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कविता

परिवर्तक
सुकृता पॉल कुमार

अनुवाद - सरिता शर्मा


मैंने लाफिंग बुद्ध के
उस बूढ़े चेहरे पर
मासूमियत को देखा
जो अचानक आँसुओं से तर हो गया और
जिसने अपार आनंद की धाराओं को
गहरी झुर्रियों से ढुलकने दिया

उनकी भृकुटी के बीच टिकी
संगीत की सब बाईस श्रुतियों ने
नाद और अनहद के बीच
अपनी-अपनी तान में
एक सुर में गाया

भीतरी कान ने
दर्द और खुशी की
एकताल में गूँजती हुई
चुप्पी साध रखी थी
जो ध्वनि में नहीं
बल्कि श्रुति मंजरी के
रंग और छवियों में और
संगीत की भाषा बोलने वाली
तस्वीर में ढल गई।


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