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लेख

इक्कीसवीं सदी का पर्यावरण - खतरे में जीवन
गरिमा भाटिया

अनुवाद - जनार्दन


कैसे निपटा जाए इक्कीसवीं सदी के कचरे से?

पिछले कुछ वर्षों से निश्चित रूप से पर्यावरण के बारे में जागरुकता काफी बढ़ी है और यह शुभ संकेत है - विशेषकर भारत जैसे आबादी बहुल देश के लिए, जहाँ कृषि और उद्योग के कारण धरती पर बहुत अधिक दबाव पड़ता है और इस दबाव के दुष्प्रभाव खतरनाक होते हैं। ऐसी स्थिति में पर्यावरण के मुद्दे को गंभीरता से लेने की जरूरत है ताकि आने वाली पीढ़ी के लिए हम अपने इस सबसे सुंदर ग्रह पृथ्वी को सुरक्षित रख सकें। एक पुरानी कहावत है - 'We do not inherit the Earth from our ancestors; we borrow it from our children!'?

धरती हमारे पुरखों की अमानत नही है बल्कि हमारे अपने बच्चों का कर्ज है हम पर। हमारा हर एक छोटा कदम हमारी धरती और इसके भविष्य को प्रभावित करता है। अगली पीढ़ी के लिए यह हमारा कर्तव्य है कि अपनी पीढ़ी के द्वारा पैदा की गई समस्यायों को सुलझाएँ।

आमतौर पर, पर्यावरण पर हमारी चर्चा शहरों के प्रदूषण और स्वच्छता को लेकर शिकायत के तहत होती है कि कैसे हर छोटी से छोटी जगह कूडे-कचरे से अँटी पड़ी है। हम फुटपाथ पर चल रहे हैं और वहाँ केले संतरे के छिलके, कागज और चॉकलेट बिस्कुटों के प्लोस्टिक रैपर हवा में उड रहे हैं, रिहायशी इलाकों में सडक के किनारे किनारे कूड़े कचरे का गंधाता ढेर लगा हुआ है, सरकार और महानगरपालिका इसे नियंत्रित करने के लिए कितना कम प्रयास कर रही है और हम नाक पर रूमाल दबा कर आगे बढ़ जाते हैं। अगर हम एक पल रुककर इस पर सोचें तो पाएँगे कि ऐसा बहुत कुछ है जिसे एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम स्वयं करके स्थिति को बेहतर बना सकते हैं। आइए, हम अपने समय की गंभीर समस्याओं में से कुछ की जाँच पडताल करें जिन्हें छोटे स्तर पर ही सही लेकिन गंभीरता से किए गए महत्वपूर्ण प्रयासों से हम दूर कर सकते हैं।

कितनी प्लास्टिक थैलियाँ दिन में लेते हैं हम?-प्लास्टिकजन्य प्रदूषण

आप रोज सब्जियाँ या फल खरीदने जाते हैं और हर बार अपने घर से कपड़े की थैली या एक झोला लाना भूल जाते हैं, सब्जी वाला धड़ाधड़ एक एक सब्जी अलग अलग प्लास्टिक की थैलियों में बांधकर आपको पकड़ा देता है, घर आते ही मिनट भर में यह प्लास्टिक कचरे का हिस्सा बन जाता है। आप बडे बडे मॉल से सामान खरीदते हैं, दाल से लेकर मसालों तक सबकुछ आपको प्लास्टिक की थैलियों में सील किया हुआ मिलता है। कई मायनों में सुविधाजनक लगने वाले प्लास्टिक और प्लास्टिक की पैकेजिंग ने हमारे आधुनिक जीवन को बीमार बना दिया है। प्लास्टिक एक ऐसी चीज है जिसे पूरी तरह नष्ट होने में एक हजार साल लग सकते हैं। फिर भी हम इसका अंधाधुंध इस्तेमाल करते हैं और इधर-उधर सड़क पर फेंक देते हैं जिसके खाने से सड़क चलती भूखी गायों की दर्दनाक मौत हो जाती है। ऐसे कई हादसों में गायों की आंतों से पंद्रह से पैंतीस किलो प्लास्टिक निकाला गया। अगर गाय इसे नहीं खाती तो यह इधर उधर फैले रहते हैं। इसमें व्याप्त रसायन भूजल में रिस जाते हैं जिससे पानी जहरीला हो जाता है और कई तरह के रोग फैलने लगते हैं। भारी बरसात में प्लास्टिक से अक्सर नालियाँ जाम हो जाती हैं। यदि प्लास्टिक प्रबंधन पर ध्यान दिया गया होता और मीठी नदी, जिसमें मुंबई का बरसाती पानी प्रवाहित होता है, प्लास्टिक से जाम न हुई होती तो मुंबई में सन् 2005 की मूसलाधार बारिश का इतना खतरनाक दुष्प्रभाव न होता।

ऐसी समस्याओं की सूची बहुत लंबी है। प्लास्टिक का कचरा इतना खतरनाक है कि सुप्रीम कोर्ट को अंततः यह कहना पड़ा कि यह 'टिक टिक करता हुआ टाइम बम' है जिस पर शहरों के नागरिकों को तत्काल ध्यान देने की सख्त जरूरत है।

प्लास्टिक के बैग जिनका उपयोग हम सब्जी आदि खरीदने में करते हैं और काम पूरा होते ही उसे फेंक देते हैं, पर्यावरण के असल अपराधी हैं। जिन प्लास्टिक बैग पर बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का लेबल लगा हो उसे पर्यावरणफ्रेंडली मान कर भ्रमित नही होना चाहिए। यह भी आम प्लास्टिक जितना ही खतरनाक है। बिना सोचे समझे प्लास्टिक के बैग इकट्ठे करते जाने से बेहतर है कि जब भी सौदा सुलुफ खरीदने आप बाहर निकलें तो एक कपड़े का झोला साथ ले लें ताकि प्लास्टिक के भयावह उपयोग से बचा जा सके। अगर आपके पास कोई बैग नहीं है तो किसी भी दर्जी से, घर के बचे हुए कपड़े से, ऐसा बैग सिलवाया जा सकता है। इसके अलावा तहा कर रखने वाले कुछ उपयोगी बैग होते हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल और देखने में सुंदर होते हैं। ऐसे बैग उन कामगार ग्रामीण औरतों को फायदा पहुँचाते हैं जो उन्हें बनाती हैं। पांडिचेरी के एक गैर सरकारी संगठन ‘‘Small Steps’’ द्वारा एक शुरुआत की गयी है। यह संगठन ऐसा झोला बनाता है जिसे तहाकर पर्स में रखा जा सकता है। इसमें एक हुक लगा होता है जिससे इसे आसानी से बेल्ट में भी लगाया जा सकता है।

ऐसा झोला मैं हमेशा अपने साथ रखती हूँ, कुछ मेरी गाडी में भी पड़े रहते हैं। मैं बिना इस कपड़े वाले बैग के कभी बाजार नही जाती। इस संस्था ने मुझे यह नायाब सौगात दी है। मैं अपनी मित्रों को भी इन्हें उपहार में देती हूँ।

'बस, हमारे आँगन से कचरा दूर रहे'-कचराजन्य प्रदूषण

हममें से जो लोग शहरों में रहते हैं, उनकी सोच कचरे को लेकर कुछ अजीब सी होती है। वे मानते हैं कि बस मेरे घर के आँगन में कचरा न रहे। (अंग्रेजी में इसे NIMB सिंड्रोम कहते हैं - नॉट इन माय बैकयार्ड) हम काले रंग की प्लास्टिक की थैली में अपना गंधाता कचरा डाल देते हैं और देख नहीं पाते कि उसके अंदर क्या है। एक बार जैसे ही यह कचरा और दुर्गंध हमारे घर से बेदखल कर दिया जाता है, उसके बाद इस कचरे का क्या हश्र होता है, यह सोचना न हमारे सरोकार का हिस्सा है, न हमारी जिम्मेदारी में शामिल है। बेशक यह किसी और की समस्या बन जाए, उससे हमें फर्क नहीं पडता। हम यह जानना ही नहीं चाहते कि आगे इस का क्या होता है। हमारे लिए यह बड़े इत्मीनान से किसी और की समस्या बन जाता है। हमारे अपने शहरों में बिखरा कचरा कितना खतरनाक हो सकता है, इस विषय पर हम कभी विचार नहीं करते जबकि हम स्वयं इस शहरी गंदगी का एक हिस्सा हैं।

क्या हम इस समस्या का एक हिस्सा है ? जवाब है - हाँ! शत प्रतिशत! फिर इन स्थितियों को बदला कैसे जाए? जबकि इससे हमारे हाथ गंदे हो रहे हैं। इसके समाधान के लिए सरकार या नगरपालिका का इंतजार करना गलत है। समय आ गया है कि हम अपनी नागरिक जवाबदेही को समझते हुए इसको निपटाने की जिम्मेदारी खुद लें। इसके लिए सबसे पहली जरूरत है कि हम यह जानने और समझने की कोशिश करें कि कचरा जब हमारे घर से बाहर जाता है तो इसका होता क्या है। हमें अपने घर के कचरे की जिम्मेदारी खुद लेनी चाहिए जो हमारा पैदा किया हुआ है।

जो कचरा हमारे घरों से आता है - वह गाँव या शहर के बाहर की खाली जमीन पर फेंका जाता है, जिसके आसपास रहने वाले वाशिंदों को हर तरह से नुकसान पहुँचता है। इस्तेामाल कर फेंके गए अंधाधुंध प्लास्टिक, जैवप्रदूषक, मिश्रित कचरे से पैदा हुए रसायन - केमिकल्स - कई तरह की बीमारियाँ पैदा करते हैं और जमीन की तलहटी में पानी के साथ मिलकर पीने के पानी तक को प्रदूषित कर देते हैं। ऐसा पानी न घरेलू इस्तेमाल लायक रहता है, न पीने लायक।

जिनके घरों के नजदीक कूड़े का विशालकाय ढेर पूरे पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है, वहाँ के वाशिंदे बताते हैं कि जहाँ पहले चिड़ियाँ चहचहाती थीं और साफ सुगंधित हवा बहती थी, अब एक परिंदा भी उस जमीन पर नहीं दिखता। वे भी उड़कर साफ हवा और हरे भरे वातावरण में चले जाते हैं, पर वहाँ के इनसान कहाँ जाएँ। उन्हें तो उसी प्रदूषण में रहना पड़ता है। उनकी तो कहीं सुनवाई तक नहीं है।

इस दुष्चक्र को बदलने के लिए हमें कचरे के प्रति अपनी मानसिकता बदलनी होगी। वस्तुतः जिसे हम खराब कहकर अपदस्थ कर देते हैं, उसमें से कचरा कुछ भी नहीं होता। फेंकी जाने वाली हर चीज का मूल्य होता है। जो खाद्य पदार्थ - केले, पपीते, फलों और सब्जियों के छिलके हम फेंक देते हैं, उन्हें पेड़-पौधों के उपयोग में आने वाली बेशकीमती खाद के रूप में तब्दील किया जा सकता है। इन छिलकों को अगर हम घर के एक गमले में मिट्टी की तहों से दबाकर रखें तो तीन से चार सप्ताह के अंदर यह तथाकथित कचरा कीमती खाद में बदल जाता है जो पूरी तरह ऑर्गेनिक और पेड़ पौधों के लिए प्राणदायक है।

प्लास्टिक और कागज हम यूँ ही फेंक देते हैं, उसे भी रीसाइकल कर फिर से उपयोग में लाया जा सकता है, लेकिन उन्हें अगर खाने के अपशिष्ट पदार्थ से मिश्रित कर दिया गया तो आसानी से उसे रीसाइकल - पुनःसंस्कारित - नहीं किया जा सकेगा।

कचरा हमारी संपत्ति बन सकता है!

इसलिए अगर हमें कचरा प्रबंधन में जिम्मेदारी बरतनी है तो हमें अपने घर का कचरा इस तरह अलगा कर रखना होगा कि वह बाहर जाकर भी एक समस्या और परेशानी का बायस न बने। हालाँकि यह थोड़ा विचित्र लगता है लेकिन है बहुत ही आसान। अपनी रसोई में सिर्फ दो डस्टबिन रखें - एक जैवअपशिष्ट पदार्थों जैसे - तरकारी, छिलके, खुरचन, बचे हुए खाद्य अपशिष्ट एवं दूसरा सूखे पदार्थों जैसे - कागज, प्लास्टिक, धातु, पन्नी, खाद्य पैकेजिंग के रैपर। सूखे और गीले कचरे को अलग रख कर इस स्थिति से निपटा जा सकता है।

सूखा कचरा किसी भी स्थानीय कबाड़ी वाले को दिया जा सकता है। आजकल कई शहरों में ड्राई अपशिष्ट पदार्थों के लिए घरेलू संग्रह कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं। आईटीसी इस तरह की एक कंपनी है जो, ''बेकार से बहुमूल्य'' या ''कचरे से संपत्ति'' (Wealth Out of Waste - WOW) जैसा कार्यक्रम चलाती है जिसमें रिहायशी इलाकों से सूखा सामान एकत्र किया जाता है। इनको रीसाइकल कर वह अपने उपयोग के लिए इस्तेमाल करती है, और प्लास्टिक दूसरी कंपनी को बेच देती है जो फेंके गए प्लास्टिक से कोलतार बनाते हैं। सोच कर देखें अगर आप के इस्तेमाल किए गए प्लास्टिक की तरह ही पूरे शहर में बिखरे हुए सारे प्लास्टिक का इतना ही उपयोगी इस्तेमाल हो पाता।

महिलाएँ और सेनेटरी नैपकिन्स

क्या महिलाएँ यह जानती हैं कि वे जो सेनेटरी पैड इस्तेमाल करती हैं और बाद में उसे फेंक देती हैं, उसका क्या होता है? एक आँकड़े के अनुसार एक स्त्री अपने जीवन में औसतन 125 किलोग्राम सेनेटरी पैड का इस्तेमाल कर डालती है। इसके फेंके या जलाए जाने से यह हानिकारक रसायन छोड़ता है। वास्तव में सेनेटरी पैड भी प्रमुख रूप से प्लास्टिक का बना होता है। एक पैड को पूरी तरह नष्ट होने में 500 साल या इससे अधिक साल लग जाते हैं। सेनेटरी पैड के अधिक स्वच्छ और इको फ्रेंडली - पर्यावरण स्नेही - विकल्प उपलब्ध हैं। पांडिचेरी में इको फेम नाम का एक समूह है जो ग्रामीण स्त्रियों को धोने और दोबारा उपयोग मे लाए जाने योग्य सेनेटरी पैड बनाने का काम देकर उनको रोजगार देती है।

स्वच्छता और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का निपटारा

प्रदूषण का एक अन्य प्रकार भी है, जो इलेक्ट्रानिक अपशिष्ट या ई-अपशिष्ट कहलाता है। जिसमें कोई भी इलेक्ट्रानिक सामान, जैसे - लैपटाप, पेनड्राइव, डीवीडी, फ्लापी डिस्क, सीएफएल बल्ब और ट्यूबलाइट आदि शामिल हैं। दो कारणों से इन अपशिष्ट को अधिक महत्व देना जरूरी है - पहला, आजकल बड़ी संख्या में इलेक्ट्रानिक सामग्रियों का उपभोग हमारे द्वारा किया जाता है, दूसरा इन इलेक्ट्रानिक उत्पादों में बेहद विषाक्त रसायन होते हैं, जैसे सीसा और पारा, जो स्वास्थ्य को जबरदस्त क्षति पहुँचाते हैं। इनकी वजह से बच्चे जन्म से ही असामान्य या विकलांग पैदा होते हैं। इसलिए इस अपशिष्ट का उचित निपटारा बहुत जरूरी है। कुछ शहरों में इन अपशिष्टों के पुनर्चक्रण का काम भी हो रहा है। घरेलू स्तर पर इन्हें फेंकते समय हम ध्यान रखें कि खाद्य सामग्री और ई-कचरा अलग-अलग रखा जाए। अगर आपने टूटा हुआ थर्मामीटर या फ्यूज हुआ बल्ब कचरे में मिला दिया तो उसका जहर पूरे कचरे को विषाक्त कर देगा और ऐसा कचरा कहीं भी डाला जाये वह अंततः प्रदूषित माहौल में जबरदस्त बढ़ोतरी करेगा।

पेयजल यानी बोतलबंद पानी?

पानी ही है जो हमारी सुंदर पृथ्वी को जीवन प्रदान करता है। प्रकृति द्वारा यह हमें बहुतायत में यह निःशुल्क प्राप्त है लेकिन इन दिनों शहरों मे पानी की किल्लत आम बात है। कुछ लोगों का मानना है कि अगला विश्व-युद्ध पानी के लिए ही होगा। कई इलाकों में पानी को लेकर राजनीति तेज हो गई है। कई देश और राज्य पानी के वितरण को लेकर आपस में लड़ रहे हैं।

हम सब जानते हैं कि पृथ्वी का 70 प्रतिशत हिस्सा पानी ही है। अधिकांश भाग समुद्र होने के कारण यह पानी खारा होता है और पीने लायक नही होता। इसलिए पानी की बचत और शुद्धीकरण आवश्यक है।

बोतलबंद पानी प्लास्टिक कचरे की बढ़ोतरी में इजाफा करता है और गैर जिम्मेदाराना ढंग से प्लास्टिक की बोतलों को फेंकने से अक्सर गंभीर समस्या उठ खड़ी होती है। अगर आप हिमालय की यात्रा पर निकलें तो प्लास्टिक की बोतलों का विशालकाय ढेर आसपास के प्राकृतिक सौंदर्य को बिगाड़ता हुआ दिखाई देगा। हाल ही के एक अध्ययन में मालूम हुआ कि प्रशांत महासागर में, मानव आवास से दो हजार किलोमीटर की दूरी पर एक सुदूर द्वीप पर ढेर सारे परिंदे मृत पाए गए और उनके पेट में प्लास्टिक की बोतलों के ढक्कन और नुकीले काँच थे। अन्य अपशिष्ट सागर में कहीं दूर बह गए होंगे।

सच तो यह है कि बोतल बंद पानी एक नया फेनॉमिना है और निश्चित रूप से एक अनावश्यक खरीद। आखिर हम इतने बड़े स्तर पर बोतल बंद पानी के आदी कैसे हो गए! ज्यादातर रेस्तराँ और होटलों में फिल्टर या एक्वागार्ड लगे होते हैं फिर भी वेटर को बोतल बंद पानी ऑफर करने की जल्दी रहती है। कारण साफ है - आर्थिक मुनाफा। जो चीज होटलों और रेस्तराँ को मुफ्त में देनी चाहिए उसकी भी वे कीमत वसूल करना चाहते हैं। बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनियाँ भी इसे प्रोत्साहित करती हैं क्योंकि उन्हें मुफ्त में पब्लिसिटी मिल जाती है।

हम शायद इस तथ्य से वाकिफ नहीं हैं कि इन कंपनियों पर आरोप है कि वे धरती से अधिक पानी निकाल लेती हैं जिससे गाँव में रहने वालों के खेतों की सिंचाई के लिए पानी कम पड़ जाता है। बोतलबंद पानी की फैक्ट्रियों से बढ़ता प्रदूषण भी हमारे सरोकार का हिस्सा है। गाँव वाले अपने सिंचाई के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन तथ्यों की जानकारी आम आदमी को न हो इसके लिए ये कंपनियाँ बड़ी रकम खर्च करती हैं। जनता को गुमराह करने के लिए हरित वातावरण स्रजन की छवि का छद्म परोसा जा रहा है। जितनी बार हम बोतलबंद पानी की खरीद करते हैं, एक गलत प्रवृत्ति का समर्थन और गाँव के खेतों के सिंचाई अधिकारों का हनन करते हैं। इसका समाधान आसान है! जहाँ भी हम जाएँ, हमारे साथ पानी की एक बोतल हो, और जब भी संभव हो हम इसे फिर से भर लें। प्लास्टिक की बेहिसाब खाली बोतलें फेंकने में इजाफा न करें।

अपने बगीचे में अपनी खाद डालें-गृह खाद और पर्यावरण

हममें से सभी का यह कर्तव्य है कि थोड़े से प्रयास द्वारा हम अपनी खूबसूरत पृथ्वी को बचाएँ और जो कुछ भी न्यूनतम हमारे लिए संभव है, जरूर करें। इस क्रम में पर्यावरण को तात्कालिक सुरक्षा देने के लिए सबसे जरूरी है - गृह खाद। खाद-निर्माण और कुछ और नहीं बल्कि कार्बनिक और बायोग्रेडेबल (जैव-अपघटक) पदार्थों जैसे - खाद्य, सब्जी और फलों के छिलके, स्क्रैप, चिकन मछली की हड्डियों आदि को पोषक-युक्त खाद बनाना है ताकि इनका उपयोग हमारे पौधों और बागीचों में किया जा सके।

खाद-निर्माण एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। सूक्ष्म जीवों द्वारा समय के साथ, अपने आप ही होता है। घर पर कंपोस्टिंग की प्रक्रिया किसी बड़े बर्तन में या कंपोस्ट बनाए जाने वाले गडढे में या मिट्टी के हंडे में की जा सकती है। सबसे आसान और पापुलर गृह कंपोस्ट यूनिट बैंगलोर का डेली डंप यूनिट है, जो कंपोस्ट बनाने वाले पॉट 'हंडे' का निर्माण करता है और बेचता भी है। ये बड़े आकार वाले मिट्टी के बर्तन होते हैं जिनके ऊपर खूबसूरती से पेंट किया जाता है। देखने में भी ये आकर्षक होते हैं। इसमें असानी से कंपोस्ट बनाया जा सकता है। इसके निर्माण में कोई दुर्गंध नही होती और इस तरह आप पर्यावरण सुरक्षा के एक योद्धा होने की खुशी और गर्व पा जाते हैं। मैंने अपने घर पर पिछले सात सालों तक खाद बनाई है और लैंडफिल में जाने वाला अढ़ाई हजार किलो कचरा बचा लिया।

एक बार आपने कंपोस्ट बना लिया तो आप अपने घर के किचन गार्डेन या टैरेस गार्डेन को पनपा सकते हैं। ताकि आप अपनी ही बेशकीमती खाद से अपने गमलों या गार्डेन में स्वस्थ ऑर्गेनिक सब्जी खुद उगा सकें। पालक, मेथी, पोदीना, टमाटर, नीबू, हरी मिर्च तो आप गमलों में भी उगा सकते हैं। ऐसी सब्जियाँ आपको किसी दुकान या बाजार में नहीं मिलेंगी। कंपोस्टिंग एवं गार्डेन के इस उपयोगी रिश्ते से और मिट्टी से सब्जियाँ उगाने की घर की खेती से आप अपने बच्चों को भी परिचित कराएँ। निश्चित रूप से इसमें उन्हें किसी खेल सा आनंद मिलेगा।

पृथ्वी को ताप से बचाएँ-ग्लोबल वॉर्मिंग (वैश्विक ताप)

वैश्विक ताप के इस युग में, मौसम का मिजाज निरंतर खराब होता जा रहा है। पृथ्वी दिन प्रति दिन गरम होती जा रही है। हमारे ऊर्जा के स्रोत कम होते जा रहे हैं। लगातार जल की कमी हो रही है। यह ग्रीन हाउस गैस - जो मानव द्वारा बनाए गए उद्योगों, एवं शहरी यातायात से उत्पन्न हुई हैं - से ओजोन स्तर लगातार क्षीण होता जा रहा है। नतीजा यह कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है। यह ऐसी प्रक्रिया है जो अप्रत्याशित है। इन हालातों में हमें व्यक्तिगत वाहनों की जगह सामुदायिक परिवहन वाले साधनों का प्रयोग करना चाहिए। एक घर - चार गाड़ियाँ - घर के हर सदस्य के लिए अलग गाड़ी! हम यह सोचते तक नहीं कि हमारे अकेले के आने जाने में हम पेट्रोल और डीजल का कितना धुआँ वातावरण को सौंप रहे हैं। जहाँ तक संभव हो, जल और ऊर्जा की बचत करें। व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर हमें पर्यावरण सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए।

अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक मारग्रेड मीड के शब्दों में - ''समझदार और समर्पित नागरिकों का छोटा सा समूह विश्व को बदल सकता है - इस बात पर कभी संदेह मत करो। दरअसल इनसे ही कुछ उम्मीद की जा सकती है।''


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