चिरंतन लीला प्रस्तुत की गई। भागवत और उसमें वर्णित चिरंतन लीला कालातीत आयाम में प्रतिष्ठित है।

कालातीत आयाम में काव्य और कला और उनमें भी विशेषतः बिंब और प्रतीक शामिल हैं। इसकी व्युत्पत्ति का आरंभ करते हुए अज्ञेय करते हैं, 'काल की प्रतीति, गति की उन्मुखता अथवा प्रतिमुखता की प्रतीति है। उन्मुखता की प्रतीति से भविष्य का और प्रतिमुखता से अतीत का बोध होता है। संत आगुस्तीन की सुविधाजनक परिभाषा में उन्मुखता प्रतीक्षा या अपेक्षा और प्रतिमुखता स्मृति है।' इस वर्तमान को हमारा भविष्य और हमारा अतीत समान रूप से निरूपित और नियंत्रित करते हैं। इस भूत और भविष्य में 'गत्यात्मक परस्परता में महत्व प्रभावगर्भ आसंग का रहता है। यह प्रभावगर्भिता हमारे अनुभव का मूल्य संपृक्त पक्ष है। साहित्य प्रधानतः इन्हीं अर्थगर्भ आसंगों को प्रस्तुत करता है। बिंब और प्रतीक के द्वारा हम मूल्य-निरपेक्ष अर्थों के बदले मूल्यवाही अर्थों और प्रभावगर्भिता तक पहुँचते हैं। इसके अलावा स्मृति में यह विशेषता भी होती है कि कोई घटना पूरी तरह विस्मृत हो जाने पर भी संबद्ध अनुभूति की गुणात्मकता अपने मूल रूप में सुरक्षित बनी रहे। इस गुणात्ककता को बनाए रखना और कल्पना के द्वारा उसे एक संवेद्य रूप देना अज्ञेय के अनुसार काव्य का मुख्य प्रयोजन है। निष्कर्ष निकालते हुए अज्ञेय कहते हैं, 'स्मृति के माध्यम से व्यक्तित्व के अनवरत पुनर्निर्माण और अस्मिताबोध का भी एक कालातीत आयाम है।' स्पष्ट ही वे काव्य को व्यक्तित्व के पुननिर्माण और अस्मिताबोध जोड़ते हैं।

कालातीत आयाम की चर्चा अभी तक मुख्य रूप से व्यक्ति की वैयक्तिक अस्मिता और स्मृति के संदर्भ में की गई। पर उसका एक सार्वभौम मानवीय पक्ष भी है जो कलाओं और साहित्य में मूलभूत महत्व रखता है। यह मिथक के रूप में विद्यमान है। मिथक मानव अस्तित्व के कालातीत प्रारूप है। मिथकीय घटनाएँ एक स्वप्नकाल में घटित होती हैं जो 'सार्वभौम मानवीय अर्थवत्ता रखने वाली घटनाओं की कालातीत कोटि प्रस्तुत करता है।' वर्तमान युग में मिथकीय सामग्री के उपयोग और समकालीन भाषा में उसके पुनर्निर्वचन की बढ़ती हुई साहित्यिक प्रवृत्ति में अज्ञेय यह आशय देखते हैं कि अनुभव का एक कालातीत या शश्वत आयाम मनुष्य की एक आवश्यकता है जिसके बिना उनकी अस्मिता, काल के बिकाऊ, यांत्रिक और जिंसी रूप से आहत होकर नष्ट हो जाएगी। आधुनिक सभ्यता के बिकाऊ जिंसी काल में अनुभूति की गुणात्मकता का महत्व क्रमशः घटता गया है और अतीत के साथ हमारी बाह्य और आभ्यंतर दूरियाँ निरंतर बढ़ती जा रही हैं। अज्ञेय कहते हैं कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अतीत मर चुका है, केवल इतिहास में नहीं, व्यक्ति के निजी जीवन में भी। परिणाम यह है कि 'हमारा अनुभूत-काल अनुदिन पतला, फीका, भुरभुरा,अधिक छिछला, क्षीणतर और इकहरा, एकायामी होता जाता है। हमारे अनुभव का प्रसार बहुत अधिक फैल गया है लेकिन उस अनुभव का सारतत्व लगातार सिकुड़ता गया है।' आधुनिक मनुष्य अंतर्वैयक्तिक संबंधों में गहरे संपृक्त होना या उलझाना नहीं चाहता। स्मरणीय है कि डॉ. राममनोहर लोहिया ठीक इसी तथ्य को आधुनिक सभ्यता की अपनी आलोचना में रेखांकित करते हैं। इस भूमिका में उन्होंने भी काव्य और मिथकों के महत्व का उल्लेख किया है। अज्ञेय के अनुसार मिथक एक जातीय अथवा सामूहिक अस्मिता के भी प्रतीक हो सकते हैं। वे हमें केवल मानवीय अतीत से नहीं जोड़ते बल्कि एक निरंतर वर्तमान के रूप में हमारे अनुभव और अस्मिता को एक गहराई और विराटता भी प्रदान करते हैं।

ये निष्पत्तियाँ अज्ञेय की पुस्तक के इस अंश की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु हैं। अज्ञेय का रास्ता अपना है पर कालातीत आयाम से संबद्ध उनकी निष्पत्तियाँ और निष्कर्ष अन्य विद्वानों और रचनाकारों के निष्कर्षों से मेल खाते हैं। काल से मुक्ति की समस्या को बीसवीं शती के अधिकांश प्रमुख रचनाकारों ने सर्वोपरि रखा। इस कार्य को करने के उनके रास्ते अलग-अलग थे। एक उदाहरण अपने निबंध के आरंभ में हमने जेम्स ज्वाइस के स्थिरण का सिद्धांत दिया। पश्चिमी विद्धानों ने कालबोध का एक सर्वमान्य प्रारूप प्रस्तुत करने के बदले हर लेखक के कालबोध के बारे में कुछ सूत्र देते हैं और टी.एस. ईलियट तथा प्रूस्त के कालबोध को इस रूप में प्रस्तुत करते हैं कि उनसे उनकी निष्यत्तियों का समर्थन हो। इससे एक और जहाँ उनका उपस्थापन प्रभावशाली और समृद्ध हो गया है वहाँ एक हद तक उन रचनाकारों की अपनी विशिष्टता का पक्ष अस्पष्ट और ओझल रह गया है। अतः इस बिंदु पर कुछ रूककर हम यह देखने का प्रयत्न करेंगे कि इन रचनाकारों के बारे में अज्ञेय के उपस्थापन और उनकी विद्वानों द्वारा सुविवेचित विशिष्टिता में क्या अंतर है।

सर्वप्रथम अज्ञेय, इलियट की एक छोटी-सी चेतना की बात उठाकर यह उद्धरण देते हैं '... अतीत काल और भविष्यत काल / एक छोटी-सी चेतना की जगह / छोड़ देते हैं / चेतना होना काल में न होना है।' टिप्पणी करते हुए अज्ञेय कहते हैं कि क्षण में विलियम जेम्स द्वारा संकेतिक 'लघु-विस्तार' न होता, तब वास्तव में हम पूरी तरह चेतन हो सकते थे और तब काल में बिलकुल न होते। लेकिन यह संभव नहीं है। ईलियट काल की सर्वव्यापी सत्ता की चर्चा करते हुए ऐतिहासिक काल का उल्लेख करते हैं जो सदा एक अंत की ओर इंगित करता है जो अंत सदा होता है। इसके बाद ईलियट का यह उद्धरण है कि 'केवल काल में गुलाब-गाछी का क्षण (और ऐसे ही कुछ अन्य क्षण) याद किए जा सकते हैं। भूत और भविष्य से गुम्फित हो सकते हैं। केवल काल के द्वारा काल को जीता जा सकता है।' अज्ञेय टिप्पणी करते हैं : 'मेरी निजी धारणा तो यह है कि ईलियट जब 'क्षण' के साथ 'स्मरण करने' की बात जोड़ता है, तब वह एक हेतुवाद का सहारा लेता है। क्योंकि स्मृति की तो परिभाषा ही उसे कालबद्ध बना देती है। यदि काल पर विजय पाना संभव है - केवल कल्पना में नहीं, वास्तव में प्राप्त की हुई विजय के रूप में ... तो वह विजय स्मृति के माध्यम से तो नहीं होगी। काल पर विजय केवल शुद्ध वर्तमान के आत्मसाक्षात्कार में ही हो सकती है।... संभव है कि ... गुलाब-गाछी का क्षण ऐसा क्षण रहा है, पर यदि ऐसा था तो उसे क्षण में काल पर पायी हुई विजय उसी क्षण की थी।' इस टिप्पणी में इतना तो स्पष्ट है कि काल पर अपनी धारणा (या बोध) को प्रमाण मानकर अज्ञेय उक्त छंद में वर्णित ईलियट के अनुभव की प्रामाणिकता को संदिग्ध करार दे रहे हैं, और यह बात तब,जब उनका दावा है कि 'बाहर से' 'एक ही' जान पड़ने वाली घटना दो पृथक् व्यक्तियों द्वारा दो पृथक् और विशिष्ट रूपों में अनुभव की जाती है क्योंकि दो गृहिता स्मृतियाँ तथाकथित 'एक' घटना को दो संपूर्ण तथा पृथक् और विशिष्ट संदर्भों में स्थापित करती हैं, उन्हें पृथक और विशिष्ट स्मृति संरचानाओं में गठित करती है, उन्हें अलग-अलग अर्थ और मूल्य देती हैं और दोबारा आह्वान के लिए अलग-अलग कोटियों अथवा वर्गों में रखती हैं। 'यदि एक ही घटना के दो अलग व्यक्तियों में दो संदर्भ-वैशिष्ट्य हो सकते हैं तो क्या यह संशय नहीं होता कि इलियट के संदर्भ (और आयाम)को अज्ञेय ने अपने ढंग से पढ़ा है। अज्ञेय जब दावा करते हैं कि मैं उस पक्ष का हूँ, जो क्षण में अमरत्व की प्रतिज्ञा से आरंभ करके कालजित होने का दावा करता है ... क्षणिक अमरत्व के ये क्षण चाहे जितने ही लघु और दुर्लभ क्यों न हों, तब क्या वे यह भी कहना चाहते हैं कि जिन लेखकों को अमरत्व या कालजित होने का अनुभव कुछ दूसरे प्रकार से हुआ है वे गलत हैं? एक का अनुभव दूसरे के अनुभव से भिन्न हो सकता है, पर वह उसे काट नहीं सकता, क्योंकि दोनों अनुभवों में उनके अनुभोक्ताओं की सापेक्षता है।

इलियट के कालबोध में स्थितियों की एक क्रमिकता है और सारा क्रम एक परिणाम या निष्कर्ष पर पहुँचता है जिससे ईलियट का अपना अस्मिता-बोध रूप ग्रहण करता है। पहली स्थिति में ईलियट का अनुभव है कि क्षण इतनी तेजी से विलीन होते हैं कि उनका एकमात्र अवशिष्ट बिंब, प्रकाश और अंधकार की पलक-झपकती अवधियों का होता है। उनमें कोई नैरंतर्य नहीं काल खंडित बिंबों का एक ढेर है। तेजी से चलकर काटती हुई काल की गति कोई ठहराव नहीं देती। यह निरुद्देश्य प्रखर प्रवाह 'एक गोलाकार मरुस्थल में चीखते हुए रूपों का अंतहीन बहाव है जो आते हैं और चल देते हैं।' इस काल या जगत में आशा की कोई जगह नहीं। पर कभी-कभी किसी पक्षी का गान (या ऐसा ही कोई अन्य संवेदन) इस पल तक मुसाफिर के कदम थाम देता है। ऐसे बिंब रहस्यात्मक ढंग से मन को उनकी क्षणिक वास्तविकता के साथ आबद्ध कर देते हैं। वे इस बात में भिन्न हैं कि वे अपने तईं कायम रहते हैं। वे गति, और खुद काल के बाहर हैं। इनमें 'प्रथम या आरंभिक क्षण होता है जो विशिष्ट है, आघात और अचंभे का है, यहाँ तक कि आतंक का एक क्षण, जो कभी बुलाया नहीं जा सकता।' गुलाब-गाछी का क्षण ऐसे 'आंशिक आह्लाद' का क्षण है। लेकिन ऐसे क्षण भी अस्थिर होते हैं उनका अर्थ हम नहीं पकड़ पाते। क्षण भागते जाते हैं और उनके अर्थ भी। लंबे समय के बाद उनके संदेश की थाह पायी जाती है, इसीलिए 'केवल काल में ही गुलाब-गाछी का क्षण स्मरण किया जा सकता है।' उसकी पुनरावृत्ति कभी नहीं होगी ऐसे क्षण अनुभव की वृहत्तर पूर्णता में ही अवशिष्ट रहेंगे। हमसे, वर्तमान से दूर हमारी स्मृति में, अतीत बन चुकने के बाद वे उन सब परंपराओं से आबद्ध हो जाएँगे जो अतीत निर्मित करता है। सब कुछ इस बहुमूल्य और सुदूर सत्य के साथ दुष्कर संपर्क पर निर्भर करेगा जिसे स्मृति इतने घटिया ढंग से सुरक्षित रखती है और जो समस्त परंपराओं के प्रति वर्तमान की घनघोर निरपेक्षता के द्वारा कटता रहता है। अतः खुद को परंपरा और काल के संचित ज्ञान पर निर्भरता के लिए अभ्यस्त करना होगा। अतीत को स्वीकारना होगा; केवल चुने हुए अंशों में नहीं, बल्कि उसकी समग्रता में, उसके दोषों और पापों सहित। अतीत के पापों के बोझ को स्वीकारने का अर्थ उसके प्रायश्चित्त की आवश्यकता को भी स्वीकारना है। भविष्य को स्वीकारने के लिए भी खुद को प्रस्तुत करना है। हम काल का उद्धार तो कर सकते हैं, पर उसे विनष्ट नहीं कर सकते। काल का यह उद्धार काल के ही माध्यम से, खुद को उसके

प्रति समर्पित करके ही, अपनी मानवीय स्थिति की स्वीकृति द्वारा ही, किया जा सकता हैः 'क्रिश्चियन काल बलिदान का काल है। यह आत्म-बलिदान जो हम अपनी वासनाओं, अपने आनंदों, स्वयं अपनी वैयक्तिकता का करते हैं, जिसमें हम, प्रथम, अतीत की व्यवस्था को स्वीकार कर सकें, द्वितीय, भविष्य के द्वारा आरोपित कर्तव्यों को स्वीकार कर सकें और अंत में अस्तित्व की केंद्रीय इकाई की निःशेष अधीनता स्वीकार कर सकें।' अब इस संपूर्ण संदर्भ को ध्यान में रखकर हम गुलाब-गाछी के क्षण और उसके स्मरण को फिर से देखें, इसकी पूरी गहराई और व्याप्त में कि काल, काल के द्वारा ही, जीता जा सकता है। और तब हम देख लेंगे कि उसके बारे में अज्ञेय की टिप्पणी कितनी असमीचीन और अप्रासंगिक है। गुलाब-गाछी के क्षण को इस पूरी परिधि से तोड़कर ईलियट के प्रति अन्याय है।

जो कुछ हमने देखा उसका सारांश यही है कि अज्ञेय और इलियट के कालबोध में अंतर है और उसके सहयोगी परिणाम के रूप में उनके अस्मिताबोध और व्यक्तित्व में भी भिन्नता है। इन दोनों से भिन्न अपनी विशेषता रखता हुआ मार्सेल प्रूस्त का कालबोध है। अज्ञेय स्पष्ट करते हैं कि प्रूस्त ने इस प्रतिज्ञा से आरंभ किया था कि 'व्यक्तिगत क्षणिक प्रभाव पृथक, वियुक्त और नैरंतर्य-रहित होते हैं।' इसका निष्कर्ष है कि आत्मबोध एक भ्रांति है। ऐसी स्थिति में आत्मसत्ता की खोज एक विलक्षण बात बन जाती है। इसी विलक्षणता की अनुभूति प्रूस्त की इस उक्ति में है कि 'जब कोई एक व्यक्ति रह नहीं जाता, तब फिर अपने ही मन, अपने व्यक्तित्व को वैसे ही खोजता हुआ जैसे कोई किसी खोयी हुई वस्तु को खोजता है, कोई किसी दूसरे आत्म अथवा चरित्र को न पाकर अपने ही आत्म को कैसे पा लेता है? ' इसमें 'जब कोई एक व्यक्ति रह नहीं जाता' वाला बोध जवाहरलाल नेहरू की 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' के प्रिफेस की एक उक्ति में भी है। यह पुस्तक जेल में लिखी गई। छपने के पहले जेल के बाहर जब नेहरू ने उसे पढ़ा तो उन्हें ऐसा लगा कि वे किसी दूसरे के द्वारा लिखे किसी परिचित अंश को पढ़ रहे हैं, जो दूसरा उनका समीपी तो है और तभी जो कोई और है। निष्कर्ष देते हुए अपनी पुस्तक के बारे में वे कहते हैं, 'वह मेरी है, फिर भी मेरी जैसी निर्मित आज है, वह मेरी नहीं है; वह मेरे किसी विगत आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है जो उन दूसरी आत्मसत्ताओं के लंबे अनुक्रम में जुड़ चुका है जो कुछ समय रहे और अपने पीछे एक स्मृति छोड़ते हुए धुँधलाते हुए विलीन हो गए।' इसमें विलीन हुई आत्मसत्ताओं की एक पूरी कतार की बात कही गई है जो स्मृति छोड़ गई है और यद्यपि नेहरू को अपने वर्तमान आत्म से तथा परस्पर उनकी भिन्नता की तीखी अनुभूति है तथापि इसका बोध उन्हें है कि वे उनके ही रूप हैं। प्रूस्त की विलीन आत्मसत्ता का बोध इससे बहुत भिन्न है। वह एकदम विलीन हो गई है जैसा कि उनके इस कथन से जाहिर होता है : 'और जब मैं बीच रात में जागा, इससे अनजान कि मैं कहाँ था, मुझे शुरू में यह भी नहीं मालूम था कि मैं कौन था, मुझमें केवल अपनी आदिम सहजता में 'होने' का एक बोध था जैसा कि एक पशु की चेतना की गहराइयों में झिलमिला सकता है; मैं एक गुफावासी से भी बढ़कर निराश्रित था।' फिर भी प्रूस्त जहाँ खोज की बात करते हैं; और प्राप्ति की संभावना टोहते हैं वहाँ नेहरू की पुस्तक का शीर्षक संकेत करता है कि उनकी 'पुनर्प्राप्ति' खोज की एक यात्रा है। यह खोज की यात्रा कदाचित केवल भारत की खोज की यात्रा नहीं है, उसके माध्यम से और उनके अंदर से अपनी विलीन आत्मसत्ताओं की पूरी श्रृंखला की खोज भी है, जिसका उल्लेख ऊपर हुआ है। यदि ऐसा है तो प्रूस्त की खोज और नेहरू की खोज में एक समांतरता है। यह जरूर है कि नेहरू का कालातीत आयाम अपनी पूर्णता में एक संपूर्ण जाति और उसकी संस्कृति का आयाम है।

अज्ञेय प्रूस्त की खोए हुए काल की खोज और अपनी 'शेखर : एक जीवनी' की समांतरता का उल्लेख करते हुए उनकी समानता और भिन्नता के कुछ बिंदु प्रस्तुत करते हैं। दोनों की समानता का बिंदु यह है कि दोनों का ही लक्ष्य अस्मिता की खोज है और दोनों में ही स्मृति की या बीते हुए की गवेषणा है। अंतर इस प्रकार है - (1) प्रूस्त की खोज एक पर्याप्त अवकाश में शुरू से ही एक कालातीत आयाम में मौजूद है। शेखर की खोज काल के विरुद्ध एक दौड़ है, एक ऐसी मृत्यु की छाया में जो एक अस्वाभाविक टूटन है; (2) प्रूस्त आत्म की खोज में एक 'पूर्वग्रह - मुक्त या' 'अप्रतिबद्ध' चित्त लेकर चलता है। शेखर, पूर्वग्रह-मुक्त और अप्रतिबद्ध नहीं है। उसे अविचल विश्वास है कि आकस्मिक ढंग से समाप्त होने वाले उसके जीवन में भी एक संपूर्ण अर्थवत्ता है जिसे वह अवश्य खोज लेगा। मृत्यु और घटनाओं की आकस्मिकता में भी एक नियोजन है, या हम कहें तो एक नियति है। मेरी राय में इनमें पहला बिंदु केवल तकनीकी अर्थ में भिन्नता प्रदर्शित करता है। यह तो ठीक है कि फाँसी द्वारा मरने वाले शेखर के पास भविष्य की संभावना ही नहीं है, केवल विगत है, और इसलिए वह बीते हुए में अपनी अस्मिता और उसके अर्थ को खोजता है? इसलिए कि उनके लिए भी भविष्य नहीं है, और है तो वह केवल मृत्यु है, क्योंकि जो प्रूस्त आज है वह कल नहीं रहेगा, कल जो होगा वह कोई और होगा, और वह भी मरेगा तथा कोई दूसरा होगा। इस तरह भविष्य का द्वार मृत्यु से बंद है। रह जाता है केवल विगत, जिसमें खोए हुए आत्मा को फिर से पा लेने की संभावना हो सकती है। शेखर के लिए भी विगत का पथ है और प्रूस्त के लिए भी, क्योंकि भविष्य दोनों के लिए नहीं है। रह गई पूर्वग्रह और प्रतिबद्ध चिंतता की बात। शेखर में उसका प्रकटन नियति के रूप में हुआ है। नियति शब्द ही पूर्व निर्धारण या 'प्रिडिटरमिनेशन' की सूचना देता है, और जो पहले से ही निश्चित है वह काल की वस्तु न होकर कालातीत आयाम की वस्तु है। जँहा तक शेखर का खोजा हुआ और खोजकर पाया हुआ अर्थ 'नियति', 'जन्मजात विद्रोही की नियति' है, वहाँ तक वह काल की वस्तु नहीं है। काल तो सिर्फ उस कालातीत आयाम का वाहक है, केवल पूर्वनिर्धारित का बाध्य और असहाय उन्मीलन है, और जो कालखंड इस उन्मीलन को घेरता है वह केवल एक अवधि है, अपने तईं नास्ति है। फिर, शेखर फाँसी के फंदे की छाया में जो ध्त्द्मत्दृद देखता है वह केवल स्मृति से गठित नहीं है। इसका प्रमाण यह है कि शेखर : एक जीवनी का आरंभ एक माँस के लौथड़े के रूप में शेखर के जन्म से होता है। क्या अपने इस प्रकार जन्म की बात शेखर की स्मृति का अंश हैं? यदि वह है तो भी उसका अस्तित्व केवल अचेतन में हो सकता है, क्योंकि, फ्रायड के अनुसार सूक्ष्म-से सूक्ष्म अनुभव मिटता नहीं, अचेतन में उसकी छाप रह जाती है, और अचेतन का संबंध इड से है जो काल जैसी किसी वस्तु को जानता ही नहीं, जो कालशून्य है। इन मतभेदों के बावजूद हम स्वीकार करते हैं कि शेखर : एक जीवनी आज भी आपने ढंग की अकेली पुस्तक है और ऐसा कहते हुए अज्ञेय को क्षमायाची होने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह भी कहना होगा कि हमारी राय में शेखर : एक जीवनी को 'खोए हुए काल की खोज' समांतरता में देखने के बदले जेम्स ज्वाइस के उपन्यास ए पोट्रेट ऑफ द आर्टिस्ट एज ए यंग मैन के परिपार्श्व में रखकर देखना कहीं अधिक फलप्रद होगा।

अज्ञेय के अनुसार हमारे काल में जीने और काल में जीने के बारे में काल में लिखने की स्थिति के कारण उठने वाली समस्याओं में से एक 'समय की यथार्थता और हमारे अनुभव में काल की प्रतीति है ' इस संदर्भ में यथार्थवादी वृत्तांत की समस्याओं की परख वे 'परी कथा' या 'नानी की कहानी' के विश्लेषण से आरंभ करते हैं। इनका आरंभ बहुधा 'पुराने जमाने में' से होता है। विभिन्न भाषाओं में इस आरंभ के अनेक रूपांतर हैं, पर उनका मंतव्य एक जैसा है। भेद केवल शैली या मुक्ति का है। इस तरह के आरंभ का विवेचन करते हुए अज्ञेय कहते हैं 'क्या यह आरंभ स्पष्ट संकेत नहीं है कि इस कथा की घटनाएँ हमारे साधारण काल अथवा समय में घटित न होकर एक विशिष्ट काल में ... अनैतिहासिक, अनिर्दिष्ट किंतु फिर भी वास्तविक काल में ... घटित होती हैं या होंगी, जिसकी संभावना और प्रतीति के अपने अलग नियम हैं। और क्या इस आरंभिक संकेत के साथ सांभाव्य श्रोता को इसकी चेतावनी नहीं दे दी जाती कि वह उस विशिष्ट काल में उस विशिष्ट सत्ता की सामान्य प्रतिज्ञा में सम्मिलित हो जाए, जिसके आगे की कहानी उसके लिए रोचक और प्रतीतिकर हो सके?' चूँकि यह 'एक जमाना' कोई भी काल हो सकता है, यहाँ तक कि वह केवल कल्पना या संभावना का काल हो सकता है। यह स्पष्ट है कि वह ऐतिहासिक काल नहीं है, वह कालातीत आयाम की वस्तु है, और एक मात्र काल जिससे उनका नाता है वह अनुभव का काल है। तभी तो राजकुमारी दो सौ साल तक सोई रहती है फिर नवयुवती बनी रहती है, या राजकुमारी को पाने के लिए असंभव की सीमा तक कठिन शर्तों की पूर्ति करता हुआ राजकुमार जब वर्षों बाद सफल होकर लौटता है तब न तो राजकुमारी की उम्र एक क्षण अधिक हुई रहती है न राजकुमार की ऐतिहासिक काल के हजारों वर्षों भी बीत जाएँ तो उनका कोई असर परी कथा के इन पात्रों पर नहीं पड़ता, मानों वे ऐतिहासिक काल से परे और मुक्त एक कालातीत आयाम में हों। यह भी, ये कथाएँ स्थपित करती है कि ऐतिहासिक काल में जो असंभव है वह भी एक अन्य प्रकार के काल में संभव हो सकता है। मुख्य बात यह नहीं कि कथा ऐतिहासिक काल पर आधारित है या अन्य काल पर, मुख्य बात यह है कि हर हालत में कहानी का नाता कालातीत आयाम से होता है, अन्यथा वह केवल अखबारी विवरण या रिपोर्ताज होकर रह जाएगी।

अज्ञेय, लारेंस स्टर्न और उनके ट्रिस्ट्रम शैंडी को लेकर एक अजीब क़िस्म की काल-चर्चा करते हैं। वे संरचनात्मक काल और घटित के काल की बात को उठाते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने जो कुछ कहा है उसे स्पष्टता से समझाने के लिए इस रूप में कहा जा सकता है ... एक वह काल है जिसमें जो कुछ हुआ वह घटित हुआ; दूसरा वह है जिसमें इस घटित को लेखक ने लिखा; तीसरा, इस लेखन या तत्संबंधी चिंतन में लेखक का अनुभूत काल है; चौथा, रचना को पढ़ने में पाठक जितना समय लेगा वह काल है, और पाँचवाँ, पाठक का अनुभव-काल है। स्पष्ट ही प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ ऐतिहासिक काल है और इस तरह उनकी चर्चा चाहे चमत्कारी शब्द 'काल' को केंद्र में रखकर की गई हो, वह केवल सतही है। हर कोई जानता है कि किसी घटना को घटित होने में जितना काल लगता है उसका इससे कोई नाता नहीं होता कि उसे लिखने में लेखक को कितना समय लगा। शेखर : एक जीवनी का घटित (चाहे वह बीच में ही काट दिया गया हो) एक पूरा जीवन काल है। फाँसी की रात में देखा हुआ 'विजन' इस पूरे जीवनकाल को घेरता है पर संभव है कि वह केवल कुछ क्षणों में ही या निश्चित रूप से एक रात में संपन्न हो गया। उसे लिखने में जो काल लगा वह इन दोनों से बहुत भिन्न है। पर यह अवलोकन हमें किस कीमती निष्कर्ष पर पहुँचाता है? और यह भी कि उसे पढ़ने में पाठक को कितना समय लगता है? पाठक के पास उतना वक्त है या नहीं, यह भी महत्व की बात नहीं है क्योंकि यदि वह उसे पढ़ना चाहेगा तो उतना समय निकालेगा। यह कहा जा सकता है कि वर्तमान युग की अत्यधिक बढ़ी हुई व्यवस्था के कारण लोगों को फुरसत के क्षण कम ही मिलते हैं और इसलिए लघु-कथा और लघु-उपन्यास जैसी चीजें सामने आईं। परंतु पोथे अभी भी लिखे जाते हैं और पढ़े जाते हैं। इस पूरे विवेचन में यदि कोई काम के तत्व हो सकते हैं तो उनका संबंध केवल लेखन से संबद्ध लेखक के अनुभव काल और पठन से संबद्ध पाठक के अनुभव काल से हो सकता है, जिनका उस कालायाम से नाता है जो रचना का अपना है।

अज्ञेय ट्रिस्ट्रम शैंडी से यह उद्धरण देते हैं, 'अब इस महीने में पिछले साल के इन्हीं दिनों से बारह महीने बड़ा हूँ; और आप देख रहे हैं कि अपने चौथे खंड के अधबीच तक पहुँचकर भी मैं अपने जीवन के पहले दिन से आगे नहीं बढ़ रहा हूँ ... स्पष्ट है कि जब मैंने शुरू किया तब से अब तक मुझे जीवन के तीन सौ चौंसठ दिन का ब्यौरा और लिखने को हो गया।' यह कथन तभी सार्थक है जब स्टर्न, ट्रिस्ट्रम शैंडी में अपने ही जीवन के 'हर घटित' का ब्यौरा लिखने बैठे हों। पर क्या कथा ऐसे ही बनती है? नहीं, लेखक चुनाव करता है; जो घटित भी है, लेकिन उसके उद्देश्य से मेल नहीं खाता या उसे उद्देश्य के लिए वैसा होना चाहिए तो वह उसे अवश्य शामिल करता है। काल को आधार बनाकर स्टर्न की युक्ति केवल बँधुआ पाठकों के लिए रुचिकर हो सकती है। सच्चाई यह है कि इस कृति के जो भी गुण हैं वे इस युक्ति के बावजूद और उससे भिन्न हैं।

शेषांश में अज्ञेय की सबसे महत्वपूर्ण निष्पत्ति, तथ्य और सत्य, या वास्तव और यथार्थ में प्रभेद से संबंध रखती है। श्रृंखलित या आवर्ती कथाओं का विश्लेषण करते हुए वे कहते हैं, कि हमारे काल-संदर्भ में सच न जान पड़ें पर 'किसी एक संस्कृति और उस संस्कृति के काल की प्रतीति के संदर्भ में सच होने के लिए ही ' उनकी सृष्टि की गई है। नैतिक कथाओं का उदाहरण लेते हुए वे कहते हैं कि यह आक्षेप किया जा सकता है कि वे कथाएँ सच न होकर केवल नैतिक तथ्य को प्रस्तुत करने का साधन थीं इसका परिहार अज्ञेय इस टिप्पणी से करते हैं कि ऐसी कथा कहने और सुनने वाले दोनों पक्षों के लिए वह नैतिक मूल्य ही तो यथार्थ के मूल और सार तत्व थे। सत्ता का यथार्थ प्रस्तुतीकरण ही हर युग के रचनाकार का उद्देश्य रहा है। यदि कोई परिवर्तन हुआ है तो इसलिए कि सत्ता के बारे में हमारी धारणा बदलती गई है। इस दृष्टि से पुरानी दृष्टांत कथाओं में कहानी यथार्थ नहीं होती थी पर वह धर्मदंड यथार्थ होता था जिसके आसपास सारा संसार घूमता था। इसी प्रकार नीति कथाओं में यथार्थ का दावा उस नैतिक सत्य के लिए था जिसकी भित्ती पर समाज खड़ा होता है। मध्यकाल में इस धार्मिक भित्ती से नाता तोड़कर मनोरंजन के लिए आसपास के याथार्थ को देखना शुरू किया गया। ऐसा कथा-साहित्य इस अर्थ में यथार्थवादी है कि उस समय के समाज के एक पक्ष का अच्छा खासा चित्र उससे निर्मित होता है। आज 'हमारा यथार्थ मुख्यता बल्कि सर्वांगतः भौतिक यथार्थ का भी अंग हो गया है जो अर्थ से संचालित होता है। 'लेकिन इतना व्यापक होकर भी वह एक खंड-यथार्थ ही है। इसी क्रम में सत्ता की उस धारणा पर आधारित साहित्य भी है जिसे मनोविश्लेषण ने प्रस्तुत किय। यह आभ्यंतर सत्य या सत्ता मानसिक प्रक्रिया की, स्वयं चेतना की, संरचना की जानकारी से निर्मित है। इसे संवेद्य रूप देने के प्रयास में नई शैलियों और उपायों का आविष्कार और प्रयोग स्वाभाविक ही था।

उक्त प्रयोगों की तीन दिशाएँ थीं - भाषा के स्वभाव और संरचना की पड़ताल, चेतना के स्वभाव और संरचना की पड़ताल और स्वयं वृत्तांत-वार्ता अथवा आख्यान-साहित्य के रूपकार और संरचना की पड़ताल। इनमें सबसे विस्तृत विवेचन अज्ञेय ने भाषा-विषयक किया है। वे कहते हैं कि 'भाषागत संप्रेषण का आधार एक सामाजिक समझौता अथवा समय होता है', लेखक जिस ढंग से शब्दों का संयोजन करता है उसीके वे शब्द असाधारण अर्थच्छटा और व्यंजनाओं के वाहक हो जाते हैं। लेकिन जब उपन्यासकार अभूतपूर्व सघनतर शब्दावलियाँ गढ़ने लगता है तब यह जो जोखिम पैदा हो जाता है कि वे लेखक की एक निजी, प्राइवेट भाषा का रूप धर ले, जो दूसरों तक न पहुँच सके। इस प्रसंग में उन्होंने ल्युइस कैरल और जेम्स ज्वाइस द्वारा गढ़े हुए कुछ शब्दों का उदाहरण दिया है। ये शब्द 'टेलेस्कोपिंग' का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जिसमें दो या अधिक शब्दों के अंश जोड़कर एक ही झटके और गति में उनके अर्थ या अर्थसंहति को व्यक्त करने का प्रयत्न किया जाता है। जैसे चमकीला और पीला को मिलाकर 'चमपीला' बनाया जाए, या चित्र-चेतना को चिपकाकर 'चित्रेचना'। इसका कारण कदाचित यह है कि चेतना में जो कुछ समकालवर्तीत्व को प्रतिबिंबित करने के लिए लेखक कदाचित उन्हें व्यंजित करने वाले शब्दों को भी एक समकालवर्तित्व प्रदान करने का प्रयत्न करता है। लेकिन चीज़ों या घटनाओं की सहवर्तिता भाषागत सहवर्तिता का रूप नहीं पा सकती; भाषा या साहित्य को अनुक्रमिकता का निर्वाह अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। भाषा में अनिवार्य अनुक्रमिकता की बात एक सीमित अर्थ में ही ठीक है। अपनी बात स्पष्ट करने के लिए हम अज्ञेय द्वारा प्रस्तुत एक उदाहरण और व्याख्या प्रस्तुत करेंगे। अज्ञेय कहते हैं, 'किसी एक दृश्य पर अपना ध्यान केंद्रित कीजिए : अपने सामने पड़ी हुई कुछ चीज़ों को ही ले लीजिए। दो-चार पुस्तकें, एक कुर्सी, एक मेज पंखा, कलम, जूते, फूलदान, आलपीन, सिगरेट की राख।' इन सबको एक ही नजर में आप देख ले सकते हैं। ... लेकिन चित्रकार जब यथार्थ को देखने से आगे चित्र भी तैयार करने लगेगा - तो उनकी आकस्मिक स्थिति को एक संयोजित रूप दे रहा होगा ...।' यह व्याख्या गेस्टाल्ट मनोविज्ञान की प्रत्यक्षण-संबंधी महत्वपूर्ण निष्पत्ति की अनदेखी ही नहीं करती, उसके विपरीत भी जाती है। इस निष्पत्ति के अनुसार हम कभी प्रर्कींणक वस्तु समुच्चय नहीं देखते, प्रत्यक्षण हमेशा एक समग्र या पूर्ण या गेस्टाल्ट का होता है। चित्रकार इस गेस्टाल्ट को देखता है, 'चीजों के एक रूपहीन सातत्य' को नहीं, और यही लेखक भी करता है। रूपहीन सातत्य है, तो प्रत्यक्षण है ही नहीं। हर रचना इसी अर्थ में गेस्टाल्ट होती है और चाहे लेखक को यह बाध्यता हो कि वह शब्दों का एक अनुक्रम रचे, पर रचना ही सार्थकता केवल उसकी संपूर्णता या 'गेस्टाल्ट' में ही होती है और शब्दों की अनुक्रमिकता उसके संप्रेषण का साधन मात्र है। ज्वाइस द्वारा कथित 'स्टासिस' में इसी भासमान अनुक्रमिकता का खंडन निहित है। यही बात प्रकारंतर से अरिस्टाट्रल की सादिमध्यांत वाली स्थापना - में कही गई है। अज्ञेय जब यथार्थ को रचने की बात करते हैं तब कदाचित उनका लक्ष्य इसी दिशा में है।

साहित्यिक में कालाभिव्यक्ति के संदर्भ में अज्ञेय ने सार्थक तौर पर 'स्लोमोशन', 'स्पीड आप', 'फ्रीज एक्शन', 'लांग शाट', 'मिडियम शाट', 'क्लोजअप' जैसी युक्तियों का उल्लेख किया है जो सिनेमा में काम में लाई जाती हैं और जिनका प्रभाव साहित्यिक विधाओं पर भी पड़ा है। जिन कविताओं में इनमें से सभी या कुछ प्रयुक्त हैं उनमें अज्ञेय ने निराला की राम की शक्ति पूजा और अपनी असाध्य वीणा का नाम गिनाया है। सच्चाई यह है कि इनमें से अधिकांश युक्तियाँ खोजने पर रामायण और महाभारत में भी मिल जाएँगी। इनके द्वारा कलाकार कभी क्रिया की गति को धीमा कर देता है, कभी तेज, कभी एकदम से थाम देता है; कभी उसे दूर से दिखाता है कभी पास से। यह उपयोगी होगा यदि उनके आधार पर कम से कम कुछ रचनाओं का विश्लेषण और उनके प्रभाव का विवेचन किया जाए।

काल के गिर्द यह खासी प्रलंब विचारयात्रा है जिसके क्रम में चिंतन और पुनर्चिंतन के विविध प्रसंग बद्धमूल धारणाओं की जड़ता को झकझोरकर पुनर्मूल्यांकन और नव्य विचारणा को स्फूर्त कर सकते हैं। जिस अज्ञेय ने शेखर : एक जीवनी जैसा उपन्यास दिया था, जिस प्रयोगवाद के युग में नव्य काव्यधारा को नेतृत्व और क्रमशः पुष्ट होता हुआ सैद्धांतिक आधार दिया, जिसने देश-विदेश के विविध तत्वबोधों और काव्यशैलियों से परिचित कराके हमारी काव्य संबंधी समझ और अभिरुचि को समृद्ध और व्याप्ति दी, जिसने आधुनिक सभ्यता के संदर्भों में मूल्य की समस्या पर निरंतर चिंतन किया, उसने संवत्सर के रूप में फिर से चिंतन का एक नया आयाम प्रस्तुत किया है। यह सच है कि व्यक्ति वैशिष्ठ्य पर आत्यंतिक बल देते हुए अज्ञेय ने मानव - मात्र में समानता और संवादिता की उतनी मूलभूत स्थिति को लगभग उपेक्षित किया है, यह भी सच है कि अनकी आत्यंतिक व्यक्ति-वैशिष्ठ्य की भावना के साथ एक आत्ममुग्धता भी जुड़ी है जो संवत्सर में भी, एक हद तक वाजिब तौर पर, लेकिन उतनी ही हद तक इसका आत्म-मुग्धता की प्रतिच्छवि के रूप में, उनके द्वारा अपनी ही रचनाओं के विविध दृष्टांतों और विवेचना-विश्लेषण में झलकती हैं, फिर भी हिंदी को उनके विराट् प्रदेय को अनदेखा करना अंधता होगी। आज हिंदी-जगत में जिन मान्यताओं और दृष्टि का जोर है उन्हें समीचीनता और संतुलनता देने के लिए अज्ञेय के दृष्टिकोण और विशेषत संवत्सर में उनकी निष्पत्तियों को उचित महत्व देना होगा। यथार्थवाद पर बल देना ठीक है पर निरंतर पुनर्चिंतन की आवश्यकता को स्वीकार न करना हठधर्मिता है। इस पुनर्चिंतन के लिए अज्ञेय की यह टिप्पणी अवसर देती है : 'यथार्थवाद का आग्रह जो अपनी सही जगह पर सही हो सकता है, बल्कि जो साहित्यकार की सनातन समस्या का निरूपण है, यथार्थवाद का नारा बनकर एक झूठा आग्रह बन गया। यथार्थ की समस्या किसी बाहर के यथार्थ को शीशे में उतार लेने की समस्या नहीं है, वह यथार्थ को रचने की ओर रचे हुए यथार्थ को जीवंत साप्रेष्य रूप देने की समस्या है। 'अनुभूत यथार्थ' और मूल्यवादी अर्थ के संदर्भ में इस टिप्पणी के आधार पर यथार्थवाद को केंद्र में रखकर एक परिसंवाद की शुरुआत हो सकती है, और संवत्सर की काल संबंधी महत्वपूर्ण निष्पत्तियें के संदर्भ में यह पड़ताल इस महत्वपूर्ण कृति को मूल्य देने का उपाय हो सकती है।


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