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कविता

पूर्वज कवि
महेश वर्मा


पूर्वज कवि आते हैं
और सुधार देते हैं मेरी पंक्तियाँ
मैं कहता हूँ कि हस्ताक्षर कर दें जहाँ
उन्होंने बदला है कोई शब्द या पूरा वाक्य

होंठ टेढ़ा करके व्यंग्य में मुस्काते
वे अनसुनी करते हैं मेरी बात

उनकी हस्तलिपि एक अभ्यस्त हस्तलिपि है
                 अपने सुंदर दिखने से बेपरवाह
                 और तपी हुई
                 कविता की ही आँच में

सुबह मैं ढूँढ़ता उनके पदचिह्न ज़मीन पर
सपनों पर और अपनी कविता पर

फुर्र से एक गौरय्या उड़ जाती है खिड़की से

 


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हिंदी समय में महेश वर्मा की रचनाएँ