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कविता

एक मनःस्थिति
स्नेहमयी चौधरी


बार-बार अपनी ही कविताओं को
पढ़ने की इच्छा करता हुआ मन
किसी दूसरे के बढ़े हुए हाथ की
तलाश में घूमता है।

अजब स्थिति है :
बदराया हुआ आसमान
न बरसता है, न खुलता।

सारा शहर
बंद खिड़कियों वाला
एक कमरा हो गया है।

आड़ी-तिरछी रेखाएँ
बनाता हुआ धुआँ
जब बादलों की एक और परत बन जाता है -
मैं अपने बूढ़े पिता को पत्र लिखने लगती हूँ,
जिसमें भाई, बहनों और सफेद बालों वाली माँ
की कुशल-क्षेम के प्रति उत्सुकता है।

मेरे सामने :
पौधों को स्थानांतरित करने की
प्रक्रिया में माली
हर रंग, हर आकार के फूलों को
पास-पास रख चुका है।

जाने किस अभाव में
ओस-भीगी घास
जिस पर मैं बैठी हूँ
और गीली लगने लगी है।

हालाँकि
झर-झर कर
पीपल की सूखी पत्तियाँ
एकत्र हो चुकी हैं,
मेरे पीछे आ कर।


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हिंदी समय में स्नेहमयी चौधरी की रचनाएँ