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कविता

पैर मोढ़े पर
स्नेहमयी चौधरी


डाक्टर बोला - पैर सूज जाते हैं,
इसलिए पैरों को मोढ़े पर रक्खो ...रख लिया...
पर उसके आगे चाय का स्टूल है
जो पैरों से खिसकाया नहीं जा सकता -
जब से हिपबोन की हड्डी टूटी -
झुकना मना है
तो झुककर हटा भी नहीं सकती...
अब हीटर के सामने बैठे-बैठे चाय पीते रहो और
नौकरों के उठने का इंतजार करो,
कब वे उठें, उसे हटाएँ और मैं उठूँ...
बस बैठे-बैठे अपने पर दया करते रहो -
यह भी कोई जीवन हुआ ?
पर जी रहे हैं
जैसे अनंत काल तक जीना है -
ऐसे ही बैठे-बैठे?


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हिंदी समय में स्नेहमयी चौधरी की रचनाएँ