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कविता

मिलने गया था
महेश वर्मा


बीच में अपने बोलने के वाक्य ही में डूब जाता फिर कुछ
देर पर उसी डूबने की जगह से उसकी थकन बुदबुदाने लगती। कमरे
में अँधेरा छा जाता। कई सूर्यास्त और साल डूब गए उसके बोलने में,
डूबने में, इतने दिनों के बाद वह लौटा था।

बाहर भी गहराती होगी शाम सोचते उठने के मेरे उद्विग्न से
बेपरवाह उसके बोलने में शत्रुओं, स्त्रियों और समर्थ लोगों पर
हिंसा की असमाप्त नदियाँ, इतना उदास और साँवला
होना था जिनका पानी कि अपने भीतर डुबोने का
दु:स्वप्न रचतीं, बहतीं फिर बहना भूल जातीं।
उधड़ी हुई जगहों से रेत और जिंदगी के सूख चुके साल
झरते रहते।

कितना ग़लत था सोचना कि पुराना कवि अपने डूबने में बाहर
कोई जगह खाली करता है नए कवि के लिए, अपने मरने में
बूढा चित्रकार नौजवान चित्रकार के लिए... और ऐसे ही बाकी सब।
बस थोड़ा असावधान था यह कि आसानी से व्यवस्था
इसका शिकार कर पाई और इतना तो अकेला कर ही पाई
दूसरों को जितना यह होता था बाहर।
जितना यह होता था हमारे भीतर हम इसके भीतर वह भी
डूबा इसके डूबने में, क्या फर्क की ये मात्राएँ अलग अलग?

ऐसा नहीं तो क्यूँ उदास कर पाती यह बात मुझको लौटते में
और फिर ये भी कि इससे मिलने जाता ही क्यूँ?


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