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विमर्श

अतीत का उत्सव और उत्सव का अतीत
बद्रीनारायण


1857 (भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रारंभिक घटनाओं में से एक) की घटना घटने के 50 वर्ष बाद 1907 में इसके इतिहास को पुनः आविष्कृत किया गया। यह इस घटना के इतिहास का उत्खनन न होकर इसकी स्मृतियों का अन्वेषण था। यह अन्वेषण लंदन में राष्ट्रवादी युवकों के एक दल द्वारा किया गया। इन्होंने 1857 की घटना को याद करने के लिए 10 मई, 1907 को 'यादगारी दिवस' मनाया। यहाँ इतिहास 'अतीत में कहे गए एवं किए गए कार्यों की स्मृति के रूप में' हमारे सामने आता है। इस यादगारी दिवस में 1857 की घटना के इतिहास का जिस प्रकार बयान किया गया, वह वस्तुतः अतीत एवं वर्तमान के बीच समानता खोजने एवं अतीत को ऐसे प्रस्तुत करने की कोशिश की गई, जिसमें वर्तमान की अवधारणाओं को वैधता प्राप्त होती हो। यह एक प्रकार से वर्तमान के आलोक में अतीत की राष्ट्रवादी पुनर्रचना का प्रयास था।

यह जानना अत्यंत रोचक है कि क्यों और कैसे राष्ट्रवादी शक्तियों के मस्तिष्क में इस स्मृति का उत्सव मनाने का ख्याल आया। वस्तुतः 1907 में इंग्लैंड में ब्रितानी जनता के एक भाग ने 1857 के क्रांतिकारियों पर ब्रितानी विजय की 50वीं वार्षिकी मनाने की घोषणा की। उन्होंने उन अँग्रेजी अफसरों की याद में जिन्होंने क्रांतिकारियों के दमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, विशिष्ट स्मृति-ग्रंथ प्रकाशित किए। इंग्लैंड के अखबारों में ऐसे विज्ञापन दिए गए जिनमें क्रांतिकारियों को धोखेबाज, अपराधी, जैसे नकारात्मक संबोधनों से अभिहित किया गया। ऐसे आयोजनों में दिए जानेवाले भाषणों, नाटकों एवं व्याख्यानों में 1857 के क्रांतिकारियों की अनेक घृणापूर्ण साम्राज्यवादी गालियों से भरी हुई आलोचना की गई।

इसकी प्रतिक्रिया में अभिनव भारत रिवोल्यूशनरी सोसाइटी के नेता सावरकर के नेतृत्व में 1857 की स्मृति को केंद्र में रखकर राष्ट्रवादी उत्सव मनाया जाने लगा। ऐसे उत्सवों में सावरकर और उनके सहयोगियों ने 1857 के विद्रोह के नायकों एवं नायिकाओं तथा नाना साहब, महारानी झाँसी, तात्या टोपे, कुँवर सिंह, मौलवी अहमद साहिब की छवि परिकल्पित की तथा इनको केंद्र में रखकर राष्ट्रवादी वृत्तांत विकसित किए। 1857 के इतिहास की ब्रितानी साम्राज्यवादी व्याख्याओं एवं पुनर्व्याख्याओं के खिलाफ सावरकर ने 1857 की घटना का एक भिन्न एवं प्रतिरोधी आख्यान विकसित किया। 1908 में उन्होंने मराठी में 1857 के इतिहास पर केंद्रित एक पुस्तक लिखी, जिसका नाम था 'द इंडियन वार आफ इंडिपेंडेन्स'।1 यह इतिहास कुछ खास लक्ष्यों को ध्यान में रखकर रचा गया था। सावरकर ने स्वयं अपने एक लेख में ऐसे इतिहास लेखन के उद्देश्यों की तरफ इशारा करते हुए लिखा है कि - इस इतिहास लेखन का उद्देश्य स्वतंत्रता की आकांक्षा की ज्वाला में धधकते लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करना है कि वे अँग्रेजों के विरुद्ध पुनः दूसरा युद्ध छेड़कर मातृभूमि को मुक्ति दिलाने की दिशा में आगे बढ़ें। अपने ऐसे क्रांतिकारी संदेशों को संपूर्ण भारत में फैलाने के उद्देश्य से सावरकर ने 1857 के योद्धाओं की स्मृतियों को जगाकर जनता के बीच अपने संदेशों के लिए जन-आधार विकसित करना चाहा। ऐसे इतिहास लिखने का उनका एक लक्ष्य यह भी था कि राष्ट्रीय आंदोलन की एक ऐसी परंपरा की स्मृति निर्मित कर सकें जो विदेशी आधिपत्य के विरुद्ध जनता द्वारा किए जानेवाले भावी सशस्त्र विद्रोह को वैधता दिला सके तथा 1857 के योद्धाओं के आख्यानों में निहित प्रतीकात्मक शक्ति से आगामी सशस्त्र संघर्ष करनेवाली पीढ़ी को प्राप्त हो सके। यह वस्तुतः भारतीय इतिहास का ऐसा दौर था जिसमें 'लायलिस्ट माडरेट्स' तथा अन्य राष्ट्रवादी राजनीतिक समूहों द्वारा सशस्त्र संघर्षवादियों को अपराधी का संबोधन दिया जा रहा था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी तब सशक्त संघर्ष के विरोध में थी तथा वह सुधार एवं शांतिपूर्ण समाधानों की पक्षधर थी।

इस प्रकार यह 1857 के इतिहास की पुनः खोज भारतीय राष्ट्रवादियों के उग्रवादी समूहों द्वारा अतीत की एक राजनीति के रूप में की गई, जिसका उद्देश्य था, स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक आदर्श निश्चित करना, उन्हें प्रेरित करना तथा स्वतंत्रता के लिए किए जानेवाले सशस्त्र संघर्ष के लिए अतीत की पुनः व्याख्या से एक वैधता प्राप्त करना। 1857 के इस इतिहास का बाद में चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उग्रवादी धारा भगतसिंह, भगवतीचरण बोहरा आदि के द्वारा अनुग्रहण एवं प्रसारण किया गया। इस इतिहास आख्यान में निहित प्रभावोत्पादकता से स्वतंत्रता संग्राम की गांधीवादी धारा भी मुँह मोड़े न रह सकी। यही इतिहास बाद में चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के राष्ट्रवादी इतिहास के रूप में स्थापित हुआ। यह उल्लेखनीय है कि किस प्रकार 1857 की घटना के 50 वर्ष बाद उक्त घटना की साम्राज्यवादी एवं राष्ट्रवादी व्याख्याओं से ओत-प्रोत अतीत का एक स्वरूप अन्वेषित कर उसके आस-पास एक स्मृति निर्मित की गई। इससे यह भी जाहिर होता है कि हरेक राजनीति अपने अनुसार इतिहास रचती है एवं उस इतिहास पर आधारित जन स्मृतियों का निर्माण एवं प्रसार उसकी सफलता का एक महत्वपूर्ण कारक होता है।

इस आलेख में मेरा उद्देश्य उत्तर प्रदेश में उभरी दलित राजनीति द्वारा 1857 के आख्यान का उपयोग एवं उनके राजनीतिक विमर्श के निर्माण में उसकी भूमिका का अवलोकन है। इसमें यह भी देखने की कोशिश की गई है कि किस प्रकार दलित जातियाँ आज के संदर्भ में अपना इतिहास अन्वेषित कर रही हैं और अपने ऐतिहासिक नायकों एवं नायिकाओं को खोजकर, रचकर अपने अस्मिता निर्माण की प्रक्रिया में इनका इस्तेमाल कर रही हैं तथा इनसे जुड़ी अपनी आकांक्षा एवं राजनीतिक अस्मिता को महत्वपूर्ण ढंग से प्रस्तुत कर रही हैं।

राष्ट्रवादी इतिहासकारों द्वारा लक्ष्मीबाई की जो छवि प्रस्तुत की गई है, उसमें उनके 1857 के संग्राम में 'हिरोइक मिथकीय व्यक्तित्व' का आख्यान विकसित किया गया। इस संग्राम में नायकों एवं नायिकाओं का जो वृत्तांतात्मक स्वरूप सावरकर ने रचा, उसी को राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने भी अनुमोदित किया। ऐसे नायकों एवं नायिकाओं का आख्यानात्मक ढाँचा मूलतः तीन आधारों पर सृजित किया गया था -
 

(1) शहीद वीर नायक/नायिका की छवि
    (2) तीव्र राष्ट्रवादी चेतना से लैस व्यक्तित्व का वर्णन
    (3) एक लोकप्रिय नेतृत्व के रूप में नायकों का स्थापन
    (4) भारतीय समाज के हिंदू एवं मुसलमान दोनों ही तबकों द्वारा उन नायकों की स्वीकृति का बयान

जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में भी उपर्युक्त छवि को ही स्वीकृति दी किंतु उसके बाद इन छवियों का विकास इस रूप में किया ताकि वे उनके तर्कों को सिद्ध करने में मदद कर सकें।2 साहित्य में भी वृंदावनलाल वर्मा एवं सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपने उपन्यासों एवं कविताओं में ऐसे नायकों एवं नायिकाओं की उपर्युक्त आविष्कृत छवि का ही साहित्यिक अनुकरण किया। आजादी के बाद भी राष्ट्रीय नायकों की छवि के उपर्युक्त टाइप की ही सरकारी प्रकाशनों, अमर-चित्र कथा, लोकप्रिय नाटक, नौटंकियों आदि में अनुकृति की गई।

हालाँकि बुंदेलखंड पर लिखे गए गंभीर आलोचनात्मक इतिहासों में लक्ष्मीबाई का वैसा मिथकीय एवं नायकत्व से भरा वर्णन नहीं मिलता, जैसा राष्ट्रवादी इतिहास लेखन में मिलता है। (स्टोक्स, 1985, चौधरी, 1957, मुखर्जी 1984)3 राष्ट्रवादी आख्यानों में 1857 का जो वृत्तांत प्राप्त होता है, वह मूलतः दो तत्वों पर निर्मित किया गया है -

(1) नायक केंद्रित वृहत आख्यान का गौरवान्वयन
    (2) दलितों की भूमिका के वर्णन के प्रति उदासीनता

1960 के बाद दलितों ने 1857 के विद्रोह का अपना आख्यान लिखना प्रारंभ किया। इस आख्यान में अनेक दलित नायकों एवं नायिकाओं यथा झलकारीबाई, ऊदा देवी, मातादीन भंगी, चेतराम जाटव, बल्लू मेहतर, बाँके चमार और वीरा पासी इत्यादि का आविष्कार किया गया। इन कथाओं में दलित नायकों की प्रस्तुति इस रूप में की गई ताकि वे 1857 के संग्राम के पहले से स्थापित नायकों एवं नायिकाओं तथा लक्ष्मीबाई, कुँअर सिंह की तुलना में ज्यादा समर्पित एवं देशभक्त दिखें। हालाँकि 1857 के संग्राम का दलित आख्यान, नायक निर्मित एवं उसका गौरव वर्णन राष्ट्रवादी आख्यान से ज्यादा भिन्न नहीं दिखता।

मिथक स्मृति और आख्यान

झलकारी बाई का मिथक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के तथाकथित प्रथम विद्रोह 1857 की कथा से जुड़ा है। यह मिथक निम्न रूप से वर्णित है -

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के महल में झलकारीबाई नाम की एक दासी थी। वह कोरी जाति की महिला थी। जब अँग्रेजों ने झाँसी के किले को चारों ओर से घेरकर उस पर गोलियों की बौछार शुरू की तो झलकारीबाई ने लक्ष्मीबाई को समझाया कि वे अपने नवजात शिशु को पीठ पर बाँधकर भाग जाएँ। वह स्वयं लक्ष्मीबाई के रूप में अँग्रेजों को भ्रम में डालकर रोके रहेगी। रानी झलकारी की सलाह को मानकर बच्चे को पीठ पर बाँधकर किले से निकल आई। अंग्रेज सेना काफी समय तक झलकारी को लक्ष्मीबाई समझकर वहाँ उलझी रही। इस प्रकार झलकारीबाई लक्ष्मीबाई बनकर अँग्रेजों से वीरतापूर्वक लड़ती रही।

यह मिथक बुंदेलखंड की लोकप्रिय स्मृति का हिस्सा है और इसे कई रूपों में कहा-सुना जाता है। यह मिथक लोक स्मृतियों में जीवित है तथा लोकायनों, लोककथाओं एवं चौपाली बातचीत में बार-बार दुहराया गया है।

इस क्षेत्र के अनेक दलित समुदाय के लोग उसे देवी के रूप में याद कर रहे हैं। राजकुमार कोरी अपने जवाबी कीर्तन में झलकारीबाई को देवी के रूप में याद करते हैं। वे उसकी वीरता का गायन निम्न रूप से करते हैं -

जय झलकारी, दुर्गा, काली,
    जय, जय माँ
    अँग्रेजों का गरब तूने
    चूर चूर किया।

राजकुमार कोरी बताते हैं कि यह हाल में रचा गया कीर्तन है। जो सुरेश सिंह बुंदेला कीर्तन पार्टी द्वारा लक्ष्मीबाई के लिए रचे गए कीर्तन के जवाब में बनाया गया कीर्तन है।4

झलकारीबाई मात्र कल्पना न होकर एक ऐतिहासिक चरित्र थी जो लक्ष्मीबाई की दासी थी। परंतु उसके बारे में विभिन्न समुदायों में विभिन्न स्मृतियाँ सक्रिय हैं। निचली जातियों में उसका मिथक लगातार पुनर्रचना एवं पुनःनवीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहा है। विभिन्न समुदाय आज भी अस्मिता निर्माण की आकांक्षाओं से प्रेरित हो झलकारीबाई के मिथ को अपने-अपने ढंग से रच रहे हैं और कई बार दूसरे समुदायों के कथन के समानांतर इसका बयान कर रहे हैं। शायद इसलिए भी झलकारीबाई की स्मृति कई बार राजनीतिक टकराव की विषयवस्तु में भी तब्दील हो गई है।

झाँसी के एक वृद्ध रामनारायण शुक्ल याद करते हैं, 'झलकारीबाई कुछ खास नहीं थी। वह एक कोरिन थी। वह महारानी लक्ष्मीबाई की दासी थी। दोनों का चेहरा मिलता था, जब रानी किले से बाहर हो गई तो झलकारी ने रानी जैसी पोशाक पहनकर अँग्रेजों को भरमाए रखा था।'

रामनारायण शुक्ल द्वारा झलकारी की कोरिन अस्मिता पर जोर देना, उनकी चेतना में निहित निचली जातियों के प्रति सवर्ण मानसिकता का सूचक बनकर उभरता है।

आख्यान बनने का इतिहास

झलकारीबाई एक ऐतिहासिक चरित्र थी, जो लंबे समय के बाद एक मिथक के रूप में तब्दील हो गई। लिखित स्रोतों से जैसे जनरल रोज की डायरी (झाँसी के किले पर आक्रमण करनेवाली ब्रिटिश टुकड़ी का नेता) एवं उस काल के गजेटियर में झलकारी का विवरण नहीं मिलता।5 जबकि 1857 के विद्रोह के वक्त बुंदेलखंड में भ्रमण करनेवाले एवं लंबे समय तक निवास करनेवाले मराठी यात्री विष्णु राव गोडसे की संस्मरणात्मक पुस्तक (माझा प्रवास) में उनका झलकारी कोरिन का महारानी लक्ष्मीबाई की दासी के रूप में एक अति संक्षिप्त विवरण मिलता है।6 प्रसिद्ध उपन्यासकार वृंदावनलाल वर्मा ने अपने उपन्यास 'झाँसी की रानी' में झलकारी कोरिन पर आधारित एक अत्यंत संक्षिप्त उपकथन का सृजन किया है। वे अपनी पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं कि उन्होंने झलकारीबाई के पौत्र से साक्षात्कार किया था और इसी साक्षात्कार के आधार पर वृंदावनलाल वर्मा झलकारी के सच्चे अस्तित्व की बात स्थापित करते हैं। वे लिखते हैं कि झलकारी की मृत्यु 1890 के आसपास हुई। उसके परिवार के लोग अभी भी झाँसी के पास की एक बस्ती में रहते हैं।7

वृंदावनलाल वर्मा के उपन्यास में झलकारीबाई का विवरण कुछ इस प्रकार मिलता है - उसका पति पूरन कोरी था। वह लक्ष्मीबाई की दासी थी। उसने तीरंदाजी, घुड़सवारी एवं निशानेबाजी रानी से सीखी थी। वह बाद में रानी द्वारा गठित महिला सेना में शामिल हो गई थी। झलकारीबाई द्वारा प्रेरित हो उसके पति पूरन कोरी ने रानी के लिए लड़ते हुए अपनी जान दे दी। उसका पति तोपची था।

जब अँग्रेजों ने झाँसी के किले पर आक्रमण किया तो झलकारी ने लक्ष्मीबाई की वेशभूषा बना अँग्रेजों को लंबे समय तक रोके रखा। अंग्रेज लगभग एक सप्ताह तक इस भ्रम में पड़े रहे कि वही रानी लक्ष्मीबाई है।8

श्री वर्मा के पाठ में झलकारी के नाम के साथ हर जगह कोरिन जोड़ा गया है। उसके नाम के साथ 'बाई' नहीं जोड़ा गया है। इस उपन्यास में अन्य महिला सेनानियों यथा मोतीबाई, मुखदरीबाई और सुंदरीबाई को ज्यादा महत्व दिया गया है जबकि उनकी हैसियत झलकारी के समान ही थी। उनके नामों के साथ 'बाई' जोड़ा गया है, जबकि झलकारी के नाम के साथ कोरिन का विश्लेषण। 1964 में एक दलित विचारक एवं लेखक भवानीशंकर विशारद ने पहली बार झलकारी की विस्तृत जीवनी लिखी।9 उन्होंने वृंदावनलाल वर्मा के उपन्यास से इस विवरण को उठाया था और झाँसी के पास के नया पुरवा गाँव (झलकारीबाई का गाँव) के दलित जाति के वृद्ध लोगों के मौखिक संस्करणों एवं वृत्तांतों के आधार पर झलकारीबाई का एक भिन्न वृत्तांत रचा।

विशारद लिखते हैं -

'जब मैं कानपुर में बी.ए. का छात्र था तो झलकारी के बारे में सुनता था। मैंने उसके ऊपर कुछ लिखने की महत्वाकांक्षा मन में पाल रखी थी।'

'दिसंबर 1961 में मेरा स्थानांतरण झाँसी हुआ। तत्पश्चात मैंने इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम आरंभ किया। पहले मैंने अनेक किताबें पढ़ीं। पर किताबें झलकारी बाई के बारे में ज्यादा बता पाने में असमर्थ थीं। फिर मैंने अपने से सच्चाई की खोज प्रारंभ की। मैं नया पुरवा की गलियों में बिना कुछ पाए दर-दर भटकता रहा। फिर मेरी मुलाकात नाथूराम आर्य से हुई। उन्होंने इस विषय पर मेरा त्याग देखकर सहयोग करने का वादा किया। सबसे पहले उन्होंने मुझे वह सब बताया जो उन्होंने झलकारी के बारे में सुन रखा था। उनके साथ मैं पुनः नया पुरवा गया। तब कहीं जाकर हम लोग उस जगह को खोज पाए, जहाँ झलकारी बाई रहती थी। फिर उन्हीं के साथ हम उन लोगों से मिल पाए, जिनकी स्मृति में झलकारीबाई की छवि सजीव थी। हम मोहन दर्जी से मिले, जिन्होंने मुझे झाँसी के मानिक चौक पर अवस्थित वीरांगना झलकारीबाई समिति के दफ्तर से परिचित कराया। वहीं मिले श्री दामोदर से, जिनसे झलकारीबाई के बारे में काफी कुछ पता चल सका।'10 भवानीशंकर विशारद (एक दलित लेखक) झलकारी बाई की छवि इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं -

'झलकारी एक संतानविहीन महिला थी। जो भी उसने किया, वह समाज की भावी पीढ़ी के लिए किया। वह एक महिला थी, जिसने एक महिला के लिए त्याग किया। अपनी जान की चिंता किए बगैर उसने लक्ष्मीबाई को किले से भागने में मदद की ताकि वे देश के लिए अगली लड़ाई लड़ सकें। उसने अनेक महिलाओं को दीवाल एवं पर्दे से बाहर आकर देश एवं समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी। अत्यंत गरीब होते हुए भी उसने स्वतंत्रता संग्राम की बनकर अपना खून बहाया।'11

झलकारीबाई की इस छवि में वृंदावनलाल वर्मा से भिन्न झलकारी का निःसंतान होकर भी, गरीब होकर भी देश, समाज की भावी पीढ़ी एवं महिलाओं के प्रति उनके द्वारा किए गए त्याग को गौरवान्वित किया गया। वहीं दूसरी ओर रानी लक्ष्मीबाई की कथा में उनका अपने संतान की प्राण-रक्षा का वृत्तांत महत्वपूर्ण बनकर उभरता है।

1990 के बाद झलकारीबाई पर केंद्रित अनेक लोकप्रिय पुस्तिकाएँ, कविताएँ, लोक-नाटक एवं लोकगीत दलित कार्यकर्ताओं, राजनीतिज्ञों एवं लेखकों द्वारा लिखे गए। ऐसी रचनाओं में लक्ष्मीबाई की जगह झलकारीबाई को रखने की अनेक प्रकार की रचनात्मक कोशिशें दिखाई पड़ती हैं। अर्चना वर्मा द्वारा रचित निम्नांकित पंक्तियों में ऐसे ही प्रयास दिखाई पड़ते हैं -

मचा झाँसी में घमासान, चहुँ ओर मची किलकारी थी।
   अँग्रेजों से लोहा लेने रन में कूदी झलकारी थी।

यह एक प्रकार से प्रसिद्ध कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की रानी लक्ष्मीबाई पर केंद्रित प्रसिद्ध कविता के ही छंद और रूप में झलकारीबाई को अवस्थित करने की कोशिश है। इसे सुभद्राकुमारी चौहान की उक्त कविता द्वारा निर्मित लोकप्रिय स्मृति के ही आधार तल पर झलकारीबाई को रखकर स्मृतियों के बने-बनाए आधारों के इस्तेमाल से ही एक लोकप्रिय कल्पना के रूप में भी देखा जा सकता है। श्री चोखेलाल वर्मा ने इसी क्रम में झलकारीबाई पर महाकाव्य लिखा एवं माताप्रसाद ने लोकनाटक। इसमें दलितों में विकसित हुए अपने इतिहास एवं आख्यान की पुनःरचना का नवीन लक्ष्य साफ दिखाई पड़ता है। इस प्रक्रिया की दो विशिष्टताएँ स्पष्ट होकर उभरती हैं।

1. सीमांत की जातियों के अस्मिता निर्माण के लिए ऐतिहासिक साहित्य की पुनः व्याख्या एवं पुनः रचना की कोशिश।
    2. दलितों द्वारा भविष्य में रचे जा रहे महाआख्यान के प्रवेश-द्वार के रूप में साहित्य का इस्तेमाल।

इस प्रकार जातियाँ एवं समुदाय अपनी अस्मिता की खोज के लिए मिथकों, स्मृतियों एवं अतीतों की पुनः कल्पना एवं पुनः खोज की एक बड़ी परियोजना में लगे हैं। यही वह स्पेस भी है जहाँ अतीत की पुनः व्याख्या के क्षेत्र में राजनीतिक शक्तियाँ प्रवेश कर सकती हैं। 1990 में माताप्रसाद द्वारा झलकारीबाई के ऊपर रचित नाटक में झलकारीबाई की छवि निम्नांकित रूप से प्रस्तुत है -

'वह पूरन कोरी की पत्नी थी। कोरी जाति ने अँग्रेजों के खिलाफ युद्ध में लक्ष्मीबाई के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया। झाँसी के किले के मुख्य गेट की रक्षा की जिम्मेदारी कोरी जाति की थी। झलकारीबाई लक्ष्मीबाई की ही तरह योग्य, युद्धप्रवीण एवं विवेकवान महिला थी, जो रानी द्वारा गठित महिलाओं की सेना दुर्गावाहिनी की मुखिया थी। रानी उसे अपनी बहिन मानती थी। राजपूत सैनिकों को रानी से उसकी निकटता अच्छी नहीं लगी। उन्होंने दोनों को अलग करने का असफल षड्यंत्र किया।' 12 उपरोक्त आख्यान में झलकारी को 'बाई' का संबोधन देते हुए योग्यता, गुण एवं वीरता में लक्ष्मीबाई के समकक्ष रखा गया है। इस आख्यान में उसकी रानी से निकटता के वृत्तांत पर जोर दिया गया है। इस आख्यान के अनुसार उन दोनों में इतनी निकटता थी कि इससे ईर्ष्या करते हुए, सवर्ण सैनिकों ने दोनों को अलग करने का षड्यंत्र किया, जिसमें वे असफल हुए।

सवर्ण मानसिकता वाले समाज के उच्च तबकों को यह आख्यान स्वीकार करने में दिक्कत होगी, क्योंकि इसमें एक ओर झलकारीबाई को रानी की ही तरह योग्य, विवेक से पूर्ण एवं युद्धकुशल बताया गया है। दूसरी ओर राजपूत सैनिकों को षड्यंत्रकारी बताया गया है। इस विस्तृत आख्यान में दलित जातियों को अत्यंत तीव्र देशभक्ति की आकांक्षा से पूर्ण बताया गया है।

अनेक दलित लेखकों ने झलकारीबाई के लगभग भुला दिए गए प्रसंग को वृंदावनलाल वर्मा के उपन्यास से उठाया जो स्वयं एक गैर-दलित लेखक थे। वर्मा के ही उपन्यास के माध्यम से झलकारीबाई का मिथक साक्षर एवं शिक्षित लोगों के बीच फैला। झलकारीबाई के प्रथम जीवनीकार भवानीशंकर विशारद अपनी पुस्तक 'वीरांगना झलकारीबाई' में बार-बार वर्मा द्वारा प्रस्तुत किए गए झलकारीबाई के विवरण का हवाला देते हैं।

दलित इतिहास की ये नई सूचनाएँ दलित लेखकों द्वारा रचित जीवनी, नाटक, वीरगाथात्मक कविता के रूप में जनता के बीच प्रचलित हो रही हैं। झलकारीबाई की कथा की इस पुनः खोज एवं पुनः संचार की प्रक्रिया में एक सशक्त वैचारिक उग्रता, एक नए प्रकार की जागरूकता, नवीन अस्मिता की धमक एवं उन नई आकांक्षाओं को पुनः परिभाषित करने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। इस प्रकार के अतीत की पुनः खोज का एक लक्ष्य अपने सामाजिक वजूद के लिए वैधता प्राप्त करना तथा नए सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ में अपनी अस्मिता को फिर से रचना है।

पारंपरिक समाजों में वीरतापरक आख्यान मूलतः युद्धों में नायक की उपलब्धि की प्रशंसा के लिए रचा जाता है। इस रचना की प्रक्रिया में एक समुदाय अपने भीतर आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान प्राप्त करता है। ऐसे आख्यान ऐतिहासिक तथ्यों तक सीमित नहीं होते बल्कि मिथक, धर्म एवं शुद्ध वृत्तांतों तक फैलते हैं। ऐसे आख्यान समुदायों की सामूहिक स्मृति को रचते हैं एवं समुदाय के सदस्यों को अपनी नवरचित अस्मिता के लिए संघर्ष करने को उन्मुख करते हैं।

डी.सी. दिनकर नाम के एक दलित इतिहासकार झलकारीबाई के बारे में एक रोचक दृश्य रचते हैं :

'रानी लक्ष्मीबाई में गद्दी का मोह था। वे विद्रोह नहीं करना चाहती थीं। वीरांगना झलकारीबाई ने उन्हें अँग्रेजों से समझौता करने से रोका। उसी ने रानी लक्ष्मीबाई को आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित किया।'

वे आगे कहते हैं - 'यह अनैतिहासिक होगा कि रानी लक्ष्मीबाई को शहीद के रूप में याद किया जाए। अनेक इतिहासकारों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि 16 जून, 1858 को रानी ने अँग्रेजों से संघर्ष करते हुए वीरगति प्राप्त की। जबकि तथ्य यह है कि वह प्रतापगढ़ के महाराजा की मदद से अँग्रेजों की नजरों से छुपकर नेपाल की तराई में भाग गईं एवं भूमिगत हो गईं। वस्तुतः उन्होंने एक लंबा जीवन जिया और 80 वर्ष की उम्र में उनकी स्वाभाविक मृत्यु हुई।' वे अपने तर्क के पक्ष में 1941 में 'सुधा' (एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका) में प्रकाशित लक्ष्मीबाई की तसवीर भी प्रस्तुत करते हैं।13

इससे यह भी जाहिर होता है कि झलकारीबाई के मिथक को स्थापित करने के लिए रानी लक्ष्मीबाई की बनी-बनाई छवि को विरूपित करने की प्रवृत्ति भी दलित इतिहासकारों एवं लेखकों में दिखाई पड़ती है। यहाँ यह स्पष्टतः देखा जा सकता है कि किस प्रकार लक्ष्मीबाई की राष्ट्र के लिए शहादत की स्मृति को विरूपित किया जा रहा है। दूसरी तरफ अनेक दलित संगठनों द्वारा झलकारीबाई का शहादत दिवस मनाकर उनकी नई छवि निर्मित की जा रही है।

अभी हाल ही में भारतरत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर जन्म दिवस मेला आयोजन समिति, इलाहाबाद ने झलकारीबाई का 143वाँ शहादत दिवस मनाया। इस शहादत दिवस समारोह में अनेक वक्ताओं का व्याख्यान तीन बातों पर केंद्रित था :

1. राष्ट्रीय परिदृश्य पर झलकारीबाई के त्याग एवं वीरता का गौरवान्वयन। इसी के माध्यम से दलित जातियों की राष्ट्र के लिए की गई कुर्बानियों एवं वीरता का आख्यान प्रस्तुत करना।|
    2. झलकारीबाई के वीरतापूर्वक शहीद होने की उपकथा पर बार-बार जोर देना।
    3. झलकारीबाई की शहादत की कथा को वीरतापरक कथा के रूप में गौरवान्वित करने का प्रयास।

वे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में दलित शहीदों की एक शृंखला भी प्रस्तुत करते हैं। इस शृंखला में झलकारीबाई एवं उदा देवी जैसी महिलाएँ दलितों की राष्ट्रभक्ति एवं त्याग की परंपरा के रूप में गौरवान्वित की जाती हैं। इन आख्यानों के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में दलितों की भूमिका का बखान किया जाता है। ऐसे आख्यानों का दूसरा लक्ष्य है उक्त परंपरा की वर्तमान पीढ़ी में आत्मविश्वास एवं साहस पैदा करने के लिए बयान। ऐसे लिखित एवं प्रकाशित आख्यानों का एक क्रम यहाँ प्रस्तुत है :

प्रकाशित लोकप्रिय पुस्तिकाओं में झलकारीबाई

 

लेखक पुस्तिकाएँ तिथि

विष्णु राव गोडसे माझा प्रवास 1907
    वृंदावनलाल वर्मा झाँसी की रानी 1950
    रामचंद्र हैरन माटी 1951
    भवानीशंकर विशारद वीरांगना झलकारीबाई 1964
    पीयूष झलकारी (नाटक) 1972
    डी.सी. दिनकर स्वतंत्रता संग्राम में
    अछूतों का योगदान 1990
    माता प्रसाद झलकारीबाई (नाटक) 1990
    चोखेलाल वर्मा वीरांगना झलकारी (काव्य) 1993
    बिहारीलाल हरित वीरांगना झलकारीबाई 1995
    (महाकाव्य)

इन पुस्तिकाओं के लेखक प्रायः दलित समुदाय के हैं। आर.एस. खरे (1984) ठीक ही मानते हैं कि अछूत वर्ग के कुछ तबकों में आत्मचेतना का विधिवत विकास हुआ है और वे ऐसी नई विचारधाराओं के विकास में लगे हैं जो सामाजिक परिवर्तन में प्रभावी हो सकें।14 खरे ने भी अपने शोध के दौरान दलित लेखकों द्वारा लिखित अनेक लोकप्रिय पुस्तिकाओं का संकलन किया है। ये छोटी पुस्तिकाएँ सस्ते अखबारी कागजों पर छपती हैं। इनका मूल्य प्रायः एक-दो रुपए होता है। ये प्रायः मेले, कस्बों के बाजारों एवं राजनीतिक रैलियों में बिकती हैं।

यह कहना कठिन है कि झलकारीबाई की कथा पहले मौखिक संस्कृति में रचित हुई कि लिखित संस्कृति में। यों भी आधुनिक युग में लिखित एवं मौखिक संस्कृतियाँ साथ-साथ विकसित होती हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। हॉफमेयर (1993) अपने अध्ययन में यह सिद्ध करते हैं कि औपनिवेशिक एवं प्राक्-औपनिवेशिक समाजों में मौखिक एवं लिखित संस्कृतियाँ एकीकृत सामाजिक परिस्थितियों में सक्रिय होती हैं और एक दूसरे से संवाद कर पाती हैं।15 झलकारीबाई की जो स्मृति आज दलित समाज में जीवंत है, वह वस्तुतः अनेक जोड़, घटाव एवं परिवर्तनों से होकर गुजरी है। वृंदावनलाल वर्मा ने 1950 के पूर्व दलित जातियों में झलकारीबाई की स्मृति को संकलित करने के महत्वपूर्ण प्रयास किए थे। किंतु 1950 के बाद के लेखकों के लेखन में इस मिथक में परिवर्तन साफ दिखता है।

1950 के आस-पास के दलित इतिहास एवं आख्यान लेखन में झलकारी की योग्यता एवं वीरता को उभारने की तुलना में उसकी लक्ष्मीबाई से निकटता पर ज्यादा जोर दिया गया है। किंतु 1960 के बाद के नाटककारों, स्थानीय साहित्यकारों एवं नाच-पार्टियों के प्रदर्शनों एवं लेखन में यह मिथक एक नए रूप में आकार ग्रहण करता दिखता है। इस कालखंड के नाटकों में उसकी छवि रानी लक्ष्मीबाई के समकक्ष एवं समान रूप में निर्मित करने की कोशिश की गई है। यह शायद इसलिए हो सका कि नाच-पार्टियों एवं नौटंकी कंपनियों में तब निचली जातियों के कलाकारों की अधिकता थी।

अपने चेतन-अवचेतन में वे अपने प्रदर्शनों एवं रचनाओं में दलित जातियों के नायकों एवं नायिकाओं को ऊँची जाति के नायक, नायिकाओं के समक्ष चित्रित करने की अंतर्निहित आकांक्षा से संचालित हो रहे थे। दलित जातियों के इन कलाकारों में जागृत हो रही नवीन चेतना को उभारने में उत्तर भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कम्युनिस्ट पार्टी इस कालखंड में लोक प्रदर्शनों, मिथकीय ऐतिहासिक प्रस्तुतियों का क्रांतिकारी सामाजिक रूपांतरण के लिए उपयोग करने की दिशा में गंभीर रूप से काम कर रही थी। कम्युनिस्ट पार्टी जैसे निम्नवर्गीय पक्षधर दलों के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोग ने भी दलित जातियों की अस्मिता की अभिव्यक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरा, 1970 के आस-पास कलकत्ता से लोकप्रिय नाटकों एवं पुस्तिकाओं के रूप में अनेक सस्ते लोकप्रिय प्रकाशन सामने आए। इन नाटकों को आकर्षक, प्रभावी एवं रोचक बनाने के लिए लक्ष्मीबाई के अनेक सहयोगी चरित्रों की कल्पना की गई थी।

चूँकि ऐसे नाटक इस क्षेत्र में विभिन्न पर्वों, त्योहारों के अवसर पर लगातार खेले जाते रहे हैं एवं अभी लगातार खेले जा रहे हैं, अतः बहुत संभव है कि इन्होंने भी जनता में झलकारीबाई की नई स्मृतियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। यह भी संभव है कि जनता के मस्तिष्क में सक्रिय एवं मौखिक माध्यमों में अभिव्यक्त स्मृतियों का संकलन कर लेखकों ने उन्हें नाटकों में शामिल किया हो।

स्मृतियों एवं मिथकों का महोत्सव

बुंदेलखंड के दलितों ने झलकारीबाई की स्मृति को केंद्रित कर महोत्सव, समारोह एवं जयंतियाँ भी आयोजित की हैं। वे प्रत्येक वर्ष रानी लक्ष्मीबाई के किले के सामने झलकारीबाई की स्मृति के उपलक्ष्य में समारोह मनाने इकट्ठा होते हैं। झाँसी के किले के उन्नाव गेट एवं अंजनी टोरिया के बीच एक बुर्ज को झलकारी बुर्ज का नाम दिया गया है। नगर एवं आस-पास के दलितों ने वीरांगना स्मृति न्यास का भी गठन किया है। झाँसी में लक्ष्मीबाई की आकृति की उनसे भी बड़ी झलकारीबाई की मूर्ति लगाई गई है। बसपा अपने चुनावी विमर्शों एवं राजनीतिक अभियान में झलकारीबाई की स्मृति एवं मिथक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करती है।

भारतीय जनता पार्टी दूसरी ओर अपने राजनीतिक विमर्शों में लक्ष्मीबाई की स्मृति एवं मिथक का इस्तेमाल करती है। भारतीय जनता पार्टी की महिला शाखा की एक उपशाखा को लक्ष्मीबाई शाखा के नाम से पुकारा जाता है। भाजपा द्वारा शासित केंद्र सरकार (मानव संसाधन विकास मंत्रालय, मुरली मनोहर जोशी के कार्यकाल में) ने अभी हाल ही में लक्ष्मीबाई एवं सती अनुसूया की याद में पुरस्कार की स्थापना भी की है। उत्तर भारत में भाजपा प्रतिवर्ष लक्ष्मीबाई जयंती बड़े पैमाने पर मनाती है। इन आयोजनों में झलकारीबाई की चर्चा नहीं की जाती। किंतु हाल ही के वर्षों में दलितों की अस्मिता में झलकारीबाई की स्मृति एवं मिथक के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भाजपा की महिला शाखा ने लक्ष्मीबाई के गौरवान्वयन में रानी के प्रति समर्पित राष्ट्रभक्त सेविका के रूप में झलकारीबाई का वर्णन करना भी आरंभ किया है। पर वास्तविकता यह है कि झलकारीबाई का दलित आख्यान उसकी उपर्युक्त छवि के विरोध में एक नई निर्मिति है।

झलकारीबाई के मिथक का सवर्ण शासित मानसिकता से उपजे आख्यानों में ऐसा नकार या उसे मुख्य छवि की सहायक छवि के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति ने दलित लेखकों एवं इतिहासकारों में अपनी अस्मिता की उपेक्षा का बोध भरा है। जिसकी झलक यहाँ स्पष्ट है :

'इतिहास के पन्नों में रानी लक्ष्मीबाई के नाम के साथ वीरांगना झलकारीबाई के नाम का उल्लेख क्यों नहीं किया गया? क्योंकि एक तो वह महल में पैदा हुई महारानी नहीं थी, दूसरे, वह ऊँची जाति में पैदा नहीं हुई थी।'16

प्रश्न उठता है कि क्यों दलित वीरांगना झलकारीबाई के इतिहास की पुनः रचना कर उसे लोकप्रिय बनाना चाहते हैं? क्यों वे उसकी छवि को लक्ष्मीबाई के समकक्ष रखना चाहते हैं?

संभवतः दलितों में यह अहसास बैठ गया है कि भारतीय समाज के राजा-रानी और अभिजात्य ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्यधारा के इतिहास के वृत्तांत के केंद्र में अवस्थित हैं। भारतीय राष्ट्रवाद के उद्भव, विकास एवं प्रसार की मुख्य कथा में दलितों के लिए कोई जगह नहीं है। इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों, सरकारी प्रकाशनों एवं स्वतंत्रता संग्राम पर केंद्रित शताब्दी समारोहों में दलित स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नामोल्लेख भी नहीं होता। इसलिए अपनी अस्मिता के प्रति दृढ़तापूर्वक आग्रह व्यक्त करने के लिए एवं उसे वैधता प्रदान करने के लिए दलितों में स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका की कथा की खोज एवं बयान एक अस्तित्वसूचक घटना है। ऐसी कथाओं में स्वतंत्रता संग्राम के दलित नायकों एवं नायिकाओं के वृत्तांत को विस्तारपूर्वक वर्णित किया जाता है।

अपने इतिहास को फिर से कहने की परियोजना दलितों के लिए एक अर्थवान सामाजिक प्रक्रिया बनकर आती है। इस प्रक्रिया में उनके लिए चार अर्थ निहित होते हैं।

1. दलित जन के अस्तित्व में उनके 'होने' का बोध
    2. इसी के माध्यम से दलित जन को समाज में अपने स्थान का अहसास दिलाना
    3. आत्मसम्मान का अनुभव
    4. अपना मूल्यांकन

दलितों के लिए यह उनका अपना इतिहास है, जिसके माध्यम से वे अपने को पहचान पाते हैं और दूसरे भी उन्हें इसी के द्वारा पहचान सकते हैं। वे इस बात में विश्वास करते हैं कि सदियों से उनकी गुलामी का आधारभूत कारण दूसरों द्वारा प्रदान की गई अस्मिता का स्वीकार है। इसलिए उन्हें अपनी अस्मिता को परिभाषित करना एक ऐतिहासिक जरूरत जान पड़ती है।

उन्हें लगता है कि दलितों में चेतनाशून्यता एवं निष्क्रियता उनके आत्मविश्वास, आकांक्षाओं एवं आशाओं की हत्या करती जा रही है। यह स्थिति दलित समाज के विकास के लिए उचित नहीं है। अपना इतिहास रचकर एवं अपनी अस्मिता निर्मित करके ही इससे निजात मिल सकती है।17

दलितों के लिए इतिहास उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं से प्रेरित एक ज्ञानात्मक इकाई है, जो उनके अस्मिता-निर्माण का मुख्य उत्पादन बनकर उपस्थित है। इतिहास के इसी पुनराविष्कार की प्रक्रिया के अंतर्गत इन्होंने अपने अनेक नायकों एवं नायिकाओं की खोज की है। दलितों के अनुसार यह इतिहास समाज में उनकी अस्मिता का मूल आधार है। किंतु सच तो यह है कि इस इतिहास-लेखन ने अपने आख्यान का वैकल्पिक फॉर्म न विकसित कर राष्ट्रवादी मुख्यधारा के इतिहास के वृत्तांत के बीच ही अपने लिए, अपनी अस्मिता के लिए एवं अपने नायकों-नायिकाओं के लिए जगह बनाने की कोशिश की है।

संदर्भ

1. सावरकर अपनी पुस्तक 'इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेन्स' (1909) में अपने इतिहास-लेखन का उद्देश्य बताते हैं।
    2. जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध पुस्तक 'डिस्कवरी आफ इंडिया' के वृत्तांतों में यह प्रवृत्ति पाई जा सकती है।
    3. देखें एरिक स्ट्रोक्स, द पिजेंट एंड द राज, कैंब्रिज यूनि. प्रेस, 1979 कैंबिज एस.बी. चौधुरी, सिविल रिबेलियन्स इन द इंडियन म्यूटिनीज़ 1857-59, कलकत्ता, आर. मुखर्जी, अवध इन रिवोल्ट, 1857-1858 : ए स्टडी ऑफ पापुलर रेजिस्टेन्स, ओ.यू.पी., 1984, दिल्ली।
    4. ओरल हिस्ट्री कैसेट न. प्रथम-1, कचनारा ग्राम में ध्वन्यांकित।
    5. वही।
    6. विष्णुराव गोडसे, माझा प्रवास, 1907, पूना।
    7. वृंदावनलाल वर्मा, झाँसी की रानी, वृंदावनलाल वर्मा समग्र, हिंदी ग्रंथालय, 1951, वाराणसी की भूमिका।
    8. वही, पृ. 225
    9. देखें भवानीशंकर विशारद, वीरांगना झलकारीबाई, आगरा, 1964
    10. वही, पृ. 3
    11. वही पृ. 33
    12. देखें माताप्रसाद, झलकारीबाई (नाटक), विश्वविद्यालय प्रकाशन, 1990, वाराणसी
    13. डी.सी. दिनकर, स्वतंत्रता संग्राम में अछूतों का योगदान, बोधिसत्व प्रकाशन, 1990, लखनऊ, पृ. 24-25
    14. देखें आर.एस. खरे, द अनटचेबल एज हिमसेल्फ, केंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1984, केंब्रिज।
    15. एल. हॉफमेयर, वी.स्पेन्ड आवर इयर्स एज ए टेल दैट इज टोल्ड : ओरल हिस्टोरिकल नैरेटिव्स इन ए साउथ अफ्रीकन
चीफडम, जोहानसबर्ग, वी.यू.पी. 1993, न्यू हेवेन, हैनिमान
    16. भवानीशंकर विशारद, वही, पृ. 38
    17. आर.के. चौधरी, पासी साम्राज्य, श्रुति प्रकाशन, 1990, लखनऊ पृ. 3


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हिंदी समय में बद्रीनारायण की रचनाएँ