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आलोचना

मोहनदास : मौजूदा समय का हलफनामा
अनुराधा गुप्ता


अगर आप सोचते हैं कि आप एक आजाद और विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के बाशिंदे हैं तो जरा ठहरिए... और कहीं ये भी सोचते हों कि आप ऐसे सभ्य और चैतन्य समय में जी रहे हैं जहाँ व्यक्ति अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए कड़ाई से मुस्तैद है, उसके अधिकारों को सुरक्षित रखने का जहाँ संवैधानिक भरोसा दिया गया है, तो भी ठहरिए। क्या आप मोहनदास से मिले हैं? अगर आप मिलेंगे तो जानेंगे कि ये धारणाएँ कितनी छद्म और बेमानी हैं, कैसे न्याय और अधिकार पूँजी बनाम सत्ताधारी ताकतों की बपौती हैं, दरअसल ये वो क्रूर समय है जब ' दि होल सिस्टम हैज टोटली कोलैप्सड...! ...मुझे लगता है हम पूँजी और सत्ता... कैपिटल एंड पॉवर के एक बिल्कुल नए रूप के सामने हैं। मोहनदास इज बीइंग डिनाइड ऑफ अ सिंपल एसेंशियल लीगल जस्टिस, क्योंकि वह न्याय को खरीद नहीं सकता! (' मोहन दास', उदयप्रकाश, पृ.76)


2005 में हंस पत्रिका में प्रकाशित उदय प्रकाश की लंबी कहानी 'मोहनदास' हर बार की तरह हिंदी साहित्य में एक परिघटना की तरह थी जिसने अपने पाठकों को स्तब्ध कर दिया। इस कहानी में हमेशा की तरह वे नए शिल्प और नए अंदाज में प्रस्तुत हुए, जहाँ स्वयं उनके द्वारा बनाए गए सभी पुराने ढाँचे ध्वस्त हो गए और आलोचकों के सभी पुराने समीक्षात्मक टूल्स फेल। फिर से 'नेति-नेति' कहते हुए आलोचकों ने नए औजार अन्वेषित किए और जो नहीं कर पाए वे रचना और रचनाकार पर अपनी खीझ निकालने लगे। चर्चित आलोचक शंभु गुप्त लिखते हैं - 'उदय प्रकाश की कहानियों पर बहुत सारी अनर्गल समीक्षाएँ अभी तक लिखी गई हैं, लिखी जा रही हैं। आगे नहीं लिखी जाएँगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। ऐसा दरअसल इसी कारण है कि उदय प्रकाश हमारे अब तक के खाँचे या साँचे में फिट नहीं बैठते। हम जिस खाँचे में भी उन्हें फिट करते हैं, उनका कोई न कोई हाथ या पाँव बाहर निकला ही रह जाता है। कभी-कभी तो उनका सिर ही बाहर झाँकता दिखाई देता है और हमें लगने लगता है कि वे बड़ी शरारती और चुनौतीपूर्ण निगाहें चलाते और भौंहें मटकाते हम पर हँसे जा रहे हैं। हम हतप्रभ रह जाते हैं। क्या यह एक लेखक की अराजकता या 'अनुशासन'-हीनता है?" (शंभु गुप्त, आलोचना : जनवरी-मार्च 2004) जब सोचती हूँ कि आखिर ऐसा क्या है जो उदय प्रकाश को खास बनाता है तब एहसास होता है कि वो है उनकी वैश्विक व्यापकता लिए गर्भ और मर्म भेदी सूक्ष्म दॄष्टि। जो अतल गहराइयों और अनंत शून्य में व्याप्त उन चीजों की सत्ता को भी देख पाती है जो हैं तो सही किंतु अदॄश्य। नोबेल पुरस्कार प्राप्त कवि मिलोश कहते हैं कि 'कवि के पास डबल विजन होना चाहिए। एक उसे चीजों को ऊपर से देखना चाहिए, दूर से निरपेक्ष भाव से, विस्तार से देखना चाहिए। दूसरा उसे निकट से देखना चाहिए। बातों की गहराई में बारीकी से देखना समझना चाहिए।' उदय प्रकाश के पास ये दोनों विजन हैं। वे चीजों को जितनी बारीकी से देखते हैं, उतने ही विस्तार से भी। समूची सभ्य व्यवस्था को कटघरे में खड़ी करती यह कहानी उदय प्रकाश के लोकल और ग्लोबल विजन का बेहतरीन नमूना है।

इस कहानी को पढ़ते हुए पाठक, दलित मोहनदास की दुर्गति के कारण, इसे प्रेमचंद की कहानी सद्गति की परंपरा की अगली कड़ी के रूप में न देखने लगे इसका ध्यान लेखक ने बराबर रखा है इसीलिए बीच-बीच में वे अच्छी तरह एहसास दिलाते चलते हैं कि यह कहानी किसी बीते दौर का किस्सा नहीं, बल्कि आज के उस समय की है जब, "9-11 सितंबर हो चुका है और न्यूयार्क की दो गगनचुंबी इमारतों के गिरने की प्रतिक्रिया में एशिया के दो सार्वभौमिक, संप्रभुता-संपन्न राष्ट्रों को धूल और मलबे में बदला जा चुका है... तेल, गैस, पानी, बाजार, मुनाफे और लूट के लिए हर रोज कंपनियाँ, सरकारें और फौजें समूची पृथ्वी में दिन-रात निर्दोषों की हत्याएँ कर रही हैं... ऐसा समय, जिसमें जिसके पास जितनी मात्रा में सत्ता थी, वह विलोमानुपात के नियम से, उतना ही अधिक निरंकुश, हिंस्र, बर्बर, अनैतिक और शैतान हो चुका था... और यह बात राष्ट्रों, राजनीतिक दलों, जातियों, धार्मिक समुदायों और व्यक्तियों तक एक जैसी लागू होती थी।" (वही, पृ. 29,37)

कहानी का कथ्य मोहनदास के रूप में एक ऐसे दलित आदमी को लेकर रचा गया है, जो योग्य है, शिक्षित है, मेहनती है, और प्रतिभासंपन्न है बावजूद इसके बेरोजगार है क्योंकि उसके पास जुगाड़ नहीं, रिश्वत नहीं तथा तिकड़मबाजी जानता नहीं। नहीं जानता था कि ईमानदारी और खालिस योग्यता का अब कोई मूल्य नहीं इसीलिए चुक गया और चूक भी गया। घाघ जैसी नजर लगाए निकम्मा अयोग्य तिकड़मी सवर्ण विश्वनाथ, जिसके पास पूँजी, सत्ता, ताकत और वो सब है जो आज की दुनिया में सफलता पाने के लिए चाहिए, मोहनदास बन कर उसकी डिग्री और पहचान पर नौकरी करने लग जाता है। ओरियंटल कोल माइंस का बाबू इस षड्यंत्र में विश्वनाथ का सहभागी है। क्या इससे बड़ी कोई यातना और धोखा हो सकता है, क्या इससे अधिक क्रूर और शातिर समय हो सकता है, जब पूँजीपति और सत्ता में बैठे शक्तिशाली लुटेरे आपकी पहचान छीन कर वो होने या बनने पर न सिर्फ मजबूर कर दें जो असल में आप नहीं हैं बल्कि ये साबित भी कर दें। नौकरी के इंटरव्यु में पहले नंबर पर सेलेक्ट होने पर भी मोहनदास को नौकरी नहीं मिलती उल्टे उसकी डिग्री और पहचान भी धोखे से जब्त कर ली जाती है। निरीह मोहनदास बुरी तरह ठगा जाता है, हक माँगने पर बेरहमी से धुन दिया जाता है। वो समझ नहीं पाता कि कैसे कोई इस हद तक बेइमान और नीच हो सकता है? उसको इतनी तकलीफ देने वाले ये सवर्ण उससे क्यों इतनी घृणा करते हैं और घृणा ही नहीं उसके लिए उनकी आँखों में इतनी हिंसा अजनबियत और गुस्सा क्यों? ये वही दौर है जब आरक्षण को लेकर सवर्णों में अवर्णों के लिए गहरी हिंसा, अजनबियत और दुर्भाव था। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी 'घुसपैठिये' इसी की एक बानगी है। मोहनदास एक साथ कई मोर्चों पर लड़ता है। सामंतवाद के शिकंजे से अभी वह पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाता कि पूँजीवाद के खूनी पंजे दबोच लेते हैं। शोषक व्यवस्था उसका अंत तक एक-एक बूँद रक्त चूस लेना चाहती है। अपने हक, अपनी पहचान और अपने नाम को पाने में तिल-तिल कर उसका क्षरण होता जाता है। घर के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। अंधी माँ पुतली बाई, टी.बी. का मरीज बूढ़ा बाप काबादास, सुंदर जहीन कर्मठ पत्नी पुतलीबाई और दो छोटे बच्चे, बेटा देवदास और बेटी शारदा। इन सबके लिए एक ही उम्मीद की किरण मोहनदास। ऐसा नहीं कि मोहनदास ने कोशिश नहीं की। कोल माइंस में अपना हक पाने की लड़ाई से लगाकर जीवन जीने की लड़ाई तक वह जूझता है। लेकिन उसका प्रतिकार और प्रतिरोध नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह घुट कर रह जाता है। और अंततः ''अँग्रेजों' द्वारा गुलाम भारत पर शासन के लिए तैयार किए गए नौकरशाही के इस जंग खाए लौह ढाँचे ने, आजादी के साठ साल बाद, आधिकारिक सरकारी दस्तावेज पर, विश्वनाथ वल्द नगेंद्रनाथ को मोहनदास वल्द काबादास बना दिया।' (वही, पृ.70)

इस कहानी का कई जगह विरोध यह कह कर हुआ कि मोहनदास के रूप में दलित के चरित्र का हनन हुआ है, उसे इतना निरीह क्यों दिखाया? क्यों वह सवर्णों का मुकाबला ईंट से ईंट बजा देने के अंदाज में नहीं करता? और चूँकि यह कहानी समाज के सामने कोई आदर्श नहीं रख पाती इसलिए चूक गई है। तो, क्या वाकई में उदय प्रकाश जैसा समर्थ लेखक यहाँ चूक गया है। इस कहानी के सच अथवा सच की कहानी का स्पष्टीकरण उदय प्रकाश भी देते चलते हैं कि यह कहानी वास्तव में 'कोई प्रतीक कथा, रूपक या कूटाख्यान नहीं है। यह तो एक बिल्कुल सपाट सा किस्सा है। बल्कि सच तो यह है कि यह किस्सा भी नहीं है। क्योंकि मैं हमेशा की ही तरह, कहानी की आड़ में, आपको फिर से अपने समय और समाज की एक असल जिंदगी का ब्यौरा देने बैठा हूँ। मोहनदास वास्तव में एक जीता जागता असली आदमी है और उसकी जिंदगी इस समय दरअसल संकट में है।' (वही, पृ.12) एक ईमानदार जज, संवेदनशील मित्र रूप में वकील और अन्य तमाम जद्दोजहद के बावजूद मोहनदास का जबर और शातिर व्यवस्था के आगे हार जाना दरअसल में मौजूदा व्यवस्था की कुरूपता का अधिक नग्न रूप में प्रस्तुतीकरण है, जो निःसंदेह किसी भी रचना के हिंसक प्रतिरोध की अपेक्षा अधिक धमक रखता है।

मोहनदास जो कहानी का डरा हुआ, हारा हुआ नायक है वह दरअसल में यथार्थ के नीचे छिपे यथार्थ का स्मॄति और कल्पना के माध्यम से आज के विद्रूप समय का महाआख्यान रचता है। तो, फिर वहीं उदय प्रकाश की कहानी 'टेपचू' को कैसे देखा जाए? टेपचू, जिसमें भयंकर आग है, जो पूरे शोषक तंत्र को जला कर भष्म कर देना चाहता है, जो जिन्न की तरह है, जो लाख सामंती और पूँजीवादी ताकतों के जोर के बावजूद बार-बार मर कर जिंदा हो जाता है। 'एक दिन टेपचू एक भरपूर आदमी बन गया। जवान... पसीने, मेहनत, भूख, अपमान, दुर्घटनाओं और मुसीबतों की विकट धारा को चीर कर वह निकल आया था। कभी उसके चेहरे पर पस्त होने, टूटने या हार जाने का गम नहीं उभरा। उसकी भौंहों को देखकर एक चीज हमेशा अपनी मौजूदगी का एहसास कराती - गुस्सा या शायद घृणा की थरथराती रोशन पर्त।' सन 78 के दौर के वर्ग-संघर्ष और वर्ग-चेतना की यह आशावाद की कहानी है किंतु किसी नकारात्मक अर्थ में नहीं। वास्तव में टेपचू तत्कालीन संघर्षमयी जन-चेतना का प्रतीक है, जो कभी मर नहीं सकती। वस्तुतः टेपचू फैंटेसी है। जिसके माध्यम से उदय प्रकाश ने निरंकुश, अराजक और क्रूर व्यवस्था का विरोध किया। टेपचू के रूप में वे एक ऐसे मुस्लिम दलित युवक की फैंटेसी सामने लाए जिसने पुलिस, प्रशासन, सामंत और पूँजीपतियों की नाक में दम कर दिया। तो, एक प्रकार के प्रतिरोध की कहानी यह भी। वस्तुतः 'मोहनदास' और 'टेपचू' दोनों का लक्ष्य भी एक है और भाव भूमि भी किंतु फॉर्म अलग है। एक 'फैंटेसी' और दूसरी 'यथार्थ'। फिर एक का स्वीकार और दूसरे का नकार कैसे।

उदय प्रकाश की समर्थता का दूसरा क्षेत्र है उनका शिल्प। जिसमें हर बार वे नए अंदाज में हाजिर होकर साहित्य समाज को विस्मित कर देते हैं। 'मोहनदास' लंबी कहानी है। शैली और शिल्प की दृष्टि से अन्य विशेषताओं के अतिरिक्त इसमें दो अभिनव प्रयोग किए गए हैं, जिन्होंने कहानी को और अधिक प्रासंगिक, सशक्त, प्रभावशाली और संप्रेषणीय बनाया। पहला प्रयोग पूरी कहानी में लेखक का तत्कालीन वैश्विक और स्वदेशी घटनाओं का जिक्र इस अंदाज में करते चलना ताकि पाठकों को इल्म रहे कि भूमंडलीकरण विकास और आर्थिक उदारीकरण की ठीक नाक के नीचे सत्ता, पूँजी और धर्म मिल कर किस तरह उन्माद फैला रहे हैं, जहाँ स्वार्थी और शक्तिशाली तबका (चाहे वह सत्ता व्यक्ति की हो या राज्य की या धर्म की) बेहिसाब तरीके से अपना कद बढ़ाते जा रहे हैं और जहाँ दरअसल सबसे बड़ा सच है 'पॉवर' जो क्लास, कास्ट और जेंडर को परिभाषित कर रहा है। दूसरा नामों का प्रतीकात्मक प्रयोग। जिनके व्यंजनार्थ पाठक अपने-अपने तईं लेते चलते हैं, और जिसके लिए लेखक उन्हें खुली छूट देता है कि वो अपनी कल्पना का अनंत विस्तार करते चलें। कहानी जितनी अभिधा में अर्थ रखती है, उससे कहीं अधिक दूर तलक व्यंजना में ध्वनित होती है। यह अनायास संयोग नहीं कि कहानी का शोषित, दीन-हीन, ठगे और छले पात्र का नाम मोहनदास है, जिसमें अंत तक बापू की छवि का प्रत्यारोपण स्पष्ट संकेतित है, पत्नी का नाम कस्तूरी, माँ का नाम पुतली बाई, पिता का नाम काबा दास, मोहनदास को न्याय दिलाने के लिए कटिबद्ध ईमानदार न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी) गजानन माधव मुक्तिबोध 'जो सिगरेट नहीं बीड़ी पीते थे और बहुत दुबले थे, जिनके गाल की हड्डियाँ नुकीली थीं और उभरी हुई थीं और माथे पर असंख्य आड़ी-तिरछी रेखाएँ थीं' (पृ.66), पब्लिक प्रोसीक्यूटर हरिशंकर परसाई, एस.एस.पी. शमशेर बहादुर सिंह, अपील करने वाला हर्षवर्धन और मोहनदास का हक छीनने वाले सवर्ण विश्वनाथ और नगेंद्रनाथ। मोहनदास का गाँव पुरबनरा जो पोरबंदर को ध्वनित करता है, जिसका संकेत स्वयं लेखक ही कर देता है।

वस्तुतः 2005 में प्रकाशित और 2012 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार द्वारा सम्मानित यह कृति आज के हमारे और आपके क्रूर समय का सच है, '...यह वही समय है, जिसमें मोहनदास है, आप हैं, मैं (लेखक) हूँ, और विसनाथ है। और आज का यथार्थ है।' (पृ.87) यह वह समय है जब मोहनदास के लिए न्यायिक लड़ाई लड़ने वाले ईमानदार जी.एम. मुक्तिबोध का तबादला कर दिया जाता है और अचानक ब्रेन हेमरेज (जो निश्चय ही व्यवस्था में चल रही भयंकर धाँधली और कुछ न कर पाने के तनाव का नतीजा था) होने से वे अस्पताल में दम तोड़ देते हैं, विश्वनाथ की उसके पिता के रसूख के कारण जमानत हो जाती है किंतु पुलिस से साँठ-गाँठ कर के चालाकी से उसने पुलिस रिकॉर्ड में नाम मोहनदास ही दर्ज रखा। कहानी का अंत पुलिस की बर्बर प्रताड़नाओं से जर्जर और खोखले हो चुके मोहनदास की इन गुहारों से होता है कि वह किसी भी अदालत में हलफनामा देने को तैयार है कि वह मोहनदास नहीं। और हम सब इस अंत के साथ मोहनदास को अपने अंदर महसूस करते हुए ठगे से रह जाते हैं।


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