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बाल साहित्य

धूर्त साधु और किसान
दिविक रमेश


 

एक था भोलू किसान। सीधा-सादा और ईमानदार। थोड़ी-सी जमीन और दो आम के पेड़ थे उसके। दिन-रात मेहनत करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता था।

हर बार की तरह इस बार भी आम के पेड़ों पर बहुत बौर आया था। पेड़ जब कच्ची अमियों से पूरी तरह लद गए तो उन्हें देखकर भोलू किसान और उसका परिवार बहुत खुश हुआ। धीरे-धीरे आम पकने लगे। भोलू ने सोचा, रोज एक टोकरा पके आम भी उतर आए तो उन्हें मंडी में बेचकर वह अच्छे दाम कमा लेगा।

एक दिन सुबह जब भोलू किसान अपने परिवार सहित पके आम उतारने के लिए पेड़ों के पास पहुँचा तो देखकर दंग रह गया कि एक भी आम पेड़ पर नहीं था। उसे बहुत दुख हुआ।

'हो न गो, किसी ने आम चुरा लिए हैं। आँधी-तूफान तो आया नहीं कि झड़ जाते। तुम पुलिस में जाकर रपट लिखाओ।' किसान की पत्नी ने उदास होकर कहा।

'ऐसे कैसे रपट लिखा दूँ! मेरे पास कोई सबूत है भी। चलो, अब कल देखेंगे।' भोलू ने पत्नी को झुँझलाते हुए समझाया।

अगले रोज भी पके आम गायब थे। अब भोलू को यकीन हो गया कि उसके आम जरूर कोई चुराता ही है। उसने तय किया कि उस रात वह वहीं छिपकर रहेगा और चोर को पकड़ने की कोशिश करेगा।

भोलू का शक सही निकला। सुबह-सुबह चार बजे के लगभग वहाँ दो जवान साधु आए और पेड़ों के पास चुपचाप खड़े हो गए। थोड़ी ही देर में उनमें से एक ने पेड़ों की ओर देखते हुए कहा -
                  'आम आम दो हमको आम
                  क्या हमसे भी लोगे दाम
                  हम साधु हैं कर दो दान
                 बोलो भी कुछ भैया आम
                 कितने ले लें तुमसे आम
                 या फिर कह दो वापस जाओ
                और लौटकर कभी न आओ।'
   इतना सुनते ही दूसरे साधु ने तुरंत पहले का कंधा पकड़ते हुए कहा -
                'नहीं-नहीं, क्या कहते हो तुम
                क्यों हम पर पाप चढ़ाते हो तुम
                जितने चाहे ले लो आम|
                क्या तुमसे भी लेंगे दाम?
                ले लो, ले लो, जी भरकर लो
               पके-पके सब ले लो आम।'

भोलू किसान ने छिपे-छिपे ही देखा कि दोनों साधु मुस्कुराते हुए पेड़ों पर चढ़ गए हैं और पके आम तोड़ने लगे हैं। उसके बाद दो टोकरे भर कर जब वे चलने लगे तो भोलू ने सामने आकर कहा, 'आप लोग मेरे आम चुराकर क्यों ले जा रह हो? साधु होकर ऐसा काम करते हो!'

किसान को वहाँ देखकर पहले तो वे ठिठाके पर जल्दी सँभलकर ऐसे देखने लगे जैसे उन्होंने कुछ किया ही न हो। उन्होंने दोनों टोकरे नीचे उतार दिए। फिर एक ने गुस्से से कहा, 'मूर्ख किसान, क्या तू चाहता है कि हम तुझे शाप दे दें। तूने देखा नहीं कि आम के पेड़ों से पूछकर ही हमने आम लिए हैं!'।

लेकिन महाराज, पेड़ भला कैसे बोलेगा?' किसान ने थोड़ा नरम पड़ते हुए कहा।

'हाहा हाहा हाहा, तुझे सचमुच ज्ञान नहीं है। अरे मूर्ख, पेड़ खुद नहीं, इन साधु जी के मुख से बोलते हैं। तूने सुना नहीं था, 'पके-पके सब ले लो आम!' याद रख, हम आम तभी तक लेंगे जब तक पेड़ इजाजत देंगे। जिस दिन ये मना कर देंगे, हम आम नहीं लेंगे। यह इन पेड़ों की मर्जी है कि वे किसे आम दें। जाओ, अब तुम घर जाकर आराम करो!' पहले साधु ने कहा।

भोलू बेचार सीधा-सादा तो था ही, वह चुपचाप अपने घर चला आया। अगले दिनों में भी वही घटा। साधु आते। वैसे ही एक पेड़ों से आम देने को कहता और दूसरा आम तोड़ने की इजाजत दे देता। दोनों टोकरे भर ले जाते और भोलू देखता रह जाता। वह यही प्रतीक्षा करता कि कब आम के पेड़ उन्हें मन करें और कब कुछ आम उसके हाथ लगें। लेकिन यह प्रतीक्षा बढ़ती ही गई। आम के पेड़ साधुओं को मना ही नहीं करते थे।

एक दिन आमों के बारे में चिंता करते-करते नहर की पुलिया पर ही उसकी आँख लग गई। कुछ देर बाद वहाँ एक व्यापारी आया और उसके पास ही बैठ गया। जैसे ही भोलू की आँख खुली तो व्यापारी ने पूछा, 'क्यों भाई, क्या तुम पास ही के गाँव के हो?'

'हाँ!' भोलू ने आँख मलते हुए उत्तर दिया।

'क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो? मुझे अभी काफी दूर जाना है। आज की रात मैं आराम करना चाहता हूँ। क्या तुम मुझे अपने घर में ठहरा सकते हो, जो कुछ दोगो वही खा लूँगा। सुबह उठते ही मैं चला जाऊँगा।' व्यापारी ने कहा।

'अरे महाराज! मैं तो गरीब किसान हूँ। पहले से ही परेशान हूँ। आम के पेड़ों ने इस बार धोखा दे दिया है। भला मैं आपकी क्या सेवा कर सकूँगा। तो भी आप मेहमान हैं, चलिए। जो कुछ मुझसे बन पड़ेगा, करूँगा।' किसान ने हाथ जोड़कर कहा।

भोलू व्यापारी को अपने घर ले आया। रात को बातों-बातों में उसने व्यापारी को आम के पेड़ों और साधुओं का सारा किस्सा भी कह सुनाया।

सारी बात सुनकर बुद्धिमान व्यापारी को साधुओं की धूर्तता और किसान का भोलापन समझते देर न लगी। उसने भोलू की मदद करने की ठान ली। उसने किसान से कहा कि जिस समय वे साधु आम तोड़ने के लिए वहाँ आते हैं, उस समय उसे वहाँ ले चलना। साथ में दो मोटे-मोटे लट्ठ भी ले चलने को कहा। उसने यह भी कहा, 'जब वे साधु आम तोड़कर टोकरे भर लें तो तुम भी पेड़ों से पूछना कि पेड़ तुम हो तो मेरे, पर आम साधु ले जाते हैं, बोलो मैं क्या करूँ? और पेड़, जो कुछ भी मेरे मुँह से बोले, तुम करना।'

दो लट्ठ लेकर किसान और व्यापारी ठीक समय पर पेड़ों के पास पहुँच गए। दोनों साधु आए। पेड़ों से इजाजत ली और पके हुए सारे आम तोड़कर टोकरे भर लिए। जैसे ही वे टोकरे उठाकर चलनेवाले थे कि व्यापारी ने उन्हें रोका और किसान की ओर इशारा किया। इशारा समझते हुए भोलू ने पेड़ों की ओर देखते हुए कहा -

               पेड़-पेड़, हो तो तुम मेरे
               पर साधु ले जाते आम
              पाला-पोसा मैंने तुमको
              पर साधु हैं खाते आम
              तुम्हीं बताओ प्यारे पेड़ों!
              मेरे लिए बचा क्या काम?'
इतना सुनते ही बुद्धिमान व्यापारी ने आँखें मूँदकर पेड़ों की ओर से कहा -
            'सुनो-सुनो ओ भोलू किसान,
             करो नहीं अब तुम आराम
             ये साधु हैं धूर्त बड़े
             अब तुम करो एक ही काम
             इतना मारो इनको जमकर
             निकल जाए सब खाए आम!'

व्यापारी के मुँह से पेड़ों की यह बात सुनी तो किसान बड़ा खुश हुआ। उसने लट्ठ उठाया और तड़तड़ साधुओं पर बरसाने लगा। धूर्त साधुओं ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि उनकी इतनी पिटाई भी हो सकती है। पिटते-पिटते ही उन्होंने किसान से कहा, 'अरे मूर्ख किसान, तू हमें मार क्यों रहा है? क्या हमने आम पेड़ों से पूछकर नहीं तोड़े हैं? तुझे पाप लगेगा।'

किसान ने तुरंत कहा, आप लोगों की जमकर पिटाई करने का हुक्म भी तो पेड़ों ने ही दिया है। सुना नहीं, पेड़ों ने व्यापारी जी के मुँह से क्या कहा था। व्यापारी जी, जरा बोलकर तो बताना!'

                 व्यापारी ने जल्दी से दोहराया -
                 'सुनो-सुनो ओ भोले किसान,
                  करो नहीं अब तुम आराम
                  ये साधु हैं धूर्त बड़े
                  अब तुम करो एक ही काम
                  इतना मारो इनको जमकर
                  निकल जाएँ सब खाए आम।'

यह बार सुनकर दोनों समझ गए कि बुद्धिमान व्यापारी ने उनको अपने ही जाल में फँसा लिया है और उन दोनों ने किसान के पाँव पकड़ लिए और गिड़गिड़ाकर कहा, 'हमें माफ कर दो। हमें अपने किए का फल मिल गया है। अब हम कभी इन पेड़ों की ओर मुँह तक नहीं करेंगे।'

उनको गिड़गिड़ाते देखकर भोलू किसान का मन पसीज गया। वह दयालु तो था ही। उसने उन्हें उठाकर कहा, 'तुम लोगों ने मुझ भोले-भाले आदमी को भी समझदार बना दिया है। मैं अपने भोलेपन की वजह से ही तुम्हारी बातों में आ गया था। जाओ, अब किसी के भोलेपन का नाजायज फायदा मत उठाना।'

बुद्धिमान व्यापारी ने भी उनसे कहा, 'तुम लोगों ने साधुओं का वेश धारण करके यह नीच काम किया है। तुमने साधुओं पर भी कलंक लगा दिया है। तुम्हें प्रायश्चित करना चाहिए।

दोनों साधुओं ने हाथ जोड़कर पूछा - 'बताइए, हमें क्या करना होगा? अपने माथे से यह कलंक मिटाने के लिए हम हर तरह का काम करने को तैयार हैं।'

'तो सुनो!' अब तुम कुछ दिन भोलू किसान के खेत में मेहनत करके इसके आमों की कीमत चुकाओ।' व्यापारी ने कहा।

साधुओं ने व्यापारी की बात मान ली। उन्होंने किसान के खेत में खूब मेहनत की। जब किसान की हरी-भरी फसल लहलहा उठी तो वे दोनों बहुत ही खुश हुए। मेहनत का फल इतना मीठा होता है, उन्होंने कभी जाना ही नहीं था।

अब तो वे भोलू किसान के अच्छे दोस्त बन गए थे।


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