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धारावाहिक प्रस्‍तुति (05 मार्च 2026), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार
खंड काव्य

जयद्रथ वध
मैथिलीशरण गुप्त

वाचक ! प्रथम सर्वत्र ही ‘जय जानकी जीवन’ कहो,
फिर पूर्वजों के शील की शिक्षा तरंगों में बहो।
दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्य पूर्वक सब सहो,
होगी सफलता क्यों नहीं कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।।
अधिकार खो कर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है;
न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है।
इस तत्व पर ही कौरवों से पाण्डवों का रण हुआ,
जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ।।
सब लोग हिलमिल कर चलो, पारस्परिक ईर्ष्या तजो,
भारत न दुर्दिन देखता, मचता महाभारत न जो।।
हो स्वप्नतुल्य सदैव को सब शौर्य्य सहसा खो गया,
हा ! हा ! इसी समराग्नि में सर्वस्व स्वाहा हो गया।
दुर्वृत्त दुर्योधन न जो शठता-सहित हठ ठानता,
जो प्रेम-पूर्वक पाण्डवों की मान्यता को मानता,
तो डूबता भारत न यों रण-रक्त-पारावार में,
‘ले डूबता है एक पापी नाव को मझधार में।’
हा ! बन्धुओं के ही करों से बन्धु-गण मारे गये !
हा ! तात से सुत, शिष्य से गुरु स-हठ संहारे गये।
इच्छा-रहित भी वीर पाण्डव रत हुए रण में अहो।
कर्त्तव्य के वश विज्ञ जन क्या-क्या नहीं करते कहो ?
वह अति अपूर्व कथा हमारे ध्यान देने योग्य है,
जिस विषय में सम्बन्ध हो वह जान लेने योग्य है।
अतएव कुछ आभास इसका है दिया जाता यहाँ,
अनुमान थोड़े से बहुत का है किया जाता यहाँ।।
रणधीर द्रोणाचार्य-कृत दुर्भेद्य चक्रव्यूह को,
शस्त्रास्त्र, सज्जित, ग्रथित, विस्तृत, शूरवीर समूह को,
जब एक अर्जुन के बिना पांडव न भेद कर सके,
तब बहुत ही व्याकुल हुए, सब यत्न कर करके थके।।

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निबंध

भारतीय राष्ट्रीयता
आनंद केंटिश कुमारस्वामी

राष्ट्रीय आत्मचेतना जिससे राष्ट्रीयता संगठित होती है किन आयामों के कारण सम्भाव्य होती होगी? नि:संदेह किसी प्रकार की एकता तो आवश्यक है। यद्यपि एकता के कुछ प्रकार ऐसे हैं जो अनावश्यक हैं, और कुछ अपर्याप्त। उदाहरण के लिए उत्तर अमेरिका के नीग्रों लोगों की नस्ली एकता किसी राष्ट्रीयता की पूरक नहीं। नस्ली एकता न्यून कारक है; ब्रिटेन की ओर देखिये जिसका गठन नाना प्रकार के नस्लों से मिलकर हुआ है, लेकिन वह राष्ट्रीय आत्मचेतना का अच्छा उदाहरण है। एक और उदाहरण देखें. आयरिश वासियों में कई लोग असल में अंग्रेजी मूल के हैं। कीटिंग और एमेट जैसे नार्मन वंश से थे, लेकिन इसके कारण आयरिश राष्ट्रभाव और आत्मचेतना की अभिव्यक्ति में कोई कमी नहीं आती है। साथ ही चेतना की अभिव्यक्ति के लिए सामान्य और विशेष भाषा की भी दरकार नहीं; स्विट्ज़रलैंड जहाँ तीन भाषाओँ में बटा हुआ है वही आयरलैंड दो में। राष्ट्रीयता के दो अनिवार्य तत्त्व हैं- एक भौगोलिक पूर्णत्व, और दूसरा एक्य(आम) ऐतिहासिक उद्भव व संस्कृति। यह दोनों तत्त्व कई और विभिन्न संयोगों के साथ भारत की बनावट में प्रचुरता से हैं जिससे ऐतिहासिक परंपरा को मजबूती मिलती है।

उपन्यास
सीमा जैन
तुझको-चलना-होगा

कहानी संग्रह
महेश केसरी
मुआवजा

 कहानी
रंजना जायसवाल
अम्मा का बटुवा

कविता संग्रह
अमरकांत कुमर
गा बंजारा

अन्य
अंशुमन भगत
राजनीतिक घेराव

संरक्षक
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कुलपति

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ISSN 2394-6687

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