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धारावाहिक प्रस्‍तुति (1 सितंबर 2026), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

उपन्‍यास

पथ के दावेदार
शरतचंद्र चट्टोपाध्याय

अपूर्व के मित्र मजाक करते, ''तुमने एम.एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती-जाती रहती हैं?'' अपूर्व उत्तर देता, ''एम.एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुद्ध तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम.एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।'' मित्र कहते, ''तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।'' अपूर्व हंसकर कहता, ''यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।'' अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह्मणी से भी आगे बढ़े जा रहे हो।'' अपूर्व हंसकर कहता, ''आगे बढ़ जाना आसान नहीं है भाभी! माता जी के पास कोई बेटी नहीं है। उनकी उम्र भी काफी हो चुकी है। अगर बीमार पड़ जाएंगी तो पवित्र भोजन बनाकर तो खिला सकूंगा। रही चिमटा, कमंडल की बात, सो वह तो कहीं गया नहीं?'' अपूर्व मां के पास जाकर कहता, ''मां! यह तुम्हारा अन्याय है। भाई जो चाहें करें लेकिन भाभियां तो मुर्गा नहीं खातीं। क्या तुम हमेशा अपने हाथ से ही भोजन बनाकर खाओगी?''

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कविता

रसखान
सुजान रसखान

मानुष हों तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्‍वारन।
जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं बसेरो करौं मिल कालिंदी कूल कदंब की डारन।।1।।

जो रसना रस ना बिलसै तेहि देहु सदा निदा नाम उचारन।
मो कत नीकी करै करनी जु पै कुंज-कुटीरन देहु बुहारन।
सिद्धि समृद्धि सबै रसखानि नहौं ब्रज रेनुका-संग-सँवारन।
खास निवास लियौ जु पै तो वही कालिंदी-कूल-कदंब की डारन।।2।।

बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सों सानी।
हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी।
जान वही उन आन के संग और मान वही जु करै मनमानी।
त्‍यौं रसखान वही रसखानि जु है रसखानि सों है रसखानी।।3।।

दोहा
कहा करै रसखानि को, को चुगुल लबार।
जो पै राखनहार हे, माखन-चाखनहार।।4।।

निबंध संग्रह
नर्मदा प्रसाद उपाध्याय
बैठे हैं आस लिए

कविता संग्रह
अजय प्रसून
अनागत शक्ति: अहिल्याबाई होल्कर

 कहानी संग्रह
रश्मि दीक्षित
समानांतर जीवन के

निबंध
राहुल मिश्रा
हर घर तिरंगा : राष्ट्रीयता का महाघोष

कहानी संग्रह
सविता मिश्रा
सुधियों के अनुबंध

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ISSN 2394-6687

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