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कहानी

बाद उनके...
नीलाक्षी सिंह


एक

वे अपमान की जरूरत वाले दिन थे। स्याही सोख्ता पर पसर कर सफेद रंग में फैल जाने वाला अपमान। वह स्याही सोख्ते पर उँगलियाँ फिरा कर देख लेती थी और उसके सफेद रंग की खुरदुराहट उसे अहसास करा देती थी कि होकर गुजर चुका... अपमान। स्याही सोख्ता के कोर को नाखून से खुरचते हुए यकीन बना रहता था कि वक्त ने उसे याद रखा है।

उपेक्षा और तिरस्कार का अपना एक गणित होता है। कभी कभी लोग एक ही अपमान में जिंदगी भर जलते रहना चाहते हैं, कभी किसी को सुलगने के लिए बार बार एक नए किस्म के अपमान की तलब होती है। वह इस दूसरी बिरादरी की थी और उसे भी उकेरे जाने के लिए अस्थायी प्रभाव वाले चोटों की लत थी।

बात अपमान की पहली आहट को आँखों की कोर से सूँघ लेने से शुरू होती। आँखें हालाँकि पनियाई रहती थीं हर समय पर इस पहली दस्तक पर उसकी कोर में फड़फड़ाहट सी होती थी। वह इस उम्मीद से चहकती कि सकारात्मक उर्जा में अनुवाद कर सकने के लिए कच्चे मसाले का जुगाड़ हो गया।

वह यानी - कौशिकी सक्सेना। जमाने के जितने भी मोबाइलों में उसके नंबर सेव थे, उनमें से अस्सी प्रतिशत लोग उसके नाम के आगे 'ब्रोकर' लगा कर उसका नंबर सुरक्षित करते थे। रियल इस्टेट ब्रोकर कौशिकी सक्सेना। ठस चीजों के खरीद फरोख्त की दुनिया में ठसके से जमी थी वह दुबली पतली स्याह लड़की।

मामूली से मामूली चीजों की शानदार पैकेजिंग और लच्छेदार प्रस्तुति। बार बार हार चुके दाँव को भी ऐसे पेश करना होता कि किसी न किसी को वह, उसका सपनों का महल लगने लगे। एक दफे उसे एक ऐसा फ्लैट बेचना था, जिसमें कोई बाल्कनी नहीं थी। कमरों की खिड़कियाँ थीं पर उनके दरवाजे भी बगल की इमारतों से उलझ कर खुलते थे।

उस घर को दिखाने एक खास समय पर लोगों को लाती वह। दोपहर के ठीक साढ़े तीन से चार के बीच का समय। लगातार कई दिन। एक दिन वाकई ऐसा आया जब उस फ्लैट के गोलाकार डाइनिंग स्पेस की बड़ी बड़ी खिड़कियों से तीखे धार में छलकती सूर्य की रोशनी ने देखने वाले को बींध दिया। उस रोज कौशिकी सक्सेना ने महसूस किया था कि इस खास वक्त के सूर्य की लौ में बुझती उमर का अचानक से सुलग उठा वह सौंदर्य होता है, जिसके उद्गम का स्रोत खोज पाना हासिल नहीं होता। जिंदगी... उस एक मुकाम के आगे और पीछे... ताउम्र उस रूप के लिए तरसती रह जाती है। बहरहाल वह ग्राहक खूबसूरती का पारखी था जरूर। उसने घंटे आध घंटे रोजाना हासिल हो पाने वाले सौंदर्य पर मुहर लगा दी और सौदा हो गया।

दुनिया की हर इमारत की, जेब से भारी भरकम खरीददारों से मेल करवा देने की हसरत रखने वाली लड़की के खुद के हिस्से छह बाई आठ का एक कमरा आया था, जिसकी सरपट दीवारों के आगे व्यवधान के रूप में एक रोशनदान और दरवाजा ही मयस्सर था। कमरे में कोई खिड़की न थी। उसके भीतर दो चौकियाँ अटाई गई थीं। उस वजह से दरवाजे का एक पल्ला ठीक से खुल भी न पाता था।

इस कमरे में बतौर पीजी वह पिछले तीनेक सालों से रहती आई थी। इन तीन सालों के बाद उसे यह अहसास हो गया था कि उसकी जरूरत और कल्पना के मुताबिक किसी रिहाइश की कल्पना अगर इस दुनिया में संभव थी तो वो, यह कमरा ही था। माँ के गर्भ की तरह प्रकाशहीन, खामोश... और सुकूनदायक।

उसे अचंभा होता जब सुख सुविधाओं से लदेफदे घर में भी लोगबाग नुक्स निकाल लेते और अपनी जरूरत के मुताबिक उसे मोड़ लेने पर आमदा हो जाते। इधर एक वह थी कि उसके लिए चार दीवारों को जैसे तैसे जोड़ कर बनाई गई यह जगह ही विश्वकर्मा की बनाई कलाकृति थी। ऐसा इसलिए था संभवतः कि उसके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था।

बहरहाल सवाल उठ सकता है कि जब उसके जीवकोपार्जन से जुड़ा विशेषण 'दलाल' ही एक शाश्वत अपमान था, तब उसे दूसरे अपमानों की क्या जरूरत थी! दरअसल इस सवाल के जवाब में ही उसके स्वाभाव को डिकोड करने का सूत्र छिपा था। अपमान से जिह्वा की जड़ों में तिरते कसैलेपन की उसे लत लग गई थी। जैसे जैसे दलाली का यह पेशा पुराना पड़ता जा रहा था, उस पर बेशरमी की परत चढ़ती जा रही थी और जीविका का कड़वापन असर गँवाने लगा था। ऐसे में लय बनाए रखने के लिए उसे हिकारत की अतिरिक्त खुराक की जरूरत पड़ती।

हर संभव जगह से इकट्ठा किए गए नीले रंग के जहर को एकसार कर वह उनमें बुतों की आत्माएँ डाल देती और अनुवाद के इस जादू के संपन्न होते ही उसकी बनाई हर मूर्ति जीवन के वैभव से झिलमिला उठती। उसके कमरे की चारपाई के नीचे अधबनी आकृतियों का वैभव छितरा पड़ा था।

वह मूर्तियाँ बनाती थी। और सबसे दिलचस्प यह कि मूर्तियाँ गढ़ते वक्त वह आँखें मूँद लेती थी। यह सालों का रियाज था। सालों का इस तरह से कि एक अरसे से आँखें मूँद कर वह अक्स गढ़ा करती थी। सिर्फ हाथ लहराते हुए। हवा में चलते हुए कोरे हाथ। पत्थर, छेनी, कतरनी... उसके हाथों में बाद में आए। कह सकते हैं कि आकृतियाँ बननी पहले से शुरू हो गईं, उन्हें बनाने वाले अवयव मूर्तिकार के हाथों में बाद में आए। यह अभ्यास इतना गहरा गया था कि मूर्तियाँ बनाते वक्त अगर कभी उसकी पलकें भूलवश भी खुल जातीं, तो हाथों का सारा तिलस्म गायब हो जाता। एकदम से सूख जाती धार मानों। ऐसे में वह अकबका कर आँखें मूँद लेती वापस ताकि खोए हुए लय को पाया जा सके पर यहाँ बात बिजली के नंगे तार वाली नहीं थी कि वापस जोड़ते ही प्रवाह कायम हो जाए। उसे फिर से एकाग्रता, अंधकार और एकांत का सम पाना होता तब जाकर उसकी उँगलियाँ साकार हो पातीं और धुन में एक अजूबा रच डालतीं। पर यह भी अजीब था कि सब कुछ शेष हो चुकने पर जैसे ही आँखें खुलतीं, वह मूर्ति से असंपृक्त हो जाती। एकदम बेलाग। वह उन्हें उठा कर आर्ट गैलरी तक पहुँचा देती। वहाँ से आगे वे एक बेनाम शिल्पकार की कृति के रूप में बिक जाते। जाहिर है ऊँचे दामों में, जिसका एक सम्मानजनक हिस्सा उस तक पहुँचता, श्रम शोषण के सिद्धांत का दाग लिए बगैर।

उसकी चारपाई से दूर लगी जिस दूसरी चारपाई की वजह से दरवाजों के पल्लों का खुल पाना संभव न हो पाता था - वह चारपाई एक प्लेटफार्म थी और उस चारपाई के नीचे का स्पेस उसका गोदाम। मिलाजुला कर यह कि अपमान के नीले रंग के, आनंद के सफेद रंग में रासायनिक परिवर्तन का क्रम अनवरत जारी था और वजह यही कि कमरे में पत्थर और छेनी के मेल से बनी जिंदगी की खुशबू कायम थी।

'थी' इस छोटे शब्द के यहाँ बड़े मायने हैं क्योंकि अपमान की जरूरत वाली बात जो शुरू में कही गई थी, वह इसी 'थी' से जुड़ी थी। पिछले कई दिन बगैर अनुवाद के गुजर चुके थे और कौशिकी सक्सेना आँखें मूँद कर खाली हाथ लहरा कर भी मनचाहा कुछ उकेर नहीं पा रही थी। घूम फिर कर उसके हाथ पुरानी आकृति में से ही किसी एक को दुहरा दे रहे थे। आँखें बंद किए किए भी वह जान लेती आखिरी चरण में कि जो बनाया जा रहा, वह उसकी पिछली बनाई किसी मूर्ति की आवृत्ति ही है। वह जान-बूझ कर कोई ऐसी गलत छेनी चलाती ताकि कोई दोष आ जाए और इस चूक के साथ ही सही, पर बनने वाली चीज, पिछली आकृति की प्रतिलिपि बनने से रह जाए। लेकिन होता क्या! आँखें खोलते ही वह जान लेती कि हिल कर भी उस मूर्ति के नाक नक्श, पिछली बनाई कृति के और करीब ही पहुँच गए थे।

ऐसा कहीं से नहीं था कि पहले जैसी ही बन गई मूर्तियाँ आसानी से नहीं बिकतीं। सच कहें तो मूर्तियों के बिकने का हिसाब रखने की उसे कभी जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि पैसे समय पर मिल जा रहे थे। तो विशुद्धतः यह नया कुछ रच न पाने का दुख ही था, जो उसके मन को साल रहा था। पर कौन जानता था कि मन की यह बेध्यानी किसी नई इबारत के लिखने के पहले का अलसायापन भर है।

ढलती दोपहर का वक्त था। एकदम नारंगी सी रोशनी आकर सीधे आँखों में घुस जा रही थी। हालाँकि ये और बात थी कि यह शुद्ध शाकाहारी किस्म की रोशनी आँखों को कोई तकलीफ नहीं दे रही थी।

कौशिकी सक्सेना आर्ट गैलरी में मौजूद थी। आवृत्ति के इन दिनों ने एक अजीबोगरीब संयोग उपलब्ध करा दिया था। अमूमन वहाँ किसी एक कलाकृति का दूसरा जोड़ा नहीं मिल पाता। उसकी बनाई एक कलाकृति किसी एक खरीददार को पसंद आ गई और वह वैसी ही एक मूर्ति और पाना चाहता था। यह उन्हीं आकृतियों में से एक थी, जिनकी हमशक्ल चीज कौशिकी सक्सेना ने उन दिनों तैयार की थी। वह जानती थी कि एक और वैसी ही प्रति पाकर ग्राहक खुश हो जाएगा, फिर भी वह झिझकते हुए उसे गैलरी के हवाले करने गई थी। जाहिर है अन्य कलाकारों की तरह वह भी दूसरों की नजरों से इस बात को छिपा लेना चाहती थी कि वह दोहराव नाम की खतरनाक बीमारी का शिकार हो चुकी थी।

गैलरी में बिकने से बची रह गई अपनी बनाई दूसरी मूर्तियों को देखते हुए उसकी आँखों की निचली पलकें एक बात को नोटिस करते ही अकड़ सी गईं। हुआ यह कि दो मूर्तियाँ ही थीं, जिनकी नाक में बड़ी सी नथ पहनाई गई थी। नथ के मोतियों की संख्या से लेकर उनके बीच की दूरी भी हूबहू एक सी थी। इतनी बेशर्म नकल - भले अपनी बनाई चीज की हो... असह्य थी। तुर्रा यह कि वे दोनों मूर्तियाँ पास पास ही रखी थीं आर्ट गैलरी में। कौशिकी सक्सेना के तलुवे काँपने लगे। एक तेज हूक सी उठी उसके भीतर और उसे तत्काल वहीं बैठ जाने की तलब महसूस हुई। पर वहाँ ऐसा आत्मीय स्पेस उपलब्ध न था।

अपने को थोड़ा संयत करने के लिहाज से उसने दूसरी कलाकृतियों को परखने में अपने आप को लगा देना चाहा। जब उसके तलुवों की कंपन सम पर आई तब अपने आप को समेट कर वह वहाँ से भागने ही वाली थी कि उसकी साँसें रुक गईं। उसने देखा कि एक व्यक्ति नथ वाले दोनों चेहरे को हाथ में उठाए तन्मयता से निहार रहा है। इस धुन से तो मोतियों की शुद्धता की जाँच ही की जा सकती थी। वह ठीक उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई।

वह उसकी तरफ मुड़ा और उसने कहा - ''इन्हें किसने बनाया?'

यह शर्मिंदगी की इंतिहा थी। सेल्स गर्ल समझे जाने की शर्मिंदगी नहीं। यह सामने वाले के सवाल की वजह से उपजी लज्जा थी... क्योंकि संभव था यह व्यक्ति ताड़ चुका था कि कलाकार ने बेशरमी से दुहराया था अपने आप को।

''ये मेरी है।''

''ओह!'' उस आदमी ने बगैर अचरज कहा।

''ये आपकी हैं ये कैसे माना जा सकता है?'

''मेरी ही है।''

''वे तो यहाँ रखी थीं... और आप मालूम नहीं कहाँ...।''

''क्या जानना था आपको।'' लड़की ने दबी जुबान में मामले को रफा दफा कर देने के अंदाज में कहा।

''बस इतना कि इन दोनों में से पहले कौन सी बनाई गई थी?'

यह कैसा सवाल था!

''उससे क्या होगा?' यह लड़की के मुँह से निकल गया।

''उससे मैं ये जान सकूँगा कि ये दोनों मूर्तियाँ आँसुओं को मुस्कुराहट में तब्दील करती स्त्री की हैं या कि मुस्कुराहट की ताव से आँखें छलक आई हैं स्त्री की।''

''वह कैसे होगा?' यह लड़की के चेहरे पर लिखा था।

वह करीब खिसक आया और दो आकृतियाँ बढ़ा दीं उसने लड़की के आगे। दोनों स्त्रियों ने दाईं माँग काढ़ रखी थी। उनके बाल - आगे के, घुंघराले थे और पीछे की तरफ बँधे थे जूड़े की शक्ल में। नाक नक्श तीखे थे और नथ बड़ी। एक से दो मुखड़े। कंधे तक की मूर्तियाँ। नथ और बालों के उतार चढ़ाव पर टिक जाती थी दृष्टि। इतना भर।

''गौर से इस चेहरे में आँसू की नमी और मुस्कुराहट का अनुपात देखिए और फिर इस दूसरी मूर्ति को देखिए! अगर इन्हें इस क्रम में रखा जाए तो यह हँसी से आँसू की ओर जाती स्त्री है। पर अगर बाएँ को दाएँ कर दें तो आँसू और मुस्कान भी अपना क्रम बदल लेंगे। इसलिए जानना जरूरी है कि पहले कौन सी बनाई गई।''

उसने वाक्य को खत्म करते वक्त कौशिकी सक्सेना पर निगाहें पैनी कर दीं। और शब्द भी भीतर तक धँसते गए।

लड़की सहम उठी। दरअसल मूर्तिकार सहम उठी। उसने अगले ही पल दाँव बदला - ''इसे मैं खरीद चुकी हूँ।''

''मैं कैसे मान लूँ?'

''आप काउंटर पर दरियाफ्त कर सकते हैं कि यह मूर्ति अब बिकाऊ नहीं है।''

''इसके बिकाऊ होने न होने से मेरे सवाल का क्या ताल्लुक।''

''शुक्र है...।'' लड़की ने सोचा कि उन्हें खरीदने में सामने वाले की कोई दिलचस्पी नहीं थी।

''फिर तो सब कुछ आसान है। आप अपने सवाल काउंटर पर रखी फीडबैक बुक में दर्ज कर दीजिए और मैं मूर्तियाँ ले जाती हूँ।''

यह व्यक्ति क्या कह रहा था, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कुछ भी। पर उसकी बातों में ऐसा कुछ तो था ही कि कौशिकी सक्सेना उन मूर्तियों को वापस अपने घर तक ले जाने पर आमादा हो गई। फिर चाहे इसके लिए उसे अपनी बनाई मूर्तियाँ ही क्यों न खरीदनी पड़ जाएँ!

सामने वाला आदमी मुस्कुराया और मूर्तियों समेत काउंटर की तरफ बढ़ गया। काउंटर पर मूर्तियों को रख उसने कुछ दरियाफ्त की। बीच बीच में वह उसकी ओर देख लेता। कौशिकी सक्सेना मूर्ति के जैसे ताम्रवर्णी रंग में रँगती जा रही थी। क्या आवश्यकता थी उसे कूद कर इन सबके बीच में शामिल होने की! वह अपने आप को काट कर निकल भी तो सकती थी इस पूरे प्रसंग के बीच से। लेकिन जो कुछ भी हुआ वह सिरे से अप्रत्याशित था। और अब निश्चय ही काउंटर के उस तरफ खड़ा सेल्समैन उस व्यक्ति के सामने सारा सच साफ कर रहा होगा कि मूर्तियाँ लड़की ने बनाई थीं... और फीडबैक बुक में कुछ लिखने की बजाय वह आदमी वापस आकर उससे मुखातिब होने ही वाला था - उसी सवाल के साथ।

अभी भी उसके पास मौका था। वहाँ से भाग लेने का। कोई रोकना भी चाहता तो न रुकती वह... ऐसे। कांउटर वाले आदमी से अपनी बातचीत के पूवार्ध में बार बार उसकी तरफ देख लेता आदमी, बात के रफ्तार पकड़ लेने के बाद उस तरफ देखना छोड़ चुका था। उत्तरार्ध से लेकर अंत हो जाने तक उस पर ध्यान दिए बगैर वह झटके से मुड़ा और तेजी से निकल गया। बाहर।

पता नहीं यह सब क्या था! संभव है काउंटर के पीछे वाले लड़के ने लड़की के मन की बात जान ली हो और झूठ कह दिया हो उस आदमी से कि मूर्तियाँ वाकई बिक चुकी थीं। पर ऐसा था तो उसने फीडबैक बुक में कुछ दर्ज क्यों नहीं किया! क्या बातें हुई होंगी दोनों में?

वह काउंटर तक गई। उन दोनों मूर्तियों को लिए लिए। उसने उन्हें काउंटर पर रखा और अपना क्रेडिट कार्ड आगे कर दिया। आश्चर्य कि उसके इस ग्राहक वाले अभिनय का काउंटर के पार खड़े सेल्समैन ने भी उसी भाषा में जवाब दिया। उसने बगैर किसी प्रकार का आश्चर्य प्रकट किए पेमेंट ले लिए मूर्तियों के और उन्हें पैक करने लग गया। जबकि यह सेल्समैन अच्छी तरह जानता था कि उन दोनों को बनाने वाली वही ठहरी - कौशिकी सक्सेना। पर कौशिकी सक्सेना के अचंभे का तब ठिकाना न रहा जब सेल्समैन ने पूछा कि मूर्तियों पर से दाम का टैग हटा दिया जाए क्या पैकिंग के पहले! वह दरअसल इसके ठीक पहले कौशिकी सक्सेना के ऊपर से मूर्तिकार का टैग हटा कर ग्राहक का टैग चिपका चुका था। स्त्री ने इन मूर्तियों की एवज में उस दुकान से मिलने वाले पैसों के दोगुने से भी ज्यादा पैसे अदा किए और पैकेट उठा कर बढ़ गई। उसे इंतजार अंत तक था कि काउंटर पर खड़े सेल्समैन की चेतना जागेगी और वह भूल सुधार कर लेगा आखिरी वक्त पर। या कोई संदेश ही देगा उसके नाम का। उसने उचटती एक नजर से परखा। काउंटर पर सदैव मुस्तैद रहने वाला फीडबैक बुक गुलाबी जिल्द में सजा धजा था यथास्थान। हद थी...!

पैकिंग जतन से की गई थी। तारीफ लायक। पर भीतर की चीज निकालने की उतावली में पैकिंग का यह आडंबर उसे झुँझला रहा था। जैसे तैसे निकाली गईं दोनों मूर्तियाँ। उसने झाँक कर... घेर कर... सब यत्न करके देखा। आँखों में... होंठों पर...। पर कोई निशान नजर नहीं आया... उस आदमी की कही गई बातों का। हालाँकि दुकान में वह उसकी बातों से सहमत थी पर यहाँ ये आकृतियाँ उन बातों को झूठा साबित कर रहीं थीं। यहाँ इस कमरे के एकांत में नथ की मोतियों के सिवा कुछ भी सूझ न रहा था उसे। उसने धिक्कार से दोनों मूर्तियों को वापस डिब्बे में ठूँस दिया।

रात भर एक अजब सी खुमारी उस पर तारी रही। जो घट चुका था उसके सूत्र नहीं जोड़ पा रही थी वह। मूर्तियाँ बेजान थीं। न उनकी आँखें कुछ कहती थीं न होंठ। तो क्या उस व्यक्ति से हुई मुलाकात ही काल्पनिक थी! पर ऐसा था भी तो कांउटर के सेल्समैन को तो वैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था! उसे तो चौंकना चाहिए था... जब अपनी ही बनाई मूर्तियाँ खरीद रही थी वह, तब। जो भी था... उस रात सब भ्रम था... सिवाए उस डिब्बे में ठुँसी जोड़ी भर मूर्तियों के।

कमरे की दहलीज पार करते ही वह अपनी इस दुनिया से रुख्सत ले लेती थी और एक दूसरी भूमिका में प्रवेश कर जाती थी। दफ्तर में पहुँच कर पिछली शाम से आई सभी कॉल्स को चेक करना, कॉल वाले सभी ग्राहकों से बात कर उनकी प्रोफाइल तैयार कर लेना और फिर डिस्कशन रूम में दिन भर का शेड्यूल लेकर उपस्थित हो जाना - उसकी सुबह की दिनचर्या। दफ्तर में सात कर्मचारी थे। एक बॉस। चार उसके जैसे ब्रोकर्स। दो फोन ऑपरेटर और एक व्यक्ति डेटा कलेक्शन में। चारों ब्रोकर्स के कार्यक्षेत्र बँटे हुए थे।

कुछ दिन पहले एक मालदार डील का ऑफर कंपनी के हाथ लगा था। प्रोपर्टी की लोकेशन उसके इलाके के अंतर्गत आती थी। पर क्लाइंट के प्रोफाइल की पड़ताल बॉस ने स्वयं की थी। मामला संवेदनशील था इसलिए स्पष्ट था कि उसके इलाके की बात होते हुए भी बॉस उसे वह मामला नहीं सौंपते क्योंकि बड़े सौदों में मर्दानी सूझबूझ हमेशा सफल होती है यह बात जमाने में प्रचलित थी। पर आरंभिक बातचीत में यह बात निकल कर आई थी कि संपत्ति का मालिक एक बूढ़ा व्यक्ति था जो सनकी, चिड़चिड़ा और झक्की प्रतीत होता था। उसकी उम्मीदों का आकलन किया जा सके - ऐसे किसी व्यावासायिक पैमाने का या तो आविष्कार न हुआ था या फिर कंपनी को ऐसे किसी ईजाद की जानकारी न थी। बॉस ने सूँघ लिया था कि इस व्यक्ति को बाजार, आँकड़े और इमारतों के मोहरों से घेरना मुमकिन न था। पर सौदा इतना बड़ा था कि उस जैसी नई और छोटी कंपनी के लिए उस सौदे का हाथ से जाना अफोर्ड करने योग्य न था। अब चाल ऐसे चलनी थी कि या तो वह सौदा हाथ आता या फिर सौदे से हाथ में निकल जाने की बात पर कौशिकी सक्सेना से मुक्ति पाई जा सकती थी। उसके बाहर होने की स्थिति में बॉस के साले की कंपनी में नियुक्ति का रास्ता साफ हो जाता।

लिहाजा उस रोज की मीटिंग में मामला कौशिकी सक्सेना के हवाले कर दिया गया। इलाका रिहायशी था पर सबसे ज्यादा महँगे इलाके में से न था। अड़तालिस सौ वर्गफीट में बना एक बंगला। घर पुराना था पर हाल ही में उसे रिनोवेट कराया गया था। इतनी जानकारी कौशिकी सक्सेना ने प्रोफाइल से हासिल कर ली। मामला जिस अप्रत्याशित तरीके से उसे सौंपा गया था उससे स्पष्ट हो गया था उसके आगे कि वह उसका आखिरी अभियान साबित होने वाला था।

उसकी उम्र सत्तर साल थी। शरीर लंबा और तना हुआ। बावजूद इसके उसके हाथों में बेंत की एक छड़ी थी। उसने संतरे की रसदार फलियों के रंग वाला कोट पहन रखा था और उसकी नाक का रंग लाल था। सिर पर अगरबत्ती के राख के रंग की टोपी थी। उसके साथ एक बीच की उम्र का व्यक्ति था। उसी ने घर का दरवाजा खोला और भीतर से एक कुर्सी ले आया। बूढ़ा व्यक्ति उस कुर्सी पर बैठ गया और उस दूसरे आदमी ने कौशिकी सक्सेना को घर दिखाने के अभियान की कमान थाम ली। पाँच कमरे, एक बड़ा हॉल, एक डायनिंग स्पेस, किचन, बरामदा, बाथरूम आदि आदि।

कौशिकी सक्सेना उस व्यक्ति के पीछे चलते हुए भी वहाँ नहीं थी। वह उन लोगों के साथ ही गाड़ी से उस घर तक आई थी। रास्ते भर किसी से उसकी कोई बात नहीं हुई। हालाँकि बूढ़ा उस दूसरे व्यक्ति से बातें करता रहा था। अभी भी वह चुपचाप उस आदमी के पीछे पीछे चल रही थी। उसे इस बात का चैन था जरूर कि बूढ़ा उनके साथ नहीं था। क्योंकि उसकी मौजूदगी उसे असहज बना रही थी। बूढ़े आदमी के चेहरे पर नफासत थी और आँखों में दूसरों के प्रति हिकारत का भाव। ऐसा मान सकते हैं कि उसे देखते ही कौशिकी सक्सेना के सामने एक बार फिर से यह साफ हो गया कि इस मामले को उसके हवाले क्यों किया गया था।

वह चाहती थी कि घर घूमने की प्रक्रिया देर तक खिंचती रहे। इसलिए अतिरिक्त उत्साह और अनवरत सवालों को उसने अपना हथियार बना लिया। जवाब क्या मिल रहा था इस पर कोई ध्यान न था उसका। अलबत्ता जवाब कहाँ खत्म हो रहा था, इस बात पर जरूर सजग थी वह। जवाब के आखिरी हिस्से से ही अगले सवाल के लिए पृष्ठभूमि मिल जाती उसे। जितना लंबा खींचा जा सकता था बात को उस हद तक... पसराया जरूर उसने। पर वह बिंदु आ ही गया जहाँ से आगे सब कुछ टूट कर बिखर जाता। उसके चैन के पल भी खत्म हुए और अब वह बूढ़े के सामने थी।

बूढ़ा संभवतः लड़की से मुखातिब होना तौहीन समझ रहा था और इसलिए बगैर कुछ कहे वह गाड़ी की तरफ मुड़ गया। साथ वाले व्यक्ति ने कौशिकी सक्सेना से साथ चलने का आग्रह किया जिसे उसने तत्परता से ठुकरा दिया और अगले पल मुड़ कर निकल पड़ी वह, मुख्य सड़क की ओर।

उसने कयास लगाया कि बूढ़े की कार उसके वजूद पर गाड़ी के चक्कों के निशान छोड़ती बढ़ गई होगी आगे। कौशिकी सक्सेना को अपमान और संतोष के भाव एक साथ घेरने लगे। अपमान की वजह तो साफ थी। संतोष इस बात का कि फिर से वह एकांत में थी।

बूढ़े के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा था जोकि सामने वाले को तोड़ दे। उसकी भौंहों का उतार चढ़ाव ऐसा था जो कि दूसरों के लिए हलचल का सबब बन जाए। साथ के दूसरे आदमी से बूढ़े की बातचीत खुली सी थी पर कौशिकी सक्सेना की उपस्थिति को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया था उसने। कितना अच्छा होता कि वह बूढ़ा कंपनी को फटकार लगाता और किसी दूसरे ब्रोकर को यह मामला सौंप देने की माँग कर बैठता। भले यह उसकी हार होती लेकिन जान तो छूटती इस व्यक्ति के सामने आने से। पर यह भी तो संभव था कि आगे की बातचीत में वह स्वयं शामिल न हो और वह साथ वाला व्यक्ति ही उसकी तरफ से बात करे।

अभी वह टैक्सी में बैठी ही थी कि फोन की घंटी बज उठी। उस तरफ वही दूसरा व्यक्ति था। कौशिकी सक्सेना से कहा गया कि अगर उसे तकलीफ न हो तो शाम की चाय साथ पीते हुए बूढ़ा उससे मकान के बारे में बातचीत करना चाहेगा। वह क्या जवाब दे सकती थी भला! तकलीफ का होना प्रकट कर पाना अर्फोड कर सकती थी क्या वह! यह शिष्ट लोगों का तरीका था अपनी बात मनवा लेने का, जिसका जवाब - ''नहीं... नहीं मुझे क्या तकलीफ हो सकती है भला...।'' से शुरू करना होता था सामने वाले को। लड़की ने रीति का निर्वहन किया। यह और बात थी कि सभ्य बनते हुए उसकी जबान तालू से चिपकने लगी।

कौशिकी सक्सेना के कान की लवों में पसीना था। सात दशक पार कर चुके एक बूढ़े व्यक्ति के साथ चाय पर जाने में उसे कँपकँपाहट हो रही थी। उसकी कँपकँपी की वजह घटनाओं का क्रम या कि मकान मालिक का दंभी व्यक्तित्व नहीं था। उसकी अपने चरित्र की भीरुता इसकी वजह थी शायद। संशय... घबड़ाहट, बेचैनी... उसके मन के एक कोने के स्थायी भाव थे। जितना वे मन में होते उससे कहीं अधिक मात्र में वे अक्सर उसके चेहरे पर प्रकट हो जाते।

ठीक साढ़े सात बजे थे जबकि वह उस गेस्ट हाउस के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई जिस जगह बूढ़ा ठहरा था। वह वेटिंग लाउंज में पहले से बैठा उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। कौशिकी सक्सेना के वहाँ पहुँचते ही वह उठ कर खड़ा हो गया। सम्मान मिला था अबकी लड़की को। पर उस अप्रत्याशित चीज ने उसके भीतर और खलबली मचा दी।

''आप बैठ सकती हैं।''

लड़की ने मजबूती से कुर्सी का हत्था थाम लिया।

''आप इस पेशे में क्यों हैं?'

''क्योंकि मैं इस पेशे के लिए नहीं बनी हूँ।''

बूढ़े के चेहरे की रेखाओं में एकबारगी घालमेल हुआ और वह मुस्कुरा पड़ा। इस तसल्लीजनक मुस्कान पर कौशिकी सक्सेना को एक जोरदार ब्रेक लग गया और उसे लगा कि वह उसी वक्त भोकार पार कर रो पड़ेगी।

''कितने घर बेच चुकी हैं अब तक?'

मैं एक अच्छी खिलाड़ी नहीं हूँ।''

''फिर भी...।'' उसने उकसाया।

''मेरी चाल बेढब है। यह बात अक्सर मेरे हक में होती है क्योंकि ढबवाले लोग मेरी चाल समझ नहीं पाते।''

''मेरे घर की कीमत जानती हैं आप?'

''सात करोड़।''

वह हँसा - ''कोई सा भी सात करोड़ नहीं...।''

अचानक वह गंभीर हो गया - ''आप की सबसे कीमती चीज क्या है ...माफ कीजिएगा मोहतरमा यह सवाल थोड़ा गैर वाजिब है पर पूछना मानीखेज।''

वह जवाब देने के वक्त अपने आप के भीतर धँसती गई और आँखों का गीलापन काजल की सरहद से टकराने लग गया।

''मेरी सबसे कीमती चीज वह दुनिया है जिसे मैं अपने हाथों से गढ़ती हूँ।''

''उसे बेचते वक्त खरीददार में क्या देखना चाहेंगी आप?'

कौशिकी सक्सेना के सामने आर्ट गैलरी की एक शाम पहले वाले शख्स का चेहरा घूम गया।

''मैं चाहूँगी कि मेरी बनाई चीज में वह वो खासियत देख ले जिसकी स्वयं मैंने कल्पना भी नहीं की थी।''

''क्या कभी आपने ऐसी चीज बेची है'

लड़की ने अपनी पनियाई आँखों को बूढ़े की आँखों पर टिका दी। सख्त निगाह।

''रोज बेच देती थी। पर जब ऐसा खरीददार मिला तो नहीं बेच पाई।''

''क्यों?'

कौशिकी सक्सेना कुर्सी के हत्थे पर पूरी ताकत से हाथ मार कर खड़ी हो गई। उसका चेहरा भिंच गया था और आँखें बूढ़े की आँखों से हटी नहीं थीं जरा। अगले ही पल वह वापस बैठ गई शांत पड़ कर।

''हम जानते हैं कि यह घर आपके वर्षों की कमाई पूँजी है और हम पूरी कोशिश करेंगे कि आपको आपका मनचाहा दाम मिल जाए और अच्छा खरीददार भी जो घर को जतन से रखे।''

बूढ़े के होठ व्यंग्य से टेढ़े हो गए - ''मकान की लेनदेन में अपने ग्राहकों की इच्छा पूरी करने की चाहत रखने वाली कुल कितनी एजेंसियाँ होंगी इस शहर में! बता सकती हैं?'

लड़की ने सिर झुका लिया। क्षण भर पहले का तेज स्याह पड़ गया। अभी बोला गया आखिरी वाक्य उसका अपना न था। यह व्यावसायिक दुनिया की रटंत भाषा थी। जिसे माँज कर अपना नहीं बना पाई थी वह।

''तो मैं क्या समझूँ।'' रुक रुक कर लड़की ने कहा।

''क्या संयोग... यही सवाल अभी मैं आपसे करने वाला था।'' बूढ़े की आँखें चमक रही थीं।

''क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि जिस चीज को आप पाना चाहते हैं प्रकाश उसे छिपा दे और उस चीज के पास अंधकार की सहायता से पहुँच पाएँ आप?' लड़की ने पूछा।

''हाँ कुछ छोटी यादें हैं जिन्हें उजाले से परहेज है।''

''आपकी सबसे कीमती चीज क्या है?' उसने साहस कर लिया अदम्य।

''उसके बारे में सिर्फ एक बात स्पष्ट हुई है। वह यह कि उस तक पहुँचने में आप माध्यम होने वाली हैं।

''पर मेरी चाल बेढंगी है। ढंग के लोग...।''

''अभी अभी आप उठने का फैसला करने के बाद बैठ क्यों गईं थी दुबारा?'

''मुझे लगा कि आई हैव नॉट फिनिश्ड विद यू येट।'' लड़की की आँखें जलने लगीं। ताप इतना था कि बूढ़े का हलक सूख गया। लड़की ने मेज पर रखा पानी एक साँस में खत्म कर दिया और कहा - ''सुबह मुझे लगा आपमें अदब की कमी थी। पर इस शहर के अदब खुद अभी मुझे सीखने हैं। इजाजत?'

बूढ़े व्यक्ति को पहली बार लगा कि चेहरे के अंग अब पहले की तरह मस्तिष्क के इशारे नहीं ले पा रहे हैं और उसे एक फीकी मुस्कान तक मुस्कराने में तकलीफ हुई। सवाल उसके अदब पर लग चुका था पर फिर भी घुटने ऐसे कँपकँपाए कि उठ कर लड़की को विदा देने की उसकी हिम्मत न पड़ी। उसने हाथों को माथे पर लगा कर एक अटपटा सा सलाम किया और सिर झुका कर बैठ गया। कौशिकी सक्सेना कुर्सी का हत्था पकड़े बगैर उठ खड़ी हुई।

उस रात लड़की ने सोचा कि अगर उसके हाथों में छेनी और पत्थर ना होते तो शब्द खोखले हो जाते पीड़ा के। वह अपने औजारों से नाद की ध्वनि को पैना ही तो कर रही थी। बेतरतीब प्रहार करते रहे उसके हाथ। आँखें खुलने पर फिर से एक दुहराव सामने था। जतन से तराश कर बनाई गई एक पुरानी कृति का दुहराव। इस बार की बेधड़क ठोंकपीट का नतीजा भी वही था। यानि की छेनी से किए जाने वाले प्रहार की कोई जाति न थी। कोमल और क्रूर दोनों प्रकार के दस्तक की परिणति एक थी - दोहराव।

दफ्तर आते ही उसने उस बंगले की बिक्री से संबंधित पहले दिन की तरक्की का ब्यौरा टाइप कर दिया। जाहिर है उसमें मकान का भ्रमण और मकान मालिक की अपेक्षाओं की विस्तृत जानकारी लेने का प्रयास, इन दो विषयों पर मोटी मोटी सूचनाएँ थीं। दिन की शुरुआती मीटिंग में बॉस उसे लगातार हैरत से घूरता रहा। लड़की की तैयार की गई रिपोर्ट पर उसने सरसरी निगाह डाली और बदले में तेज नजर डाल कर उसे यह सूचना दी कि बूढ़ा व्यक्ति हफ्ते भर के लिए जर्मनी लौट गया था और वापस लौटने के बाद वह जल्द से जल्द घर बेचना चाहेगा।

बॉस अचंभे में था कि कौशिकी सक्सेना और बूढ़े ने एक दिन सफलतार्पूवक एक दूसरे को झेल कैसे लिया था। उधर अपनी जगह पर बैठते हुए उसने सोचा कि हफ्ते भर के लिए वह स्वतंत्र थी। आजाद कल्पनाएँ की जा सकती थीं। मसलन यह पता किया जा सकता था कि हफ्ते भर में जर्मन भाषा सीखी जा सकती थी क्या! अगर सप्ताह भर बाद वह उस बूढ़े को जर्मन बोल कर चौंका दे तो...! अभी अगर वह अपने कमरे में होती तो आँखें मूँद कर छेनी उठा लेती। देखा जाता कि इस खुश मन से पड़ने वाली उसके हाथों की हल्की थाप क्या चीजें उकेर पाती हैं।

उस रोज ग्राहकों से बात कर उनकी जरूरतें रिकार्ड करना शुरू ही किया था कि एक फोन लाइन उससे कनेक्ट की गई। उसने अपने पेशेवर अंदाज में बात शुरू की और सामने वाले की जरूरत की जानकारियाँ कलेक्ट कर लीं। यह 'अर्जेंट रिक्वायर्मेंट' वाली कॉल थी, जिसकी फीस दोगुनी थी। यानी कि जहाँ बाकी मामलों में कंपनी बेचने वाले और खरीदने वाले से दाम का एक प्रतिशत लिया करती थी, अर्जेंट मामलों में दो प्रतिशत फीस ली जाती थी। डेटा ऑपरेटर की मदद से उस लड़की ने उस ग्राहक के लिए चार पाँच घर शार्टलिस्ट किए और उससे अप्वाइंटमेंट ले लिया। उसी दिन का। जगह तय हुई। समय भी।

यह सब रोज की कहानी थी। रास्ते भर वह सोचती रही कि लोगों की जरूरतें कितनी एक जैसी हैं - बड़ा, सुंदर, खुला, सुरक्षित, वास्तु के अनुकूल... पर किफायती घर। हालाँकि इस ग्राहक ने घर की चाहत का कोई ब्यौरा न दिया था। बस एक खास लोकेशन का जिक्र था उसक कॉल में। कौशिकी सक्सेना ने तयशुदा जगह पर पहुँच कर उसके मोबाइल पर सूचना दे दी और पहचान का एक सूत्र भी थमा दिया - बैगनी रंग। उसने फोन डिस्कनेक्ट किया ही था कि पीछे से आवाज आई - ''आपको रंग बतलाने की जरूरत नहीं थी। वैसे बैगनी के साथ गुलाबी रंग का मेल मुझे पसंद है।''

कौशिकी सक्सेना मुड़ी। पीछे। फीडबैक बुक की गुलाबी जिल्द उसके सामने तैर गई। उसने अचानक अपने कपड़े देखे। वाकई। बैगनी और गुलाबी में होड़ लगी थी कुर्ते को छेंक लेने की - ऐसे कि पहचान के लिए गुलाबी रंग भी दिया जा सकता था क्लू में। आर्ट गैलरी का एक शाम पहले वाला आदमी खड़ा था सामने।

''मुझे जो भी चीज पसंद होती है वह पहले से आपकी होती है - ये मैं जान गया हूँ।''

वह हँसा। लड़की का चेहरा तमतमा गया।

''आपने मजाक किया था। ...घर नहीं लेना आपको?'

''आपने ये कैसे सोचा?'

''घर लिए बगैर कोई घर सजाने के लिए मूर्तियाँ खरीदता है क्या?'

''घर खरीदने वाले के सिर पर पहले से छत नहीं हो ये शर्त है क्या आपकी कंपनी की?'

''कंपनी की नहीं आप मेरी बात कीजिए... मेरा मतलब है मुझसे बात कीजिए।''

''ठीक कहा आपने। बिल्कुल मेरे मन की बात। कंपनी में मेरी कोई दिलचस्पी है भी नही।''

''आपने मेरा वक्त बर्बाद किया।''

''क्या यह संयोग नहीं हो सकता?'

''नहीं। नहीं हो सकता।''

''मैं जानता था उस शाम कि मेरी पसंद की गई मूर्ति पहले से आपकी हो ऐसा नहीं हो सकता। फिर भी मैंने संयोग के खाते में उसे डाल कर आपकी बात मान ली। इसलिए आपके पास भी संयोग वाली बात को मान लेने का विकल्प है और तकाजा भी।''

''आपकी कही बात बकवास थी। मूर्तियाँ हँस या रो नहीं रही थीं... मैंने देखा बाद में।''

''यानी आपने मेरी कही बात याद की बाद में... बार बार याद की?' वह बुदबुदाया।

''सिर्फ एक बार याद की थी। और वह सब बकवास था। अच्छा हुआ आप मिल गए दोबारा और आपको मैंने बता दिया। अब फिनिश्ड!''

''चलिए अब आप भी इस दोबारा मिलने को अच्छा मान लेने पर सहमत हुईं।''

''उसके बाद भी मैंने कुछ कहा।''

''फिनिश्ड...। क्या फिनिश्ड! तलाश?'

लड़की ने तब पहली बार उसे गौर से देखा। वह एक लंबा व्यक्ति था और अपने आप को आगे की तरफ झुका कर उससे मुखातिब था। उसने उसी वक्त अपने आप को भी देखा। वह अपने को भरसक ऊपर की तरफ खींचे उस आदमी से रूबरू थी। उस वक्त उस आदमी को और अपने आप को देखते हुए उसे दोनों में एक प्रकार का तादात्म्य अनुभव हुआ। कैसे कैसे मोड़ आने लगे थे उसकी सीधी सादी जिंदगी में। पिछले दो तीन दिनों में उसका जैसे अजीबोगरीब सवालों से साबका पड़ा था, वैसा तो आज तक न हुआ था। किस चीज के शेष हो चुकने की घोषणा की थी उसने... ये खुद उसके आगे अस्पष्ट था। स्पष्ट थी तो केवल एक चीज कि इस घड़ी वह एक लकीर पर खड़ी थी। लकीर- जिसके कि दोनों ही तरफ आगाज था। वह किसी भी ओर कदम बढ़ाती और एक नए अध्याय में प्रवेश कर जाना तय था।

''मुझे लगता है मजाक आप कर रही थीं... आपके पास दिखाने के लिए कोई घर था ही नहीं?' वह बुदबुदाया।

लड़की इस टोकाटाकी से घबड़ा गई और बगैर सोचे समझे उसके कदम बढ़ गए।

फ्लैट हालाँकि पुराना था पर लकड़ी की कारीगरी उसे भव्य बनाती थी। खिड़कियाँ काफी थीं और उनकी अवस्थिति ऐसी थी कि हवा बेरोक टोक आती थी। एक तरफ की बालकनी से स्लाइस भर पहाड़ और कुछ बाईट्स पेड़ों के मयस्सर थे। दूसरी बाल्कनी रूफ गार्डन के सामने खुलती थी। फ्लैट की अवस्थिति इतनी शानदार थी कि सेकेंड हैंड होते हुए भी कौशिकी सक्सेना ने सबसे पहले उसे दिखाना ही माकूल समझा। आदमी चुपचाप उसके पीछे चल रहा था। लड़की की मनःस्थिति ठीक उसी दिन जैसी थी जब वह बूढ़े का मकान देखने गई थी। उस दिन की तरह आज भी वह इस देखने दिखाने की रस्म को भरसक लंबा खींचना चाह रही थी। क्योंकि उसे पता था कि इस अध्याय के समाप्त होते ही एक चुभन भरा एकांत और अटपटे सवाल उसकी झोली में गिरने वाले थे।

वह उस व्यक्ति के ध्यान को बार बार बाल्कनी की तरफ खींचना चाह रही थी क्योंकि उस घर की यूएसपी बालकनी से दिखने वाला नजारा ही साबित होने वाला था। पर उस आदमी ने बाल्कनी से बाहर की तरफ एक उचटती सी नजर फेरी और गौर से कमरे की दीवारों को देखता रहा। लड़की को लगा कि शायद वह दीवारों की उम्र मालूम करना चाह रहा था और उसने स्पष्ट कर दिया कि घर तीन साल पुराना था। दो साल आठ महीने पुराना। सामने वाले ने उम्र वाली बात पर कोई ध्यान न दिया। वह मास्टर बेडरूम की दीवार को एकटक देखता रहा। वहाँ निशान थे। लड़की ने सफाई दी - ''कोई तस्वीर टँगी होगी पहले।''

''आईना भी हो सकता है आदमकद। दीवार के स्विचबोर्ड बताते हैं कि पलंग वहाँ रही होगी। ...सामने। पलंग के ठीक सामने आईने का मतलब...।'' उसने रोक लिया अपने आप को। बीच में ही। रोका नहीं था बल्कि रास्ता बदल लिया था उसने - ''यहाँ सेल्फ भी लगाई जा सकती है और उस पर बड़ी नथ वाली मूर्तियों का जोड़ा रहे तो...।''

उसकी आँखों की चमक ने लड़की की साँसें रोक दीं। वह बात को घुमा रहा था और लड़की ने निश्चय किया कि व्यावसायिकता के सूत्र को एक पल के लिए भी हाथों से छूटने न देगी वह। लड़की के मन में जितनी तेजी से यह बात आई उतनी ही शीघ्रता से आदमी ने डिकोड भी कर लिया उसे। आदमी ने खुद ही बात की दिशा बदल दी - ''इस घर में लकड़ी का काम है तो अधिक पर लकड़ी की किस्म उम्दा नही। लकदक है काम पर रुचिसंपन्न नहीं।''

वह घर में घूमता रहा। हर दीवार... हर तहखाने से मुखातिब। कौशिकी सक्सेना उसके पीछे पीछे घूमती रही। पर वह तो अपने में लीन था। केवल घर से संवाद करता। कौशिकी सक्सेना को लगा कि घर ने ग्राहक पर अपना जादू करना शुरू कर दिया था है कि अचानक वह मुड़ा और कहा उसने - ''एक वाक्य में कहूँ तो घर की आत्मा मिसिंग है...। चलें?'

''यह आदमी शर्तिया वक्त बर्बाद कर रहा है।'' एक तेज आवाज उठी उसके भीतर।

उसने घर का ताला बंद कर दिया। शुक्र है कि यह घर पहली मंजिल पर था और वे सीढ़ियों से ही आ गए थे। वरना इस आदमी के साथ लिफ्ट में आते जाते हुए जान पर बन आना तय था।

''एक दूसरा मकान पास ही है। आप अपनी गाड़ी से मेरे पीछे आइएगा?'

''आज नहीं हो पाएगा।'' आदमी ने बेरुखी से कहा।

लड़की सकपका गई। ऐसे उत्तर की उसे आशा न थी।

''आप कल मुझे मैसेज कर दीजिए कि कहाँ मिलना है।'' उसने एक सुर में खत्म किया और पीछे मुड़ गया। कौशिकी सक्सेना स्याह पड़ गई। अचानक ऐसे बर्ताव की वजह क्या हो सकती थी! पर यह सब नया तो नहीं था उसके लिए! उसके पेशे के लिए तो यह आम बात थी। यह बात और थी कि इस तरह के रूखे सूखे व्यवहार रंग नहीं बदला करते थे उसके चेहरे के, पहले कभी।

क्या हो गया था अचानक उस आदमी को! एकांत में आँखें बंद कर कौशिकी सक्सेना ने याद करने की कोशिश की। अपनी धुन में घर की दीवारों को ताकता आदमी अचानक से फैसला क्यों कर बैठा! फैसला भी ऐसा! एकदम निर्णयात्मक। आत्मा नहीं थी घर की! ईंट मिट्टी के बने घर की आत्मा होती है क्या! और अगर होती भी है तो एक आवेग में उसकी शिनाख्त कर लेना संभव था क्या! क्या चल रहा था आदमी के भीतर! क्यों स्थगित कर लिया था उसने अपने आप को सवाल यह भी था कि क्या वाकई वह घर देखने आया था! कौन था वह आदमी... कैसे थे उसके सवाल और क्यों अपने आप को उसके सवालों के प्रभाव से नहीं बचा पा रही थी वह!

लड़की का ध्यान अभी अपने हाथ की छेनी पर जरा भी न था। और जब उसकी आँखें खुलीं तो सामने जो उकेरा पड़ा था वह बिल्कुल भिन्न था। पूर्ण कृति नहीं थी। एक हिस्सा भर था। लेकिन छाप नई थी। कौशिकी सक्सेना को उस पल का स्मरण हुआ जब वह लकीर पर खड़ी थी। एक लगभग अपरिचित व्यक्ति के साथ। उसके आँसू एक कतार में गाल पर सहरने लगे। कौन था वह व्यक्ति, इस सवाल के मन में उठने की बारी थी। पर उसकी जगह एक ललक उठी मन में कि नया कुछ रचने की शुरुआत कर चुकी थी वह एक बार फिर... यह सूचना सबसे पहले उस आदमी के साथ ही बाँटी जाए।

अगले रोज वह वक्त से पहले थी, तयशुदा जगह पर। लड़की नहीं चाहती थी कि फिर से वह आदमी इधर उधर किधर से भी प्रकट होकर उसे चौंका दे। वह उसे आते हुए देखना चाहती थी शुरुआत से। कुछ देर उसने खड़े होकर इंतजार किया। चौकन्नेपन और सजगता से। फिर उसने एक टेलीफोन बूथ के शेड के नीचे खड़े रह कर इंतजार किया। फिर भी बात नहीं बनी तो अपनी स्कूटी की सीट से कमर टिका कर। वह तब भी न आया जबकि दो मर्तबा मैसेज करके वह आने की जगह और समय बता चुकी थी। फिर वह चहलकदमी करती हुई इंतजार करने लगी। पौन घंटे से ऊपर बीत चुके। उसने फोन लगाया। फोन कवरेज के बाहर था। ऐसा कभी हो सकता था क्या कि वह आए ही ना! लौट जाना चाहिए क्या उसे! उसने दस मिनट का मोहलत दिया उस आदमी को। इनमें से शुरू के सात आठ मिनट तत्परता से खड़े रह कर और आखिरी पल चहलकदमी करके बिताए गए। ऐन दसवें मिनट के पूरा होने के कुछ पहले उसने रियायत के पलों का फिर से दस मिनट के लिए नवीनीकरण कर दिया। अबकी उसने बैठने के लिए जगह तलाश ली। गार्ड की कुर्सी रखी थी पास के एटीएम के बाहर। गार्ड पास के पान की दुकान पर खड़ा था। वह जाकर बगैर झिझके गार्ड की कुर्सी पर बैठ गई। जब कोई हटाने आएगा तो देखा जाएगा... का संकल्प लिए।

अब तक उसे भान हो चुका था कि वह व्यक्ति आने वाला नहीं। क्योंकि अगर वह आ जाता और उस कुर्सी पर बैठे रँगे हाथों पकड़ी जाती वह, तो इससे ज्यादा बेइज्जती की बात और क्या हो सकती थी! इतनी देर खड़े होकर इंजतार करने के बाद बैठ कर राह देखना आसान लगा। इसीलिए वक्त की मियाद खत्म होने पर एक और नवीनीकरण की गुंजायश बनती थी। तीसरी बार दस मिनटों का चक्र चलाया गया। आधी दूर तक बेड़ा पार हो जाने के बाद उसने गौर किया कि गार्ड आकर उसके बगल में खड़ा हो गया था। इसलिए उस चक्र के उतरार्ध में उसे सुख का त्याग करना पड़ा। वह वापस स्कूटी से टिक कर खड़ी हो गई। क्या सोच रहे होंगे आसपास के लोग! इतनी देर तक खड़े होकर, बैठ कर दौड़ कर कोई किसी की प्रतीक्षा करता है क्या! उसने फिर से फोन लगाया। पर उस पार से उसी आशय की सूचनाएँ दुबारा आईं। सारी गलती उसकी थी। खाली मैसेज भेज देने से ही उसने कैसे मान लिया कि सामने वाले को उसकी बात मंजूर थी! और इस खोखली जमीन पर इतने वक्त की कुर्बानी दे दी उसने। और यह सब आडंबर भी तब, जबकि वह जानती थी कि सामने वाले की मंशा घर खरीदने की कभी थी ही नहीं। वह आदमी उसे उल्लू बना रहा था यह बात तो उसकी समझ में आती थी। पर वह खुद अपने आप को क्यों मूर्ख बना रही थी - यह बात समझ से परे थी।

उसने घड़ी देखी। हे भगवान! चौथा चक्कर भी चालू हो चुका था। अपने आप ही रिन्यू हुए जा रहा था अब समय। उसकी स्वीकृति की भी प्रतीक्षा न रही। वह वापस तेज तेज चहलकदमी करने लगी। आज आए तो वह इतनी जली कटी सुना देगी कि आत्मा परमात्मा का सारा दर्शन ही हवा हो जाएगा उसका। इस संसार में दूसरों के वक्त की किसी को कद्र है ही नहीं। वह उम्मीद भी किस से कर रही थी! एक दिन की पहचान (?) वाले व्यक्ति से! उसके मैसेज का जवाब तक देना जरूरी नहीं समझा जिसने। लड़की ने चौंक कर अपने मोबाइल का भेजा हुआ मैसेज चेक किया। डिलीवरी तो हो गई थी दोनों संवादों की। बस बहुत हुआ। जैसे ही अबकी का दसवाँ मिनट खत्म होता वह चल देती - यह बात पक्की।

बीतने लगी समय की सीमा। उसे एक अजीब सी निराशा ने घेर लिया। वह एकटक आने जाने वालों को देखती रही। और अचानक मुड़ कर चल पड़ी। उस समय दसवें मिनट के पूरे होने में सैंतीस सेकेंड बाकी थे। स्कूटी में चाभी डालते वक्त उसे आभास हुआ कि ठीक उसके पीछे से किसी की आवाज आई और वह पूरी ताकत से पीछे पलटी। उसकी सँभाल लड़खड़ा गई पर उस बेसँभारी को सँभालने के लिए कोई भी मौजूद न था वहाँ। भ्रम। उसने सिर को झटक दिया। दो और ग्राहक निबटाने थे उसे उस रोज।

उसका मन उखड़ गया। पर व्यावसायिक रूप से देखें तो किस्मत अच्छी थी उसकी उस रोज। दोनों ही ग्राहकों का काम बन गया। एक को नया मकान खरीदना था दूसरे को किराए का फ्लैट लेना था। इन दो अभियानों के सफल होने के साथ ही उसका इस महीने का टार्गेट भी अचीव हो गया था, जबकि महीने के खत्म होने में छह दिन बाकी थे। यह बात मायने रखती थी पर खुशी की कोई अनुभूति नहीं जागी उसके मन में। बल्कि इस घटना को स्वीकार करना तो दूर अनुभव तक नहीं कर पाई वह। हर थोड़ी थोड़ी देर पर वह मोबाइल को पलट कर देख लेती थी। आवाज नहीं भी सुनाई दे सकती थी संदेश की। पर्स के भीतर से वाइब्रेटर भी धोखा देता था कभी कभी। दोनों ग्राहकों के बाद वह कुछ घरों को देखने के अभियान पर थी। ऐसे घर, जिन्हें बेचने के इच्छुक उन्हें उसकी कंपनी में रजिस्टर करवा देते थे। वह मशीन की तरह काम निबटाती जा रही थी।

देखे जाते घरों से अंतर का कोई संबंध स्थापित नहीं हो पा रहा था। उसने बगैर सोचे उसके नंबर पर एक बार फिर से कॉल कर दिया। इस मर्तबा घंटी बजी। पूरी बजी। पर कोई जवाब न आया। मारे क्रोध के वह तमतमा उठी। उसने आवेग में भर कर अपना मोबाइल बंद कर दिया। ताकि आदमी वापस कॉल कर अगर बात करना चाहे तो भी न कर पाए बात। देखा जाए तो तयशुदा वक्त पर न आने की वजह से ऐसा व्यवहार अपने ग्राहक के साथ करने की बात वह सोच भी न सकती थी। पर उस समय लड़की को कुछ भी देख न पाने की तलब महसूस होने लगी। वह अपने एकांत में जाना चाहती थी जहाँ बंद आँखों से वह सिरजने का काम कर सके। कल के छोड़े गए बिंदु से आगे का प्रस्थान। पर वह उस वक्त मयस्सर न था। हताशा से उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने फौरन घर लौटने का फैसला किया।

घर पहुँच कर ही उसने मोबाइल ऑन किया। पर वहाँ कोई भी संदेश या मिस्ड कॉल न थी। निश्चय ही आदमी की घर खरीदने की कोई मंशा न थी। या कि...। हे भगवान! पिछले दिन की उसकी आखिरी टिप्पणी उस घर पर...! उसने कहा था कि घर बेजान था। तो क्या वाकई घर उसे पसंद न आया और इतना नाउम्मीद हो गया वह उसकी घर दिखाने की क्षमताओं से कि उसने दूसरी किसी एजेंसी का दामन थाम लिया। यह सब होता तो वह बॉस को खरी खोटी सुना चुका होता और सूद समेत गालियाँ उस तक पहुँच गई होतीं। साधारण सी यह बात क्यों नहीं मान ली जा सकती कि किसी काम में फँस गया होगा वह! घर देखना ही उसका एकमात्र एजेंडा थोड़े न होगा। और रही बात मैसेज या कॉल की तो व्यस्तताओं में कई बार ऐसा होता है कि चाह कर भी संवाद कर पाने का स्पेस नहीं मिल पाता। ऐसे ख्याल ही उस तक आते थे अमूमन, सबसे व्यावहारिक किस्म के ख्याल... परिस्थिति चाहे जो भी रहे। पर इस मर्तबा अतिनाटकीय किस्म के ख्याल उसे लुभा रहे थे। सीधा सपाट सा नहीं सोचना चाह रही थी वह! जो भी था... वह ज्वार भाटा किस्म के भावों से लबरेज था।

एक चेतना उसके मन में यह भी जाग रही थी कि निश्चय ही बाद में वह इन पलों पर ठहाके लगाएगी... खुल कर। पर भविष्य की घटनाओं का ठीक ठीक भान होने के बावजूद भी वह भावनाओं में बह जाने को आतुर थी। और भावनाओं की बुनियाद क्या! बस दो मुलाकात और दस बीस अटपटे संवादों का आदान प्रदान। ऐसे में क्रोध, अपमान, घृणा, लगाव... किसी किस्म की भावनाओं का आध्धार न बनता था। उसका सिर नाचता था। पर आँखें बंद करने पर भी तसल्ली न थी। किसी छेनी हथौड़ी को छूने की कूव्वत न थी मन में। उसने एक रात पहले की अधूरी आकृति को भी देखा। शायद वही मन में कुछ ललक जगा पाए! और एक बार रचने के सुख में लीन हो जाने के बाद इस नए भावनात्मक उथलपुथल के पल धूमिल पड़ जाएँ।

पर उस रात कौशिकी सक्सेना ने दूसरी मूर्तियों को तवज्जो दिया। दुहराव की उपज, वे मूर्तिद्वय। उन दोनों को सामने रख कर वह एकटक देखती रही। उस आदमी की कही बातों के परिप्रेक्ष्य में... अपलक। वह उन चेहरों पर नमी और हँसी का अनुपात नाप ही रही थी कि फोन की घंटी बजी। नौ की तीन आवृत्तियों से समाप्त होने वाला नंबर... जिससे संवाद स्थापित हो पाने की आस में पूरा एक दिन गुजरने के कगार पर था। उसने फोन उठाया।

''आपने जो पता और समय भेजा था... वही तय रहा कल के लिए।'' उधर से आवाज आई।

''ठीक है।''

''पहचान के लिए फिरोजी रंग। दुआ कीजिएगा कि उस पते का ठिकाना एक रोज में बदल न जाए।''

''ठीक।''

''और कि कल सुबह ग्यारह बजाने में घड़ी की सूई ज्यादा वक्त न लगाए।''

''अच्छा।''

''पर मुझे तो अभी माँगी गई दोनों मन्नतों पर शक हो रहा है।''

इस बार वह मौन रही।

''कोई सवाल जवाब नहीं! अगर आप एक दिन में ही इतनी बदल सकती हैं तो इमारत के पते का या घड़ी की सूई की चाल का बदल जाना क्या बड़ी बात है...!''

उस हँसी के समानांतर लड़की की आँखों से ठोढ़ी तक एक गीली लकीर खिंच गई। क्या बेहतर न होता कि वह भी अपने आप पर ठहाके लगाती। ऐसा दरका हुआ मन कि एक जरा सी आहट पर चाक चाक हो जाए! आहट भी उस आदमी की जिसका चेहरा तक ठीक ठीक स्मरण नहीं कर पा रही थी वह। वह व्यक्ति इतना मतलबी था कि अपने चेहरे की एक जरा झलक तक नहीं आने दे रहा था उसके ख्यालों में। और वह ऐसी ढोल निकली कि अपने विचलन की सारी गठरी खोल बैठी एक फोन कॉल पर। फोन के उस पार से वह क्या अब तक न पा सका होगा उसकी आवाज का रुँधापन। और आत्मसमर्पण वाले ऐसे जवाब! सामने वाला मजा लेता जा रहा था और वह उघाड़ती जा रही थी अपने मन को।

उसका मन किया कि जाए ही न वह। लेकिन कंपनी की जिम्मेदारियों के नाते एक बंधन था। हालाँकि यह तर्क कितना खोखला था, उसे इस बात का अंदाजा भी था। और वह जानती थी कि मर्जी न हो, तो नहीं जाने के रास्ते थे मौजूद। इसी ''जानने।'' को झुठलाने के लिए उसने एकदम वाहियात तरीके से तैयार किया अपने आप को। कोई बनाव सजाव नहीं। बालों को पीछे की तरफ बाँध कर एक पोनीटेल। हरा पीला बंधेज का कुर्ता, मूँग दाल के रंग की लेगिंग्स और कत्थई लाल दुपट्टा। इतने सारे अलग अलग कुल गोत्र के रंग थे पर फिरोजी के खानदान की उपस्थिति न रहे... इस बात की विशेष सावधानी थी।

वह नियत समय से पहले पहुँची थी, फिर से। एक रोज पहले वाली वह जगह उसे बड़ी अपनी अपनी सी लगी। उसने एक रोज पहले वाले टेलीफोन बूथ की शेड वाली जगह चुनी अपने लिए। वह आया। उस शाम जाते वक्त कौशिकी सक्सेना उसका ड्राइवर वाला तामझाम देख चुकी थी। आज वह खुद गाड़ी चला कर आया था। भूरे रंग की कमीज थी। लड़की का मुँह टेढ़ा हो गया। उसके कपड़ों के रंग से उसका क्या लेना देना।

वह उतर कर चुपचाप खड़ा हो गया। अपनी गाड़ी से जरा सा दूर हट कर। अन्यमनस्क सा एक तरफ देखता। किसी किस्म के जोश, उत्सुकता या तलाश के भाव नहीं थे आदमी के चेहरे पर। लड़की ने अपनी एक दिन पहले वाली दशा याद की। बेचैन, इधर उधर ताकती, झुँझलाती छवि। कितना अंतर था दोनों के इंतजार में! सामने वाले की निष्पृहता देख कर लड़की को फिर से बेचैनी होने लगी और झुँझलाहट भी। उस तक बढ़ गई वह। आदमी ने उसे देखा... भौंहें चढ़ाई। बस इतने तक की इजाजत दी कौशिकी सक्सेना ने उसे। इसके बाद वह सरपट चलने लगी। आगे आगे। यह फ्लैट छठे तल्ले पर था। उसने लिफ्ट की तरफ इशारा कर कहा - ''आप चलिए सिक्स्थ फ्लोर पर। मुझे सीढ़ियों से आना पसंद है।''

''मेरी पसंद की चीजें आपको पहले से पसंद होती हैं... इसमें नया क्या है?'

अजीब मुसीबत थी। तीसरे तल्ले पर चढ़ कर लड़की ने सोचा। अगर यह आदमी पीछे पीछे न आ रहा होता तो रुक कर सुस्ताया जा सकता था। वह एकदम धीमे धीमे चलने लगी। आदमी बगल से गुजर गया उसके।

छठी मंजिल पर आकर मुँह बंद किए साँसों को सँभालती रही वह कुछ देर। आदमी चुपचाप खड़ा बंद दरवाजों का स्थापत्य परख रहा था। यह घर भी अर्पाटमेंट की बुकिंग के वक्त ही खरीदा जा चुका था। पर यह बन कर अब तैयार हुआ था और फ्लैट का मालिक इसे बेच कर मोटा मुनाफा कमाना चाह रहा था।

दरवाजा खुला। घर में कुँवारेपन की खुशबू थी। उसमें प्रवेश करने के बाद कौशिकी सक्सेना की उपस्थिति धूमिल पड़ गई। आदमी अकेला ही घूमता रहा कमरों में। उसने चाहा कि खिड़कियों के पल्ले खोल दे ताकि ग्राहक कमरे में आने वाली धूप और हवा की नापजोख कर सकें। पर उसके कदम जैसे किसी ने रोक से लिए थे। वह हॉल में खड़ी रह गई थी और उसके आँख और कान दौड़ कर आदमी का कमरों में आना जाना परख रहे थे। अतिश्योक्ति अलंकार में उभचुभा कर तैयार की गई उसकी व्यावसायिक जबान अपना ढब दिखाना चाहती थी पर दाँतों ने ऐसी मजबूत किलेबंदी कर दी थी कि कोई करिश्मा न रचा जा सका। बड़ी अजीब सी स्थिति थी। कशमकश से भरी। या तो उसे वहीं खड़े रह जाना था या कदम घसीट कर आदमी के पीछे पीछे उपस्थित रहना था। निश्चय ही पहला विकल्प सम्मानजनक था।

कुछ देर बाद वह व्यक्ति नमूदार हुआ कुछ देखने के लिए और उसने चौंक कर कहा - ''अच्छा आप हैं यहाँ!''

लड़की झेंप गई।

''आइए मैं आपको घर दिखाता हूँ।''

''इस घर की छत और जमीन का रंग एक दूसरे के लिए बना है।'' यह कहते हुए उसने लड़की के कपड़ों पर गहरी नजर डाली। कौशिकी सक्सेना अकबका कर छत का रंग देखने लगी। बाल्कनी एक ही थी हॉल में। उस तरफ घर में दीवार की जगह काँच का स्लाइडिंग दरवाजा था और सुरक्षा के लिए लोहे की ग्रिल भी।

उसे सरकाते हुए आदमी ने कहा - ''प्रकृति के साथ होने के लिए यह जगह बेहतर है।''

घर के एक कमरे से लगा एक गोलाकार प्रकोष्ठ था, जिसके चारों तरफ ऊपर से नीचे तक खिड़कियाँ थीं थोड़े थोड़े दीवारों के अंतराल पर।

''जब अपने को अकेलेपन में कैद कर लेना हो तो यह उम्दा विकल्प।''

वाकई वह जगह पिंजड़े का सा नजारा देती थी।

''सब कुछ बेहद सुंदर। पर माफ कीजिएगा मैं खूबसूरती की तलाश में नहीं हूँ। चलें?'

अचंभा नहीं हुआ उसे। क्योंकि खूबसूरती क्या कहें... निश्चय ही यह व्यक्ति घर की ही तलाश में नहीं था। पर अगर यह सही है कि यह खेल था तो वह भी हार क्यों मान ले!

''कैसा घर चाहिए था आपको?' ताला बंद करते हुए उसने पूछा।

''आपके जैसा।''

चाभी गिर गई लड़की के हाथों से।

''क्या बकवास है!''

''सच कह रहा हूँ। हालाँकि शब्द मुझे दूसरे चुनने चाहिए थे। पर लब्बोलुआब यही है। आप एक आदर्श इमारत जैसी ही तो हैं।''

''कैसे हूँ मैं इमारत आदर्श इमारत।'' लड़की तमतमा गई।

''मेरे शब्दों के चयन में मेरी सपाटबयानी का नमूना देख कर भी आप इस सवाल का जवाब सुनना चाहती हैं! ये तो जुर्रत हुई। शब्दों के सौंदर्यशास्त्र को समझने के लिए थोड़ा वक्त चाहूँगा। फिर आपके सवाल का जवाब देना मुनासिब होगा।''

थोड़ा रुक कर उसने कहा - ''वैसे सच कहूँ तो मुझे पता है कि आपको भी इस सवाल का उत्तर मालूम है।''

लड़की ने मुँह फेर लिया।

पर मुँह का फेर लिया जाना समाधान था क्या! मुँह फेर लेने से सिर्फ सीढ़ियों तक पहुँचा जा सकता था... जहाँ से वापसी का रास्ता शुरू होता था। वह हाँफने लगी थी सीढ़ियाँ उतरने में भी।

''क्या आप आगे भी घर देखना चाहेंगे?'

''पहले ही आपको बता दूँ कि वह मेरे जैसा नहीं है।''

आदमी पहले सवाल का जवाब देने को मुँह खोलता कि लड़की ने दूसरा संवाद बोल दिया। वह मुस्कराया। उसकी मुस्कराहट ने लड़की के चेहरे पर मँडराते विचलन के बादल को फूँक कर उड़ा देने की बजाए उसमें थोड़ी हलचल ही पैदा कर दी।

''देखने वाले के नजरिए पर निर्भर करती है किसी चीज की छवि। आपने तो फैसला सुना दिया पर हो सकता है मेरी नजर कुछ और देख ले।''

लड़की का चेहरा तरल होने लगा। उसे लगा कि वह किसी भँवर के करीब खड़ी है और उसमें प्रवेश कर जाना ही उसकी नियति है।

''अब देखिए न आपके इस दुपट्टे पर लाल बुंदके हैं... आप कहेंगी। पर मैं इसमें फिरोजी अक्स देख पा रहा तो...।''

लड़की ने अपने चेहरे की तरलता को पोंछ डालने के लिए दुपट्टा हाथ में उठाया ही था कि उस आदमी की बात ने मुँह तक उठे मुट्ठी भर मैरून लाल रंग को नीचे गिरा दिया... हठात्। गिर कर वे फिरोजी आभा में बिखर गए और लड़की के शरीर में मद्धम कंपन होने लगा।

''तो मैं ही गलत कैसे करार दिया जा सकता हूँ?' आदमी ने अपना वाक्य पूरा किया।

कौशिकी सक्सेना ने कुछ नहीं किया। बगैर उसकी मर्जी उसकी आँखें उठीं ऊपर और पलकें जाकर उस आदमी के चेहरे पर छितरा गईं। लड़की की आँखों की कोर नम थी हमेशा की तरह। पलकें हर घड़ी नम कोरों के सान्निध्य के कारण सिमसिमी सी रहती थीं। उन पलकों के सीलेपन ने आदमी को छू लिया। दोनों एक दूसरे को देखते रहे। अपलक नहीं... पलकें थीं उनके बीच में। एक अहम किरदार के रूप में।

''आपकी पलकों का एक कतरा अभी आपके दाहिने गाल पर है।''

कौशिकी सकसेना ने दाहिने गाल पर हथेली फेरी। एक पलक चिपक गई उँगलियों से। आदमी ने अपनी मुट्ठी आगे कर फूँकने का अभिनय कर कुछ संकेत दिए। पलकों को फूँक कर उड़ाते वक्त जो माँगा जाए वह पूरा हो जाएगा... इस मान्यता का संकेत।

लड़की ने वैसा ही किया। यंत्रवत्। मुट्ठी पर पलकें रख कर आँखें मूँद कर फूँक मारी गई। आँखें खुलीं उसकी। पलक अपनी जगह पर कायम थी। कौशिकी सक्सेना के होंठ एक फीकी मुस्कान की जद तक फैले। उसने झेंप कर मुट्ठी गिरा ली पर पलक अभी तक चिपकी थी उसी जगह।

''आपने जरूर कोई बड़ी चीज माँग ली होगी! पलक जिसके बोझ से दब कर उड़ न पाई होगी।''

लड़की ने तपाक से कहा - ''हाँ मैंने माँगा कि मैं जान सकूँ कि आप वाकई घर खरीदना चाह भी रहे या...।''

''मुझे लग गया था कि जरूर कोई बड़ी विश रही होगी।''

वह हँसा और लड़की भी उस हँसी में बह गई।

अगले फ्लैट को दिखाते वक्त लड़की ने अपने को एकदम हल्का महसूस किया। तनावमुक्त। वह आदमी के साथ साथ चलती रही। घर में रंगों का चयन भड़कीला था। कमरे की दीवार... फर्श हर जगह। घर के हर पहलू पर दोनों की छोटी छोटी टीका टिप्पणी जारी थी।

आदमी ने कहा - ''फ्लैट आपकी तरह तो नहीं पर इसकी टाइल्स और पेंट पर आपके कपड़ों की छाप जरूर है।''

यह बोले जाते वक्त लड़की बेडरूम में बनाई गई लकड़ी के सेल्फ पर लगे आईने के सामने थी। उसने उस आईने में अपना हुलिया देखा और बुरी तरह झेंप गई। उसे सुबह की अपनी मूर्खता पर बड़ा क्रोध आया और कपड़ों का यह चयन सख्त नागवार लगा। मौसमी फूलों के गुलदस्ते से ज्यादा क्या लग रही थी वह! तत्काल उसने अपने आप को उस आईने के सामने से हटा लिया। पर आईने के आगे से अपने को हटा लेना कुछ भी नहीं बदल सकता था। नुकसान तो वह कर चुकी थी। कैसा नुकसान उसके अंतर से सवाल उठा और वह कोई मन बहलाने लायक जवाब भी न जुटा पाई।

''यहाँ आएँगी जरा?'

कौशिकी सक्सेना ने अपने अंतर का सामना करने वाले अध्याय को सरसरी निगाह डाल कर पलट दिया और उसके पास जाकर खड़ी हो गई। आदमी ने सामने की खिड़की की तरफ इशारा किया।

''यह है तो साधारण रुचि का घर, पर इसमें संगीत है।''

लड़की ने देखा। आदमी की तर्जनी खिड़की के नीचे जिस बिंदु पर जाकर ठहर गई थी उसके समानांतर एक बिंदी चिपकी थी। मटमैली लाल बिंदी।

''कोई औरत घर की फिनिशिंग को आखिरी टच देने के अभियान में शामिल रही होगी। संभवतः खिड़की पर पॉलिश चढ़ाने का काम किया होगा उसने।''

''डिठौना!'' लड़की के मुँह से निकला।

''आप इस तरह एकटक देखेंगी तो हो सकता है डिठौना अपना प्रभाव गँवा दे और नजर ही लग जाए।''

उस मुस्कान के समानांतर वह झट से पीछे मुड़ गई।

''आप मुड़ने में एकदम वक्त नहीं खरचतीं... मानना पड़ेगा।''

उसे झुँझलाना था... पर बदले में उपजी मुस्कान को जल्दी से समेट लेना चाहा लड़की ने... इसके पहले कि पीछे चलता आदमी देख पाए कुछ भी।

''क्या और कोई घर बचा है?'

लड़की ने लक्ष्य किया कि अपनी गाड़ी के पास खड़े होकर इस सवाल को पूछते वक्त वह खासा शुष्क था। एक ऊबे हुए ग्राहक की झलक थी वहाँ, जो दुकानदार के उसका स्वाद न पहचान पाने की खींझ से पैदा होती है।

लड़की इस परिवर्तन से सकपका गई और दुकानदार के संवाद बोलने लगी - ''हमें थोड़ा वक्त और दीजिए। हम पूरी कोशिश करेंगे कि आपकी पसंद के अनुसार घर जल्द से जल्द तलाश सके।''

''कितना समय चाहिए और आपको?' वह कुछ ज्यादा ही तल्ख हो गया।

लड़की का चेहरा सफेद पड़ गया- ''बमुश्किल दो दिन और।''

''याद रखिएगा मैंने अर्जेंट रिक्वायरमेंट का विकल्प दिया है।''

''जी जरूर। क्या लोकेशन का कोई और विकल्प देंगे आप?'

वह कुछ पल मौन रहा। फिर उसने सिर डुला कर कहा- ''नही।''

उसने मुड़ने में शर्तिया लड़की से भी कम वक्त लिया। गाड़ी का दरवाजा बंद हुआ और गाड़ी चल पड़ी। कोई अभिवादन... कोई शिष्टाचार नहीं। लड़की हतप्रभ सी खड़ी रह गई। उसने पिछले दिन के आखिरी पलों को याद किया। आज का अंत भी उस दिन की पुनरावृत्ति ही थी। आखिरी पलों में उसके पीछे लौटते आदमी के मन में ऐसा कौन सा परिवर्तन आ जाता था कि अंतिम निशान पर कटुता के रंग ही होते थे।

अपनी स्कूटी स्टार्ट करते वक्त लड़की का ध्यान बंद मुट्ठी पर गया। उसकी हथेली पर ऊपर की तरफ... वह पलक अभी भी चिपकी थी। उसने दूसरे हाथ की चुटकी से उठाया उसे। ऊपर तक। फिर दोनों उँगलियों को अलगा दिया। और वह पलक को किस्तों में आजाद होता देखती रही।

क्या दुनिया में परिवर्तन हर जगह एक साथ होता है! घटनाओं ने जो असर उस पर छोड़ा था, क्या उसके छींटे दृश्य के दूसरे पात्रों पर भी गिरे होंगे क्या एकांत में जिस तरह से वह बातों को धुन रही थी... क्या कोई तानाबाना दूसरे भी इससे बुन पा रहे थे! ऐसे सवाल उसे छू रहे थे। ये सवाल कीमती थे उसके लिए। तभी वे छेनी की जद में ना आ पाएँ यह लियाकत रखते हुए वह गढ़ रही थी प्रतिमा।

अगले रोज कौशिकी सक्सेना दफ्तर पहुँची ही थी कि अप्रत्याशित रूप से आदमी का फोन आ गया। पिछली शाम का एपिसोड जैसे हुआ ही न हो, वह इस तरह खिला हुआ था उस पार से। लड़की से पूछा गया कि क्या उस रोज भी वह किसी संभावित विकल्प को दिखाने की इच्छा रखती है।

कौशिकी सक्सेना के दिमाग में बहुत सारी बातें एक साथ आने जाने लगीं। न बोल कर के अपना भाव बढ़ा लिया जाए कि झूठ मूठ की हाँ कहके मिलने का एक मौका जुगाड़ लिया जाए! सामने वाले ने रातोंरात पाला क्यों बदल लिया। हाँ कहे जाने की स्थिति में घर कौन सा दिखाया जाए आदि आदि।

''हाँ है। घर है। मैं आपको मैसेज करने ही वाली थी।''

''तो कर दीजिए।''

अच्छा हुआ कि मैंसेज का विकल्प उसके दिमाग में आ गया क्योंकि फोन पर पता बताने में हकलाहट हो सकती थी। पर मैसेज से सच झूठ की क्या परख संभव थी भला! उसने एक बेहद औसत विकल्प का लोकेशन भेज दिया। मैसेज टाइप करते वक्त उसके दिमाग में एक चुस्त ख्याल आया। इससे उस आदमी के विषय में ज्यादा कुछ जाना जा सकता था। उसने बिजली की गति से उस विचार को अंजाम दिया। सवालों का एक घेरा बनाया गया जिसमें ओल झोल जानकारियाँ जैसे - फोन नंबर, ईमेल आईडी, आय, वाहनों की संख्या आदि आदि की किलेबंदी की गई और मध्य में वैवाहिक स्थिति की जानकारी को छिपा कर रखा गया। यह प्रारूप बनाते वक्त लड़की के भीतर एक तीव्र आत्मधिक्कार ने सिर उठाया। पर लड़की ने इस व्यावसायिक तर्क से उस भावना को कुचल दिया कि उस क्वेश्चनेयर के जवाबों से वह ग्राहक की पसंद नापसंद के करीब पहुँचेगी। बल्कि अगर वह सफल रही तो सवालों की इस सेना को वह कंपनी से आधिकारिक मान्यता दिलवाने का भी प्रयास करेगी। तर्क खोखले थे जरूर पर फर्क विशेष न पड़ा क्योंकि तब तक उसके तैयार किए सवालों का प्रिंटआउट निकल कर आ चुका था बाहर।

साजो सामान से लैस होकर वह जगह पर पहुँच गई। अभी वह टैक्सी से उतरती कि आदमी का फोन आ गया। उस जगह के कुछ लैंडमार्क लड़की ने फिर से बताए। बहरहाल लड़की को इंतजार के पल खले नहीं जरा भी। कारण कि वह पूरी तरह से संशय और व्यस्तता के साये में थी। आदमी के आते ही सवालों का परचा बढ़ा देना था कि बात में उलझा कर बीच में घेर लेना था उसे या कि चलते वक्त थमा देने थे सवाल। किस्म किस्म की रणनीति अपना पासा फेकने को आतुर थी। उसके लिए अपने मन की तड़फड़ाहट को काबू कर पाना एक बड़ी चुनौती साबित हुआ उस समय।

आदमी कुछ ज्यादा ही प्रसन्न था।

''आह! फिरोजी!''

लड़की की सारी योजना ध्वस्त हो गई। उसके कपड़े वाकई फिरोजी थे। ये गलती कैसे हो गई उससे। कौशिकी सक्सेना ने अपने माथे का पसीना पोंछा और दायाँ हाथ बढ़ा दिया - ''ये फॉर्म भरिए पहले।''

''यहाँ पर!'' आदमी ने हवा में हाथ हिलाया - ''क्या इस फ्लैट को देखने के पहले फॉर्म भरना होता है?' उसने अतिरिक्त भोलेपन से पूछा।

''हूँह खराब अभिनय।'' लड़की बुदबुदाई।

''सधा हुआ वस्त्र विन्यास।'' वह मुस्कुराया।

लड़की चिढ़ कर तेज तेज चलती हुई अपार्टमेंट की लिफ्ट में दाखिल हो गई। उसने दसवीं मंजिल का बटन दबाया।

''क्यों दसवीं मंजिल तक सीढ़ियों से नहीं चढ़ सकतीं आप?' आदमी ने ऊपर से नीचे तक उस पर आँखें फेरते हुए कहा।

''ग्यारहवीं मंजिल। इस बिल्डिंग की लिफ्ट ऑड नंबरों पर नहीं रुकतीं। दसवीं मंजिल से आगे एक फ्लोर चढ़ कर जाना होगा सीढ़ियों से। यह खामी है इस फ्लैट की।''

बात खत्म करने के पहले ही लड़की को अपनी भूल का अहसास हुआ। भयानक भूल। चाभी!

''निकलिए मिस सक्सेना। आपका इवेन नंबर आ गया।''

''चाभी..।'' उसने भय से आँखें छितरा कर सामने वाले को देखा।

''बढ़िया अभिनय।'' आदमी बुदबुदाया।

''अभिनय?' लड़की की आवाज का स्वर बदल गया भौंहों के वक्र होने की ताल पर। पर अगले ही पल वह शांत पड़ गई।

''मैं शर्मिंदा हूँ।''

''बात ही ऐसी है।'' वह लिफ्ट के दरवाजे पर पाँव अड़काए अदा से खड़ा था।

''वापस चलें?' लड़की ने अपनी झुँझलाहट पर शालीनता का आवरण चढ़ा कर कहा।

''वक्त कितना बरबाद हुआ न मिस सक्सेना।'' उसने लिफ्ट के भीतर आते हुए कहा।

''यह घर अच्छा नहीं था भीतर से। आपको पसंद नहीं आता।''

''मेरी पसंद... नापसंद...! आप सही रास्ते पर हैं।''

''ये फॉर्म भर दीजिए।''

''लिफ्ट के बाहर निकल पाने के लिए भी फॉर्म! अजीब घर है।'' आदमी मुस्कराया।

लड़की को अहसास हुआ कि गलत जगह पर बात चलाई उसने पर इस वार को खाली नहीं जाने देना था। लिफ्ट से निकलते ही उसने आदमी को पकड़ा दिया कागज। कलम भी। वह दीवार से कागज को सटा कर लिखने लगा। उसने बेमन से जल्दी जल्दी सवालों को निबटा कर कागज को लड़की के हवाले कर दिया। कौशिकी सक्सेना ने सरकती निगाह से देखा। कुछ कॉलम खाली थे। एक वह कॉलम भी, जिसे किलेबंदी कर पेश किया गया था।

''कुछ सवाल बचे रह गए।'' लड़की ने मन को मजबूत करके कहा।

''पूछिए क्या बचा रह गया?'

लड़की काँप उठी। क्या समझ चुका वह सब कुछ?

उसने अनजान बनते हुए कागज बढ़ा दिया।

आदमी ने जन्मतिथि लिखी और अविवाहित के आगे सही का निशान लगा दिया। लड़की ढंग से राहत की साँस ले पाती कि आदमी ने उसकी तरफ मुड़ कर कहा - ''कुछ खाएँगी आप?'

''हाँ।''

''क्या?' आदमी ने इस तरह पलकें झपकाईं मानों लड़की का उत्तर अप्रत्याशित था उसके लिए।

''कोई भी चीज। छोले भटूरे या आइस्क्रीम।''

आदमी ने भौंहे उचकाईं अदा से।

''चॉकलेट या बिरयानी...।'' वह जोर से हँसा।

''मुझे सच में समझ में नहीं आता कि आप कब क्या बोलती हैं। छोले भटूरे और आइस्क्रीम, एक दूसरे का विकल्प हो सकते हैं ये मैं कभी कल्पना नहीं कर सकता था।''

आदमी हँसी नहीं सँभाल पा रहा था और क्रोध का सुरूर लड़की पर तारी होने लगा था।

''सोच कर बताइए।'' आदमी ने अपने को संयत किया। उसने अगले पल कहा - ''ओह! गलती मेरी है। पहले चल कर बैठिए कहीं। फिर बताइएगा सोच कर।''

बड़ी हास्यास्पद स्थिति थी। बनावटी ढंग से एक जगह बैठना और फिर किचकिच माहौल में खाने के विकल्प के बारे में सोचना। चॉकलेट और बिरयानी, कितना मजाक बनाया था आदमी ने उसका। पर वास्तविकता यह थी कि वह इस हास्यास्पद दृश्य का पात्र बनने जा रही थी और वह भी आदमी की गाड़ी में बैठ कर। ड्राइवर था इस मर्तबा और वे दोनों पीछे बैठे थे। वह ड्यूटी पर थी। आई थी आदमी को घर दिखाने पर चाभी छूट गई। फिर एक बेस्वाद बकझक के बाद वह आदमी की ही गाड़ी में बैठ कर क्या खाना चाहिए यह सोचने के लिए बैठने की जगह तलाश करने जा रही थी। कुछ भी तर्कसंगत नहीं था पर हुआ जा रहा था सब सहजता से।

''एक बार जरा वह कागज तो दिखाइए।''

''क्यों?' लड़की को करंट लगा। कहीं उसे शक तो नहीं हो गया।

''चेक करूँ, कहीं कोई डिटेल मैंने गलत तो नहीं डाल दी।'' उसने शरारत से कहा।

लड़की ने मुँह फेर लिया।

''पर ये डिटेल तो पहले दिन भरवाना चाहिए था। अब कैसे याद आया आपको?'

''भूल गई थी।'' लड़की ने खीझते हुए बात को घसीटा।

''मिस सक्सेना... आप शायद।''

''मेरे नाम के आगे बार बार आप मिस क्यों लगाते हैं?' लड़की ने उसकी बात को काटते हुए चुनौती दी।

''आप इतना नाराज किस पर रहती हैं हर वक्त?'

लड़की इस सवाल से चौंक गई। पर दम था उसकी बात में। वाकई नाराजगी शाश्वत थी उसकी। पर किस पर?

''ओ अब मैं समझा आपके ऐतराज के माने। आप हैरान हो गईं कि आपके नाम के आगे मिस लगाने का कान्फिडेंस पाने के लिए मुझे कोई क्वेश्चनेयर भरवाने की जरूरत नहीं पड़ी।''

आदमी की हँसी ने पल भर पहले के लड़की के आत्ममंथन की ताल बिगाड़ दी। तो वह सब कुछ जान चुका था! शर्मनाक था यह सब।

''सॉरी। आई वज जस्ट जोकिंग।''

राहत की तरह यह संवाद आया। दूसरी राहत की बात यह थी कि लड़की को उसके साथ इस तरह पास पास बैठ पाने से आजादी मिलने वाली थी क्योंकि... आदमी ने गाड़ी रुकवा दी थी।

गाड़ी से उतरते वक्त लड़की ने अपने आप को टटोला। संभवतः वह बिल्कुल भी भूखी नहीं थी। फिर भी वह आदमी के पीछे पीछे गई।

बैठते हुए आदमी ने कहा - ''आपने कितनी देर से कुछ भी नहीं कहा।''

लड़की उस वक्त अपने आप को सफाई देने में व्यस्त थी कि वह आखिर इस आदमी के पीछे कर क्या रही थी वहाँ।

''बताइए इनमें से कौन सा नैपकिन पसंद है आपको किसे रखेंगी आप अपने हिस्से में?'

लड़की फिर भी मौन रही टेबल के नैपकिन को देखती।

''क्या आप कंफर्टेबल नहीं हैं क्या हमें चलना चाहिए यहाँ से?' आदमी वाकई परेशान हो गया।

लड़की ने मेज पर नैपकिन की जगहें बदल दीं आपस में। आदमी के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई।

''जिस तरह का व्यवहार मेरे साथ होता है आपका... क्या वैसा हमेशा करती हैं?'

लड़की ने चम्मच पटक दिया जोर से मेज पर। आदमी ने चम्मच को उठा कर वापस लड़की की तरफ बढ़ा दिया। लड़की ने दोनों हाथों से उस चम्मच को थाम लिया। आदमी ने चम्मच का एक सिरा थामे रखा।

''चलिए यह तय रहा कि जितनी देर हम यहाँ रहेंगे यह चम्मच हमारे बीच सेतु बन कर रहेगी। हम इस सूत्र को पकड़े रहेंगे। हूँ?'

''कितने चतुर हैं आप! आपका एक हाथ रहेगा यहाँ और मेरे दोनों हाथ व्यस्त रहेंगे तो मैं खाऊँगी कैसे?'

''इस समस्या के निदान के कई रास्ते हैं पर उनकी तरफ ध्यान दिलाने की बजाए मैं समानता को चुनूँगा। आप अपना एक हाथ हटा लीजिए।''

लड़की ने आदमी की देखादेखी अपने दाहिने हाथ को आजाद कर दिया।

''जिसने चम्मच गिरा दिया उसका क्या होगा?' लड़की ने पूछा।

''चम्मच जो गिरा दे वह हार जाए ऐसा खेल नहीं है ये। यह एक सामूहिक प्रयास है। जो कमजोर पड़ जाए उसकी मदद करनी है दूसरे को और मिल कर इस पुल को थामे रखना है।''

बैरा आया और लड़की ने अपने लिए स्वीट लाइम सोडा मँगवाया। बैरे ने आदमी की तरफ देखा। उसने स्वीकृति में पलकें झपकाईं।

''आपको नेलपॉलिश लगाना पसंद नहीं?'

लड़की को लगा चम्मच का सिरा उसकी उँगलियों से छूट जाएगा। उसकी नजरें अपने नाखूनों पर गईं। हे प्रभु! कैसा भद्दा लग रहा था उसका हाथ! नाखून जैसे तैसे कटे हुए। न नाखूनों पर रंग न कोई अँगूठी। कलाई भी सूनी। हाथ तो उसका जाना पहचाना रोज जैसा ही था पर उसकी आकर्षणहीनता अभी उभर कर लड़की के सामने आई थी। वह मन ही मन खुश हुई कि उसने दाहिना हाथ हटा लिया था वरना उस हाथ की उँगलियों पर तो छेनी चलाने की वजह से निशान भी पड़ गए थे कहीं कहीं।

''ये है आपकी खेल भावना! सामने वाले का ध्यान भंग करना टीम एफर्ट है!''

''मैंने तो बस एक सवाल पूछा था। वह भी इस जिज्ञासा से भर कर कि क्या मेरी तरह आपको भी बेवजह की लिपाई पुताई नापसंद तो नहीं?'

उनकी ड्रिंक आ गई। लड़की ने पिछली बात से ध्यान हटाने के लिए ग्लास को अपने पास खींच कर स्ट्रॉ की मदद से घूँट भरी। इस क्रम में उसकी बाईं कनपटी से बालों की एक लट निकल कर सामने झूल गई ठोढ़ी के समानांतर। उसके बाएँ हाथ ने तत्परता दिखाई और वह आने लगा लटों पर लगाम कसने। चम्मच लगभग छूट ही गया था। आदमी ने अपनी उँगली को आगे तक बढ़ा कर चम्मच का पूरा भार थाम लिया। लड़की की उँगली का आखिरी सिरा अलगता चम्मच से कि उसे अपने कर्तव्य का भान हुआ और उसने वापस पकड़ लिया चम्मच को।

आदमी लड़की की ठोढ़ी तक झूलती लट को देखता रहा। दो पल की यथास्थिति के बाद लड़की ने दाहिने हाथ से कनपटी की सरहद के पार पहुँचा दिया नन्हें घुसपैठियों को।

हड़बड़ा कर उसने कहा - ''मुझे लौटना होगा अभी। मैंने देर कर दी बहुत।''

लड़की को अपनी ही कही बात से नाराजगी हुई और उसने तत्काल स्ट्रॉ से ड्रिंक खींचे जाने की रफ्तार धीमी कर दी।

''हम कितने बेवकूफ दिख रहे होंगे न!''

''यह भी हो सकता है कि इससे ज्यादा युक्तिसंगत कोई और पल न रहा होगा इस रेस्तराँ में पहले। महसूस कीजिए कि कितना तादात्म्य स्थापित हो गया है इस पुल के माध्यम से हमारे बीच।''

लड़की ने महसूस किया कि वाकई शुरू के लम्हों का तनाव... हाथ का... कंधे का... निकल गया था और उसकी जगह सहजता ने ले ली थी।

आदमी ने तेजी से अपना ड्रिंक खत्म किया।

''मैं तैयार हूँ। इंतजार में कि आप अपना ग्लास खत्म कीजिए और अपने जरूरी काम पर जाएँ।''

यह क्या अशिष्टता थी! कैसा रूखापन अचानक। लड़की ने अपना ग्लास सरका दिया परे। आदमी ने इशारा कर बेयरे को बुलाया। बिल आया। एक हाथ से आदमी ने पैसे अदा किए।

बेयरे के पैसे लेकर जा चुकने के बाद आदमी ने कहा - ''आपका धन्यवाद! इस टीम वर्क की गरिमा बनाए रखने के लिए।''

उसका चेहरा सख्त था। उसने दाहिने हाथ से चम्मच को पकड़ा और टेबुल पर रख दिया। लड़की के बाएँ हाथ से चम्मच का सिरा छूट चुका था। पर हाथ उसका उठा रह गया उसी जगह। वह स्तब्ध थी।

''चलिए।''

वे उठ गए।

उस रोज के बाद से उस आदमी ने कोई खोज खबर न ली। हालाँकि ग्राहकों से अपेक्षित भी नहीं था कि वे खबर लें। अब ऐसा हो रहा था कि जो भी घर शार्टलिस्ट हो पाता उस इलाके का, उसे खुद कौशिकी सक्सेना ही छाँट दिया कर रही थी। अगर उस रोज की रुखसती किसी अच्छे बिंदु पर हुई होती तो इन घरों को उस आदमी की नजरों से देख पाने का अवसर नहीं चूकती वह। पर आखिरी संवादों की औपचारिकता इतनी मर्मभेदी थी कि वह इसी निष्कर्ष पर पहुँचती कि अबकी उसे ऐसा ही घर दिखाना था जिसमें कि कमी निकाल पाना असंभव होता आदमी के लिए।

घटना के बाद का तीसरा दिन था। वह एक दूसरे खरीददार के लिए सारी जानकारी इकट्ठी कर के अभियान पर निकलने ही वाली थी कि बॉस का फरमान आया कि वह बूढ़ा आदमी जर्मनी से वापस आ चुका था और कौशिकी सक्सेना को अपने तमाम अप्वाइंटमेंट्स अपने सहयोगी को सिपुर्द करके उस बूढ़े से मिलने जाना था। इतनी जल्दी गुजर चुके थे सात दिन। कौशिकी सक्सेना ने अपने को विचित्र से भँवर में फँसा महसूस किया।

बाहर बारिश हो रही थी। फोन ऑपरेटर ने एक परची उसे थमा दी। उस पर उस जगह का पता दर्ज था जहाँ बूढ़े से उसकी मुलाकात होने वाली थी। वह बेवक्त के लिए बरसाती रखती थी अपने पास हमेशा। अब या तो यह होता कि बरसाती की जिल्द चढ़ा कर उसे स्कूटी से उस जगह तक का सफर तय करना होता या फिर टैक्सी ली जा सकती थी। जिल्द वाला ख्याल बेहतर था। क्योंकि वह किफायती था और व्यावहारिक भी... इस लिहाज से कि बूढ़े से मुलाकात का प्रसंग निबटा कर उधर से ही घर निकला जा सके।

कैफे तक पहुँचते पहुँचते उसके आगे के बाल गीले हो चुके थे। लड़की ने बरसाती उतार कर अपने को आजाद किया और तलहथी से गीलेपन को सोख कर बालों की कमी को ढकने का प्रयास किया। नतीजतन आगे की लटें घुँघरुओं की शक्ल में चिपक गईं माँग के दोनों तरफ। पार्किंग से कैफे के गेट तक तेज तेज चल कर, बूँदों से खुद को बचाती वह भीतर दाखिल हुई।

अंदर रोशनी मद्धिम थी और मौसम बेहद सर्द। कॉफी की तीखी खुशबू थी। उसके हाथों पर बारिश की बूँदों ने कलाकारी नहीं की थी। पर लड़की ने अपने हाथों को दुपट्टे से ऐसे रगड़ कर पोंछा मानों नमी के नामोनिशान को मिटा देना चाह रही हो। इतनी अदाकारी निभा ली गई पर बूढ़ा नहीं दिखा उसे कहीं भी। उसने कलाई की तरफ देखा। क्या वह वक्त के पहले थी!

एक बैरा उसके पास आकर कुछ फुसुसाया... अदब से। कौशिकी सक्सेना उसकी कही बातों का एक शब्द भी न सुन पाई। पर वह समझ गई कि वक्त उससे पहले है। उसने देखा बूढ़ा दूर कोने में बैठा उसे देख रहा था।

उसे अपने आप पर हँसी आ गई। वह खुद नहीं जानती थी कि वह क्या करने आई थी वहाँ! निश्चय ही जो भी होने वाला था यहाँ - उसका उसके प्रोफेशन से दूर दूर तक कोई संबंध न होता। ऊपर वाला उसे अनजान सी स्थिति में धकेल कर मजे ले रहा था। खतरनाक बात यह थी कि इस अप्रत्याशित स्थिति में उसकी खुद भी दिलचस्पी जाग गई थी।

बूढ़े की मेज तक पहुँच कर बगैर किसी संकेत, आग्रह या आदेश की प्रतीक्षा किए, वह धप्प से बैठ गई। बैठने के अगले पल ही उसने संतुलन खोया और तीन छींकें क्रमवार उपस्थित हो गईं। उसने माफी माँगने के लिहाज से माथा उठाया बूढ़े की तरफ तो माँग से एक मोटी बूँद टपक गई ललाट के बीचोंबीच। यह सब इतना प्रभावशाली था कि बूढ़े ने तुरंत कहा - ''कॉफी पिएँगी?'

वह 'हाँ' में सिर डुला चुकी थी। हे भगवान! यह सब कितना शर्मनाक था! उसने फिर से छींक दिया।

''आपकी उम्र कितनी है?'

''सत्ताइस। पर मैं दिखती नहीं हूँ उतने की।''

कितना मजेदार था। कुछ भी बोल जाना। उसने अपने आप को शाबासी दी। अब वह इस खेल को थोड़ा थोड़ा समझने लगी थी। भय और अनजाने हालातों पर विजय पाने का सटीक नुस्खा था बदले में दिए गए असंभावित और बेबाक जवाब।

''आप को ठंड लग रही है लगता है। काँप रही हैं... आप तो।''

''हाँ बढ़वा दीजिए टेंपरेचर।''

बूढ़े ने बैरे को बुला कर कुछ आदेश दिए। कौशिकी सक्सेना जम कर बैठ गई।

''मैं आपके लिए कुछ लाया हूँ जर्मनी से।''

यह अप्रत्याशित था। पर इसका भी कोई अच्छा तोड़ प्रस्तुत करना था।

''मुझे आज तक किसी का दिया तोहफा पसंद नहीं आया।''

बूढ़ा मुस्कुराया।

''लेकिन आप आजमा सकते हैं... अपनी किस्मत।''

''ऐसा है तो फिर मैं देने के लिए किसी बेहतर मौके का इंतजार करूँगा।'' वह गंभीर हो गया।

''इंतजार खतरनाक चीज है। तब तो और भी जब ज्यादा वक्त न हो।''

यह तो हद पार करने जैसी बात थी सरासर। बूढ़े की उम्र पर इतनी तीखी बात कहना तमीज की सरहद के बाहर की चीज थी। लड़की ने अपनी जाँघ पर नाखून धँसा लिए।

बूढ़ा हँसा।

''लंबे इंतजार में अपनी एक कशिश है पर इस आकर्षण में एक लंबे वक्त तक जी चुका हूँ मैं। अब छोटे छोटे इंतजारों की ही ख्वाहिश है।''

लड़की को अपने कमीनेपन पर दहाड़ मार कर रो देने का मन हुआ।

उसने बगैर बूढ़े की प्रतीक्षा किए तुरंत कॉफी को मुँह से लगा लिया। पहली बूँद से उसे लगा कि इस स्वाद से अनजान थी उसकी जिह्वा। खूब गरम चीज, जिसकी भाप ही जीभ को जला देने के लिए पर्याप्त थी। कौशिकी सक्सेना ने ताबड़तोड़ चार पाँच घूँट लिए। स्वाद की समस्त कोशिकाओं के लिए महरूम पैगाम था।

''देखता हूँ आप इंतजार के सुख से महरूम है।''

''इसे इंतजार की बदकिस्मती भी मान सकते हैं।''

कॉफी की गंध ने लड़की पर गहराई से असर कर दिया। उसके शरीर के रोंए अकस्मात की गर्मी पाकर सिहरने लगे। उसने अपने पर काबू पाने की कोशिश की। टेबल पर रखा चम्मच उठा लिया और उसकी यह हरकत उसे दो लोगों के बीच बने पुल की स्मृति तक खींच ले गई।

''कल मैं आपको अपना घर दिखाना चाहूँगा।''

उसके व्यवसाय से संबंधित पहली बात थी यह, उस शाम की। पर कौशिकी सक्सेना ने इस बात में कोई रुचि नहीं ली और पुल के इस छोर से उस छोर तक अँगूठे के नाखून को चलाती रही।

''और कॉफी लेंगी?'

''हाँ।''

उसने अपना खाली मग आगे सरका दिया।

''आप कुछ कहना चाह रही हैं ऐसा लगता है।'' बूढ़ा उसके हाथ की बेसब्र हरकत की ओर इशारा करके बोला।

''आप मेरी शिकायत कंपनी से क्यों नहीं कर देते?'

''किस बात की शिकायत?'

''मेरी अशिष्टता की।''

''ओह...। मेरा ध्यान तो आपकी विशिष्टता पर था।''

कॉफी आ गई दोबारा।

''यकीनन यह बहुत महँगी होगी।''

''है पर इसमें नशा नहीं।''

कॉफी का भाप उसके ललाट से टकरा जा रहा था और वजह यही शायद कि लड़की के माथे पर बूँदें चमकने लगीं।

''आप कितने वर्षों से इस जगह काम कर रही हैं?'

''मुझे सच में याद नहीं।''

''क्या?'

''कि मैं क्या कर रही हूँ... क्यों कर रही हूँ। यकीनन इस कॉफी में नशा नहीं है। दोष प्याले का भी नहीं है पर...।''

उसके मोबाइल की घंटी बजी। नौ की तीन आवृत्तियों से समाप्त होने वाला नंबर। कॉफी की भाप अबकि सीधी लड़की की आँखों तक गई और बूँद भर पानी छलक आया वहाँ। लड़की ने झपट कर फोन उठाया।

''कहाँ थे आप?'

उधर से कुछ पल की खामोशी के बाद जवाब आया - ''मैं हूँ मिस सक्सेना।''

''ये इतनी भी बड़ी बात नहीं कि मैं जान न पाऊँ। आप कहाँ गायब हो जाते हैं अचानक कितना परेशान हो गई थी मैं! मेरे मन में कैसे कैसे विचार आ रहे थे मालूम है आपको?'

''नहीं।''

''हाँ ये बात सही नहीं। कोई विचार नहीं आए मेरे मन में। पर आपकी आखिरी बातों का क्या मतलब था यह तो जरूर सोचती रही मैं। बार बार सोचा मैंने।'' बुदबुदाई भर वह। पर इस तरह कि बात उस पार तक पहुँचे।

''मुझे उम्मीद है कि आपने मुझे पहचान लिया है।''

''चलिए अच्छा लगा कि कोई तो उम्मीद है आपको। वरना उस रोज तो सारी उम्मीद गँवा चुके थे आप।''

''कल मिलते हैं।''

''यह मैं तय करूँगी।''

कुछ रुक कर फिर लड़की ने कहा - ''ठीक है। कल।''

लड़की ने फोन टेबुल पर रख दिया।

''अब तीसरी दफे मैं नहीं पी सकती।''

उसने मग सरका दिया।

''क्या आप वही बातें कहना चाहती थीं, जो अभी आपने कहा फोन पर या आपकी बातचीत को मेरी उपस्थिति ने प्रभावित किया?'

''क्या मैं इतनी पारदर्शी हूँ?'

''आप में बनावट कम है। मिलावट भी कम।''

''यह दोष है'

''आप हमेशा कुछ छिपाती क्यों है?'

''यह दिखता है?'

''छिपाना दिखता है। क्या छिपाया जा रहा... यह नहीं दिखता।''

बैरा बिल रख गया। लड़की ने आदमी के हाथ बढ़ाने के पहले ही उसे खोल कर पढ़ा।

''इतनी महँगी कॉफी मैंने आज तक नहीं पी।''

''शायद इस तल्लीनता से इस कॉफी को आज तक किसी ने न पीया होगा।''

''यह तारीफ है?'

''आपको दोष लगा?'

लड़की ने सिर झुका लिया।

''आपको क्या लगता है हमारी ये मुलाकात बेकार थी?'

''यकीनन नही।'' उठ कर खड़ी होती लड़की दोबारा बैठ गई। बूढ़े ने भी उसका साथ दिया।

''शायद आपको बुरा लगे पर मैंने एक बड़ी चीज पा ली है। जो बातें मैंने फोन पर कीं, वे शायद कभी कह नहीं पाती। मेरे लिए यह मुलाकात एक लंबी मानसिक यंत्रणा से आजाद हो पाने का अहसास है। ये बात और है कि मेरी जीभ गरम चीज हलक में उतार कर इस कदर झुलस चुकी है कि अगले दो दिनों तक किसी भी स्वाद को पा सकना संभव न हो। सलीका नहीं है न ढब मुझमें कि पी सकूँ लियाकत से।''

''मुझे भी ऐसा ही लगा कि इस मुलाकात के बहुत मायने हैं।''

लड़की ने सवाल में पलकें उठाईं।

''जिस घर को आपके माध्यम से बेचने वाला हूँ मैं, उस घर को बनाने में सबसे लंबी उम्र मेरे सपनों की लगी, फिर अनुभव की, फिर उसके बाद बारी आती है बनने में लगे वक्त की... तीन साल और जमा किए गए पैसे। पर अब, जबकि उस घर को बेच देना ही एकमात्र विकल्प बचा था, उसे जस का तस उस रूप में नहीं बेचा गया मुझसे। मैंने पैसे बहा कर उसकी वास्तविक शक्ल को धो डालने की पूरी चेष्टा की। बहुत सफल भी रहा इसमें मैं और रिनोवेट होकर घर का हुलिया बदल गया। अब खुद मैं भी किसी झलक के मिल जाने की बिनाह पर ही यह कह पाता हूँ यकीन से कि यह वही घर है। उसी तरह मुझे यकीन होने लगा है कि आप भी किसी चीज को छिपाए चल रही हैं, जिसे आप कभी गँवाना नहीं चाहतीं।''

हे भगवान! यह दो दिनों के भीतर दूसरा मौका था जब किसी इमारत से तुलना की गई थी उसकी।

''क्या मैं इमारत जैसी दिखती हूँ?'

''दिखती शायद नहीं।'' लड़की ने चैन की साँसें लीं।

''पर वैसी हो सकती हैं संभवतः।''

लड़की को अकस्मात ही हँसी आ गई।

''चलिए।'' उसने कहा।

वे निकल पड़े। दरवाजे तक आकर बूढ़ा ठिठक गया।

''आप जाएँगी कैसे?'

बाहर बारिश तेज हो गई थी।

लड़की को उस पहले दिन की स्मृति हो आई, जब बूढ़ा उससे साथ चलने का आग्रह किए बगैर अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया था।

''आप निकलिए।'' उसने मुस्करा कर कहा।

''और आप?'

''बरसाती की ओट में अपने पर एक और परत चढ़ा कर लौट जाऊँगी।''

लड़की के हाथ जुड़े और वह निकल गई।

जगह और वक्त लड़की ने तय किया था। दोनों विकल्प खुले थे। या तो पहले पहुँच कर इंतजार किया जाए ताकि शुरुआत से उसका आ पाना देखा जा सके। पिछले अनुभव के आधार पर इसमें जोखिम यह निकलता था कि अगर उसे आने में देर हो जाती या आता ही नहीं वह, तो लंबे खिंचते इंतजार के साथ उसका दिमाग उबाल खाने लगता। दूसरा विकल्प यह कि प्रतीक्षा को सामने वाले के खाने में डाल दिया जाए। पर यहाँ बखेड़ा यह था कि सामने वाले का इंजतार करने के अकाव्यात्मक ढंग का नजारा ले चुकी थी वह। देखा जाए तो इसमें उसका ही अपमान था जिसका रास्ता देखा जा रहा हो।

इस लिहाज से पहला ही विकल्प श्रेयस्कर था। उसने वक्त से पहले पहुँच जाने को चुन लिया। वह पहुँची और गाड़ी को पार्क कर जैसे ही उसने जगह का मुआयना करना शुरू किया कि उसकी साँस थम गई। आदमी ठीक उसकी तरफ ही देख रहा था। लड़की ने पहली बार स्वीकार किया अपने आप की उपस्थिति में कि संभवतः वह व्यक्ति आकर्षक भी था! उसने आँखें मूँद लीं। उसके बाद अगली प्रतिक्रिया में वह अपने माथे को नीचे झुका कर दो पल का विराम ले सकती थी... अप्रत्याशित से इन पलों पर काबू पाने की कोशिश में। पर धुन में वह उस आदमी तक चली गई और उसने कहा - ''मैंने आपके लिए घर तलाश लिया है।''

आदमी ने आँखें सिकोड़ कर देखा उसे।

''आप उसे रिजेक्ट नहीं कर पाएँगे।''

आदमी ने होंठों पर उँगली रख कर उसे चुप रहने का इशारा किया।

लड़की ने सकपका कर चारों तरफ देखा और भौंहे उचका कर 'क्या कहना चाह रहा था वह?' इस बात की तप्तीश की।

आदमी ने अदब से दाहिना हाथ बाहर किया और चलना शुरू किया। यह उसके लिए साथ आगे बढ़ते जाने का इशारा था, लड़की ने जिसे तत्काल के लिए मान लिया था। काफी दूर तक दोनों चलते रहे एक साथ। आजिज आकर लड़की ने पूछा - ''कहाँ जा रहे हैं हम?'

आदमी हँसा।

''कमाल है। इतनी देर से आप यही सोच रही थीं?'

''ऐसा नहीं। लेकिन बात सोचने की है भी।''

''मुझे नहीं लगता कि हर सफर के पास मंजिल का पता हो ही।''

लड़की चुप रही।

''मैं जानता हूँ कि आप यह सब नहीं सोच रही थीं। पूछे जाने के ठीक पहले यह सवाल आपके मन में आया और आपने पूछ लिया।''

''आप तो मेरे मन की सारी बात जान जाते हैं।'' उसने मुँह टेढ़ा करके कहा।

''उनमें से नब्बे फीसदी बातें सही निकलती हैं।''

''इसमें आपकी कोई योग्यता नहीं। मेरा मन है जो आपसे जा मिला है।''

बात पूरी होने के पल ही लड़की को अपनी भूल का अहसास हो गया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

''बगैर सोचे समझे बोल गईं आप।'' आदमी ने तुरंत जोड़ा और बात का रुख पलट दिया।

''उस रोज आपने क्यों छिपाया कि वे आपकी बनाई मूर्तियाँ थीं।''

लड़की ने सवाल पर ध्यान नहीं दिया। उसका ध्यान तो एक कदम पीछे ठिठका था। शर्मिंदगी के मोड़ से उबार लाया था वह उसे। क्यों क्या इसलिए कि वाकई उसके मन की आदमी से साँठगाँठ थी और आदमी यह भाँप गया था कि लड़की अपनी झेंप का बदला अपने मन से ही लेती यकीनन।

''ऊँ...'

आदमी ने उसे उकसाया। अवश्य ही वह उसके उत्तर की प्रतीक्षा में था। हे भगवान! पर सवाल भी तो जटिल था। वह सोच रहा होगा कि इतनी देर से वह इसका जवाब तैयार कर रही थी पर दरअसल सवाल पर तो उसका ध्यान अभी गया था।

''मैंने इस बारे में कभी सोचा नहीं। न वाकये के पहले न बाद में।''

''अभी सोच सकती हैं।''

''मैं समझ गई थी कि आप कोई बेवजह की खोट निकालेंगे। इस वजह से कहा होगा। और जब आप जान ही गए थे कि मैंने बनाया उन्हें तो उतना नौटंकी पसारने की क्या जरूरत थी?'

''पर जिस बिंदु पर आप समझ गईं कि कोई नुक्स नहीं निकाल रहा मैं... तब तो आप भूल सुधार कर सकती थीं।''

''अगर मुझे ये लग जाता कि मेरे सही बात बता देने से कोई फर्क पड़ जाता तो जरूर बता देती।''

''क्या आप वाकई ऐसा मानती हैं कि किसी बात के सही या गलत होने से जब कोई फर्क नहीं पड़ता सामने वाले को... तब वैसा बोलना जायज है।'' वह संजीदा हो गया अचानक। बल्कि वह खड़ा हो गया था ठहर कर। लिहाजा लड़की को भी बराबर में खड़ा होकर उसकी तरफ देखना पड़ा। यह सब क्या था! अचानक से रंग का बदल जाना! क्या जवाब देना चाहिए उसे!

अभी लड़की मुँह खोलती ही कि सामने वाले ने कहा - ''सोच समझ कर जवाब दीजिएगा।''

लड़की के होंठ खुले रह गए। यह क्या बात थी। ऐसा क्या सवाल था कि सोचने समझने पर जोर था।

''हाँ।''

''आपकी ये बात मैं याद रखूँगा।'' वह एक पल रुका फिर उसने कहा - ''पर इससे ज्यादा जरूरी यह है कि आप इसे याद रखें।''

उसके चेहरे से संजीदगी मिट गई और एक हल्की रेखा मुस्कराहट की छा गई वहाँ।

''उन दोनों मूर्तियों में से पहले कौन सी बनाई गई थी ये बताया नहीं आपने?'

''हर बार आप ही सवाल करेंगे क्या?'

''कीजिए आप सवाल।''

''कल क्यों फोन किया था आपने, यह पूछना तो मैं भूल ही गई।''

''मैं भी वजह भूल गया कल फोन पर आपकी बातें सुनने के बाद।''

लड़की को लज्जा आई। एक शाम पहले की फोन पर अपनी कही गई बेतकल्लुफ बातों को याद कर नहीं बल्कि कोंच कर वह सब याद कराए जाने से।

''बस एक ही सवाल?'

''हम कहाँ जा रहे हैं?'

वह उसका रास्ता छेंक कर खड़ी हो गई। इस तरह कि उसने खुद ही अपनी आँखों को आदमी की आँखों के नीचे कर दिया। आदमी ने सामने वाली आँखों में घुटनों तक दाखिल होकर कहा - ''अपना रास्ता पता है मुझे। आपको अपने रास्ते का चुनाव करना है।''

लड़की के दोनों कानों की कोरें जोर जोर से धड़कने लगीं।

''आपको कोई सुबहा दिखता है?'

उसने महसूस किया कि उसकी आँखों के कोर डबडबाने लगे थे। वजह चाहे जो भी रही हो... आदमी से नजरें मिलाए रहते चले जाने के लिए तरेर कर रखी गईं पलकें या भीतर से उमड़ता आवेग कोई, आँसू को निगल लेने के प्रयास में वह मुस्कराई।

''नहीं। जो जवाब मुझे देना चाह रही थीं आप... उसके संदेश मैंने पकड़ लिए। वे मूर्तियाँ इन्हीं पलों को कैद करने की कोशिश थीं, जो अभी यहाँ देखा मैंने।''

लड़की के लिए यह सब एक सपने जैसा था। उसने अपने चेहरे को थामे जाते हुए देखा।

''उन मूर्तियों के बनाए जाने का क्रम समझ गया मैं।''

लड़की की आँखों की जद से आजाद होकर आँसू पसर गया। वह भयानक निराशा से भर कर बोली - ''और कुछ नहीं दिखता आपको?'

''चलें वापस?' आदमी ने कुछ रुक कर कहा।

लड़की ने सिर डुला दिया 'हाँ' में।

रास्ते भर लड़की खामोश रही। पूरे सफर आदमी मौन रहा। आदमी धीरे धीरे चल रहा था और लड़की मन ही मन कभी पीछे की ओर भी चल देती कुछ कदम, ताकि सफर की डोर खिंचती रहे देर तक। दूरी लगभग तय होने को थी कि लड़की ने कहा - ''चलिए कुछ खेलते है।''

आदमी ने इतनी कृतज्ञता से भर कर देखा उसे मानों यह कह कर... या कि कुछ भी कह कर लड़की ने अहसान किया उस पर।

''जैसे?'

''जैसे कि आप मेरे जन्म की तारीख बूझिए। इसके लिए दो क्लू दिए जाएँगे जो कि पहेलियों में हों। एक सवाल आप भी कर सकते है।''

सामने वाले का मनोरंजन हुआ था। खिलखिलाहट गूँज गई।

''मुझे ये सब नहीं आता।''

''आपने हार मान ली?'

''हाँ मान ली।''

''तो फिर पूछा क्यों था आपने - जैसे?'

''पूछा तो था क्योंकि आपने खेल की बात की थी। अब हार इसलिए मान रहा क्योंकि जब आपकी साधारण बातें पहेलियाँ होतीं हैं तो पहेली कैसी होगी।''

जाहिर है वह मजे ले रहा था - उसे खिझा कर।

लड़की ने पैंतरा बदला और नरमी से बोली - ''खेलिए न!''

आदमी ने उसे एक पल स्थिर होकर देखा और कहा - ''पूछिए।''

लड़की कुछ देर सोचती रही। फिर उसने कहा - ''दस गुने तीन में शामिल है - यह पहला क्लू।''

आदमी चुप रहा। मौन के लंबा खिंच जाने पर लड़की ने कहा - ''समझ गए तो आगे कहूँ क्या?'

''समझा नहीं पर आप कहिए।''

''मैं थोड़ा और वक्त दे सकती हूँ।''

वे उस जगह पर पहुँच गए जहाँ से कि आगे की यात्रा आरंभ की गई थी। दोनों बगैर कुछ कहे या सोचे कुछ... मुड़ गए - उस जगह से दुहराव की यात्रा पर। यह सब इतना सहज था मानों पूर्वनिर्धारित हो उनका इस तरह बार बार चलना उस रास्ते पर।

''आपको समझने में जितनी मुश्किल हो रही है, क्लू चुनना उससे ज्यादा मुश्किल काम था।'' लड़की ने ताना मारा।

''अप्रैल जून सितंबर नवंबर।''

लड़की की आँखें फैल गईं। तो आदमी ने सुलझा लिया था - दस गुने तीन.. तीस दिन वाले महीने को।

लड़की ने जोश में कहा - ''दूसरा क्लू, हैट्रिक।''

आदमी ने आँखें सिकोड़ी। वह चलता गया चुपचाप फिर उसने कहा - ''यह पहेली सुलझाने के पहले एक सवाल आपसे। बेटरहाफ के बारे में।'' उसके चेहरे पर एक शाश्वत मुस्कान फैल गई - ''कौन सा हिस्सा महीने का?'

लड़की के चेहरे पर एक लाल रेखा खिंच गई।

उसने धीरे से कहा - ''सेकेंड हाफ।''

आदमी कुछ पल मौन रहा फिर वह बुदबुदाया - ''चौबीस सितंबर।''

लड़की के चेहरे की रंगत क्षण में बदल गई।

''आपने मेरा प्रोफाइल चेक किया। यह धोखा है। पहेली बूझने का नाटक क्यों किया साफ साफ बता देते।''

''आपने भी तो साफ साफ नहीं बतलाया।'' उसकी आवाज धीमी ही थी।

''क्या नहीं बताया मैंने।''

''कि पहेली ना बूझ पाना खेल की आखिरी शर्त थी।''

''पर आप कैसे बूझ सकते हैं माना कि मैंने आसान क्लू दिए।'' उसने पैंतरा बदला फिर एक बार - ''तीन आवृत्ति सितंबर में हो सकती 'ई' की यह समझ गए आप। माना कि सेकेंड हाफ की बात बता दी मैंने, यानी महीने के आखिरी पंद्रह दिन। पर पंद्रह दिन में से एक किसी दिन को कैसे निकाला जा सकता है इतनी आसानी से?'

आदमी ने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला पर आखिरी वक्त में अपनी मंशा बदल ली और कहा - ''खैर छोड़िए। हर खेल में जीतने पर इनाम दिया जाता है। कहाँ है मेरा रिवार्ड?'

''आपने खेल का नियम भंग किया है। छल से जीत हासिल की है। आपको पहले से सब पता था।''

''लेकिन दोष तो आपका भी बनता है। आपने वही सवाल क्यों पूछे जो पहले से मुझे पता हो या कि आसान सूत्र क्यों दिए... आदि आदि...।'' आदमी मुस्करा रहा था।

''मैं आपके अभिनय के झाँसे में आ गई। मुझे लगा कि पहेली बूझना वाकई में मुश्किल है आपके लिए इसलिए आसान क्लू दिए।''

''यानी कि आप चाहती थीं कि मैं पहेली सुलझा लूँ। फिर मेरी जीत से बौखलाई क्यों? आप इनाम देने से भाग रही हों, ऐसा तो नहीं लगता।''

कितना आसान हो जाता सब कुछ यदि वह आदमी के पास आ पाती और उसकी मुट्ठी तक नीचे झुक कर अपने आगे के दाँत कस कर धँसा पाती उसकी कलाई पर। उसके भीतर की सारी झुँझलाहट उड़ेल उठती और उस आदमी को यथोचित दंड भी मिल पाता, ऐसा लड़की ने सोचा।

पर इनसान के सोचने में और चीजों के होने में फर्क तो होता है सदैव। वह उसकी दाहिने तर्जनी का नाखून ही था जो र्स्पश की पृष्ठभूमि बना। नाखून भर की जमीन पर कोई चीज ससर रही थी। मुलायम सा अंश। साथ वाले की उँगलियाँ संभवतः। लड़की सरपट चल रही थी और उसके हाथ खुले लहरा रहे थे शरीर के साथ साथ। पार्श्व का आदमी भी उसके बराबर ही चल रहा था। पर इस तरह लय साध कर कैसे चला जा सकता है कि एक के नाखून से दूसरे की उँगली का साथ लगातार बना रहे और कोई दूसरा हिस्सा एक दूसरे को छूने भी न पाए। लड़की को लगा मानों पूरे शरीर की चेतना उसके नाखून में जा सिमटी हो। उस तरफ से कुछ उकेरने की कोशिश थी उसके नाखून पर या कि कुछ मिटा देने की। आश्चर्य कि बजाए उन संकेतों को पकड़ने की चेष्टा करने के, वह सिर्फ छुअन को महसूस भर करने में डूबी रहना चाह रही थी। पर अगर उसके हाथ खुले झूल रहे थे और पार्श्व का आदमी उससे हाथ भर लंबा था तो बगल वाले की उँगलियाँ उसके नाखून तक कैसे पहुँच सकती थीं चलते हुए! लड़की ने अपनी आँखों की कोर से इस बात की तप्तीश करनी चाही और परिणाम ने उसे चौंका दिया। अछूते थे उसके नाखून। कोई था नहीं इर्दगिर्द उसके। यह सच उसकी आँखों में आँसू भर देने के लिए पर्याप्त था। हुआ भी यही।

आँसू निकल कर दो कदम चले पर अगले ही पल उसने चाहा कि उन्हें वापस अपने उद्गम तक लौटाया जा सके। कोई और मौका होता तो बेशक वह इन सबसे उलझ सकती थी। पर उस वक्त... और कुछ नहीं। पर्याप्त था उद्वेग। उसके गाल के रास्ते होता हुआ वह कतरा दाहिने हाथ की तर्जनी के नाखून पर बिखर गया। अभी गीले नाखून के ऊपर से होकर गुजरने वाली हवा की पहली आहट को उसने महसूस ही किया था कि उसे कंधे से पकड़ कर सीधा किया गया।

''आप मुझसे एक सच बात कहिए और एक झूठ बात। इसी क्रम में कही जाएँ वे बातें... यह जरूरी नही।''

लड़की को गीले पलकों को उठाने में अतिरिक्त श्रम लगाना पड़ा।

''मेरी आँखों में कुछ चला गया इसलिए भर आईं आँखें - एक बात। मैं अभी इसी वक्त यहाँ से चली जाना चाहती हूँ - दूसरी बात।''

लड़की का चेहरा तप रहा था।

आदमी हँसा - ''इसे पहचानना तो बेहद आसान है। मतलब सच और झूठ पहचानना। पहला वाक्य झूठ, दूसरा सच।''

वह अगले पल गंभीर हो गया - ''मैंने आपसे झूठ कहा था कि मैं घर की तलाश में हूँ - एक। दूसरा - जब जब हम नहीं मिले... मैंने आपको याद करने की कोशिश की।'' उसने शिनाख्त के लिए दो वाक्यों को प्रस्तुत कर दिया। आदमी का चेहरा धधक रहा था अब, ऐसा लड़की ने महसूस किया। जबकि परीक्षा लड़की की थी और उसे सामने वाले की अभी कही दो बातों को दो खानों में फिट करना था।

उसने आदमी की ओर देखा। इस बार उसकी पलकें सूख चुकी थीं। पर श्रम संभवतः उतना ही लगा उन्हें छितरा कर खोलने में... एक प्रश्नवाचक चिह्न की घुमावदार लय में।

''कठिन है क्या?' आदमी मुस्कराया जरूर पर उसकी आँखें पीड़ा से बिंधी पड़ी थी। लड़की के लिए सब कुछ और भी जटिल बन गया। पर सामने वाले की आँखों के भाव गहराते गए। पीड़ा ने गहरा कर तीक्ष्ण कटाक्ष का वेष धर लिया।

आदमी ने कहा - ''मैं आपकी वे मूर्तियाँ खरीदना चाहता हूँ। बताइए क्या कीमत लगेगी'

यह सवाल नहीं था बेशक। उसे लपेट कर दूर पटक देने वाली चाबुक की धार थी यह। तो वह एक ग्राहक ही था मूलतः। उसकी हर बात खरीद से आरंभ होकर फरोख्त पर खत्म होती थी। लड़की ने तुनक कर सोचा और मन को कड़ा करके कहा - ''आपकी पहली बात झूठ थी और दूसरी बात सच।''

हालाँकि वह स्वयं महसूस कर पा रही थी कि वाक्य के आखिर में उसकी आवाज सांद्र बूँदों के झुरमुट में खोकर रह गई। आदमी की हँसी ने उन बूँदों को जड़ से कँपकँपा दिया।

''कितनी दूर तक आप मेरे साथ चलना चाहेंगी?'

''ऐसे में अब एक भी कदम चलना मेरे लिए...।'' इसके आगे सब कुछ धुँधला पड़ गया।

''अगर मैं ये कहूँ कि आप हार गई हैं और मेरे कहे में झूठ और सच का क्रम उलटा था तो... तब भी?'

''हाँ तब भी।'' लड़की ने तमक कर कहा। वह अपने साथ चलते जाने वाले खेल से रुष्ट थी।

''सोच लीजिए।''

''हाँ सोच लिया।''

अगली साँस में उसने कहा - ''अब आगे मैं आपको कोई भी घर दिखा सकने की स्थिति में नहीं हूँ। आप चाहें तो अपने लिए बेशक कंपनी से कोई दूसरा ब्रोकर...।''

उसे रुक जाना पड़ा बीच में बोलते हुए। कारण कि उसकी नजर अपने बाजुओं के समानांतर झूलते आदमी की हाथों पर पड़ गई थी और उसने यह बूझना चाहा कि इतनी ऊँचाई पर रहते हुए वह अपनी उँगलियाँ उसके नाखून पर टिकाए कैसे चल सकता था! अगले ही पल फिर उसने अपने को सुधारा। स्वयं अपनी आँखों से देखा था उसने कि भ्रम था वह सब उसका।

''आप कंपनी से किसी विकल्प की बात मतलब किसी विकल्प के लिए बात कर सकते है।''

''आपकी कंपनी में विकल्प दे पाने की कूव्वत है क्या?'

लड़की के लिए समय रुक सा गया। वह अनवरत आदमी को देखती रही। मन्नत की एक गूँज उसके कंठ तक आकर फँस सी गई।

''मेरे गालों पर कोई पलक टूट कर चिपकी है क्या?' वह बुदबुदाई।

आदमी ने इनकार में सिर डुलाया।

''आप कौन हैं?'

आदमी ने भौंहें उचकाईं और मुस्कराहट दौड़ गई उसके चेहरे पर।

''पहले आप बताएँ।''

लड़की को झुँझलाहट नहीं हुई। न निराशा। न दुख। न आवेग। न अचरज। न भय। न आशंका। न लज्जा। न पश्ताचाप। न टीस। ठीक ठीक इनमें से कुछ भी नहीं पर इन सबके जैसा कुछ। एक नई किस्म की भावना थी, जिसकी थरथराहट एड़ी से लेकर भौंहों तक लड़की को सुगबुगा गई। ऐसा लगा मानों हथौड़ी की कोई थाप उस जगह जा लगी हो जहाँ से मूर्ति के मुकम्मल हो चुकने का सफर पूरा होता हो।

अगर वह अपने सीने पर हाथ रखती तो वहाँ धड़कन का कोई ठोस सबूत न मिलता। वजह कि उसका सारा जिस्म ही धड़कन में तब्दील हो चुका था। मान अपमान, उचित अनुचित, संभव असंभव... सबके बीच की रेखाएँ मिटने लगी थीं। कौशिकी सक्सेना ने पूरे शरीर की उर्जा समेटी और कहा - ''मैं आपके संदेश की प्रतीक्षा करूँगी।''

इसके बाद उसे जो करना था उसमें वह घोषित रूप से निपुण थी। वह घूम कर मुड़ गई पीछे और वापस दफ्तर में आकर ही दम लिया उसने। आदमी अपना पूरा नाम लिखने की बजाए इनीशियल इस्तेमाल करता था। उस आदमी की पूरी फाइल को छान मार कर भी वह उसका पूरा नाम हासिल नहीं कर पाई, जिससे कि सोशल साइट पर उसे खोजा जा सके। नहीं मिला एक मुकम्मल नाम कहीं भी उस आदमी का। हताशा में लड़की ने अपना मोबाइल निकाला और संदेश टाइप किया।

''मैंने आपके घर के लिए ग्राहक खोज लिया है जल्दी ही हम मिलेंगे।''

फिर उसने उस बूढ़े आदमी का प्रोफाइल खोला कंप्यूटर पर, उसका नंबर निकाला और संदेश को उस नंबर के ठिकाने पर भेज दिया। अभी वह आँखें मूँद कर बूढ़े तक संदेश के पहुँच चुकने की गणना कर ही रही थी कि मोबाइल पर संदेश की घंटी बजी। यह संदेश वहाँ से नहीं आया था, जहाँ अभी अभी मैसेज भेजा गया था।

नौ की तीन आवृत्ति से समाप्त होने वाले नंबर ने लिखा था - ''अपनी गरदन को पीछे मोड़िए। दाहिनी तरफ। और नीचे देखिए... क्या दिखता है?'

लड़की ने मुँह बिचकाया। उसने बाईं तरफ गरदन मोड़ कर देखा। कुछ भी तो न था।

''कहाँ है कुछ भी?'

''मैं जानता था आप गरदन बाईं तरफ मोड़ेंगी।''

लड़की ने अकचका कर चारों तरफ देखा। कोई कैमरा तो फिट नहीं था कहीं... फिर

''खैर नीचे की तरफ देखिए।'' अगला संदेश आया उसका।

''देखा तो। कहाँ है कुछ?'

''आपकी चोटी के अंत में दो बाल लटके हैं नीचे की तरफ। टूट गए हैं पर चोटी में गुँथा होने के कारण अलग होकर गिरे नहीं।''

सच में! उसने अपनी चोटी आगे की।

''दो नहीं छह हैं।''

''ठीक है। चार आपके। दो मेरे।''

उसे हँसी आ गई। अगले ही पल उसने अपने को जब्त किया। दो और चार से उसे कुछ याद आया। चौबीस सितंबर।

''आपने सही तारीख को कैसे ढूँढ़ा'

''तो आप अभी भी मानती हैं कि मैंने कोई छल नहीं किया बल्कि खोजा आपके जन्म की तारीख को। मैं जानता था कि आप मानती हैं ऐसा।''

''जवाब दीजिए।''

''तुक्का था मिस सक्सेना।''

''पाप लगेगा आपको न बताया तो।''

''आप इमोशनल हैं इतनी, कलाकार भी, तो आपकी जन्मतिथि का मूलांक छह ही हो सकता था, ऐसी मेरी धारणा थी। फिर इसके बाद अगर आप स्वयं बता देती हैं कि 'महीने का आखिरी हिस्सा' क्लू है तो अंतिम के पंद्रह दिन में एक ही तारीख बचती है जिसके अंकों का जोड़ छह हो।''

लड़की समझ न सकी कि इस संदेश का क्या जवाब दिया जाए। फिर एक बार सामने से ही मैसेज आया।

''वैसे मुझे पाप लगने की ज्यादा फिक्र न थी।''

लड़की फिर से जवाब तलाश न पाई। कुछ पल रुक कर उसने लिखा - ''यह बात आप मुझे उस वक्त भी तो बता सकते थे।''

लिख चुकने के बाद लड़की को लगा कि बड़ी चिपकू किस्म की बात लिख दी उसने। कुछ पल तक कोई जवाब न आया। उसने अपना भेजा गया मैसेज चेक किया। मैसेज की डिलिवरी हुई थी उस पार। फिर क्यों न आया कुछ। अकबका कर उसने फिर से उस संदेश को भेजा। उसके भी सामने वाले तक पहुँचने की सूचना थी। पर अबकी भी कोई जवाब न आया। लड़की ने मोबाइल को बंद करके फिर ऑन किया। अभी भी कुछ न था। क्या वजह हो सकती थी उसका पिछला संदेश आए ग्यारह मिनट सैंतीस सेकेंड बीत चुके थे। उसने अपने और उसके भेजे तमाम संदेशों का समय चेक किया। औसतन उसका जवाब आने में एक मिनट से भी कम वक्त लगता था। फिर ऐसा क्यों था। लड़की चोटी से आजाद हुए बालों को उँगली पर लपेटने लगी। उसे अपना भेजा संदेश लिजलिजा सा लगने लगा और एक शाम पहले की कही अपनी बात कि 'मैं आपके संदेश की प्रतीक्षा करूँगी'। ...अश्लील लगने लगी।

उसे उँगली पर लपेटे बाल को चिंदी चिंदी तोड़ कर फेंक देने की इच्छा हुई। वह औंधें मुँह बिस्तर पर ढह गई। चारपाई के नीचे उसका संसार था। कुछ अधबनी कलाकृतियाँ थीं। पर उसका मन उँगली में लिपटे बालों में उलझा पड़ा था। क्या करने की चेष्टा कर रही थी वह! नाक की उठान पर एक अश्रु चमका जो कि कनपटी पर ढुलक गया अगले पल। क्या उन बालों से आँसुओं को बाँध कर रखा जा सकता था! गोलमटोल आँसू को उसके पूरे अस्तित्व के साथ! भटक चुकी थी वह रास्ता। अपने आप को दयनीय बना कर हासिल किए पल कितने निरर्थक साबित हो रहे थे। हर बार यही हो रहा था। वह अपने आप को नीचे गिरा कर अगले संवाद को संभव बना रही थी और सामने वाला अपनी मर्जी से उनके संवाद की डोर को मनचाही दिशा में ले जाकर छोड़ दे रहा था।

एक संदेश आया - 'मुझे जरूरी नहीं लगा।'

लड़की ने नचा कर अपना मोबाइल फेंक दिया। हालाँकि इस बात का ख्याल रखा गया कि वह तकिए पर ही गिरे। तमाम अदाकारी को निभाते हुए अपनी जेब के आयतन का भी ख्याल रखना था। उसके होंठ थरथराने लगे अपमान से। वह उस आदमी को अब क्षमा करने के पक्ष में नहीं थी। उसका संदेश आ जाए तो भी कोई जवाब न देना था। कुछ पल बीते वैसे ही। वह सोचने लगी कि वह आदमी जैसे जान जाता है कि वह क्या कर रही है क्या सोच रही है... वैसे ही जानने की कोई शक्ति उसे भी हासिल हो पाती जिससे कि वह भी कयास लगा पाती कि क्या कर रहा था वह उस घड़ी। क्या चल रहा होगा उसके मन में... उसे ऐसे रूखे संदेश भेजते वक्त।

लड़की ने अपना मोबाइल देखा। कुछ न था वहाँ। हो सकता है आदमी ने अंतिम संदेश के आगे या पीछे और कोई संदेश भेजा हो जो डिलीवर न हो सका हो और जिसके कि अभाव में 'मुझे जरूरी नहीं लगा' रुखड़ा लग रहा था उसे।

हे भगवान! तो अपने आप को थोड़ा और गिराया जाए क्या? लड़की ने सोचा एक बार गिरने और बार बार गिरने में विशेष फर्क है क्या!

''चलिए मान लिया।''

तीन शब्द लड़की ने बिजली की गति से लिखे और फौरन भेज दिए। संभवतः उसे आशंका थी कि सोचने के लिए दी गई जरा सी भी मोहलत संदेश के भेजे जाने में बाधक साबित हो सकती थी। पर खुद से की गई इस चालाकी ने लड़की को अपने आप से नाउम्मीद कर दिया और गहरी निराशा से भर कर उसने अपना मोबाइल बंद कर दिया। वजह चाहे खुद को सजा देने की मंशा हो या कि प्रतिउत्तर में आने वाले मौन अथवा किसी कड़वे संदेश से स्वयं को बचा लेने की कोशिश। वह तर्जनी पर लपेटे गए बालों को अँगूठे से दबाए गिनती रही रात की धड़कन। एक दाह तलुवे से उठ रही थी और लड़की ने महसूस किया कि अपमान की दाह से ज्यादा झुलसाने वाली साबित होगी यह लहक। यकीनन।

दफ्तर पहुँचने के बाद लड़की ने पौन पन्ने का त्यागपत्र टाइप किया। प्रिंटआउट निकाला। दस्तखत के लिए छोड़ी गई जगह पर उसने अपनी उँगलियाँ फिराईं। एकदम चिकनी और शफ्फाक जगह। स्याही के लग जाने पर जिसकी शुचिता भंग होती थी। बाहर मौसम बेहद खराब था। तेज गर्जन तर्जन। हवा और बेपरवाह हल्की बूँदें। कौशिकी सक्सेना बॉस के टेबुल पर अपना इस्तीफा लहरा कर मौसम को चीरती हुई निकल सकती थी। हहराते पानी से अपने आँसुओं को एकसार करती। पर मौसम की बेरहमी ने नहीं बल्कि त्यागपत्र को बढ़ा दिए जाने वाले दृश्य के परिणामों ने उसे विचलित कर दिया। उसने त्यागपत्र के मजमून को दराज में सरका दिया और अगली साँस में छुट्टी का आवेदन लिखा - तबीयत की खराबी के कारण उस दिन की छुट्टी का आवेदन। हालाँकि एक बार आ चुकने के बाद लौटने की अनुमति लेना अवकाश का अपमान करना था। फिर भी। आखिरकार बॉस के टेबल पर उसने आधे दिन की छुट्टी वाला कागज लहराया और स्कूटी स्टार्ट कर दी, बगैर बरसाती या ऐसे किसी तामझाम के।

थोड़ी दूर तक आगे बढ़ने के बाद उसे लगा कि अपने आप को प्रताड़ना देने वाले इस दृश्यविधान में सब कुछ परफेक्ट है सिवाए उसके वाहन के। अनावश्यक शोरशराबे के अलावा उसकी सवारी सीन की कलात्मकता में खलल डाल रही थी सो अलग। जिहाजा वह वापस दफ्तर तक आई और दफ्तर के गैराज के एक सुरक्षित कोने में उसे आश्रय दिला चुकने के बाद लड़की ने फोन करके अपने एक सहकर्मी को बुलाया और गाड़ी की चाभी इस ताकीद के साथ उसके हवाले की गई कि शाम में गार्ड की इजाजत लेकर या तो स्कूटी को वहीं रहने दिया जाए या किसी सुरक्षित ठिकाने तक पहुँचा दिया जाए। सहकर्मी इसके पहले कि इस प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर पाता, वह निकल गई वहाँ से।

रास्ता खाली था। धुला हुआ। यह पहला मौका था जब वह पानी को चीरती हुई निकल पड़ी। चटक मैरून कुर्ता था उसका। उससे दो शेड गाढ़े रंग की लेगिंग्ज और ऑफ व्हाईट जैकेट पूरे आस्तीन का - मौसम में आई हल्की ठंडक और दफ्तर के एसी के मद्देनजर जिसे पहना गया था। उसके कानों में मैरून और नारंगी धागे में कढ़ा तीन लड़ियों वाला कुंडल था। इस विषम समय में भी उसके चेहरे पर मुस्कान खेल गई - कारण कि वह जिस नाटकीय दृश्य का हिस्सा बनने वाली थी, उसके अनुरूप पात्रसज्जा पूर्ण थी।

तकरीबन सौ मीटर आगे बढ़ते ही बूँदें सघन हो गईं। गीलापन हावी होने लगा और अपना निर्णय उसे फिर से विचार करने लायक लगने लगा। क्या हासिल होने वाला था ऐसे होश गँवाए हुए की तरह बेमतलब भीगते जाने से। क्या साबित करना था उसे और किसके आगे मौसम का मजा लेने की बात तो इतनी उमर बीते सूझी नहीं उसे। तो यह ढकोसला किसलिए मिस सक्सेना कोई आसपास नहीं था पर किसी ने चुभती हुई आवाज में पूछा उससे यह सवाल। उसने आसपास की पड़ताल को गरदन घुमाया कि एक गाड़ी दाहिनी तरफ से उसका रास्ता काटती खड़ी हो गई।

गाड़ी का शीशा नीचे सरका और लड़की को अंदर आने का आदेश मिला। लड़की के कपड़ों से पानी टपक रहा था और लड़की की आँखों में विस्मय था। वजह शायद यह थी कि दृश्य की अतिनाटकीयता का अहसास लड़की को हो गया था।

उसकी तरफ का दरवाजा भीतर वाले आदमी ने खोल दिया था। लड़की भीतर बैठ गई थी और सबसे पहली बात जो उसके जेहन में आई वह यह कि अभी इस वक्त ड्राइविंग सीट पर किसकी उपस्थिति ज्यादा चौंकाऊ होती - जिसका इंतजार था उसे - उस जवान आदमी की या उसकी सोच के विपरीत उस पीछे छूट गए बूढ़े आदमी की!

जवान आदमी ने गाड़ी को मद्धिम गति दी।

''अभी मैं क्या सोच रही हूँ... आप बताइए प्लीज?'

आदमी की लड़की के मन की बात जान लेने वाली क्षमता का सच परखने का इससे माकूल अवसर नहीं आने वाला - ऐसा लड़की ने सोचा।

आदमी ने गाड़ी रोक दी और आँखें सिकोड़ कर लड़की को देखा।

''इसके लिए मुझे ध्यान से आपको देखना होगा।''

''देखिए।'' लड़की ने अकस्मात की गर्मी पाकर सिहरते हुए चुनौती दी।

गाड़ी के भीतर हल्की गरम हवा का इंतजाम था।

''आपने मेरी जगह किसी और के होने की कल्पना की।''

लड़की की आँखें अधिकतम फैलाव में पसर गईं।

''कैसे पता आपको?'

लड़की ने स्टियरिंग पर ताकत से हाथ रखा। एक बेसुरी साँस का हॉर्न बज गया। लड़की ने अपने हाथ वापस किए। आदमी मुस्कुराया और उसने गाड़ी स्टार्ट कर दी।

''आपका रंग कच्चा निकला मिस सक्सेना।''

लड़की विस्मय से उसे देखती रही।

''कुर्ते का रंग। अपनी बाँह पर एक नजर डालिए। फिर आगे आप मुझे देख सकती हैं।''

लड़की ने वैसा ही किया। जैकेट की बाँह पर भीतरी कुर्ते के मैरून रंग की छाप चढ़ गई थी।

''कैसे पता आपको?'

लड़की अपने पिछले सवाल वाली जिद पर ही कायम थी।

आदमी संजीदा हो गया - ''मैंने तो अपनी समझ से सबसे दूर का विकल्प रखा था। सबसे गलत जवाब। पर आपने उसे सही जवाब के सम्मान से अपनाया। इसलिए श्रेय मेरा नही।''

लड़की खामोश रही।

''मैं तो यह जानता था मिस सक्सेना... यह जानता हूँ मिस सक्सेना कि मैं आऊँगा ही इस बात का पक्का यकीन था आपको। इस बिगड़े मौसम में घुसपैठ करने के पहले भी आप यह जानती थीं और इसमें दाखिल हो चुकने के बाद भी हर पल आपको पता था इस बात का।''

लड़की सर्द पड़ गई दोबारा। गीले कपड़े और कनपटी से टपकती बूँदों की वजह से नहीं बल्कि उसके अपने मन और उस आदमी की साँठगाँठ पर। लेकिन उसकी शारीरिक स्थिति ऐसी थी कि उसे ज्यादा कुछ सोचने समझने की इजाजत नहीं थी। कपड़ा भोथरा होकर शरीर से चिपक चुका था। शुक्र है कि शरीर से चिपके कपड़े के ऊपर से जैकेट का आवरण था। फिर भी काश कि गीले कपड़ों का खलल नहीं होता। फिर तो दृश्य को अधिकतम सीमा तक खींच ले जाने का उपक्रम करती वह। उसने अपने आप को टटोला। क्या उन कपड़ों में देर तक रहने की गुंजाइश थी! कुर्ता सूती था। इस जिहाज से जवाब नकारात्मक ही बनता था। फिर क्या रास्ता था क्या उससे यह कहा जा सकता था कि आप मेरे घर चलिए। मैं सूखे कपड़े पहन लूँ फिर आप जहाँ चाहे चलिएगा।

हे भगवान! अपने मन का उघड़ापन उसे लज्जित कर गया। पर अगले पल उसे भान भी हुआ कि मंजिल के बारे में उसे कुछ मालूम नहीं था।

''कहाँ जा रहे हैं हम?'

''आपके कपड़े गीले हैं। ऐसे में आपको ही तय करना है।''

''इतनी देर से बगैर कुछ तय किए हुए चल रहे हैं हम?'

''मिस सक्सेना! कभी कभी लोग जिंदगी भर चल लेते हैं बगैर कुछ तय हुए।''

लड़की ने होंठ काट लिए। आदमी ने ब्लोअर तेज कर दिया। गर्म हवा उसके शरीर पर घुमड़ने लगी।

बात जिंदगी भर की थी तो उसे भी बगैर तय किए चलने में कोई ऐतराज न था - क्या इतनी हिम्मत थी लड़की में कि वह यह कह सके। उसकी आँखों में आँसू आ गए।

''बताइए।''

क्या बताना था उसे हिम्मत के बारे में या कि दिशा के बारे में!

आँसू ढुलक आए गाल पर उसके। क्या कहती वह कि उन कपड़ों से मुक्ति पाकर वह फिर से उसके साथ आना चाहती है। और कपड़े अगर न बदले गए तो ज्यादा से ज्यादा क्या होता! जवाब में उसे एक जोरदार छींक आई।

''रोक दीजिए गाड़ी। मेरा सफर पूरा हुआ।''

''मैं आपके घर का पता जानता हूँ मिस सक्सेना। आर्ट गैलरी से मैंने उन मूर्तियों को बनाने वाले का पोस्टल ऐड्रेस लिया था। इसलिए अभी आपने एक चौथाई ही सफर तय किया है।''

''रोकिए गाड़ी अभी रोकिए अभी।''

गाड़ी रुक गई।

''क्या चाहते हैं आप मुझसे क्यों जीना मुश्किल कर दिया है आपने मेरा क्यों हाथ धोकर पीछे पड़ गए हैं आप मेरे क्यों मैं चाह कर भी दूर नहीं कर पा रही आपको क्यों मति मार दी है आपने मेरी कि मैं गिरती जा रही हूँ रोज रोज रोज रोज?'

आदमी ने लड़की को एक तेज नजर देखा और गाड़ी स्टार्ट कर दी दोबारा। लड़की शीशे से सिर टिका कर निढाल बैठ गई।

''अभी आप गीली हैं मिस सक्सेना। हम आपके हर 'क्यों?' का रहस्य सूखी जमीन पर तलाशेंगे। गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली तेज। कोई कुछ भी न बोला। निःशब्द गर्म लहर गुजरती रही दोनों से टकरा कर।

लड़की गाड़ी का दरवाजा खोल कर उतरी और पीछे मुड़े बगैर बढ़ती चली गई। घर के बगल से होकर सीढ़ियाँ ऊपर की तरफ जाती थीं जहाँ उसका कमरा था। उसने ऊपर पहुँच कर ताला खोला और दाखिल होकर वापस बंद किया दरवाजा अपने पीछे। गीले कपड़ों को उसने धिक्कार भाव से अलगाया क्योंकि वे ही उसकी इस ताजा जलालत की जड़ में थे। कपड़े बदल कर लड़की ने एक जूट के बैग में उन स्त्रीद्वय में से एक को डाला। अगले ही पल उसने उसे वापस निकाला और देखा। आखिरी बार के देखने जैसा देखना। फिर उसने मूर्ति को वापस बैग में डाला और कूद कूद कर सीढ़ियाँ उतर आई नीचे। गाड़ी अपनी पुरानी जगह ही खड़ी थी। उसकी तरफ का दरवाजा खुला पड़ा था पहले की तरह। उसने दरवाजा बंद किया और शीशे तक झुकाया अपने को।

''बात जहाँ से शुरू हुई थी, वहीं खत्म भी हो जाए तो अच्छा।'' उसने आदमी की आँखों में प्रवेश कर कहा। अगले पल उसने खिड़की से जूट का बैग भीतर सरकाया और अगली सीट पर रख दिया।

विदा लेने में कोई अतिरिक्त पल खरचे बगैर अगली साँस में वह अपने कमरे में थी। रात लंबी ज्यादा थी कि काली ज्यादा... यह एक सवाल था। पर इस सवाल से टकराते हुए लड़की की आँखें लम्हा भर भी खुली नहीं। हथौड़ी और छेनी रात भर बेरहम ताल पर उठते गिरते रहे। लड़की बवंडर को अपने दो हाथ और दो औजारों से घेर कर बाँध लेने में जुटी रही। गलत ताल, बेसुरी धुन, ताबड़तोड़ प्रहार। जो उकेरा जा रहा था नीचे, उसे देखने तक को आँखें नहीं खुलीं लड़की की। सच तो यह था कि कुछ भी देख पाने के लिए आँखें नहीं खोलना चाह रही थी वह। कारण कि दुनिया के अलग अलग बिखरे हुए रंग उसे सँभाल से बाहर लग रहे थे। उसके मन के भावों को थामने की सामर्थ्य सुरंग से अंतहीन रंग का ही था केवल। सुरंग सा अंतहीन रंग - आँसुओं से धुल कर जिसका कि वैभव और भी निखर रहा था।

 

दो

आदमी गाड़ी को उसके मालिक के हवाले कर लौट रहा था पैदल। उसके हाथ में जूट का एक थैला था। इसके पहले गाड़ी में पीछे छूट गई लड़की की निशानियों को अपने हाथों से पोंछ कर मिटा दिया था उसने। पैर के पास के मैट पर टपक आईं पानी की बूँदें। बैठने की जगह पर सीट के ऊपर बिछे तौलिए का गीलापन। पीठ की तरफ चिपके रह गए लंबे बाल। तौलिए को अपने साथ ले जाने की इजाजत ले ली थी उसने। वजह भी स्वाभाविक थी। हल्की बूँदें जो अब भी मौजूद थीं - उनसे बचने का जुगाड़। गाड़ी का मालिक नेकदिल था। वह आदमी को उसके गंतव्य तक पहुँचवा देने पर तुला रहा। फिर आदमी की ना पर उसका प्रस्ताव था कि उस पहले से भींगे हुए तौलिए की जगह आदमी को दूसरा तौलिया ले जाना चाहिए। पर आदमी गीलेपन को ही गीलेपन का कवच बनाने पर आमादा था। इसलिए वह गीला तौलिया उसका हुआ। कम से कम उतनी देर तक तो जरूर... जब तक कि उसमें नमी बची थी।

आदमी को अपने कमरे की पलंग और मेज कुर्सी आदि से खाली बची रह गई जगह की अधिकतम दूरी को नापने में सत्ताइस कदम लगते थे। लड़की का कमरा जो उसने बाहर से देखा था... वह इस कमरे का कुंभ के मेले में बिछड़ा हुआ सगा भाई हो सकता था। बेशक दोनों की परवरिश अलग माहौल में हुई हो - ऐसा आदमी ने सोचा। उसने मोबाइल को देखा। लड़की कभी भी अपनी पहल पर संदेश नहीं करती थी। तो उसे देखना बेकार ही था।

वह बिस्तर पर लेट गया। उसे ऐसा लगा मानों वह लड़की का पहना गया ऑफ ह्वाइट जैकेट हो... जिसके कि ऊपर लड़की के कुर्ते का मैरून रंग चढ़ चुका हो। लड़की के टूट कर तौलिए से चिपक गए बालों को साथ लाने के लिए उसे किसी की इजाजत नहीं लेनी पड़ी थी। वह उन बालों को अपनी तर्जनी पर लपेटने लगा।

सफर के आखिरी चरण में शीशे से टिक कर बाहर देखते वक्त ही क्या लड़की ने मन ही मन विदाई वाले दृश्य की परिकल्पना कर ली थी! उसने आखिर में जो कुछ भी कहा क्या उन संवादों को उसी समय लिख लिया गया था! क्या उससे पहले पूछे गए अपने सवालों के जवाब जानने में वाकई लड़की की रुचि नहीं थी या कि उसने आदमी को मौका ही नहीं दिया उत्तर देने का?

आदमी अपने कमरे के क्षेत्रफल को सत्ताइस कदमों में नापने लगा। अब इस भ्रमजाल को और लंबा खींचना उचित था क्या! भ्रमजाल किसका उसका अथवा लड़की का! आदमी के माथे के बीचोंबीच कुछ बूँदें पसीने की चुहचुहा आईं। उसने कोशिश तो कई बार की पर या तो लड़की उसके हिस्से का सच सुनने से महरूम रहने पर आमादा थी या कि उसके बताने के प्रयासों में कमी थी ईमानदारी की। आदमी मुस्कुराया। ईमानदारी की उससे अपेक्षा भी कैसे की जा सकती थी। पर अप्रत्याशित रूप से इस ताजा ख्याल ने उसे गुदगुदाने की बजाए बेचैन कर दिया। वह वापस आकर बिस्तर पर लेट गया और उसने आँखें बंद कर लीं। क्योंकि पहली बार उसे लगा कि अपने सच का सामना उजाले में करने की ढिठाई कमजोर पड़ने लगी थी।

आदमी जोड़तोड़ का गुण लेकर पैदा हुआ था। अपनी व्यावसायिक काबिलियत और कुटिलता की वजह से सात वर्षों में वह रियल इस्टेट कंपनी के मामूली कर्मचारी से कंपनी के डायरेक्टर्स में से एक बन बैठा। फिर देखते ही देखते शहर के सबसे बड़े बिल्डरों में उसका नाम शुमार होने लगा। औने पौने दामों में स्थानीय लोगों से जमीन खरीदना, अच्छी रकम देकर नक्शा पास करवाना, स्वीकृत नक्शे के कुल क्षेत्र और अन्य प्रावधानों की धज्जियाँ उड़ा कर आसपास की और भी जमीनों को शामिल कर उन पर अर्पाटमेंट बनवाना, बैंकों से कर्ज उगहवाना और ऊँची कीमतों में बेच देना। अंधाधुंध प्रचार प्रसार और सरकारी कर्मचारियों के मुँह में पैसे ठूँसे रखने को अपना मूलमंत्र बना कर कंपनी ने अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। सफलता के नशे ने कंपनी के मालिकों में और मुनाफे की लालच पैदा कर दी। कालांतर में अर्पाटमेंट के निर्माण में प्रयोग किए जाने वाले सामानों में बेलगाम मिलावट से होने वाली आमदनी का रास्ता भी खुला। सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक कंपनी की बनाई एक नई नवेली सात मंजिला इमारत की ऊपरी छत ढह गई। चार लोग मारे गए। बिक चुके फ्लैट के मालिकों ने कंपनी पर मुकदमा कर दिया। पुलिस, बाजार, बैंक... सबने अपने मोर्चे खोल दिए सो अलग। गनीमत थी कि जो मारे गए वे मजदूर थे। गरीब लोग। कंपनी ने हाथ खोल कर पैसा खर्च किया और मुखर जबानों को ढाँप लेने में सफलता अर्जित की। डायरेक्टरों पर नॉन बेलेबल वारंट जारी था और वे चारों जमींदोज थे। कंपनी को पूरी उम्मीद थी कि मामले के थोड़ा बासी पड़ चुकने पर बात पूरी तरह से रफादफा हो जाएगी और पहले वाली साख दोबारा पाई जा सकेगी। पर तक तब मालिकों को शहर से अलगा कर रखना था।

आदमी इसी कड़ी में उस शहर तक आया था और कुछ दिनों के अंतराल पर अपने रहने के ठिकाने बदल लिया करता था। कंपनी की कोशिश थी कि मालिकों की सुविधाओं में किसी किस्म की कमी न रहे। ऐशो आराम के तमाम साधन तो थे पर आजादी न थी। दिन भर फोन पर कर्मचारियों को हिदायतें देने, सरकारी तंत्र से संपर्क साधने और मुकदमे पर नजर रखने के अलावा कोई काम भी न था। उस रोज आर्ट गैलरी में उसका जाना महज एक इत्तफाक था। आर्ट गैलरी के मेन हॉल में उसके एक अमीर दोस्त (जो बारिश वाले दिन दृश्य में गाड़ी के मालिक के रूप में था) की पत्नी के बनाए तैल चित्रों की प्रदर्शनी थी। आदमी शिष्टाचार निभाने वहाँ गया तो पर उसका मन वहाँ रमा नहीं। इसलिए सबकी आँख बचा कर वह बाहर निकल आया। वहीं इधर उधर भटकते हुए वह मेन हॉल से लगी उस गैलरी की तरफ बढ़ गया जहाँ बेचने के लिए पेटिंग्स और अन्य कलाकृतियाँ रखी थीं।

वहीं स्त्रियों के दो मुखैटों पर उसकी नजर पड़ गई और वह उन्हें देर तक देखता रह गया। उस वक्त वह इस बात से अनभिज्ञ था कि ये जुड़वाँ स्त्रियाँ उसकी जिंदगी को उलट कर रख देने का माद्दा रखती थीं। पर ऐसा कुछ था जरूर कि आदमी को एकबारगी लगा कि वह अतीत में दसेक साल पीछे चला गया हो, जहाँ वह भी इन स्त्रीद्वय की तरह भावप्रवण था और संभवतः निष्कलुष भी। उसकी एकाग्रता को बेधती एक लड़की आ खड़ी हुई थी इसी बीच - अपने अजीबोगरीब सवालों से लैस। एक दुबली पतली पीली लड़की - जिसकी आँखें बड़ी थीं और नाक नक्श साधारण। पर उसके हावभाव और बातों की दिशा हर पल बदल जा रही थी... चौंकाने की हद तक। आदमी ने गौर किया बस। इससे ज्यादा की हकदार नहीं थी लड़की।

पर अगले ही पल काउंटर पर यह जान कर वह स्तब्ध रह गया कि मूर्तियों को उसी लड़की ने बनाया था। यदि ऐसा था तो लड़की को झूठ कहने की क्या जरूरत थी कि उसने खरीदी हैं वे मूर्तियाँ। क्यों वह उसे दूर रखना चाह रही थी मूर्तियों से? उस झूठ ने आदमी की दिलचस्पी जगा दी और उसने खेल को लड़की की शर्त पर ही खेलने का निर्णय लिया। उसने काउंटर के आदमी से लड़की का पता लिया और पाँच सौ के दो नोट थमा कर यह ताकीद भी दी कि लड़की के सामने यह जाहिर न होने दिया जाए कि वह जान चुका है सब कुछ। आदमी ने तत्क्षण लिए गए इस फैसले पर बाद में विचार किया और परखा कि लड़की हजार रुपये खरचा जाना डिजर्व करती थी अथवा नहीं।

उसने सरसरी तौर पर लड़की के बारे में जानकारियाँ इंटरनेट पर तलाशनी चाही और एक ब्रोकिंग एजेंसी के कर्मचारियों की लिस्ट में उसका नाम दिखा। वैसी दीनहीन लड़की ब्रोकर हो सकती है यह बात आदमी के लिए अकल्पनीय थी। उसे लगा कि उसके नाम वाली किसी दूसरी लड़की के पते पर पहुँच गई थी उसकी खोज। फिर भी एक चांस लिया जा सकता था। आदमी ने उस एजेंसी में संपर्क किया और अगले दिन बैंगनी गुलाबी शेड वाली वह लड़की उसके सामने खड़ी थी। उसके आगे घटनाओं की कमान पूरी तरह से लड़की ने थाम ली और वह बस चलता गया।

शुरू में इस जिज्ञासा में कि यह खेल किन गलियों से होकर गुजरता है और वक्त बीतते बीतते जिज्ञासा की जगह एक गिल्ट ने ले ली। वह रोज सोचता कि आज वह इस खेल का पटाक्षेप लिख देगा पर विदा लेने के ठीक पहले वह अंत को अगली मुलाकात पर टाल देता। बीच में कभी कभी एहतियात के तौर पर ठिकाना बदल कर वह पास के किसी दूसरे शहर तक भी जाया करता। ऐसे वक्त उसे दृश्य से पूरी तरह गायब हो जाना पड़ता। ऐसे मौकों पर उसने टटोलने की कोशिश की कि लड़की से न मिल पाने का क्या असर पड़ता था उसके ऊपर। पर जो था वह इतना खुल कर प्रकट था कि इसके लिए अपने भीतर झाँकने की जरूरत ही न थी। उसकी बची खुची किलेबंदी लड़की के आतुर संवाद ध्वस्त कर दिया करते। पर अब उसे हर हाल में लड़की को रोक लेना था। पर लड़की को यदि वह रोक भी लेता तो खुद उसे रोक पाने के लिए किसका आसरा था!

ऐसा नहीं था कि अपने आप के कमजोर पड़ते जाते वाले पलों में उसने अपने भीतर के राक्षस को जगाने की कोशिश नहीं की। उसकी जमा संपत्ति किस दिन काम आती। लड़की का मुँह ऐशोआराम और सुविधाओं से बंद किया जा सकता था और पा भी लिया जा सकता था उसे। पर अगर पैसे से ही पाना था तो लड़की से बेहतर विकल्प मौजूद थे संसार में। और यह भी तो निश्चित नहीं था कि वह लड़की को पाना ही चाहता था। उसे तो बस लड़की की उपस्थिति से खुशी मिलती थी। उसकी बातों का हिस्सा बन कर सुकून मिलता था। उसके चेहरे पर बदले भावों का कारण बन कर तोष मिलता था। उसके पैसे - नाजुक सूत पर सधने वाले इन लम्हों का संतुलन बिगाड़ सकते थे। और सबसे बड़ी बात यह कि लड़की की जबान ही अगर बंद हो जाती तो उसमें फिर बचता क्या मुग्ध करने लायक!

फिर लड़की को रोक देना... अपने को रोक देना ही एकमात्र विकल्प! वैसे एक रास्ता और भी था कि बीच से ही अपने को अनुपस्थित कर लिया जाए दृश्य से। सब कुछ छोड़ कर अचानक से एक दिन गायब हो जाया जाए लड़की की दुनिया से। सच तो यह है कि इसका प्रयास किया था आदमी ने बीच में अपने को स्थगित करके पर स्वयं उसके भेजे संदेशों ने ही इस संभावना का अंत किया। ये बात और है कि उसके बाद जब भी आदमी लड़की से मिला, वह मन ही मन अपना आभारी हुआ - संदेश भेजने का निर्णय करने के लिए।

पर उस रोज की लड़की की बातों से जाहिर था कि वह भी अब ज्यादा वक्त तक खेल को खींच ले जाने के पक्ष में नहीं थी। आदमी ने आँखें खोल दीं। उठ बैठा वह। कहाँ जाना था यहाँ से आगे। क्या यह सही मौका नहीं था कि वह पीछे खींच ले अपने आप को पूरी तरह! लड़की ने स्वयं अंत की घोषणा की थी। यही वह मोड़ था जहाँ से वह बगैर अपने मन पर कोई बोझ लिए आसानी से अपना रास्ता बदल सकता था। लौट सकता था अपनी दुनिया में। यही चयन बेहतर। तो तय रहा।

आदमी ने जूट के थैले में से मूर्ति को निकाला। यह भी एक पहेली थी कि लड़की ने उसे बतौर तोहफा एक ही स्त्री मूर्ति क्यों दी? आदमी गौर से उस मूर्ति को देखता रहा और मूर्ति के चेहरे के बरअक्स आदमी का चेहरा भी एक संकल्प से दहक उठा। अंतर बस इतना था कि जहाँ मूर्ति की आखों में आँसू के कतरे कैद थे, आदमी की आँखें सूखी थीं... रेगिस्तान की मानिंद। आदमी ने फोन लगाया और अपने मातहत को आदेश दिया कि उसके रहने के इंतजामात उस शहर से दूर करवा दिए जाएँ तत्काल।

उसने एक उचटती सी नजर कमरे में बिखरे अपने सामानों पर डाली और वापस लेट गया... चित्त। क्या हो पाएगा उससे यह सब! करना ही था क्या ऐसा उसने अपने को याद दिलाने की कोशिश की कि उसकी जिंदगी में मकसद पैसा और ताकत हासिल करना है। ऐसे दो चार पल के सुकून वाले लटके झटके के लिए अपना संतुलन नहीं बिगाड़ सकता वह।

फोन आ गया आदमी के मातहत का। अगले ठिकाने का इंतजाम कर लिया गया था। उसे अगले दिन की सुबह ही शहर छोड़ देना था। आदमी ने सामने वाले को सुधारा और दोपहर की रवानगी निश्चित की। सुबह से दोपहर तक की मोहलत क्यों ली गई थी इसका जवाब आदमी को एकांत में भी लज्जित कर गया। निकलना तो था ही। सुबह सबेरे की हड़बड़ी का क्या मतलब - उसने मन ही मन कैफियत दी।

अगली सुबह हुई। सामान बँध गया आदमी का। गाड़ी आ गई। सामान सहित चेक आउट करने की बजाय वह खाली हाथ आकर गाड़ी में बैठ गया। ड्राइवर को शहर में ही एक पते पर चलने का आदेश मिला। आदमी आर्ट गैलरी तक गया और उसने काउंटर पर दरियाफ्त करके लड़की की बनाई हुई तमाम अनबिकी कलाकृतियों को खरीद लिया। उसने गौर किया कि उन आकृतियों में स्त्री के मुखौटों का जुड़वा पीस शामिल नहीं था। तो यकीनन लड़की ने उसे अपने पास रखा था।

बहरहाल इस नई खरीद के साथ अपने साजो सामान सहित आदमी शहर से विदा ले चुका था। वह अपने आप को व्यस्त रखने के प्रयासों में जुट गया। उसने अपने शरीर को खंगाल कर इधर उधर बिखरे उत्साह को एकत्रित किया। वह नए सिरे से सरकारी कर्मचारियों से अपने मुकदमे में आने वाले पेंचों और उनके संभावित हल की जानकारी पाने में जुट गया। उसने महसूस किया कि पिछले कुछ दिनों में आए ढीलेपन ने उसके मुकदमे के निबटारे को कई दिन पीछे कर दिया था। वह कंपनी के बाकी तीन डायरेक्टरों के मुकाबिल कहीं ज्यादा प्रभावशाली था। दूसरे भी उसके आसरे थे इस मुसीबत के निबटारे में। इसलिए आदमी अपना फोकस गँवाया जाना अर्फोड नहीं कर सकता था। मुकदमा एक बार निबट जाए तो रियल इस्टेट की दुनिया में फिर से अपनी साख पाई जा सकती थी और कंपनी के मुनाफे को वापस पहले वाली पटरी पर लाया जा सकता था। पैसे का दुनिया में कोई विकल्प नहीं हो सकता - ये कैसे भूल गया था वह!

कोई ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी आदमी को। जल्द ही वह अपने पुराने साम दाम वाले रंग में लौट आया। स्वाभाविक गुणों की तरफ ढलने में वैसे ही मनुष्य को ज्यादा कष्ट नहीं होता। आदमी की कंपनी ने अपने नए चल रहे प्रोजेक्ट के एक चौथाई भाग के लिए ही नक्शा स्वीकृत करवाया था। बाकी के तीन चौथाई हिस्से का नक्शा जालसाजी से तैयार किया गया था। प्रोजेक्ट का काम पूरी जमीन पर शुरू हो चुका था। पर एक फ्लैट के कुछ ऊपरी हिस्से के ढह जाने से विरोधियों ने उसकी कंपनी के खिलाफ शहर में माहौल बनवा दिया। उसके प्रोजेक्ट में फ्लैट लेने वाले ज्यादातर लोगों को जो बैंक लोन मुहैया करा रही थी, वहाँ तक यह बात पहुँच चुकी थी कि नक्शों में जालसाजी हुई है। लिहाजा बैंक के अधिकारी सर्किल ऑफिसर के दफ्तर में नक्शे की सत्यता से संबंधित अर्जी लगा चुके थे। सर्किल ऑफिसर के दफ्तर में यह अर्जी आधे पौन महीने से अटकी थी और कंपनी से मोलतोल जारी था। आदमी ने तात्कालिक नुकसान उठाने का फैसला किया और सीओ और उसके मातहतों के मुँह भर दिए गए। कंपनी को क्लीन चिट मिल गई और बैंक ने वापस उस प्रोजेक्ट में फ्लैट लेने वालों को लोन देना शुरू कर दिया।

जबसे आदमी ने पूरे मनोयोग से वापस कंपनी का काम सँभाल लिया था, तबसे व्यावसायिक मुसीबतें तेजी से छँटने लगी थीं। महीने दो महीने में उसे बेल मिल जाने की उम्मीद थी। फिर आजाद हो जाता आदमी। उसे तसल्ली थी कि जितना पैसा इन दिनों उसे बहाना पड़ रहा था, उसे सूद समेत वसूल लेगा वह।

बीते दिनों की घटनाओं से वह खुद को अलगा लाया था। सच तो यह था कि लड़की की बनाई कलाकृतियाँ, जिन्हें आदमी खरीद लाया था, एक कोने में पड़ी थीं। वैसे ही। पैकिंग पेपर में कैद। दुकान से लाने के बाद खोल कर देखा तक नहीं गया था उन्हें। बल्कि यह भी संभव था कि होटल के उस कमरे को छोड़ते वक्त यदि साथ चलता सामान अधिक हो जाता, तो कुछ गैरजरूरी चीजों के साथ उन पैकेटों को भी छोड़ दिया जाता कमरे में - अपने पीछे।

आखिरी मुलाकात के बाद का लाया गया वह तौलिया भी अब अपनी नमी के सारे निशान गँवा चुका था। आदमी के सामानों के साथ कमरे में तुड़ामुड़ा पड़ा था वह। जिस जगह पर आदमी के सामान बिखरे थे वहाँ की सफाई करने में रूम अटेंडेंट भी झिझकता था क्योंकि आदमी के रसूख को वह भी सूँघ चुका था। लिहाजा तौलिए को गुड़ीमुड़ी स्थिति में उस जगह पड़े रहने की सहूलियत थी। एक रोज आदमी की मिजाजपुर्सी में आए एक मातहत के हाथ से चाय का प्याला मेज पर छलक गया। तत्काल सफाई की तत्परता में मातहम के हाथ उस तौलिए को उठाने बढ़ गए। आदमी को जरा भी बुरा न लगा तौलिए का वह इस्तेमाल होता देख कर। बल्कि वह तत्काल याद भी न कर सका कि तौलिए के साथ कौन सी स्मृति जुड़ी थी। एक बार दाग लग चुकने के बाद तौलिए ने हर किस्म के गर्द का खौफ दिया और उसने बेझिझक अपने को झाड़पोंछ में प्रयुक्त हो जाने दिया। लेकिन तौलिए में स्वाभिमान था और जिद भी। वस्तुओं पर जमी गर्द उससे बच नहीं पाती थी पर स्मृतियों पर पड़ी गर्द के पास कभी खुद को फटकने नहीं देता था तौलिया। लिहाजा आदमी का वैभव तो चमकता रहा पर यादों पर परतें जमती गईं।

एक रोज जब आदमी ट्रेडमील पर दौड़ चुकने के बाद तौलिए से अपना पसीना सुखा रहा था तो उसके मोबाइल पर संदेश की घंटी बजी। संदेश ब्रोकिंग एजेंसी की तरफ से आया था। लब्बोलुआब यह कि उसकी जरूरत के मुताबिक घर का चयन कर लिया गया था और कंपनी देरी के लिए शर्मिंदा थी। आदमी ने अगली साँस में मैसेज को डिलीट कर दिया और वापस ट्रेडमील पर चढ़ कर स्पीड बढ़ाने लग गया, बावजूद इसके कि रोज का तयशुदा कोटा आदमी पहले ही पूरा कर चुका था। मशीन वापस लय में चलने लगी और आदमी ने आँखें मूँद कर अपनी गति उस लय से मिला ली। एक बार सम पर पहुँच जाने के बाद आदतन आदमी ने दोनों हाथों की पकड़ से ट्रेडमील को आजाद कर दिया और धुन में दौड़ने लगा। उसकी पूरी चेतना गति को साधने में लगी थी। घुप्प अंधकार में पैरों की थाप को महसूस लेने में उसकी समस्त इंद्रियाँ ध्यानस्थ हो गईं। उसने शरीर के रोओं से अहसास किया उस अनुभव का। असीम सुखकारी अहसास। ठीक इसी समय अपनी दोनों भौंहों के बीचोंबीच एक फिरोजी लौ दिखाई दी उसे।

तत्क्षण आदमी की आँखें खुल गईं और उसके हाथों ने हड़बड़ा कर ट्रेडमील के बाजुओं को थाम लिया। आदमी इस कदर विचलित हो गया था कि उसने कूद जाना चाहा ट्रेडमील से नीचे। पर तत्काल उसने चाल को काबू में किया। गति धीरे धीरे कम की गई और आदमी उतर गया नीचे। वह वहीं रखी आरामकुर्सी पर निढाल पसर गया। भीतर से उठे एक तेज भभके ने जतन से दाब कर रखी स्मृतियों के ढक्कन को उड़ा दिया और अतीत के मैरून रंग के फिरोजी रंग में अनुवाद की पूरी प्रकिया उसके आगे खुल गई। उसने तौलिए से अपना मुँह रगड़ रगड़ कर पोंछा। मानों उसकी कोशिश थी कि लड़की के दुपट्टे का कच्चा रंग पूरी तरह से उसके चेहरे पर छा जाए। उसके कपड़ों की तरह लड़की का रंग भी कच्चा था। आसानी से दूसरे पर चढ़ जाने वाला। ये बात और थी कि एक बार चढ़ चुकने के बाद दूसरे के लिए उस रंग को उतार पाना मुमकिन न हो पाता।

आदमी ने अपना मोबाइल फिर से पलट कर देखा। कुछ भी न था वहाँ। आदमी को अपनी कनपटी पर गीलेपन का अहसास हुआ। आँसू नहीं हो सकते... पसीना होगा! आदमी ने उसे पोछते हुए अपने आप से कहा।

नाश्ते के वक्त आदमी के दिमाग में यह विचार आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि लड़की से उसकी नाकामी के कारण आदमी की फाइल छीन ली गई हो और दूसरा कोई ब्रोकर इस मुहिम पर लग गया। वरना संदेश लड़की के नंबर से भी तो आ सकता था। कंपनी की तरफ से संदेश आने का क्या मतलब हो सकता था और उसे अहसास हुआ कि आनन फानन में संदेश को नहीं मिटा डालना चाहिए था। अगर कि वह इनबॉक्स में मौजूद होता तो हरेक शब्द को पुनः पढ़ कर उसके पीछे की संभावनाओं को सूँघने का प्रयास तो किया ही जा सकता था। पर इन सबके विषय में फिक्रमंद होने की उसे क्या आवश्यकता थी! उसने नाश्ते में अपना ध्यान केंद्रित कर दिया।

आदमी का सारा दिन अपने वकील और मातहतों के साथ रणनीति की माथापच्ची में बीता। उसने जाँच कर रहे अधिकारियों के दूर के रिश्तेदारों के नाम पर उसी प्रोजेक्ट में दो एक्जीक्यूटिव फ्लैट देने की पेशकश पर विचार किया और उसे मंजूरी दे दी। इसमें बड़ा तात्कालिक घाटा था पर हालात के पतलेपन को देखते हुए यह बेहतर विकल्प था। पर अभी के उठाए वित्तीय नुकसानों की भरपाई फ्लैट खरीदने वाले ग्राहकों की जेब से होती, यह तो जगजाहिर बात थी।

दूसरी तरफ एक अच्छी खबर आई थी। काफी दिनों से शहर के सीमांत इलाके में कुछ स्थानीय जमीन मालिकों से जमीन खरीदने की बातचीत चल रही थी। उस मामले में कुछ पेंच थे जो सुलझ गए थे और इस बड़ी डील का रास्ता साफ हो गया था। लेनदेन की पृष्ठभूमि पर सरकारी कर्मचारियों के साथ संबंधों का इन दिनों रिन्यूवल हो चुका था। इससे भविष्य में इस नए प्रोजेक्ट का नक्शा पास होने में कम झंझट की संभावना थी।

शाम में आदमी का मन बेहद हल्का और प्रसन्न था। वह एक लंबी सैर पर निकल गया था पैदल। स्मृतियाँ और विचार किसी किस्म की घुसपैठ न करें इसलिए कानों में एयरफोन लगा कर वह गाने सुनता रहा। रात का खाना खा चुकने के बाद वह न्यूज चैनल देख रहा था तभी उसके फोन की घंटी बजी। हड़बड़ाई सी हल्की साँस। आदमी जब तक बगल के तकिए के उस पार रखे फोन को उठाता, तब तक कट चुका था फोन। आदमी ने चेक किया। लड़की का मिस्ड कॉल था। एक संदेश भी था। आदमी ने संदेश को पढ़ने के पहले उसका समय चेक किया। डेढ़ दो घंटे पहले का संदेश था। अभी आदमी उस संदेश को पढ़ता कि दूसरा संदेश आ गया।

''चेक करने के लिए कॉल किया था कि फोन ऑन है कि नहीं। बात कुछ नहीं करनी थी।''

आदमी ने दूसरा संदेश पढ़ चुकने के बाद पहला संदेश खोला।

''आखिरी मुलाकात के पहले ही मैंने आपके लिए घर खोज लिया था और इस बात की सूचना भी आपको पहले ही दे दी गई थी। इसलिए हमारे बीच हुई आखिरी बातें उस पर लागू नहीं होतीं। आपको घर देखना ही होगा। अपनी सुविधा से समय की डिटेल भिजवा दें।''

आदमी ने याद किया। घर खोज लिए जाने की सूचना लड़की ने शायद उस दिन दी थी जब वे एक गली के छोरों को मापते रहे थे बार बार। उसे उम्मीद नहीं थी किसी संदेश की - यह बात बेमानी थी। संदेश हठधर्मिता भरा ऊँटपटाँग होगा - यह भी जानी हुई बात थी। फिर भी, सब कुछ प्रत्याशित होते हुए भी... लड़की को उत्तर में दिया जा सकने वाला कोई जवाब सोच नहीं पाया आदमी। कोई जवाब देना भी चाहिए कि नहीं - यह बड़ा प्रश्न था। अगर सिर्फ पहला संदेश ही आया होता तो सोचा भी जा सकता था जवाब दिए जाने के बारे में। पर दूसरे संदेश में जब लिख दिया गया कि कोई बात नहीं करनी थी... तब फिर बात की ही क्यों जाए!

आदमी सोचने लगा कि अगर लड़की उसके बारे में सब कुछ जान जाती, तब भी क्या उसका व्यवहार ऐसा ही रहता क्या उससे संपर्क रखती वह कैसी बातें सोचने लग गया वह भी। कोई चोर उचक्का थोड़े न था वह। केस मुकदमा तो किसी भी व्यवसाय में लगा रहता है। संभव है यह जान कर लड़की खुश ही हो जाती कि वह घर खरीदने की हसरत रखने वाला एक आम आदमी नहीं, बल्कि रियल इस्टेट की दुनिया में एक जाना माना नाम है। इस सोच का खोखलापन वाक्य के हिस्से में ही लिथड़ कर प्रकट हो गया। यह ख्याल एक तसल्लीदार मुस्कराहट तक का जुगाड़ नहीं कर पाया आदमी के चेहरे पर।

आदमी कुछ अंतराल के बाद प्रवेश कर रहा था शहर में। वह घटनाओं के घटने के पहले किसी भी प्रकार की मोर्चाबंदी या रणनीति बनाने से बचा रहा था अपने आप को। परिस्थितियों के सामने आकर खड़े हो जाने के पहले कोई भनक तक न हो उसके दिमाग को कि वह क्या करने वाला था। लड़की का सामना करने की यह नीति सर्वोत्तम थी। कारण कि वैसे भी वह लड़की हालात की डोर को अपनी मर्जी से घुमाने फिराने में माहिर थी। लड़की ने मिलने की जो जगह बताई थी, वह उस इलाके से खासी अलग थी जहाँ कि घर लेने की ख्वाहिश आदमी ने प्रकट की थी। इसलिए यह भी संभव था कि लड़की उसे बेवकूफ ही बना रही हो और उसे बुला कर खुद न आए। उस वक्त आदमी के मन में इस संभावित स्थिति को लेकर कोई प्रतिरोध नहीं जन्मा। उसका अंतर बेवकूफ बनाए जाने को भी तैयार लगा। वैसे देखा जाए तो यह स्थिति बेहतर होती। कारण कि वैसा होने से लड़की की बात भी रह जाती और उसका सामना हो पाने से खुद को बचाया भी जा सकता था। पर क्या वह वाकई खुद को बचा लेना चाहता था!

ड्राइवर को शहर की विशेष जानकारी न थी और रुक रुक कर पता पूछते हुए वह लक्ष्य की ओर बढ़ रहा था। विलम्बित ताल की यह यात्रा आदमी के ख्यालों में बहुत सी आशाएँ और प्रत्याशाएँ जगा रहीं थीं।

आदमी पते पर पहुँच गया। लगभग समय से। कोई नहीं था वहाँ उसके इंतजार में। आदमी ने ड्राइवर को होटल भेज दिया इस ताकीद के साथ कि उसके अगले आदेश की प्रतीक्षा की जाए। आदमी खड़ा रहा कुछ देर एक लैंपपोस्ट के नीचे। फिर उसने चक्कर लगाना शुरू कर दिया। नियत समय से दस मिनट ज्यादा हो चुके थे। लड़की को फोन करने का विकल्प सामने आया और चला गया नेपथ्य में..., यह भाँप कर कि आदमी को कोई हड़बड़ी नहीं थी। वह लैंपपोस्ट के नीचे की दुबली पतली जगह में बैठ गया। पैरों को फैला कर और उन्हें इस तरह रोप कर जमीन पर कि शरीर का अधिकांश भार थाम सकें वे दोनों। उसे अहसास हुआ कि इतनी पतली सुतली जगह बनाने की बजाए अगर थोड़ा चौड़ा चबूतरा बनाया गया होता तो सुस्ताने के लिए भी इसे उपयोग में ला सकते थे राहगीर। सरकारी फंड के कामकाज में लूट की जगह अगर उसे सही जगह खर्च किया गया होता, तो थोड़ा भला हो जाता लोगों का। अचानक उसके जेहन में अपने प्रोजेक्ट की वह इमारत कौंध गई जिसका ऊपरी सिरा बनने के दौरान ही टूट गया था। मुंडेर से गिरे चार मजदूर। उसके तलवे में झनझनाहट होने लगी और वह हड़बड़ा कर उठा कि एक स्कूटी उसके समानांतर आकर रुक गई। लड़की ने हेलमेट उतार कर इधर उधर देखा।

''बगैर गाड़ी के आपको पहचानने में दिक्कत हुई। मेरी स्कूटी पर बैठ कर जाएँगे क्या?'

आदमी को अपने पिछले ख्याल की जमीन से इन सवालों की हकीकत तक आने में वक्त लगा। लड़की प्रश्नवाचक चिह्न की तरह मुँह को टेढ़ा मेढ़ा बना कर उसे देख रही थी।

''कहाँ जाना था पता तो यही था।''

''हाँ पर पता तो मिलने का था। यहाँ आसपास कोई घर दिखता है क्या घर तक कैसे जाएँगे।''

''पैदल।''

''आप कहना चाहते हैं कि आप पैदल चलें और मेरी स्कूटी आपकी चाल के साथ जुगलबंदी करे?'

''कितनी दूर चलना है?'

''पाँच किलोमीटर।''

आदमी ने भौंहें चढ़ाईं। लड़की स्कूटी से उतर गई।

''चलिए ज्यादा दूर नहीं चलना... ऐसे ही चलते है।''

आदमी चलने लगा। पर बड़ा विचित्र सा था। वह पैदल चल रहा था और लड़की उसके समानांतर स्कूटी धकेलती चल रही थी। उसके दिमाग में एक बार भी शिष्टाचार से भरा यह ख्याल नहीं आया कि स्कूटी को धकेलने की जिम्मेदारी वह अपने ऊपर ले ले। कारण कि वह अभी तक इमारत के ऊपरी हिस्से के भहरा कर गिरते जाने वाले दृश्य से बाहर नहीं आया था। थोड़ा आगे चल कर लड़की रुक गई और गाड़ी से पानी की बॉटल निकाल कर पानी पीने लगी।

उसने हाँफते हुए कहा - ''आप चलते रहिए सीधे। मैं आती हूँ।''

लड़की की साँसें चढ़ रही थीं पर उस पर एक नजर डाल कर आदमी बढ़ता गया। चाल जरूर उसने धीमी कर ली। लड़की ने तेज चल कर बीच में आई दूरी को पाट लिया। कुछ आगे चलने के बाद लड़की के तेज साँसों की आवाज फिर से आने लगी।

आदमी ने कहा - ''लाइए। अब मैं ले चलता हूँ।''

''शुक्रिया।'' लड़की ने तेज स्वर में कहा - ''पहुँच गए।''

वे एक कॉलोनी में पहुँच गए जिसमें प्लॉटिंग की गई थी और उस पर स्वतंत्र बंगले बने थे। एक बंगले के लॉन के बाहर लड़की ने गाड़ी लगा दी।

आदमी लड़की के पीछे पीछे लॉन में दाखिल हुआ।

वहाँ तीन कुर्सियाँ खाली थीं। एक कुर्सी पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था। लड़की ने बूढ़े पर नजर पड़ते ही अपना दाहिना हाथ हिलाया और उसके बगल की खाली कुर्सी पर बैठ गई। आदमी लड़की के बगल में बैठ गया। बूढ़े ने आदमी की तरफ नजर उठा कर भी नहीं देखा। उसका सारा ध्यान लड़की की तरफ था।

''मैं ग्राहक लेकर आई हूँ।'' लड़की ने एक बेशर्म दलाल की तरह कहा। उसके चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास था।

बूढ़े ने पीछे खड़े घर को आँखें नचा कर देखा। कोठे की उमरदराज मालकिन की तरह, जो अपने निहारने के अंदाज से अपने सामान की कीमत बढ़ाने का प्रयास करती है। आदमी ने बूढ़े की पुतलियों का पीछा करते हुए घर को नजर भर देखा।

''इतने दिन कहाँ रहीं?' बूढ़े की न तो संभावित ग्राहक में कोई दिलचस्पी थी न सौदे में।

लड़की आदमी का चेहरा देखने लगी और उसने गहरी अदा से कहा - ''मसरूफ थी।''

आदमी को इन दोनों के संवाद घनघोर नाटकीय लगे और वह एक दर्शक की तरह सामने चलते इस दृश्य में दिलचस्पी तलाशने लगा।

''काफी मँगवाऊँ क्या?' बूढ़े ने पूछा।

लड़की ने अचकचाने का अभिनय किया - ''कॉफी यहाँ!''

''यहाँ मँगवा नहीं सकता पर मँगवाने की इच्छा तो जाहिर कर सकता हूँ।''

लड़की ने पैंतरा बदला अचानक।

''ओह! मैंने तो इनसे आपको मिलवाया ही नहीं।''

आदमी चौंक गया क्योंकि उसे अप्रत्याशित रूप से दृश्य में खींच लिया गया था।

''मिलवा चुकीं आप! आपने कहा था कि आप ग्राहक लेकर आई है।'' आदमी ने कहा।

''पर मैं इनसे आपको क्या मिलवा सकती हूँ।'' लड़की अपनी रौ में थी - ''जब मैं खुद नहीं जानती कुछ।''

आखिरी हिस्सा उसने बुदबुदा कर पूरा किया।

''आप दोनों खुद ही मिल ले।'' लड़की ने कहा और उठ खड़ी हुई जाने के लिए।

''रुकिए मिस सक्सेना। मैं आप दोनों को एक साथ मिलवाना चाहूँगा अपने आप से।''

बूढ़ा अभी भी आदमी की तरफ न देख कर जमीन की घास की तरफ देख रहा था। लड़की ने भौंहें उचकाईं और कुर्सी को सख्ती से पीछे खींच कर बैठ गई।

''शुरू कीजिए।''

आदमी मुँह खोलता इसके पहले बूढ़े ने बोलना शुरू किया।

''मैं गिरीश अग्निहोत्री। समाजशास्त्री हूँ। उसके पहले प्राध्यापक भी था। दसेक साल हुए रिटायर कर गया। कुछ किताबें भी लिखीं। दो बेटे हैं। दोनों जर्मनी में सेटल हो गए। पत्नी गुजर चुकी हैं। यही घर संपत्ति है। इसे बेच कर जर्मनी चला जाना चाहता हूँ... बच्चों के पास।''

बूढ़े ने घास से बॉटल उठाई और पानी पीया।

''अभी जो सब कहा मैंने वे बातें कॉमन हो सकती हैं - अगर मैं दस लोगों से अपने ऊपर निबंध लिखने को कहूँ तो। पर अगर मुझसे कहा जाए लेख लिखने अपने ऊपर... अपने मकसद के ऊपर तो मैं इतनी पंक्तियाँ खर्च नहीं करूँगा। सिर्फ दो वाक्य में कहूँगा - ''मुझे सिर्फ कीमत चाहिए। और यह कीमत पैसों में ही हो जरूरी नहीं। बूढ़े ने पहली बार आदमी की आँखों में देखा।

''अगर आपने दूसरी पंक्ति नहीं कही होती तो मैं मानता कि मिस सक्सेना की खोज मुकम्मल है।''

''आपके पास बहुत पैसा है?' लड़की ने पूछा।

जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि आदमी ने इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर नहीं दिया। ये बात और थी कि ऐसा प्रश्न उससे किया ही पहली बार गया था। उसने नजरें घुमा लीं।

''बताइए न! आपके पास बहुत पैसा है?'

आदमी ने नजरें नहीं फेरीं।

''इतना पैसा है कि मेरी सारी कलाकृतियों को खरीद चुकने के बाद भी बचा रह गया।'' वह फुँफकार उठी आक्रोश से।

''जब आपने कहा कि आप ग्राहक लेकर आई हैं तो मुझे लगा आप मेरे घर के खरीददार की बात कर रही हैं। ...आपने अपनी मूर्तियों के ग्राहक की बात की थी - यह मैं समझ नहीं पाया।''

''मैंने आपके घर के संदर्भ में ही वह कहा था।'' लड़की ने संयत स्वर में बूढ़े को जवाब दिया।

आदमी के पास पर्याप्त कारण थे अपने को विजातीय महसूस करने के पर वह अपनी जगह बगैर हिचकिचाहट बैठा रहा।

''आप घर देखना चाहेंगे?' बूढ़े ने आदमी से पूछा।

''नहीं। यह जानना चाहूँगा कि अगर मुझ पर लेख लिखने को कहा जाए तो आप क्या लिखेंगे?' जवाब आदमी ने बूढ़े को दिया था पर नजरें उसकी सवाल बन कर लड़की पर टिकी रहीं।

बूढ़ा हँसा - ''मैं लिखूँगा कि आपके पास बहुत पैसा है और आप उन पैसों को दुनिया की अनमोल चीजें खरीदने के योग्य बनाना चाहते हैं।''

''आपको अवश्य ही निबंध में पास मार्क्स तक नहीं मिल पाते होंगे।'' लड़की ने बगैर उन दोनों की तरफ देखे हुए कहा।

''मिस सक्सेना। मैं मानता हूँ कि आप निश्चय ही जिंदगी की एक कड़ी परीक्षक होंगी पर एक कड़ा परीक्षक हमेशा ही औचित्यपूर्ण निर्णय ले, यह आवश्यक नहीं।'' आदमी ने कहा।

''चुनाव अगर औचित्य और ईमानदारी में हो तो मैं हमेशा ही बाद वाले को चुनूँगी।'' लड़की की ग्रीवा तन गई।

''ईमानदारी!'' आदमी के होंठ व्यंग्य से वक्र हो गए।

''आश्चर्य है कि आपने ईमानदारी को चुनने की बात की। मेरे अनुभव में तो जब भी सामने वाला ईमान का रास्ता पकड़ना चाहता है आप उसे बेईमानी की पटरी पर उतार देती है।''

''लगता है आप दोनों एक दूसरे से ज्यादा परिचित हैं।'' बूढ़े ने कहा।

''नहीं मैं आपके बारे में ज्यादा जानती हूँ।'' लड़की ने रुखाई से कहा।

''किसी के बारे में ज्यादा जानने और किसी को ज्यादा जानने में भयानक अंतर है।'' बूढ़े ने संजीदगी से कहा। उसके हाथ अपनी जेब में गए और अगले पल उसने उसमें से कुछ निकालते हुए लड़की से कहा - ''लीजिए यह मैं आपके लिए लाया था जर्मनी से।''

वह सिल्वर चेन की एक पतली घड़ी थी।

''शुक्रिया। बहुत अच्छा।'' लड़की ने कहा और अपनी कलाई में बाँध लिया। एक घड़ी पहले से वहाँ बँधी थी।

''यह मेरे लिए एक अच्छा तोहफा है। मैं इंतजार करने का सलीका सीखना चाहती हूँ ताकि वक्त मेरे लिए कभी बोझ नहीं बने।''

''आइए घर देखते है।'' बूढ़ा उठ खड़ा हुआ। बाकी के दो लोग भी उठ गए उसके पीछे पीछे। लॉन को पार कर वे घर के भीतर दाखिल हुए। बूढ़ा आगे आगे, फिर लड़की और आखिर में आदमी। बूढ़े को इस बार घर में घुसते ही महसूस हुआ कि वह बहुत जल्द इस घर से बतौर मालिक विलगने वाला है। लड़की सोच रही थी कि अब जबकि वह आदमी के आगे चल रही थी तो आदमी की आँखों से कैसे देख पाएगी उस घर को! आदमी को न तो कुछ महसूस हुआ न उसने कुछ सोचा। वह अपने आगे चल रही लड़की के तलुवों और चप्पल के बीच के तारतम्य को देख रहा था। लड़की जैसे ही आगे बढ़ने को कदम बढ़ाना चाहती, तलुवे चप्पल का मोह छोड़ अलग जाते थे ऊपर की तरफ और फिर जब एड़ी जमीन पर पड़ती तो दोनों एकसार हो जाते। यानी कि मिलने की आवश्यक शर्त बिछुड़ना था। जब कभी लड़की रुक रुक कर कुछ देखने लगती, आदमी की साँसें भी थम जातीं। वह शिद्दत से चाहने लगा था कि लड़की चलती रहे अपनी धुन में बेखबर... घर के इस कोने से उस कोने तक लगातार। उसके आगे आगे।

लड़की दो मर्तबा देख चुकी थी पीछे मुड़ कर - आदमी की खामोशी का भेद जानने की गरज से। दोनों बार उसने लक्ष्य किया कि आदमी उसके पदचिह्नों को देख रहा था।

''फटी एड़ियाँ पहले कभी नहीं देखीं क्या?'

आदमी इस व्यवधान से बौखला गया।

''क्या चुपचाप चलती नहीं रह सकतीं आप?'

लड़की ने अविश्वसनीय आज्ञाकारिता का परिचय दिया और आदमी के आगे चलती रही लगातार बगैर रुके। पर उसकी इस सजग यंत्रवत चाल ने दृश्य की सुंदरता और पाकीजगी को नष्ट कर दिया और आदमी को बहुत झुँझलाहट हुई।

''कैसा लग रहा है आपको?' बूढ़े ने पूछा।

''एक खराब थाप ने पूरी लय बिगाड़ दी। सुंदर नहीं बचा कुछ भी।'' आदमी ने कहा।

''आपने गौर कर लिया?' बूढ़े ने पूछा हैरत से, घर की छत को देखते हुए।

''हाँ देख लिया मैंने सुंदर को असुंदर होते हुए।'' आदमी ने फर्श का ओर देखते हुए जवाब दिया।

बूढ़ा प्रसन्नता से आदमी की तरफ मुड़ा।

''तब मैंने जो पैसे बहाए जो परिवर्तन करवाए इस घर में सब सार्थक रहे! विश्वास कीजिए पहले यह घर बेइंतिहा सुरुचिपूर्ण था। एक एक ईंट में हमने अपनी कलाप्रियता छिपा दी। इतना सुंदर कि मेरी पत्नी संभवतः मुझसे ज्यादा प्रेम इस घर से करती थी। और वह गलत भी नहीं थी, यह मानता हूँ मैं। इस घर को उस रूप में बेच भी नहीं सकता था और बेचना अनिवार्य था, कारण कि पत्नी के बाद इस घर में अकेले समय काटना सजा थी। फिर मैंने यह तरकीब निकाली कि बेचने के पहले पैसे बहा कर इसकी कलात्मकता पर भव्यता का नकाब पहना दिया जाए। और मैं उसमें सफल रहा क्योंकि आपने कुछ भी न जानते हुए भी देख लिया इस सच को।''

आदमी ने पहली बार नजर उठा कर उस घर को देखा। वह बुदबुदाया - ''सुंदर के असुंदर में रूपांतरण से आत्मा भी बदल जाती है क्या?'

बूढ़े के चेहरे का रंग उतर गया एक पल। अगले ही पल उसकी आँखों में चमक आ गई - ''मैं यह घर आपको ही सौंपूँगा।''

''मैं कहूँ कि घर खरीदने की मेरी कभी इच्छा थी ही नहीं तो?'

''मैं जानती थी यही होगा।''- लड़की चिल्लाई।

''आपको तो मैंने बता दिया था सामने से पर आपने उसे झूठ समझा।''

लड़की का माथा घूम गया। एक बात सच एक बात झूठ वाले खेल में आदमी ने दो वाक्य कहे थे - मैं घर नहीं खरीदना चाहता और जब हम नहीं मिले उन दिनों मैंने आपको याद करने की बहुत कोशिश की। कितनी बड़ी बेवकूफ थी वह कि उसने झूठ को सच और सही को झूठ करार दिया। मूर्ख नहीं हास्यास्पद। कोई अपना इस कदर भी तमाशा बना सकता है क्या पहली बात को वह झूठ समझ बैठी इससे कष्टप्रद कि दूसरी बात को उसने सच समझ लिया। उसकी आँखों में आँसू आ गए।

''मिस्टर अग्निहोत्री। मैं एक बड़ा बिल्डर हूँ। मुझ पर वारंट जारी है और मैं भूमिगत हूँ अभी। अभियोग यह है कि मेरी बनाई हुई इमारत में मिलावट काफी थी और एक हिस्सा गिर जाने से चार मजदूर मारे गए। आप सोच रहे होंगे कि मैं यह सब क्यों बता रहा हूँ पर मिस सक्सेना - वह लड़की की ओर मुड़ा - ''आपके आँसुओं के अनुपात में मैं अपने आप को जलील करना चाहता हूँ।''

लड़की की आँखों में अविश्वसनीयता की सिलवटें थीं। वह बुदबुदाई - ''अब देर हो चुकी। इस ईमानदारी का अब क्या औचित्य ये बातें पहले भी बताई जा सकती थीं।''

''अभी अभी आपने बताया कि औचित्य और ईमानदारी में से आप किसे चुनेंगी।''

लड़की झटके से मुड़ी और लगभग दौड़ती हुई निकल गई घर से। बूढ़ा भी उसके पीछे गया। आदमी बचा रह गया अकेला। वह घर के भीतर घूमने लगा। उसकी दिलचस्पी अकस्मात जाग गई घर में। वह घूमता रहा देर तक। बूढ़ा जिस चीज को नष्ट कर पाने का मुगालता पाले बैठा था, वह चीज दबा दी गई थी बेशक, पर उसके झाँकते अक्स की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता है। घर में खिड़की और दरवाजों की उपस्थिति ऐसी थी कि सूरज की किरणों को हर कोण के कटाव से महसूस किया जा सके। संगमरमरी फर्श पर किरणों के जोड़ घटाव का साक्षी बनता वह एक किनारे के कमरे में पहुँचा। उस कमरे में बाकी घर की तुलना में रोशनी की आवाजाही कम थी पर ऐसी चीज थी जिसे किसी भी घर में देखे अरसा हो चुका था उसे। उस कमरे की पूर्वी दीवार पर ऊपर की तरफ बीचोंबीच एक छोटा सा रोशनदान था। आदमी रोशनदान के सामने की दीवार में उस जगह लग कर खड़ा हो गया जहाँ कि सूर्य की पहली किरण के आकर गिरने की कल्पना की आदमी ने।

जैसे ही वह उस जगह जाकर खड़ा हुआ उसे वह कमरा कालकोठरी सा प्रतीत होने लगा। उसका अपना संभावित भविष्य। वह वहीं दीवार से टिका... बैठ गया धीरे धीरे। क्यों थी मन में ऐसी शंकाएँ जबकि पैसा इतना जमा कर चुका था वह कि कानून के लंबे हाथों को गिरेबान तक बढ़ने की बजाए नोट गिनने के काम में व्यस्त किया जा सके। वह चाहता तो चुटकियों में उस घर को खरीद लेता। नहीं चाहता तो आराम से बाहर निकल चुके दो व्यक्तियों से विदा लेकर या बगैर विदा लिए ही निकल सकता था उस स्थिति से। किसी किस्म का बंधन नहीं था उसके इर्द गिर्द। फिर कैसा था यह असमंजस, द्वंद्व, संशय... संभवतः ग्लानि भी। क्या आवश्यकता थी उसे अपना सच उन दो लगभग अजनबी व्यक्तियों को बता देने की, जबकि वक्त ऐसा नाजुक था कि उसकी रिहाइश का पता तक गुप्त रखा जा रहा था। ऐसे में बगैर सोचे विचारे इतना बड़ा खतरा लेना कितना जोखिम भरा साबित हो सकता था। एकांत के पलों में ऐसे ख्याल, ओवर एक्टिंग से उसकी सोच को वश में करने का प्रयास करने लगे पर एक गहरी तसल्ली और उदासीनता थी आदमी के भीतर कि वह निस्पृह भाव से बैठा ख्वाबों की आवाजाही को महसूसता रहा देर तक।

दरवाजे के बीचोंबीच बूढ़ा आकर खड़ा हो गया। वह आशंका से भरा आदमी को देख रहा था। फिर उसकी नजर रोशनदान पर गई और उसके चेहरे के भाव बदल गए तुरत। वह अविश्वसनीयता से कुछ पल आदमी को देखता रहा। फिर उसके चेहरे पर गहरा संतोष छा गया।

बूढ़े ने कहा - ''आपने बैठने के लिए सबसे उपयुक्त जगह तलाश ही ली। पर आइए अभी बाहर चलें।''

आदमी ने बगैर प्रतिवाद, दीवार का सहारा लेकर उठा दिया खुद को। दोनों बाहर आ गए। लड़की तन कर बैठी थी। तुनक कर बैठे बच्चे के समान। वे दोनों भी बैठ गए।

''आप जिस तेजी से निकली थीं, मैंने सोचा नहीं था कि इतनी कम दूरी तय कर के ही रुक जाएँगी।''

''मजाक करने की हैसियत खो चुके हैं आप।''

''आपकी कलाई पर दो दो घड़ियाँ बँधी हैं मिस सक्सेना। दोनों यकीनन, कुछ हेरफेर से ही सही... अलग अलग वक्त बता रही होंगी। एक ही समय में इन दो घड़ियों के अलग अलग सच को साध रखा है आपने। फिर उन वाक्यों के बोले जाने के पहले और बाद के मेरे दो अलहदा सत्य को नहीं साध सकतीं आप - ऐसा अविश्वास आप पर मैं क्यों करूँ!''

चुप्पी पसरी रही आगे। फिर आदमी ने कहा - ''और रहा देर से या अब यह सब बताने का सवाल तो आपने ही कहा था कि जिस बात से सामने वाले को फर्क नहीं पड़ता उसे न बताया जाए तो भी कोई हर्ज नहीं।''

''फर्क पड़ता कि नहीं पड़ता इसका निर्णय आपने कैसे लिया?'

''मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ मिस सक्सेना।'' आदमी की आँखें शांत पर बेधक थीं - ''कि आप यह सब जानने के बाद भी वही सब महसूस कर रही हैं मेरे लिए जो कुछ घड़ी पहले तक महसूस कर रही थीं... या फिर अभी कर रही हैं। इसलिए फर्क नहीं पड़ता - यह तय था।''

लड़की का चेहरा लाल पड़ गया। क्रोध, अपमान लज्जा... तीनों भावनाएँ उपस्थित हो गईं इस असामंजस्य में कि लड़की को इनमें से किसी की भी जरूरत पड़ सकती थी। पर लड़की ने माथे के आगे तलहथी की आड़ लगा कर धूप से बचने का अभिनय कर सूरज की रोशनी को चेहरे की लाली का कारण घोषित कर दिया और तीनों भावों को दरकिनार होना पड़ा।

बूढ़े की उपस्थिति फीकी पड़ चुकी थी और उसने भी जिम्मेदार भाव से इस फीकेपन को अपना लिया। अपनी पहल पर वह एक छतरीदार गोलमेज में तब्दील हो उपस्थित हो गया आदमी और लड़की के बीचोंबीच। उसकी इस प्रत्युत्पन्नमति से दृश्य में प्राण आ गया। लड़की का चेहरा धूप से बच गया साथ ही आदमी और लड़की को एकांत भी मिल गया।

''आपके पैर काँप रहे हैं।''

मंच की सज्जा में इस परिवर्तन के बाद लड़की ने अपने आप को एकदम अकेला महसूस किया और वह दुपट्टे में मुँह छिपा कर फफक पड़ी।

आदमी बुत बना बैठा रहा। कर भी क्या सकता था वह! लड़की को भी अहसास था कि कुछ करने नहीं जा रहा था आदमी। इसलिए थोड़ी देर सिसक चुकने के बाद लड़की ने स्वयं ही दुपट्टे से अपना मुँह पोंछा और बैठ गई वापस सिर झुका कर।

आदमी ने धीमे स्वर मे पूछा - ''आपको कौन सी बात बुरी लगी - असलियत या कि असलियत बताने में की गई तथाकथित देरी'

''कुछ नहीं। कुछ भी नहीं। बुरा यह लगा कि उस सच झूठ के खेल में झूठी बात को सच मान लिया मैंने।''

आदमी मौन रहा कुछ पल फिर उसने कहा - ''मैंने कहा था... मैंने आपको याद करने की कोशिश की - यह बात झूठ थी और इसे सच मान लिया आपने - यही बात आपको तकलीफ दे गई हाँ ये बात झूठ थी कि मैंने आपको याद करने की कोशिश की। क्योंकि कोशिश करके याद करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। सोच पर अनवरत जब किसी का कब्जा हो तो प्रयास करने की जरूरत होती है क्या! उलटे मैं तब शायद मुक्त होना चाहता था और मैंने न याद करने की भरपूर कोशिश की। संभवतः यह भी गलत। मुक्त कभी नहीं होना चाहा मैंने।''

''बंद कीजिए।'' लड़की लगभग गिड़गिड़ाई। फिर उसने अगले पल संयत किया अपने को।

''होंगे आप बातों के रफूगर। लच्छेदार जबान के धागे से बातों को सीने वाले। पर यह बात तार तार हो चुकी है। आपको इस बार लौट कर आना ही नहीं चाहिए था।''

''मैं कुछ महसूस करने लगा हूँ।'' आदमी ने सपाट स्वर में कहा।

लड़की के होंठों पर फीकी मुस्कान खेल गई - ''आपका महसूस करना ही खबर है। लोगों की जान चली जाती है यहाँ... और बात रफा दफा हो जाती है।''

आदमी को लगा कि अभी अभी उसके पैर जहाँ थे, उस जमीन का कोना भहरा कर गिर चुका नीचे।

लड़की का चेहरा सख्त हो गया - ''अगर मैं आपके यहाँ होने की सूचना पुलिस को दे दूँ तो?'

''मैं फिर भी बच निकलूँगा मिस सक्सेना।'' आदमी ने बुझी हुई आवाज में कहा।

''बच तो जाएँगे आप निःसंदेह। पर ईंट मिट्टी के बने घरों में आत्मा ढूँढ़ने का स्वाँग करने वाले इनसान के भीतर भी तो कोई आत्मा होगी कहीं। उस पर पड़े हुए बोझ से किस विधि निजात पाएँगे आप?'

''मुझे तो लगता है मेरी आत्मा से ज्यादा बोझ आपके मन पर पड़ गया है।'' एक लंबी साँस लेकर आदमी ने अपना दाहिना हाथ बढ़ाते हुए कहा - ''इन उँगलियों में से किसी एक को चुनिए।''

लड़की ने कोई प्रतिक्रिया न दिखाई।

''चुनिए न।''

लड़की ने अपनी तर्जनी निकाल कर आदमी की तर्जनी की ओर इशारा किया।

आदमी ने दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों पर बाईं हथेली का आवरण छिपा दिया, इस तरह कि उँगलियों के ऊपरी सिरे को देखा जा सकता था केवल।

''अब इनमें से अपनी चुनी हुई उँगली चुनिए।''

लड़की आदमी के यह कहने के पहले ही जान चुकी थी, हाथों की भंगिमा से, कि उसे क्या करना था। वह हिचकिचाई। बात जिस गंभीर मुकाम पर थी उससे आगे यह सब खेल कौतुक बचकाना था। फिर भी उसने अपने पर्स से एक कलम निकाली और हिचकते हुए आदमी की एक उँगली पर निशान बना दिया। आदमी ने बाईं हथेली हटा ली। दाहिने की उँगलियाँ छितरा दी गईं। लड़की की कलम का नीला निशान आदमी की अनामिका पर लगा था।

''आपने एक अकेले सच को चुना। फिर जब वही सच झुंड में था तब आपके लिए कोई दूसरा चेहरा सच बन बैठा और उस पहले वाले ने अपना तेज खो दिया। यानी किसी चीज को अकेला होने पर जैसा देख पाती हैं आप, आवश्यक नहीं कि उसका प्रभाव दूसरी चीजों से घिरा होने पर भी वैसा ही रहे। यही बात उन चीजों पर भी लागू होती है जो बुरी मानी जाती हैं। एक पहलू जो बुरा है वह दूसरी घटनाओं के साथ लग कर जब सामने आता है तो संभवतः अपनी कलुषता गँवा चुका होता है।''

अचानक से आदमी के चेहरे पर मुस्कान खेल गई। उसने उँगलियों को लक्ष्य करके कहा - ''उम्मीद करता हूँ आपकी स्याही का रंग आपके कपड़ों के रंग जैसा कच्चा न हो।''

अगले ही पल वह संजीदा हो गया और अपनी दाहिनी हथेली को गोद से थोड़ा ऊपर तक उठा कर बुदबुदाया - ''यह निशान जल्दी न जाए तो अच्छा।''

''आप ऊपरी आवरण के कच्चेपन में उलझे हैं और मैं भीतरी रंग के पक्केपन की दरियाफ्त करना चाह रही हूँ... यही अंतर है।''

दोनों देर तक खामोश रहे।

''आपको कभी गिल्ट नहीं होता?'

''मैंने सोचा नहीं।''

''रातों को बेचैनी नहीं होती?'

''बेचैनी का रात से क्या संबंध दिन में भी हो सकती है।''

''आगे आपने क्या सोचा है?'

''यह घर मैं खरीद लूँगा मिस सक्सेना।''

''भविष्य के बारे में क्या सोचा है?' लड़की झुँझलाई।

''यही मुस्तकबिल बन सकता है।'' आदमी ने गहरी साँस लेकर घर की ओर देखा।

''जो पाप आप करते आए हैं, उसके बारे में क्या सोचा?'

''आप यह कहलवाना चाहती हैं कि मैं अपना रास्ता बदल लूँगा... प्रायश्चित करूँगा... शुद्धिकरण करूँगा... सजा काटूँगा आदि आदि?'

''कुछ कहलवाना नहीं चाह रही मैं। आपके महान विचार सुनना चाह रही हूँ।''

''आप ऐसा चाहती हैं। अगर मैं आपकी चाहत में हामी भरता जाऊँ तो इस बात के क्या मायने यह सच है कि मैंने जब भी कल्पना करने की कोशिश की कि आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी ये बातें जानने के बाद - तो मैं दहल गया। और आज अचानक कह गया मैं सब कुछ सहजता से। यह सब सोच समझ कर नहीं हुआ।''

''आगे?'

''आगे अब सब बातों का जवाब एक है। उस दिन विदा लेने के पहले आपने जो सवाल पूछे और जिनके जवाब देने का मौका मुझे नहीं मिला... उन तमाम सवालों का बस एक उत्तर है।''

''मुझे वह उत्तर नहीं सुनना।''

''सुन नहीं सकतीं पर उत्तर दे तो सकती हैं। कह तो सकती हैं अपनी जबान से।''

''ये बातें किल्कुल झूठ हैं। आपको मेरी... किसी की कोई परवाह नहीं है।''

आदमी चुप हो गया। लड़की को उसका चुप होना अच्छा नहीं लगा। उसने चाहा कि आदमी अपना पक्ष रखे और अपने पक्ष में लड़की को राजी कर ले। पर उसका राजी हो पाना कैसे संभव था! अजीब गड्डमड्ड सी स्थिति थी। उसने थोड़ी देर पहले कही अपनी बात को फिर से दोहराया।

''आप मेरे बुलावे पर आए ही क्यों?'

दरअसल इससे मिलते जुलते सवाल पर ही आदमी उस जवाब तक पहुँचा था पूर्व में जिसे वह सुनना चाह रही थी। इस मर्तबा आदमी पलट गया और उसने कहा - ''इतने सबके बाद भी आपने मुझे बुलाया तो वह घर मैं जरूर देखना चाहता था मिस सक्सेना। घरों से मुझे लगाव है।''

लड़की का चेहरा क्रोध से तमतमा गया। उसने दूसरा रास्ता अपनाया अपनी बात सुनने का।

''आपने क्यों खरीदी मेरी बनाई चीजें उनसे भी लगाव था क्या?'

''मैं उन्हें हमेशा अपने साथ रखूँगा। एक जोड़ी कछुवे, राखदान, हाथी, एक ऊँट, ढोल बजाता एक आदमी, नथ वाली एक स्त्री...। मेरा अंत ही उन्हें अलग कर सकेगा मुझसे।''

लड़की को यह बात भली लगी। पर वह इसे सँभाल नहीं पाई। उसने मुँह फेर लिया।

''मैं आपके बगैर नहीं रहना चाहता।''

लड़की जिस बात को बोले जाने वक्त आदमी को देखने की चाह रखती थी शिद्दत से, वह बात बोली जा चुकी थी। पर ऐसा क्यों था कि बात के बोले जा चुकने के बाद भी लड़की गरदन मोड़ कर आदमी की तरफ न देख पाई।

''मैं चाहने लगा हूँ आपको।''

''क्या आप मेरी लिखावट पहचान सकते हैं?'

आदमी ने 'न' में सिर डुलाया।

''मैं भी नहीं पहचान सकती आपकी लिखावट। हम दोनों एक दूसरे को जानते ही कितना हैं!''

''लिखावट नहीं पहचान सकता पर मैं ये जानता हूँ आप लिखने क्या वाली हैं। इतना पर्याप्त नहीं... इसलिए और जानना चाहता हूँ आपको।''

लड़की पूरे ताव में पलटी - ''पर आपको इसका कोई अधिकार नहीं है। आप कातिल हैं। बेईमान हैं। आपको जेल में होना चाहिए।''

''पर मुझे चाहने का अधिकार है मिस सक्सेना। भले बदले में चाहे जाने का हक न हो।''

लड़की का चेहरा पिघल गया। उसने अपने आप को बोधा - ''मुझे यकीन नहीं होता कि आप...।''

अगले पल वह फुँफकारी - ''नहीं मुझे शुरू से पता था कि आप अच्छे आदमी नहीं हैं।''

''आपको इस तरह पीड़ा में देख कर मुझे तकलीफ हो रही है।''

''तकलीफ तो आपको अपने आप पर होनी चाहिए अपने किए पर होनी चाहिए।''

''उसके लिए तो उम्र पड़ी है। फिलहाल मैं आहत हूँ इस अहसास के लिए कि आपने मेरे लिए अपने आप को गिराया। बार बार गिराया... जैसा कि आपने उस रोज कहा था।''

''मैं गिरूँगी, उठूँगी... फिर और जोर से गिर जाऊँगी... यह मेरा निजी मामला है।''

लड़की की बात खत्म होती कि बीच में ही छतरी वाली मेज में कंपन हुआ और बूढ़ा खाँसने लगा। उसकी खाँसी की आवाज ने उसके छद्म रूप को अनावृत कर दिया। दृश्य का पूरा संतुलन बिगड़ गया। लड़की और आदमी ने एक दूसरे को नई रोशनी में देखा। लड़की ने नीचे से उठा कर पानी की बॉटल बूढ़े की ओर बढ़ा दी। बूढ़े की खाँसी काबू में आ गई। उसे शर्मिंदगी महसूस हुई और उसने वापस अपने आप को गैर मौजूद कर छतरी के भीतर समा जाने का प्रयास किया। पर एक बार बिगड़ चुके सुरों को साध पाना संभव न था उस वक्त।

''लगता है यह धूप अब आपके लिए ठीक नही।'' लड़की ने बूढ़े से कहा।

''आइए भीतर ही चलें।'' बूढ़े ने उठते हुए कहा।

''भीतर?' लड़की ने पूछा।

''हमने पूरी तरह घर को देखा कहाँ! बात बीच में ही रह गई थी, जैसे अभी रह गई।''

आदमी उठ खड़ा हुआा। आखिर में लड़की को भी उठना पड़ा। तीनों गए भीतर। क्रम अभी भी वही था। बूढ़ा, लड़की फिर आदमी। अबकि आदमी ने देखा कोई संबंध बन नहीं पा रहा था लड़की के तलवे और चप्पलों में। दोनों अपना अपना कर्तव्य निभा रहे थे बस। बूढ़ा सीधा उस रोशनदान वाले कमरे में जाकर खड़ा हो गया। वे दोनों भी आ गए वहाँ।

''एक बार बाहर जाकर हम अपनी अपनी कुर्सियाँ ले आएँ क्योंकि जो मैं बताने वाला हूँ उसमें थोड़ा वक्त लगेगा। बैठना उचित रहेगा।''

बूढ़ा मुड़ा। वे भी। कुर्सियाँ लाई गईं। बूढ़े ने अपनी कुर्सी उस जगह लगाई जहाँ आदमी बैठा था... दीवार के सहारे कुछ देर पहले। आदमी और लड़की उसके अगल बगल बैठे थे।

''इस जगह जहाँ मैं बैठा हूँ बिस्तर लगा हुआ था मेरी पत्नी का।''

''इस कमरे में?' लड़की ने पूछा। कारण स्पष्ट था। इस कमरे से ज्यादा हवादार और बड़े कमरे मौजूद थे घर में।

''हाँ यहीं। रोशनदान के सामने। यह कमरा उसे पसंद था। हम दोनों को। शैय्या नहीं। मृत्युशैय्या थी उसकी यहाँ। हम जानते थे कि वह ज्यादा समय साथ नहीं रहने वाली। पत्नी की पूरी दिनचर्या यहीं लगे बिस्तर के इर्दगिर्द सीमित थी। मैं अक्सर उसके पास वहाँ बैठा करता था - बूढ़े ने आदमी की कुर्सी की ओर इशारा किया। मैं वहाँ बैठता पत्नी की सुश्रूषा करते जाने का भाव लिए पर मन ही मन मैं उसके न रहने की कामना करता। कारण यह नहीं था कि वह कष्ट से मुक्त हो जाए यह इच्छा थी या कि उसकी परेशानी देखी न जाती ऐसा कुछ। कारण यह था कि मैं यह चाहता था कि वह जाए तो मैं अपनी प्रेमिका के पास लौट सकूँ।''

दो लोग सन्न रह गए।

''वैसे मृत्युशैय्या पर रहते हुए बीमारी की खुनक और ऊब के सिवा कोई और शारीरिक परेशानी थी भी नहीं मेरी पत्नी को। उसके बिस्तर पर पड़ने के कुछ वर्ष पूर्व मेरा एक प्रेम संबंध बना था। पत्नी को खबर न थी। यहाँ उस जगह पर बैठ कर एक भी ऐसा क्षण न बीता जबकि मैंने पत्नी के आँखें मूँद लेने की इच्छा न की। वैसी स्थिति में उसे छोड़ कर अलग संसार नहीं बसा सकता था, न उसकी तीमारदारी से अनुपस्थित रह कर प्रेमिका के साथ वक्त ही बिता सकता था। बहुत पेशोपेश के पल थे वे। उसी स्थिति में मेरी पत्नी छह वर्षों तक घसीट ले गई जीवन को। मैं इंतजार की साँस को उस हद तक खींच ले जाने की सामर्थ्य रखता था पर जिस स्त्री से मेरा प्रेम था, उसका धीरज चौथे साल में ही छूट गया। जब वह अलग हुई मैं पीड़ा से भर गया। किसी से बाँट भी नहीं सकता था वह सब। पत्नी को लगता कि उसके मरते जाने की बात के गाढ़ेपन ने मुझे विचलित कर दिया था। वह और भी प्रेम में भर कर मुझे धैर्य देने लगती। प्रेमिका के जीवन से निकल जाने के बाद मरती पत्नी के सिरहाने उस कुर्सी पर बैठे बैठे तब मुझे किस बात की मन्नत माँगनी चाहिए यह मैं तय नहीं कर पा रहा था। इतने वर्षों तक उसके न रहने की दुआ माँग चुका था शिद्दत से कि अचानक से दुआ को उलट देना नाइनसाफी होती ईश्वर के साथ। फिर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि मुझे प्रेम में मिले आघात से ज्यादा मन्नत में माँगी जाने वाली दुआ का विकल्प छिन जाने ने दुखी किया था। कुछ दिनों तक उसके सिरहाने मैं बगैर कुछ माँगे बैठा रहा। पर ऐसे में वहाँ रोज रोज बैठते हुए झुँझलाहट होने लगी थी मुझे - ऐसा मैंने महसूस किया। मेरी झनक निकलती पत्नी पर ही। लिहाजा वह सहमी सहमी रहने लगी। पूर्व में मैं जब उसके मर जाने की दुआ माँगता तो इस ग्लानि को कम करने के लिए अतिरिक्त लाड़ बरसाता पत्नी पर। उन दिनों जबकि ग्लानि की वजह मिट चुकी थी उस स्नेह से भी मरहूम हो गई थी बीमार स्त्री।

उसके साथ होते इस अन्याय से बचने का एक ही रास्ता सूझा मुझे। अगर किसी एक के साथ अन्याय होना तय था तो ईश्वर ही सही। ईश्वर सह लेता अपने प्रति किया गया अन्याय। मैंने पत्नी के सिरहाने बैठ कर उसके स्वस्थ हो जाने की दुआ माँगनी शुरू की और तीन महीने के भीतर ही वह गुजर गई।''

कमरे में थोड़ी देर खामोशी छा गई। मालूम होता था तीनों लोगों ने साँसें लेने को भी साइलेंट मोड में डाल दिया था। सन्नाटा बूढ़े की धीमी आवाज से ही भंग हुआ।

''मैं एक ईमानदार अध्यापक था। नामचीन समाजशास्त्री। पर अपने मन की गहराई में उन वर्षों मैं एक गिरा हुआ इनसान था। किसी ने भी मेरे बेईमान चेहरे को नहीं देखा। आज तक मैंने किसी से ये बातें साझा नहीं कीं। और समाज ने मुझे जिस ऊँचे आसन पर बिठाया, उस पर बैठ कर मैं अपनी महानता को देखता रहा। आपने एक बार पूछा था न...।'' वह लड़की से मुखातिब हुआ - ''मेरी सबसे कीमती चीज क्या है! और मैंने कहा था कि उस तक पहुँचने में माध्यम आप होंगी। मेरी सबसे कीमती चीज वर्तमान है। ठीक अभी का पल जब मैंने अपने आप के गिरते जाने की बात कबूल ली। वह साहस पा सका कि साझा कर सकूँ अपना अपराध। इस कमरे में मैंने जिंदगी का सबसे बड़ा पाठ सीखा था। प्रेम, इंतजार और लालसा के त्रिकोन की भुजाओं के बीच झूलते हुए। आज अपने मन के पाप को उजागर करके मैंने उस घुटन से मुक्ति पा ली, जो आज तक मेरे गले में फँसी थी या कि आजादी ही दे दी उस घुटन को कि वह गरदन से ऊपर की ओर पसर कर लील जाए मेरे वजूद को।''

बूढ़े ने सिर झुका लिया। लड़की ने नजरों के एक अर्धवृत्ताकार घेरे से दोनों व्यक्तियों को देखा।

रोशनदान से होकर आती एक धुँधली सी गोल आकृति तीनों लोगों से दूर छिटकी दीवार के एक कोने पर पसरी थी। तीन इनसान अपनी अपनी चाक से मौन पर रेखाएँ खींचते रहे।

 

तीन

बूढ़े को जीवन के अठहत्तरवें साल में शोध कार्य पर बड़ा पुरस्कार मिला था। उसने आपराधिक प्रकृतियों वाले इनसानों के मानसिक गठन, उनके अंतर के नजरिए और प्रेम के प्रति उनके दृष्टिकोण पर घूम घूम कर शोध किया था। कई देशों की यात्रा की गईं और अलग अलग लोगों के व्यवहार को परखा गया। बूढ़े की यह पुस्तक बेईमान और अपराधियों को पूर्व निर्धारित मानदंडों पर परखने की बजाए एक नई दृष्टि देती थी उनकी प्रवृत्ति और मानसिक बुनावट को समझने के लिए। उसके काम को देश विदेश में सराहना मिली और वह इसी पुरस्कार को लेने के लिए एक अंतराल के बाद जर्मनी से अपने देश लौटा था।

समारोह में शिरकत करने के बाद वह अपने घर भी आया। घर बिकने से रह गया था और एक ट्रस्ट को दे दिया गया था। ट्रस्ट की देखरेख में वहाँ एक संग्रहालय बन गया था। उस घर के बाकी कमरों में ऐतिहासिक महत्व की और अन्य कलात्मक चीजें रखी थीं। एक कमरा जो अपेक्षाकृत छोटा था और जिसमें कि एक रोशनदान था, उसके आगे 'ट्रिब्यूट टू फाउंडर।' का बोर्ड लगा था। उस कमरे में कुछ भी न था, सिवाए तीन कुर्सियों के। यह घर के मालिक के विशेष आग्रह पर उसके जीवन की एक शाम को सुरक्षित रखने के लिए किया गया था। कुर्सियों की स्थिति तक भी न बदली गई थी जरा भी।

लड़की और अपने बीच हुए दो तीन वर्ष पूर्व के संवाद के आधार पर उसने लड़की को खोज लिया। अपने संक्षिप्त पोस्टकार्ड में लड़की ने लिखा था कि वह नेत्रहीन बच्चों के एक स्कूल में मूर्तिकला सिखाती थी। मिलने का स्थान तय हुआ। बूढ़ा कई वर्षों के बाद लौटा था और शहर की चालों और ढब से वह अनजान था। फिर भी जगह उसने ही चुनी। लड़की ने कोई प्रतिवाद न किया मिलने की जगह की तफसील जानने पर।

कॉफी हाऊस की शक्ल बदल चुकी थी। उसकी ऊपरी मंजिल पर एक बार खुल चुका था और रौनक सारी उधर सिमट चुकी थी। अँधेरा कॉफी हाउस में पहले भी हुआ करता था पर अब माहौल में एक घुटापन था। बूढ़ा एक खाली मेज की तरफ बढ़ गया। वह हर चीज को पीकर जेहन में उतार लेने की तसल्ली से देख रहा था। चीजें बेशक बदल चुकी थीं पर पिछली स्मृति के उस तापमान को बदस्तूर बनाए रखा गया था कॉफी हाउस में। मालूम नहीं लड़की तापमान के उस ठंडेपन को अब भी उसी तरह खुल कर महसूस कर पाती होगी या नहीं।

बूढ़े ने गौर किया कि वह मेज भी अब खाली हो चली थी, जिस पर पिछली दफा वे बैठे थे। बूढ़े ने बेझिझक जगह बदल ली। अभी वह तसल्ली से अपनी जगह बैठ पाता कि सामने की कुर्सी भर गई।

बूढ़े ने देखा - सामने स्त्री थी। उसने उन्नावी और बादामी साड़ी पहन रखी थी। उसका चेहरा भरा भरा था और जूड़े की जद से निकल कर एक लट बाईं ठोढ़ी को छू रही थी। उसके होठों पर जो मुस्कान थी, उस तरह से नहीं मुस्कराना चाह रही थी वह। यह द्वंद्व उसकी आँखों में झलक रहा था जिसकी दरियाफ्त बूढ़े ने चश्मे के फ्रेम को ऊपर की तरफ सरका कर की। निसंदेह सामने जो स्त्री थी - वह लड़की का बेहतर संस्करण थी।

''अचानक कहाँ से आ गईं आप?' बूढ़े ने पूछा।

''मैं वहाँ दूर बैठी थी और मेरा सारा ध्यान इस बात पर था कि कब यह मेज खाली हो और मैं इसे आरक्षित कर सकूँ... हमारे लिए। मेज खाली हुई और मैं आई। पर आप पहले आ गए! यह बाजी भी निकल गई मेरे हाथ से।''

बूढ़ा हँसा - ''शुक्र है आपकी आवाज नहीं बदली।''

''आप बूढ़े हो गए है।''

बूढ़ा हँसा।

''इन दो रंगों का मेल इतना सुंदर होगा सोचा न था।'' उसने स्त्री की साड़ी की ओर इशारा किया।

''अजनबी कुल गोत्र की दो चीजों का मेल कभी कभी अद्वितीय हो ही जाता है।''

एक खामोशी की लकीर खिंच गई हल्की।

''कॉफी नहीं मँगवाएँगे'

स्त्री की बात पूरी होने के पहले ही बैरा कॉफी लाकर रख गया।

''ऑर्डर मैंने उसी टेबुल से दे दिया था। जैसे ही मेहमान आ जाएँ उनके पसंद की मात्रा में कॉफी आ जानी चाहिए ऐसा आदेश था।''

''आपको याद हैं सारी बातें कॉफी की मात्रा...।''

''आपको भी तो याद है...।''

''मेरे पास वक्त ज्यादा है काम कम, इसलिए रियाज कर लेती हूँ पुरानी यादों का।''

''स्कूल कैसा चल रहा है?'

''बहुत अच्छा।'' स्त्री के चेहरे पर चमक आ गई - ''मैं ठीक ठीक जो महसूस करती हूँ मूर्तियाँ बनाते वक्त... वे बातें उन बच्चों तक जिस सहजता से संप्रेषित हो जाती हैं, वह सब दूसरी जगह संभव नहीं।''

स्त्री ने एक तेज घूँट भरा और अगले पल कहा - ''फिर से जल गई मैं। कॉफी से। यह एक अच्छी बात है।''

बूढ़े ने हैरत से देखा।

''मुझे लगने लगा था कि अब कोई कॉफी मुझे जलाने का ताव नहीं रखती पर दोष कॉफियों का नहीं था। मेरी जीभ ने ही तय कर रखा था कि कहाँ जल जाना है।''

''जाहिर है। जीभ किसकी है!''

दोनों हँस पड़े।

''हँसते वक्त आपके चेहरे की झुर्रियाँ हिलती हैं।''

''और आपकी आँखों में आँसू छलक आते हैं खुल कर।''

''मैं आपके लिए कुछ लाया हूँ।''

''माँग लूँगी। अभी मत दिखाइए। अभी मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ। यह सवाल इन दिनों बार बार आपसे पूछा गया होगा... फिर भी - कैसा लग रहा है आपको इतना सम्मान पाकर?'

बूढ़ा मुस्कुराया - ''जो जवाब मैंने लोगों को दिया वह आपको नहीं दूँगा। अच्छा किया कि आपने यह सवाल पूछा। मैं जो सच में महसूस कर पा रहा हूँ उस पर उँगली रखना आवश्यक है। वह आखिरी शाम जो मैंने आपके साथ बिताई वह मेरी जिंदगी का उरूज था। उसके बाद का सफर ढलान जैसा था। ये और बात है कि मैंने उतरते जाने के एक एक पल को गुनगुना कर जीने की कोशिश की। ये सम्मान भी उसी ढलान का एक पड़ाव। खूबसूरत पड़ाव - इतना जरूर कहूँगा।'' बूढ़े की आँखें खुशी से चमकीं।

''क्या शोध के विषय को चुनने की प्रेरणा आपको हमारी आखिरी मुलाकात से ही मिली?' स्त्री का चेहरा अबूझ हो गया। पीड़ा, तसल्ली और जिज्ञासा सब समा गए उसकी आँखों में।

''नहीं। वह शाम मूल टेक की तरह कायम रही मेरे भीतर पर शायद जिस चीज का प्रभाव ज्यादा हो उसके तले कभी कभी सोच दब जाया करती है। फिर कोई हल्की त्वरा की चीज आपके विचार को उद्वेलित कर देती है और आप खुद ब खुद एक प्रक्रिया का हिस्सा बन जाते हैं - बेशक जिसकी अंतर्ध्वनि वही मूल टेक हो। ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। अपने अध्ययन के सिलसिले में एक रोज मैं वहाँ एक ऐसी स्त्री से साक्षात्कार करने गया जिसने पच्चीस से साठवें साल के बीच का जीवन कैदखाने में गुजारा था। वह कई बैंक लूट और हत्याओं की मुख्य अभियुक्त थी। अपने बातचीत के रास्ते को इत्मीनान और अनौपचारिकता की पटरी पर लाने के लिए मैंने उससे कुछ सवाल किए। उसने भी मेरा पूरा सहयोग किया और कृत्रिम जवाबों से बचा ले गई अपने को। उन हल्के क्षणों में ही मैंने उससे पूछा कि अब इतने दिनों बाद संसार में लौटने पर अगर उसके पास कुछ विकल्प हों किताबों के तो वह किसे पढ़ना चाहेगी - जीवन जीने की कला से संबंधित किताब, आपराधिक घटनाओं पर आधारित थ्रिलर, प्रेम कहानियाँ, लजीज भोजनों की रेसिपी... या कुछ भी नहीं उसने छूटते ही कहा - प्रेम कहानियाँ। वजह मैं पूछता कि उसके पहले ही उसने कहा कि बाकी सारी चीजों के स्वाद वह चख चुकी थी सिवाए इसके। हमारी बातचीत मनचाही पटरी पर आ चुकी थी और मैं पहले से जो सवाल तैयार कर के लाया था उनमें बेधड़क प्रवेश किया जा सकता था। हो भी गए हम दाखिल पर मेरा मन वहीं अटक गया... और मैंने अपने नए शोध का विषय वहीं चुन लिया।''

कुछ देर मौन कायम रहा। फिर बूढ़े ने पूछा - ''क्या आप दोनों कभी मिले नहीं फिर?'

''आपने इस सवाल को पूछने में इतनी देर लगा दी?'

बूढ़े का चेहरा लाल हो गया - ''अगर बताना ठीक न लगे तो माफी चाहूँगा।''

स्त्री का चेहरा दमकने लगा उत्फुल्लता से। उसके तेज को देख कर बूढ़े ने अपनी बात का आखिरी सिरा धीमी आवाज में... लगभग बुदबुदाते हुए पूरा किया।

''मिले थे। पहली बार उस शाम के चार रोज बाद।''। रविवार था ढलते दोपहर का वक्त। मैं चादर में दुबकी ऊँघ रही थी कि कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। बेढब सी थाप। मकान मालिक से लेकर दूधवाला, अखबार वाला या कोई भी लेनदार हो सकता था जो घर पर मेरी मौजूदगी की पक्की संभावना को सूँघ कर आया था। मैंने बाल समेटे, चादर को तहा कर एक तरफ किया, पर्स के पैसे गिने और दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खोलते ही परदे में आए उफान से अहसास हुआ कि मौसम खराब हो चुका था। पर इस अहसास को परे ढकेलते वह दाखिल हुआ। उसने मैरून शर्ट पहन रखी थी। ऊपर से ऑफ व्हाईट जैकेट भीगा हुआ। उसके कमीज का रंग निकल कर जैकेट पर चढ़ गया था... हे प्रभु!''

बूढ़े ने इशारे से और कॉफी की बावत पूछा। स्त्री ने हाँ में सिर डुलाया और कहना जारी रखा।

''मैं उसे घूरती... उससे दोगुनी आँखें फाड़ कर वह मुझे घूर रहा था मुझे नहीं मेरे कमरे को। मैंने अपनी नजरों से देखा तो मुझे कमरा सामान्य लगा बिल्कुल। थोड़ी बेसंभारी थी पर वैसा भी अबूझ नहीं था सब कुछ। वह बिस्तर पर बैठ गया और उसने मुझसे तौलिया माँगा।

मैं हिचकिचा गई। तौलिया था तो, पर वह मेरा था। उस दिन सुबह नहा कर देह पोंछा था उससे। अपना जूठा किया तौलिया मैं उसे कैसे दे सकती थी मुझे एक बेहतर विकल्प सूझा। और मैंने वहीं कुर्सी पर लटका एक सूती दुपट्टा खींच कर उसे दे दिया। वह ज्यादा नहीं भीग पाया था। वह रगड़ रगड़ कर दुपट्टे से पोंछने लगा गीलापन। मेरे इस सवाल के जवाब में कि वह भीग कैसे गया, उसने कहा कि पानी के नीचे खड़े होकर भीगने की प्रक्रिया को बेहतर समझा जा सकता था।

बहरहाल। क्या प्रयोजन था उसके आने का यह मैंने पूछ लिया। उसने कहा कि वह मुझे मूर्तियाँ बनाते देखना चाहता था। वह तो तौलिए से भी ज्यादा गोपनीय चीज थी। उस प्रक्रिया को उसके साथ साझा कैसे कर सकती थी मैं। मैंने इनकार में सिर डुला दिया। हालाँकि मेरी मुद्रा में दृढ़ता की भारी कमी थी। उसने फिर से इसरार किया। लेकिन वह वैसा क्यों चाहता था यह मैंने पूछ लिया। उसने मेरी नकल कर दी और इनकार में सिर डुला दिया। मैंने बदले में उससे इसरार किया। फिर उसने जो वजह बताई वह मेरे लिए अकल्पनीय थी। उसके हिसाब से जिस प्रकार प्रस्तर पर हथौड़ा मार मार कर उस प्रस्तर के भीतर से मैं प्रतिमा के अंगों को बाहर निकाल लाती थी, उसी प्रकार उसके अंतर पर पड़ी किसी थाप ने ही उसके भीतर से कुछ भावनाओं को उकेर दिया था। वह मेरे मूर्ति बनाने की प्रक्रिया को देख कर अपने भीतर के परिवर्तन को महसूस करना चाहता था। मैं निरुत्तर हो गई। क्या करती।''

स्त्री ने दोबारा आई कॉफी का एक बड़ा घूँट भरा।

''आपको क्या लगता है आगे क्या हुआ होगा?'

''आपने सामने वाले की इच्छा पूरी की होगी।'' बूढ़े ने कहा।

स्त्री हँसी जोर से।

''बिल्कुल नहीं। कभी नहीं। उसके उत्तर ने ही मुझे रास्ता दिखा दिया। अंतर में हुए किसी परिवर्तन की प्रक्रिया को देख लेना सृष्टि के बनाए कायदों का उल्लंघन नहीं है क्या! जिसे महसूस किया जाए उसे देखने की क्या जिद उसने मेरी बात सरलता से मान ली। पर अगले पल ही कहा कि मैं उससे दो बातें कहूँ - एक सच और एक झूठ। आप ही बताइए उसने साहस कैसे किया। जिस खेल में मैं एक दफे इतनी रुस्वा हो चुकी थी वही खेल दोबारा खेल सकती थी भला! उसने कहा अगर मैं न चाहूँ तो न सही। वही दो बातें कहेगा और बूझना मुझे पड़ेगा। यह तो ज्यादा बड़ा खतरा था। मैंने लपक कर स्वयं ही दो वाक्य कहने की बात मान ली। उसने ताकीद की कि खेल को गंभीरता से खेलना था। बहरहाल मैंने दो वाक्य तलाश लिए। पहला कि उसके गीलेपन को पोंछने के लिए दुपट्टा देने में मुझे खुशी हुई। दूसरी कि दरवाजे पर जब थाप पड़ी तो मैंने उसके उस पार होने की कल्पना की थी। थोड़ा सोच कर उसने पहले को सच और दूसरे वाक्य को झूठ करार दिया। मैं मारे प्रसन्नता के उछल पड़ी। गलत था वह। दरवाजे पर हुई थाप ने सबसे पहले उसका ही स्मरण कराया था तभी सबसे पहले मैंने बाल समेटे थे। वह सच, खेल में उसे हरा पाने की प्रसन्नता में जाहिर हुआ था खुद मेरे आगे। जोश में भर कर मैंने उसे भी दो बातें कहने की अनुमति दे दी, जिसमें से सच झूठ बीनने की बारी मेरी होती।

उसने दो वाक्य मेरे सामने रखे - मैं यहाँ इसलिए आया था कि मैं आपको मूर्तियाँ बनाते देखना चाहता था। दूसरा वाक्य कि अभी जो मैंने कहा वह झूठ था। मैं समझ गई फौरन। दूसरे वाक्य में सचाई थी। मैंने बताया और उसने मान भी लिया कि मैं सही थी। माना कि उस खेल में वह मेरा दिन था। पर सवाल तो यह उठता था कि वह आया क्यों था आखिर। पूछ लिया मैंने उससे।''

बूढ़ा उसे मंत्रमुग्ध सा देख रहा था।

''क्या आप जानते हैं फिर क्या हुआ?' स्त्री ने पूछा।

''आपके मुँह से सुनना चाहता हूँ।'' बूढ़े की आवाज में गजब का आत्मविश्वास था जो वह जानता था उसके ऊपर संभवतः। स्त्री का चेहरा लाल पड़ गया।

उसने आवाज धीमी कर दी और कहा -

''एक उँगली बस।''

स्त्री ने अपनी तर्जनी निकाल कर मेज पर रख दी।

''बढ़ाई उसने पूरी हथेली थी। पर मुझ तक आकर एक उँगली में सिमट गया सब। उसने बिस्तर पर रखी मेरी दाहिनी मुट्ठी के ऊपर चलाई अपनी उँगली।''

मेज पर ससरती स्त्री की तर्जनी थम गई और उसने नजरें उठा कर बूढ़े की आँखों में देखते हुए कहा - 'और फिर वह उँगली उठी और मेरी गरदन की उभरी हड्डियों पर चलने लगी। मेरी आँखें बंद हो चुकी थीं और मैं इतने मद्धिम ताल में काँप रही थी कि मेरी कँपकँपाहट को उँगलियाँ फिराने वाला ही महसूस कर पा रहा होगा बस। वह बुदबुदाया - 'मैं दावे से कह सकता हूँ कि आपको अपने शरीर का यह हिस्सा ही सबसे ज्यादा पसंद होगा। वरना अपने शरीर के किसी अंग को इतनी शिद्दत से महसूसे बगैर कोई कलाकार अपनी कृति में हूबहू उसे उतार नहीं पा सकता। मैं उसकी हर चाल से मंत्रबिद्ध सी थी और उसकी यह बात समझने में उलझन हुई। मैंने अधमुँदी आँखों से उसे देखा और उसकी नजरों का पीछा करते हुए मैं कोने में रखी उस मूर्ति को देख पाई, जिसकी एक प्रति उसे भेंट में दे चुकी थी मैं पहले। वह समझ गया कि मैं उसकी नजरों के ठीक पीछे हूँ और उसने मेरी आँखों पर छा जाते हुए कहा - ''उस मूर्ति के गले के उभरे ऊबड़खाबड़ रास्ते यही हैं न! मेरे गले पर उसकी उँगलियों की चाल गहरी हो गई और मेरी आँखें वापस मुँद गईं। संभवतः वह उत्तर था मेरा। उसने उस उभरे बोन लाइन के नीचे दाहिनी तरफ की तिल के पास अपने अँगूठे का नाखून धँसा दिया।''

स्त्री ने देखा बूढ़े का चेहरा काँपा। स्त्री ने नजरें झुका लीं। उसके प्याले में कॉफी बची थी पर उसकी खुशबू और ताव उसका साथ छोड़ चुकी थी। स्त्री ने जोर से उस प्याले को पकड़ लिया अपनी दोनों हथेलियों से। उसे गरमी देने की गरज से। उसकी साँसों को लौटाने के प्रयास में। वह कुछ पल प्याले को थामे बुदबुदाती रही कुछ और बूढ़े ने हैरत से देखा कि कुछ समय पहले तक बेजान पड़े प्याले से भाप की एक लकीर उठी ऊपर की तरफ। स्त्री की आँखों में चमक आ गई और उसने धीरे धीरे प्याले पर से अपने हाथ का दवाब कम कर दिया।

प्याला दोबारा से जीवन की धुन में लौट आया था और स्त्री ने उसे होठों से लगा कर बात का सिरा थाम लिया -

''नाखून से खुरच कर उसने उस जगह पर कुछ उकेर दिया। बाद में जब आईने में मैंने उस निशान को निहारा तो वह मुझे उसके हस्ताक्षर सा प्रतीत हुआ। बहरहाल उसने अपने हाथ मुझ पर से खींच लिए वापस और कहा कि अगर कभी वह मेरे सामने जीवन भर साथ चलने का प्रस्ताव दे तो मैं उसे हरगिज न मानूँ। मेरे कारण पूछने के पहले ही उसने कहा कि अगर हम साथ चलते तो संभव था वह दृश्य हमारे बीच भी।''

स्त्री ने बूढ़े को देखा। वापस।

''वही दृश्य जो आपने हमें सुनाया था उस कमरे में। आपके जीवन का वह सीन हमारे मध्य भी संभव था यह उसने स्वयं कहा मुझसे। उसने कहा कि अगर मैं मृत्युशैय्या पर होती तो मुमकिन था कि वह मेरे सिरहाने बैठा मेरे मरने की कामना करता ताकि मेरे न रहने के बाद वह वापस लौट सके अपनी बेईमान दुनिया में। आपके जीवन में घटित उस दृश्य को भविष्य की कल्पनाओं में मेरे साथ हूबहू जीने लगा था वह। मैं कुछ कहती इसके पहले ही वह मेरे बिस्तर से उठ गया और उसने अपने बैठने से पड़ आई सिलवटों को चादर से दूर किया और वह जाने लगा कमरे से।

मैंने उसकी कलाई को अपनी पाँचों उँगलियों से पकड़ लिया। वह रुका। मुड़ा नहीं। मैं उसके कंधे के ठीक पीछे तक बढ़ आई चल कर। एक सूत भर का फसाला रह गया जबकि मैंने उसकी कलाई छोड़ दी। उसने ठान लिया था कि वह मुझे पूरी तरह बेपर्दा करके ही छोड़ेगा। तभी तो वह बुत की तरह खड़ा रहा और पहल की सारी जिम्मेदारी मेरे माथे पर डाल दी गई। झुँझलाहट तो हुई मुझे पर उतनी नहीं कि उसे जाहिर करके वक्त का एक रेशा भी बरबाद किया जाए। मैं हलका आगे की तरफ झुकी और उसके बाद जब मैंने पलकें उठाईं तो वे उसके कान के निचले सिरे से उलझ गईं। यह स्पर्श उसे तत्काल मेरी तरफ मोड़ देने में सफल हो गया।

हम इस तरह खड़े थे कि मेरे चेहरे का आधा हिस्सा और उसके चेहरे का आधा हिस्सा एकसार हो गया। इस तरह कि मेरे कान की ऊपरी फुनगी पर उसकी साँसों का साम्राज्य था और मेरे माथे के बीचोंबीच उसकी कनपटी के बाल गिर रहे थे।''

बूढ़े को ठीक अपनी स्थिति समझाने के प्रयास में स्त्री के चेहरे पर लाली छा गई और वह एक क्षण ठिठक गई।

अगले पल उसने फिर से अपने को अतीत से जोड़ दिया धीमे स्वर में।

''उस स्थिति में हम एक लंबे समय तक कायम रह सकते थे बगैर थके। कम से कम अपने डटे रहने की बात तो मैं दावे से कह सकती थी। इसके पहले कि मैं उसके बारे में भी आगे बढ़ चढ़ कर दावे करने लगती, उसके शरीर में हल्का कंपन हुआ और अपने स्थान में थोड़ा हेरफेर करके उसने मेरी भौंहों के बीच अपने होंठ सटा दिए। क्षण भर की छुअन रही होगी बस। फिर वह छिटक कर अलग खड़ा था और मैं ललाट के उस हिस्से को तलहथी से ढाँप कर उजबक की तरह खड़ी हो गई।

''थोड़ा रुक जाइए।'' मैंने कहा।

वह बैठ गया। हम चुपचाप बैठे रहे। बगैर कुछ बोले। मेरी तलहथी बार बार अपने माथे तक जाकर उसकी शर्मिंदगी को कोंचती रही।

उसने कहा - ''आपको मुझे नहीं रोकना चाहिए था - संभवतः मैंने उसे किस तरह रोका था... वह यह याद दिला कर अपनी लज्जा कम करना चाहता था।

मैंने पूछा - ''क्यों'

उसने कहा - ''तभी मेरा जाना स्वाभाविक सा था। अब मैं जाने की भूमिका कैसे बनाऊँ!''

''ठीक सोचते हैं आप। दृश्य में पात्र के आने की स्थिति कैसी भी हो सकती है। किसी भी प्रकार से प्रवेश तो किया जा सकता है। पर जाना सदैव प्रभावशाली होना चाहिए।''

उसने कहा - ''आप कल मिलने का वायदा कर मेरी मदद कर सकती हैं... प्रभाव उत्पन्न करने में।''

मैंने तुनक कर कहा - ''आप भी तो आगे कभी न मिलने की घोषणा कर अपनी तरफ ध्यान आकर्षित कर सकते हैं।''

वह मुस्कुराया और उसने कहा - ''आप निश्चय ही बुद्धिमती हैं। वह उठ खड़ा हुआ। उसने मेरी तलहथी को मेरे माथे से हटाया और उसे अपने होठों तक ले गया - अब यह हथेली और ललाट अपना दुख सुख बाँट सकेगी समानता से। लेकिन वे अभी ऐसा नहीं कर पाएँगी। वे ऐसा करेंगी पर मेरे जाने के बाद। फिलहाल मसला यह है कि आप इमारत कैसे हो सकती हैं।''

इतना कह कर उसने मुझे कंधे से पकड़ कर उठा दिया। मैं तैयार थी।''

स्त्री की आँखें पथरीली हो गईं। गहरी, सूनी और सख्त। बूढ़े के पार देखते हुए उसने कहा

''मेरा दायाँ कंधा... बायाँ कंधा... कोई एक कंधा, उस जगह उसने दो उँगलियाँ धँसाईं गहरे और मेरा सारा शरीर तरंगित होने लगा। वह जहाँ कहीं भी उँगली रखता भीतर का दर्द टीस मारने लग रहा था। कॉलर बोन से लेकर कंधे तक कई कई जगहें तलाश लीं उसने, जहाँ वह उँगली धँसाता मैं चीख कर उस जगह पर पीड़ा के छिपे होने का ऐलान कर देती। अभी तक यह एक तरह की थेरेपी ज्यादा थी, किसी तरह का अनुराग प्रदर्शन कम। मैं पीड़ा का साक्षात्कार करने में इतनी लीन थी कि उसे बदले में कोई सुख न दे पाने की बात मेरे दिमाग में आई जरूर, पर कदमताल खत्म कर निकल भी गई।

हम पीड़ा की सीढ़ियाँ चढ़ चुके थे साथ साथ। जैसा कि अक्सर होता था मेरे साथ कि सीढ़ियाँ चढ़ने पर मेरी साँसें चढ़ने लगती थीं, वही हुआ। मैं हाँफने लगी बेसाख्ता, जबकि वह संयत था। उसने थोड़ा ठहर कर मुझे साँसें सँभालने का मौका दिया। मैंने काँपते हाथों से उसे चाभी थमाई और उसने आहिस्ता से दरवाजा खोल दिया। वह आवरण हटाता गया और हर बार हटाए जाने के बाद ही मैं जान पा रही थी कि मेरे अंतर के गवाक्ष कहाँ कहाँ छिपे थे। रोशनी, हवा और साँसें मेरे शरीर में प्रवेश कर पा रही थीं। वह फर्श, दीवार और छत पर पूरी तन्मयता से पच्चीकारी कर रहा था और मैं अपने शरीर के इमारत में अनुवाद होने की प्रक्रिया को अधमुँदी आँखों से महसूस कर पा रही थी। वह एक लौ की तरह मेरे भीतर कौंध रहा था एक सिरे से दूसरे सिरे तक। समान गति... समान दमक से। एकबारगी वह जोर से भभका। अपनी पूरी दीप्ति के साथ। मैंने आँखें मूँद लीं। वह चरम का क्षण था - ऐसा मुझे लगा। पर ऐसा था नहीं।

सुख उसके आगे था। वहाँ - जहाँ एक रोशनदान खोज लिया था उसने मेरे भीतर। वहाँ आत्मा थी। उस वक्त वहीं हमारी आत्मा थी। उस बिंदु पर आकर सब कुछ स्थिर पड़ गया। उसके आगे मैंने महसूस करने की क्षमता गँवा दी। और जब मेरी चेतना जागी, मैं इमारत से वापस अपनी योनि में लौट चुकी थी। मैंने उसे जाते हुए देखा... आखिरी झलक। अंतिम फ्रेम। बस।''

स्त्री ने अपनी हथेली को ललाट से हटाया और बूढ़े को देखा। उसका चेहरा जर्द पड़ चुका था। निष्प्राण और पीला। उसे वैसे ही ट्रीटमेंट की आवश्यकता थी जो कुछ घड़ी पहले कॉफी के प्याले के साथ की गई थी। स्त्री ने एक नजर बूढ़े के ठंडे चेहरे को देखा और दूसरी नजर उसने अपनी सुसुप्त तलहथियों पर डाला। क्या वह एक बार फिर जीवनदायिनी की भूमिका के लिए तैयार थी। स्त्री ने अपनी हथेली आगे बढ़ाई। इस बार उसके कंपन को महसूस करने के अलावा उसे प्रत्यक्ष देखा भी जा सकता था। उसके दोनों हाथ बूढ़े के गाल के समानांतर खड़े हो गए और आहिस्तगी से उन्होंने बूढ़े के गालों को छुआ। वहाँ सुप्तावस्था में पड़ी दाढ़ी के तिनके स्त्री की हथेली के पोरों के आगे खड़े हो गए और अगले ही पल स्त्री की हथेली फिसल गई। उसकी हथेली मेज पर गिरती पर उसके पहले ही बैरे ने बिल रख दिया मेज पर। अब स्त्री की दोनों हथेलियाँ बिल पर थीं। दरअसल बिल इस शर्मिंदगी से भर चुका था कि उसका अकस्मात आगमन ही स्त्री के हाथों की फिसलन का कारण बना और उस बिल की जलालत को ढक लेने के लिए फिर से स्त्री की हथेलियाँ मौजूद थीं। बूढ़े ने स्त्री की दोनों हथेलियों को अपने हाथों से अलग हटाया और बिल उठा कर देख चुकने के बाद पैसे रख दिए।

स्त्री अपनी हथेलियों को देखती रही जो कि उस वक्त किसी काम की न रह गई थीं। बैरे के पैसे उठाते ही बूढ़ा उठ कर खड़ा हो गया। स्त्री अपनी हथेलियों को... दरअसल अपने आप को समेट कर चलने लगी बूढे के पीछे। दो मेज को पार कर बूढ़ा रुका और उसने पीछे मुड़ कर स्त्री से पूछा - ''वह बेईमान ज्यादा था कि ईमानदार?'

स्त्री ने कहा - ''वह था भी कि नहीं... कभी कभी मैं यह सवाल भी पूछ लेती हूँ खुद से।''

दो लोग तेजी से बाहर निकल गए।

बाहर निकल कर बूढ़े ने एक कार्ड बढ़ा दिया। स्त्री ने देखा। उस पर किसी होटल का पता था। संभवतः बूढ़ा वहीं ठहरा होगा। स्त्री ने कार्ड पलट दिया। पृष्ठ भाग कोरा था। स्त्री ने अपने पर्स को खँगाला। कलम तो वहाँ कभी होती नहीं थी। एक आईब्रो पेंसिल जरूर मिली। स्त्री ने उसका ढक्क्न खोल कर कार्ड के पिछले हिस्से पर अपने कमरे का पता लिखा और पेंसिल की ढक्कन बंद करते हुए कहा - ''कल मैं मेजबान रहूँगी।''

सीढ़ियाँ सँकरी थी और ऊपर तक पहुँचने में वाकई बूढ़े के घुटने टीसने लगे। दरवाजा अधखुला था और दस्तक देने को जैसे ही उसने मुट्ठी बढ़ाई पल्ले खुल गए पूरी तरह। स्त्री कहीं जाने की तैयारी में थी संभवतः और बूढ़े को देखते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

''क्या मैं गलत वक्त पर हूँ?'

''हाँ शायद थोड़ा पहले।''

बूढ़ा झेंप गया - ''हाँ जल्दबाजी कर बैठा। आप शायद...।''

स्त्री ने अपने कदम वापस खींच लिए - ''आइए।''

कमरे में एक चारपाई थी और दूसरी तरफ दो कुर्सियाँ।

दोनों बैठ गए। बूढ़े ने कमरे का मुआयना करना चाहा पर उसकी नजरें उठीं नहीं संकोच से। एक अपरिचित सी स्त्री के कमरे में होने का अनुभव नहीं था उसे। यह तो थी ही एक वजह पर स्त्री ने एक शाम पहले कैफे में जो बातें बताई थीं, उसकी धुरी भी वही कमरा था। स्त्री के उन गोपन पलों की पृष्ठभूमि। इस बात के स्मरण ने बूढ़े के संकोच को गाढ़ा किया।

''घर खोजने में मुश्किल तो नहीं हुई?'

''नहीं।''

बात का सिरा तेजी से फिसल गया और बूढ़ा वापस संकोच की ओर बढ़ गया। थोड़ी प्रतीक्षा के बाद उसने कहा - ''मैं कल निकल जाऊँगा।''

''जानती हूँ। कमरा कैसा लगा?'

''अच्छा है।''

''झूठ।'' स्त्री हँसी।

''अस्तव्यस्त है। पहले इसमें एक और चारपाई हुआ करती थी। बाद में उसे हटवा दिया तो कुछ जगह बनी।''

''आपकी मूर्तियाँ कहाँ हैं'

''मैं अब कम... बहुत कम काम करती हूँ। सिर्फ जब उन बच्चों के बीच होती हूँ तभी औजार थामती हूँ।''

''फिर भी कहूँगा कि यह कमरा अच्छा है। जहाँ से स्मृतियाँ जुड़ जाएँ वह सदैव अच्छा ही होता है। जैसे मेरे घर का वह कमरा। उसे मैं संग्रहालय में तब्दील करने की अनुमति नहीं दे सका। पत्नी की यादें तो थीं ही, आप दोनों के साथ बिताई वह आखिरी शाम बहुत कीमती थी मेरे लिए।''

कुछ रुक कर उसने कहा - ''माफ कीजिएगा। आखिरी शाम से मेरा मतलब था मेरे हिस्से की अंतिम शाम।''

''हम तीनों के लिए आखिरी शाम।'' लड़की ने आँखें उठाईं। तरल और बड़ी। गंभीर और एकाग्र। बंधनमुक्त और संसार से परे।

''वह हम तीनों की आखिरी शाम थी। उसके बाद हम दोनों ने भी एक दूसरे को कभी नहीं देखा। इस कमरे में नहीं आया था वह। मैंने जो कहा था कल शाम... वह सब... वह सब... कभी नहीं हो पाया।'' उसने सिर झुका लिया।

बूढ़ा उसे देखता रहा चुपचाप।

''आप कहीं जा रही थीं अभी?'

''हाँ मैं ताला बंद कर लौट जाना चाह रही थी ताकि आप लौट जाएँ और मिलना न हो पाए। मैं आपसे मिलने से बचना चाह रही थी।''

''आप उससे प्रेम करती थीं... हैं! निश्चय ही। फिर... फिर क्यों नहीं मिल पाईं कभी?'

स्त्री की पुतलियाँ स्थिर हो गईं। उसने कहा - '' मेरी जिंदगी में उसके बाद भी कई पुरुष आए।''

''पर इससे मेरा सवाल उत्तरित नहीं हुआ।''

''मैं जीना चाहती हूँ आगे भी।''

''मेरा सवाल दूसरा था।'' बूढ़े ने हाथ हटा लिए वापस।

''नहीं आपका सवाल पहला था। पहला सवाल। जिसके उत्तर के आधार पर मुझे अपनी जिंदगी का मानचित्र खींचना था। मैं बहुत तड़पी। बहुत भटकी। बहुत लहूलुहान किया मैंने अपने अंतर को। बेमकसद प्रस्तर पर चोट करती रही अहर्निश। और अपने सवालों का जवाब मुझे वहीं से मिला। मूर्ति तो प्रस्तर के भीतर छिपी थी। और मैं छेनी से ठोंक ठोंक कर बस उसे उभार लाती थी प्रस्तर के गर्भ से। उसी तरह प्रेम तो मेरे भीतर सदैव था। उसने उसके ऊपर उँगली रख मुझे एकात्म कर दिया था उस भावना से। मैं पत्थरों को गढ़ती थी उसने मुझे गढ़ा। पर जैसा कि जरूरी नहीं कि हर कलाकृति अपने कलाकार को सम्मान दे ही, मैंने भी उसे नकार दिया।''

''क्यों आपको लगा कि जो आदमी सीमेंट बालू में मिलावट कर सकता है उसकी भावनाएँ अछूती कैसे होंगी घालमेल से?'

''नहीं। उस पर अविश्वास नहीं था मुझे। मेरी जिद थी कि मैं उसमें से सारी बुराई को निकाल कर ही उसके भीतर प्रवेश पाऊँ।''

''ये वाजिब भी है।''

''पर व्यावहारिक नहीं। अपनी मर्जी से स्वयं को बदलने और एक शर्त की तरह बदलने में काफी फर्क होता है।''

''अगर मान लीजिए वह नहीं बदलने का फैसला करता तब आप क्या करतीं?'

''यकीनन मैं अपना रास्ता चुनती। जिंदगी जीने का रास्ता। और उस रास्ते का मेरे प्रेम से कोई लेना देना नहीं होता। कभी कभी एक दूसरे से पूरी तरह सहमत होकर ही हम जिंदगी जीते हैं, पर प्रेम कहीं नहीं होता। कभी असहमति की आठ दस मुलाकातों में ही प्यार का उत्स छिपा दिख जाता है। जो जहाँ मिल गया मैंने उसे लपक कर जी लिया। और जीती जाऊँगी भी पर आवश्यक नहीं कि मेरा रास्ता वही हो जो उन आठ दस मुलाकातों के मेरे साथी की राह हो। आपको मालूम नहीं पर हमा