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बात-चीत

एक अपना ही अजनबी
मनोहर श्याम जोशी


सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' नाम तो नाम उपनाम सुबहान अल्लाह! आप कहेंगे कि भला नाम-उपनाम में धरा क्या है? जरा सुनिए - मुंशी प्रेमचंद - एक निहायत ही दबे-ढके, सीधे-सादे शख्स की तसवीर सामने आती है न? निराला - यही शब्द सुनकर मन में अवधूत जगता है कि नहीं? और वे तमाम नंदन, कुमार और लाल युक्त नाम, उन्हें सुनकर, सच कहिए, मूड कतई सूरदास हुआ जाता है कि नहीं? तो जरा फिर सुनिए - सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'! देखो अपने, इसे सुनने की दो ही प्रतिक्रियाएँ होती हैं, या तो आप आस्तीनें चढ़ाकर पूछते हैं, 'क्या कहा?' या आप मरी सी आवाज में एक गिलास ढंडे पानी की माँग कर बैठते हैं। तो क्या ताज्जुब जो इस नाम ने हिंदी साहित्य जगत में सबसे ज्यादा उन्मेष, सबसे ज्यादा हीन-भावना जगाई है। यहाँ बतौर सांत्वना, 'नाम बड़े और दर्शन छोटे' वाला मामला भी नहीं है। यह नहीं कि कहा मनोहर श्याम और एक उजबक सामने ला खड़ा किया। अज्ञेय जब आपके सम्मुख प्रगट होता है तो आप देखते हैं कि उसका व्यक्तित्व भी नाम के अनुरूप गरिमावान है। ऊँचा कद, चौड़ा सीना, फ्रायडवाद की याद ताजा कराने वाले घने काले रोएँ, यदा-कदा बाहर-दाढ़ी, खिलाड़ी-सा बदन, शिकारी-सी चाल! इस पर तुर्रा यह कि आप इस व्यक्तित्व को किसी भी लिबास में लपेट दीजिए, वह प्रभावप्रद प्रतीत होता है। एक बार नई दिल्ली में जींस-जाकिट धारी और स्कूटर-सवार वात्स्यायन को देखा था और खुदा झूठ न बुलवाए, वह क्षण खासा चेतन रहा था। कुल मिलाकर यह व्यक्तित्व ऐसा है कि देखते ही अहेतुक विशेषणवादी काव्य आप ही आप फूटता चला जाए। मगर जब यह व्यक्तित्व बोलना शुरू करता है तो दुखद आश्चर्य के साथ, आप दिनकर जी को विदा करके पंत जी को न्यौता देते हैं। भगवान की दी हुई तमाम अक्खड़ सजधज के बावजूद अज्ञेय में कुछ ऐसा है जो निहायत ही नाजुक है - उसकी आवाज, सुनहरे फ्रेम के पीछे से झाँकती हुई उसकी शांत-क्लांत आँखें और होठों की कोर से ठोढ़ी की ओर बढ़ती हुई दो थकीहारी-सी रेखाएँ। अज्ञेय की आवाज में गए तत्व काफी है। लहजा भी खास है - लययुक्त और विराम-चिह्न-पूर्ण। अक्सर विराम-चिह्न शब्द के बीच भी लगा दिए जाते हैं, यथा - रघु, वीरजी तो, आ, प आते हैं? इस लहजे की नकल करने की तबीयत होती है। कई भूतपूर्व अज्ञेयवादियों की जबान पर तो 'करत-करत अभ्यास के' यह नकल असल हो चली है और वह सभा-सोसायटी में कुछ इस तरह के जुमले कहते सुने जाते हैं - 'हम, ने एक यो, जना, बनाई थी, उस पर काम हो, ने जा, रहा है।' गर्ज यह कि कुछ और है उसका अंदाजे बयाँ उसकी तर्ज बयाँ भी! यों सच पूछिए तो उसका क्या ऐसा है जो कुछ और नहीं?

सामान्य हिंदी साहित्यकार के सामने अज्ञेय कुछ ऐसा ही जँचा जैसा उच्च मध्यवर्ग निम्न मध्यवर्ग की तुलना में दीखता है। उससे सामान्य हिंदी साहित्यकारों को कुछ वैसी ही ईर्ष्या हुई जैसी निम्न मध्यवर्ग को उच्च मध्यवर्ग से होती आई है। पंचों की राय से अज्ञेय हिंदी साहित्य जगत का सर्वाधिक अप्रिय व्यक्ति है। इस भावना को महज ईर्ष्या पर आधारित समझना य समझ सकना मुश्किल है। मानना ही पड़ता है कि अज्ञेय को दोस्त न बनाने में, और प्रकारांतर से, दुश्मन बनाने में माहिरी हासिल है। उसे तापक से मिलना, गले में हाथ डाले घूमना, भगवान! गुरू! कौ बेटा! जैसे संबोधन कहना, कुछ भी तो नहीं आता। अपने में, अपने तक रहने में, वह अंग्रेजों को भी मात करता है। न वह किसी का व्यक्तिगत सुख-दुख जानना चाहता है और न वह किसी को अपना व्यक्तिगत सुख-दुख बताता है। इसीलिए पीठ पीछे बुराई करने में प्रवीण हिंदी लेखकों को इसमें भी रचनात्मक मुश्किल आती रही है। उसके व्यक्तिगत जीवन में कोई खास पेंच रहा हो, ऐसा भी नहीं। विवाह, तलाक और एक लंबे अंतराल के बाद पुनर्विवाह। इतनी-सी बात को लेकर वह चटखारे पैदा किए और लिए गए हैं कि हिंदी साहित्यकारों की कल्पनाशीलता की दाद देनी पड़ती है।

अज्ञेय को राजनीतिक बदनामी भी काफी मिली है। प्रतिक्रियावादियों की हिंदी में कोई कमी नहीं, लेकिन अमरीकी एजेंट अज्ञेय को ही कहा गया है। मुझे एक प्रगतिशील आलोचक ने विस्तार से यह समझाया था कि अज्ञेय को 'प्रतीक' के प्रकाशन के लिए कितनी अमरीकी सहायता मिलती है। जब 'प्रतीक' बंद हो गया तो शायद इन आलोचक महोदय का यही अनुमान रहा होगा कि अमरीकी खजाना खाली हो गया है। साहित्यिक दृष्टि से भी अज्ञेय को बराबर गलत समझा और समझाया गया है। कहीं गलती से उसने इलियट की कुछ पंक्तियाँ अपने लेख में उद्धृत कर दीं तब से उसे इलियट कहा जाने लगा और इलियट को 'इडियट' का पर्याय ठहराया जाने लगा। कोई भी पढ़ा-लिखा आदमी यह देख सकता है कि अगर अज्ञेय पर किन्हीं पाश्चात्य लेखकों का प्रभाव है तो डी.एच. लारेंस और ब्राउनिंग का! लारेंस का प्रभाव अज्ञेय की लेखनी ही नहीं दाढ़ी भी घोषित करती है, लेकिन और पढ़नेवाले लोग हैं कहाँ?

पिछली पीढ़ी अज्ञेय की अंग्रेजियत से आक्रांत रही और उसे अमौलिक साबित करने की कोशिश करती रही। नई पीढ़ी अज्ञेय की भारतीयता से बोर हुई पड़ी है और उसके नएपन को पुराना ठहराने में जुटी हुई है। अज्ञेय आज प्राचीनों में आधुनिक हैं और आधुनिकों में प्राचीन, यानी हर कहीं अजनबी। हिंदी के अधिकांश नए साहित्यकार कभी-न-कभी अज्ञेय से प्रभावित रहे। लेकिन उनमें से सबने इस प्रभाव की केंचुली उतार फेंकना अथवा उसे अपने ही प्रादुर्भाव की केंचुली मान लेना श्रेयस्कर समझा। वह परिष्कार, वह प्रौढ़ता, वे किताबें, वे कलाकृतियाँ, वे चंद चुने हुए रेकार्ड, वह वक्तव्यवाद, वह व्यक्तिधर्म यानी अज्ञेय की तमाम ऊपरी विशेषताएँ इन नए साहितयकारों में मौजूद हैं। लेकिन वे सार्त्र और कामू की बात भले ही कर लें, अज्ञेय का नाम गलती से भी जबान पर नहीं लाते। अज्ञेय की चर्चा से उन्हें वैसा ही संकोच होता है जैसा किसी किशोर को अपनी आया अथवा बच्चा-गाड़ी देखकर हो सकता है।

अज्ञेय का व्यक्तित्व और कृतित्व नए लेखक को शुरू में अनायास आकर्षित करता है। जब मैं पहली बार अज्ञेय से मिला, कोई बीस मिनट तक अपना पारिवारिक दुखड़ा रोता रहा। कोई दूसरा आदमी होता तो शायद सचमुच पसीज जाता, पसीजता भी नहीं तो पसीजने का अभिनय अवश्य करता। लेकिन मैंने अज्ञेय की आँखों में यह पढ़ा कि वह मेरे दुख से नहीं, उस कमजोरी से दुखी है जो अपना दुख व्यक्त करने पर मजबूर कर रही है। दुख के प्रति यह दृष्टि साहित्य साहित्य में अक्सर नजर आती है, लेकिन जीवन में नहीं। व्यक्ति अज्ञेय का यही पहला आकर्षण है कि उसके कई उसूल हैं और वह उनका पक्का है। एक उसूल यह है कि वह किसी की धारणा बदलने की कोशिश नहीं करता। अज्ञेय ने मेरे 'प्रगति-वाद' का कभी बुरा नहीं माना, तब भी नहीं जब वह सर्वथा अज्ञेय-विरोधी हो उठा। एक बार मैंने नदी के द्वीपवाद के खिलाफ एक कविता लिखकर अज्ञेय को दी। उस वक्त एक साहित्यिक कम-फोटोग्राफर ज्यादा किस्म के जीव भी वहाँ मौजूद थे। उन्होंने कविता पढ़ी और इस आशय के भाव व्यक्त किए कि लौंडे, सूरज पर थूकता है! लेकिन अज्ञेय ने कहा कि कविता की कमजोरी यह नहीं कि वह मेरी कविता के विरुद्ध लिखी गई है बल्कि यह है कि वह निजी बातचीत को अपमान के बराबर मानता है। अज्ञेय ने मेरी बेरोजगारी दूर करने के लिए जो भी प्रयास किया उसकी मुझसे कभी चर्चा नहीं की। जब भी सूचना दी, पत्र के माध्यम से दी और वह भी खासे क्षमा याचना भाव से। यह नहीं कि फलाँ मेरा यार है, उससे कह दिया है, काम बन जाएगा, समझे, हमारे साथ रहोगे तो ऐसे ही मजे करोगे। अज्ञेय का तीसरा उसूल है कि अपनी इज्जत करो और दूसरों की भी। अपने से छोटे लोगों के भी नाम के साथ सम्मानसूचक 'जी' लगाना वह कभी नहीं भूलते। किसी के लिए भी सामने या पीठ पीछे निरादरपूर्ण बात उसके मुँह से नहीं निकलती। अज्ञेय के यहाँ वह सापेक्षवाद भी नहीं जो हिंदी साहित्यिकों के दरबार में अक्सर नजर आता है, वह सापेक्षवाद जो हर व्यक्ति को अपने स्वार्थ और उसकी शक्ति की तुला पर तोलता है। लिहाजा अज्ञेय का चौथा उसूल यह है कि वह हर व्यक्ति और कृति का मूल्यांकन कुछ सुनिश्चित प्रतिमानों के आधार पर करता है। साहित्य और साहित्येतर दोनों क्षेत्र में उसका मूल्यांकन कभी-कभी लोकमत - विरुद्ध होता है, मसलन उसे फिल्म 'पथेर पांचाली' पसंद नहीं आई, हुसेन की चित्रकला कभी विशेष प्रभावित नहीं कर पाई। लेकिन अज्ञेय जगहँसाई के डर से धारणा बदलनेवालों में से नहीं। अँग्रेजी मुहावरे की टाँग तोड़कर कहूँ, तो अज्ञेय में अपनी धारणा का धैर्य है। अब आनंद यह है कि हिंदी के वही नामचीन लेखक जो आशीर्वादनुमा अभिमत बाँटते फिरते हैं, किसी अधकचरे लेखक का भदेस गद्य पढ़कर जेम्स जायस! चिल्ला उठते हैं, वही लेखक अज्ञेय की हर गलत धारणा को पक्षधरता का प्रमाण मानते हैं। मसलन जब अज्ञेय ने साहित्य अकादमी के लिए अपने एक लेख में मुझ जैसे कुछ छुटभैया लेखकों का भी नामोल्लेख कर दिया तो हिंदी साहित्य संसार में हाहाकार मच गया। हाहाकार मचानेवाले साथ ही यह भी कहते रहे कि अज्ञेय की मान्यताओं का कोई मूल्य नहीं। जैसा कि उस अवसर पर एक साहित्यकार-रिश्तेदार-साहित्यकार ने मुझसे कहा था, 'देखा, आज अज्ञेय की वजह से सबकी गालियाँ सुन रहे हो। हमारे रिश्तेदारों की सेवा की होती तो वह तुम्हारे विषय में अपनी अच्छी राय सही जगह व्यक्त करते, तुम्हें अच्छी नौकरी मिल जाती।'

अज्ञेय हिंदी साहित्य का अछूत है। उसका आशीर्वाद सार्वजनिक श्राप के बराबर समझिए। फिर उसका व्यक्तित्व कुछ इतना विशिष्ट और विराट है कि दूसरे को वटवृक्ष कॉम्प्लेक्स होने लगता है। फिर उसने कुछ ऐसे एकांत में घर बना छोड़ा है कि वहाँ अकेले भी जाइए तो यही महसूस होता है कि भीड़ साथ ले आए। फिर उससे कोई साहित्येतर संपर्क अथवा सेवा-मेवा-संबंध भी संभव नहीं है। इसलिए उसका हर साहित्यिक साथी उससे अलग हो जाता है। अलग होकर यह कहने लगता है कि अज्ञेय बहुत घुन्ना और गुम्मा है, मतलब साधता है, मौके पर छिपकर वार करता है। मैंने जब 'तीसरा सप्तक' के लिए अपनी कविताएँ आलस्य और संकोचवश नहीं दीं, मैंने जब दिल्ली में 'परिमल' बनाए जाने का विरोध किया, मैंने जब निर्मल वर्मा, राजकुमार, भीष्म साहनी और नरेश मेहता जैसे घोषित वामपक्षीय लेखकों का साथ अपनाया तो मुझे इस छिपे वार का बड़ी हौलदिली से इंतजार रहा। लेकिन, मेरी गर्दन आज भी सलामत है। इधर यह सुना जा रहा था कि अज्ञेय की सब अकड़-बकड़ धरी रह गई है, वह बहुत ही दुखी है, मान्य होने के लिए बेहद बेचैन है। तो जब अज्ञेय हाल में बंबई आए, मैं उनका यह नया रूप देखने पहुँचा। 'धर्मयुग' के सहायक संपादक नंदन जी भी इस अवसर पर मौजूद थे।

जोशी : वात्स्यायन जी, आपको कोई पश्चाताप है?

अज्ञेय : पश्चाताप तो अनेक हैं, लेकिन...

जोशी : व्यक्तिगत नहीं, साहित्यिक ही बताइए।

अज्ञेय : वह भी कई हैं। एक तो यही है कि शेखर को मैंने आत्मकथा की शैली में क्यों लिखा? तीसरे भाग के प्रकाशन में यही दिक्कत है कि अब जो कुछ मैं कहना चाहता हूँ वह सब-का-सब शेखर के मुँह से नहीं कहलाया जा सकता। जितना वह कह सकता है, उतने तक ही सीमित रहना अब मुझे अपने प्रति न्याय नहीं मालूम होता।

नंदन : क्या यह नहीं हो सकता कि आप तीसरे भाग को शेखर की सीमाओं में ही रहकर छपवा दें। बाकी जो कुछ कहना हो किसी और उपन्यास में कह दें।

अज्ञेय : किसी चीज को छपाना या छपने देना भी तो एक साहित्यिक निर्णय है। यह तो हो सकता है कि आप कोई रचना छपने के लिए दें और वह इतने विलंब से प्रकाशित हो कि इस बीच आपकी मान्यताएँ बदल जाएँ। लेकिन किसी ऐसी रचना को प्रकाशन के लिए देना जिससे आप तभी संतुष्ट न हों, यह साहित्यिक ईमानदारी नहीं।

जोशी : आपने कहा था कि आपके साहित्यिक पश्चाताप भी कई हैं।

अज्ञेय : हाँ, हैं। लेकिन उन्हें ठीक पश्चाताप कहना भी शायद उचित न हो। मसलन मैं कभी सोचता हूँ कि मैंने अपने को सिर्फ एक तरफ सीमित क्यों नहीं रखा? शुद्ध लेखक ही क्यों नहीं बना रहा? आलोचना, संपादन, आयोजन, इन सबके क्षेत्र में कभी भी क्यों आया? लेकिन इसी के बाद जब मैं अपना तीसरा पश्चाताप गिनाऊँगा तो दूसरा कुछ झूठा मालूम होने लगेगा। यानी कभी मैं सोचता हूँ कि 'प्रतीक' को किसी तरह बंद न होने दिया होता तो अच्छा रहता। वह और एक साल चला होता तो चल निकलता। लेकिन यह मेरे वश की बात नहीं थी। इसलिए इसके बारे में सही माने में पश्चाताप भी नहीं होना चाहिए। और पश्चाताप हो तो उसे साहित्यिक नहीं कहा जाना चाहिए, क्योंकि 'प्रतीक' के बंद होने का साहित्य से नहीं, एक प्रकाशक की धूर्तता से संबंध था।

जोशी : आजकल जिन लघु-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है, उन्हें पढ़ते हैं आप?

अज्ञेय : हाँ। मगर ये लघु-पत्रिकाएँ नहीं, लघु-लघु-पत्रिकाएँ हैं। इनके क्षेत्र, स्थान- विशेष या मित्रमंडल-विशेष तक सीमित हैं। वैसे यें अच्छी, काफी अच्छी होती हैं। लेकिन ऐसी पत्रिकाओं का महत्व तभी होता है जब उनके साथ-साथ कोई बड़ी और जमी हुई साहित्यिक पत्रिकाएँ भी हों। साहित्यिक चेतना हर स्तर पर फैली हो। लेकिन हिंदी में...

जोशी : हिंदी में जो हैं सो 'कल्पना' है।

अज्ञेय : हाँ और उसके नाम के साथ अनायास ही 'जो है सो' या 'ले दे के' जैसे विशेषण भी निकल आते हैं। कोई जमी हुई साहित्यिक पत्रिका हो तो साहित्यिक-साझेदारी का कोई ठोस और सार्वदेशिक अर्थ भी हो सकेगा। वह स्थानिक मैत्री या गुटबंदी से ऊपर उठ सकेंगी।

जोशी : हिंदी में तो दोस्ती ही चलती है। क्यों?

अज्ञेय : साझेदारी को भी गुटबंदी कह दिया जा सकता है। मैंने हमेशा यही कोशिश की कि जो भी साझेदारी बने वह समान-चिंतन पर आधारित, और व्यक्तिगत संबंधों से अछूती हो। मैंने तमाम तरह के लोगों के साथ मिलाकर काम किया है। इसलिए कभी-कभी मुझे अवसरवादी भी ठहरा दिया जाता है। कुछ लोग आश्चर्य करते हैं - अरे, आपने उनके साथ भी काम किया।

जोशी : आपके कई पिछले साथी आज आपके विरुद्ध हैं। ऐसा क्यों? फ्रायडवादी भाषा में कहूँ तो आप नए साहित्यकारों के लिए पिता-प्रतिभा बने हैं।

अज्ञेय : वह तो मैं जानता। नए लोगों का मार्ग-दर्शन, नेतृत्व ऐसा कुछ भी मुझे कभी अपेक्षित नहीं रहा। मैंने सिर्फ उनकी मदद करनी चाही यानी मात्र आशीर्वाद दे देने की परंपरा चली आई थी उससे कुछ आगे बढ़ना जरूरी समझा। साधारणतया यह होना चाहिए कि पुराना लेखक नए लेखकों के प्रकाशन और उचित मूल्यांकन में सहायता दे। लेकिन दूसरी तरफ यह खतरा रहता है कि नए लेखक पर पुराने लेखक का प्रभाव जरूरत से ज्यादा हो या किसी को ऐसा लगे, जैसा कि मेरे साथ कुछ नए लेखकों को लगा, कि यह संसर्ग तो बाधक है।

जोशी : आपने जिन नए लेखकों को होनहार माना उनमें से कई तो फिस होकर रह गए। मसलन सप्तकों के कई कवि।

अज्ञेय : लेकिन हर सप्तक में दो-तीन, दो-तीन तो आगे चलकर कुछ खरे साबित हुए ही। मेरा ख्याल है कि सात में तीन विनर्स निकलते रहें तो किसी भी रेसहॉर्स ओनर को संतोष ही होगा।

जोशी : मैं समझता हूँ कि नए लेखकों पर आपका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। उपन्यासों के नाम पर बौद्धिकता से लदी, और रोमान में रँगी आत्मकथाएँ चल निकली हैं। यह आत्मकेंद्रित साहित्य खासा खतरनाक है और वाहियात भी। और उच्च-मध्यवर्गीय वातावरण के लिए प्यार, जिस जिंदगी को न जाना है न जिया उसके लिए मोह, यह सब आपकी नकल में हुआ है। आपने तो एक खास तरह का जीवनयापन किया और वही आपके साहित्य में प्रतिफलित हुआ। लेकिन जिनका उस जीवन से कोई नाता नहीं रहा, उन्हें उसकी कहानियाँ लिख-लिखकर जनता को बोर करने की क्या सूझी? बिहार की एक लेखिका की कहानियों में तो पात्रों के नाम भी आपके उपन्यास से उठाए जाते हैं - शेखर, गौरा, भुवन, रेखा।

अज्ञेय : अच्छा?

जोशी : वक्तव्यवाद का मर्ज भी आपकी देखा-देखी बढ़ा है। अपने साहित्य की स्वयं समालोचना करना, अपनी रचना प्रक्रिया पर खुद ही प्रकाश डालना, यह एक अजीब तमाशा मालूम होता है। आज स्थिति यह है कि लेखक लिख कम रहे हैं, समझा ज्यादा रहे हैं।

अज्ञेय : इसका एक कारण तो यही है कि जिनको बिचौलियों का काम करना चाहिए उनकी संख्या बहुत कम है। यानी ऐसे आलोचक जो लेखक को पाठक तक पहुँचा सकें। जैसे पश्चिम में एक समय था कि चर्च ने कलाकार को बाहर निकाल दिया था वैसे अब हमारे यहाँ यह परिस्थिति है कि विश्वविद्यालयों ने, पेशेवर आलोचकों ने, कलाकार को बहिष्कृत कर दिया है। इसलिए हर कलाकार को आत्मव्याख्या में समय नष्ट करना पड़ता है। शक्ति तो आदमी के पास उतनी ही होती है या एक तरफ लगा ले या दूसरी तरफ।

जोशी : लेकिन मेरा कहना यह है कि बहुत-सी जो आत्मव्याख्या हो रही है वह बिल्कुल बेबुनियाद है। उसका लेखक के व्यक्तित्व से या उसकी परिस्थितियों से कोई संबंध नहीं। 'संकट' की या भाषा के अशक्त हो जाने की ये तमाम बातें कही जा रही हैं क्या ये बेबुनियाद नहीं? साहित्य के नाम पर पश्चिम का अनुवाद और साहित्यिक आंदोलनों के नाम पर पश्चिम का अनुकरण ये सब क्या है, क्यों है?

अज्ञेय : बात यह है कि सारे समाज ने यह मान लिया है कि अँग्रेजी श्रेष्ठ है। पश्चिमी समालोचकों ने जो कुछ कहा है वही ठीक है। इसीलिए किसी भी आंदोलन का ज्यादा मूल्य तभी समझा जाता है जब उस पर किसी पश्चिमी आंदोलनों की छाप लगी हो। वह सच है या नहीं, उसका हमारी परिस्थिति और परंपरा से संबंध है कि नहीं, इस सबको अलग छोड़कर। लेकिन यह कोई नई चीज नहीं। यह रोग छायावाद-युग से ही शुरू हो गया था।

जोशी : लेकिन आपको मानना होगा कि पाश्चात्य प्रेम और अधकचरी बौद्धिकता से आज जो खतरा पैदा हुआ है उसके लिए आप लोग भी जिम्मेदार हैं।

अज्ञेय : यह सोचिए कि खतरा न होने की स्थिति भी तो कितनी खतरनाक होती।

नंदन : लोगों का विचार है कि आप अध्यात्मवादी होते जा रहे हैं।

अज्ञेय : वह तो मैं नहीं हूँ। हाँ, अध्यात्म के बारे में सवाल जरूर उठाता हूँ। और ऐसा करना संतुलन के लिए जरूरी भी समझता हूँ। बात यह है कि इस वक्त प्रगति की जो प्रगति है वह जीव को यंत्र मानकर ही चल रही है।

नंदन : 'अपने-अपने अजनबी' में अध्यात्मवाद बहुत है। शायद ज्यादातर लोगों को वह इसी वजह से अच्छा नहीं लगा।

अज्ञेय : मेरा कोई उपन्यास लोगों को पहले अच्छा नहीं लगता। जिन्हें शुरू में 'शेखर' पसंद नहीं आया था उन्होंने 'नदी के द्वीप' छपने के बाद 'शेखर' को अच्छा मान लिया। कुछ तो यही है कि लोग एक उपन्यास को पढ़कर लेखक के बारे में कोई धारणा बना लेते हैं। अगला उपन्यास उस धारणा को पूरा न करे तो उन्हें निराशा होती है।

जोशी : 'अपने अपने अजनबी' की भाषा लोगों को बहुत दुरूह लगती है।

अज्ञेय : नहीं तो! यह उपन्यास मैंने सर्वथा निराडंबर और विशेषण-विमुक्त शैली में लिखने की कोशिश की है। विषयवस्तु के अनुरूप भाषा को मांसल की बजाय हड्डीदार बनाने का प्रयास रहा है।

जोशी : मैं समझता हूँ आपके लेखन में भारतीयता और आध्यात्मिकता शुरू से ही थी। 'शेखर एक जीवनी' में उसका रोमान-परवर रूप है, 'नदी के द्वीप' में बौद्धिक और 'अपने अपने अजनबी' में आध्यात्मिक। शायद यही आध्यात्मिक आध्यात्मिकता पाठकों को कुछ परेशान करती है। वात्स्यायन जी, मैं आपसे एक प्रश्न करना चाहता हूँ - आपने इतना पर्यटन किया है, इतना कुछ देखा-सुना है फिर भी आपकी लेखनी स्थल क्यों खोई हुई है? मैं समझता हूँ कि हिंदी-कथा-साहित्य का यह बड़ा दुर्भाग्य है कि अमृतलाल नागर और अज्ञेय दो अलग-अलग व्यक्ति हैं। और उन दोनों में एक-दूसरे का कोई भी गुण नहीं है। अगर नागर जी और अज्ञेय जी के गुण एक ही लेखक में होते तो हिंदी-कथा-साहित्य का कल्याण हो जाता।

अज्ञेय : आपके प्रश्न का जवाब देना मेरे लिए बहुत ही खतरनाक होगा। उसे आलोचक ले उड़ेंगे। वह बात यह है कि मैं भारतीय तो हूँ और काफी सचेत रूप से हूँ, लेकिन भारत के किसी एक स्थान में या प्रदेश में मेरी जड़ें नहीं हैं, किसी एक समाज में अपना तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाया हूँ। जानता हर समाज को हूँ। सोच कर तो उसके बारे में सोच ही सकता हूँ। लेकिन आंचलिक लेखकों के पास किसी अंचल या वर्ग से जैसा तादात्म्य है वैसा मेरे पास नहीं। तो इसलिए मुझे कोई सच्ची बात कहनी हो तो सूक्ष्म का या आत्मकथन का सहारा लेना पड़ता है। मैं अपनी कथा को अग्रवालों या ब्राह्मणों, किसी विशेष समुदाय में जमा नहीं पाता। यह मेरी सीमा है। और इसका मुझे खेद भी है। वैसे मैं मानता हूँ कि एक ही लेखक में नागरजी और अज्ञेय दोनों के गुण हो सकते हैं। बल्कि यों कहूँ होने चाहिए।

नंदन : हिंदी लेखक बहुत जल्दी चुक जाते हैं, यह बड़ा दुर्भाग्य है!

अज्ञेय : चुक जाना कोई दुर्भाग्य नहीं हैं। मैं समझता हूँ कि दस-बीस-सौ-पचास लेखकों के चुक जाने से किसी साहित्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

जोशी : बहुत जल्दी चुक जानेवाली यह बात तो आज पश्चिमी साहित्यकारों में भी देखी जाती है। शायद आज हर कहीं लेखक के सामने मूल प्रश्न यही है कि लिखे तो किसलिए? प्रगतिवादी आंदोलन शायद आखिरी ठोस साहित्यिक आंदोलन था, उसकी विफलता के बाद किसी के पास कुछ रहा नहीं।

अज्ञेय : बात यह है कि किसी सिद्धांत, धर्म या राजनीति के प्रति आस्थावान होकर जो लिखता है वह अपने आराध्य के टूटने पर स्वयं भी टूट जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वयं अपने प्रति आस्थावान और ईमानदार बनें। आज पश्चिम में भी इसी ईमानदारी की कमी देखी जाती है। वहाँ लेखन में चतुराई,चमक-दमक, यह सब बहुत है, लेकिन अपने से पाबंद हों, ऐसे लेखक वहाँ भी बिरले हैं। 'सेल्फ कमिटमेंट' ही साहित्यकार के लिए सबसे बड़ी चीज है।

जोशी : इसकी व्याख्या कीजिए।

अज्ञेय : इसे अज्ञेय की एक अज्ञेय उक्ति ही रहने दीजिए।

अज्ञेय उक्ति और उसके साथ एक आधी-आधी-सी मुस्कान, एक विचित्र काट का नाइट सूट गोया लिबास से, लहजे से अपने को भिन्न घोषित करता हुआ एक व्यक्तित्व। किसने कहा अज्ञेय बदल गया है? वह वही गमले का फूल है, अच्छी खाद-मिट्टी पर बहुत ही सावधानी और प्यार से पाला गया फूल है, जिसे मध्यवर्ग का मन कभी चाह नहीं सकता। उस मन को फूल चाहिए, जंगल के या कागज के।


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हिंदी समय में मनोहर श्याम जोशी की रचनाएँ