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कविता

मिट्टी तेल
महेश वर्मा


चाहे कुछ भी कहते हों उसका संभ्रांतजन
हमारी ओर तो मिट्टी तेल ही पुकारा जाता रहा हमेशा उसे
पुरानी घटना नहीं है इससे जलती लालटेन की उजली रौशनी में
दीवार पर डोलती परछाइयाँ।
कहाँ ख़त्म हुई है हवा से
पंप वाले स्टोव की भरभराती आवाज़।
जितने गहरे से यह आया है ऊपर
पार करते कितने तरह की मिट्टियाँ -
उससे भी गहरा मिट्टी से इसका अनुराग
कि मिट्टी तेल से भी नहीं जलती हमारी धरती
जो अब तक बनी हुई है मिट्टी से।
आज लौटे हैं लेकर इतनी सारी आग
लाखों साल पुराने हमारे पुरखे, हमारे जीव।
घूमते इतने सारे लोग सड़क पर
भीतर इतने कल का मिट्टी तेल, अगर कोई
सुलगा ले माचिस से अपनी तर्जनी की पोर
जल पाएगी थोड़ा पहले
क्या थोड़ी सी भी आग?


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