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आत्मकथ्य

आईने के सामने
अमृतलाल नागर


अपनी गद्दी पर बैठ गया। कागज, कलम सँभाली, पर लिखने न बना। क्‍या लिखूँ? स्‍मृतियों का हुजूम मन की दृष्टि के आगे से गुजर रहा है। मैंने बीते 46 वर्षों में कितने रंग अपने ऊपर चढ़ाए, कितने उतारे और कितने मेरे भीतर से खिले, निखरे, इसका हिसाब भला चटपट कैसे हो सकता है। एक रेखाचित्र - अधिक से अधिक एक रंगीन रेखाचित्र बनाने की गुंजाइश है - चलो, यों ही खेलूँ, नाक-नक्श बनाऊँ, आँखें कान-सिर पूरा स्‍वरूप आँकूँ।

मेरे सिर पर बाल घने हैं। नाई जब काटता है, त‍ब तो बहुत से सफेद बाल भी सामने आ जाते हैं, पर जाहिरा तौर पर काली रैन में दिन के उजाले से छिपे रहते हैं। चाँद में हल्‍का गंजापन भी घुन की तरह लग चुका है। लेकिन शुक्र है कि अभी कोई भाँप नहीं पाता। कानों के पास दशरथ महाराज को चौंकानेवाले कुछ सफेद बाल अवश्य ही पास बैठनेवाले को दिखलाई पड़ सकते हैं। माँग बीच से दो फाँकों विभाजित करता हूँ। पहले सीधे बाल काढ़ता था, फिर एक बार दिल की मजबूरी से दिमाग में बँटवारे का समय आया तो, बीच से माँग काढ़ने लगा। मराठी भाषा में 'माँग' को 'भाँग' कहते है यानी भंग करना। वो बँटवारा तो अब फिर नए 'समन्‍वय' में लय हो गया है, पर माँग ज्‍यों की त्‍यों भंग होती है। यों सिर पर रोज ही शाम को भंग भवानी भी लहराती हैं। लत है - इल्‍लत ही सही - अब कोई क्‍यो करे?

कपाल बहुत चौड़ा नहीं, बहुत सँकरा भी नहीं। कभी पूजा-प्रसंग में रोली या चंदन का टीका लगाता हूँ तो फबता है। बहुत सँकरे कपाल पर यह बिंदी या गंजी चाँद से मिले चौड़े कपालों पर टिका चुगली खाता है, यह प्रमाण है। दाहिनी भौं के ऊपरवाला भाग कुछ उभरा हुआ है, उस पर काला तिल है। ज्‍योतिषी बताते हैं कि शनि का प्रभाव है, उम्र के 49वें बरस में सितारे सा चमकेगा। काश, ऐसी कोई तरकीब होती, जिससे आयु के तीन वर्ष आज ही बढ़ जाते! काल अपनी गति से चलता है। खैर, भँवें घनी और काली हैं। अपनी आँखें मुझे अपेक्षाकृत छोटी लगती हैं। मैं बड़ी और रसीली आँखों का आशिक हूँ। एक बार पान में चूना कुछ तेज लग जाने पर परम प्रिय बंधुवर नरेंद्र जी ने ताना दिया कि चूना लगाना मेरा स्‍वभाव है। इस पर आदरणीय पंत जी कह उठे - "नहीं, बंधु की आँखों में यह बात नहीं, चुटकी में होगी।" इससे बड़ा प्रमाण भला क्‍या दूँ? हाँ, कच्‍चापन कह दूँ। मेरे जान पहचानी एक पुराने खाँ साहब यह कहा करते थे कि लखनऊवालों में और कोई नहीं, पुराने खाँ साहब कहा करते थे कि लखनऊवालों में और कोई नहीं, महज नजर का ऐब होता है। मेरी नजरों में वह रोमानी ऐब कहीं कोने कतरे से चोर-सा झाँकता हुआ अब भी नजर आ जाता है। एक हविस के तौर पर। वैसे अब मेरी दृष्टि बहुत साफ हैं। उसमें में विद्रोह और प्रश्‍न की-सी पैनी चमक सहज नेह की आब के साथ-साथ मिलती है। आँखों की पुतलियाँ तो अभ्‍यास क्रम से अब अपनी चंचलता छोड़कर स्थिरता पा गई हैं, पर उनके अंदर प्रकाश किरणों की गति अब भी बड़ी चंचल है बल्कि अब तो उसकी तीव्रता और क्षिप्रता की मुझे तड़पाती है। इस रूप में प्रकाश भी क्रमशः व्‍यापकता और गहराई से केंद्रीभूत हो गया है, पर अभी हुआ नहीं।

गालों की हड्डियाँ उभरी हैं। विद्रोही व्‍यक्तित्‍व की सूचक हैं। नाक, नुकीली है, देख कर कोई भी समझदार यह मान जाएगा कि नाकवाला है और नाक के बालोंवाला भी है। होंठ न पतले, न मोटे, मुँह छोटा, निचले होंठ पर एक तिल भी है। अनुभवी लोगों से सुना है कि ऐसे तिलवाले को रसीले भोजन, पानों और रसीले होंठों का सुख मिलता है। मैं अपना अनुभव भी उसमें जोड़ता हूँ। होंठों पर पान की छवि तथा सहज मुस्‍कान की रेखा प्रातः हर समय अंकित रहती है। दाँत पानों के प्रताप से काले तो हुए हैं, पर दिन में दो बार मंजन करने की आदत ने उन्‍हें दिखनौट में भद्दा नहीं बनने दिया। कान बड़े हैं, उनकी लवें आगे की ओर झुकी हुई है। कहते हैं कि बड़े कानोंवाले की आयु लंबी होती है। मेरे पिता के कान भी बड़े थे, लेकिन 40 होते न होते वे स्‍वर्गवासी हो गए। लिहाजा अपने कानों को जानबीमा की सनद नहीं मानता। ठोड़ी नुकीली और आगे की ओर उभरी हुई है। मेरे हठी स्‍वभाव की परिचालक है।

सब मिलाकर चेहरा बुरा नहीं हैं, लोगों का ध्‍यान एक बार तो अपनी ओर खींच लेता है। कुछ औरतें भी इस पर रीझ चुकी हैं। तसल्‍ली है। सबसे बड़ी तसल्‍ली तो इस बात की है कि मेरे चेहरे पर इश्‍क फरमाते रहने को धंधा या लफंगापन अपना साइनबोर्ड नहीं टाँग पाया। देखते ही किसी को विश्‍वास हो जाएगा कि आदमी भला और शरीफ है। लेकिन आईने के सामने 'जो मुख देखा अपना, मुझ-सा बुरा न कोय'।

सब मिलाकर यों तो मैं खुश रंग हूँ पर अपने बदरंग भी नजर आते हैं। मैं पत्‍थर पर उकेरी गई ऐसा मूर्ति हूँ, जो कहीं-कहीं अनपढ़ छूट गई हो - ऐसी कि बुरा लगे। क्‍यों यह सुंदर मूर्ति अधूरी रह गई, क्‍यों पूरी नहीं हुई? इसकी झुँझलाहट मेरे निकट आनेवाला हर व्‍यक्ति अनुभव करता है। मेरे बड़े प्रेमियों और अंतरंगों को भी अकसर झटका लग जाता है। मुझ में कहीं एक आँच की कसर रह गई है। अपने भीतरवाली वह 'कहीं' मैं अब जानने लगा हूँ और वहीं जूझ भी रहा हूँ। इसकी तस्‍वीर तो जीवन पूरा होने पर ही पूरी हो सकती है। लिहाजा हार-जीत के परिणाम की बात नहीं जानता। अब पश्‍चात्ताप वाला प्रारंभिक वर्षों का स्‍वभाव भी बदल चुका है। वह हार की निशानी थी। मैं उस चींटी की तरह हूँ, जो बार-बार गिरने के बावजूद चढ़ती है। हार-जीत की बाजी प्राणों को उमंग देकर लड़ाती तो है, पर हार अब उतना निराश नहीं करती। 'दर्द का हद से गुजरना है दवा है जाना' यह उक्ति सच्‍ची है। फल की आशा से स्‍फूर्ति में भर-भरकर जान लड़ा-लड़ा कर काम किया, दिया - स्‍वप्‍न देखे। जब मेरी आशा फलवती न हुई तो कुंठित होता था। बरसों यह राग रहा। इसके ऊफान के बाद फिर जब किए हुए काम पर नजर जाती, तो संतोष मिलता था। अब तो यह जानता हूँ कि आत्‍महत्‍या कर नहीं सकता, इसलिए नियत आयु तक जीना है। काम न करूँ तो जियूँ कैसे। इसलिए शांत हूँ, अपनी मौज में फल की ओर से लापरवाह हो चला हूँ। अपनी लगन के लिए अपनी प्रबल उमंग को सीधे रखना ही मेरी एक मात्र महत्त्वकांक्षा है। लिखने-पढने के समय तो बात ही न्‍यारी है, यों भी चाहे बच्‍चों के साथ खेलूँ या नाटकों के रिहर्सल कराऊँ, चाहे पुरातत्त्‍व की झोंक में टीले खंडहर झाँकूँ या गली-कूचों में बड़ी-बूढ़ियों से, बूढ़ों, तजरबेकारों से इंटरव्‍यू लेता हूँ। कमोबेश हर काम में अपना प्राण स्‍पर्श कराने का अब अभ्‍यस्‍त हो गया हूँ। उसी की मस्‍ती है, बदमस्ती तनिक भी नहीं है। इस मस्‍तीजनक शांति रस को यदि रंग दूँ तो अपनी शैव आस्‍था के अनुसार भस्‍मावृत श्‍याम, चाँदनी-भरे आकाश जैसा दूँगा। स्‍वयं प्रकृति ने ही मेरा पोर्ट्रट विविध रस-रंगों के प्रज्‍वलित अणुओं की सचल बुंदकियों और रेशों से रँगने के बावजूद मेरा सर्वव्‍यापी भाव प्रभाव शांत ही अंकित किया है। मैं अब यह जानने लगा हूँ कि प्रकृति को पहचानकर उसके अनुसार ही ढल जाना ही प्रकृति पर विजय पाना है।

महत्‍वकांक्षाओं की लाली भी मुझमें चमकती है, धन की लालसा है, पर धन कमाने की महत्त्‍वकांक्षा नहीं। यश और आदर का सदा से भूखा रहा। काम की लगन पा लेने के बावजूद वह भूख आज भी कभी-कभी सताती है। मेरी एक तमन्‍ना जरूर है कि एक दिन अपनी किताबों की रायल्‍टी पर ही निर्वाह करने लायक बन जाऊँ। जी चाहने पर किताब खरीद सकूँ, घूम सकूँ। अपनी फिल्‍म कमाई में मैंने यही सबसे बड़ा सुख और संतोष पाया था। मुझे किताबों की आमदनी, पत्र-पत्रिकाओं से फुटकर रचनाओं का आया हुआ पैसा जैसा गर्व-भरा संतोष देता है वैसा और कोई धन नहीं। मैंने स्‍वेच्‍छा से फि़ल्‍म और रेडियो की आमदनी छोड़ी, किसी ने मुझे मजबूर नहीं किया था। सच पूछो तो बस एक ही साध है, लिखते-लिखते कोई ऐसी चीज कलम से निकल जाए कि मैं सदा के लिए इनसान के दिल में जगह पा लूँ। इस लगन का रंग गुलाबी या हल्‍का लाल नहीं, बल्कि गहरा लाल है - खू़न का रंग।

शैव, आस्तिक हूँ, घरेलू संस्‍कारों से। धार्मिक हूँ अपने ढंग से। मेरा किसी धर्म, किसी जाति से परहेज नहीं। मेरा धर्म मुझे मानव मात्र सो बाँधता है। रंग चटक पीला।

मेरी तस्‍वीर को बदरंग बनानेवाला आलस्‍य का मटमैला रंग है। कुंठाओं की कालिमा भी मौजूद है, मगर क्षीण। इसीलिए द्वेष, घृणा, ईर्ष्‍या, लालच मेरे पास अधिक देर तक नहीं टिक पाते। क्रोध काला-लाल-सिंदूरी-धुएँ और लपटों-जैसा सर्वग्राही। बहुत तेज आता है और बहुत तेजी से जाता है। गुस्‍सा इस बात पर भी आता है कि क्रोध क्‍यों आया, इसलिए प्रचंड होता है। मैं उस समय पागल होता हूँ, कुछ भी कर सकता हूँ। ऐसा क्रोध तभी आता है जब व्‍यक्तिगत या सामाजिक अन्‍याय के कारण मेरे स्‍वाभिमान को करारा आघात लगता हैा उस‍ स्थिति में घर, परिवार, संसार किसी से भी मेरा समझौता नहीं हो सकता। लेकिन यह सारे रंग प्रकाश की गति से चलते-फिरते अस्थिर तूलिका के हैं, स्थायी भाव शांत है, लीलामय है।

मैं समझता हूँ, पोर्ट्रट पूरा हो गया।

(सारिका , सितंबर , 1962 , टुकड़े-टुकड़े दास्‍तान में संकलित)


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