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कविता

नई पहचान
स्नेहमयी चौधरी


जीवन के खेल में हारकर
उसने ताश के खेल में जीतना सीख लिया
अंदर से पूरी तरह टूटकर
उसने कागज पर चित्र रचना सीख लिया

एक केंद्र पर हुई पराजय
दूसरे को पर विजय बन गई
अपनों से बिलगने की प्रक्रिया में
दूसरों से जुड़ना उसकी नई पहचान बन गई।


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हिंदी समय में स्नेहमयी चौधरी की रचनाएँ