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कविता

हिमालय की सुनामी
सुकृता पॉल कुमार

अनुवाद - सरिता शर्मा


उस पुराने कंबल में खुले छेद
बोलते थे भाषा गहरी आहों की
भूख और अभाव की

जबकि कंबल के एक छोर से
बाहर झाँकता
छोटा सा सिर -
खुद सुकरात का है
सवाल उठाता है जो
विकास के मानदंडों पर
तारकोल की चिपचिपी सड़क के पार लेटे हुए
गूँजती हुई मनहूस सुरंगों के अंदर से
पहाड़ों पर टेढ़े-मेढ़े दौड़ते हुए

केदारनाथ नामक शहर की ओर
जहाँ तीर्थयात्री बन जाते हैं
आँखों में छेद वाले भूत
अपने विश्वास
या उसके न होने
को जताते हुए।


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