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कविता

इस शाम की रोशनी कुछ सुनहरी है
अन्ना अख्मातोवा

अनुवाद - सरिता शर्मा


इस शाम की रोशनी कुछ सुनहरी है
अप्रैल की ठंडक कितनी कोमल है
हालाँकि तुम आए हो बहुत बरसों की देरी से,
आओ मैं फिर भी तुम्हारा स्वागत करती हूँ

क्यों नहीं बैठते तुम मेरी बगल में
और खुश होकर देखो चारों ओर
इस छोटी सी नोटबुक में
मेरे बचपन में लिखी कविताएँ हैं

मुझे माफ कर दो कि मैं जिंदा रही और विलाप किया
और सूरज की किरणों के लिए आभारी नहीं थी
कृपया मुझे माफ कर दो, मुझे माफ कर दो क्योंकि
मैं... मैंने तुम्हें कोई और समझ लिया


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