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कविता

चढ़ आया है पानी
महेश वर्मा


देह के भीतर चढ़ता जा रहा है पानी
बाहर आईने में रोज परख रहा हूँ मैं
अपनी त्वचा का आश्वासन,
एक पुराने चेहरे के लिए
मेरे पास है मुस्कान का समकालीन चेहरा।
कल जो कमर तक था पानी आज
चढ़ आया है सीने तक
सुनाई देने लगी है कानों में हहराते पानी की आवाज़
दिखाई देते हैं फुनगी के थोड़े से पत्ते
डूब जो चुकी है पगली झाड़ी।
किसी पर्व की रात सिराए दीपक सी
अब भी डगमग उतराती हो आत्मा
इसी बढ़ते जल में


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