डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

विमर्श

हिंदी में स्त्री आत्मकथाएँ और उनका प्रतिरोधी स्वरूप
अवंतिका शुक्ल


बीसवीं शताब्दी का अंतिम और इक्कीसवीं शताब्दी का प्रथम दशक हिंदी भाषा में आत्मकथा-लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाएगा। इस दौर में जहाँ स्त्री-विमर्श से प्रभावित होकर (स्त्रीवाद या स्त्री-आंदोलन से कम) अधिकांश कहानियाँ, कविताएँ, उपन्यास लिखे जा रहे थे, वहाँ आत्मकथा-लेखन में भी काफी तीव्रता आई। हालाँकि इसमें से कई विवादित भी रहीं, जिसमें महिला-लेखन और उसका स्वरूप बड़ी बहस का मुद्दा रहा। महिला-लेखन को लेकर पहले भी काफी बहसें चलतीं रहीं हैं, पर उसमें पिछले दौर की लेखिकाओं द्वारा लिखी आत्मकथाओं का अभाव था वे सिर्फ कुछ संस्मरणों तक ही सीमित रही। अब इस बात पर ध्यान देना काफी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हिंदी में महिला-लेखन की एक समृद्ध परंपरा होने के बावजूद आत्मकथा-लेखन की शुरुआत इतनी देर से क्यों हुई? जबकि अन्य कई भाषाओं में उन्नीसवीं सदी में ही महत्वपूर्ण आत्मकथाएँ मिलतीं हैं, जिन्होंने स्त्री-जीवन और उसकी जटिलताओं को समझने के लिए नए औजार दिए। हिंदी को अपनी जातीय, वर्गीय, भाषाई पितृसत्तात्मक स्थिति में स्त्री-लेखन के इस अभाव को समझने की आवश्यकता है।

जब अठारहवीं सदी में आत्मकथा का जन्म हुआ तो ये माना ही जाता था कि आत्मकथा किसी विराट व्यक्तित्व की ही हो सकती है। इसके लेखन का प्रमुख उद्देश्य महान लोगों के जीवन,उनकी उपलब्धियों और उन्हें प्राप्त करने के रास्तों, उनके संघर्षों, उनके द्वंद्वों और उनकी जीत का वर्णन करना था,ताकि उसे पढ कर लोग महान व्यक्तित्वों का अनुकरण करके अपने जीवन की श्रेष्ठतम स्थिति की ओर अग्रसर हो सकें। शायद ही कभी इस बात की कल्पना की गई हो कि किसी साधारण व्यक्ति और उसके जीवन को भी आत्मकथा का केंद्र बनाया जा सकता है। और यदि हम स्त्रियों की बात करें तो ये और भी आश्चर्यजनक हो जाता है क्योंकि उन्हें तो मनुष्य का दर्जा न देकर सिर्फ पुरुष को पित्र ऋण मुक्त करने का माध्यम ही माना गया। इसलिए हमें स्त्री आत्मकथाएँ एक खास समय के बाद ही और कम संख्या में मिलती हैं। मैनेजर पांडे स्त्रियों की आत्मकथाओं के इस अभाव पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि "स्त्रियों की आत्मकथाएँ तो इसलिए नहीं है कि उन्हें हमारे सामाजिक ढाँचे में सच बोलने की स्वतंत्रता नहीं है" 1। वास्तव में यहाँ बहुत मार्मिक टिप्पणी है। अगर देखा जाए तो सच बोलने की स्वतंत्रता तो दूर की बात है, ये कभी माना भी नहीं जाता था कि स्त्रियों की भी कोई आवाज हो सकती है, जिसे समाज के द्वारा सुना जाए।

अब यदि ये आवाज आत्मकथा के माध्यम से आ रही हो तो और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि स्त्री की आवाज, उसके विचार उसके जीवन के निजी अनुभव के साथ आए। आत्मकथा उनकी खुद की आवाज थी। उनके अपने जीवन के अनुभव, संघर्ष, सुख दुख और जमाने भर का उनका अपना विश्लेषण, उनकी अपनी नजर से। इस घटना को अनदेखा नहीं किया जा सकता। साहित्य के कुछ सुधी लोगों ने इन घटनाओं पर गौर करते हुए साधारण जीवन की आत्मकथा को भी वही स्थान दिया जो कि किसी विराट या प्रतिष्टित व्यक्तित्व की आत्मकथा को दिया जा सकता है। इससे ही जुड़ी एक घटना का जिक्र करना चाहूँगी। 1932 में प्रेमचंद के संपादन में हंस का आत्मकथा अंक निकला, जिसमें उन्होंने नंद दुलारे वाजपेयी से उसमें लिखने के लिए कहा। वाजपेयी जी ने इस संदर्भ में लिखा कि आत्मकथा लिखने के योग्य लोग हिंदी में कितने हैं? कितने ऐसे महच्चरित है, जिनकी जीवनी हिंदी-जनता की पथ नियामिका बनाई सकती है। इस पर प्रेमचंद ने पत्र लिख कर जवाब दिया कि मेरा खयाल है कि मेरे घर के मेहतर के जीवन में भी कुछ ऐसे रहस्य हैं, जिनसे हमें प्रकाश मिल सकता है 2। और हमें वास्तव में प्रकाश नहीं प्रकाश का खजाना मिला। समाज के वंचित तबके जिसमें प्रमुख रूप से स्त्रियाँ, दलित और आदिवासी हैं, उन्हें, उनके जीवन, उनके दायरों, रीतिरिवाजों के साथ साथ समाज द्वारा किए गए अपमान, शोषण, उपेक्षा को उन्होंने किस तरह देखा, सहा और उनका विरोध करने की ताकत जमा करी, इसकी विस्तृत और वास्तविक जानकारी इन आत्मकथाओं से ही हमें प्राप्त हुई।

आत्मकथा लिखना और वह भी किसी स्त्री के लिए कोई आसान काम नहीं था। आत्मकथा आप तभी लिख सकते हैं जब आपको अपने होने का अपने स्व का मूल्य पता हो। स्त्री के लिए अपने आत्म को पहचानना आसान काम नहीं था। स्त्री हमेशा श्रीमती एक्स, वाई, जेड, भाभी, बहू जैसे नामों में ही उलझी रही। हमारी कितनी ही दादी, नानी का कोई नाम ही नहीं था। वे किसी की बहू, किसी की माँ नाम से ही स्वयं को पहचानती रहीं। उनकी अपनी पहचान पाने में महिला आंदोलन की एक बड़ी भूमिका रही है।जिसने सीमोन के शब्दों में उन्हें ये बताया कि औरत पैदा नहीं होती बना दी जाती है। इस अंतर को समझने के बाद कि उनकी स्थिति के लिए उनका स्त्री के रूप में जन्म जिम्मेदार नहीं है, बल्कि समाज की ढाँचागत असमानताएँ जिम्मेदार हैं, उनकी चेतना बहुत विकसित हुई और लेखन के माध्यम से स्त्रियों द्वारा इस ढाँचागत स्थिति को सामने लाने की कोशिश की गई। ये कोशिश बुद्धकाल की थेरियों, मीरा, आंडाल, ललद्यद, महादेवी से लेकर आज की लेखिकाएँ भी कर रहीं हैं। स्त्रियों की इसी लेखन परंपरा से हम जान पाए कि हमारी पूर्वजाओं के क्या योगदान हमारे लिए रहे हैं। हम कह सकते हैं कि बुद्ध काल की थेरियों, मीरा, आंडाल आदि का लेखन भले ही प्रचलित विधा में आत्मकथा न कहा जाए पर उसके भीतर वास्तव में तत्व आत्मकथा का ही है। उनका भोगा हुआ यथार्थ ही उनके लेखन का आधार बना।

स्त्री-आत्मकथा स्त्री के दृष्टिकोण, स्वर, निर्णय और उसके यथार्थ के वास्तविक अध्ययन में सबसे ज्यादा मददगार साबित होती है जो सिर्फ उसका नहीं बल्कि व्यापक समाज का हिस्सा बन जाता है। बकौल प्रणय कृष्ण "अच्छी आत्मकथा आपकी 'निजता' से वाद-संवाद करती है, आपको 'आप' से मिलाती है, आपके 'आत्मनिर्वासन' को भंग करती है, आपकी अपनी कहानी में घुलमिल जाती है।"3 स्त्री-आत्मकथा को इस दृष्टि से भी देखने का प्रयास आवश्यक है कि यह अपने भीतर किन वृहद मुद्दों को समेटे हुए है और ये मुद्दे बाकी समाज से किस प्रकार जुड़े हैं।

जिस रूप में हम आज आत्मकथा को समझते हैं, लेखन की ये नई विधा कहानी या कविता लेखन से बिल्कुल अलग है क्योंकि इसमें आपको किसी और को नहीं बल्कि खुद को केंद्र में रखकर बात करनी है। साथ ही इसके सौंदर्य बोध जो की जीवन की वास्तविक घटनाओं की सत्यता पर आधारित होता है, उसकी सुरक्षा भी करनी होती है। प्रभा खेतान के शब्दों में अगर कहें तो आत्मकथा लिखना एक स्ट्रीप्टीस का डांस है। आप चौराहे पर एक-एक कर कपडे उतारते चले जाते है। लिखने वाले की नजर में ये चाहत भी छुपी रहती है कि सामने वाला उसे गलत नही समझेगा, जो भी वह कह रहा है, उसे सही परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करेगा। ये माँग बहुत जायज भी है क्योंकि "आत्मकथा एक चीख भी है जो बताती है कि अपने किए और भोगे हुए के लिए सिर्फ हम जिम्मेदार नहीं होते। हमारे पीछे खडा सारा समाज इस जिंदगी का साक्षी और सहभोक्ता ही नहीं, इसकी हालत के लिए उत्तरदायी व्यूह रचना का निर्माता भी वह है।"4

इस व्यूह रचना को लेखिकाओं ने काफी गंभीरता से समझा। इसी लिए वे आत्मकथा लिखने का साहस भी जुटा पाईं। एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था जहाँ लगातार प्रेम करने की सँभावनाएँ कम होती जा रही हैं। प्रेम या अपनी पसंद का इजहार करना भारत में स्त्री ही नहीं पुरुषों की मौत का सबब बन जाता है, वहाँ अपने जीवन की तहों में छिपी घटनाओं को पुनः सामने लाना, एक बहुत ही साहसी और परिपक्व व्यक्तित्व के द्वारा ही संभव है, जो हमें आत्मकथा लेखिकाओं में मिलता है।

उन्नीसवीं शताब्दी से ही भारत की भिन्न-भिन्न भाषाओं में महिलाओं ने आत्मकथाएँ लिखीं। इन आत्मकथाओं के लेखन में नवजागरण और स्त्री शिक्षा के विकास का एक बड़ा प्रभाव पड़ा, जिसने महिलाओं पर बहस को केंद्र में लाया। इन्हीं बहसों ने महिलाओं के जीवन में छिपे अपने गहन अनुभवों को सबसे बाँटने का हौसला दिया। हिंदी क्षेत्र में हमें ये हौसला थोडा देर से मिलता है। पर संस्मरणों के माध्यम से हमें इसकी सुगबुगाहट मिल जाती है। शिवरानी देवी अपने पति के साथ बिताए समय के वर्णन के माध्यम से प्रेमचंद्र का एक अलग ही रूप सामने ले आईं। देखा जाए तो चाहें मीरा हों या महादेवी वर्मा उनका साहित्य भी उनकी एक आत्मकथा ही है पर उस रूप में नहीं जिसमें हम आज आत्मकथा को समझते हैं, वे अधिकांश महिला आत्मकथाएँ पिछली शताब्दी के आखिरी दशक के आखिरी दौर में लिखी गईं। ये दौर कई मामलों में बहुत खास रहा। क्योंकि इस दौर का आधार लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और स्त्री अधिकारों के सशक्त आंदोलनों का रहा, तो पूँजीवादी ताकतों के उभार और उनके तेजी से फलने फूलने, जातिवाद के प्रति बढ़ती कट्टरता और सांप्रदायिक शक्तियों के मजबूत होने का दौर भी था। स्त्री आंदोलन के लंबे संघर्ष को भुलाकर इस पूरे आंदोलन को पूँजीवादी शक्तियों द्वारा प्रचारित महिला मुक्ति को, महिलाओं द्वारा उपभोग की वस्तु चयन के अधिकार में सीमित कर दिया गया। महिला आत्मकथा लेखिकाओं ने समाज के इस बदलाव को काफी गंभीरता से लिया और इस परिवर्तन का उनके ऊपर, उनके समाज के ऊपर पड़ने वाले प्रभाव को अपनी लेखनी का विषय बनाया।

इस दौर में जो प्रमुख आत्मकथाएँ रहीं, उनमें चंद्रकिरन सौनरेक्सा की पिंजड़े की मैना, प्रभा खेतान की अन्या से अनन्या, मैत्रेयी पुष्पा की गुड़िया भीतर गुड़िया, रमणिका गुप्ता की हादसे, मन्नू भंडारी की एक सच ये भी का नाम पहले आता है। पर इसके साथ साथ दो और महत्वपूर्ण आत्मकथाएँ रहीं जिन्होंने जीवन का एक नया दृष्टिकोण सामने लाया। हम जब स्त्रीवादी नजरिये से जाति, वर्ग और जेंडर को देखते हैं तो पाते हैं कि इन तीनों ही में आपसी गहरा संबंध है। एक को समझने के लिए दूसरे को समझना बेहद जरूरी है। इस आपसी संबंध को कौशल्या बैसंत्री ने अपनी आत्मकथा दोहरा अभिशाप में काफी गहराई से अभिव्यक्त किया है। ये आत्मकथा इस लिए और भी खास हो जाती है कि यह हिंदी की पहली आत्मकथा है, जिसे किसी दलित स्त्री ने लिखा हो। दूसरी आत्मकथा है सुशीला राय की एक अनपढ़ आत्मकथा। सुशीला उ.प्र. के पूर्वांचल इलाके की रहने वाली है। उन्होंने किसी भी तरह की औपचारिक शिक्षा नहीं ग्रहण की। आलो आंधारि की लेखिका बेबी हालदार सातवीं तक पढ़ी थीं पर सुशीला राय अनपढ़ थीं। उनके पति बंगाल की चर्चित शख्शियत अशोक सेकसरिया के पास काम करते थे, जिनका सुशीला बेहद सम्मान करती थीं। उन्हें पत्र लिखने के लिए सुशीला ने जिद के साथ पढ़ना लिखना सीखा। वे कहती भी हैं कि अब हर बात तो दूसरों को बता के नहीं लिखवाई जा सकती।5

इस आत्मकथा को पढ़ते हुए बंगाल की रसासुंदरी देवी बार बार याद आती हैं। शिक्षा प्राप्ति के लिए दोनों ने बहुत संघर्ष किया। रसासुंदरी ने जहाँ छुपछुप के पढ़ना लिखना सीखा, वहाँ सुशीला ने अपने भाई को बुलाकर पढ़ना सीखा। ये आत्मकथा छोटी है पर जीवन के सबसे बड़े अभाव अशिक्षा, अक्षर ज्ञान ना होना, पति का काले रंग का होने के कारण पुष्पा को ना अपनाना, बाँझ होने के ताने सुनना आदि जीवन की घटनाओं की चर्चा के माध्यम से एक सशक्त रचना हुई है। भाषा का प्रभाव इतना सहज है कि ये कहना मुश्किल है कि ये आत्मकथा किसी अनपढ़ व्यक्ति ने लिखी है। मैत्रेयी पुष्पा के कस्तूरी कुंडल बसै व गुड़िया भीतर गुड़िया में भी शिक्षा प्राप्ति के लिए एक जबरदस्त संघर्ष मिलता है, जब लोकलाज और तानों की परवाह किए बगैर मैत्रेयी की माँ 22 साल की उम्र में झोला उठा कर पढ़ने स्कूल जाती है और मैत्रेयी से कहती है कि बिना शिक्षा हमारी जिंदगी के अँधेरे दूर ना हो सकेंगे। 6

हिंदी में लिखीं ये आत्मकथाएँ, जिन पर अवैध संबंधों की भरमार का आरोप हमेशा लगाया गया, वे अपने भीतर गहरे सामाजिक सरोकारों को लिए हुए हैं, यदि हम आत्मकथाओं की भाषा, आवाज और प्रस्तुतीकरण पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो इसके आलोक में इन आत्मकथाओं का अध्ययन करते हुए देखते हैं कि इन आत्मकथाओं की भाषा एक अलग ही भाषा है। इसका अनुमान हम इन आत्मकथाओं के शीर्षक देखकर ही लगा सकते हैं। गुड़िया भीतर गुड़िया, हादसे, दोहरा अभिशाप, एक कहानी यह भी, एक अनपढ़ कथा आदि शीर्षक हमें बताते हैं कि उनका जीवन क्या रहा होगा। वो एक ऐसे समाज में जीने को विवश कीं गई, जहाँ स्त्री का जीवन एक दोहरे अभिशाप की तरह है या अभी भी वह समाज के लिए गुड़िया ही है। इन मानकों में स्त्री के जीवन मुक्ति का संघर्ष भी इन आत्मकथाओं में मिलता है, अन्या से अनन्या बनने का रास्ता। एक कहानी यह भी लिखने का रास्ता।

वास्तव में इन लेखिकाओं के पास पुरुषों की आत्मकथाओं के समान किसी बड़ी परंपरा के निर्माण का दंभ नहीं है, बल्कि एक चेतनायुक्त व्यक्तित्व की पीर है, जो अपनी बीमारी के कारण को समझ रहा है और इलाज कर रहा है पर उसका इलाज दुनिया द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया है। इसी कारण जहाँ पुरुषों द्वारा संघर्षों का सामना उनका नायक रूप सामने लाता है क्योंकि अंत में वह अपनी परिस्थितियों पर नियंत्रण स्थापित करता है, वहीं स्त्रियों द्वारा किए संघर्ष उन्हें नायक या कहें कि सब्जेक्ट के रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाते, क्योंकि वे स्थितियों पर नियंत्रण का प्रयास सफलतापूर्वक नहीं कर पाती हैं। महिला होने के कारण उनके निजी अनुभवों से पर्दा उठाना उन्हें समाज की नजर में पहले ही नायक नही बल्कि खलनायक बना देता है, क्योंकि वे अपने जीवन और समाज में काम कर रहे पावर रिलेशंस को पहचानती हैं और उनका विरोध करती हैं।पर इन पावर रिलेशंस को बदलने और अपने स्पेस को तलाशने का प्रयास समाज द्वारा प्रशंसनीय नहीं होता। स्त्रियाँ लंबे समय स्वयं को स्थापित करने की जद्दोजहद करती हैं। गुड़िया भीतर गुड़िया में हम देखते हैं कि तीन बेटियों को जन्म देने के बाद खुद मैत्रेयी के गाँव के लोग बेटा पैदा करने के लिए उनके पति का दूसरा विवाह कराने के लिए मैत्रेयी पर जोर डालने लगते हैं।7 मैत्रेयी की तीसरी बेटी भी एक बार मैत्रेयी से पूछ ही लेती है कि उसका जन्म बेटे की इच्छा के कारण ही हुआ है ना?8 नायकत्व के इस अभाव के बारे में सुधा सिंह बताती हैं कि स्त्री जहाँ जन्मी-बढ़ी वह धरती और वहाँ के लोग उसके होने को ग्लोरीफाई नहीं करते। न ही पृष्टभूमि का काम करते हैं। वह वहाँ थी और उखड़े हुए पौधे की तरह वह और कहीं चली गई। विवाह कर के जाए या विवाह के बिना अपने अस्तित्व की तलाश में या अन्य किसी और कारण से अपने परिवेश से उसका विछोह होता है। ऐसे में वह उन परिस्थितियों पर गर्व नहीं कर सकती, जिनसे लड़ते हुए उसका अस्तित्व विकसित हुआ है। इन पर विजय उसके किसी भी तरह के विजेता भाव को जन्म देने में असमर्थ होता है। यह तो लीलने वाले परिवेश में अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है।9 यह स्त्री अस्तित्व की लड़ाई हर वर्ग में है,चाहें वह सिकुर्रा गाँव हो या दिल्ली की एम्स का रिहायशी इलाका।

अस्तित्व की लड़ाई की जानकारी का पता करना हो तो बाकी बातें छोडकर सिर्फ यही देख लें कि स्त्री की आत्मकथाओं में पुरुषों का जिक्र किस प्रकार आता है। पुरुष पिता, प्रेमी आदि के रूप में पूरी तरह स्त्रियों की जीवन घटनाओं के केंद्र में रहता है और उनकी जीवन गति को निर्धारित करता है। इसमें जाति और वर्ग का भेद बहुत पीछे रह जाता है। चाहे वो निम्नमध्यवर्गीय सुशीला राय हो, मध्यवर्गीय मैत्रेयी या मन्नू भंडारी हों, उच्चवर्गीय प्रभा हो या दलित स्त्री के रूप में कौशल्या हों, सभी अपने जीवन में पुरुषों और उनमें भी अपने जीवन साथियों के क्रोध के भय के नीचे समान रूप से ही जीती रहीं। ये अनुभव लगभग सभी आत्मकथा लेखिकाओं के समान ही रहे। ताने, हिंसा, पतियों के अन्य स्त्रियों के साथ संबंध सभी को इन महिलाओं ने झेला।

इन आत्मकथाओं पर कई बार ये आरोप लगे कि इन्होंने स्त्री की मुक्ति सिर्फ देह के माध्यम से ही खोजी, इसी लिए इन्होंने पुरुषों के समान अपने यौन संबंधों या समाज द्वारा अस्वीकृत अपने कई पुरुषों के साथ संबंधों को बेबाकी से सामने रखा। बाकी मुद्दों से वे कटी रहीं। पर ऐसा नहीं है, इन लेखिकाओं ने जातिवाद, सांप्रदायिकता, अशिक्षा जैसे मुद्दों पर व्यवस्थित चर्चा की है। पर यौनिकता भी एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रभा खेतान ने अपनी आत्मकथा अन्या से अनन्या में एक विवाहित डॉक्टर के साथ अपने संबंधों का जिक्र किया, बल्कि ये संबंध पूरी आत्मकथा के केंद्र में रहे। प्रभा उस व्यक्ति के प्रेम में अविवाहित रहीं और पूरी उम्र उसके परिवार को पालन पोषण में मदद करने के बाद भी भयानक सामाजिक उपेक्षा की शिकार रहीं। गौर करें कि वे एक बड़ा बिजनेस भी चलाती थीं। आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थीं। तब ऐसे क्यों हुआ कि वे सामाजिक उपेक्षा को सहकर भी एक ऐसे संबंध को जीती रहीं, जिसमें प्रेम तत्व धीरे धीरे विलुप्त होता रहा। दरअसल प्रभा का संबंध प्रेम पर नहीं, बल्कि असुरक्षा पर टिका था। गोरी ना होने के कारण उन्हें बचपन से अपने परिवार में उपेक्षा मिली। माँ बाप भाई बहनों ने कभी उनकी परवाह नहीं की। विदेश जाने पर कहा कि लौट कर मत आना। वहीं कहीं सैटल हो जाना।10 उस साठ के दशक का बंगाल भी भयानक अस्थिर वातावरण का सामना कर रहा था। ऐसे में एक स्त्री को जहाँ प्यार के दो शब्द पहली बार सुनने को मिले, उसने समर्पण कर दिया। उसके बाद कई बार सोचा भी कि इस संबंध से बाहर निकलूँ, पर किसी भी पारिवारिक या मित्रों के एक भावनात्मक लगाव के विकल्प का अभाव होने के कारण पुनः उसी संबंध में लौटना पड़ा। किसी भी व्यक्ति के लिए एक अदद भावनात्मक सहारे की सख्त जरूरत होती है, इसी लिए भले ही परिवार का प्रचलित संयुक्त या एकल रूप बदल रहा हो पर नए रूप में परिवार पुनः बन भी रहा है, चाहे वह लेस्बियन्स या गे संबंधों के आधार पर बने हों या आपसी समझ के आधार पर लिव इन संबंधों के आधार पर बने संबंध हों। परिवार व्यवस्था समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उसका स्वरूप परिवर्तित हुआ।

मैत्रेयी के युवा प्रेम में भी पारिवारिक प्रेम का अभाव सामने आता है, पर उनकी माँ की देखरेख उन्हें माँ से एक चिढ़ के बाद भी विकल्प देती है। विकल्पों का अभाव सिर्फ अविवाहित संबंधों ही में नहीं, बल्कि विवाहित संबंधों में भी मिलते है। मन्नू भंडारी की आत्मकथा में इस बात को हम देख सकते हैं। अपने पति के तमाम बुरे बर्ताव, अन्य स्त्रियों के साथ उनके संबंध, बार बार मन्नू को अकेले छोड़कर जाने के बाद वापस आना, फिर चले जाना आदि पर मन्नू ने लगातार उनकी उपेक्षा को सहा, और कोई भी मजबूत निर्णय लेने में 35 वर्ष की देरी की। गरिमा श्रीवास्तव इस स्थिति को बेहतर तरीके से व्याख्यायित करती हैं। वे कहती हैं कि "मन्नू भंडारी जैसी प्रतिष्ठित लेखिका का आत्मकथ्य स्त्री चेतना का पुरुषवादी चेहरा प्रस्तुत करता है, स्त्रियों के हक में किए जाने वाले संघर्षों में अंतर्विरोधों के विमर्श को समझने में यहाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्त्री रचनाकार के संघर्ष, महत्वाकांक्षा, अंतर्विरोध, पितृसत्तात्मक मानसिकता का वर्चस्व, सामाजिक असुरक्षा का भय - इन सबसे मिलकर जो चेहरा बनता है, वह भारतीय स्त्री विमर्श का चेहरा है, जो अभी भी अपने प्रारंभिक चरण में है, जहाँ स्त्री पुरुष की मानसिकता को बदलने के प्रयास में अपने को खो-खपा देती है। आर्थिक रूप से सशक्त और रचनाकार का सम्मान पाने के बावजूद अपनी शर्तों पर पुरुष से संबंध नहीं बना पाती।"11 पर मन्नू के इस संघर्ष का सबसे सबसे मजबूत पक्ष यह रहा कि अपने जीवन के तनावों को उन्होंने अपने लेखन पर हावी नहीं होने दिया और नकारात्मक स्थितियों के विरुद्ध अपने लेखन को लगातार पैना किया। एक स्त्री लेखिका अपने तय सामाजिक दायरे में किस तरह अपनी रचनात्मकता को बचाए रखने की जद्दोजहद करती है एक कहानी यह भी को इस दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए।

इन आत्मकथाओं में दर्शाए गए संबंधों के माध्यम से हम मानवीय संबंधों की जटिलताओं को बेहतर समझ सकते है,कि ये संबंध सिर्फ शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति नहीं है बल्कि यहाँ यह बताते हैं कि स्त्रियों के जीवन में जीवन के सम्मानजनित विकल्प का कितना अभाव है। दोहरा अभिशाप की लेखिका कौशल्या बैसंत्री भी लगातार अपने पति की उपेक्षा का शिकार होती रहीं। उनके पति जो कि उच्च पदस्थ अधिकारी थे। हमेशा चीनी और चाय की पत्ती जैसी चीजें ताले में बंद करके जाते थे। और माँगने पर कहते थे कि तुम खुद कमाओ। ये बातें आत्मकथा में आने पर दलित लेखक धर्मवीर कहते हैं कि घर का काम करने में कमाकर खाना नहीं कहा जा सकता। बाहर कमाकर लाने में भी घर का काम करना पड़ता है। अपने बच्चों को रोटी पकाकर देना कोई विशेष काम नहीं है। कमाने और रोटी पकाने के मेल से बच्चे पलते हैं, केवल गोल गोल रोटी पकाने से नहीं। साथ ही कहते हैं कि ये महिलाएँ अजगर की तरह होती हैं जो अपने पति की कमाई पर ऐश करती हैं। खुद कमाएँ और खाएँ पीएँ जितना खाना पीना हो12, पर ये विचारणीय है कि जो घरेलू श्रम उनकी पत्नी घर में कर रही है, सामाजिक पुनुरुत्पादन कर रही है, क्या उसकी कीमत सिर्फ दो वक्त का खाना है। दलित मुद्दों पर बात करने वाले अभी भी जेंडरगत असमानता के कितने खिलाफ हैं ये बात हमें कौशल्या के दोहरा अभिशाप में मिलती है, जो तिहरे शोषण, जाति, वर्ग और जेंडर पर बात करती है। दरअसल आत्मकथा में "आत्म" सेल्फ केंद्र में होता है, पर स्त्री आत्मकथाओं में उन्होंने अपने अन्या या अदर होने को केंद्र में रखा। इसे लिखने में स्त्रियों के भीतर कोई महान स्थान पाने की इच्छा नहीं थी, बल्कि ये उनके भीतर की बेचैनी थी, जो चेतना संपन्न होने के कारण समाज में बदलाव की उम्मीद कर रही थी। ताकि उनके अनुभवों को बाकी स्त्रियाँ भी अपने अनुभवों के साथ जोड़कर साझा कर सकें। आत्मकथा को स्त्रीवादी शोध-पद्धति में मौखिक इतिहास का प्रमुख स्रोत माना जाता है, जो कि लेखिका के साथ-साथ उसके समय और उसमें निहित परिवर्तन के इतिहास को भी दर्ज करता है, जिससे आत्मकथा सिर्फ लेखिका की अपनी कहानी भर नहीं रह जाती, बल्कि एक स्त्री के नजरिये से उसके समकालीन समय, समाज, धर्म, राजनीति आदि को समझने का माध्यम बन जाती है। ये आत्मकथाएँ 'पर्सनल इज पोलिटिकल' का बेहतरीन उदाहरण हैं। जिंदगी के गहरे अनुभवों से रची-बसी ये आत्मकथाएँ स्त्री-जीवन के हाशिएकरण से उद्वेलित दिखती हैं और अपने निजी को सार्वजनिक कर (जो कि मन के कई पर्दों, कई तालों में कैद था) एक विद्रोही तेवर अपनाती हैं। हम जानते हैं कि अधिकांश स्त्री लेखिकाएँ आज स्वयं को स्त्रीवादी कहने से हिचकती हैं या नाराजगी व्यक्त करतीं हैं। समाज की अन्य यौनिक अस्मिताओं को लेकर भी काफी पारंपरिक दृष्टिकोण रखतीं हैं लेकिन स्त्री होने के नाते संघर्षों से रू-ब-रू होते हुए कई बार परंपराओं का अतिक्रमण भी करती है। स्वयं को फेमिनिस्ट ना मानकर भी ये लेखिकाएँ महिला आंदोलन के हिस्से माने जाएँगे। भले ही ये अपनी सीमाओं का अतिक्रमण एक सीमा के भीतर ही कर पाए, फिर भी निजी दुनिया और सार्वजनिक दुनिया के बीच पड़े पर्दे को इन लोगों ने उठाया है, जो सराहनीय है। इसी बिंदु से इनका प्रतिरोध शुरू होता है।

संदर्भ सूची

1 . गरिमा श्रीवास्तव, पुनः अंकुरित होने की इच्छा और सामर्थ्य की कहानी, समयांतर, जून 2008, पृष्ठ17
2 . पंकज चतुर्वेदी, आत्मकथा की संस्कृति
3 . प्रेम का स्त्री अर्थ, सं. - आशुतोष कुमार
4 . प्रभा खेतान, अन्या से अनन्या, राजकमल पेपरबैक्स, 2010, पृष्ठ - 255
5 . सुशीला राय, एक अनपढ़ कहानी, रोशनाई प्रकाशन, 2005, पृष्ठ - 22
6 . मैत्रेयी पुष्पा, गुड़िया भीतर गुड़िया, राजकमल प्रकाशन, 2008
7 . वही पृष्ठ - 101
8 . वही पृष्ठ - 92
9 . रसा सुंदरी देवी, मेरा जीवन, अनु. - सुधा सिंह, स्वराज प्रकाशन, 2010, पृष्ठ (x)
10 . प्रभा खेतान, अन्या से अनन्या, राजकमल पेपरबैक्स, 2010, पृष्ठ - 106
11 . धर्मवीर, दोहरा अभिशाप, कितना दोहरा, एक अजगर औरत की कथा, हंस, सत्ता विमर्श और दलित, 2004, पृष्ठ - 68
12 . गरिमा श्रीवास्तव, पुनः अंकुरित होने की इच्छा और सामर्थ्य की कहानी, समयांतर, जून 2008, पृष्ठ - 17
13 . मन्नू भंडारी, एक कहानी यह भी, राधाकृष्ण प्रकाशन, पेपरबैक्स, 2008


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में अवंतिका शुक्ल की रचनाएँ



अनुवाद