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लेख

भारतीय शास्त्रीय संगीत का स्थापत्य : गंगुबाई हंगल
अमरेंद्र कुमार शर्मा


' संगीत की ध्वनि का एक 'पाठ' होता है, यह 'पाठ' सामवेद के स्त्रोतों और जाक देरिदा के सिद्धांतों के साथ तथा उससे भिन्न भी हो सकता है।'

धरती के लाल मिट्टी वाले हिस्से पर अपने धुन की पक्की, दूर बजते ग्रामोफोन को सुनने के लिए नंगे पैर दौड़ लगाती, पड़ोसी के बगीचे से आम तोड़ती हुई पकड़ी जाती, छोटी जाति के कारण अपमानित होती, भूख से लड़ती लड़की गंगुबाई हंगल (5 मार्च 1913 - 21 जुलाई 2009) भारतीय शास्त्रीय संगीत का स्थापत्य है। कर्नाटक के धारवाड़ जिले में देवदासी परंपरा वाले केवट परिवार में गंगुबाई हंगल का जन्म हुआ था। यह कौन जानता था कि 'सामवेद' (कहा जाता है कि दुनिया की सबसे पुरानी स्वरलिपियाँ इसमें मौजूद हैं) और भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' (जिसके छह अध्यायों में संगीत के बारे में लिखा गया है, जिसमें विभिन्न वाद्यों की उत्त्पति, उन्हें बजाने के तरीकों, स्वर, छंद और लय की विस्तृत चर्चा है।) से निसृत होती संगीत की लय को गंगुबाई हंगल अपने आँचल में थामे मुंबई के स्थानीय समारोहों और गणेश उत्सवों की गायकी से निकलकर भारतीय भूगोल के एक छोर से दूसरी छोर तक संगीत की हिंदुस्तानी शैली का एक उजास रचेगी। यह कौन जानता था कि सिंधु-घाटी सभ्यता में मिली उस कांस्य मूर्ति की मुद्राओं में संगीत का जो क्षण स्थिर हो गया था, वह रामायण और महाभारत में वर्णित कई मुद्राओं, तानसेन (मियाँ की तोड़ी, मियाँ मल्हार आदि रागों के निर्माता), बैजू बावरा (दोनों अकबर के दरबार में थे, कहा जाता है बैजू बावरा ने 'मानकुतूहल' नामक संगीत की पहली किताब लिखी थी।) के धुनों से निकलकर शास्त्रीय संगीत की एक गायिका के कंठ में प्रवाहित होगी। गंगुबाई हंगल अपनी परंपरा की आवाज की तमाम सलवटों को सीधी और ठोस करती हुई किराना घराना में ख्याल गायिकी की उस्ताद थीं। जब मैं गंगुबाई हंगल को उस्ताद कह रहा हूँ तो मुझे उस्ताद के मसले पर एक बातचीत में गंगुबाई हंगल का कथन याद आ रहा है, वे कहती हैं, 'पुरुष संगीतकार मुसलमान होता है तो उस्ताद कहलाने लगता है, हिंदू होता है तो पंडित हो जाता है, लेकिन केसरबाई, हीराबाई (1905-1989) और मोगुबाई जैसी गायिकाएँ बाई ही रह जाती हैं। 'जेंडर आग्रहों से भरी दुनिया में गंगुबाई हंगल की पीड़ा आजन्म बनी रही। उन्हें 'गानेवाली' कह कर अपमानित किया जाता था, हम जानते हैं कि इस पेशे को कथित तौर पर सभ्य समाज अच्छा नहीं मानता था। तब क्या हमें उन्हें उस्ताद न कहकर विदुषी कहना चाहिए? प्रश्न आपके सामने छोड़ जाता हूँ।

किराना घराना की स्थापना उस्ताद अब्दुल करीम खाँ (1872-1937) से जुड़ा हुआ है। अब्दुल करीम खाँ के प्रख्यात शिष्य पं. रामभाऊ कुंडगोलकर थे जो सवाई गंधर्व (1886 -1952) के नाम से प्रसिद्ध हुए। सवाई गंधर्व के सानिध्य में ही गंगुबाई हंगल ने संगीत सीखा था। प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक भीमसेन जोशी (1922-2011) भी सवाई गंधर्व के ही शिष्य थे। गंगुबाई हंगल ने अपनी आत्मकथा 'द साँग ऑफ माय लाइफ' में भीमसेन जोशी को लेकर एक मार्मिक चित्र खींचा है। यह वह समय था जब दोनों एक साथ सवाई गंधर्व के पास संगीत का रियाज करते थे, देर शाम तक, अपने गुरु के घर पर, भीमसेन जोशी अपने गुरु के घर पर ही रहते थे जो कर्नाटक के हुबली से तीस किलोमीटर दूर था। रोज शाम को भीमसेन जोशी हाथ में लालटेन लेकर गंगुबाई हंगल को स्टेशन छोड़ने आया करते थे। रियाज के अद्भुत क्षण में कौन जानता था कि भारतीय संगीत का एक विलक्षण जोड़ा लालटेन की रोशनी में रागों का खजाना भावी पीढ़ी के लिए निर्मित करने वाली थी।

ख्याल गायिकी मोटे तौर पर अमीर खुसरो के समय से मानी जाती है। मुहम्मद शाह (1719) के दरबार में अदारंग और सदारंग दो प्रसिद्ध गायकों ने ख्याल के रागों की रचना की और उसेके गायन को प्रोत्साहित भी किया। ख्याल गायिकी ध्रुपद का एक भेद है। माना जाता है कि ध्रुपद शैली के संगीत का विकास ग्वालियर के राजा मानसिंह के समय हुआ था। ध्रुपद विशुद्ध रूप से भारतीय है जबकि ख्याल गायिकी में भारतीय संगीत के अलावा फारसी परंपरा का भी मिश्रण है। ख्याल रूपक शैली में विकसित हुई है जबकि ध्रुपद प्रबंध शैली में। दरअसल 11वीं-12वीं शताब्दी में इस्लामी सभ्यता के बड़े पैमाने पर प्रसार ने उत्तर भारतीय संगीत की दुनिया का महत्वपूर्ण विस्तार किया। पहली बार गायिकी में ख्याल और वाद्ययंत्र में सरोद, सितार आदि भारतीय संगीत का हिस्सा बनते गए। भारतीय संगीत का इतिहास लगभग चार हजार वर्ष पुराना माना जाता है, हालाँकि साक्ष्यों की इसमें भारी कमी है। बारहवीं सदी में जयदेव का 'गीतगोविंद' (कवि जयदेव ने विभिन्न रागों और तालों के प्रबंध भी लिखे हैं।), तेरहवीं सदी में शारंगदेव का 'संगीतरत्नाकर' चौदहवीं सदी में विद्यारान्य का 'संगीतसार', पंद्रहवीं सदी में कवि लोचन का 'राग तरंगिणी' सोलहवीं सदी में पुंडरीक विट्ठल का 'संद्रांग चंद्रोदय' सत्रहवीं सदी में हृदयनारायण देव का 'हृदय प्रकाश' अठारहवीं सदी में श्रीनिवास पंडित का 'राग तत्व विबोध' उन्नीसवीं सदी में बंगाल के राजा शौरिंद्र मोहन ठाकुर का 'यूनिवर्सल हिस्ट्री ऑफ म्यूजिक' बीसवीं सदी में पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का 'हिंदुस्तानी संगीत पद्धति' आदि संगीतशास्त्र के ग्रंथ लिखे गए जो भारतीय संगीत की एतिहासिकता के प्रमाण हैं।

हिंदुस्तानी संगीत की सबसे बड़ी विशेषता है, उसका आलाप, उसकी लंबी तान जो एक खास किस्म की दुनिया का निर्माण करती है जिसमे शब्द नहीं ध्वनि गुंजायमान होती है। गंगुबाई हंगल द्वारा कान पर बायाँ हाथ रखकर खींची गई तान एक खींची प्रत्यंचा की तरह हुआ करती है। गंगुबाई हंगल यह प्रत्यंचा संगीत की दुनिया में लगभग पाँच दशकों तक खींचे रहीं। गंगुबाई की कद-काठी और उनकी आवाज दोनों अलहदा हैं। वे स्वयं यह जानती थीं कि यदि किसी ने उन्हें सुना है पर देखा नहीं है तो देखने के बाद यह अनुमान लगाना उसके लिए मुश्किल हो जाएगा कि यह वही महिला है जिसकी आवाज उसने सुनी है। यदि आप गंगुबाई हंगल को पहली बार सुन रहे हैं तो आपको कई शुरुआती झटके लगेंगे। प्रचलित स्त्री स्वर से बिलकुल भिन्न एक ठोस, वजनदार लहराती आवाज आपको चारों ओर से घेर लेती है और जिसकी गिरफ्त से निकलना बहुत देर तक संभव नहीं हो पाता है। दरअसल गंगुबाई हंगल को अपने गुरु सवाई गंधर्व की सीख हमेशा याद रहा करती थी कि 'जिस तरह से एक कंजूस अपने पैसों के साथ व्यवहार करता है, उसी तरह सुर का इस्तेमाल करो, ताकि श्रोता राग की हर बारीकियों के महत्व को संजीदगी से समझ सके।' राग जो संस्कृत के रंज धातु से बना है, का अर्थ है रँगना और यह प्रेम और स्नेह के अर्थों में होता है। राग को मूल रूप से थाटों में विभाजित किया जाता है। हिंदुस्तानी शैली में 32 और कर्नाटक शैली में 72 थाटों की परिकल्पना मानी गई है। रागों में स्वरों का आरोह (सा,रे,ग,म,प,ध,नि,सा) और अवरोह (सा,नि,ध,प,म,ग,रे,सा) ही संगीतकार और संगीत रसिक के मन को क्रमशः रँगता है। गंगुबाई हंगल अपने राग में धीरे-धीरे संगीत की एक इमारत खड़ी कर देती हैं, इस इमारत में ध्वनियाँ आपकी इयत्ता को झंकृत कर देती हैं और कई बार तो अपहृत कर ले जाती है। अपने रंग में रँगती हुई, यह इमारत न भूलने वाले पल का निर्माण करती है। गंगुबाई अपने हर राग को शनैः-शनैः और क्रमशः खोलती जाती हैं जैसे सुबह की धूप से कमल-दल खुलते हैं, जैसे धीरे-धीरे पुरवैया हमारे कान की लौ को छूती हुई गुजरती है। गंगुबाई हंगल भारतीय शास्त्रीय संगीत की नब्ज पर मजबूत पकड़ रखती हैं, उसके आरोहों-अवरोहों पर किराना घराना की विरासत हमेशा लहराती रहती है। राग भैरव, असावरी, तोड़ी, भीमपलासी, पुरिया, धनश्री, मारवा, केदार, चंद्रकौस, मालकौंस गंगुबाई हंगल की पहचान है। गंगुबाई हंगल अपनी तमाम संगीत प्रस्तुतियों में अपने साथ कुछ जरूरी समान साथ रखती थीं, वे अपने साथ घर का बनाया घी, आम का अचार रखती थीं, वे जहाँ भी जाती अपने संगीत के आयोजकों से खाने के समय गर्म चावल जरूर इंतजाम करने के लिए कहतीं, गर्म चावल के साथ घी और अचार उनका प्रिय भोजन था।

गा गा री सा नी सा, नी दा पा मा, गा गा री सा नी दा पा मा गा री सा... यह वह लय थी जिसे गंगुबाई हंगल अपने गुरु के आदेश पर एक दिन सुबह से शाम तक लगभग दो सौ बार आँसुओं से तर होती हुई दुहराती रहीं, वह तब तक दुहराती रहीं जब तक कि उनके गुरु ने देर शाम में 'अब ठीक है' कहकर रोका नहीं। गंगुबाई हंगल अपने शुरुआती दिनों में ताल में कमजोर हुआ करती थीं, वे बताती हैं कि इसके लिए उनकी माँ अंबाबाई उनकी पिटाई भी करती थीं। शुरुआत में उनकी माँ के पास संगीत सिखाने वाले गुरू को देने के लिए पैसे नहीं हुआ करते थे, वे सोने के छोटे-मोटे गहने उनको दिया करती थीं। शुरुआत में माँ अंबाबाई अपनी बेटी गंगुबाई को कर्नाटक संगीत में पारंगत करना चाहती थीं, लेकिन अपनी बेटी की रुचियों को देखते हुए हिंदुस्तानी संगीत के अध्ययन के लिए प्रोत्साहित किया। गंगुबाई हंगल इसका जिक्र करती हैं कि कैसे एक बार हिंदुस्तानी शैली के 'राधे बोलो मुझसे' धुन को दिन भर गुनगुनाती रहीं, और तब उनकी माँ ने फैसला किया कि उन्हें हिंदुस्तानी संगीत सिखाना है।

अपने जीवन के आखिरी वर्षों में गंगुबाई अपने पुराने घर में नितांत अकेली रहा करती थीं, घर के पुरानेपन में वह कोई बदलाव नहीं करना चाहती थीं क्योंकि उस घर को उनके पति ने उनके लिए बड़े प्यार से बनाया था, जहाँ गंगुबाई हंगल के गुरु आकर रहा करते थे। जिंदगी में इन यादों के खजाने के साथ गंगुबाई हंगल अपने बिस्तर से लगे तानपुरा, अपनी माँ की संगीत की किताब, ईश्वर की तसवीर, अपनी दवाइयाँ और अपने छोटे से काले बैग जिसे लेकर वह संगीत प्रस्तुतियाँ देती थीं, के साथ धरती के उसी लाल मिट्टी वाले हिस्से पर इक्कीसवीं सदी के पहले दशक तक मौजूद थीं। जीवन के इस सफर में उन्होंने अपनी माँ, अपने गुरु, अपने पति (गुरुराओ कौल्गी) और यहाँ तक की जिसको अपनी संगीत की विरासत सौंपकर जाना चाहती थीं, अपनी प्यारी बेटी कृष्णा को खोया, कृष्णा जिसने शादी न करने का फैसला किया था और अपनी माँ के साथ साए की तरह रहना चाहती थीं। जिस दिन गंगुबाई हंगल को 'पद्म भूषण' मिलने की घोषणा हुई थी, गंगुबाई रातभर रोती रही थीं।

गंगुबाई हंगल को 1962 में कर्नाटक संगीत नृत्य अकादमी पुरस्कार, 1971 में पद्म विभूषण, 1973 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2002 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। अपनी आत्मकथा 'द साँग ऑफ माय लाइफ' में गंगुबाई हंगल अपनी सांगीतिक यात्रा का वर्णन एक आख्यान की तरह करती हैं। बचपन में जिन समाजों में वे छोटी जाति की होने के कारण बहिष्कृत और अपमानित हुई थीं, वही समाज गंगुबाई हंगल की प्रसिद्धि के बाद उनके साथ बैठकर खाना खाना अपना सम्मान समझने लगा था। लिंग आधारित अतियों और जाति आधारित अतियों को गंगुबाई हंगल ने अच्छे से अपने जीवन में समझा था। इन विडंबनाओं पर गंगुबाई हंगल केवल मुस्कुराती थीं। स्त्री विमर्शों के दौर में इस मुस्कुराहट को नए सिरे से रेखांकित किया जाना चाहिए। संगीत के आरोहों-अवरोहों के साथ गंगुबाई हंगल ने अपने जीवन की लहरों को, अपने समाज के ताने-बाने को भी अपने तानपुरे पर सिरजा था। एक संगीतकार और उसके समाज के साथ के रिश्ते, उस रिश्ते के अंतर्विरोधों का पाठ अब भी हिंदी साहित्य की दुनिया में स्थगित है। इस स्थगन का भाष्य अब भी होना शेष है। बहरहाल, अंतरिक्ष में गंगुबाई हंगल की आवाज की मौजूदगी हमें आश्वस्त करती है कि हमारी पीढ़ी और आनेवाली पीढ़ियों में संगीत का जिंदा रहना दरअसल एक सभ्यता का जिंदा रहना है।


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