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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 05 असंगति या असंगत अंलकार पीछे     आगे


लक्षण (दोहा) :- कारज जहवाँ होत ना कारन का अनुसार।
होत असंगति बा उहाँ जेकर तीनि प्रकार॥
या
कर्ता कर्म करे जवन फल पावत सब कर्म।
इहे असंगति नाम के अलंकार के धर्म॥
 
उदाहरण :- '' जिभिये जब पानी गिरावे लगी तब आँखि में पानी कहाँ रहि जाई ''
उपरोक्‍त न सूक्ति हमार हवे ई त मोती बीए के हवे कविताई।
उनसे हम माँगत बानी कि ना एतना बढि़याँ हम से बनि पाई।
जब संहतिबाउनसे त असंगति में उनसे सहयोग लियाई॥
 
दोहा :- राउर मेहर बानिये जन जन कृषि बरसात।
घरवालन के किंतु बा मन मदारि जरि जात॥
छात्र परीक्षा देत जब नकल बना आधार।
अत: फेलना होत ऊ फेल होति सरकार॥
बेटहा के जब सिर चढ़त अधिक लोभ के भार।
बेटिहा के टूटत कमर ई विवाह व्‍यवहार॥
 

 
पहली असंगति अलंकार
 
लक्षण (दोहा) :- कारण कतहीं और हो कारज कतहीं और।
प्रथम असंगति नाम के अलंकार तेहि ठौर॥
 
उदाहरण (दोहा) : - चीलम पर गाँजा जरत लपट उठत टहकार।
निकलत मुँह से मनुज का किंतु धुवाँ के धार॥
बेटहा का सिर चढ़त जब अधिक लोभ के भार।
बेटिहा के टूटत कमर मन दुख होत हमार॥
जस-जस बेटिहा के भरम बेटहा लूटत जात।
तस-तस बेटहा के भरम आपन घटत दिखात॥
बी.पी. का जब देहि में लागल चोट प्रचण्‍ड।
जनता पार्टी टूटि के होई गइल दुइ खण्‍ड॥
जब भट्ठा का ईंट पर आगि खूब लहरात।
भट्ठा मालिक का मुहें लाली तब छा जात॥
गर्भ भार ढोवलि भंइसि गोसयाँ मन अगुतात।
भइंसि बियाये के दिवस जोरत ऊ दिनरात॥
कइल कुकर्म कुवंश के काने जब परि जात।
जब ओही संताप से कुल के मन पकि जात॥
अपने गा के देत ना गायकजन के साथ।
हरि-कीर्तन में ढोल के पीटत छुटहे हाथ॥
बेटिहा के सब अन्‍नधन लूटत खात बरात।
बिना जियाने ढोल बा बारम्‍बार पिटात॥
बरिसत जल जब खेत में पीयत फसिल नहात।
बइठल घरे किसान के हिय हरषात जुड़ात॥
 
सवैया :- रथ राम के यू.पी. में आवे बदे दृढ़ इच्‍छा रहे मन में निज धैले।
रथ के गति बंद उहाँ सहसा जब लालू समस्तियेपुर में कैले।
हिलि गैल बिहार में ले झटका अति वेग से आवत में रुकि गैले।
कुरुसी पर बैठल दिल्‍ली में बी.पी. तुरन्‍त उहाँ भुइयाँ भहरैले॥
 
ताटंक :- सिंह मुलायम जब करि दिहले लोहू से तर धरती तल।
तब उनके सब पाप कमाइल बी.पी. का सिर पर बीतल॥
भूत प्रेत आ रोग आदि जब केहू के कबे सतावेला।
तब भेड़ा भंइया आ बकरा के माथ लोग कटवावेला॥
सरस्‍वती जी छात्र लोग के कक्षा पास करावेली।
पर लड्डू हनुमान जी खाले ऊ ना तनिको पावेली॥
 
वीर :- नभ में सूर्य चाँद पर आके परक राहु के छाँह अशुद्ध।
हिंदू लोग इहाँ धरती पर होत अशुद्ध बतावें बुद्ध॥
शुद्ध बने खातिर कुछ हिन्‍दू करें तीर्थ में तीन स्‍नान।
या केहु अपना घरे नहालाकरे सभे लेकिन कुछ दान॥
दाँत काटि मरिचा के कूँचत जलन जीभि पर होते सजोर।
रोवे लागति आँखि दुओ तब गिरा गिराके टपटप लोर॥
 
सार :- बेटा का वियाह में पहिले बापे माँगे भरावे।
ई हे रसम जरुरी ज्‍यादे तीलक चढ़ल कहावे।
कि ना मरन के किछुवे दिन में माँग परंतु धोवाला।
और दुबारा माँग भरावे खातिर ऊ कोहनाला॥
जब तक माँग भरल ना जाला तब तक भात न खाला।
माँग बधू के भरल कि नाहीं ई ना पूछे जाला॥
अपने माँग भरावे खातिर बारबार छरियाला।
ओकर माँग भरत में बेटिहा के छक्‍का छुटि जाला॥
* * * *
ब्राह्मण जब केहु जेकरा घरे इहाँ खियावल जात।
देवता पीतर सरग में ओकर उहाँ अघात॥
 
लावनी छंद :- मात्रा से जे जेतने बढि़ के ज्‍यादे भोजन खात हवे।
ओतने ओकर वैद्य डॉक्‍टर ओझा गुनी मोटात हवे॥
हाथी घोड़ा बैल आदमी जे केहुजात बरात हवे।
ऊ बेटिहा के अंत खात आ करत रहत उत्‍पात हवे॥
बाजा ना कुछ खात पियत ना ठनगन करत देखात हवे।
बिना जियाने ऊहे लेकिन बारम्‍बार पिटात हवे॥
दल बदलू लोगन के पगु जब जगह छोडि़ विछिलात हवे।
तब सूबा या दिल्‍ली के पूरा सरकार गिरि जात हवे॥
 
दूसरी असंगति अलंकार
लक्षण (दोहा) :- जहाँ न किछु के उचित जगह दे अनुचित जगह दियाला।
उहाँ असंगति अलंकार के दूसर भेद कहाला।
 
वीर :- उचित जगह पर काम न होखे अन्‍य जगह पर यदि हो जात।
उहाँ दूसरी होति असंगति कबि सब इहे बतावत बात॥
 
उदाहरण :- दुइ नारि ब्राह्मनी क्षत्रानी एकहे गो बेटा चहली।
आ दुओ जनी आपन इच्‍छा केहु मुनि से जा के कहली॥
दुओ जनी खातिर एकहे गो अलगे पिण्‍ड रचाइल।
लेकिन खायेका बेरा अनजाने में बदलाइल॥
ब्राह्मण वाला पिण्‍ड रहे से खा गइलीं क्षत्रानी।
जेसे भइले विश्‍वामित्र महर्षि महाविज्ञानी॥
क्षत्रिय वाला पिण्‍ड रहे से खा गइली ब्रह्मनी।
जेसे भइले परशुराम जी महावीर अभिमानी॥
 
सवैया :- काश्‍मीर में सेना जे भेजे के वाहीं ऊ सेना कुटी बथना में भेजावत।
जहाँ यू.पी. पुलीस रहे के तहाँ अब तामिलनाडु के सैन्‍य डटावत।
इसकूलन में लरिका पढि़ते तहवाँ बन्‍हुआ लोगवा के टिकावत।
चले चाहीं बनुखि जे डाकुन चोरन पै उहे साधुन पै चलवावत॥
दोहा :- पेटू अपना पेट में जेतने ज्‍यादे खात।
ओतने ओकर डॉक्‍टर अथवा वैद्य मोटाल॥
दाँत तरे मरिचा परे जरत जीभि अति जोर।
परिजत नाक लिलार दोउ आँखि गिरावत लोर॥
 
कवित्त :- अर्थी अनुशासन आ ज्ञान के दुओ के रोज
खूब धूमधाम से विद्यारथी जरावता।
सगरी सुनीति और गुरु भक्ति यों के उहें
लाठिये का हाथे सती साथ में बनावता।
कौंसिल आ कचहरी में धा-धा के नेता लोग ,
जिम्‍मा तऽ धवाई के सगरे उठावता।
गाँवों के पंच लोग करत काम न्‍याय के बा
चोर बदमासन के साँढ़ छोड़वावता॥
युग महापात्रन के अइसन बा आइल कि
ओकनी के दक्षिणा जे ठीक से चुकावता।
कवनो अपराधी हो चिंता के न बात बाटे।
दण्‍ड यातना से ऊ बेदाग मुक्ति पावता।
एमें सरकारों न तनिकों पछुवाइल बा।
झूठे कुछ लोग दोष ओके लगावता।
कहीं एक बरखीं या कहीं पंचबरखी के
कई बरखी के उहो योजना बनावता॥
केहु दलबदलू जब नया मिलि जाता त
दल उहाँ पितर मिलौनी करि लेत बा।
कमजोर वर्ग बनल बाम्‍हन सरोतरी बा
ओकरे के दान सरकार सब देत बा।
केवल किसाने के बनत इजामत बाटे
सवातीन एकड़ से ज्‍यादे यदि खेत बा।
उलटा छुरा से लेखपाल कुर्कमीन द्वारा
बनत हजामत मोंछि दार्ही समेत बा॥
 
जोहि-जोहि योग्‍य लोग जहवाँ रखे के चाहीं
उहाँ अब जोहि-जोहि जाति ये रखात बा।
झुण्‍ड नील गाइ के जे बन में रखे के चाहीं
ऊ सब किसानन का खेत में रखात बा।
खेती के अंत जे किसान लोग धरित घरे
ऊहो नील गाइन का पेट में धरात बा।
साँढ़ भैंसा घूमित आजाद हो देहात में ऊ
बान्‍हल बलाक में रहत दिनरात बा॥
 
वीर :- घोड़ा पर हउदा धइ दिहले आ हाथी पर धइले जीन।
जल्‍दी भागि परइले कइसों तजि पड़ाव वारन हेस्‍टीन॥
* * * *
केहु पत्र लिखल अपना रूठल पत्‍नी के कबे मनावे के।
तब परल प्रेमिका के ओइ में फूहर बेहया बनावे के॥
और प्रेमिका खातिर दोसर चिट्ठी जवन लिखाइल।
ओमें निज पत्‍नी चुड़ैल आ गर के घेघ कहाइल॥
पर भारी भूल भइल भेजे में पत्र दुओ बदलाइल।
दुओ जनी का पास आनही के चिट्ठी चलि आइल॥
 
षटरस भोजन खाये के अवसर एगो जब आइ गइल।
किंतु रसोइया ज्‍यादे जल्‍दी में परि के अगुताइ गइल॥
परल खीर में नून दाल में चीनी ओ अगुतइला में।
आ तरकारी तेज बने के किसमिस परल करइला में॥
 
तीसरी असंगति अलंकार
 
लक्षण (सार छंद) :-
जौन काम के करे बदे केहु मन में इच्‍छा धारे।
लेकिन इच्छित का विरुद्ध कुछ और काम करि डारे।
या अपनी प्रवृत्ति का उल्‍टा और काम करि आवे।
उहाँ असंगति होति तीसरी कवि सब लोग बतावे॥
 
उदाहरण (वीर) :- लोकतंत्र जे छोटका बड़का सबके देत समान बनाइ।
गुप्‍ता सिंह तिवारी पदवी खेतन पर से देत हटाइ॥
आरक्षण के भीति उहे अब मधि आँगन में करत तेयार।
जातिबाद के देत बढ़ावा बैर फूट के करत प्रचार॥
 
दोहा :- दुइ कुल के मिलवे बदे बेटहा सजि के जात।
पर बेटिहा से झगरि के मुँह फुलाह कोहनात॥
दुइ गो सिक्‍ख इन्दिरा जी के बडी गार्ड जे भैलें।
गोली मारि उहे दूनूँ दिन में उनके बध कैलें॥
देखते जवना साँप के देला लोग मुवाइ।
पूजत ओही साँप के लावा दूध चढ़ाई॥
जीवन भर दुलर्भल रहे टुटही खाट पूरान।
मुवला पर गद्दा सहित नया पलँगरी दान॥
देखे बदे पतोह मुख रहत सासु का साध।
पर ओसे झगरति सदा बीतत मास एकाध॥
कुछ कवि नीमन स्‍वर बिना गायक बनत हठात।
तानतान कवितान के तानसेन बनिजात॥
 
सार :- नकल परीक्षा में रोके के बनल कमेटी जौन प्रधान।
छुट्टा नकल निसंक करे के कइलसि आज्ञा उहे प्रदान॥
खेतन में जब धान आदि के बीया बोवल जाला।
धाने का संग घासफूस के बढ़ती बहुत देखाला॥
घासफूस के दूर करे सज से खेत सोहाला।
सोहत में धाने के पौधा कई किंतु कटि जाला॥
राजा दशरथ हाथी मारे खातिर बान चलौले।
लेकिन हाथी का बदला में तापस तीनि मुवौले॥
आपन मान वृद्धि हित बेटिहा के सम्‍मान लुटाला।
लेकिन ओसे मान बेटहा के बहुत घ‍टि जाला॥
जसजस इसकूलन के संख्‍या बढ़त जात बाटे दिनरात।
तसतस छात्र ज्ञानके गड़हा बाटे छिछिल होत चलि जात।
पहिले बादर ब‍रसि के जब अनाज उपजावेला।
पर दँवरी का बेरा ऊहे बरसि के अन्‍न सरावेला॥
जे ग्रह राजा बनि के आम फरा के खूब खियावेला।
ऊहे ग्रह आन्‍ही से सबके छप्‍पर घर उधियावेला॥
घाम जाड़ में सुख देला गरमी में देहि जरावेला।
जवन अदालत डिगरी देला ऊहे सजा सुनावेला॥
जे ब्राह्मन बियाह करवावे पिण्‍डा उहे परावेला॥
जे गंगा जी निज जल से भवसागर पार हेलावेली।
ऊ गंगा अनगिनत जंतु आ गाँव अनेक डुबावेली॥
लरिका पढ़े बदे घर से जब विद्यालय में आवेले।
तब इहाँ यूनियन नामक एक अवारा गोल बनावेले॥
धोखाधड़ी लीडरी सीखे में सब समय लगावेले।
भवे भसुर के नाता अपना पुस्‍तक से निमहावेले॥
विद्या के लय करे बदे ऊ विद्यालय में आवेले।
कुछ गीत सिनेमा के कण्‍ठस्‍थ करे में चित्त लगावेले॥
कलम परीक्षा में छूरा का बल पर सिर्फ चलावेले।
हीरो के डिगरी पा के शिक्षा के ओर लगावेले
शोभा शरीर के बढ़े बदे महिला सब गहना गाँथेला
दुओ पाँव में बेड़ी पहिरें नाक कान निज नाथेला॥
गहना से शोभा बढ़ी मोह ई महिला सब के घेरेला।
पर ऊ शरीर का स्‍वाभाविक शोभा पर पानी फेरेला॥
गहना से सब शरीर तोपे के चाह सर्वदा छावेला।
गहना तन पर मोटा तह के मइल किंतु बइठावेला॥
जल्‍दी में जब चोर छीनि के गहना लेके भागेला।
तब नाक कान दूनूँ कटि जाला खून बहाए लागेला॥
साथे साथ विलाप सहित जब खूब रोवाई आवेला।
तब गहना महिला सब के सुप‍नखिया सही बनावेला॥
गांधी जी ताड़ी पियला पर भारी रोक लगवले।
ताड़ी के बिक्री रोके के धरना तक बइठवले॥
ताड़ी के नाम बदलि के नीरा धइले और सरहले॥
बइसाख जेठ के वायु जवन प्रात: सब सुख बरसावेले।
दुपहर से ऊहे निष्‍ठुर हो करके देह जरावेले॥
नकल लिखे के लरिकन के प्रतिदिन टीचर हुरपेटें।
नकल परीक्षा में लिखला पर बाहर दूर चहेटें॥
ब्‍याह होत , व्‍यय बढ़ी अत: बेकति घर में बढि़यायी।
धन ना अधिक जमा होई त घर कइसे चलि पायी॥
ई ना लौकत लोग ब्‍याह में खुलि के खर्च करेला।
कई लोग तऽ खर्चा खातिर बन्‍धक खेत धरेला॥
बादर पानी दे के सबसे जीवन दान करेला।
तब काहें ऊ बाढि़ बढ़ा के जीवन के सर्वस्‍व हरेला।
 
वीर :- लोकतांत्रिक दिल्‍ली मिल के दुनियाँ जानत बाटे नाम।
ओहि में भइल हवे अब एगो नया और अति अद्भुत काम॥
अहिरे नियम के दूगो जूता हाले भइल हवे तइयार।
बी.पी. द्वारा भेजल बाटे एगो यू.पी. एक बिहार॥
दूनूँ बड़ा कीमती बाटे और टिकाऊ आ बरियार।
पाँच बरिस तक चले बदे बा गारण्‍टी दिहले सरकार॥
यू.पी. वाला हवे मुलायम आ बिहार वाला कुछ लाल।
इहे नाम के अंतर बाटे ना तऽएक दुओ के हाल॥
छोट लोग का पगु में दूनूँ फिर हो जात देत आराम।
किंतु बड़ा लोगन का पगु के छीलि देत बा पूरा चाम॥
लरिका विद्या पढ़े बदे जब विद्यालय में आवेलें।
तब युनियन एगो रचि के पढ़गित के इच्‍छा बिसरावेलें।
नित्‍य नया कवनो बवाल लेके उतपात मचावेलें।
और कबे हड़ताल करा आपन प्रभाव दरसावेलें॥
तोड़ फोड़ के कार कबे विद्यालय बीच लगावेलें।
अथवा बाहर जाके कवनो बस के क्षति पहुँचावेलें॥
विद्या सीखे गइले किंतु दुर्गुण सीखि के आ गइलें।
ना घर के ना घाटे के ऊ कवनो लायक ना भइलें॥


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