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कविता

वर्षाजल
महेश वर्मा


अगर धरती पर कान लगाकर सुनो
इतिहास की कराहटें सुनाई देंगी।
सम्राटों की हिंस्र इच्छाएँ,
साम्राज्ञियों के एकाकी दुःख,
स्त्रियों के रुदन की चौड़ी नदी का हहराता स्वर -
गूँजते हैं धरती के भीतर।
ऊपर जो देखते हो इतिहास के भग्नावशेष
सूख चुके जख़्मों के निशान हैं त्वचा पर।
फिर लौटकर आई है बरसात -
जिंदा घावों को धो रहा है वर्षाजल।


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