डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

लेख

बांग्ला दलित उपन्यास : अतीत और वर्तमान
कृपाशंकर चौबे


उपन्यास आधुनिक काल की बहुपठित विधा है। बांग्ला उपन्यास की यात्रा उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में आरंभ हुई। बांग्ला में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की उँगली पकड़कर उपन्यास ने जीवन पाया था किंतु उनके उपन्यास के पात्र ऊँचे वर्ग के थे। शरतचंद्र के उपन्यासों में निचले वर्ग की महिलाओं के जीवन का भाष्य मिलता है। शैलजानंद मुखोपाध्याय, प्रबोध कुमार सान्याल, नरेशचंद्र सेनगुप्त और जगदीशचंद्र के उपन्यासों में भी दलित पात्र उपस्थित हुए हैं। मानिक बंद्योपाध्याय, ताराशंकर बंद्योपाध्याय और विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यासों में भी दलित पात्र आए हैं किंतु दलितों की वह खंडित उपस्थिति है। दलित जीवन की समग्र उपस्थिति तो बांग्ला उपन्यास में पहली बार 'तितास एकटि नदीर नाम' में ही दर्ज हुई। इसीलिए 'तितास एकटि नदीर नाम' को बांग्ला के पहले दलित उपन्यास का दर्जा हासिल है। इसके लेखक अद्वैत खुद दलित मालो समुदाय से थे। 1956 में जब यह उपन्यास छपा था, तब तक अद्वैत मल्लबर्मन की मात्र सैंतीस साल की उम्र में अकाल मौत हो चुकी थी। वर्ण व्यवस्था और उसके भीतर से पैदा होनेवाली सामाजिक विकृतियों का मुखर प्रतिरोध इस उपन्यास को नया परिप्रेक्ष्य देता है। 'तितास एकटि नदीर नाम' के प्रथम संस्करण की भूमिका में उनके अनाम मित्रों ने लिखा है, "अस्पताल में भर्ती होने के पहले अद्वैत ने इस ग्रंथ की पांडुलिपि हमें सौंप दी थी। उनके जीते जी हम इसका प्रकाशन नहीं कर पाए। लेखक की मृत्यु के बाद भी कई वर्ष बीत गए क्योंकि अनुकूल अर्थिक सहायता नहीं मिल पाई। जीवन काल में भी उन्हें भयंकर आर्थिक अभाव से गुजरना पड़ा था। दुनियादारों की नजर में उनका यह आर्थिक दबाव उन्हें आत्म नियंत्रण को विवश कर सकता था क्योंकि उन पर कोई पारिवारिक दायित्व नहीं था। वे खुद अविवाहित थे और परिवार में कोई नहीं बचा था किंतु दूर- दराज के रिश्तेदारों ने अद्वैत की दरियादिली को पहचानने की भूल नहीं की। उनकी आर्थिक तंगी का एक और बड़ा कारण संभवतः उनका पुस्तक प्रेम था। भयंकर अर्थाभाव से घिरे रहने के बावजूद वे जीवन भर बहुमूल्य किताबें खरीदते रहे। नृतत्वशास्त्र, समाज विज्ञान, इतिहास और साहित्य में डूबे रहना उनका प्रिय काम था। अद्वैत अपने पीछे किताबों का एक विपुल संग्रह छोड़ गए थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके ग्रंथ साहित्यकार प्रेमेंद्र मित्र के प्रयासों से कलकत्ता की राममोहन लाइब्रेरी को संरक्षण के लिए सौंप दिए गए।"1

'तितास एकटि नदीर नाम' उपन्यास को चार खंडों में बाँटा गया है। प्रत्येक खंड के दो अध्याय हैं। इस तरह कुल आठ अध्याय हैं। प्रथम खंड के अध्यायों के नाम क्रमशः 'तितास एक नदी का नाम' और 'प्रवास' है। द्वितीय खंड के अध्यायों के नाम 'नया ठिकाना' और 'जन्म मरण और 'विवाह, तृतीय खंड के अध्यायों के नाम 'इंद्रधनुष' और 'रंगीन नाव' तथा चतुर्थ खंड के अध्यायों के नाम 'दुरंगी तितली' और 'भासमान' हैं। प्रथम खंड के 'तितास एक नदी का नाम' शीर्षक प्रथम अध्याय में तितास नदी का काव्यमय चित्रण किया गया है। उपन्यास की आरंभिक पंक्तियाँ देखें - "तितास एक नदी का नाम है। उसे दोनों किनारों के बीच जल ही जल है। उसके हृदय पर पानी की प्राणवान लहरें अठखेलियाँ किया करती हैं। वह स्वप्न की गति से बहती है। भोर की हवा से उसकी तंद्रा टूटती है। दिन का सूर्य उसे ताप देता है। रात में चाँद सितारे उसे सुलाने का प्रयास तो करते हैं पर इसमें सफल नहीं हो पाते। मेघना और पद्मा की विभीषिका इस नदी में नहीं है।"2

इसके तीरवासियों की आजीविका इसी पर निर्भर है, गर्मी में विजय सूख जाती है और उसके तटवासी जीविका की तलाश में अन्यत्र भटकने लगते हैं। तितास के किनारे बसे गाँवों के अधिकतर निवासी मालो हिंदू हैं, लेकिन कुछ छोटे-बड़े मुसलमान किसानों का भी वहाँ निवास है। उनमें परस्पर प्रेम और सहयोग है। खेतिहरों और मछेरों की संस्कृतियों में एकता है। बाउल, सूफी और अध्यात्म दोनों संप्रदायों के अपने हैं, खान-पान, रहन-सहन, बोलचाल, भाषा-बोली, मुहावरे सब एक जैसे हैं, सब एक दूसरे के उत्सवों में खुलकर भाग लेते हैं। गाँव का दक्षिण टोला मालो टोला है। इसी टोले के दीननाथ मालो की बेटी बासंती के बचपन के साथी किशोर और सुबल से उपन्यासकार पाठकों का परिचय कराते हुए बताता है कि बासंती की माँ ने तो किशोर को मन ही मन अपना भावी दामाद ही मान लिया था। हटात तितास में मछलियों की मात्रा घटती देख किशोर और सुबल तिलकचाँद नाम एक अनुभवी मछेरे को साथ लेकर उत्तर की ओर प्रवास पर निकल जाते हैं। अनेक स्थानों पर होते हुए वे शुकदेवपुर गाँव पहुँचते हैं। जहाँ किशोर एक किशोरी को पहली नजर में ही देखकर मुग्ध हो जाता है। होली के उत्सव में वे मिलते हैं और उनमें प्रेम होता है। किशोर के साथ उस लड़की की माला बदल रस्म कर दी जाती है। किशोर इस माला बदल से वाकई खुश होता है और उसके लिए इंतजार करती बासंती सुबल के लिए बच जाती है। लेकिन प्रवास से लौटते समय जल दस्यु नाव पर हमला कर देते हैं। वे सोते हुए सुबल, किशोर और तिलक को बांधकर नाव लूटने की कोशिश करते हैं। लेकिन नववधू उनसे बचकर पानी में कूद जाती है और तैरते-तैरते बेहोश हो जाती है। जब सब जागते हैं तो नववधू गायब पाई जाती है। इस आकस्मिक मानसिक आघात से किशोर विक्षिप्त हो जाता है।

बाद का घटनाक्रम यह है कि किशोर की वह माला बदल बऊ अब चार वर्षीय अनंत की माँ बन गई थी। डाकुओं की गिरफ्त से छूट जब वह नदी में कूदी, तब अनंत उसके गर्भ में था। मछेरे की बेटी जबरदस्त तैराक थी। तैरते-तैरते थककर जब वह विजय के किनारे बेहोश पड़ी थी तो उसे गौरांग और नित्यानंद नामक दो बूढ़े सर्वहारा बचाते हैं। ये दोनों अपनी बेटी की तरह उसे सम्मान की सुरक्षा भी देते हैं। चूँकि वह अपने मायके लौटना नहीं चाहती थी और ससुराल से परिचित नहीं थी, बस उसे इतना याद था कि किशोर और सुबल तितास के किनारे बसे गोकन गाँव से आए थे। अद्वैत ने कहीं भी उसके नाम का उल्लेख नहीं किया है। या तो वह किशोर की माला बदल बऊ के रूप में आई है या फिर आमरण अनंत की माँ के नाम से जानी गई है। शायद वह यहाँ मालो औरतों के वर्ग चरित्र के रूप में आई है, जो पुरुष के नाम से जुड़कर ही जानी जाती हैं। अनंत की माँ बाद में सुबला बऊ के गाँव में अपना नया ठिकाना बनाती है। इस गाँव के घाट पर उतरते ही वह एक पागल युवक को उसके बूढ़े माँ-बाप के साथ देखती है, जो उसे नदी में नहलाने के लिए लाए थे। वस्तुतः यही पागल उसका माला बदल पति किशोर था, जो उसी की वजह से पागल हुआ था। घटनाक्रमों में जब अनंत की माँ को इसका पता चलता है तो वह किसी भी तरह पागल के साहचर्य में आना चाहती है और पुरानी स्मृतियों को सामने लाकर उसे पुनः होशमंद बना लेना चाहती है। इसी प्रवास में होली के दिन उसे अबीर लगा देती है, लेकिन इससे किशोर का उन्माद बढ़ जाता है। उत्तेजना में वह उसे गोद में उठा लेकर चिल्लाने लगता है - डाकुओं ने सती को हाथ लगा दिए, बचाओ, मारो आदि। गाँववाले पागल के इस व्यवहार को स्त्री असम्मान समझ लेते हैं और उसकी जमकर पिटाई की जाती है। मार के आघात से किशोर दूसरे ही दिन मर जाता है और इस घटना से आहत होकर पहले से ही थकी, टूटी अनंत की माँ भी चार दिन के बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाती है। भयंकर आर्थिक अभाव के बावजूद बासंती को अनाथ अनंत का दायित्व लेते देखा जाता है लेकिन निरंतर उपेक्षा, मारपीट से उसे यह आश्रय छोड़ देना पड़ता है। अनंत एक नितांत आत्मसम्मानी कल्पनाशील, भावुक, स्वतंत्रचेता बालक है। वह बनमाली और उसकी बहन उदयतारा के साथ उनके गाँव चला जाता है। वहाँ वह अनंतबाला नामक युवती के प्रेम में पड़ता है।

बंगाली समाज में मौजूद 'छुआछूत' और 'जातिप्रथा' के तमाम मार्मिक प्रसंग इस उपन्यास को व्यापक फलक और व्यापक परिप्रेक्ष्य की कथाकृति बनाते हैं। सबसे तात्पर्यपूर्ण यह है कि हाशिए के आदमी को लिखने की कोशिश में ही अद्वैत की यह रचना संभव हुई है। बांग्लाभाषी समाज की विषम संरचना ने सामाजिक दृश्य पट में जो कड़वाहट घोली है, उसकी तीखी और तिलमिला देनेवाली अनुभूति के लिए अद्वैत ने तितास किनारे बसे गाँवों को बैरोमीटर बनाया है जो पूरे बंगाल का बैरोमीटर बन गया है। उपन्यास लिखने के लिए जिस समझ, सामाजिक संरचना, जीवन मूल्य व उसके संघर्ष की पहचान की अपेक्षा होती है, लेखक उस कसौटी पर खरा उतरता है। उपन्यासकार ने इस कथाकृति के जरिए संवेदना और संरचना के संगठन का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है। यह उपन्यास मनुष्य जाति की नियति का भी लेखा जोखा है। सिर्फ मालो समुदाय की नियति की ओर उपन्यासकार ने संकेत नहीं किया है अपितु समूची मानवता के सामने वह यह यक्ष प्रश्न है। यह कहना आवश्यक है कि पहली बार इतनी रचनात्मक अनिवार्यता के साथ किसी उपन्यास में दलित को शामिल किया गया है। वर्णन, विवरण और वृत्तांत इस उपन्यास की विशेषता है। दलित के साथ क्या कुछ घटित हो रहा है और वह कितना भयावह है, इसे लेखक ने गहरी चिंता और गहरी संलग्नता से चित्रित किया है। उपन्यासकार ने बड़ी नावों के साथ छोटी नावों की दुर्दशा को दिखाते हुए ब्राह्मण-संस्कृति के समानांतर दलित-संस्कृति का अत्यंत सजीव और संगीतमय चित्रण किया है। मालोपाड़ा के लोग हरेक दुख-दारिद्र्य के बीच भी अपना गीत-संगीत, संस्कृति को नहीं भूलते। कभी जाल पर नजरें टिकाए मालो युवक तान छेड़ता है - 'पहले थी ब्राह्मण की बेटी/ करती थी शिवपूजा/ पड़ी प्रेम में मछुआरे के/ कैसे कटे पाट की डोरी/ हाय रे क्या यही था मेरे नसीब में,'3 तो औरतें गाती हैं - सखी हे, बिछ गई है फूलों की सेज/ काला चाँद तो अब तक नहीं लौटा।4

कभी तिलक गाता है - 'काशीनाथ जोगीराज नाम तुम्हारा निरंजन/ साथी तुम्हारे भूत-प्रेत/ खेलते हो उन्हीं के साथ/ डमरू और सिंगा लिए तुम नाचते गाते हो उन्हीं के साथ।'5 कभी किशोर दिल खोलकर गाता है - 'नदी किनारे जा बाँसुरी बजाई/ प्रेम के मधु से मन मीठा हो गया/ यह किस कुजगह पाँव पड़ गया/ यह तो खेया घाट नहीं है/ नाविक को तो लंका का बाघ खा गया।'6 पूरे उपन्यास में प्रंसगानुकूल गीत कई हैं जो कथा के प्रवाह को बढ़ाते हैं। लेकिन वह दौर भी आता है जब मालोपाड़ा में अपसंस्कृति का हमला होता है। मालोपाड़ा की समृद्ध लोक-संस्कृति पर बाजारू जात्रा-गान और सखी नाच कब्जा करने लगते हैं। सुबला बऊ गाँव के कुछ स्व-संस्कृति प्रेमी लोगों को नेतृत्व देती है और वे लोक-गीतों की महफिल जमा अपनी संस्कृति को बचाने की आप्राण चेष्टा करते हैं लेकिन मालो लोगों की आपसी फूट के कारण वे उसे बचा नहीं पाते। वह तितास, जो जलजीवियों की जिंदगी थी, हठात सूखने लगती है। नदी के बीच बालू के द्वीप उभरने लगते हैं। सूखी जमीन पर दूर-दराज से आए किसान और जमींदार कब्जा कर लेते हैं। मछेरे न घर के रह पाते हैं, न घाट के। आखिर में एक-एक कर सब भुखमरी के शिकार होकर मर जाते हैं। बस दो लोग बचते हैं - किशोर का बाप रामकेशव और सुबला बऊ बासंती। मृतप्रायः बासंती को नीम-बेहोशी में अपना पूरा जीवन चलचित्र की तरह सामने घूमता दिखाई देता है। उसे अनंत की याद भी आती है कि वह बाबू बना लोगों में भात बाँट रहा है। वह उसकी नजर बचाकर दूर सरक जाती है। लेकिन यह तो उसका सपना था।

उपन्यास में धनी दलितों द्वारा गरीब दलितों के शोषण का प्रसंग दिल दहला देनेवाला है। सुबल जब कालोबरन बैपारी के यहाँ नौकरी करने जाता है और उसकी नाव लेकर मछली पकड़ने जाता है तो नाव तूफान में फँस जाती है और कालोबरन सुबल को आदेश देता है, 'लग्गी के सहारे कूदकर तीर पर पहुँच जाओ। फिर उसे धक्का देकर नाव को बचाओ। तुम्हारे साथ-साथ हम भी आ रहे हैं।' सुबल उनके आदेशानुसार नाव से कूदकर किनारे पर उतर गया लेकिन डर के मारे और कोई नहीं उतरा। सुबल ने लग्गी के एक सिरे को नाव की तरफ बढ़ाया और अपने कंधे से धकेलना शुरू किया जिससे नाव की गति कुछ कम हो जाए लेकिन वह पूरी तरह रोक नहीं पाया। किनारे पर ढलान थी। नाव तेजी से आई और किनारे पर चढ़ गई। सुबल उसके नीचे दबकर इस तरह पिसा कि फिर उठने का सवाल ही नहीं बचा। उसकी बऊ बसंती सोचती कि मालिक के असंगत आदेश पर एक मजबूर नौकर ने उसका पालन करने के लिए खुद को मौत के मुँह में क्यों झोंक दिया?

उपन्यास का एक अन्य मार्मिक प्रसंग है - दो दलित बूढ़ों - नित्यानंद और गौरांग द्वारा किशोर की माला-बदल बऊ को पुत्री मानकर अपने यहाँ आश्रय दिए जाने का। किशोर की माला-बदल बऊ जब दुर्दिन की एक रात बड़ी नदी में मरणासन्न पड़ी थी तो नित्यानंद और गौरांग ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया। अनंत तब किशोर की माला-बदल बऊ के पेट में था। कैसे बिना घाट के भी घाट हो सकते हैं और बिना राहों के भी राह, वैसे ही बिना रिश्तों के रिश्तेदारियाँ भी हो सकती हैं। अनंत जब चार साल का हो गया और उसे व उसकी माँ को दोनों बूढ़े जब तितास के किनारे नए ठिकाने छोड़कर विदा लेने लगते हैं, तो वह दृश्य भावुकता से भर उठता है। किशोर की माला-बदल बऊ या अनंत की माँ उपन्यास में मालो - औरतों के वर्ग-चरित्र के रूप में आई है, जो पुरुष के नाम से जुड़कर ही जानी जाती हैं।

अनंत की माँ की मौत के बाद सुबला बऊ उसे अपने यहाँ ले जाती है। सुबला बऊ को अनंत मौसी कहता है। लेकिन सुबला बऊ की बूढ़ी माँ को यह नागवार लगता है कि उसके घर अनंत रहे। बूढ़ी उसे जलती लकड़ी से मारने की धमकी देती है। एक दिन वह जलती घास से अनंत का चेहरा जलाने जाती है तो उसकी बेटी ही प्रतिरोध करने आ खड़ी होती है और माँ-बेटी में भयंकर मारपीट होती है। उसके ठीक बाद सुबला बऊ अनंत को देखते ही भड़क जाती है - मैंने तेरे लिए अपनी माँ को मारा। शत्रु तू अभी मेरे घर से निकल। अनंत वहाँ से निकल जाता है। बाद में जब वह सुबला बऊ से मिलता है तो एक और मारपीट की घटना घट जाती है। नौका-दौड़ को देखने दूर-दूर से लोग अपनी नावों में लदकर पहुँचते हैं। बनमाली की नाव में उदयतारा के साथ अनंत, अनंतबाला आदि बैठे थे। संयोगवश कुछ देर बाद सुबला बऊ की नाव भी उसकी नाव से आ सटती है। जब सुबला बऊ अनंत को देखती है तो ममता, क्रोध, ईर्ष्या आदि मिले-जुले भावों से भर उठती है। उत्तेजित होकर वह अपनी नाव से कूदकर बनमाली की नाव में आ जाती है। अनंत को लेकर यहाँ दो निस्संतान औरतों की मारपीट और हिंस्र प्रतियोगिता अपने चरम पर दिखाई देती है। इसमें सुबला बऊ पराभूत होती है। हताश होकर वह अपने घर लौट आती है। मुहल्ले में शर्मिंदगी के भय से घर से बाहर निकलना बंद कर देती है। उधर, नौका दौड़ में छादिर की नाव दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। छादिर संपन्न मुस्लिम कृषक कादिर का पुत्र है। दुर्घटना में उसकी जान वनमाली ने बचाई थी। कादिर के यहाँ वनमाली की खातिरदारी होती है। उसे केले के पत्ते पर चिवड़ा और दूध-बताशा खाकर बड़ी तृप्ति मिली। हिंदू-मुस्लिम एका इस कथाकृति की ताकत है। उपन्यास में जाति चले जाने का प्रसंग बहुत रोचक है। अनजाने में एक व्यक्ति की जाति चली जाने की कथा सुनकर रमू दुखी हो जाता है। यह कथा गीत के रूप में इस प्रकार है - 'हाथ में लाठी/ और कंधे पर छाता लेकर/ बुरुज दीर्घ प्रवास पर चल पड़ा।'7 गीत के अनुसार बुरुज चलते-चलते थक गया। उसे भयंकर प्यास लग गई। वह पानी की तलाश में इधर-उधर देखने लगा। सहसा उसे एक घर दिखा। लिपा-पुता, द्वार पर चंदन के छींटे, जरूर किसी ब्राह्मण का होगा। खुद ब्राह्मण होने के कारण एक ब्राह्मण का घर पहचानने में बुरुज को देर नहीं लगी। उसने कदम आगे बढ़ाकर आवाज दी - अरे भाई गृहिणी घर में हो तो पानी ले आओ। बहुत प्यास लगी है। प्रवासी प्यास से मरा जा रहा है। गीत की आगे की पंक्तियां हैं -'दाहिने हाथ में जल की कलसी/ बाएँ में पान का बीड़ा/ कन्या चली पानी पिलाने।'8 बुरुज पानी पीकर तृप्त हो गया। उसने कन्या से पूछा - तुम्हारी जाति क्या है? हम लोग गंध भुईं माली (निचली जाति की माली) हैं। इतना सुनते ही बुरुज पछाड़ खा-खाकर रोता है - माँ-बाप तक मेरी खबर पहुँचा देना। भुंईमालियों के घर मेरी जाति चली गई। इस कथा से दुखी होकर रमू ने बड़े मिस्त्री से पूछा - प्यास लगी, एक गिलास पानी पी लिया और जाति चली गई? जाति चली गई, इस बात को बुरुज ने कैसे जाना? यह सवाल उपन्यास में एक चीख बन जाता है। कथा कहने की शैली, चित्रण की शैली और वर्णन की शैली ऐसी है कि कहना चाहिए कि इस उपन्यास के लिए अद्वैत ने ऐसा शिल्प ईजाद किया है, जो खाल्लिस उनका है। पारदर्शी गद्य की ऐसी ताजगी बांग्ला में अन्यत्र नहीं मिलती। इस उपन्यास की विशेषता है उसकी प्रवाह पूर्णता और पठनीयता। इसका श्रेय लेखक की वर्णन क्षमता और विभिन्न कथा प्रसंगों को गुंफित करने की कुशलता को है। संप्रेषणीयता इस उपन्यास की सार्थकता है। यह उपन्यास भावों के विधान की दृष्टि से भी संप्रेषण गुण से संपन्न है। उपन्यासकार ने अपने मालो समुदाय की भाषा के प्रयोग, गीतों व मुहावरों के प्रयोग द्वारा कथा को अत्यंत प्रवाही और प्रभावपूर्ण बनाने की सफल चेष्टा की है। नदी किनारे गाँवों के जीवन संघर्ष और बोली-बानी पर लेखक की गहरी पकड़ है जो उसे दृश्यमान बनाए रखती है।

उपन्यास में जिस भुखमरी की त्रासदी का वर्णन है, उसे स्वयं लेखक ने बहुत नजदीक से महसूस किया था। पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के कुमिल्ला जिले के गोकर्ण, ब्राह्मणबाड़िया के एक दलित मालो परिवार में पहली जनवरी 1914 को जन्मे अद्वैत मल्लबर्मन जब छोटे थे, तभी उनकी माँ, पिता और भाई गरीबी और भुखमरी की भेंट चढ़ गए थे। अद्वैत के परिवार में उनकी एकमात्र दीदी बची थीं, वे भी दो बच्चों के जन्म के बाद विधवा होकर मायके लौट आई थीं। अद्वैत के परिवार की तरह ही गाँव के दूसरे दलित मालो परिवार भी अत्यंत दरिद्र थे। सवर्ण लोग अद्वैत के गाँव को हेय दृष्टि से देखते थे क्योंकि वे दलित थे और नाव रँगने वालों के रूप में जाने जाते थे। अद्वैत में गरीबी के बावजूद पढ़ने की गहरी ललक थी। कुपोषण के परिवेश में ही उन्होंने प्राथमिक शिक्षा पूरी की। पाँच मील की दूरी तय कर वे स्कूल जाते थे। वहाँ सनातन बर्मन जैसे सहृदय अध्यापक उन्हें मिले। उन्होंने अपने घर में ही अद्वैत के रहने का प्रबंध कर दिया और इस तरह अद्वैत की मिडिल तक की पढ़ाई पूरी हुई। अद्वैत ने 1933 में ब्राह्मणबाड़िया अन्नदा हाईस्कूल से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और बांग्ला भाषा में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने कुमिल्ला के विक्टोरिया कालेज में दाखिला लिया। लेकिन अर्थाभाव के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही रोकनी पड़ी। वे 1934 में कलकत्ता आ गए और जीविका के लिए उन्होंने 'त्रिपुरा', 'नवशक्ति', 'देश,' 'मासिक महम्मदी', 'नवयुग', 'आजाद' और 'कृषक' पत्रिकाओं में काम किया। बाद में विश्वभारती से भी जुड़े। अर्थाभाव ने कभी उनका साथ न छोड़ा। अर्थोपार्जन के लिए काम का अतिरिक्त बोझ अपने कंधे पर लेते रहे। न कभी किसी के सामने हाथ फैलाया, न किसी को अपनी व्यथा सुनाई।

'तितास एकटि नदीर नाम' के बाद बांग्ला के उल्लेखनीय दलित उपन्यास हैं -'पितृवाण' (समरेंद्र वैद्य), 'कलार मंदास' (ब्रजेन मल्लिक) और 'मानुषेर रंग' (ज्योतिप्रकाश चट्टोपाध्याय)। इसके साथ ही जो दलित उपन्यास तो मील का पत्थर साबित हुए हैं, वे हैं - 'उजानतलीर उप कथा' (दो खंड), 'बसत हारिए जाय', 'शिकड़ छेंड़ा जीवन' और 'खोमा नेई'। 'उजानतलीर उप कथा' के लेखक हैं कपिलकृष्ण ठाकुर, 'बसत हारिए जाय' के लेखक हैं श्यामल कुमार प्रामाणिक, 'शिकड़ छेंड़ा जीवन' और 'खोमा नेई' के क्रमशः लेखक हैं -यतीन बाला और नकुल मल्लिक।

'उजानतलीर उप कथा' का पहला खंड 2000 में और दूसरा खंड 2011 में आया। बांग्ला समाज में शूद्रों के जीवन संग्राम पर केंद्रित यह उपन्यास बंगाल के विभाजन के बाद बदले परिदृश्य और एक समूची जाति के सामने खड़े हुए संकट को पूरी मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त करता है। दलितों के दैनंदिन जीवन, उनके सुख-दुख का इतिहास, उनकी पूजा-अर्चना, कुसंस्कार, सामाजिक-राजनीतिक जीवन का सांगोपांग विवरण इस उपन्यास में है। उपन्यास के आरंभ में ही लेखक ने बता दिया है कि उजानतली व उसके आस-पास प्रायः पचास गाँव जिनके पसीने, खून, स्वप्न तथा प्रेम से बने थे, वे सभी शूद्र थे।9 अभिजात्य वर्ग इन्हें चांडाल कहकर बुलाता था। इनकी जो पुरोहिती करते थे, उन ब्राह्मणों को भी दया की दृष्टि से देखा जाता था।10 ऊँचे समाज में उनकी भी हेठी होती थी। शुरू में ही पाठक का परिचय काजल से हो जाता है। काजल के प्रथम बार स्कूल जाने का विवरण है। फिर किशोर से उसकी मित्रता, क्लास में पढ़नेवाले दूसरे लड़कों-लड़कियों का विवरण भी है। मेलों का वृत्तांत है तो गीत-संगीत का भी। लेकिन तभी उस जीवन को नजर लग जाती है। 1947 में देश विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से भारी संख्या में लोगों का पलायन शुरू हुआ। 11 सबका गंतव्य था पश्चिम बंगाल। बनगाँव, बगुला, रानाघाट, कृष्णनगर से लेकर हिली स्टेशन तक तिल रखने की भी जगह नहीं।12 सारे रेलवे स्टेशन शरणार्थियों से अटे पड़े। बीच-बीच में लारी आती और लोगों को लादकर किसी अस्थायी कैंप में ले जाती। रेलवे स्टेशन से निकलकर कोलकाता के फुटपाथ भी लोगों से पटने लगे। सिर छुपाने की जगह छोड़िए, स्नान और शौच तक की सामान्य व्यवस्था तक नहीं। महिलाओं की दुरावस्था तो सोची भी नहीं जा सकती। शर्म को विसर्जन देने के अलावा उनके पास दूसरा कोई चारा न था।13 पीने के पानी के लिए भी लंबी कतार लगानी पड़ती थी। धक्का-मुक्की और मारामारी के बाद एकाध बाल्टी पानी मिल जाता तो पूरे परिवार को उसी से पूरे दिन काम चलाना पड़ता। तीन-चार दिन बाद ही नहाने लायक पानी मिलता। चारों ओर मैल और कचरे की दुर्गंध। सब मिलाकर एक नरक का चेहरा।14 उन सबकी तुलना में बनगाँव बहुत अच्छी जगह है। वहाँ स्टेशन के समीप ही खुले मैदान, जंगल और तीन-तीन जलाशय हैं। भोजन मयस्सर हो अथवा नहीं, सिर डुबोकर स्नान की सुविधा तो यहाँ है। बनगाँव स्टेशन तक पहुँची उस पार की महिलाएँ उन्हीं जलाशयों में स्नान कर आतीं। कुछ तो प्लेटफार्म पर ही चूल्हा जलाकर भात भी पका लेतीं। कब किसको कहाँ से बुलावा आएगा, किसी को नहीं पता। पता नहीं कि कब घोषणा होगी कि फलाँ नंबर से फलाँ नंबर तक के लोग फलाँ नंबर लारी पर चढ़ जाएँ। कांकसा, धुबुलिया, कुपार्स अथवा बलागढ़ के ट्रांसिज कैंप में जाना होगा। उस पार से आनेवाले शरणार्थियों के लिए बनगाँव स्टेशन को खाली करना होगा। 15 कुल मिलाकर स्थितियाँ हर तरह से प्रतिकूल हैं। किंतु तब भी उनकी जिजीविषा द्रष्टव्य है। काजल ने सुरेन हाल्दार से कहा था, "स्थितियाँ प्रतिकूल हैं तो क्या हम हार मान लें? इस तरह मरनेवाली जाति से हम नहीं आते। यदि कहीं मिट्टी मिल गई तो वहीं ठिकाना बनाएँगे और नए ढंग से खड़े होंगे। 16 और पूरा उपन्यास इन दलितों के खड़े होने की गाथा ही कहता है। बीच-बीच में कई गीत हैं तो उपन्यास के प्रवाह को बनाए रखने में बहुत सहायक हुए हैं - "अबूझ मन आमार/ आमि कैन बा छेड़े एलाम रे बाड़ी घर। उरे बेनापालेर स्टेशने आमार केड़े निलो गलार हार।"17 अथवा यह गीत - स्वाधीन देशे लोक पालाइल एमन खबर शोनेछो नि? बाप दादार उई भिटा छाइड़ा चलेछो सब विदेशे की? हिंदू मुसलमान एक जाति भाई एक देहे दुइडा हाथ/ केउ कारु नय शत्रु रे भाई दुए दुए मित्तिर हय। उ भाई परेर कथाय परेर भरसाय छाइड़ो ना देश माथा खाउ।18 यह गीत हिंदू-मुसलमान भीड़ लगाकर सुनते हैं। इसके ठीक बाद उपन्यासकार बताता है कि किशोर के मुख से काजल ने सुना था कि ढाका जाकर जब जिन्ना साहब ने घोषणा की कि उर्दू ही होगी पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा तो मुस्लिम छात्रों ने चीखकर माँग की थी कि मातृभाषा बांग्ला चाहिए। तथ्य है कि पाकिस्तान बनने के पहले ही यह बहस छिड़ गई थी कि वहाँ की राष्ट्रभाषा क्या होगी। उस बहस की परवाह किए बगैर पाकिस्तान के तत्तकालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने 1948 में घोषणा कर दी कि देश की राष्ट्रभाषा उर्दू होगी। इस घोषणा की पूर्वी पाकिस्तान में जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई। वहाँ बांग्ला को राजभाषा बनाने की माँग को लेकर आंदोलन छिड़ गया जिसे चलाने के लिए ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने राष्ट्रभाषा संग्राम परिषद का गठन कर 11 मार्च को बांग्ला राष्ट्रभाषा दिवस मनाने का ऐलान कर दिया। उस ऐलान के अनुरूप सड़क पर उतरे आंदोलनकारियों पर लाठी चार्ज हुआ और आँसू गैस के गोले छोड़े गए। इससे भाषा आंदोलन दबने के बजाय और तेज हुआ और तीन वर्ष बीतते न बीतते छात्रों का वह संघर्ष वृहद राजनीतिक आंदोलन में तब्दील हो गया। 21 फरवरी 1952 को ढाका में कानून सभा की बैठक होनी थी। उस सभा में भाग लेनेवाले प्रतिनिधियों को ज्ञापन देने का फैसला भाषा आंदोलनकारियों ने किया। धारा 144 लागू कर दी गई। तब भाषा आंदोलनकारियों ने दस-दस के समूह में कानून सभा की बैठक के स्थल पर जाने का फैसला किया। आंदोलनकारियों ने जैसे ही ढाका विश्वविद्यालय से निकलकर राजपथ पर आना प्रारंभ किया, सशस्त्र पुलिस वाहिनी ने बल प्रयोग करना शुरू कर दिया। फिर भी भाषा आंदोलनकारी आगे बढ़ते रहे। पुलिस ने भी बल प्रयोग जारी रखा। ढाका विश्वविद्यालय मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों का प्रांगण लड़ाई के मैदान में बदल गया। जनता आंदोलनकारियों के साथ तनकर खड़ी हो गई। पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू की। अधिकृत तौर पर कहा गया कि चार लोग मारे गए किंतु कहते हैं किंतु सही तथ्य साठ साल बाद भी अनजाना है क्योंकि कई शव गायब कर दिए गए थे। घायलों की संख्या तो इतनी थी कि मेडिकल कालेज का इमर्जेंसी वार्ड छोटा पड़ गया था। बांग्लादेश के लेखक महबूब उल आलम चौधरी ने इस घटना पर कविता लिखी - 'रोने नहीं आया हूँ, फाँसी की माँग लेकर आया हूँ।' हसन हफीजुर्रहमान की कविता का शीर्षक ही है - 'अमर इक्कीस।' अब्दुल गफ्फार चौधरी का गीत है - 'मेरे भाइयों के रक्त में रंगी इक्कीस फरवरी।' फायरिंग की घटना से कानून सभा की बैठक से कई सदस्य उठकर चले गए। अंततः बैठक स्थगित करनी पड़ी। विरोधी कांग्रेस सदस्य ही नहीं, मुसलिम लीग के सदस्य भी उस घटना की निंदा के लिए विवश हुए। ढाका मेडिकल कालेज के उस प्रांगण में लोगों का तांता लग गया, जहाँ लोग भाषा शहीद हुए थे। शहादत स्थल पर जमा लोगों ने रातों-रात एक शहीद मीनार बनाई। भारी संख्या में हर भाषा, संप्रदाय, धर्म के लोगों के जुटने से एक शक्ति बन गई। शोक ने बांग्ला भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए शक्ति जुटाने का काम किया। पुलिस फायरिंग की घटना के बाद पूर्वी पाकिस्तान के लोग हर वर्ष 21 फरवरी को भाषा शहीद दिवस के रूप में मनाने लगे। 21 फरवरी हर बांग्लाभाषी के जीवन संग्राम की प्रेरणा का प्रतीक बन गया और स्रोत भी। भाषा से संस्कृति, संस्कृति से स्वायत्तता और स्वायत्तता से स्वाधीनता की माँग उठी। इस तरह पूर्वी पाकिस्तान के भाषा आंदोलन ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का रूप लिया और एक नए देश का जन्म हुआ।

उपन्यासों के अलावा जो दलित कहानी संग्रह बांग्ला में समादृत हुए हैं, वे हैं - 'नेपो निधन पर्व' और 'गंडीर बांधे भांगन'। इन दोनों संग्रहों के रचयिता हैं यतीन बाला। गौतम अली का कहानी संग्रह 'जतुगृहेर छाई', विमलेंदु हाल्दार का संग्रह 'आकाश माटी मन', राजू दास का 'ब्रात्यजनेर गल्प', नकुल मल्लिक का 'महासिंधु' और 'निर्वाचित गल्प', श्यामल प्रामाणिक का 'खिलि पानेर मेय' और कपिल कृष्ण ठाकुर का 'अन्य यहूदी' भी बांग्ला दलित कहानी के बदलते मिजाज के द्योतक हैं। ब्रजेंद्रनाथ मल्लिक, गौतम शौंड और अचिंत्य विश्वास की कहानियाँ भी दलितोद्धार की कामना में रची गई हैं।

 

संदर्भ ग्रंथ

1. तितास एकटि नदीर नाम - अद्वैत मल्लबर्मन, नेशनल बुक एजेंसी प्रा.लि., प्रथम संस्करण - जनवरी 2013, पृष्ठ-5

2. तितास एकटि नदीर नाम - अद्वैत मल्लबर्मन, प्रथम देज पब्लिशिंग संस्करण - जून 2013, पृष्ठ-17

3. तितास एक नदी का नाम - अद्वैत मल्लबर्मन, हिंदी अनुवाद - चंद्रकला पांडेय, जय कौशल, मानव प्रकाशन, कोलकाता, संस्करण - 2014, पृष्ठ-39

4. वही पृष्ठ-50

5. वही पृष्ठ-69

6. वही पृष्ठ-57

7. वही, पृष्ठ-256-257

8. वही, पृष्ठ-257

9. उजानतलीर उपकथा (उपन्यास), प्रथम खंड, लेखक - कपिल कृष्ण ठाकुर, प्रकाशक - चतुर्थ दुनिया, कोलकाता, संस्करण - 14 अप्रैल 2000, पृष्ठ-11

10. वही पृष्ठ-11

11. उजानतलीर उपकथा (उपन्यास), द्वितीय खंड, लेखक - कपिल कृष्ण ठाकुर, प्रकाशक -निखिल भारत, कोलकाता, संस्करण - 26 जनवरी 2011, पृष्ठ-16

12. वही पृष्ठ-16

13. वही पृष्ठ-17

14. वही पृष्ठ-17

15. वही पृष्ठ-17

16. वही पृष्ठ-23

17. वही पृष्ठ 18

18. उजानतलीर उपकथा (उपन्यास), प्रथम खंड, लेखक - कपिल कृष्ण ठाकुर, प्रकाशक -चतुर्थ दुनिया, कोलकाता, संस्करण-14 अप्रैल 2000, पृष्ठ-199


End Text   End Text    End Text