डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

लेख

मो यान के संग लौह दरवाजे के भीतर
अवनीश मिश्र


नोबेल पुरस्कार समिति ने चीनी लेखक मो यान को नोबेल पुरस्कार देने घोषणा करते हुए उन्हें आत्मभ्रमपूर्ण यथार्थवाद में लोककथाओं, इतिहास और समसामयिकता का मिश्रण करने वाले फनकार की उपाधि दी। नोबेल पुरस्कार समिति के स्थायी सचिव पीटर एंगलुंड ने मो यान को किसानों, गाँव देहात के जीवन, अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत लोगों (जो अकसर अपनी जंग गँवा बैठते हैं) के बारे में लिखनेवाला लेखक करार दिया। सही मायने में एक बड़ी दुनिया का मो यान से पहला परिचय इन वाक्यों ने ही कराया। हालाँकि मो यान चीन के सबसे ज्यादा अनूदित लेखक हैं और 'टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट', 'वर्ल्ड लिटरेचर टुडे' जैसी पत्रिकाओं के पिछले सालों के पन्नों को खँगालते हुए पता चलता है कि मो यान से पश्चिम के पाठकों से रिश्ता कोई नया नहीं है। दुनिया के तमाम प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में मो यान की किताबों की समीक्षाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं और मो यान को एक उम्दा फनकार मानने वाले आलोचकों की संख्या कम नहीं है। बहरहाल, ब्रिटेन के प्रसिद्ध अखबार 'द गार्जियन' ने इस जानकारी को आगे बढ़ाते हुए मो यान की शख्सियत को कुछ इस तरह बयान किया। 'चीन के लेखक मो यान, जिन्हें 12 वर्ष की उम्र में खेती में काम करने के लिए स्कूल छोड़ना पड़ा, साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले चीनी नागरिक बन गए हैं। पुरस्कारों के 111 वर्षों के इतिहास मे ऐसा पहली बार हुआ है। हालाँकि, सन् 2000 में चीन में जन्मे गाओ जिंगियान, जो अब फ्रांसीसी नागरिक हैं, इस सम्मान से नवाजे जा चुके हें।' (गाओ जिंगजियान चीनी सरकार के आलोचक हैं और उन्हें नोबेल मिलने पर चीनी सरकार ने अपनी नाराजगी का इजहार किया था।)

मो यान को नोबेल मिलने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया और साहित्य जगत में विश्लेषणों और टिप्पणियों के एक दौर को जन्म दिया। इन विश्लेषणों और टिप्पणियों में दो तरह की धाराएँ साफ तौर पर देखी गईं। एक धारा मो यान को उनके लेखन के आईने में समझने और परिभाषित करने की कोशिश कर रही थी, दूसरी धारा वह थी जो मो यान के लेखन की बनिस्बत उनकी राजनीतिक पक्षधरता को लेकर फिक्रमंद नजर आ रही थी।

पहले बात मो यान के लेखन और उनक लेखन स्टाइल को लेकर छिड़ी बहस की। नोबेल पुरस्कार समित ने मो यान के लेखन के लिए 'हैलुशिनेटरी रियलिज्म' (आत्मभ्रमपूर्ण यथार्थवाद) पदबंध का इस्तेमाल कर निश्चित ही बहस की अच्छी जमीन तैयार कर दी। मो यान के बारे में कहा गया कि उनके लेखन में फ्रांज काफ्का के मनोविश्लेषण, मार्क्वेज के जादुई यथार्थवाद और फॉकनर की पैनी दृष्टि का सम्मिश्रण देखा जा सकता है। ऐसा कहने के पीछे ठोस वजहें थीं और खुद मो यान ने 1987 ईस्वी में ही लिखे अपने एक लेख में इस प्रभाव का जिक्र भी किया था। नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद सवालों का जवाब देते हुए मो यान ने इस तरह के प्रभाव की बात खुद स्वीकार की : ''नोबेल पुरस्कार समिति ने मेरे लेखन को हैलुशिनेटरी रियलिज्म (आत्मभ्रम से परिपूर्ण यथार्थ) की संज्ञा दी है। यह मेरे लेखन की एक तरह से अच्छी व्याख्या है। 1987 में मैंने एक लेख लिखा था। इसमें मैंने चीनी लेखकों और विलियम फॉकनर और ग्रैबियल गार्सिया मार्क्वेज के बीच के संबंध की चर्चा की थी। इन दोनों महान फनकारों का मेरे ऊपर बहुत बड़ा प्रभाव रहा है। इन लोगों के लेखन को पढ़ने के बाद ही मैं यह समझ पाया कि साहित्य इस तरह भी लिखा जा सकता है।' लेकिन, यहीं मो यान ने इस प्रभाव का अतिक्रमण करने और अपना रास्ता खुद बनाने की बात भी की। मो यान ने इस प्रभाव की हद बताते हुए कहा, 'दोनों लेखक लगातार धधकते हुए ज्वालामुखी के समान हैं। आप उनके बहुत नजदीक नहीं जा सकते। आप पिघल जाएँगे। मेरे लिए यह जरूरी है कि मैं उनसे दूर जाऊँ, ऐसा करके ही मैं अपने आपको खोने से बचा सकता हूँ।' मो यान ने 2010 में ह्यूमैनिटीज पत्रिका को एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार देते हुए भी इस प्रभाव को स्वीकारा था, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा था कि मेरे स्टाइल में और भी कई तरह के प्रभाव मिले हुए हैं। नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद दिए गए एक साक्षात्कार में मो यान ने इस सवाल का जवाब कुछ इस तरह दिया। 'वैसे मुझे नहीं लगता कि नोबेल समिति का यह कहना पूरी तरह सही है कि मैंने हैलुशिनेटरी यथार्थ, दंत कथाओं, इतिहास और वर्तमान का संलयन किया है। बल्कि इसकी जगह मैं कहूँगा कि मेरे उपन्यासों में कल्पना, लोक कथाओं, सामाजिक समस्याओं और ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश है।

नोबेल वक्तव्य एक तरह से मो यान के लेखकीय व्यक्तित्व को समझने की कुंजी है। इस वक्तव्य में मो यान ने अपनी कथा जमीन को हासिल करने की प्रक्रिया का वर्णन किया है : '1984 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के साहित्य विभाग में दाखिले के बाद अपने मेंटर झू हुआइजोंग के मार्गदर्शन मे मैंने 'ऑटम फ्लड्स', 'ड्राय रिवर', 'द ट्रांसपैरेंट कैरट', और 'रेड सोरगम' की रचना की। उत्तर पूर्व के गाओमी नगर का पहली बार मेरी रचनाओं में आगमन 'ऑटम फ्लड्स' में हुआ। उस पल से जैसे कि किसी भटकते हुए किसान को अपनी जमीन मिल जाती है, मुझ भटक रहे साहित्यकार को एक ऐसी जमीन हासिल हुई जिसे मैं अपना कह सकता था। मुझे यह जरूर स्वीकार करना चाहिए कि अपने लिए इस साहित्यिक जमीन का निर्माण करने की बड़ी प्रेरणा मुझे अमेरिकी उपन्यासकार विलियम फॉकनर और कोलंबियाई उपन्यासकार गैब्रियल गार्सिया मार्क्वेज से मिली। हालाँकि मैंने तब तक इन दोनों को ज्यादा सलीके से नहीं पढ़ा था, लेकिन जिस साहस और बिना किसी बंधन में बँधे इन दोनों ने अपने लेखन में नई भौगोलिक जमीन का निर्माण किया था, उसने मुझे काफी प्रोत्साहित किया। इन दोनों से ही मैंने यह सीखा कि एक लेखक के पास अपनी एक ऐसी जमीन होनी चाहिए, जो सिर्फ और सिर्फ उसकी हो।'' लेकिन यहीं मो यान यह भी कहते हैं, ''विनम्रता और समझौते का व्यक्ति के सामान्य जीवन में तो आदर्श है, लेकिन साहित्यिक रचना के लिए उच्चतम आत्मविश्वास और अपनी सहज बुद्धि के अनुसरण करने की जरूरत सबसे ज्यादा होती है। दो साल तक मैं इन दोनों के रास्ते पर चलता रहा, लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि मुझे इनके प्रभाव से बाहर निकलना होगा। अगर मैं उनके ज्यादा पास जाता, तो अपना अस्तित्व गँवा बैठता। मेरा मानना है कि एक लेखक दूसरे को तब प्रभावित करता है, जब दोनों के बीच गहरी आध्यात्मिक नातेदारी हो, जिसे कि अकसर एक के दिल में दूसरे की धड़कन सुनाई पड़ना कहा जाता है।'' मो यान के उपन्यासों-कहानियों के अँग्रेजी अनुवादक हॉवर्ड गोल्ड ब्लैट ने भी ''द सबवर्सिव वॉयस ऑफ चाइना'' के प्राक्कथन में यह माना है कि ''रेड सोरगम'' किसी कृति से प्रभावित नहीं है। ''यह सही है कि मार्क्वेज के ''वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सालीट्यूड'' और मो यान के पहले उपन्यास ''रेड सोरगम'' में कई समानताएँ देखी जा सकती हैं, लेकिन दोनों रचनाएँ सिर्फ और सिर्फ अपने लेखक की है।''

मो यान को अपना रास्ता खुद बनाना था और यह रास्ता उनके बचपन के अनुभवों ने तैयार किया। मो यान के लेखक बनने की प्रक्रिया के बारे में उनकी कहानियों की किताब ''शिफु यू विल डू एनीथिंग फॉर लाफ'' की भूमिका काफी कुछ कहती है। अपने नोबेल वक्तव्य में भी मो यान ने अपने बचपन के संघर्षों, स्कूल से बाहर किए जाने और चरवाहे से लेखक बनने की कहानी को काफी विस्तार से बयान किया। उस बच्चे की कहानी जिसकी माँ ने उसे ज्यादा न बोलने की ताकीद की थी, क्योंकि उस समय के चीन राजनीतिक माहौल में ज्यादा बोलना, अपने मन की बात करना, अपने विचारों को सार्वजनिक करना मुश्किल का सबब बन सकता था। खासकर माओ के समय के उस चीन में जहाँ गाँवों को और गाँवों के वाशिंदों को सिर्फ शहरी चीन के विकास के लिए कच्चा माल, ज्यादा से ज्यादा अनाज पैदा करने वाली फैक्टरी समझा जाता था। यह एक विचित्र संयोग ही है कि जिस बच्चे को उसकी माँ ने कम बोलने की हिदायत थी, 'गुयान मोये' नाम के उसी बच्चे ने जब कहानियाँ लिखने के लिए कलम उठाई, तो अपना तखल्लुस ही रखा ''मो यान।'' जिसका चीनी में अर्थ है : बोलो मत।

ह्यूमैनिटीज पत्रिका को 2010 में दिए गए साक्षात्कार में मो यान ने अपने लेखन के कच्चे माल का जिक्र कुछ इस तरह किया था : 'मेरी परवरिश गाँव-देहात में हुई। मेरी जवानी वहीं बीती। लोक साहित्य और किस्सागोओं ने मुझ पर काफी प्रभाव डाला। मेरी दादी, मेरे दादा, बड़े-बुजुर्गों और मेरे माता-पिता ने मुझे जो कहानियाँ सुनाई वे मेरे लिए कथा लेखन के संसाधन - कच्चा माल बन गए।'

इसमें कोई शक नहीं कि मो यान पर आई शुरुआती टिप्पणियों में उन पर फॉकनर, मार्क्वेज और काफ्का के प्रभाव को काफी बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया। इसके पीछे पश्चिम की उस सोच का हाथ हो सकता है, जो मानती है कि पूरब में कोई चीज तभी महान हो सकती है, जब वह पश्चिम से प्रभावित या वहाँ से आयातित हो। जबकि मो यान भले अपने लेखन पर ऐसे प्रभावों की बात स्वीकार करें, उनके लेखन पर उनकी जमीन, उनके परिवेश और उनके अपने जिए, भोगे और साझा किए गए जीवनानुभव का हाथ ज्यादा रहा है। मो यान अपने लेखन में इसी देसी संपदा का इस्तेमाल करते हैं।

नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद चीन की आधिकारिक न्यूज एजेंसी जिंहुआ को दिए गए एक अन्य साक्षात्कार में मो यान ने कहा, 'मैंने हमेशा बड़ों के मुँह से कहानियाँ सुनीं। इसमें परीकथाएँ भी थीं, दंत कथाएँ भी थीं। इतिहास और हमारे क्षेत्र में हुई स्थानीय लड़ाइयाँ भी थीं। किंवदंती बन चुके लोगों के किस्से भी थे। आपदाओं की कहानियाँ भी थीं। ये मेरे लेखन का स्रोत हैं। मैं इन सबका इस्तेमाल अपने उपन्यासों में करता हूँ। गाँव में बिताया हुआ मेरा जीवन मेरे लिए एक निधि के समान है। अगर आप लेखक नहीं हैं, तो शायद आपको यह निधि काम की न लगे। लेकिन, मेरे जैसे लेखक के लिए यह बेहद बेशकीमती और महत्वपूर्ण है। यही वह कारण है कि मेरे उपन्यास अलग तरह के हैं। अगर मैं क्लासिक उपन्यास पढ़ते हुए बड़ा हुआ होता, तो मैं मो यान नहीं बन पाया होता।' ऐसा कहते हुए मो यान अपनी रचनाओं के ठेठ देसज स्रोत का जिक्र करते हैं। मो यान के मुताबिक भले उन्हें किताबें पढ़ने का मौका नहीं मिला और वे स्कूल से बाहर कर दिए गए हों, जीवन की किताब को पढ़ने का मौका उन्हें खूब मिला।

अपने नोबेल वक्तव्य में मो यान ने जीवन के इस किताब का जिक्र विस्तार से किया है। मो यान के शब्दो में, ''प्राथमिक स्कूल से बाहर निकलने के बाद, चूँकि मैं ज्यादा श्रम वाले काम करने के लिहाज से काफी छोटा था, इसलिए मैं नदी के तट पर मवेशियों और भेड़ों की चरवाही करने लगा। जब मैं अपने जानवरों को स्कूल के गेट के सामने से हाँकते हुए गुजरता था, तब स्कूल के अपने पुराने साथियों को स्कूल के अहाते में खेलते हुए देखना मुझे दुख से भर देता था। इसने मुझे इस बात का एहसास कराया कि किसी व्यक्ति के लिए, चाहे वह बच्चा ही क्यों न हो, किसी समूह को छोड़ना कितना कठिन होता है। मैं अपने जानवरों को नदी के किनारे नीले समुंदर जैसे आसमान के नीचे और जहाँ तक मेरी नजर जाती वहाँ तक धरती को हरी कालीन की तरह ढके घास की चादर पर चरने के लिए छोड़ देता था। वहाँ दूर-दूर तक कोई दूसरा इनसान नहीं दिखाई नहीं देता था। इनसान की कोई आवाज नहीं होती थी। कुछ नहीं बस मेरे सिर के उपर पक्षियों का कलरव होता था। मेरे साथ सिर्फ मैं होता था। भयानक अकेलेपन के बीच। मेरा दिल कई बार बैठने लगता था। कई बार में मैं घास पर लेट जाता था और अपने सर के उपर अलसाए बादलों को तैरता हुआ देखता रहता था। चीन का वह हिस्सा सुंदर स्त्रियों का रूप धरने वाली लोमड़ियों के किस्सों के लिए जाना जाता है। मैं कल्पना करता था कि एक सुंदर लड़की मेरे साथ जानवरों को चराने के लिए आई हुई है। हालाँकि वह लड़की कभी नहीं आई। मैं कई बार मैं आसमान में उड़ रही चिड़िया से बातचीत करता था। उनकी आवाज की नकल उतारा करता था। कभी-कभी मैं पेड़ बन जाने की इच्छा करता था। लेकिन पक्षियों और पेड़ों ने मेरी उपेक्षा की। वर्षों बाद जब मैं उपन्यासकार बन गया था, तब मैंने अपनी इन फैंटेसियों के बारे में कहानियों और उपन्यासों में भी लिखा। लोग कई बार मुझ पर मेरी चटक कल्पनाओं के कारण मेरी प्रशंसा करते हैं। साहित्य से प्रेम करने वाले मुझसे ऐसी चटक कल्पनाओं का राज पूछते हैं। उनके जवाब में मैं बस मुस्करा कर रह जाता हूँ। हमारे ताओवादी गुरु ने क्या खूब बात कही थी। ''भाग्य दुर्भाग्य पर निर्भर करता है। किस्मत में बदकिस्मती छिपी होती है।'' मैंने बचपन में ही स्कूल छोड़ दिया। अकसर भूखा रहा करता था। हमेशा अकेलेपन से घिरा होता था। मेरे पास पढ़ने के लिए कोई किताब नहीं होती थी। लेकिन इन कारणों से ही एक पिछली पीढ़ी के लेखक शेन कोंगवेन की तरह मैंने काफी उम्र में जिंदगी की किताब को पढ़ना शुरू कर दिया। बाजार मे जाकर किस्सागोओ की कहानियाँ सुनने का अनुभव उस किताब का एक पन्ना ही था।'' इस वर्णन को पढ़कर मो यान के मो यान के मो यान बनने की प्रक्रिया का पता चलता है। जाहिर है मो यान के लेखन की इतनी सरल और एकसूत्रीय व्याख्या नहीं की जा सकती कि मो यान पर अमुक-अमुक लेखकों या घटनाओं का प्रभाव है।

मो यान ने अपने लेखक बनने के सफर में जिस पड़ाव को सबसे अहम माना है, वह है 1984 में। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के कॉलेज में साहित्य के विभाग में उनका दाखिला। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी और चीन के कम्युनिस्ट शासन से रिश्ता मो यान पर लगने वाले आरोपों की सबसे बड़ी जड़ है। मो यान पर आरोप लगते हैं कि वे चीनी हुकूमत के काफी नजदीक हैं। यहाँ तक कि उनको नोबेल मिलने को चीनी हुकूमत के साथ पश्चिम की मेल-जोल की कोशिश के रूप में भी देखा गया। इसे पिछले साल चीनी सरकार के प्रखर विरोधी मानवाधिकारों की माँग करने वाले कार्यकर्ता लियु जियाओबो को शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने से चीनी हुकूमत की नाराजगी के मुआवजे के तौर पर भी देखा गया। विदेशी मीडिया में मो यान को नोबेल दिए जाने की खबर को यह कोण भी दिया गया कि आखिरकार चीन की नोबेल पुरस्कार पाने की साध पूरी हो ही गई। खासकर इस मायने में उसे ऐसा नोबेल मिल गया है जो उसके लिए स्वीकार्य है, जिसका वह जश्न मना सकता है।

2009 की नोबेल पुरस्कार विजेता हर्ता मुलर ने मो यान को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा को एक बड़ा 'हादसा' करार दिया। भारतीय मूल के लेखक सलमान रुश्दी ने भी मो यान की खुल कर आलोचना की। उन्हें सत्ता द्वारा खड़ा किया गया पैट्सी (काफी भोला भाला व्यक्ति) कहा। खासकर इसलिए क्योंकि मो यान ने 2011 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता चीनी मानवाधिकार कार्यकर्ता लियु जियाओबो की रिहाई के लिए चलाए जा रहे एक अंतरराष्ट्रीय हस्ताक्षर अभियान में शामिल होने से इनकार कर दिया था।

सेंसरशिप को लेकर मो यान के विचार भी उन पर हमले का सबब बनते रहे हैं। ग्रांटा को दिए साक्षात्कार में मो यान ने सेंसरिशप को न्यायसंगत ठहराते हुए कहा, ''दरअसल, साहित्य की तमाम दृष्टियों का अपना एक राजनीतिक प्रतिफलन होता है। हमारे वास्तविक जीवन में कुछ तीखे और संवेदनशील मुद्दे हो सकते हैं और उन्हें छुए जाने की अपेक्षा नहीं होती। ऐसे में लेखक उन्हें अपनी कल्पना का इस्तेमाल करके खुद को अभिव्यक्त करता है, ताकि वे वास्तविक दुनिया से अलग नजर आएँ। या वह यथार्थ को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर सकता है, इस बात का ख्याल रखते हुए कि यह यथार्थ स्पष्ट और निर्भीक तो दिखे ही उस पर वास्तविक दुनिया की छाप भी हो। इस लिहाज से देखें, तो सीमाएँ या सेंसरशिप साहित्यिक सृजनशीलता के लिए काफी अच्छे हैं।'' नोबेल पुरस्कार लेने से पहले स्टॉकहोम में प्रेस कांफ्रेंस में बोलते हुए मो यान ने सेंसरशिप को जायज ठहराया और इसकी तुलना एयरपोर्ट सेक्योरिटी चेक से की। हालाँकि उन्होंने यह जोड़ा कि यह सेंसरशिप उच्चतम मानदंड वाला होना चाहिए। और इसे सत्य कहने की राह में अवरोध नहीं खड़ा करना चाहिए। सेंसरशिप को लेकिर अगर किसी लेखक की राय अगर ऐसे हों, स्वाभाविक सी बात है कि उसकी लेखकीय प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए जाएँगे। सेंसरशिप के भीतर साहित्य सृजन की कल्पना नहीं जा सकती। याद कीजिए रवींद्रनाथ टैगोर की इन प्रसिद्ध पंक्तियों को :

Where the mind is without fear and the head is held high;

Where knowledge is free;

Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls;

Where words come out from the depth of truth;

अपनी इस ऐतिहासिक कविता में टैगोर ने भयमुक्त मानस, आत्मसम्मान, सोच की आजादी, मुक्त ज्ञान और सत्य के अंतरतम से निकलने की स्वतंत्रता की बात की है। टैगोर जिस देश के निर्माण का स्वप्न देख रहे हैं, उस देश में इन आजादियों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कौन करता है? एक लेखक ही न! लेखक को ये आजादी क्यों चाहिए? ताकि वह अपने स्वजनों-परिजनों के पक्ष में प्रतिबद्ध, संबद्ध और आबद्ध हो सके। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का साहस कर सके। संसद के तेल की घानी में बदल जाने का सच कह सके। राष्ट्रगान के भाग्यविधाता से हरचरना की तरफ से सवाल पूछ सके।

अब इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिलने के ठीक करीब 100 साल बाद जिस एक दूसरे एशियाई को नोबेल पुरस्कार मिलता है, वह सार्वजनिक रूप से लेखक के मानस को सरकारी सेंसरशिप में कैद करने को जायज ठहराता है। लेकिन यहीं एक सवाल उठता है, जिससे मुठभेड़ किया जाना चाहिए। अपनी इस घोषणा के बावजूद टैगोर अपनी कविताओं में किसका आह्वान करते हैं? भारत के विचार को रूपायित करने वाला उनका उपन्यास गोरा अंग्रजी हुकूमत को सीधे अपने निशाने पर क्यों नहीं लेता है? क्या छायावाद के कवि स्वतंत्रता की अपनी कामना को व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक महदूद नहीं रखते! जब निराला को अँग्रेजी राज के अंधकार की बात करनी होती है, तब वे तुलसीदास और राम की शक्तिपूजा में अपनी बात सीधे कहने की बजाय प्रतीकों और बिंबों का इस्तेमाल करते हैं? आखिर क्या वजह है कि प्रेमचंद अपने उपन्यासो में अवध के किसानों की दुर्दशा की तो बात करते हैं, लेकिन उनके उपन्यासों में सीधे अँग्रेजी राज के खिलाफ मुखालफत नहीं दिखाई देती। गोदान में अँग्रेजी राज की आलोचना के अनेक अवसर हैं, लेकिन आखिर क्या वजह है कि वे उपन्यास में महाजनी सभ्यता की आलोचना तक ही खुद को सीमित रखते हैं।

क्या इसकी वजह यह नहीं कि प्रेमचंद का कहानी संग्रह 'सोजे वतन' अँग्रेजी हुक्मरानों द्वारा जब्त कर लिया जाता है। और उसके बाद प्रेमचंद अंग्रेजी शासन पर मुखर होकर निशाना नहीं साधते हैं। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए प्रेमचंद लेखन को राजनीति से आगे चलने वाली मशाल कहते हैं, लेकिन यह मशाल उनके लेखन में थोड़ा प्रतीकात्मक ढंग से जलता है। मो यान टैगोर की तरह भयमुक्त मानस की बात नहीं करते हैं। न ही वे लेखन को राजनीति से आगे चलने वाली मशाल कहते हैं। जाहिर है इस मायने में टैगोर और प्रेमचंद मो यान से कहीं ज्यादा साहसी हैं। लेकिन यह भी सही है कि मो यान के उपन्यासों तथा कहानियों में समय-समाज और यहाँ तक की सरकार की आलोचना का स्वर भी देखा जा सकता है। हाँ थोड़ा व्यंग्य का स्वर लिए। यह आरोप लगाना कि मो यान के पास चमत्कार भरे शब्द तो हैं, लेकिन ये शब्द खोखले हैं, सच्चाई के पूरी तरह करीब नहीं। किसी लेखक की सबसे बड़ी कसौटी उसकी रचना ही हो सकती है। सवाल है कि क्या मो यान की रचनाओं में सेंसरशिप के भय को लक्षित किया जा सकता है? गौर से देखा जाए, तो मो यान के यहाँ सेंसरशिप का भय नहीं सेंसरशिप की चुनौती का सामना रचनात्मक तरीके से करने की जिजीविषा ज्यादा नजर आती है।

सवाल यह भी कि आखिर एक लेखक से समाज की क्या अपेक्षा होनी चाहिए? क्या उसके लेखन में 'पॉलिटिकल एक्टिविज्म' होना उसके महान लेखक होने की अनिवार्य शर्त है? मो यान को लेकर इन सवालों के जवाब उनके साक्षात्कारों, उनके आत्मकथ्यों, वक्तव्यों के साथ उनके उपन्यासों-कहानियों में भी खोजा जाना चाहिए।

अपने नोबेल वक्तव्य में मो यान कहते हैं, 'मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती वे उपन्यास रहे हैं, जो सामाजिक सच्चाइयों पर लिखे गए हैं। मसलन, 'द गार्लिक बैलाड्स' इसलिए नहीं कि मैं समाज के स्याह आयामों की खुल कर आलोचना करने से डरता हूँ, बल्कि इसलिए क्योंकि खौलती हुई भावनाएँ और गुस्सा राजनीति को मौका देता है कि वह साहित्य को दबा दे। यह उपन्यास को सामाजिक घटनाओं के रिपोर्ताज में बदल देता है। समाज का सदस्य होने के नाते एक उपन्यासकार को अपना नजरिया और पक्ष रखन का अधिकार है, लेकिन जब वह लिख रहा होता है, तब उसे जरूर से एक मानवीय पक्ष लेना चाहिए और उसके अनुरूप लिखना चाहिए। ऐसा करने से ही यह मुमकिन है कि साहित्य घटनाओं के पार जा सके। सिर्फ राजनीति के प्रति चिंता जाहिर न करे, उससे बड़ा हो जाए।' मो यान की चिंता राजनीति से बड़ा होने की है।' सवाल है कि क्या मो यान रचनाएँ राजनीति से बड़ा हो पाती हैं? क्या यह मुमकिन है कि राजनीति से टकराए बिना ही कोई रचना राजनीति से बड़ी हो जाए?

'शिफू यू विल डू एनीथिंग फॉर लाफ' की भूमिका में मो यान ने चीन में चले ''द ग्रेट लीप फॉरवार्ड'' और ''सांस्कृतिक क्रांति'' के दौरान की दुश्वारियों का जिक्र किया है। यहाँ मो यान ने लगातार भूखे रहने, खाने के लिए पेड़ों के पत्तों और उसकी छाल तक को खाने की मजबूरी की बड़ी मार्मिक कथा कही है। यह भूख ऐसी है कि वे और उनके साथी स्कूल में आए कोयले के टुकड़ों तक को चटकारे-ले लेकर खा लेते हैं। कोयले के इस भोज में और भी कई लोग शामिल हो जाते हैं। अब इसे भूख की इंतहा नहीं कहेंगे तो क्या कहेंग? और इस भूख की वजह क्या थी? इसकी वजह थी जन गणतंत्रात्मक चीन में माओ के समय शुरू किया गया 'द ग्रेट लीप फॉरवार्ड' का ग्रामीण कृषि के सामूहिकीकरण का प्रयोग जिसने चीन की बड़ी आबादी पर बेइंतहा तकलीफों का भार लाद दिया था और जिसका अंत व्यापक भूख और आखिरकार मानवीय इतिहास के भीषणतम अकाल के रूप में हुआ। लेकिन, मो यान इस सच्चाई का यहाँ प्रत्यक्ष रूप से उल्लेख नहीं करते। वे माओ का, द ग्रेट लीप फॉरवार्ड का जिक्र नहीं करते। वे यह जरूर कहते हैं कि ''यह दौर चीन के इतिहास सबसे विचित्र और अभूतपूर्व उन्माद से भरा हुआ दौर था। इस दौर में अर्थव्यवस्था थम गई थी, लोग वंचितों का जीवन जीने पर मजबूर थे। लोगों का संघर्ष मृत्यु को अपने दरवाजे से दूर रखने का था। उनके पास खाने को बेहद कम होता था, पहनने के लिए चीथड़े ही होते थे।'' हालाँकि यहाँ मो यान यह भी कहते हैं कि ''यह तीव्र राजनीतिक भावावेश का दौर था। जब भूख से मर रहे नागरिकों ने पार्टी के आदेशों का पालन करते हुए उसके साम्यवादी प्रयोग में खुद को समर्पित कर दिया। हमारी नौबत भले भुखमरी जैसी हो, लेकिन हम अपने आप को दुनिया का सबसे भाग्यशाली व्यक्ति मानते थे, हमें लगता था कि दुनिया की दो तिहाई आबादी घनघोर गरीबी में है और यह हमारा पुनीत कर्तव्य है कि हम उन्हे उनके कष्टों से मुक्ति दिलाएँ। हम ऐसा तब तक मानते रहे जब तक कि 1980 के दशक में चीन में उदारीकरण की शुरुआत के बाद चीन के दरवाजे दुनिया के लिए खोल नहीं दिए गए। तब कहीं जा कर हमें किसी ख्वाब से जागने का एहसास हुआ।'' ये पंक्तियाँ माओ के शासन काल की आलोचना नहीं हैं तो और क्या हैं?''

अपने उपन्यास द ''गार्लिक बैलेड्स'' में वे ग्रामीण कृषि को नियंत्रित करने की सरकारी नीति पर तीखा व्यंग्य करते हैं। यह एक गहन राजनीतिक उपन्यास है। इस उपन्यास में पाराडाइज काउंटी के किसानों को स्थानीय सरकार अपने खेतों में लहसुन उगाने के लिए प्रोत्साहित करती है। लेकिन जब किसानों की पैदावार अच्छी होती है, तो स्थानीय सहकारी समितियाँ किसानों की उपज को खरीदने से मुकर जाती है, क्योंकि सारे गोदाम भर गए हैं। किसान अपनी पैदावार को खेतों में सड़ते हुए देखने पर विवश हैं। इससे किसानों का गुस्सा भड़क उठता है और वे सरकार के खिलाफ हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। मो यान किसके साथ खड़े हैं, इसे उस अंधे गायक के गीतों से समझा जा सकता है, जो घूम-घूम कर इस व्यवस्था के प्रति अपना क्षोभ प्रकट करता है। उपन्यास के सोलहवें अध्याय की शुरुआत में उद्धृत किए गए इस गीत में शासन के मनमानेपन के खिलाफ प्रतिरोध का स्वर है :

''अगर तुम्हारी यही इच्छा है, तो मुझे गिरफ्तार कर लो।

कोई मेरे लिए अपराध संहिता को ऊँचे स्वर में पढ़ेगा

कानून तोड़ने वाले के साथ नरमी बरती जाती है

मैं अपनी जुबान सिर्फ इसलिए बंद नहीं करूँगा कि मुझे जेल में बंद कर दिया गया है।''

कोई आश्चर्य नहीं कि 1988 में प्रकाशित यह उपन्यास चीन में प्रतिबंधित है। यह उपन्यास बताता है कि वर्तमान चीन में भी किसानों की स्थिति अनिवार्य सामुहिकीकरण के दौर से कोई बेहतर नहीं है। वे पहले की ही तरह शोषण का शिकार होने पर मजबूर हैं।

अपने बेहद महत्वपूर्ण उपन्यास ''लाइफ एंड डेथ आर वियरिंग मी आउट'' में मो यान आदि से अंत तक चीनी कम्युनिस्ट हुकूमत के असंवेदनशील चेहरे, व्यापक भष्टाचार और सत्ता की असंवेदनशीलता को उजागर करते हैं। हालाँकि यहाँ भी वे व्यंग्य का सहारा लेते न कि सीधी टिप्पणियों का। यह उपन्यास एक ऐसे काश्तकार की कहानी है, जो माओकालीन चीन में शुरू किए गए सुधारों के दौर में विभिन्न जानवरों की योनियों में जन्म लेता है। यह काश्तकार चीन के साम्यवादी समाज की न सिर्फ आँखों देखी बयाँ करता है, बल्कि उस मारक व्यंग्य भी कसता है। उपन्यास का केंद्रीय पात्र लिन लियान अपने पारिवारिक जमीन के एक छोटे टुकड़े पर अपना मालिकाना हक बनाए रखने के लिए संघर्ष करता है और हठपूर्वक समाजवादी संगठनों में शामिल होने से इनकार करता है। चीन के कम्युनिस्ट सरकार की यहाँ एक तरह से निर्मम आलोचना है। ला लियान एक जगह कहता है, ''मेरे मन में चीन की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ कुछ नहीं है, और यकीनन चेयरमैन के खिलाफ तो मेरे मन में कोई दुर्भावना नहीं है, मैं तो बस यह चाहता हूँ कि मुझे मेरी जमीन पर खेती करने दिया जाए और मुझे अकेला छोड़ दिया जाए।'' अपने नोबेल वक्तव्य में भी मो यान ने इस उपन्यास के बारे मे बात की। इस उपन्यास का चीनी भाषा में शीर्षक बौद्ध धार्मिक धर्म ग्रंथ से लिया गया है। मो यान के मुताबिक, ''मैंने यह शीर्षक इसलिए चुना क्योंकि मेरा मानना है कि बौद्ध धर्म की मूलभूत चीजें वैश्विक ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती हैं। और इनसान के अधिकांश झगड़े बौद्ध जगत में निरर्थक हैं।'' हान बहुमत वाले चीन में जहाँ बौद्ध संस्कृति के केंद्र तिब्बत को एक गहरी साजिश के तहत हान लोगों से भरा जा रहा है, ल्हासा पर अपनी पकड़ बनाने के लिए चीन ने अरबों डॉलर खर्च करके दुनिया की सबसे ऊँची रेल लाइन बिछाई है, चीनी हुकूमत बौद्धों के हर अधिकार छीनने में जुटी है, वहाँ के नोबेल विजेता लेखक द्वारा बौद्ध धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की इस तरह खुलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रशंसा को क्या सेंसरशिप के दबाव में निकले शब्द कहा जा सकता है?

मो यान पर चली आ रही बहस में एक बात और निकल कर आती है कि मो यान अगर माओयुगीन चीन को लेकर निर्मम हैं, तो इसकी एक वजह यह है कि आज के चीन में माओ की आलोचना को सरकारी सेंसरशिप की गिद्ध दृष्टि का सामना नहीं करना पड़ता। एक हद तक यह बात सही जान पड़ती है। मो यान के उपन्यास इतिहास में ज्यादा विचरण करते हैं। फिर वह चाहे 'रेड सोरगम' हो या फिर 'लाइफ एंड डेथ आर वियरिंग मी आउट'। इस लिहाज से मो यान की उपन्यासिका ''शिफु यू विल डू एनीथिंग फॉर लाइफ'' को पढ़ना चौंकानेवाला अनुभव है। इसे अगर मो यान की अर्द्ध काल्पनिक आत्मकथा चेंज के साथ मिला कर पढ़ा जाए, तो मो यान क लेखन की पक्षधरता को समझा जा सकता है।

शिफु यू विल डू एनीथिंग फॉर लाफ में 80 के दशक में चीन में हुए ग्रैंड ओपेनिंग के बाद वाले चीन का वर्णन है, जिसे ह्यूमैनिटीज पत्रिका को दिए गए साक्षात्कार में मो यान ने चीनी साहित्य का का स्वर्णिम दौर कहा है और यह भी कहा है कि अगर यह दौर शुरू नहीं हुआ होता, तो वे लेखक नहीं बन पाए होते। इस कहानी की सबसे बड़ी खासियत यह भी लक्षित की जा सकती है कि इसका भूगोल गाँव-देहात नहीं है। यह कहानी चीन के एक शहर में सेट की गई है। चीन के उन शहरों में से एक शहर में जिन्हें चीनी तरक्की के प्रतीक के तौर पर पेश किया जाता है। इस शहर की फिजा कैसी है? शिफु जो अपने कारखाने का वरिष्ठ और सबसे काबिल माना जानेवाला मजदूर है, उसकी एक दिन अचानक छँटनी कर दी जाती है। क्यों? क्योंकि नई व्यवस्था में पुरानी उत्पादन व्यवस्था के किसी व्यक्ति के लिए जगह नहीं है। वह कितना ही काबिल क्यों न हो। महत्वपूर्ण काबिलियत नहीं है। न हुनर है। न अनुभव। महत्वपूर्ण है कि वह नई व्यवस्था के लिए धन अर्जित कर सकता है या नहीं? चीन में ग्रैंड ओपेनिंग के बाद का जल्दी-जल्दी ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने, दोहरे अंकों की आर्थिक विकास दर का दौर दूसरी तरह की मुश्किलें ले कर आया है। और इसके शिकार भी आम आदमी ही हुए हैं। गाँव के भी शहर के भी। इस कहानी में वर्णन है कि किस तरह से चीन में साम्यवाद के तमाम नारों के बावजूद अधिकारियों और मजदूरों के बीच बड़ी असमानता है। अधिकारियों के पास जहाँ महंगे कार हैं, वहीं मजदूर पुरानी खटारा साइकिलों पर चला करते हैं। बहरहाल, बात शिफु की। छटनी के बाद शिफु का सामना एक भ्रष्ट और बेरपवाह शासन व्यवस्था से होता है, जो उसकी फरियाद सुनने से इनकार कर देती है। शिफु जब सड़क पर निकलता है, तो उसे सिर्फ अपने जैसे छँटनी के मारे लोग दिखाई देते हैं, जो किसी न किसी तरह अपना गुजारा करने के लिए मेहनत-मजदूरी कर रहे हैं। इस नई व्यवस्था में शिफु अपने लिए कोई भविष्य नहीं देखता और अंत में एक ऐसा धंधा अपनाता है, जो उसके मन में एक तरह की अपराध भावना भर देता है। यह कहानी आधुनिक चीनी समाज, राजनीतिक व्यवस्था और प्रशासन पर चुभते हुए सवाल छोड़ जाती है। साथ ही मजदूरों की सोचनीय दशा की ओर भी इशारा करती है। यहाँ चीन के श्रम कानूनों के खोखलेपन का भी पता चलता है। यहाँ आधुनिक चीनी समाज में व्याप्त गहरी असमानता, पूर्वाग्रह साफ झलकते हैं। इस कहानी का फॉर्म, इसका पूरा कहन जितना चौंकानेवाला है, उतना ही चौंकाने वाली है मो यान की अपने साथी चीनी नागरिकों के साथ खड़े होने की इच्छा।

यहीं मो यान की अर्द्ध काल्पनिक आत्मकथा ''चेंज'' के वर्णनों को देखना रोचक है। यहाँ माओकालीन चीन पर तो टिप्पणी है ही, यह भी दिखाया गया है कि वर्तमान चीन में किस तरह जल्द से जल्द अमीर बन जाना सबसे बड़ा मूल्य, सबसे बड़ी सफलता बन गया है। यहाँ मो यान ने अपने दोस्त हे झिवु के बहाने चीनी अर्थव्यवस्था की सफल कहानियों के पीछे की भ्रष्ट व्यवस्था को उजागर किया है। किताब का आखिरी हिस्सा काफी मानीखेज है। किताब में मो यान ने खुद को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नजदीक दिखाया है। माना जाता है कि उनकी पहुँच दूर-दूर तक है। उनके पास उनके गाँव की पुरानी सहेली अपनी बेटी की पैरवी कराने आती है। और यह जानकर कि उसका काम हो गया है, मो यान के हाथ में दस हजार युआन थमा जाती है। मो यान वे पैसे रख लेते हैं। क्यों? क्योंकि चीन में कोई भी काम बिना पैसे के, बिना घूस के, गलत रास्तों के नहीं होता, मो यान बताते हैं यही वर्तमान चीन का सच है।

मो यान के लेखन की सबसे बड़ी खासियत यह कही जा सकती है कि यह हमें चीन के लौह दरवाजे के भीतर ले जाती है। जिसके भीतर न दाखिल हुआ जा सकता है, न जिसको लाँघ कर चीन की कोई आवाज बाहरी दुनिया तक आ पाती है। चीनी हुकूमत अखबारों, टीवी, किताबों पर ही नहीं, सोशल नेटवर्किंग साइट्स और ब्लॉगिंग तक को कठोर सेंसरशिप के भीतर रखती है। शायद मो यान इस चीन की व्यथा-कथा कहने के लिए ही अपनी रचनाओं को जादुई या कहें हैलुशिनेटरी यथार्थवाद की चादर में लपेटते हैं। यथार्थ में कल्पना का ही नहीं, प्राकृतिक में परा-मानवीय का समावेश करते हैं और एक बेहद चौंकाने वाले शैल्पिक ढाँचे में अपनी कथा को विन्यस्त करते हैं। मो यान का शिल्प चाहे कितना ही चमत्कारी हो, लेकिन यथार्थ उसमें से बिना किसी जतन के बाहर निकल आता है। यही मो यान के यथार्थ बोध की ताकत है। मो यान हमें चीन के गाँवों तक ले जाते हैं। चीन के वर्तमान का उसके इतिहास से रिश्ता जोड़ते हैं। वर्तमान चीन के संकटों की बात करते हैं। मो यान को पढ़ने के बाद शायद पहली बार चीन का मतलब बीजिंग या शंघाई मात्र नहीं रह जाता। उसकी चौंकाने वाली सफलताओं, तरक्की के आँकड़ों की चमक-दमक को भेद कर हम ऐसे चेहरों तक पहुँच पाते हैं, जिनसे हमारी मुलाकात आज से पहले कभी नहीं हुई थी। मो यान ने भले न बोलने की कसम खाई हो, लेकिन उनकी रचनाएँ और उनके पात्र खूब बोलते हैं। हालाँकि यह सही है कि इस बोलने में कई बार विरोधाभास भी झलकता है और यह अकारण नही कि मो यान को पढ़ते हुए बार-बार भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक भारत दुर्दशा की इन पंक्तियों की याद आती हैं : ''अंगरेज राज, सुखसाज सजे सब भारी। पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी।'' मो यान सांस्कृतिक क्रांति के बाद की तरक्की की तो प्रशंसा करते हैं, लेकिन इसके नकारत्मक पहलुओं को भी देखने से नहीं चूकते। सवाल यह है कि पाठक किस हिस्से को देखना चाहता है? उस हिस्से को जिसमें तरक्की करते चीन की प्रशंसा है या उस हिस्से को जिसमें इस तरक्की का बोझ उठाते, उसके बोझ तले पिसते गाँव के किसान या शहरों में हाशिये पर रहने वाले लोग हैं?


End Text   End Text    End Text