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लेख

समकालीन फ्रेंच कविता और उसका विधान
मदन पाल सिंह


जब हम 'समकालीन फ्रेंच कविता' की बात करते हैं तब एक समग्र कविता-काल के संदर्भ में इसकी व्याख्या करते हैं, क्योंकि कविता के काल-विशेष को किसी स्पष्ट लकीर के द्वारा विभाजित नहीं किया जा सकता। यह सही हैं कि किसी भाव विशेष की सांद्रता किसी काल में अधिक होती हैं और किसी काल में विरल। समकालीन फ्रेंच कविता को हम रूमानी (जिसमें ह्यूगो का बार-बार लौटने वाला दर्द) और प्रतीकवादी कविता (रैंबो का चर्चित गद्य-गीत 'सैलाब के बाद' या मलार्मे के दुर्बोध प्रतीकों की दुनिया के संदर्भ में उनका मंतव्य की कविता जनप्रिय उपस्कर नहीं अपितु कला बिंब का समुच्चय हैं) से अलग करके नहीं देख सकते है। और न ही हम इसे अतियथार्थवादी कविता (पॉल एलुआर द्वारा पिकासो की विश्वविख्यात पेंटिंग 'गुएर्निका' पर लिखी कविता, या कवि का दिन-प्रतिदिन की घटनाओं को कविता का रूप देने का तरीका) से निरपेक्ष मान सकते हैं।

संक्षेप में कहें तो समकालीन फ्रेंच कविता किसी न किसी तरह अपने इतिहास का ही अंग है। इसके साथ समकालीन कविता 'निर्वात की संहिता' न होकर समकालीन घटनाओं, द्वंद्व और विकास का भी अक्स है। इनमें से कुछ घटनाएँ जिनका मनोदशा पर तत्काल और दूरगामी असर हुआ, यहाँ चिह्नित की जा सकती हैं, जैसे दादा-वाद (स्थापित मापदंडों की अस्वीकार्यता और नए प्रयोगों के प्रति रुझान), औपनिवेशिक युद्ध (जिनमे फ्रांस के अपने औपनिवेशिक हित थे, अनेक देशों को सभ्य रखना या करने का मत एक ढकोसला था)। और इसके साथ ही फ्रांस में हुई सेक्स क्रांति (1960 और 1980 के बीच तन और मन के पार देखने की इच्छा अर्थात शरीर और आत्मा को सौंपने की स्वतंत्रता)। यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि समकालीन फ्रेंच कविता, विश्व-युद्ध की उस विभीषिका से भी पोषित हुई है जिसमें रक्त ही नहीं बहा बल्कि कलम की स्याही की दिशा और दशा भी बदली।

यहाँ यह निवेदन करना जरूरी लगता है कि हम समकालीन फ्रेंच कविता की बात कर रहे हैं, अतः आधुनिक फ्रेंच कविता का यहाँ विस्तार न किया जाए, जिसके कवि बॉदलेयर, रैंबो, वरलेन, मलार्मे, पॉल वालेरी, जूल सुपरवेई और ऐरी मिशू आदि हैं। इसके साथ ही किसी काव्य-काल पर की गई टिप्पणी और उससे जुड़े रचनाकारों की सूची अपने आप में पूर्णता का दावा नहीं करती क्योंकि कला पर लिखा गया लेख, इंद्रियों की सीमा का भी दर्पण होता है और जितना विस्तार हम महसूस करते हैं, गहराई अक्सर उससे कही अधिक होती है।

फिर भी अनेक सामाजिक - राजनैतिक - सांस्कृतिक उद्देलन जिनका उल्लेख पीछे किया जा चुका है के समांतर समकालीन फ्रेंच कविता का आरंभ सामान्यतः 1950 के इर्द-गिर्द माना जा सकता हैं। जहाँ अनेक पूर्ववर्ती कवियों जैसे पॉल एलुआर, लुई आर्गो, रेने शार, पॉल क्लॉदेल और सें-जॉ पर्स ने कविता की शक्ति और समरसता में अपना विश्वास व्यक्त किया, वहीं जॉर्ज बताई, ऐरी मिशू, अंतोनि आर्तो आदि कविता के इस संस्कार से असहमति व्यक्त करते हैं। और इससे भी आगे समकालीन कविता के एक बड़े पैरोकार एमानुएल हॅकार 'नकारात्मक आधुनिकता' की व्याख्या समकालीन कविता के संदर्भ में कुछ इस तरह से करते हैं कि समकालीन कविता, काव्यशास्त्र से निसृत काव्य-कला के सिद्धांत, भावनाओं, रूप, करुणा आदि से ऊपर होनी चाहिए। वहीं क्लॉद जुर्नो इसे 'अज्ञानता के शिल्प' का नाम देते हैं जिसे अज्ञात को ज्ञात करने के लिए लिखा जाता हैं। यानि इन कवियों और विचारकों के अनुसार कविता, मोक्ष, सांत्वना और भावना से ऊपर हैं और अच्छे-बुरे की पड़ताल या पड़ताल करने का जरिया है।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब अतियथार्थवाद (surealism) का प्रभाव कुछ फीका पड़ना शुरू हुआ, तब 1920 के आसपास जन्में अनेक कवियों की कविताओ का प्रकाशन 1950 के आसपास हुआ। इन कविताओं को जां तारतेल ने अतियथार्थवाद के 'पटाखे और फुलझड़ियों' के फूटने के बाद की कविता कहा था। समकालीन फ्रेंच कविता के प्रारंभिक और प्रतिष्ठित कवि थे - ईव बोनफ़ुआ, आंद्रे दू बूसे, फ़िलिप जाकोत, जॉक दुपै और लोरा गास्पा। इन कवियों की कविता अपने आप में एक नई भाषा और शिल्प लिए थी जिनमें विषय को बिना संदर्भ और पूर्वाग्रह के देखने की दृष्टि मिलती हैं। यानि इनकी कविताओं की जिम्मेदारी बिना लाग-लपेट के सीधे दृश्य और व्यवहार को पकड़ने की थी। यहीं फ़िलिप जाकोत एक नई पारदर्शी भाषा की इच्छा जताते है जिससे आदमी अपने आपको लैस कर दुनिया की कुरूपता और वास्तविकता को देखे। अर्थात ऐसी कविता जो संसार की वास्तविकताओ से संबंध तो बनाए पर पूर्ववर्ती संदर्भो से मुक्त होकर कविता को एक 'क्लासिक पेंटिंग' की तरह प्रकट न करे।

यहाँ कविता में शब्दों का अपना एक खास मतलब है जिसे उनकी चंचलता और सहभागिता के संदर्भ में ईव बोनफ़ुआ अपनी एक कविता में इस तरह चिह्नित करते हैं :


'हमारे शब्द, दूसरे शब्दों को बिलकुल भी नहीं खोजते
वे तो सहभागी होते हैं
एक दूसरे के साथ घुले मिले, समांतर
यदि एक शब्द भी फिसल जाता है
एक दूसरे का साथ वे देते हैं
यूँ कुछ तो हुआ उजाला
हमारी शब्द रचना छितरी-बिखरी
कह सकेंगे शब्दों का उद्देश्य पूर्ण हुआ
उनका संदेश तो पहुँचा'

इन्हीं कवियों में एक जॉक दुपै अपनी कविता में निराशा और कविता की भौतिक बनावट को उच्च शिखर पर ले जाते हैं जहाँ सरसता लगभग विलुप्त है और नीरव एकांत का द्वंद्व अपने चरम पर प्रकट होता है। अपनी कविता 'तेज हवा' में कवि कहता है :


धूप के नीचे बल खाती
सेल्विआ और लाइकेन पौधों के बीच
पहाड़ी पगडंडी ही हमारी नियति हैं
अनंत रात में, नक्षत्रों से अभिसार करती
चोटियाँ हो जाती हैं एक साथ
उर्वर जमीन की अंतिम सीमा पर
जहाँ सारे दल एक दूसरे से मिलते हैं
फिर बीज हमारी मुट्ठियों में फटते हैं
और शोले हमारी हड्डियों में...

इनसे इतर 'रोसफोर स्कूल' का भी अपना महत्व है जिसकी स्थापना 1941 में हुई थी। इसके प्रमुख कवि जॉ बूइये, रेने कादू, मिशैल मनोल, फर्ना मार्क, जॉ रुसलो आदि थे। इन कवियों ने अपनी कविताओं में काव्य - शास्त्र को साधने की सामान्यतः परवाह न करके, संवेदनाओं को सीधे अपनी शैली में अभिव्यक्त करने का रास्ता चुना। इनकी कविताएँ भी शिल्प के संदर्भ में अतियथार्थवाद के आगे के विकास को प्रदशित करती हैं।

इस तरह की भाव-अभिव्यक्ति के बाद करीब 1960 के दशक में अनेक संरचनात्मक प्रयोग (OULIPO : Ouvroir de littérature potentielle) कविता में दिखाई दिए जैसे फ्रेंच गणितज्ञ फ्रांस्वा द लियोनू और लेखक रेमॉ केनों के प्रयोग। रेमॉ केनों ने 10 सॉनेट की एक कविता पुस्तिका तैयार की थी। प्रत्येक पेज 14 पट्टियों में विभाजित था और प्रत्येक पट्टी एक कविता पंक्ति के रूप में चुनी जा सकती थी। कह सकते हैं कि यह शब्दों के साथ तकनीक का ऐसा प्रयोग था जिससे सब्द संयोजन ने एक क्रीड़ा का रूप ले लिया। यद्यपि हम कविता की बात कर रहे हैं पर यहाँ फ्रेंच लेखक जॉर्ज पेरे के उपन्यास का भी उल्लेख किया जा सकता है जिसमें प्रयुक्त किसी भी शब्द में 'E' स्वर का इस्तेमाल नहीं हुआ था। इस संरचनात्मक आंदोलन में जॉक रुबॉ और बेर्ना नोएल का कार्य भी याद किया जाता हैं। बेर्ना जापानी कविता 'तनका' की संरचना से प्रभावित थे। कहने का तात्पर्य हैं कि कविता में अनेक ऐसी संरचनात्मक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया था जिनमें अलग-अलग प्रतिबद्धताओं का पालन करना था। इस तरह अभिव्यक्ति की आजादी के प्रयास तो हुए लेकिन कविता अब भी बंधित थी।

यहाँ कला के अवा-गार्द आंदोलन का उल्लेख करना भी जरूरी हैं जिसने समूचे यूरोप को ही नहीं अपितु इससे इतर अनेक संस्कृतियों को भी प्रभावित किया था। इस शाखा के प्रमुख नाम हैं मिशैल देगी, दानी रोश, मारसलेन प्लेने, पियर गारनिये, बर्नार एदसीएक, फ्रांस्वा दुफरेन और ऐरी शोपे। यहाँ दानी रोश के अनुसार कविता एक ऐसे फोटो की तरह हैं जिस पर फोकस किया जाता है और उसका एक फ्रेम भी होता है जिससे उसे बाकी दृश्यों से काटा जाता हैं। वहीं जॉक रुबॉ के लिए कविता संख्या का समीकरण है। इस आंदोलन के तहत, कविता के साथ अनेक प्रयोग हुए जैसे कविता को चित्र, आकर, संख्या-समीकरण आदि माध्यमों के रूप में व्यक्त किया गया। इसे गियम अपोलिनेर (1880-1918) की 'चित्र-कविता' में पहले ही देख लिया गया था। लब्बो-लुआब यह है कि कवियों ने कविता को फार्मूला के माध्यम से प्रेषित किया। चूँकि कविता का प्रस्तुत या अप्रस्तुत विधान मूलतः भावना से जुड़ा है, ऐसी स्थिति में लोगों को यह तकनीकी पक्ष देखकर आश्चर्य तो हुआ लकिन वे इससे गहरे से जुड़ पाए, इसमें संदेह है। समकालीन कविता में पिएर गारनिये की अवा-गार्द के प्रभाव में रची कविता Drapeau (झंडा) नीचे दी गई है जिसमें अनेक कोणों से अर्थ खोजा जा सकता है, यहाँ : Drapeau = झंडा, Drape = अस्तर / कपडा / पर्दा / लपेटना, Drap = चादर, Eau = जल और सीधा खड़ा अक्ष, समय का सूचक है।

 

शिल्प की विविधता, भाषा-तकनीक और वाद (जैसे मानुएल हॅकार द्वारा सुझाया गया 'उदासीन और निरपेक्ष भाषा' का वाद) के संदर्भ में जां देव, आन मारी अलबियाक, क्लॉद जुर्नो के मत से यह स्पष्ट हो गया कि कविता स्वांतः सुखाय स्तुतिगान न होकर एक सक्रियता है, एक कार्य है जिसमें लॉजिक और व्यावहारिकता हो। लेकिन ये कवि भी मानते थे कि सत्य या वास्तविकता की खोज, शब्दों में या शब्दों के माध्यम से पूरी तरह संभव नहीं है। यानि शब्द, चिह्न या प्रतीकों की प्रतिछाया हैं न कि सत्य के उद्घाटक। फिर भी इसे व्यवहार के साथ जोड़ने की कोशिश क्लॉद जुर्नो के इस रोचक कथन से भी समझी जा सकता हैं, जिसमें वह कहते हैं कि 'उन्हें यह कहना ज्यादा बेहतर लगता है कि भुजा रक्त और मांस से बनी हैं, बनिस्पत इसके कि पृथ्वी संतरे की तरह नीली है'।

1970 की कविता के इस तकनीकी रूप की शुष्कता के समांतर और उसके बाद 1980 के दशक में, 1950 के आसपास पैदा हुए अनेक कवि सामने आए जो अवा-गार्द के समय वयस्क हो रहे थे तथा तमाम तरह के सामाजिक परिवर्तन को कौतहूल से देख रहे थे। ये कवि जहाँ मार्क्सवाद और मनोविज्ञान को काव्य से जोड़कर अपना शिल्प बुन रहे थे वहीं पुराने काव्य से भी दूर नहीं थे। लकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं था कि ये कवि, सोफो, पिंदार या ह्यूगो का अनुशीलन कर रहे थे और भाषा की लय के साथ भावनाओं का साज बजा रहे थे। कहना चाहिए कि ये कवि शुष्क कविता और सरसता के मध्य में थे। उनके काव्य में उतनी रुक्षता न थी जिसे हम पहले के कवियों की कविताओं में महसूस करते हैं। चूँकि इस समय को 'विचारों की नई लहर' से जोड़कर देखा जा रहा था जैसे 'नया इतिहास', 'नया दर्शन', 'नई रसोई और खानपान' तो इस काव्यात्मक लहर को भी 'नए भावगीत' का नाम दिया गया। ये कविताएँ अपने लिए होकर भी दूसरों पर सोचने के मानवीय सरोकारों से लैस थीं। यहाँ रिल्के और मिलोज की भी इस संदर्भ में याद आना स्वाभाविक है। इस काल के कवियों की अपनी पृथक शैली और वैचारिक विविधता थी। इससे पहले विविधता का विस्तार इतना दिखाई नहीं देता। 'नए भावगीत' के प्रमुख कवि हैं - गी गोफेत, जां पियर लेमेर, आंद्रे वेलते, जां-मिशैल मालपुआ, जेम्स साकरे, बेनुआ कोनोर, फ़िलिप देलावो, जां-इव मासों आदि। दूसरी और जॉक रेदा, मारी-क्लेर बान्कार, जॉक दरास आदि ने भी इन कविताओं में महत्वपूर्ण योगदान किया।


जॉक रेदा अपनी कविता में कहते हैं :
मुझे सुनो, मत डरो
मुझे तुम तक कोई बात पहुँचानी है
जिसका कोई नाम नहीं, मेरी भाषा में शब्द नहीं
मैं जानता हूँ जिस भाषा को
बस कोई बात, न कोई विस्तार, न ही गहराई
और बंधनों से भी दूर (बस धीमी और कमजोर)
मुझे सुनो, डरो मत,
कोशिश करो समझने की मेरी चिल्लाहट को...
और कवि गी गोफेत का मानवीय सरोकार उनकी कविता में कुछ इस तरह से प्रकट होता है :
और सबके बाद यही लगा
कि आदमी घर में रहने के लिए बना ही नहीं
वह तो जंगल में बसे
और उस पर भी!
गिलहरी या अफ्रीका के बंदर की तरह नहीं
जो या तो सहमें रहते हैं
या मचाते हैं धमाचौकड़ी,
लेकिन हाँ, पछियों की तरह
लेकिन उस पर भी!
न पीलक चिरैया की तरह बातूनी
न ही नीलू पक्षी* की तरह आवारा
जो करता रहता शैतानी,
न ही, फार्म हाउस का बिगड़ा खूँखार कुत्ता
न एक टूटा दरवाजा जो खड़खड़ करता,
लेकिन हाँ!, एक पछी कि तरह जो लंबी भरे उड़ान
सुदूर गगन में
और सिर्फ नीचे आए जब वह आराम करे
फिर सुदूर की वह दे जानकारी
बदले में वह ताजा रक्त चखे
खुद को झोंकने से पहले
आकाश की शान, गुमनाम खामोशी में...

      (* यूरोप में पाए जाने वाला नीलकंठ की तरह का पक्षी।)

इन दिनों फ्रेंच कविता अनेक फॉर्म में लिखी जा रही है। ज्यादातर कविता मुक्त छंद में है पर भावना के बारीक और व्यापक छंद से मुक्त नहीं। लगता है जैसे अब कविता, चित्रकला के अधिक निकट है। जहाँ छंद कभी अभिव्यक्ति में बाधा बने थे वहीं अब लगता है कि शब्द भी अभिव्यक्ति को नहीं साध पा रहे हैं। अर्थात अब शब्द कूची के रूप में कथ्य के ऐसे चित्र बना रहे हैं जो कभी स्पष्ट होते हैं और कभी कहीं बहुत दूर से दिखने वाले धुँधले दृश्य की तरह भी लगते है। लेकिन इस तथ्य को सिर्फ नकारात्मक तौर पर देखने का मतलब, समकालीन कविता के साथ और खासतौर पर आज की कविता के साथ नाइंसाफी करने जैसा होगा। इसे कविता का संक्रमण काल न कहकर, समाज का संक्रमण काल कहना चाहिए। या दूसरे शब्दों में इसे 'संक्रमण काल की कविता' कहना वास्तविकता के ज्यादा निकट लगता है। यानि कविता यहीं पैदा होती हैं। यही दृश्य जिसे 1981 में जन्में युवा कवि माथ्यास विनसेनो, 2013 में प्रकाशित अपनी कविता 'गाँव में जिंदगी के चेहरे' में दिखाते हैं -


कर्ज, पीले मेजपोश पर रखा टीवी
और भूली-बिसरी पुरानी CD
जो देश और दुनिया की खबरों पर शहीद हो गई हैं,
बेरोजगार भत्ता पाने वालों की बढ़ती संख्या
और असंतुष्ट लोगों की शिकायत
ऐसे ही ग्राहकों की चिल्ल-पों से शराबखाना आबाद है।
गाँव का खस्ताहाल कारखाना
कामगारों को निकाल चुका है
अब आंद्रे को अपनी बारी का इंतजार है
पचास साल के जीवन-अनुभव से पका
अवसाद दूर करने की दवा
साहस से जीने में मदद करती है!
और यही दवा दी जाती है जिससे हम रो भी न सकें!
तो जीवन पहले से ही ऐसा है।
चौका-बर्तन का काम करने वाली जॉन बेहाल,
कभी थोड़ा बहुत काम दिन में
और कभी कभार मिल जाता है रात बेरात
आर्थिक मंदी की लहर
अब उसके खुद के चौका-बर्तन को ही डुबो रही है...
और यहाँ जां पियर भी है
काम से निकाला गया मैनेजर
न कि कंपनी का मालिक,
उसकी सुनवाई भी होगी
लेकिन प्राथमिकता सूची से बाहर।
जनाब जो अपने पुश्तैनी घरेलू व्यापार को बंद करने वाले हैं
बेहिसाब टैक्स
और अजीबोगरीब कायदे कानून, मीन-मेख से आजिज हैं।
जैसा कि कहा जाता है - 'यही जिंदगी है
शिकायत न करो, सीने में गुबार दबाए रहो
और परेशानियों को निगल जाओ'
फिर शाम के 8 बजे, टीवी पर खबर
लोग फट जाते हैं
समाज से जुड़ी योजना, वादे और ढुल्ल-मुल्ल खबरों की तफ्सील पर,
सब लोग परेशानियों से बेजार
अब कोई खास फर्क भी तो नहीं पड़ता...
कर्ज, पीले मेजपोश पर रखा टीवी
और भूली-बिसरी पुरानी CD
जो देश और दुनिया की खबरों पर शहीद हो गई हैं,
बेरोजगार भत्ता पाने वालों की बढ़ती संख्या
और असंतुष्ट लोगों की शिकायत
ऐसे ही ग्राहकों की चिल्ल-पों से शराबखाना आबाद है।
गाँव का खस्ताहाल कारखाना
कामगारों को निकाल चुका है
अब आंद्रे को अपनी बारी का इंतजार है
पचास साल के जीवन-अनुभव से पका
अवसाद दूर करने की दवा
साहस से जीने में मदद करती है!
और यही दवा दी जाती है जिससे हम रो भी न सकें!
तो जीवन पहले से ही ऐसा है।
चौका-बर्तन का काम करने वाली जॉन बेहाल,
कभी थोड़ा बहुत काम दिन में
और कभी कभार मिल जाता है रात बेरात
आर्थिक मंदी की लहर
अब उसके खुद के चौका-बर्तन को ही डुबो रही है...
और यहाँ जां पियर भी है
काम से निकाला गया मैनेजर
न कि कंपनी का मालिक,
उसकी सुनवाई भी होगी
लेकिन प्राथमिकता सूची से बाहर।
जनाब जो अपने पुश्तैनी घरेलू व्यापार को बंद करने वाले हैं
बेहिसाब टैक्स
और अजीबोगरीब कायदे कानून, मीन-मेख से आजिज हैं।
जैसा कि कहा जाता है - 'यही जिंदगी है
शिकायत न करो, सीने में गुबार दबाए रहो
और परेशानियों को निगल जाओ'
फिर शाम के 8 बजे, टीवी पर खबर
लोग फट जाते हैं
समाज से जुड़ी योजना, वादे और ढुल्ल-मुल्ल खबरों की तफ्सील पर,
सब लोग परेशानियों से बेजार
अब कोई खास फर्क भी तो नहीं पड़ता...
कर्ज, पीले मेजपोश पर रखा टीवी
और भूली-बिसरी पुरानी CD
जो देश और दुनिया की खबरों पर शहीद हो गई हैं,
बेरोजगार भत्ता पाने वालों की बढ़ती संख्या
और असंतुष्ट लोगों की शिकायत
ऐसे ही ग्राहकों की चिल्ल-पों से शराबखाना आबाद है।
गाँव का खस्ताहाल कारखाना
कामगारों को निकाल चुका है
अब आंद्रे को अपनी बारी का इंतजार है
पचास साल के जीवन-अनुभव से पका
अवसाद दूर करने की दवा
साहस से जीने में मदद करती है!
और यही दवा दी जाती है जिससे हम रो भी न सकें!
तो जीवन पहले से ही ऐसा है।
चौका-बर्तन का काम करने वाली जॉन बेहाल,
कभी थोड़ा बहुत काम दिन में
और कभी कभार मिल जाता है रात बेरात
आर्थिक मंदी की लहर
अब उसके खुद के चौका-बर्तन को ही डुबो रही है...
और यहाँ जां पियर भी है
काम से निकाला गया मैनेजर
न कि कंपनी का मालिक,
उसकी सुनवाई भी होगी
लेकिन प्राथमिकता सूची से बाहर।
जनाब जो अपने पुश्तैनी घरेलू व्यापार को बंद करने वाले हैं
बेहिसाब टैक्स
और अजीबोगरीब कायदे कानून, मीन-मेख से आजिज हैं।
जैसा कि कहा जाता है - 'यही जिंदगी है
शिकायत न करो, सीने में गुबार दबाए रहो
और परेशानियों को निगल जाओ'
फिर शाम के 8 बजे, टीवी पर खबर
लोग फट जाते हैं
समाज से जुड़ी योजना, वादे और ढुल्ल-मुल्ल खबरों की तफ्सील पर,
सब लोग परेशानियों से बेजार
अब कोई खास फर्क भी तो नहीं पड़ता...

1971 में जन्मी युवा कवि सांदरीन रोतिल तिफेनबाक 'शब्दों में निरुत्तर व्यथा' को अपनी कविता 'एक रात' में इस तरह शब्द देती हैं -


मै नहीं जानती कि
मेरे हाथ मेरी आँखों को पूरा छिपा लेंगे
जिनके नीम अँधेरे में, मैं दुनिया को फिर खोज लूँगी

मैं नहीं जानती कि
मैं कहाँ चकनाचूर करूँ? घर के भेदी इन दोषी आईनों को
जिनमें मेरी छायाएँ प्रेत-सी लहराती हैं...

जो भी हो कविताएँ लगातार लिखी जा रही हैं और काफी हद तक पढ़ी भी जा रही हैं। समकालीन फ्रेंच कविता में अनेक प्रयोग भी हो रहे हैं जैसे ओलिविए कादीओ ने अपनी कविता पुस्तक 'ला आर्त पोएतिक' के माध्यम से किया है, जिसमें कविता का एक हिस्सा काटकर उसको नए रूप में विकसित किया जाता है। और जब हम कविता के लिए जागरूकता की बात करते हैं तो उन अनेक संगठनों का प्रयास याद आता है जो कविता के त्यौहार और समारोह आयोजित करते हैं, जिनमें स्थानीय प्रतिभागियों के साथ बहुत से देसी-विदेशी कवियों को काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किया जाता है। कविता का संगीतमय मंचन भी होता है और कविता की पुस्तिकाओं से लेकर कविता के भारी संकलनों का प्रकाशन भी। यहाँ कह सकते हैं कि जहाँ पहले कविता जनता की जबान पर चढ़कर अपनी धार दिखाती थी वहीं अब कभी-कभी पुस्तक के पृष्ठों में आराम फरमाती-सी महसूस होती है। फिर भी यहाँ कविता के प्रेमी उसे खोजकर पढ़ते भी हैं। अनेक प्रकाशन गृह कविता के प्रकाशन के विशेषज्ञ हैं। पाठ्यक्रम में भी समकालीन फ्रेंच कविता की उपस्थिति में वृद्धि हुई है।

आज के फ्रांस के कुछ कवि हैं : आंद्रे वेर्दे, जां क्लॉद रेनार, लुई कालाफेरत, जां ब्रेतो, बेर्ना देलवेल, जां-मिशैल मालपुआ, मिशैल ऑल्बेक, एमानुएल मोस, क्रिस्चिया विगिए, फ़िलिप बेक, एमानुएल इरिआ, नथाली किनतेंन, ओलिविए कादीओ, पियर अल्फेरी, जेरार नवारे, एरिक सोतु, वालेरी रुजो, क्रिस्तॉफ दोफै, सांदरीन रोतिल तिफेनबाक, माथ्यास विनसेनो, क्लॉदीन एल्फ आदि।

आज के दौर की कविताएँ कभी दूर से और कभी अंदर बिलकुल पास से आवाज देती हैं और यही उनका हस्तक्षेप है जो सतत जारी है। भले ही लोग कविता को 'तारणहार' की मुद्रा में न पाकर निराश हों। यहाँ फ्रेंच कवि सें-जॉ पर्स के नोबेल पुरस्कार समारोह में दिए भाषण के कुछ अंशों को उद्धृत किया जा सकता हैं जिससे कवि और काल के आपसी सरोकारों का खुलासा होता है : 'सच तो यह है कि मानव मस्तिष्क की किसी भी रचनात्मक प्रक्रिया में सर्वप्रथम काव्य का सवरूप ही प्रकट होता है... ज्ञान की अपेक्षा काव्य जीवन जीने का एक तरीका है... कवि प्राचीन काल में गुफाओं में भी रहे थे और इस परमाणु शक्ति संपन्न काल में भी उपस्थित हैं... जब मिथक भग्न हो जाते हैं तब हम उन्हें कविता में खोजते हैं... कवि के लिए इतना ही काफी है कि वह अपने समाज और काल का दर्पण होता है...'

तो कविता को अपने समाज और समय का दर्पण होना चाहिए, जो निडरता से अक्स दिखा भी सके और कवि के साथ खुद का अक्स देख भी सके। इस कथ्य से शायद किसी को आपत्ति न हो।


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