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कविता

मुझे बस इतना पता है
रोजा आउसलेंडर

अनुवाद - प्रतिभा उपाध्याय


पूछते हो तुम मुझसे
क्या चाहती हूँ मैं
मुझे नहीं पता यह

मुझे बस इतना पता है
कि ख्वाब देखती हूँ मैं
कि ख्वाब जी रहा है मुझे
और तैर रही हूँ मैं
इसके बादलों में

मुझे बस इतना पता है कि
प्यार करती हूँ मैं इनसान को
पहाड़ बागान समुद्र
जानते हैं कि बहुत से मृतक
रहते हैं मुझमें

आत्मसात करती हूँ मैं अपने ही
लम्हों को
जानती हूँ इतना ही
कि यह समय का खेल है
आगे-पीछे ।

 


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