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कविता

सपनों को पकड़ने वाला
सुकृता पॉल कुमार

अनुवाद - सरिता शर्मा


मुझे जंगल में समय पर पहुँचना होगा
हर दिन पौ फटने से पहले
धुँधले अँधेरे में बिखरे हुए
कुछ सपने पकड़ने के लिए

मुझे पहुँचना होगा
उन पेड़ों की पत्तियों पर
सूरज निकलने से पहले
जिन पर सपनों को ढेर लगा है
रात भर के लिए
शाखाओं पर जिनका बसेरा है

सपने - अधदेखे सपने, पूरे सपने
और वे सपने जिन्हें देखा जाना है
जन्मे और अजन्मे,
ध्यान दिलाने के लिए छटपटाते

नींद में अजीब से चेहरे बनाते बच्चों की तरह

मैं उन्हें चुनता हूँ जो मेरी कल्पना को तरंगित करते हैं
गोधूलि में घुलते हुए
मेरे दुखद अतीत और
सायादार भविष्य के टुकड़े
सूर्योदय के साथ गायब होने के लिए तैयार
ओस की बूँदें

हर दिन मैं एक बोरा भर सपनों के
साथ घर आती हूँ
जो मेरे और सभी के लिए
दिन से टपकते रहते हैं

हर रात
मैं नई सुबह की प्रतीक्षा करती हूँ।


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