hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

दूसरी ओर से
महेश वर्मा


अगर खूब याद रखें तो भी
थोड़ी ही देर में भूल जाते कि कैसे दिख रहे हैं
हम इस क्षण उस दूसरी ओर से।
कितनी कातर, मुस्कान की हमारी यह मुद्रा
जो दूसरी ओर से दिखती शायद व्यंग्य,
तीसरी ओर से खीज और किसी परम कोण से
होती एक समर्पण।
कैसा दिखाई देता हमारा क्रोध औ हमारा प्रेम,
दूसरे किसी कोण से कैसे दिखते हमारे जीवन के ये कोण।
सभी दिशाएँ बदल जाएँ आईनों में तो भी
बहुत कम होते वह कोण जिधर से
ठीक ठीक हम देख पाते अपने होने का आकार।
और कितनी अनंत वे जगहें
जहाँ के बारे में सोचना भी असंभव
कि कैसा दिखेगा हमारा होना - वहाँ से।
जितना थोड़ा होता हमारे जानने में हमारा होना,
उससे भी कितना कम होता
हमारे जानने में हमारा दिखना।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में महेश वर्मा की रचनाएँ