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आत्मकथ्य

कुछ पुर्जियाँ, कुछ चिंदियाँ
ईमान मर्सल

अनुवाद - गीत चतुर्वेदी


' लिखे हुए ' को ' सुनाना '

कोई कवि आखि़र श्रोताओं के सामने कविता पढ़ता ही क्यों है?

अरब श्रोताओं के सामने कविता पढ़ने का आखि़री मौका मुझे 1995 में मिला था। बेशक, हर कविता-पाठ के अपने खास तनाव होते हैं और मैं कह सकती हूँ कि वह कविता-पाठ मेरे जीवन का सबसे समृद्ध और गहन पाठ था। मैंने काहिरा के ऑपेरा हाउस में अल-हनागर हॉल में कविताएँ पढ़ी थीं। उस सुबह मैं बहुत हिचकिचाई थी कि मुझे कविता पढ़ने जाना चाहिए या नहीं, क्योंकि मैं बड़ी शिद्दत से महसूस करती हूँ कि कविताएँ - या जो भी कुछ मैं लिखती हूँ - उन्हें श्रोताओं के सामने सस्वर नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि वे उस मकसद से लिखी भी नहीं जातीं।

यूरोप और अमेरिका के बाद के कविता-पाठ जरा जटिल रहे। पहला मुद्दा तो यही कि ऐसी कविताएँ पढ़ना, जो श्रोताओं को सुनाने के लिए न लिखी गई हों, दूसरा मुद्दा यह कि पश्चिमी श्रोता आखि़र अरब कविता से क्या सुनने की उम्मीद करते हैं। यह एक अपरिहार्य प्रश्न है और तब ज्यादा महत्वपूर्ण, जब खुद श्रोता ही यह सवाल पूछ लें। भले बीते बरसों के घटनाक्रम और राजनीतिक कारणों से लगभग हर अरब व्यक्ति पश्चिमी हवाई अड्डों पर पहुँचते ही आत्मचेतस और सजग हो जाया करे, कविता-पाठ के दौरान की गई उम्मीदों का सीधा संबंध उस अरबी कविता की उस छवि से है, जो पश्चिम ने अरबी साहित्य की नवीनताओं के बारे में जानकारी के अभाव के कारण बना रखी है।

साधारणतया, अनुवाद ने इस्लामिक काव्य-परंपरा की सहायता की है, उसमें भी खासकर सूफी काव्य की। और आधुनिक कविता को इसका नुकसान भी उठाना पड़ा है। अदूनिस, महमूद दरवेश, सादी यूसुफ जैसे कुछ जाने-माने कवि भी हैं, जिनकी कविताएँ एक निर्वात से बाहर निकलती है, जैसा कि उन्हें प्रस्तुत भी इसी तरह किया जाता है, और कविता के साथ उनका संबंध प्रमुखतया राजनीतिक संबंध होता है, साहित्यिक व सांस्कृतिक परंपरा में उनके योगदान के बारे में कोई खास जानकारी नहीं दी जाती। जबकि इधर हुए कई कविता आंदोलन इन कवियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर चुके हैं।

मैं दहलीज पर बैठ लिखती हूँ

कुछ कवियों को निर्वासन मिलता है, कई विस्थापित हो जाते हैं, लेकिन कई ऐसे कवि होते हैं, जो बिना घर-बार, देश-दुआर छोड़े ही एलियनेशन, विस्थापन या तमाम राजनीतिक संघर्ष झेल लेते हैं। इसीलिए मैं निर्वासन शब्द का इस्तेमाल करने से बचती हूँ क्योंकि इस शब्द के सारे अर्थ समझे बिना इसका गलत इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जाता है। मेरे लिए 'रेक्वीअम' में अन्ना आख्मातोवा का निर्वासन, चेस्वाव मिवोश द्वारा 'नेटिव रेल्म' में झेले निर्वासन से कहीं भी अलग नहीं है।

मैं अपने संदर्भ में निर्वासन की जगह विस्थापन शब्द का प्रयोग करती हूँ, क्योंकि मुझ पर इजिप्त छोड़ने का कोई दबाव ही नहीं था। बोस्टन, और उसके बाद कनाडा के एडमॉन्टन के अपने शुरुआती दिनों में मैं भी उन्हीं सब चीजों से गुजरी, जिनसे विस्थापित लोग गुजरते हैं - नॉस्टैल्जिया, घर की याद, क्रोध, दो स्थानों की तुलना। मुझे सर्रियल या अतियथार्थवादी किस्म के स्वप्न भी आते थे, जिनमें मैं शहरों, लोगों, भाषाओं सबको आपस में जोड़ दिया करती थी। इस पूरे दौर में कविता लिखने के प्रति कोई मोह भी नहीं था। पाँच साल तक तो मैंने एक भी कविता नहीं लिखी।

आज जब मैं मुड़कर देखती हूँ, तो पाती हूँ कि शायद ये सारी अनुभूतियाँ मेरे लिए इतनी आकर्षक नहीं थीं कि मेरे भीतर लिखने की इच्छा का वांछित स्पेस बना दें। इजिप्त छोड़ने से पहले ही मेरी कविताओं के बारे में यह कहा जाता था कि ये भावुक होने को हर संभव टालने की कोशिश करती हैं।

मैं विस्थापित लेखकों की ढेरों किताबें पढ़ती थी (यह कोई मुश्किल काम न था क्योंकि उत्तरी अमेरिका की दुकानें ऐसे लेखकों की किताबों से भरी हुई हैं), लेकिन मैं उनमें से कइयों से कनेक्ट ही नहीं हो पाती थी। इन लेखकों से अक्सर दो संस्कृतियों के बीच पुल होने की उम्मीद की जाती है, या कम से कम वर्तमान और अतीत के बीच। उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन में इस तरह की चीजें काम की हो सकती हैं, लेकिन मुझे लगा कि अनुभवों की मेरी भूमि कहीं और है।

2003 में जब मैं इजिप्त में एक साल के लिए रहने गई, तब चीजें मेरे सामने खुलने लगीं। तब मुझे पहली बार यह अनुभूति हुई कि घर-वापसी नामुमकिन होती है। कनाडा लौटते ही मैंने 'ऑल्टरनटिव जिऑग्रफी की कविताएँ लिखनी शुरू कर दीं।

जब मैंने पहली इजिप्त छोड़ा था, तब मेरी एक वृद्ध रिश्तेदार ने मुझसे कहा था, 'एक खुशनुमा दहलीज पर रहना।' यह पूरी तरह एक मिस्री अभिव्यक्ति है, जिसका अंग्रेजी या दूसरी भाषा में ठीक उतना ही असरदार अनुवाद नहीं हो सकता। मेरे सबसे अहम यह था कि मैं एक दहलीज तलाश सकूँ, वह खुशनुमा हो या उदास हो, यह अलग मुद्दा है, दहलीज चाहिए थी। यही वह जगह है, जहाँ से मैं लिख सकती हूँ।

इजिप्त में वह एक साल गुजारने के पहले, मेरे अनुभवकोश में बहुत कुछ था, जिनके बरक्स मैं अपने ताजा अनुभवों को खड़ा कर सकती थी, लेकिन उस बरस वहाँ पूरा समय रहने के बाद मैंने पाया कि वे सारे अनुभव तो छिन्न-भिन्न हो चुके हैं, सबकुछ बदल गया है। ठीक उसी समय मैं उस रेखा पर जाकर फँस गई, जो दो जगहों के बीच होती है।

कवि जहाँ से देखता है , दरअसल , वह वहीं रहता है

आपके टिकने की जगह या 'पोजीशन' का सवाल, लेखन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। फर्ज कीजिए, हम पाँच कवियों को एक गुलाब या एक लाश देते हैं और उस पर लिखने के लिए कहते हैं। जिस 'पोजीशन' से वे उस पर लिखेंगे, वही 'पोजीशन' उन्हें एक-दूसरे से अलग करेगी। कुछ लोग इसे 'एक लेखक द्वारा अपनी आवाज पा लेना' कहते हैं। अपनी पोजीशन पाने में बहुत समय लगता है और मेरा मानना है कि लेखन में यही बुनियादी चुनौती भी है। एक बार आपने अपनी पोजीशन पा ली, लेखन अपने आप खुलने लगता है, हालाँकि उस समय नई चुनौतियाँ खड़ी हो जाती हैं। मेरी कविताओं के मामले में बेचैनी यही थी कि इस दहलीज वाली पोजीशन से अरबी भाषा में कविता कैसे लिखी जाए।

आज मैं इस पूरी यात्रा का वर्णन कर पा रही हूँ, लेकिन उस समय तो मैं उस बेचैनी को साधारण तौर पर निराशा ही मान लेती थी।

कविता खुद ही एक राजनीतिक धारा है , अप्रत्यक्ष

कुछ लोग कविता को विरोध की आवाज कहते हैं। यह ऐसी बात है, जिससे मैं अपने अब तक के जीवन में जुड़ाव नहीं महसूस कर पाती। शायद ऐसा उस संस्कृति के कारण है, जहाँ से मैं आती हूँ। औपनिवेशिक युग की समाप्ति के बाद बहुत बड़े राजनीतिक सवाल खड़े हुए थे, उन पर हद बौद्धिक-विचारधारात्मक बहसें चलीं, और उसके बाद अरब साहित्यिक पटल पर फलीस्तीनी त्रासदी ने बहुत बड़ी जगह घेर ली। उस दौर से महान कवि निकलकर आए, जैसे कि महमूद दरवेश, फिर भी मेरा मानना है कि उनकी कविता में काव्यशास्त्र का जो सुंदर प्रयोग है, वह प्रतिवाद या विरोध के इस तत्व से पूर्णतः स्वतंत्र है।

प्रामाणिक कला, अपनी शैक्षणिक भूमिका अदा करती हुई एक अप्रत्यक्ष राजनीतिक धारा हो सकती है।

जैसा कि बादू ने कहा है, कला शैक्षणिक होती है, क्योंकि यह सत्य का संधान करती है और शिक्षा भी इससे अलग कुछ नहीं करती : यानी ज्ञान की विभिन्न विधाओं का संयोजन इस तरह करना कि सत्य उसमें एक छोटा-सा छेद कर सके।

सौंदर्यशास्त्रों को तोड़ना , ऐतिहासिक विचारधाराओं को नकार देना

मैं उस पीढ़ी की कवि हूँ, जिसने अरब साहित्य में गद्य कविताओं को हाशिए से उठकर केंद्र में आते हुए देखा है। हालाँकि वह वजूद में तो पहले से ही थी। शब्दबंध के रूप में गद्य कविता और उसके आसपास चलने वाली बहसों को 1960 के बैरूत के साहित्यिक परिदृश्य में भी देखा जा सकता है। उस समय उस परिदृश्य में यूसुफ अल खाल, अदूनिस और ऊंसी अल-हज्ज जैसे कवि सक्रिय थे। लेकिन निजी तौर पर मैं इराकी गद्य कविता से ज्यादा प्रभावित हुई, खासतौर पर सारगोन बूलोस और सालाह फाइक से। इन कवियों को कोई भी अरब कविता समारोह या प्रकाशन संस्थाएँ मान्यता नहीं देती थीं। हम उनकी कविताओं और अनुवादों की फोटोकॉपी कराकर आपस में बाँटा करते थे।

उन कवियों को पढ़ने से पहले मैं गद्य कविताओं से अच्छी तरह वाकिफ थी, लेकिन उन कवियों को पढ़ते हुए यह पहली बार महसूस हुआ कि भावनात्मकता व विचारधारात्मकता के इस अभाव को, भाषा की इस पारदर्शिता को अरबी में भी पकड़ा जा सकता है। मेरी पीढ़ी के कवियों के लिए, मोरोक्को से लेकर इराक तक के कवियों के लिए, गद्य कविता कोई शैलीगत चुनाव नहीं थी। मैं नहीं मानती कि कोई भी लेखक अपनी शैली चुन सकता है। बल्कि, जब वे अपनी बात कहने के लिए रास्तों की तलाश कर रहे होते हैं, तब शैली उनके पास खुद आ जाती है।

1990 के उन शुरुआती बरसों में, शहरी काहिरा के उस उजाड़ में मैं नाउम्मीद हो चुके युवा कवियों की जमात में शामिल थी, जो अपनी आँखों से इराक द्वारा कुवैत पर हमला देख रहे थे, इराक को तबाह कर देने के लिए अरब राष्ट्रों को अमेरिका का पिछलग्गू बना देख रहे थे, फलीस्तीनी आजादी की जद्दोजहद देख रहे थे, अन्याय और गरीबी देख रहे थे, वह पाखंड जो समाजों के चरित्र की रचना करता है, उसे वैश्विक पूँजीवाद और स्थानीय रूढ़ियों-परंपराओं के बीच चिंदी-चिंदी होता देख रहे थे। हम अरब राष्ट्रवाद, पश्चिमी लोकतंत्र, यहाँ तक कि नवजागरण तक को संदेह से देख रहे थे।

मेरी पीढ़ी के युवा कवि, फिल्मकार और बुद्धिजीवी, हम सब इस एलियनेशन को बहुत शिद्दत से महसूस कर रहे थे और इसी ने हमें इस इच्छा से भर दिया कि हम अरब संस्कृति के सौंदर्यशास्त्र और ऐतिहासिक विचारधाराओं से परे हट जाएँ, कविता में तो खासकर। इस तरह गद्य कविता हमारे लिए मुख्यधारा के महा-आख्यानों का निषेध थी।

शायद यह हमें दुनियावी अनुभवों से मुठभेड़ करने की ज्यादा इजाजत देती थी। हम भले अपनी शैली या फॉर्म बहुत चैतन्य होकर न चुनें, भले किसी एक खास स्कूल के लेखन में शामिल हो जाने की इच्छा चेतन न रहे, फिर भी हमें जो दिया गया है, जिन सबसे हम पहले से परिचित हैं, उन सबसे अलग हो जाने में इन सारी चीजों का बड़ा दबाव होता है।

मसलन युवा कवि के रूप में मैंने अपने पिता और मेरे बीच के जटिल संबंधों को पकड़ने की असफल कोशिशें की थीं, किसी समय मैं उनके भीतर के पितृसत्तात्मक, पुरुष-प्रधान पक्ष की तरफ जाती, तो कभी उनके भीतर के प्रेम और त्याग की तरफ फिसल आती। जब मैंने इन दोनों ही संदर्भों को नकार दिया और फिर से कोशिश की, तो एक तरह से यह मेरे अपने अस्तित्व के साथ एक जुआ खेलने की तरह था, मेरी भाषा, मेरे ज्ञान, मेरे अंधकार के साथ जुआ।

लेकिन इसमें आनंद भी है, उन चीजों को पकड़ने की कोशिश करना, जिनका कोई संदर्भ ही न हो। आपके चुने विषयों की गंभीरता का जैसा चित्रण दूसरों ने किया है, आप उसके खि़लाफ खड़े हो जाते हैं। आप न केवल कुछ रचने की क्रीड़ा और आनंद से भरे होते हैं, बल्कि चीजों और उनके इर्द-गिर्द फैले पूरे सौंदर्यशास्त्र के विखंडन, उन्हें तोड़-मरोड़ देने के, सुख को अनुभूत करते हैं।


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