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कविता

धूप : एक गौरइया
स्नेहमयी चौधरी


मैंने कहा धूप से -
धूप! जरा ठहरो,
मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी,
यहाँ यह ठिठुरन,यह अंधियारा
मुझे तनिक नहीं भाता है।
लेकिन धूप,धूप थी,
भला क्यों रुकती !
मुझे मटमैली साँझ दे चली गई।
मैंने देखा : मेरे ऊपर से
पंख फड़फड़ा गौरइया एक क्षितिज की ओर उड़ी
जाने कहाँ खो गई।


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