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आलोचना

कबीर का वैचारिक दर्शन
रोहिणी अग्रवाल


' मो को कहाँ ढूँढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।

ना तीरथ में, ना मूरत में, ना एकांत निवास में।

ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना काबे कैलास में।

मैं तो तेरे पास में बंदे, मैं तो तेरे पास में।

ना मैं जप में, ना मैं तप में, ना मैं बरत उपास में।

ना मैं किरिया करम में रहता, नाहिं जोग संन्यास में।

नहिं प्राण में, नहिं पिंड में, ना ब्रह्मांड अकास में।

खोजा होय तुरत मिल जाऊँ, इक पल की तलास में।

कहत कबीर सुनो भई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में।'

कबीर के वैचारिक दर्शन पर पर बात करने से पूर्व इस प्रश्न पर विचार कर लेना जरूरी है कि भक्ति काल के अग्रगण्य कवि होने के बावजूद कबीर भक्त कवि नहीं, संत हैं। 'जगत मिथ्या ब्रह्मं सत्यं' - भक्त संसार को नकार कर संसार की रचना करने वाले अलक्षित अदृष्ट सर्वव्यापी ईश्वर को पा लेना चाहता है। वह ईश्वर जो शील, शक्ति और सौंदर्य का संगम है और जिसकी अनुकंपा से तमाम लौकिक दुखों से मुक्ति पाकर स्वर्गारोहण की कामना परिपूर्ण की जा सकती है। भक्त परमात्मा के जरिए उसमें आरोपित एक अमूर्त आदर्श की प्रतिष्ठा करता है जो प्रच्छन्न रूप से मनुष्य - आत्मा - की हीनता और अकिंचनता पर जोर देकर परमात्मा-आत्मा के बीच ठीक उसी संबंध की परिकल्पना करता है जिसमें सामाजिक पदानुक्रम की स्वीकृति है। सामाजिक पदानुक्रम सामंती मानसिकता का निदर्शन भर है जो वर्ग, वर्ण, लिंग और वय के आधार पर विषमतामूलक आचार-संहिताओं का निर्माण और निर्वाह करता है। जाहिर है भक्त संसार का नकार/अतिक्रमण करने की हर संभव इच्छा के बावजूद संसार के गहन दलदल में धँसता चला है। उसकी मुक्ति की यात्रा बहिर्यात्रा है। निष्क्रियता का अलख जगाते हुए वह सामान्यीकरण पर बल देता है और तमाम धार्मिक कर्मकांडों का निषेध करते हुए पुनः पुनः नए कर्मकांडों की रचना करता चलता है। अपनी ही सीमाओं में आबद्ध वह न लोक के महत्व को जान पाता है, न आत्म की शक्ति को। आत्मनकार वस्तुतः दिग्भ्रमित कर उसे घनघोर लौकिक, अहंनिष्ठ, एकाकी और पलायनवादी बना देता है। इसके विपरीत संत संसार का नकार करने की बात सोचता ही नहीं। संसार से उसका गहरा नाता है। मोह का नहीं, संवेदना का जो संसार को बेहतर बनाने की व्यग्रता में बार-बार जड़ सांसारिक विधानों से टकराने, उन्हें चुनौती देने और नई लीकों को बनाने की तूफानी चेष्टाओं में प्रतिफलित होता है। संत के लिए परमात्मा नामक कोई भी अलौकिक तत्व महत्वपूर्ण नहीं। प्रसादन से दूर वह मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा में रत रहता है। उसका एकमात्र संगी है विवेक। यही उसकी अंतश्चेतना है और परमात्मा भी। न आत्मदया, न आत्मदमन, न परलोक की चिंता, न इहलोक से पलायन - उसकी यात्रा आत्मान्वेषण की अंतर्यात्रा है जो 'मनुष्य' की प्रतिष्ठा कर लोकतंत्र में गहरी आस्था बनाए रखती है। दरअसल भक्त राम/कृष्ण के रूप में परम सत्य की प्रतिष्ठा नहीं करता, लौकिक मूल्यों - सामदामदंडभेद की नीति और विषमतामूलक व्यवस्था में आस्था - को 'रीइन्फोर्स' करता है। वह धर्म का आश्रय लेकर अखंड मनुष्य को वर्ग, वर्ण, जाति, लिंग, समुदाय, संस्कृति में बाँटता है। संत मनुष्य की अखंड मनुष्यता का संवर्धन कर उसे जनशक्ति का रूप देना चाहता है। शेष सब विभेद उसके लिए बेमानी हैं। उसके लिए धर्म का अर्थ है - मानवतावादी दर्शन। कबीर इसी मायने में संत हैं कि उनका वैचारिक दर्शन सिर्फ और सिर्फ मनुष्य की गरिमा की रक्षा के लिए कटिबद्ध है। इसलिए आज के इक्कीसवीं सदी के भूमंडलीय विश्व में जब मनुष्य को कतरा-कतरा कुतर कर बाजार, धर्म, पितृसत्तात्मक व्यवस्था और वर्णव्यवस्था सरीखी सामंती वर्चस्ववादी ताकतें इकाइयों में बँटा व्यक्ति बनाने का कुच चलती हैं, तब इनके मनोविज्ञान को जानने और इनसे निपटने के लिए संत कबीर के वैचारिक दर्शन को नजदीक से जानना अनिवार्य हो जाता है। दरअसल आज का आक्रांता समय सिर्फ आज की सच्चाई नहीं। वह रूप बदल-बदल कर हर वक्त की छाती पर सवार हो अपनी विजय-यात्रा पर निकला करता है। आज के बीहड़ समय को पंद्रहवीं सदी में कबीर ने भी झेला है जब मनुष्य की गरिमा को तोड़ कर उसे अकिंचन 'व्यक्ति' बनाती साजिशें मानवीय मूल्यों को अपदस्थ कर विकल्प रूप में जीवन मूल्यों का घटाटोप खड़ा करती हैं और उन्हें ही नए युग का अंतिम सत्य घोषित कर जीवन-प्रवाह को बदल देना चाहती हैं। जाहिर है कबीर का विश्लेषण कबीर की जमीन पर खड़े होकर करना पलायनवादी निष्क्रिय मानसिकता है। हमारी जमीन पर पुख्ता पाँव गड़ाए खड़े कबीर का आकलन करना अपने युग के भीतर उस जज्बे और जरूरत को भर देना है जो कबीर को व्यक्ति नहीं, संघर्ष, जिजीविषा, अदम्य विश्वास और सृजन का प्रतीक बनाता है।

कबीर को थहाने की एकमात्र कुंजी है कबीर के 'राम' का मर्म जानना। यह राम न कृष्ण हैं, न दशरथसुत राम। चूँकि अवतारी पुरुष के रूप में उसने जन्म नहीं लिया, अतः उसकी लीलाओं का महिमामंडन भी नहीं। 'घर-घर में वह साईं बसता, कटुक बचन मत बोल रे' - वह हर मनुष्य के अंतस्थ में विद्यमान है - विवेक/अंतश्चेतना बन कर जिसे 'जिन खोजाँ तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठि।' अन्यथा डूबने के डर से किनारे बैठे-बैठे जड़ होते रहो या कस्तूरी मृग की तरह अपनी ही नाभि से उठती गंध के स्रोत का पता लगाने के लिए वन-वन भटकने की पस्ती के बाद अकारथ दम तोड़ने की त्रासदी सहते रहो। कबीर का राम दरअसल एक आइडिया है - अमूर्त शक्ति - जो आदर्श का पुंजीभूत रूप है और एक अखंड मानवीय प्रेरणा का प्रकाश पुंज, जो स्व-पर, ऊँच-नीच के भेद से परे 'मनुष्य' का आकलन केंद्र है। इसलिए वह 'जल में कुंभ, कुंभ में जल है' यानी अपने भीतर के मनुष्य की रक्षा के उद्योग में दूसरे के भीतर के मनुष्य की रक्षा करने का विवेक अपने भीतर और बाहर पाता है। लेकिन अपने ही भीतर स्थित राम को पाना क्या इतना सरल है? 'हिरदा भीतर आरसी, मुख देखणा न जाई/मुख तो तौपरि देखिए, जे मन की दुविधा जाई।'

इसी मनोहारी दुविधा से आक्रांत है आज का व्यक्ति। विवेकसम्मत आचरण का अर्थ है बहुत सी सुविधाओं, विशेषाधिकारों, लिप्साओं और निरंकुश आचार-संहिताओं से वंचित रहना। भीतर की सद्वृत्तियों के आलोक में अपनी ही मनुष्यता को जाँचते रहने की निर्मम निःसंग समझ विकसित करना। न, सुविधाभोगी मानस कबीर के काल का हो या इक्कीसवीं सदी के अभियांत्रिकी संपन्न युग का - रूप-रंग-रस-गंध में सराबोर दुनियावी प्रलोभनों में लिप्त होकर ऐंद्रिक सुख भोग लेना चाहता है। न, ऐंद्रिक सुखों के पूर्ण परित्याग की बात करते ही नहीं कबीर। निषेध वर्जना बन कर सहज-स्वस्थ सोच का दमन नहीं करती, भीतर की मनोभूमि पर बर्बरता और पाशविकता का कुटिल साम्राज्य पुख्ता करती चलती है। इसलिए कबीर संतोषप्रद एवं सम्मानजनक ढंग से लौकिक ऐषणाओं की पूर्ति कर लेना चाहते हैं -

'साईं इतना दीजिए जा में कुटुम समाय।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।'

इसके बाद सिर्फ लोभ का विस्तार है - दूसरों की जमीन पर अतिक्रमण की अनैतिक कोशिश। इसे कबीर 'माया' का नाम देते हैं - एक ऐसी तिलिस्मी आत्ममुग्धता जो अहंकार और अज्ञान के पायों पर सवार हो मनुष्य की अस्मिता को ही लीलने लगती है। 'माया तजूँ, तजी न जाय/फिरि फिरि माया मोहे लिपटाय' - दूर तक पसरी एक अवश बेचारगी। इतना अशक्त नहीं हुआ करता मनुष्य कि निरीह कातर भाव से अपना ही तन-मन घुलता देखता रहे। जिजीविषा और प्रतिरोध की शक्ति ही व्यक्ति को कर्मठ बनाती है और समाज को विकसनशील इकाई। 'काहे रे मन दह दिसि धावै, विषिया संग संतोष न पावै' - कबीर की करारी फटकार में आज के बाजार-तंत्र से जूझने की ललकार है। जरूरत है संयमित होकर बाजार के शास्त्र और मनोविज्ञान को जानने की जिसका तंत्र टिका है ढेर से उत्पादों, उत्पादकों, उपभोक्ताओं पर; और वजूद मीडिया-विज्ञापन और छवियों पर। बाजार केंद्र है लेकिन केंद्र होने के दंभ से बहुत दूर मात्र 'स्रष्टा' की अकिंचन छवि से संतुष्ट। वह एक नया शास्त्र गढ़ता है जहाँ पहले चरण में केंद्र होने का दंभ सेवा और परोपकार जैसे सकारात्मक जीवन मूल्यों को धारण करता है। दूसरे चरण में वह सीमित साधन संपन्न क्रेता को ससीम जीवनचर्या से निकाल कर लालसाओं के निःसीम व्योम में प्रतिष्ठित करता है जहाँ उसकी कल्पना लालसा को साकार करना असीमित साधन संपन्न उत्पादक/पूँजीपति का अहोभाग्य बन जाता है। घोर विस्मय! आँखें मल-मल कर अपने को चिकोटी काटने की नाटकीय स्थिति... कहना न होगा कि - यहाँ थैला-बटुवा-लस्त पस्त चाल वाली तुच्छ छवि की प्रेत छाया से मुक्त कर वह 'उपभोक्ता' को अहम्मन्य नशीली केंद्र छवि में अवतरित करता है जहाँ साधन से उत्पादन तक, विज्ञापन से वितरण तक केंद्र में बस वही है। तीसरे चरण में बाजार अहम्मन्यता को मीठे नशे में ढाल कर उपभोक्ता को ज्यादा से ज्यादा परनिर्भर और निष्क्रिय बनाता है, इस कदर कि उपभोग से मिलने वाले आनंद की बजाय उपभोग की सतत दुश्चिंता उसके अस्तित्व की पहली शर्त बन जाती है। यहाँ क्रेता जो न्यूनतम भौतिक आवश्यकताओं से परिचालित मूलतः 'मनुष्य' है और इसलिए बाजार के दबावों का प्रतिरोध करने में सक्षम है को उपभोक्ता जो लालसाओं के अनावश्यक विस्तार के कारण स्वयं उत्पाद बन गया है में तब्दील करने के बाद बाजार 'स्रष्टा' का मुखौटा उतार कर अपनी मूल केंद्र यानी शोषक की भूमिका में आ जाता है। चूँकि वह हर उस व्यक्ति से भयभीत है जो संयम, आत्मानुशासन, विश्लेषण, दृढ़ इच्छा शक्ति और चयन के सीमित अवसरों के साथ जीवन-क्षेत्र में उतर कर भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए मानवीय दायित्वों को संपन्न करना अपना परम कर्तव्य समझता है, अतः चौथे और अंतिम चरण में स्मृतियों के लोप की पुरजोर पैरवी करता है, यानी बाहर और भीतर बाजार का अनंत विस्तार!

जाहिर है बाजार भोग की सर्वग्रासी ज्वाला का दूसरा नाम है जिसका फल है सतत असंतोष। चिर अतृप्ति। माया प्रतीकार्थ अज्ञान, दंभ, छल, प्रपंच का विस्तार भोग को प्रश्रय देता है। तो क्या इस जानलेवा गठबंधन से मुक्ति पाना संभव नहीं? है। लेकिन डगर बेहद कठिन है। अपना घर फूँक कर तमाशा देखने के अलमस्त शौर्य की पैरवी करती। 'जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान' - कबीर उपदेश नहीं देते। न ही इंद्रिय निग्रह की शुष्क कठोर भयाक्रांत कर देने वाली पद्धति में ठोक-पीट कर कैद कर देना चाहते हैं उमगते-विकसते जीवन-प्रवाह को। वे विवेक के अंकुश तले - जियो और जीने दो - सहअस्तित्व के अधिकार को पुनर्जीवित करना चाहते हैं जो मनुष्य को पशु से अलगा कर विशिष्ट और सुसंस्कृत कर देता है। संतोष धन तमाम मनोविकारों के संगठित आक्रमण को पहले ही वार में समूल काट कर परे फेंक देता है। कबीर तमाम मनोविकारों को लोभ और बड़ाई नामक दो विकारों में गूँथते हैं - 'मैं मैं बड़ी बलाई है, सकै तो निकसि भाजि/ कब लग राखौ हे सखी, रूई पलेटी आग' तथा 'कबीर अपने जीवते, एै दोई बातें धोई / लोभ बड़ाई कारणौ, अछता मूल न खोई।' इन दोनों के नष्ट होने का परिणाम है - 'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।' क्या कबीर के अतिरिक्त कोई अन्य भक्त कवि इतने आत्मविश्वास से जीवन-चदरिया को मैली किए बिना ज्यों की त्यों छोड़ देने का संतोष पा सका है?

बाजार से जूझते कबीर के बरक्स कबीर-परवर्ती समाज/साहित्य में यह जानना भी जरूरी है कि क्या बाजार उपभोक्तावादी मानसिकता बन कर सदा सर्वदा व्यक्ति को भटकाता रहा है? क्या बाजार का माकूल जवाब देकर बाजार की अधिनायकवादी ताकतों को हराया है उसने? हाँ! प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' में बाजार नन्हें हामिद के विवेकसम्मत आचरण से चारों खाने चित्त पड़ा है। हामिद इतना नासमझ, इतना अभावग्रस्त और इतना ज्यादा संवेदनशील है कि मृत माँ-बाप के लौट आने पर सुख के हिंडोले में झूलने की कल्पनाओं में जीता है, अधिकतर। दादी की निस्सहायता और घर के कोने-कोने में पसरी गरीबी एक सच्चाई है जिसके साथ उसके जीवन का हर लम्हा जुड़ा हुआ है। इसलिए ईद के अवसर पर दोस्तों-हमजोलियों की तुलना में कुल छह पैसे का जेबखर्च उसे 'छोटेपन' का अहसास नहीं कराता। मेला, मेले की रंगीनियाँ और सजी-भरी दुकानों का अंबार उसे आतंकित भी करता है और विमूढ़ भी। उसकी मित्र मंडली भरी जेब के मुताबिक एक से एक दामी खिलौने खरीदती है, मिठाइयाँ खाती है। हामिद इन सबसे दूर अपनी तृष्णाओं, हसरतों और अभावों के साथ अकेला खड़ा है। उपेक्षित और तिरस्कृत! लेकिन धीरज और विवेक का साथ नहीं छोड़ता वह। इसलिए हसरतों और सच्चाइयों, लोभ और दायित्व के द्वंद्व के बीच उसे रोटी बनाती दादी की जली उँगलियाँ दिखाई दे जाती हैं। फिर तमाम द्वंद्वों की समाप्ति और ठोस निर्णय! चिमटा! भीड़ की शक्ल में दोस्त हँसे तो हँसते रहें, 'पीअर ग्रुप प्रेशर' के सिद्धांत की आड़ में अपनी दुर्बलताओं को ढाँपने वाला बहानेबाज नहीं है हामिद। बल्कि बेहद स्वाभिमानी और हाजिरजवाब कि दोस्त अपनी पसंद और लोभ पर शर्मसार हो उसे अपना नेता और नायक मान बैठते हैं। या फिर संजय खाती की कहानी 'पिंटी का साबुन' और नीलाक्षी सिंह की कहानी 'प्रतियोगी भी बाजार की ताकत से लोहा लेकर मनुष्य की इयत्ता और अस्मिता कायम रखने का जज्बा रखती हैं। इनमें 'डैथ ऑव ए सेल्जमैन', 'मुझे चाँद चाहिए' या उदयप्रकाश की कहानियों सरीखा त्राहि माम त्राहि माम जैसा रोता-झींकता निरीह आर्तनाद नहीं है, अपनी अंतःशक्तियों को संचित कर अपनी लड़ाई अपने दम खम पर लड़ने का आत्मविश्वास है। यही कबीर वाणी है - घर फूँक तमाशा देखने का उल्लास जो संतोष को मूल्य और मूलधन बना कर अज्ञान, अहंकार और अबुद्धि पर विजय पाता है।

स्थिति का विश्लेषण, आत्मसाक्षात्कार, समस्या से निपटने के लिए विवेकसम्मत रणनीति बनाने का कौशल और जिजीविषा - यही है कबीर के वैचारिक दर्शन का सारतत्व। इन्हीं को हथियार बना कबीर अपने युग में पसरी संकीर्ण सांप्रदायिक मानसिकता से जूझते रहे हैं जो धर्म और जाति के नाम पर मनुष्य-मनुष्य के बीच विभेदक दीवारें खड़ी करती रही है। कबीर पहले फटकार लगाते हैं - 'जो तू बामन बामनी जाया, आन बाट तै क्यों न आया / जो तू तुरक तुरकनी जाया, भीतर खतना क्यों न कराया।' फिर धर्मपालन के नाम पर कर्मकांडों में हास्यास्पद लिप्तता पर कटाक्ष -

'पाहन पूजे हरि मिले, मैं पूजूँ पहार।

ताते या चाकी भली, पीस खाय संसार।'

तथा

काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।

ता चढ़ मुल्ला बाँग दे, बहरो भयो खुदाय।'

क्या इतना भर होता है धर्म? कुछ प्रतीकों-चिह्नों-रूढ़ियों-कर्मकांडों में सिमट कर बेहद संकुचित, आत्मलिप्त और असंवेदनशील? धर्म के केंद्र में अपने अल्लाह/ईश्वर को बचाने की फिक्र है या मनुष्य की गरिमा का संवर्धन कर मनुष्यता को बचाने की? जो धर्म असहिष्णुता, द्वेष, वैमनस्य, प्रतिशोध और घृणा का पाठ पढा़ता हो, वह 'धर्म' तो नहीं क्योंकि धर्म सत् और विवेक के पाँवों पर चल कर मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। विडंबना है कि कबीर अपने युग में जिन कर्मकांडी ताकतों को बुरी तरह फटकारते थे, वे आज 'राष्टवाद' का नाम लेकर महिमामंडित की जाने लगी हैं। धर्म के कर्मकांडी स्वरूप का वर्चस्व पहले मनुष्य को 'मैं' और 'वह' में बाँटता है, फिर 'मेरे' धर्म को 'उसके' धर्म से श्रेष्ठ साबित कर दूसरे को 'काफिर' घोषित करता है और अंततः 'अपने' धर्म की विजय के उन्माद में 'दूसरे' केा तहस-नहस करने के 'पुनीत' कर्तव्य में जुट जाता है। सांप्रदायिकता के उत्स के मूल में इस बर्बर मानसिकता को लक्षित किया जा सकता है जो अपने क्रूरतम रूप में 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस में उभर कर आई है। सांप्रदायिक ताकतें सतह पर उभरी विकृत विद्वेषपरक सच्चाइयों को तूल देकर व्यक्ति को भीड़ और भेड़ में तब्दील करती चलती हैं जबकि सत्य यह है कि सतह के नीचे खदबदाती सच्चाइयाँ ही स्थिति का सटीक विश्लेषण कर पाती हैं। बकौल इस्मत चुगताई हम जब भी हिंदू-मुस्लिम की बात करते हैं, 'मैं' और 'वे' में बँट कर अपने-अपने स्टैंड पर लज्जित होने या क्षमा माँगने की कोशिश क्यों करते हैं? क्यों इतिहास के ताने-बाने की बिनाई में से सिर्फ एक ही धागा उठाते हैं और उसी के सहारे पूरे नमूने की बारीक जाँच करने की कोशिश करते हैं? क्यों नहीं उन सच्चाइयों से रू-ब-रू होकर प्रचारित करते कि हिंदू-मुस्लिम की साझी संस्कृति हमारे देश की अनुपम सांस्कृतिक विरासत रही है जहाँ मंदिर और मस्जिद की दीवार साझी रही है, जहाँ धर्मांतरण के बावजूद मुस्लिम परिवारों के शादी-ब्याहों में कृष्ण-यशोदा के गीत गाए जाते हैं और छुआछूत जैसे ऊपरी भेदों/परहेजों के बावजूद दोनों धर्मों में गाढ़ा भाईचारा और मेल-मुहब्बत रहे हैं। कबीर की वाणी आज के कथा साहित्य में सांप्रदायिक ताकतों से टकराने का मंत्र बन कर अपने आप को एक ठोस रचनात्मक पात्र में गूँथती रही है। 'कितने पाकिस्तान' में तो विवेक को जगाने वाली इस अलख जगाती आवाज को कमलेश्वर ने 'कबीर' का नाम ही दिया है। 'हमारा शहर उस बरस' में गीतांजलि श्री ने इसे धार्मिक एवं जातीय पहचान से हीन 'मनुष्य' के कल्याण के लिए कार्यरत बाबू पेंटर का नाम दिया है और अब्दुल बिस्मिल्लाह ने 'अपवित्र आख्यान' में तमाम विसंगतियों और विडंबनाओं से निर्लिप्त हिंदू मुस्लिम साझी संस्कृति की अद्भुत मिसाल बन कर जीती राबयाँ के रूप में व्यक्त किया है तो प्रियंवद ने 'वे वहाँ कैद हैं' में एक सूक्त वाक्य में पिरोया हे - 'ये अँधेरे जैसे-जैसे बढ़ें, तुम अपनी लौ बढ़ाते जाओ'

कबीर सत्य को दो टूक सत्य की तरह स्वीकार करने के पक्षधर हैं। इसलिए जानते हैं कि 'मानस जनम अमोल है, देह न बारंबार' और जब तक 'देह' है, 'विषै विकार' के घर 'मन' को 'मूँड़ने' का जतन करते हैं क्योंकि 'मन मार्या ममता मुई, अहं गई सब छूटि।' साथ ही कोशिश भी करते हैं कि 'औरन को सीतल' करने के साथ-साथ 'आपहु सीतल' करने वाली बानी बोलें ताकि 'मन का आपा' खोकर व्यक्ति जान सके कि 'आपण यौं न सराहिए, और न कहिए रंक / नां जाणौं किस वृच्छ तलि, कूड़ा होइ करंक।' लेकिन आत्मसाक्षात्कार की यह प्रक्रिया इतनी सरल तो नहीं। 'निंदक नियरे राखिए' की गुहार लगा कर अपने 'सुभाय' को बिना साबुन-पानी 'निरमल' बनाने की सतत क्रिया है यह और 'तू तू' करते 'हूँ' को नष्ट करने की साधना। संसार में बुरा देखने के उद्योग में अपने अंतर्जगत में झाँकने की निर्भीकता है और 'मुझ से बुरा न कोय' स्वीकारने की ईमानदारी भी। उल्लेखनीय है कि सत्य का संज्ञान आत्मपरिष्कार की ऊर्ध्व यात्रा को संभव बनाता है। इस यात्रा में 'जागृतावस्था' का बोध है जिसमें मानवीय दुखों को दूर करने की निःशेष चेष्टा में 'रुदन' का भाव अंतर्निहित है -

'सुखिया सब संसार हे, खावै अरु सोवै

दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।'

यह वही भाव है जो 'करुणा' का नाम लेकर गौतम को बुद्ध बनाता है और ऊर्ध्व अंतर्यात्रा को मानव-कल्याण की बहिर्यात्रा से जोड़ 'निर्वाण' तक पहुँचाता है। कबीर संभवतः इसे ही कुंडलिनी जागृत करने की प्रक्रिया बताते हैं। जाहिर है कबीर को जानने का अर्थ है अपने ही अंतस्तल में स्थित 'विवेक' की शक्ति को पहचानना, उसे सक्रियतर करना और दिशानिर्देशक बनाना। यही 'राम' है या 'निरंजन' - मनुष्यता की उत्स शक्ति और यही 'मनुष्य' बनने की प्रेरणा भी। तब आज के सांप्रदायिक द्वेष की लपलपाती आग में स्वाहा होती मनुष्यता को बचाने के लिए कबीर का यही वैचारिक दर्शन ही तो आगे बढ़ कर आता है -

'एक निरंजन अल्लाह मेरा, हिंदू तुरक दुहूँ नहीं मेरा।

राखूँ वरत न मुहरम जाना, तिस ही सुमिरूँ जो रहे निदाना।

पूजा करूँ न निमाज गुहारूं, निराकार हिरदै निमस्कारूँ।

ना हज जाऊँ, न तीरथ पूजा, एक पिछाण्याँ तौ क्या दूजा।

कहै कबीर भरम सब भागा, एक निरंजन सूँ मन लागा।'


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