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कविता

उतर गया है पानी में
महेश वर्मा


बढ़ते-बढ़ते उतर गया है -
छाती तक पानी में।
अचरज नहीं, तट की बजाय
विगत ग़लतियाँ याद आने लगें।
मंथर गति से हलकोरते
गहरे उतरते पानी में -
गूँजता है घमासान पुरानी हिंसाओं का
खोपड़ी में।
अब तक बाहर बची एक तिहाई देह में
दहाड़ते हैं प्राचीन दुःख।
चारों ओर अपरिमित जल है आँसू नहीं है।
कहाँ से आ रही है वंशी की पुरानी टेर?
मुड़ते ही जो हो गया पत्थर -
क्या कहेगा जल?
और दावानल?
अक्षुण्ण अग्नि की लपलपाती शाखाओं को
धारण किए -
बढ़ते बढ़ते उतर गया है
छाती तक पानी में।


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